खबर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खबर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

29 दिसंबर 2016

अफ़वाह, सोशल मीडिया और पोस्ट ट्रूथ का दौर

--    दिलीप ख़ान
सोशल मीडिया के दौर में ख़बरों और सूचनाओं की बमबारी ने हमें उस जगह ला खड़ा किया है जहां किसी भी ख़बर की अगर आपने पुष्टि करने की कोशिश नहीं की तो अफ़वाहों के शिकंजे में ख़ुद को आप जकड़ा पा सकते हैं। मामला सिर्फ़ सोशल मीडिया यूजर्स या आम लोगों तक सीमित नहीं है, अफ़वाह फैलाने के तंत्र के तौर पर जिस बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल हो रहा है उसकी ज़द में वो तमाम संस्थान हैं, जिन्हें आप ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ कहते हैं। जिनका काम है ख़बरों को आप तक पहुंचाना और ज़िम्मेदारी के साथ पहुंचाना। 

2000 के नोट जिसमें 'चिप' की बात कही गई

2016 में ऐसी कई ‘ख़बरें’ सोशल मीडिया से उछलकर टीवी और अख़बारों में टंग गईं जो पूरी तरह झूठ थीं। नोटबंदी के बाद जब 2000 रुपए का नोट छापा गया तो इसमें किसी ऐसी ‘चिप’ लगे रहने की अफ़वाह ज़ोरों से उड़ी, जोकि ‘ज़मीन के 200 मीटर अंदर भी नोट का लोकेशन बताने में क़ामयाब’ हो। हिंदी और अंग्रेज़ी के तमाम बड़े अख़बारों ने पहले पन्ने पर इसे छापा। इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर राजस्थान पत्रिका तक शामिल हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया पूरी दुनिया में अंग्रेज़ी का सबसे बड़ा अख़बार है। सबसे ज़्यादा पाठक इसे पढ़ते हैं, लेकिन बिना किसी पुष्टि के अख़बार ने पहले पन्ने पर एक ऐसा झूठ छापा जिसकी कोई बुनियाद नहीं थी। हद तो तब हो गई, जब उग्र दक्षिणपंथ के एजेंडे को लगातार देश में स्थापित करने की कोशिश करने वाले ज़ी न्यूज़ ने इस पर ख़बर दिखाई। चैनल के सबसे बड़े चेहरे सुधीर चौधरी ने इस पर लंबा शो किया और ‘चिप’ की ख़ासियत कई मिनटों तक दर्शकों को समझाते रहे।

जैसे ही इस ‘ख़बर’ को कथित राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिली, इसके भीतर ‘अफ़वाह’ का तत्व झड़कर अलग हो गया और उसी प्लेटफॉर्म पर अब ये विश्वसनीय तरीके से फैलने लगी, जहां से इसकी उत्पत्ति हुई थी। यानी सोशल मीडिया पर फैले इस झूठ ने ‘मुख्यधारा के मीडिया’ में घुसकर ख़ुद को ‘तथ्य’ में तब्दील कर दिया और यही ‘तथ्य’ अब उस सोशल मीडिया पर सच के तौर पर नए सिरे से नमूदार हुआ। सरकार की सफ़ाई के बावजूद ख़बर के फ़ैलाव के चलते लोगों का चिप पर बना यक़ीन टूटा नहीं। करोड़ों लोगों को आज भी लगता है कि उस नोट में ‘चिप’ लगी है और सरकार गुप्त तरीके से खंडन कर उस चिप का आपातकालीन इस्तेमाल करने में जुटी है।

सुधीर चौधरी ने नोट में 'चिप' पर पूरा शो कर डाला

इस ख़बर के खंडन में भी तमाम ख़बरें मीडिया में आईं, लेकिन तब तक करोड़ों लोगों के पास ‘पहले पहुंच चुकी सूचना’ एक तरह से ‘तथ्य’ के तौर पर स्थापित हो चुकी थी। बतौर खंडन आई ख़बर भी एक तथ्य के तौर पर ही पहुंची। यानी अब एक ही मामले पर दो तथ्य थे। कौन सा तथ्य सही है और कौन सा नहीं, ये साबित करना दोनों पक्ष के लिए उतनी ही मशक्कत भरा काम बन गया। जो अफ़वाह को ‘तथ्य’ मानकर चल रहा है उसके लिए आपके द्वारा पेश की गई सच्चाई भी महज एक ‘तथ्य’ ही है और ये ज़रूरी नहीं कि आपके द्वारा पेश किए गए तथ्य से वो अपने ‘तथ्य’ को कट जाने दें। 


असल में सोशल मीडिया के बाद पोस्ट ट्रूथ के विमर्श के मूल में यही आपाधापी और सनकपन है, जहां शोध और आमफ़हम जानकारियों के वजन को बराबर की कमोडिटी मान लिया गया हैं। मान लेते हैं कि आपने बहुत रिसर्च किया, और किसी ने उसी मुद्दे पर कोई जानकारी WhatsApp पर पाई। आपने किसी विश्वसनीय अख़बार/पत्रिका/जर्नल में कोई लेख पढ़ा और किसी ने उसी मुद्दे पर किसी टीवी चैनल में कोई कार्यक्रम देख लिया। किसी ने अपने भरोसेमंद व्यक्ति के मुंह से वो ‘फैक्ट’ पा लिया, जिसके लिए आपने दिन-रात एक की हो। आपने पूरी तन्मयता और मेहनत के साथ किताब पढ़ी, और उसी मसले पर किसी व्यक्ति ने पसंदीदा लोगों के फ़ेसबुक स्टेटस पढ़ लिए। हो सकता है कि आपकी जानकारी और तथ्य उससे बहुत अलग, बहुत विशद और सत्य के ज़्यादा क़रीब हो, लेकिन जिसने whatsApp या फ़ेसबुक पर वो जानकारी पाई है, उसके लिए आपकी मेहनत का कोई मोल नहीं है। उसके लिए जो मायने रखता है वो ये कि आपके पास भी किसी मुद्दे पर कोई जानकारी है और उसके पास भी एक जानकारी है। बिल्कुल उलट जानकारी होने के बावजूद उसे ख़ुद के ‘तथ्य’ पर भरोसा है।

नरेन्द्र मोदी को दुनिया के बेहतरीन प्रधानमंत्री क़रार देने की अफ़वाह तेज़ी से फैली

आपकी मेहनत और उसकी कोशिश का अंतिम नतीजा क्या है? दोनों के पास आख़िर में आया क्या? फैक्ट्स। आपका फैक्ट सही है और उनका ग़लत, ये साबित करने में आपका पसीना निकल जाएगा। सबको अपने-अपने फैक्ट्स पर भरोसा है। सबका अपना-अपना तथ्य है। पोस्ट ट्रूथ दौर में तथ्यों का उत्पादन और पुनरुत्पादन हो रहा है। सच के कई शेड्स बन गए हैं जिनमें कौन सा सच सही है ये तय कर पाना मुश्किल बना दिया गया है। 

सच को भी एक तथ्य माना गया है और अफ़वाह को भी एक 'तथ्य'। ऐसे में सच का कोई अलग मोल नहीं है। सच को झूठी सूचनाओं की बमबारी से ढंक देने की कोशिश दुनिया भर में जारी है। 2000 रुपए के नोट में ‘चिप’ की बात कोई इकलौता मामला नहीं है जिसे आप अपवाद करार दें। पिछले कुछ महीनों में आपने ये ख़बरें भी पढ़ी होंगी कि यूनेस्को ने नरेन्द्र मोदी को दुनिया का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री क़रार दिया या फिर यूनेस्को ने ‘जन गण मन’ को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगाण बताया है। इसे आज भी करोड़ों लोग सच मानते हैं और ऐसी ‘ख़बरों’ के उत्पादन करने वालों का जो लक्ष्य था, उसे उतनी मज़बूती से लोग मुहर लगा रहे हैं जितनी किसी सांगठनिक-सांस्थानिक और महीनों की मेहनत से की गई पत्रकारिता पर। 

आपको लग सकता है कि मामले को जितना गंभीर बनाकर पेश किया जा रहा है उतना है नहीं, तो दुनिया भर में पिछले कुछ महीनों से चल रही ख़बरों पर नज़र दौड़ाइए और देखिए कि कितने बड़े-बड़े फ़ैसले ऐसी अफ़वाहों की बदौलत हो चुके हैं। कैथरीन विनर ने हाल ही में द गार्डियन में पोस्ट ट्रूथ के मुद्दे को समझाने के लिए ‘ब्रेग्जिट’ का उदाहरण दिया और बताया कि यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के मामले में जो जनमत संग्रह हुआ, उसमें अफ़वाहों ने कैसे बड़ी भूमिका अदा की। अलग होने वालों के समर्थकों ने जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया था, वो था ‘यूरोपियन यूनियन से अलग होने पर हर ब्रिटिश परिवार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत ख़र्च करने के लिए 12000 पाऊंड हर हफ्ते ज़्यादा मिलेंगे’। ब्रेग्जिट का नतीजा घोषित होते ही सारे प्रचारकों ने उसी दिन खुलकर माना कि इस दावे में सच्चाई नहीं है और ये महज प्रचार के उद्देश्य से किए गए थे। 

भारत में इसे आजकल हम और आप ‘जुमला’ नाम से जानते हैं। सोशल मीडिया ने जुमलों की शक्ति को बढ़ा दिया है और जुमले आजकल तथ्य के तौर पर स्थापित होने की पूरी कोशिश में है। झूठा साबित होने के बावजूद ऐसे 'तथ्यों' का उत्पादन नहीं रुक रहा। ये मान लिया गया है कि 'झूठे तथ्यों' में भी उतनी ही शक्ति है जितनी एक तथ्य में। सवाल ये है कि अफ़वाह को कितने आत्मविश्वास से भरोसेमंद बनाकर उसे लोगों के ज़ेहन में उतार दिया जा रहा है। 

अथॉरिटी पर सवाल न करने में यक़ीन रखने वाले लोग इस अफ़वाह के सबसे बड़े उपभोगकर्ता है और एक तरह से उत्पादकों के साथ उनकी मिलीभगत है और ये लोग ऐसी अफ़वाहों को 'एंप्लिफाई' करने में जुटे रहते हैं। चेतनाशून्य और क्रिटिकल दिमाग़ को एक तरफ़ भोथड़ा बनाने की कोशिश जारी है और दूसरी तरफ़ अफ़वाहों की खेती। दूसरे को चलाने के लिए पहला कदम बहुत ज़रूरी है।

(इसी मुद्दे पर कैथरीन विनर के लेख का अनुवाद के बाद ये लेख लिखा है। जल्द ही उस लेख को भी ब्लॉग पर लगाया जाएगा।)

26 नवंबर 2013

तहलका का साहस अब कहां है? - अरुंधति रॉय

'तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स को छापा था. मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है. मैं मीडिया के शोरशराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं. एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है. लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है. अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिए घूमने लगे हैं. अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे. तरुण कई बरसों से मेरे एक दोस्त थे. मेरे साथ वे हमेशा उदार और मददगार रहे थे. मैं तहलका की भी प्रशंसक रही हूं, लेकिन मुद्दों के आधार पर. मेरे लिए तहलका के सुनहरे पल वे थे जब इसने आशीष खेतान द्वारा गुजरात 2002 जनसंहार के कुछ गुनहगारों पर किया गया स्टिंग ऑपरेशन और अजित साही की सिमी के ट्रायलों पर की गई रिपोर्टिंग को प्रकाशित किया. हालांकि तरुण और मैं अलग अलग दुनियाओं में रहते हैं और हमारे नजरिए (राजनीति भी और साहित्यिक भी) भी हमें एक साथ नहीं लाते और जिससे हम और दूर चले गए. अब जो हुआ है, उसने मुझे कोई झटका नहीं दिया, लेकिन इसने मेरा दिल तोड़ दिया है. तरुण के खिलाफ सबूत यह साफ करते हैं कि उन्होंने ‘थिंकफेस्ट’ के दौरान अपनी एक युवा सहकर्मी पर गंभीर यौन हमला किया. ‘थिंकफेस्ट’ उनके द्वारा गोवा में कराया जाने वाला ‘साहित्यिक’ उत्सव है. थिंकफेस्ट को खनन कॉरपोरेशनों की स्पॉन्सरशिप हासिल है, जिनमें से कइयों के खिलाफ भारी पैमाने पर बुरी कारगुजारियों के आरोप हैं. विडंबना यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में ‘थिंकफेस्ट’ के प्रायोजक एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें अनगिनत आदिवासी औरतों का बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं और हजारों लोग जेलों में डाले जा रहे हैं या मार दिए जा रहे हैं. अनेक वकीलों का कहना है कि नए कानून के मुताबिक तरुण का यौन हमला बलात्कार के बराबर है. तरुण ने खुद अपने ईमेलों में और उस महिला को भेजे गए टेक्स्ट मैसेजों में, जिनके खिलाफ उन्होंने जुर्म किया है, अपने अपराध को कबूल किया है. फिर बॉस होने की अपनी अबाध ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने उससे पूरे गुरूर से माफी मांगी, और खुद अपने लिए सजा का एलान कर दिया-अपनी ‘बखिया उधेड़ने’ के लिए छह महीने की छुट्टी की घोषणा-यह एक ऐसा काम है जिसे केवल धोखा देने वाला ही कहा जा सकता है. अब जब यह पुलिस का मामला बन गया है, तब अमीर वकीलों की सलाह पर, जिनकी सेवाएं सिर्फ अमीर ही उठा सकते हैं, तरुण वह करने लगे हैं जो बलात्कार के अधिकतर आरोपी मर्द करते हैं-उस औरत को बदनाम करना, जिसे उन्होंने शिकार बनाया है और उसे झूठा कहना. अपमानजनक तरीके से यह कहा जा रहा है कि तरुण को राजनीतिक वजहों से ‘फंसाया’ जा रहा है- शायद दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा. तो अब एक नौजवान महिला, जिसे उन्होंने हाल ही में काम देने लायक समझा था, अब सिर्फ एक बदचलन ही नहीं है बल्कि फासीवादियों की एजेंट हो गई? यह एक और बलात्कार है- उन मूल्यों और राजनीति का बलात्कार जिनके लिए खड़े होने का दावा तहलका करता है. यह उन लोगों की तौहीन भी है, जो वहां काम कर रहे हैं और जिन्होंने अतीत में इसको सहारा दिया था. यह राजनीतिक और निजी, ईमानदारियों की आखिरी निशानों को भी खत्म करना है. मुक्त, निष्पक्ष, निर्भीक. तहलका खुद को यह बताता है. तो साहस अब कहां है?' 
आउट्लुक से हिन्दी अनुवाद रेयाज-उल-हक़


तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!- क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा

तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!
पीड़ित महिला पत्रकार के पक्ष में न्यायपूर्ण कार्रवाई करो!!
साम्राज्यवादी-सामंतवादी संस्कृति को ध्वस्त करो!!

पिछले दो वर्षों में महिला की सुरक्षा की जितनी दावेदारी राज्य सरकारों और संसदीय पार्टियों ने किया है उससे कई गुना महिला उत्पीड़न की घटनाएं घटीं। पिछले दिसम्बर में बलात्कार की हुई घटना से दिल्ली ही नहीं पूरा देश सड़क पर उतर पड़ा था। इसके बावजूद न तो बलात्कार की घटनाओं में कमी आ रही है और न ही उत्पीड़न की घटनाओं में गिरावट का संकेत मिल रहा है। यह तकलीफदेह हालात एक रोजमर्रा की खबर और जीवनचर्या का हिस्सा बनता हुआ लग रहा है। मानो यह सब कुछ होना समाज का अनिवार्य हिस्सा हो। किसी सांसद, विधायक, नौकरशाह आदि का इस तरह की घटनाओं में लिप्त होना इस तरह के विचार को बनाने में न केवल मदद करता है बल्कि इस तरह के घिनौने समाज विरोधी कार्य को वैधानिकता भी प्रदान करता है। एक मीडियाकर्मी की लिप्तता इस भयावह स्थिति का एक ऐसा नमूना है जिसके नीचे वर्तमान साम्राज्यवादी-सामंतवादी आर्थिक-सामाजिक ढांचा सड़ रहा है और जिसका खामियाजा पूरा समाज और महिलाएं भुगत रही हैं।

तरुण तेजपाल, मुख्य संपादक, तहलका ने गोवा में अपनी पत्रिका द्वारा आयोजित ‘थिंक फेस्टिवल’के दौरान अपनी पत्रिका की एक पत्रकार का जिस तरह लगातार यौन अत्याचार किया है वह शर्मनाक और उत्पीड़ित महिला और समाज के प्रति घोर अपराध है। यह महिला पत्रकार तरुण तेजपाल की बेटी की मित्र है और वह उसी की उम्र की है। ‘थिंक फेस्टिवल’का आयोजन खनन कारपोरेशन्स और माफिया के सहयोग से करने वाले तरुण तेजपाल खुद को ‘लोकतंत्र’के झंडाबरदार के तौर पर पेश करते रहे हैं। पत्रकारिता के पेशे में तहलका कायम करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन के दौरान महिलाओं का ‘कॉलगर्ल’के तौर पर इस्तेमाल के दौरान भी उनपर कई आरोप लगे थे। पत्रकारिता और नैतिकता की बहस में यह मसला उस समय दब गया और उन महिलाओं के प्रति किए गए अपराध को न्याय के दायरे से ही नहीं पत्रकारिता की नैतिकता से भी बाहर ही रखा गया। उत्पीड़ित पत्रकार महिला और तरुण तेजपाल की बेटी के बीच हुए संदेशों और ई-मेल के माध्यम से तरुण तेजपाल की महिला के प्रति घिनौनी मानसिकता का काफी खुलासा होता है। इस घिनौने अपराध को लेकर तरुण तेजपाल ने जिस तरह बयानों को तोड़ा मरोड़ा है उससे भी उनके अपराध का पक्ष काफी कुछ बाहर आ जाता है। तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी ने जिस तरह महिला विरोधी पक्ष लिया है, बचाव के नाम पर जो कुछ बयान दिया है वह चितंनीय और कथित व्यवसायगत एकता के नाम पर पत्रकारिता को कलंकित करने का भी काम है।

तरुण तेजपाल को बचाने के लिए शोमा चौधरी ने जिस तरह का बयान दिया और माहौल बनाया उसकी वजह से उत्पीड़ित महिला पत्रकार को एक बार फिर यातना से गुजरना पड़ा। इस तरह के बचाव की शह पर तरुण तेजपाल ने पैंतरेबाजी कर उत्पीड़िता को एक बार फिर यातना का शिकार बनाया। पीड़िता को न्याय मिले इसके लिए जरूरी है कि तरूण तेजपाल के घिनौने कृत्य के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई हो और पीड़िता के खिलाफ माहौल बनाने वालों का दोष तय हो।

वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजी से हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ में अहम हिस्सा है महिला को बाजार में ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’के रूप में उतारना। यह साम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों, संपादकों...में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होने का लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरण में खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिला के लिए भयावह स्थिति बना रहा है। महिला उत्पीड़न का बढ़ता फैलाव और उच्चवर्गों का खुलेआम हिंसक व्यवहार एक ऐसी चुनौती है जिसे रोकने के लिए सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक मोर्चों पर संघर्ष को तेज करना होगा।

क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) तहलका में काम करने वाले आम पत्रकार और पीड़िता जिन्होंने तरुण तेजपाल के खिलाफ बोलने का साहस किया के साथ अपनी एकजुटता प्रकट करता है। क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) पीड़िता के पक्ष में न्याय की लड़ाई और दोषी को सजा दिलाने के संघर्ष में अपनी भागीदारी प्रस्तुत करता है।

वरवर राव
जीएन साईबाबा

03 सितंबर 2013

गडचिरौली मुठभेड़: मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट

दख़ल की दुनिया के लिए हिन्दी में अनुवाद किया है प्रेम प्रकाश ने. 
गडचिरोली जिले में इस वर्ष मुठभेड़ की छः वारदातों की खबरें मीडिया व प्रेस में आयीं। इन मुठभेड़ों में कुल 26 व्यक्तियों की जिंदगी खत्म हो गई। जहाँ पर मुठभेड़ हुई वहाँ के लोगों ने पुलिस द्वारा बताई गयी बात की सच्चाई पर सवाल खड़े किए हैं।  
            विभिन्न राज्यों के अखिल भारतीय नागरिक आजादी और जनतांत्रिक अधिकारों की संयुक्त संस्था जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय (सी.डी.आर..) ने भारतीय जन वकील संघ (इंडियन एसोशिएसन आफ पीपुल्स लायर) के साथ मिलकर सत्य को सुनिश्चित करने के लिए तथ्यों की जाँच-पड़ताल को अंजाम दिया। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली के सात संगठनों के 23 सदस्यीय दल ने 23 से 26 अगस्त 2013 तक गडचिरोली जिले का दौरा किया। दल नें पाँच गाँवों-  धानोरा तहसील के सिंदेसुर, कुरखेड़ा तहसील के भगवानपुर, एटापल्ली तहसील के मेंधरी और अहेरी तहसील के गोविंदगाँव व भाटपार का भ्रमण किया जहाँ मुठभेड़ हुई थी। जाँच दल नें पांचों गाँवों के लोगों, जन प्रतिनिधियों, मीडिया के लोगों, राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों और पुलिस से मुलाक़ात की। 
जाँच दल की तात्कालिक प्राप्तियाँ निम्नलिखित हैं:
1.      सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा पहले गोलाबारी शुरू की गयी। भगवानपुर और गोविंदगाँव की  घटनाओं  में जो लोग मारे गए उनकी तरफ से कोई जवाबी गोलाबारी नहीं हुई।
2.         सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा चेतावनी व समझाने का कोई प्रायस नहीं किया गया। पुलिस द्वारा तथाकथित माओवादियों से अपना हथियार डालने के लिए कोई घोषणा नहीं की गई। भगवानपुर, मेंधरी, गोविंदगाँव और भाटपार की घटनाओं में जहाँ लोग पुलिस द्वारा चारो तरफ से घेर लिए गए थे, पुलिस द्वारा आत्मसमर्पण करने के लिए घोषणा नहीं की गई और लोगों को बाद में मार डाला गया।
3.         मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में हुई हत्याएं फर्जी मुठभेड़ थी। मेंधरी गाँव में छः महिला माओवादियों ने मारे जाने से पहले ही अपने हथियार डाल दिये थे और समर्पण कर दिया था। भगवानपुर में जो व्यक्ति मारा गया वह मारे जाने से पहले पुलिस हिरासत में था।
4.      भगवानपुर, मेंधरी और भाटपार गाँव की घटनाओं में गाँव वालों को पुलिस द्वारा बुरी तरह पीटा गया। भगवानपुर में 10 व्यक्तियों को सारी रात सड़क पर पीटा गया। मेंधरी में एक व्यक्ति को पुलिस द्वारा लोगों को पीटने तथा दुर्व्यवहार से बचाने के लिए गोली मार दी गयी। भाटपार गाँव के तीन लोगों को दो दिन तक पुलिस स्टेशन में रोक कर रखा गया और पीटा जाता रहा। 
5.    मुठभेड़ में हत्या की सभी घटनाओं में यह अनिवार्य है कि अपराध की जाँच ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा हो जो हत्या में शामिल पुलिस बल और पुलिस स्टेशन से स्वतंत्र हो। हमारी अधिकतम जानकारी के अनुसार इसका पालन नहीं किया गया।
6.       पुलिस अधीक्षक नें हमसे कहा की उचित पंजीयन और जाँच को सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक मुठभेड़ में हत्या की आंतरिक जाँच एक उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी द्वारा की जा रही है। यद्यपि उसने पुष्ट किया कि इन घटनाओं की जाँच रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है। आंतरिक जाँच होने की वजह से इसमें न तो पारदर्शिता होगी और न ही निष्पक्षता।
7.       मेंधरी मुठभेड़ मामले में मजिस्ट्रेट स्तर की जाँच का आदेश दिया गया है। परंतु हमें मजिस्ट्रेट द्वारा ग्रामीणों के बयान दर्ज करने के प्रयास का एक भी साक्ष्य नहीं मिला। किसी भी तरह अधिशासी मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच इस तरह के मामले की जाँच में निष्पक्षता नहीं प्रदान कर सकती।
8.      कम से कम सिंदेपुर की दो हत्याओं को “द्विपक्षीय क्षति कहा जा सकता है। पुलिस और प्रशासन का इस मामले में रवैया अत्यंत निर्मम है। गाँव के दो युवा लड़के दो-तरफा गोलाबारी में मारे गए। अभी तक उन परिवारों को न तो कोई मुआवजा मिला और न ही राज्य द्वारा उन परिवारों से कोई संवेदना प्रकट की गई। इसके विपरीत सरकार ने बड़ी फुर्ती से अपने मानवीय सरोकार” के प्रमाण के रूप में प्रत्येक परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता के बड़े विज्ञापन बोर्ड जिले भर में लगा दिया है।
9.   भाटपाल गाँव में मारी गई महिलाओं में से एक उसी गाँव की निवासी थी। उसके माँ-बाप के अनुनय-विनय और सारे गाँव के पुलिस थाने पर इकट्ठा होने के बावजूद पुलिस ने अंतिम अधिकार के रूप में मृत शरीर को उन्हें देने से इंकार कर दिया। यह अत्यंत निंदनीय है। अन्य मामलों में भी लाशें लंबे समय तक बिना पहचाने ही पड़ी रहीं, उनकी तस्वीरें प्रकाशित नहीं की गईं तथा माँ-बाप व संबंधियों को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया व अंतेष्टि में शामिल होने की संभावना को खत्म कर दिया गया।   
           
उपरोक्त के प्रकाश में सीडीआरओ इस विचार पर पहुंचा है कि पांचों मुठभेड़ों में हुई जीवन की क्षति को आसानी से बचाया जा सकता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के क्रिया-कलाप को निर्देशित करने के लिए आरपीसी में दिये गए स्थापित मानकों का पालन इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त हो सकता था। इन परिस्थितियों में गोलाबारी करना गाँव के हिसाब से गलत  था जो न तो आत्म रक्षा” और न ही दोषियों” को हिरासत में लेने की दृष्टि से उपयोगी था। वास्तव में उपरोक्त प्रत्येक मामला दोषियों को हिरासत में लेने की अत्यधिक असफलता थी।  यह शक्ति का अतिरिक्त व अनाधिकृत गठन था।   
            समान तरह की घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति बताती है कि बंदियों के लिए कोई कार्यकारी नीति नहीं है और उनको माओवादी होने के संदेह में मारा जा रहा है। यह प्रशासन द्वारा विभिन्न जगहों पर लगाए गए बैनर में स्पष्ट दिखाता है जो मेंधरी में मारी गई महिला माओवादियों की तस्वीरों से भरा है । यह कहता है कि सामान्य जनतेवार अन्याय करल, तार पोलिसांच्या बंदुकीनेच मारल (अगर तुम सामान्य जन के साथ अन्याय करोगे तो तुम पुलिस की बंदूकों से मारे जाओगे)
            इस तरह पुलिस के खतरे की एक झलक को इस बंदूक के आनंद की प्रवृत्ति में देखा जा सकता है जो भगवानपुर की घटना में दिखाई दी। उपचारात्मक उपायों से दूर पुलिस अधीक्षक गडचिरोली ने पुलिस की भाषा ही दोहराते हुये कहा कि इससे कोई मतलब नहीं की यह कितना अविश्वासनीय है कि सामान्य ग्रामीण रहवासी जोकि माओवादियों से संबन्धित नहीं है पुलिस पर गोलाबारी किए जबकि उनसे रुकने के लिए कहा गया। इस तरह की नीति भविष्य में भयानक अनहोनी की पूर्व-सूचना देती है ।      
            चारो मामले में पुलिस का विवरण हमारी खोज तथा ग्रामीणों के विवरण से गंभीर रूप से भिन्न है। प्रेस को दी गई पुलिस रिपोर्ट तथा एफ़आईआर चौंकाने वाली है जिसमें कहा गया है कि जाँच पूर्णतया हत्या में शामिल पुलिस दल के विवरण पर आधारित है। यह नागरिक न्यायशास्त्र के विचार से पूर्णतया उलट है। हत्यारा, सूचनादाता, जाँच और न्यायाधीश एक दूसरे से अलग होने चाहिए। और यह कानून तथा व्यवहार में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 
उपरोक्त के प्रकाश में हम मांग करते हैं कि:
           
1.      बंदियों को गिरफ्तार करने के बजाय उनको जान से मारना तथा अधिकतम नुकसान पहुंचाना अवश्य ही बंद किया जाय।
2.       मुठभेड़ के सभी मामलों में जिम्मेदार पुलिस दल के खिलाफ आपराधिक मानवहत्या की एफ़आईआर दर्ज हो। इसकी जाँच दूसरे जिले के पुलिस अधिकारी को सौंपी जाय।
3.      भाटपाल, मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में जहाँ लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया, की न्यायिक जाँच की जाय।
4.      न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रत्येक मुठभेड़ की घटना की मजिस्ट्रेट स्तरीय जाँच की जाय और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान उनके घर पर भयमुक्त वातावरण में दर्ज किया जाय तथा इस तरह के गवाहों पर भविष्य में पुलिस प्रताड़ना के मामलों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएँ।
5.      भगवानपुर से गिरफ्तार दो व्यक्तियों को अविलंब रिहा किया जाय।
6.      भगवानपुर गाँव के देवराव व बुधनाथ के परिवारों को अविलंब मुआवजा दिया जाय। 

द्वारा जारी: 
·       जनतान्त्रिक अधिकार संघ,पंजाब (Association for Democratic Rights, Punjab)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संघ, पश्चिम बंगाल(Association for the Protection of Democratic Rights, West Bengal)
·        नागरिक स्वतन्त्रता समिति, आंध्र प्रदेश (Civil Liberties Committee, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा समिति, मुंबई (Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai)
·       भारतीय जन वकील संघ (Indian Association of People’s Lawyers)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संगठन, आंध्र प्रदेश(Organisation for the Protection of Democratic Rights, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार जनसंघ, दिल्ली (People’s Union for Democratic Rights, Delhi)


गाँव की जाँच-प्राप्ति  का विवरण: संक्षिप्त रूप
(Village Accounts of our Findings – Short Version)

1-गोविंदपुरगाँव, अहेरी तहसील: 11 जनवरी को मावोवादियों के 11 सदस्यीय समूह की  ग्रामीणों के साथ शाम 7 बजे बैठक हुई। बैठक के दौरान माओवादियों नें गाँव में शराब उत्पादन और शराब पीने की बंदी के लिए, परिवार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए, ग्रामीणो में झगड़े और तनाव को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने और बिजली के तारों से शिकार के खतरनाक तरीकों को बंद करने के लिए अभियान चलाया। उन्होने  सरकार की लघु-बचत योजना बचत घट के विरोध का लोगों से आह्वान किया। गाँव में रात्रि भोज के बाद मावोवादी दल बस्ती से अभी बाहर गया ही होगा कि “सुरक्षा बल” के लोगों ने ग्रामीणों को घेर लिया और उन पर गोलियां बरसाने लगे।
            छः व्यक्ति वारदात की जगह पर ही मारे गए जबकि बाकी माओवादी बच निकलने में  सफल हो गए। प्रतिरक्षा में माओवादियों द्वारा कोई गोलीबारी नहीं की गई। मृतकों में दो महिलाएं थी। गाँव से कुछ व्यक्तियों को मृतकों की पहचान के लिए लाया गया।

2- भगवानपुर, कुरखेडा तहसील: 16 जुलाई 2013 को रात के लगभग 10 बजे गाँव के 11 लोग जंगल में शिकार के लिए गए। उसमें से 8 लोग तीन स्कूटरों पर गए जिसके कुछ देर बाद तीन लोग दूसरे स्कूटर पर गए। बाद में गए लोग अपने साथ एक भामार (एक देशी बंदूक), एक कुल्हाड़ी, एक चाकू तथा एक टोपी वाली टार्च ले गए।  
करोडी गाँव के महात्मा फुले स्कूल के नजदीक मुख्य सड़क पर उन्होन्नें सी – 60 कमांडो दल को देखा और जल्दी से निकल जाने का निश्चय किया। पुलिस दल जो तीन गाड़ियों में था ने उनका पीछा किया और उन्हें रोक लिया। उनमें से तीन ग्रामीणों नें पुलिस को समझाने की कोशिश की कि उनके 8 साथी नीचे है। लेकिन सब कुछ अनसुना कर पुलिस द्वारा पीटे जाने के बाद आनंदराव मार दिया गया। आनंदराव घटना की जगह पर ही गिर गया और मर गया उसकी पसलियों के ठीक नीचे दो गोली मारी गई थी। साक्षियों ने बताया कि जिन पुलिस वालों  ने आनंदराव को मारा वे उसे पहले से जानते थे।   
            पुलिस ने अन्य आठ व्यक्तियों के लौटने की प्रतीक्षा की और उन्हें पकड़कर भोर के 4 बजे तक लगातार पीटती रही जबकि 10 ग्रामीणों व लाश को दो गाड़ियों में अरमोरी पुलिस थाने लाया गया। वहाँ आनंदराव के साथ दो व्यक्तियों देवराव राजाराव उसेंदी तथा बुधनाथ पांडुरंग तुलावी पर आईपीसी की धारा 307 व 353 के तहत केस दर्ज की गई। वर्तमान में वे दोनों चंद्रपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं। बाकी बचे लोगों को जिन्हें पुलिस नें हवालात में बंद कर रखा  था बाद में छोड़ दिया गया।   

3- सिंदेसूर, धनोरा तहसील: 12 अप्रैल की सुबह सिंदेसूर गाँव से 12 लोगों का एक समूह पहाड़ी की तली में अपने खेतों के निकट जंगल से महुआ के फूलों को इकट्ठा कर रहा था। कुछ समय बाद चार माओवादी वहाँ आए और उन्होनें 20 साल के दो लड़कों से गाँव से पीने के लिए पानी लाने को कहा। जब ये लड़के पानी लेकर लौट रहे थे तो पुलिस ने अचानक आकार गोलीबारी शुरू कर दी। परिणाम स्वरूप जवाबी गोलीबारी हुई और दोनों लड़के उसकी चपेट में आ गए। दोनों ही मुकेश दुरु हुड़को तथा सुखदेव वरलू गवडे मारे गए। गोलीबारी के अंत में एक पुलिस  और चार माओवादी मृत पाये गए। दो मृतक ग्रामीण लड़कों के लिए मुआवजे की घोषणा की गई है परंतु अभी तक वह अंधेरे में ही अटकी हुई है।

4- मेंधरी, एटापल्ली तहसील: 7 जुलाई की सुबह 6 औरतों व दो पुरुषों का एक मावोवादी समूह गाँव के निकट एक नाले के पास था। उनमें से दो औरतें नहाने के लिए नाले में गईं तथा शेष गाँव की एक युवती के साथ चाय पीते हुये बातचीत करनें लगीं जबकि दो पुरुष सदस्य गाँव में चीनी तथा चाय खरीदने चले गए। नजदीक ही एक पुलिस को छिपते हुये देखकर गाँव की युवती अपने घर भाग गई और उसके कुछ क्षण बाद ही गोलीबारी शुरू हो गई। महिला मावोवादी अपना बैग वहीं छोड़कर बंदूकों के साथ दौड़ीं तथा जवाबी गोलीबारी शुरू हो गई। बिना युद्ध सामाग्री के भागते हुये महिलाओं नें गाँव की शरण लेने की कोशिश की लेकिन पुलिस नें खुले खेतों में उनका पीछा किया। दूसरी तरफ से अन्य पुलिस वाले आ गए और महिलाओं ने अपने आपको फंसा हुआ पाया, उन्होने अपनी बंदूकें फेंक दीं तथा आत्मसमर्पण में अपने हाथ उठा दिये। उनमें से एक नें अपनी बंदूक फेककर उसी खेत में महुआ के पेड़ पर चढ़ गई। इसके बाद पुलिस महिलाओं के निकट पहुंची, आत्मसमर्पण की हुई महिलाओं को नजदीक से मारा तथा पेड़ पर छिपने का प्रयास कर रही महिला को भी मार गिराया। 10 से अधिक गाँव वालों को खींचकर बाहर लाया गया और उन्हें पीटा गया जबकि वे मृतकों को पहचानने में असमर्थ थे। एक ग्रामीण को तब मार दिया गया जब वह शवों से दूर भागने की कोशिश कर रहा था।     

5- भाटपार, अहेरी तहसील: तीन अप्रैल की शाम चार सशस्त्र मावोवादियों का एक समूह ग्रामीणों के साथ बैठक कर रहा था। बाद में उस रात वे गाँव छोड़ दिये और आधा किलोमीटर दूर नदी के किनारे रुके। उनके साथ गाँव की दो औरतें भी थीं। दूसरे दिन तड़के सुबह गाँव वालों नें गोली की आवाज सुनी और उनमें से एक औरत भागती हुई गाँव में आई। बाकी पांचों की लाशों को पुलिस नदी के इस पार लायी। गाँव वालों नें पुलिस से कुम्मा ताड़ो की बेटी सुनीता की लाश को परिवार वालों को देने की मांग की। पुलिस नें लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी, जबकि तीन ग्रामीणों को खेत से पकड़ा, उनको पीटा और अपने साथ धोजराज पुलिस थाने लाये। अगले दिन सुबह अधिकतम ग्रामीण थाने गए और मृतक की लाश को वापस करने तथा चार ग्रामीणों को छोड़ने की मांग किए। वे चार ग्रामीणों के साथ वापस आए। लाश को कभी भी परिवार वालों को नहीं सौंपा गया। 
जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय
(Coordination of Democratic Rights Organisations)

14 नवंबर 2010

लवासा का सच


-दिलीप ख़ान

मुंबई और पुणे जैसे चमक-दमक वाले दो बड़े शहरों के बीच छोटी पहाड़ियों और जंगलों से घिरा एक बड़ा भूभाग है, जो प्राकृतिक और जैव विविधता के लिए मशहूर पश्चिमी घाट का हिस्सा है. इस क्षेत्रफल के बीच टुकड़ों में कई छोटे-छोटे गांव बसे हैं. इन्हें किसी शहरीकरण की नियोजित नीति के तहत नहीं बसाया गया हैं. मुंबई और पुणे के मानिंद इन गांवों का भी अपना एक लंबा इतिहास है. लेकिन, इनमें से कई गांव अब वहां के नक्शे से ग़ायब हो गए हैं. कई अपने अस्तित्व बचाने के लिए भीषण जद्दोजहद कर रहे हैं. ऐसे ही 25 गांवों को हटाकर इस इलाके में एक ’हिल सिटी’ लवासा बन रहा है. यदि सब कुछ ’ठीक’ रहा तो साल के अंत में इस परियोजना का पहला चरण बनकर तैयार हो जाएगा, जिसमें एक हज़ार बड़े अट्टालिकाओं और 500 अपार्टमेंट के साथ इसकी संपूर्ण रूप-रेखा की पहली झलकी प्रस्तुत की जाएगी. चार चरणों में इसे विकसित करने वाले मॉडल के अनुसार 2021 में यह अंतिम रूप से बनकर तैयार हो जाएगा. इस तरह इस परियोजना की परास दूरदर्शिता के मामले में विज़न 2020 से भी अधिक आगे तक जाती है!


लवासा परियोजना कोई देसी दिमाग की उपज नहीं हैं. हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी की इस परियोजना की मूल रूप-रेखा अमेरिका में खींची गई थी और इस परियोजना की सहूलियत और सफ़लता को परखने के लिए अमेरिका की ही एक सर्वे एजेंसी ए. सी. निल्सन को उत्तरदायित्व सौंपा गया. ध्यान देने वाली बात यह है कि ए सी निल्सन, वास्तव में एक मार्केटिंग रिसर्च फर्म है जो विभिन्न व्यवसायों और बाजार के मौजूदा व्यवहार की जानकारी देने के लिए प्रसिद्ध है. 100 वर्ग किमी में फैले इस पूरे इलाके को इस सर्वे फर्म ने संबंधित परियोजना शुरू करने के लिए उपयुक्त करार दिया. महाराष्ट्र सरकार ने आनन- फानन में इसके लिए बिल पास कर दिया, गोया किसी निज़ी व्यावसायिक कंपनी की मार्केटिंग के लिए लोगों को विस्थापित करने को सरकार बेचैन हो. बाद में इस बेचैनी का कारण अधिक स्पष्ट हुआ जब इसमें शामिल लोगों की जुगलबंदियां साफ़ दिखने लगी. राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी की भागीदारी वाली सरकार निविदा के नियम-क़ायदों के कारण होने वाली देरी को कम करने के लिए इस व्यवस्था को ही लांघ गई. इस कंपनी के पंजीकरण के दो साल बाद सुप्रिया सुले को इसमें बारह फ़ीसदी शेयर का मालिकाना हक़ हासिल हुआ. इसमें सुप्रिया के पति की हिस्सेदारी अलग है. आरोप यह भी लग रहे हैं कि इसी एवज में कंपनी के पंजीकरण को मंजूरी दी गई थी. इस विवादास्पद बिल के मंजूरी के बाद राजनीतिक हलके में हल्के शोर के अलावा अब तक कोई ठोस दबाव भरा कदम नहीं उठाया गया है. ऐसे में स्थानीय जनता के पास क्या विकल्प बचता है?


परियोजना के सामने कई समस्याएं हैं और उनसे निपटने के लिए राज्य सरकार हरेक मंजूरी देने को तैयार दिखती है. मसलन, लवासा को जिस वारसगांव बांध के पानी के भरोसे विकसित किया जा रहा है, उसके पानी से पुणे के लोग अपनी दिनचर्या का निर्वाह करते हैं और पिछले कुछ वर्षों से पुणे खुद पानी की कमी का संकट झेल रहा है, फिर भी वारसगांव बांध के पानी को लवासा की ओर मोड़ने की अनुमति दे दी गई. लेकिन 11.5 टीएमसी क्षमता वाले इस पूरे वारसगांव के पानी से भी लवासा की ज़रूरत पूरी नहीं होने वाली थी, तो कृष्णा घाटी में बिना किसी ठोस पर्यावरणीय जांच के जल संग्रहण और नए बांध बनाने पर भी सरकार ने सहमति दे दी. यह सहमति जिस समय दी गई उस समय अजीत पवार महाराष्ट्र कृष्णा घाटी विकास निगम के अध्यक्ष थे. अजीत पवार रिश्ते में शरद पवार के भतीजे हैं और सुप्रिया सुले बेटी. इस तरह आपस में वे दोनों चचेरे भाई- बहन हैं. भाई-बहन की घरेलू सांठ-गांठ राजनीतिक फ़ैसले में परिवर्तित हो गई. महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में हालिया नेतृत्व परिवर्तन के बाद अजीत पवार अब प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हो गए हैं. दिलचस्प यह है कि यह नेतृत्व परिवर्तन जिस तात्कालिक मुद्दे को संज्ञान में लेकर किया गया वह आदर्श सोसाइटी का मसला है, जिसमें कई पर्यावरणीय तथा वित्तीय अनियमितताओं के मामले उजागर हुए हैं. आदर्श सोसाइटी सैनिकों के लिए रिहाइशी मकानों की परियोजना है. लवासा भी बड़े अट्टालिकाओं और रिहाइशी मकानों की परियोजना है.



लवासा परियोजना को सफ़ल बनाने के लिए स्थानीय लोगों पर लगातार विस्थापन आरोपित किया गया है. उस पूरी पट्टी में लोग क्रमिक रूप से विस्थापित हो रहे हैं. 1974 में वारसगांव बांध बनाने के लिए जिस ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था उसका एक हिस्सा अभी तक पड़ती पड़ा हुआ था, जिसे लवासा पर खरचा जा रहा है. देश में बांध परियोजनाओं के नाम पर अधिग्रहीत की गई ज़मीन की एक लंबी सूची है जिसे किसी दूसरे निज़ी कंपनियों को सौंप दिया गया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुताबिक नर्मदा घाटी में अधिग्रहीत की गई ज़मीन का लगभग 40 फ़ीसदी पड़ती पड़ा है और उसके कुछ टुकड़ों को किराए पर निज़ी कंपनियों को सौंप दिया गया है. ’कल्याणकारी राज्य’ में स्थानीय जनता की रत्ती भर परवाह किए बग़ैर सरकार ने जिस तरह निज़ी कंपनियों को ज़मीन सौंपा है वह लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ रहा है. लोगों को जबरन खाली करा कर ज़मीन अधिग्रहीत करने का एक नतीजा यह है कि पिछले 60 वर्षों में सिर्फ़ बांध के नाम पर 15 करोड़ से अधिक लोगों को देश के नक्शे के भीतर इधर-उधर खदेड़ा गया है.



इन विस्थापनों और अनियमितताओं को अपने भविष्यगत योजानाओं तले ढंकते हुए, योजनाकारों ने लवासा को लेकर बेहद सुनहरी तस्वीर खींच रखा है. यह सही मायनों में ग्लोबल होगी. यहां पर्यटक आएंगे तो डॉलर-यूरो की चरमराहट पहाड़ों में गूजेगी. यहां यूरोप के फुटबॉल क्लबों से लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों से संबद्ध प्रबंधन विश्वविद्यालयों के शाखाएं खोली जाएगी. यह सच है. सच यह भी है कि यहां के रसोईघर से लेकर संडास तक को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा रहा है. ठीक कॉमनवेल्थ के खेल गांव की तरह. सच यह भी है कि यह वाकई स्वतंत्र भारत का पहला नियोजित हिल शहर है वैसे ही जैसे नागपुर का मिहान पहला कारगो और हवाई अड्डे का हब है. नागपुर की तरह यहाँ भी 25 गांवों को उजाड़ा गया और यह भी उतना ही बड़ा सच है.



(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया शोधार्थी है.)



मो. - +91 9555045077


E-mail - dilipk.media@gmail.com





22 जून 2010

''फ्लेम्‍स ऑफ दी स्‍नो'' को सेंसर बोर्ड का प्रमाणन नहीं मिलेगा



बोर्ड ने कहा, माओवाद का प्रचार करती है फिल्‍म
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड ने नेपाल पर बने वृत्तचित्र ''फ्लेम्स ऑफ दि स्नो'' को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इंकार कर दिया है। बोर्ड का मानना है कि 'यह फिल्म नेपाल के माओवादी आंदोलन की जानकारी देती है और उसकी विचारधारा को न्यायोचित ठहराती है।' बोर्ड की राय में हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में फैली माओवादी हिंसा को देखते हुए इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती। 'ग्रिन्सो' और 'थर्ड वर्ल्ड मीडिया' के बैनर तले बनी 125 मिनट की इस फिल्म के निर्माता नेपाल मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा हैं और इसका निर्देशन किया है आशीष श्रीवास्तव ने। फिल्म की पटकथा भी आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखी है।
बोर्ड के इस फैसले पर हैरानी प्रकट करते हुए पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि इस फिल्म में भारत में चल रहे माओवादी आंदोलन का जिक्र तक नहीं है। इसमें बस निरंकुश राजतंत्र और राणाशाही के खिलाफ नेपाली जनता के संघर्ष को दिखाया गया है। 1770 ई. में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल राज्य की स्थापना के साथ राजतंत्र की शुरुआत हुई जिसकी समाप्ति 2008 में गणराज्य की घोषणा के साथ हुई। इन 238 वर्षों के दौरान 105 वर्ष तक राणाशाही का भी दौर था जिसे नेपाल के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। फिल्म में बताया गया है कि किस प्रकार 1876 में गोरखा जिले के एक युवक लखन थापा ने राणाशाही के अत्याचारों के खिलाफ किसानों को संगठित किया जिसे राणा शासकों ने मृत्युदंड दिया। लखन थापा को नेपाल के प्रथम शहीद के रूप में याद किया जाता है। निरंकुश तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ 'प्रजा परिषद' और 'नेपाली कांग्रेस' के नेतृत्व में चले आंदोलनों का जिक्र करते हुए फिल्म माओवादियों के नेतृत्व में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष पर केंद्रित होती है और बताती है कि किस प्रकार इसने ग्रामीण क्षेत्रों में सामंतवाद की जड़ों पर प्रहार करते हुए शहरी क्षेत्रों में जन आंदोलन के जरिए जनता को जागृत किया।
फिल्म राजतंत्र की स्थापना से शुरू हो कर, संविधान सभा के चुनाव, चुनाव में माओवादियों के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित होने, राजतंत्र के अवसान और गणराज्य की घोषणा के साथ समाप्त होती है। सेंसर बोर्ड की आपत्ति को ध्यान में रखें तो ऐसा लगता है कि नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाने की यह अनुमति नहीं देगा। कारण यह कि आज माओवादियों की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किए बिना नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाना संभव ही नहीं है। नेपाल में माओवादी पार्टी की मई 2009 तक सरकार थी और इस पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड प्रधनमंत्री की हैसियत से भारत सरकार के निमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आए थे। नेपाल की मौजूदा संविधान सभा में माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और प्रमुख विपक्षी दल है।
श्री वर्मा अब अपनी इस फिल्म को बोर्ड की पुनरीक्षण समिति के सामने विचारार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।