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16 अगस्त 2013

विश्व हिंदू परिषद के नेता करेंगे चोर गुरु की जांच!

प्रोफ़ेसर अनिल कुमार राय उर्फ़ अंकित
(अक्टूबर में विभूति नारायण राय का महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से बतौर कुलपति कार्यकाल ख़त्म हो रहा है और हाल ही में उन्होंने मीडिया सेंटर के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर अनिल कुमार राय उर्फ़ अंकित पर किताब चोरी के आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित करने का विज्ञापन कुछ स्थानीय अख़बारों में छपवाया है। अनिल राय अंकित ने अब तक 17 किताबें लिखी हैं, जिनमें से 14 तो वो असाधारण रूप से दो वर्षों में ही लिख डालीं! उन पर CNEB चैनल ने 'चोर गुरु' नाम की श्रृंखला का एक एपिसोड भी तैयार किया था, जिसमें कई प्रमाण दिए गए थे। इससे पहले भी अनिल राय की चोरी की जांच के लिए एक समिति बनी थी, जिसे बाद में ठप्प कर दिया गया। अभी पी जी पल्सीकर की अगुवाई में नई जांच समिति बनाई गई है। यह टिप्पणी इसी बात से पर्दा उठाती है कि चार साल से जिस जांच को विभूति टालते रहे, आख़िर क्या वजह है कि जाते-जाते वो जांच समिति का अनुष्ठान संपन्न करना चाहते हैं?-- दिलीप ख़ान)

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय को पांच वर्ष पूर्व अपनी जाति के एक प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार राय अंकितको मास मीडिया विभाग में नियुक्ति करते समय ये शिकायत मिल चुकी थी कि उन्होंने एक दर्ज़न से ज़्यादा ऐसी किताबें अपने नाम से छपवाई हैं जिनकी सामग्री देश और विदेश के लेखकों की किताबों से उड़ाई (कट-पेस्ट)  गई हैं। लेकिन उन्होंने नियुक्ति के समय से ही उन शिकायतों की अनदेखी की और यही नहीं, उसके बाद वो लगातार डॉ अनिल कुमार राय अंकितको प्रोन्नति देते गए।

डॉ. अंकित ने हिंदी की कविताओं पर पीएचडी की है और उन्हें मास मीडिया विभाग को प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त किया गया। नियुकति के तत्काल बाद विभागाध्यक्ष भी बन गए। डॉ. अंकित द्वारा विभिन्न संस्थानों में नौकरी के लिए जो आवेदन दिए गए हैं उन्हें एक जगह रखकर भी देखा जाए तो उनकी अकादमिक उपलब्धियों की लंबी-चौड़ी फ़ेहरिस्त पर किसी को भी संदेह हो सकता है।

डॉ. अंकित द्वारा चोरी की सामग्री से किताबों को लेकर जब मीडिया में लगातार शिकायतें आने लगीं, तब उन्होंने 11 फरवरी 2010 को एक आदेश देकर एक जांच समिति नियुक्ति करने की घोषणा की। उस समिति की ज़िम्मेदारी रांची विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा को दी गई। सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा को यह जांच देने का मक़सद उनसे डॉ. अंकित को बेदाग़ घोषित करवाने का रहा होगा। लेकिन जब सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा के भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि सार्वजनिक तौर पर जाहिर होने लगी तब जांच समिति ठप्प पड़ गई।

विश्वविद्यालय प्रशासन को मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यू.जी.सी में दर्ज शिकायतों के ज़रिए लगातार ये कहा गया कि वह डॉ. अंकित की किताबों के बारे में जांच कराएं। लेकिन, संभवत विश्वविद्यालय को कोई ऐसा ईमानदार व्यक्ति नहीं मिल रहा था जो कि डॉ. अंकित को बेदाग़ घोषित करने का भरोसा दे सके। लिहाजा जांच की प्रक्रिया फिर शुरू नहीं की गई। जबकि इस बीच दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में डा. दीपक केम को इस आरोप में बर्ख़ास्त करने की कार्रवाई पूरी की गई। फ़ोटो जर्नलिज़्म पर डॉ. दीपक केम ने एक पुस्तक डॉ. अंकित के साथ मिलकर लिखी है। डा. केम के ख़िलाफ़ जांच की शुरुआत 4 मार्च 2010 को हुई और 1 अप्रैल 2011 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कार्यकारी परिषद के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। 31 मई 2011 को उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हटा दिया गया। डॉ. केम को हटाने में भी इतना वक़्त संभवत इसीलिए लगा क्योंकि उनके पिता यूजीसी में प्रभावशाली अधिकारी रहे हैं।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। संभवत: कुलपति विभूति नारायण राय ने यह समझा कि वे जब तक इस पद पर बने हुए हैं तब तक डॉ. अंकित को बचाने में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। अक्टूबर 2013 में कुलपति विभूति नारायण राय अपने पद से मुक्त होने वाले हैं। वे फ़िलहाल इस पद पर इस स्थिति में हैं कि वे कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकते। लेकिन 7 अगस्त 2013 को समाचार पत्रों के पाठकों ने एक नोटिस देखा जिसमें ये बताया गया है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में डॉ. अनिल कुमार राय द्वारा किताबों के लिए सामग्री की चोरी की शिकायत की जांच के लिए एक समिति बनाई गई है। उस समिति के सर्वेसर्वा पूर्व न्यायाधीश पी जी पल्सीकर बनाए गए हैं।

एक तो यह जानना बेहद दिलस्चप होगा कि अपने कार्यकाल के मुहाने पर पहुंचने के बाद कुलपति राय को ये क्यों लगा कि एक पूर्व न्यायाधीश से अनिल कुमार राय अंकितके ख़िलाफ़ शिकायतों की जांच करा लेनी चाहिए? इतनी जल्दीबाजी में जांच पूरी कराने का उद्देश्य भी हैरानी में डालता है। जांच समिति की नियुक्ति की समाचार पत्रों में सूचना के अनुसार 27 अगस्त तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलसचिव तक चोरी की सामग्री से जुड़े तथ्यों को भेज देना है। 
CNEB के कार्यक्रम 'चोर गुरु' में रिपोर्टर से बात करते कुलपति विभूति नारायण राय
 (पूरा कार्यक्रम देखने के लिए यहां क्लिक करें)
इस संदर्भ में ये भी उल्लेखनीय है कि 2009 में जब मीडिया में डॉ. अंकित समेत कई चोर गुरुओंके बारे में ख़बरें आ रही थी तब महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को न्यूज़ चैनल CNEB ने कई कड़ियों में बनाए गए अपने कार्यक्रम चोर गुरुकी सीडी भेजी थी। उस कार्यक्रम में कुलपति राय का भी बयान शामिल था जिसमें उन्होंने ये दावा किया था कि यदि एक पैरा भी चोरी करने की शिकायत प्रमाण के साथ उन्हें मिली तो वे तत्काल डॉ अंकित को हटाने का फैसला कर सकते हैं। कार्यक्रम में डॉ. अंकित द्वारा चोरी के कई प्रमाण दिए गए थे और कुलपति राय के बयान में दावे के मद्देनज़र ही चैनल CNEB ने सीडी भेजी थी। लेकिन सीडी के पहुंचने के बाद विश्वविद्यालय द्वारा ये जानकारी दी गई कि उक्त भेजी गई सीडी में आवाज़ नहीं सुनाई दे रही हैं!

इस पृष्ठभूमि में कुलपति राय द्वारा जल्दी से जल्दी जांच पूरी कराने के इरादे को बखूबी समझा जा सकता है। दरअसल देश के कुछेक विश्वविद्यालयों में एक ख़ास तरह की जांच प्रक्रिया और उसके परिणाम देखने को मिले हैं और यह पूरी क़वायद उसी की नकल लगती है। देश के कुछ विश्वविद्यालयों में कुलपतियों ने जांच के नाम पर अपने यहां दस्तावेज़ मंगवाए और जिनके ख़िलाफ़ जांच हो रही थी उन्हें बेदाग़ घोषित करने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया।

पहली बात कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपने यहां सबूतों को भेजने का निर्देश क्यों दे रहा हैं? खासतौर से तब, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया अब तक डॉ. अंकित को बचाने का रहा है। दूसरी बात कि जांच की यह प्रक्रिया क्यों अपनायी गई कि दस्तावेज़ जांच समिति को भेजने के बजाय विश्वविद्यालय प्रशासन को भेजे जाए? यह भी बता देना ज़रूरी है कि जिस कुलसचिव के पते पर इन प्रमाणों को भेजा जाना है उनकी अस्थायी नियुक्ति की गई थी और कुलपति की मेहरबानी पर वे अब तक बचे हुए हैं। साथ ही डॉ. अंकित डीन के पद पर प्रोनन्ति पाकर विश्वविद्यालय में बेहद प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गए हैं।

अनिल अंकित के सह-लेखक
दीपक केम, जिन्हें जामिया
मिल्लिया से प्लैगमेरिज़्म
के आरोप में बर्ख़ास्त किया
गया
उपरोक्त तथ्यों के अलावा एक महत्वपूर्ण सवाल ये हैं कि पूर्व न्यायाधीश पी जी पल्सीकर को जांच समिति की ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी गई? क्या विश्वविद्यालय उनकी पृष्ठभूमि से अवगत रहा है? आखिर कोई भी संस्था किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति करता है तो उनके चुनने का क्या पैमाना होता है? मुंबई हाईकोर्ट के 323 ऐसे पूर्व न्यायाधीश है जिनकी सूची हाईकोर्ट की वेबसाइट पर दी हुई है। उनमें पी जी पल्सीकर का भी नाम है जो इस समय नागपुर में रहते हैं। लेकिन बेवसाइट पर वे ऐसे कुछेक पूर्व न्यायाधीशों में हैं जिनके हाईकोर्ट में जज बनने और सेवा निवृत होने की तारीख़ नहीं मिलती! इसका रहस्य क्या है और उन्हें जांच समिति का प्रमुख चुने जाने से उसका क्या कोई रिश्ता है इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीश पी जी पल्सीकर की नियुक्ति का फ़ैसला तब लिया गया था जब दिल्ली में आरएसएस (RSS) के सहयोग से मोराईजी भाई देसाई की सरकार बनी थी। ये तथ्य उल्लेखनीय है कि आरएसएस की चुनावी पार्टी जनसंघ का विलय जनता पार्टी में कर दिया गया था और मोरारजी देसाई उसी जनता पार्टी के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन उस वक़्त न्यायाधीश पी जी पल्सीकर की नियुक्ति की पुष्टि नहीं की जा सकी। कुछ ऐसा घटनाक्रम रहा कि दिल्ली में मोरारजी देसाई की सरकार ही गिर गई थी। सो, पल्सीकर पुष्टनहीं हो पाए। इसके बाद से पी जी पल्सीकर को नागपुर में विश्व हिन्दू परिषद की गतिविधियों में बेहद सक्रिय देखा गया।

6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को ढाहे जाने की घटना के बाद नागपुर में विश्व हिन्दू परिषद के समर्थन में एक प्रदर्शन निकाला गया था जिसमें पी जी पल्षीकर प्रमुख रूप से उपस्थित थे और उनका नाम उस प्रदर्शन की अगुवाई करने वालों में लिया जाता है। नागपुर में आमतौर पर उन्हें एक आदर्शवादी विश्व हिन्दू परिषद के नेता के रूप में जाता है। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष ये भी है कि उम्र के इस पड़ाव पर वे शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, इससे उनके जानने वाले शक जता रहे हैं। यानी उनकी क्रियाशीलता पर भी सवालिया निशान है। इस तरह की जांच समिति के बनने और उसके संभावित फैसलों से न्यायिक प्रक्रिया और न्याय के सिद्धांत से लोगों का भरोसा उठता है।


विश्वविद्यालय से यह अनुरोध किया जाना चाहिए कि विश्वविद्यालय जांच के लिए एक भरोसेमंद समिति का गठन करें और उसकी खुली जांच होनी चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन के नेतृत्व के प्रति अविश्सनीयता और संदेह की गुंजाइश में किसी जांच समिति के गठन और उसके प्रमाण पत्र की उपयोगिता नहीं होनी चाहिए।   

02 दिसंबर 2012

विभूति नारायण राय लाल सलाम, यानी हिंदी के तीन युग हैं

प्रसंग: हिंदी का दूसरा समय-2013 का वर्धा में आयोजन

-दिलीप खान
हिंदी साहित्य के इतिहास में पता नहीं हिंदी के समय को किन आधारों पर बांटा गया है, लेकिन इसके कालखंड बंटवारे के ताजा मुहिम में आपको आधार भी पता चलेगा, शक्ति की नुमाइश भी और वजह भी। विवाद-विरोध-आलोचना-हिच-हिच-खिच-खिच की गुंजाइश अगर तलाशेंगे तो समझ लीजिए इस गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षी बनने का एक महत्वपूर्ण अवसर आप खो देंगे! भविष्य की पीढ़ियां आपको सिर्फ़ इसी बिनाह पर गरिया सकती है कि अपने दौर में हिंदी के समय के साथ आप नहीं थे और अगर आप अपने वर्तमान में हस्तक्षेप नहीं करते थे तो जाहिर तौर पर समाज निर्माण की प्रक्रिया से कहीं दूर बैठे बांसुरी बजा रहे थे और इसलिए भविष्य तक पहुंचने वाली सड़क साफ़-सुथरी नहीं रह सकी!

हिंदी के राजमार्ग के किनारे बसे वर्धा नामक मुल्क में हिंदी यात्रियों के ठहरने के भरपूर इंतजाम हैं। हिंदी के नाम पर देश का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय पांच टापुओं पर यहीं बना हुआ है। हिंदी शक्ति के विकेंद्रीकरण में दिल्ली से जो पावर-शिफ़्ट हुआ, उसका एक टुकड़ा वर्धा की झोली में भी गिरा है। लिहाजा समय-समय पर यहां मजमा लगता है जिनमें हिंदी को लेकर चिंतित लोग दूर-दराज़ से आकर शरीक होते हैं और हिंदी का पूरा कलेवर बदल डालते हैं। तो ये मुख़्तसर-सा परिचय था वर्धा का। लेकिन हम बात कर रहे थे हिंदी के कालखंड को परिभाषित करने की, तो सीधी बात ये है कि हिंदी का समूचा इतिहास दो भागों में बंटा हुआ है। इतिहास के पहले खंड को ‘हिंदी समय पूर्व’ नाम से जाना जाता है और दूसरे खंड को ‘हिंदी समय से हिंदी के दूसरे समय तक’ के नाम से। तीसरा, एक भविष्य का भी काल है जिसे ‘हिंदी के दूसरे समय से आगे का समय’ कहा जाएगा। इतना जानने के बाद अब इस सवाल का जवाब दीजिए कि कालजयी नहीं बल्कि काल के रचयिता महापुरुष कौन है? पूरे चार नंबर के इस प्रश्न का जवाब है उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय।

अक्टूबर 2008 में कुलपति बनकर वर्धा पहुंचने के बाद 2009 के शुरुआती दिनों में उन्होंने हिंदी पट्टी को आमंत्रण कार्ड बांटा और उस उजड़े से परिसर में छात्रों से ज़्यादा हिंदी के मेहमान वहां पहुंचे थे। ‘हिंदी समय’ का आग़ाज़ हो चुका था। विभूति नारायण राय ने अपने वर्धा आगमन का जो ढोल पीटा उसमें काफ़ी धमक थी और काफ़ी आवाज़। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पुराने कुलपति श्रीमान अशोक वाजपेयी से लेकर कुलाधिपति श्रीमान नामवर सिंह से लेकर जाने कितने हिंदी के कसरती शरीर वहां नमूदार हुए थे। हफ़्ते भर काफ़ी गहमा-गहमी का माहौल रहा, विद्यार्थी भी खुश थे कि कुछ आयोजन-सा हुआ और कुछ ‘बड़े लोगों’ से पता-परिचय भी। फिर शादी के टैंट की तरह वहां के टैंट भी उखड़ गए और अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का परिसर अपनी रूटीन पर लौट गया। तब से लेकर अब तक हिंदी, हिंदी से जुड़े लोगों, हिंदी के सवालों और विभूति नारायण राय के ऊपर काफ़ी पानी बह चुका है।

लगभग चार साल गुजर गए और राय साहब को अब महसूस हो गया कि उस कार्यक्रम की पुनरावृत्ति होनी चाहिए। तो साहिबान, 2013 पेश करता है आपके सामने ‘हिंदी का दूसरा समय’। चलिए मान लेते हैं कि हिंदी की सेहत के लिए ऐसे आयोजन बेहद ज़रूरी है, ये भी मान लेते हैं कि रचनाकारों का आपस में समय-समय पर संवाद करने के लिए माकूल जगह मुहैया कराई जानी चाहिए और खींच-तान कर ये भी मान लेते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को लाभ मिलता है। बावज़ूद इसके मामले की हल्की तफ़्तीश तो ज़रूर की जानी चाहिए। मैं निजी तौर पर जानता हूं कि राय साहब को अदबी ज़ुबान बेहद रास आती है इसलिए दरख़्वास्त है राय साहब कि मुझे ऐसा करने की इजाज़त बख़्सी जाए!

इससे पहले कि मंच से आप ये बात दोहराएं मैं ख़ुद ही कह देता हूं कि 2009 वाले उस उजड़े परिसर में अब भवन बन गए हैं। मैं इन इमारतों में पड़े दरारों और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा उत्तर प्रदेश (आपका गृह राज्य) के कुछ लोगों को ग़लत तरीके से लाभ पहुंचाने के आरोपों को झुठलाते हुए सीधे कहता हूं कि आपने शानदार काम किया है। पूरे विश्वविद्यालय को नीचे से उठाकर टीले पर पहुंचा दिया, नीचे वाले हिस्से में शिक्षकों का घर बना दिया, भाड़े के हॉस्टल को ख़त्म कर पहले लड़कियों के और फिर ‘उत्तरी परिसर’ में लड़कों के न सिर्फ़ हॉस्टल बनाए बल्कि पुलिसिया पृष्ठभूमि से आए सरकारी आदमी होने के बावज़ूद जिस हद तक संभव था आपने प्रगतिशीलों, क्रांतिकारियों के नाम पर इन इमारतों के नाम रखे। दलित छात्र-छात्राओं की भूख हड़ताल चलती रही, हर साल प्रवेश परीक्षा में आंतरिक आरक्षण और संवैधानिक आरक्षण के गणित में आप गड़बड़ी करते रहे लेकिन हॉस्टल का नाम जब रखना हुआ तो आपने बिरसा-मुंडा छात्रावास और सावित्रीबाई फुले छात्रावास रखा!

प्रगतिशीलता इसी का तो नाम है! हिंदी लेखिका को छिनाल कहे जाने को कितने महीनों तक कोई याद रखेगा, आरक्षण में भेद-भाव को, विद्यार्थियों पर लाठी भांजने को कितने समय तक कोई याद रखेगा, मनमर्जी से किसी को निकालने और किसी को वर्धा में बनाए रखने को कितने समय तक कोई याद रखेगा, अगर लंबे समय तक याद रखा जाएगा तो सिर्फ़ आपके द्वारा रखे गए इन हॉस्टल के नामों को। गोरख पांडेय छात्रावास, राहुल सांकृत्यायन पुस्तकालय, फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, कबीर हिल्स, गांधी हिल्स वगैरह। अब तो भगत सिंह हॉस्टल भी बन रहा है न? आपके ऊपर किताब लिखने वाले लोग रीडर बने फिर साल भर में प्रोफ़ेसर बन गए। आपके सामने चुप रहने वाले लोग परिसर से बाहर नौकरी की तलाश में नहीं भटकते, मुझे मालूम है। रिसर्च एसिस्टेंट, एसोसिएट, हिंदी समय डॉट कॉम, अनुवाद प्रोजेक्ट, फलाना प्रोजेक्ट, ढिमकाना प्रोजेक्ट, लेक्चरार आदि, आदि बहुत पद है वहां। पद के मुताबिक़ लोग ही कम हैं। आपको साधने का मतलब है दुनिया कुछ भी कहे लेकिन जिसने आपको साधा है वो इन्सान वहां निश्चिंत रह सकता है। दुनिया की परवाह आप भी कहां करते हैं। इसलिए तो किसी भी आलोचना को तवज्जो नहीं दी और आलोचकों को वर्धा बुला-बुलाकर उनके मुंह में सही शब्द ठूंस दिए। कहिए कि औकात बता दी!

अगर आप हुनरमंद और क़ाबिल नहीं होते तो इतने पुरस्कार और सम्मान फिर आपको क्यों मिलते? इतने सेमिनारों में आपको क्यों बुलाया जाता? दिल्ली की हंस वाली गोष्ठी में कश्मीर पर और वर्धा में उत्तर-पूर्व पर राजधर्म को निभाने वाली नैसर्गिक बात कहने के बावज़ूद पीयूसीएल आपको बलिया में क्यों ऐसे ही विषय पर बुलाता? राजकिशोर वर्धा को आपका हरम बताने के बाद वहां नौकरी क्यों करने जाते? ‘नक्सलबाड़ी कवि’ आलोकधन्वा वहां से पटना जाने के बाद ही आपकी आलोचना क्यों करते? छिनाल प्रकरण के बाद जेंडर समानता के लिए पौधा लगाने का विरोध वहां क्यों नहीं हुआ? मुंहफट विद्यार्थियों को ठिकाना लगाने के बाद वहां आप कितनी शांति से प्रशासन चला रहे हैं? हैं न?  बहुत सारे गुण हैं आपमें लेकिन भूमिहारों की योग्यता को पहचानने की आपकी क्षमता की मिसाल दी जानी चाहिए। भूमिहार भी तो इसी देश के लोग हैं जाहिर है कि उनकी बेहतरी एक तरह से देश की ही बेहतरी है। इस मामले में जो आपका विरोध करेगा, मैं उनका विरोध करूंगा। मैं आपके साथ हूं।

छिनाल प्रकरण को लोग अब भूल गए लेकिन भ्रष्टाचार तो आज-कल देश का बड़ा मुद्दा है और सीएजी (कैग) देश में न्यूज़ तय करने वाली संस्था। फिर भी आप पर कैग की रिपोर्ट आने के बाद बहुत से लोगों को इसके मुतल्लिक कुछ भी मालूम नहीं, तो इससे साबित होता है कि आप एक कुशल प्रबंधक भी हैं। आपका भविष्य उज्जवल है। मुझे बेहद दुख है कि आप सितंबर-अक्टूबर 2013 में वर्धा से अलग हो जाएंगे। सचमुच बेहद दुख है। लेकिन ज़्यादा दुख तब होता जब लगता कि आप साहित्य का मजमा लगाए बिना ही जा रहे हैं। आप 2013 के शुरुआत में ‘हिंदी का दूसरा समय’ कर रहे हैं, मैं खुश हूं। मैं देखना चाहता हूं कि आपके बहिष्कार की बात करने वाले कितने लोग अपनी बात पर टिके रहते हैं। दो साल में दुनिया काफ़ी बदली है। कई लोग समय बीतने के साथ बातों को भूल जाते हैं या फिर भूलने की जिद करने लगते हैं या फिर भूलने का फ़ायदा उठाना चाहते हैं। आपका क्या है, हिंदी का एक समय आने के नाम और एक समय जाने के नाम। वित्त वर्ष ख़त्म होने से पहले-पहले संस्थान के पैसे भी ख़र्च करने हैं, लिहाजा 2013 की गरमा-गरम शुरुआत कीजिए। अकेले आप कितनों की कलई उतार देते हैं, आप जैसे दो-चार लोगों का हिंदी में बने रहना बेहद ज़रूरी है। लोग आपको फ़र्जी कॉमरेड बोलते हैं, मैं दुनिया की नहीं मानता। इसलिए जाते-जाते आपको लाल सलाम!