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10 अक्टूबर 2015

अफ़वाहों से बचिए और अपना पक्ष तय कीजिए

-दिलीप ख़ान
पहले बिसाड़ा में मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या हुई, उसके बाद बिहार चुनाव में ये चुनावी मुद्दा बना। अब धीरे-धीरे मसला जब पेंदी में बैठने लगा था तो एक बार फिर मैनपुरी में चार लोगों को बुरी तरह पीटा गया। इस बार जान नहीं गई, लेकिन सिर्फ जान ही बची। दर्जन भर से ज़्यादा उन दुक़ानों को ख़ाक कर दिया गया, जिनके मालिक मुस्लिम थे। आरोप वही। एक ख़ास तरह की भीड़ ने उन चारों पर ये आरोप लगाया कि वो गोहत्या करने के बाद गाय की खाल उतार रहे थे!  

आज-कल जो माहौल बना है, वहां ठहरकर सोचने का स्पेस ख़त्म होता जा रहा है। अफ़वाह फैली और जान लेने की कोशिश शुरू हो गई। पुलिस इस बार जैसे-तैसे जान बचाने में क़ामयाब रही। फिर हुआ क्या? कुछ गाड़ियां जलीं और कुछ दुकानें, कुछ लोग बुरी तरह पीटे गए। लेकिन 'भीड़' शांत नहीं है। वो कहीं और इसी मुद्दे पर फिर जमा होगी। मोबाइल भीड़ जहां-तहां एक ही मुद्दे पर एक ही तरह की हरकत कर रही है। बिना प्रमाण के, बिना किसी ठोस वजह के।

अख़लाक़ के घर में तो अब साबित हो चुका है कि गोमांस नहीं था। गोहत्या का भी कोई मामला नहीं था। फ्रिज़ में जो था उसके लिए कभी दंगे की नौबत देश में नहीं आई। अख़लाक़ के घर में मटन था, बीफ़ नहीं। पुलिस की रिपोर्ट ये बता रही है। मैनपुरी में जो घटा, वो भी लगभग अख़लाक़ की कहानी का दोहराव है। पुलिस बता रही है कि मरी हुई गाय को कुछ हिंदुओं ने कुछ मुसलमानों को बेच दिया और वे उसकी खाल उतार रहे थे। बस्स, खाल उतारने की दिमाग़ में कौंधी तस्वीर धीरे-धीरे गोहत्या के अफ़वाह में तब्दील हो गई और उस 'भीड़' को फिर से मौक़ा मिला कथित धर्मरक्षा के नाम पर चार लोगों को मौत के घाट उतारने की हर मुमकिन कोशिश करने का।

अफ़वाहों के दौर में भीड़ की बौद्धिकता लगातार कम होती जाती है। जब भी अफ़वाहों के आधार पर कोई समूह रिएक्ट करता है तो वो तार्किक तरीके से सोचने की अपनी सारी शक्ति ख़ुद से बाहर छोड़ आता है। लोग मौक़े के मुताबिक़ रिएक्ट करते हैं। आम तौर पर उनके दिमाग़ में एक तस्वीर बनती है और वो तस्वीर अचानक कई तस्वीरों को जन्म देती हैं, जिनमें आख़िरी तस्वीर का पहले के साथ कोई रिश्ता हो, ये ज़रूरी नहीं।
बूचड़खाना खोलने के लिए संगीत सोम की दरख़्वास्त

दादरी और मैनपुरी में जो कुछ हुआ या आगे कहीं और होने वाला है, वो हमारे सामने क्या चुनौती पेश कर रहा है? क्या इन तमाम लोगों का उसका कोई ठोस राजनीतिक रुझान नहीं है? क्या ये महज अफ़वाहों के शिकार लोग हैं और ये अप्रत्याशित तौर पर धर्म रक्षा के जज़्बे से इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं? अगर हां, तो फिर इन्हें ठहरकर दो मिनट सोचना चाहिए कि फिर वे कौन लोग हैं जो इनको ऐसी करतूत के लिए उकसाते हैं? दो मिनट के लिए भूल जाइए कि सारे के सारे एक ख़ास राजनीतिक समूह से सीधे तौर पर जुड़े लोग ही हैं। हो सकता है आप योजनाकारों में शामिल ना हों, हो सकता है कि आप हमलावर भी ना हों, लेकिन अगर आप इन हमलों को वैध क़रार देते हैं तो उनसे अलग भी नहीं है।

सवाल ये है कि गोमांस और गोहत्या को किस तरह देखा जाए? ठीक है कि ये किसी एक धर्म के लोगों के लिए आस्था का मसला है, लेकिन क्या अपने धर्म के मुताबिक़ दूसरों को भी ज़बर्दस्ती जीने लायक बनाकर छोड़ेंगे आप? दादरी में अगर अख़लाक़ के घर में मटन की जगह बीफ़ होता तो क्या होता? क्या फिर वो हत्या वैध हो जाती? बीफ़ रखना या खाना उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित नहीं है, गोहत्या ज़रूर प्रतिबंधित हैं। इस तरह अगर किसी के प्लेट में बीफ़ है तो वो किसी भी तरह क़ानून का भी उल्लंघन नहीं कर रहा। दूसरी बात, अगर उल्लंघन कर भी रहा है तो आपको कोई हक़ नहीं है कि किसी की जान ले लें।

जिस पार्टी के लोग अख़लाक़ की हत्या में आरोपित हैं और जिस पार्टी का एक नेता मुज़फ़्फ़रनगर दंगे का आरोपी है, उनकी निजी ज़िंदगी कैसी है? संगीत सोम का एक हलफ़नामा अब मीडिया में तैर रहा है जिसमें वो बूचड़खाना खोलने के लिए सरकार से लाइसेंस की मांग की थी। तो आर्थिक फ़ायदे के लिए संगीत सोम को बूचड़खाना खोलने से कोई परहेज नही है, लेकिन राजनीतिक फ़ायदे के लिए अख़लाक़ पर गोहत्या का आरोप लगाकर उसकी हत्या को वैधता देने में हैं। राजनीतिक फ़ायदा इसमें है कि वो सभी आरोपितों के पक्ष में बयान दें। जो बीजेपी देश भर में घूम-घूम कर बीफ़-बीफ़ चिल्ला रही है उसी बीजेपी की गोवा सरकार ने मार्च महीने में बीफ़ की क़िल्लत देखते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक से बीफ़ आयात करने का फ़ैसला किया। गोवा में रोज़ाना 30 से 50 हज़ार किलोग्राम बीफ़ की खपत होती है। जो नरेन्द्र मोदी लोक सभा चुनाव में पिंक रिवोल्यूशन का नारा देते फिर रहे थे, उसी नरेन्द्र मोदी के शासन में भारत दुनिया में बीफ़ का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया।

उनको अफ़वाहों से फ़ायदा है, उनको इस बात से फ़ायदा है कि धार्मिक तौर पर लोग गोलबंद हो जाए। हम-आप जो 60-70 साल से किसी इलाक़े में बिना दंगा-फ़साद के साथ रह रहे हैं, उसके लिए क्या फ़ायदा? एक दिन की घटना के बाद गहराए जख़्म को भरने में दशकों लग जाएंगे। मुज़फ़्फ़रनगर पहले ऐसा कहां था? फ़रीदाबाद की घटना याद कीजिए। वहां भी गांव छोड़कर जाना पड़ा था। दादरी के बिसाड़ा गांव में जब मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या हुई तो उसके बाद भी पड़ोसी गांव में मांस का टुकड़ा पुलिस ने बरामद किया। यानी पूरे इलाक़े में नियोजित तरीके से मांस के नाम पर दंगा भड़काने की कोशिश जारी है। ऐसे में हमें-आपको तय करना है कि किस तरफ़ रहेंगे? वो तो मोहम्मद अख़लाक़ का एक बेटा एयरफोर्स में हैं, इसलिए देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं मांगा जा रहा, नहीं तो जो माहौल है, वैसे में किसी भी मुस्लिम पर कोई भी आरोप लगा दें, सफ़ाई आरोप लगाने वालों को नहीं उस व्यक्ति को देनी होती है जिस पर आरोप लगा है। बाद में आरोप ग़लत साबित हो जाए तो भी आरोप दाग़ने वालों की कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं होती।


संगीत सोम और संजीव बालियान जैसे नेता देशभक्त हैं। गिरिराज सिंह बीफ़ और मटन की तुलना बहन और पत्नी से कर रहे हैं। यानी स्त्री को मांस के बराबर तौल रहे हैं। ये क्या स्लिप ऑफ टंग है या राजनीतिक परवरिश? ये लोग लगातार देशभक्त बने रहेंगे। देशभक्ति के ऐसे माहौल में देशभक्तों की पहचान बहुत ज़रूरी हो गई है। 

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08 अक्टूबर 2015

बिहार में बीफ़ पॉलिटिक्स

दिलीप ख़ान
राजनीति की धुरी 
दादरी के बिसाड़ा गांव में 28 सितंबर की रात उन्मादी लोगों के एक समूह ने अख़लाक़ की गोमांस खाने की अफ़वाह के आधार पर हत्या कर दी। बिहार में चुनाव के मद्देनज़र उसी वक़्त से ये कयास लगाए जा रहे थे कि राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे की घटना बिहार की ज़मीन तक खींच लाई जाएगी। हफ़्ते भर चली तीखी बहस के बाद राष्ट्रीय स्तर पर इस घटना पर कई पक्ष उभरकर सामने आए। फ़िलहाल उन तमाम दलीलों, बहसों को स्थगित करते हुए अगर बिहार के सियासी रण में इस घटना के जुड़े तार पर नज़र दौड़ाएं तो ये साफ़ हो चला कि बीजेपी इस घटना को बिहार में भी बड़े मुद्दे के तौर पर उछाल रही है। घटना की आंच को बिहार में हिंदूवादी रंग में रंगने की कोशिश को बीजेपी इस तरह देख रही है कि धार्मिक गोलबंदी के ज़रिए जातिवादी खांचे में बंटे हिंदू समाज वो एक अस्मिता के तौर पर बांध लेगी।

पहले छिटपुट आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चला और बाद में जब आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने ये बयान दिया कि हिंदुओं का भी एक तबका बीफ़ खाता है तो पूरे मामले ने बिहार में तूल पकड़ लिया। बीजेपी इसी तरह के बयान के फ़िराक में थी और 5 अक्टूबर को राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने बाक़ायदा इस पर लंबा बयान देकर जनता को ये संदेश दिया कि महागठबंधन के नेता बीफ़ खाने की तरफ़दारी कर रहे हैं। सुशील मोदी ने कहा, “जहां नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश सीमा पर चौकसी बढ़ाकर हज़ारों गायों को कटने से रोक दिया है, वहीं लालू-नीतीश और सोनिया गांधी गोमांस खाने की बात कर रहे हैं।” हालांकि ना तो सोनिया गांधी और ना ही नीतीश कुमार ने इस पर कोई बयान जारी किया, लेकिन बीजेपी ने समूचे महागठबंधन को इस राजनीति की आंच में एक कड़ाही में बंद कर दिया।

इसके बाद मीडिया ने जब इसको लपका तो लालू प्रसाद यादव को पीछे हटते हुए सफ़ाई देनी पड़ी कि वो पुश्तैनी तौर पर गाय पालते रहे हैं और गोरक्षा को लेकर उन्हें किसी भी तरह के स्पष्टीकरण की दरकार नहीं है क्योंकि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के मुक़ाबले गाय के प्रति उनका प्यार सार्वजनिक है। लालू प्रसाद शायद इस बयान में अपनी जातिगत पृष्ठभूमि को जाहिर करते हुए यादव और पशुपालन के संबंधों को रेखांकित करना चाह रहे थे। हालांकि वो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश मार्कंडेय काट्जू और सिने अभिनेता ऋषि कपूर के उदाहरण के ज़रिए इस बात पर भी अड़े रहे कि हिंदुओं का एक तबका बीफ़ खाता है और ये देश की हक़ीकत है।

पशु से मैय्या तक
बिहार के चुनाव को इस बार देश की राजनीति के लिए अहम बताया जा रहा है और इसके बाद पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और केरल में होने वाले चुनाव के लिहाज से बीजेपी के लिए ये अहम पड़ाव है। लिहाजा, बिहार में बीजेपी ने इसे साख का सवाल बना लिया है और महागठबंधन की पार्टियों के लिए भी ये समीक्षा के आख़िरी मौक़ों में से एक है कि जिस राजनीति के आधार पर उन्होंने एकजुट होने का फ़ैसला लिया और “जनता दल’ का प्रयोग आख़िरी मौक़े पर समाजवादी पार्टी के अलग होने से बिखर गया, उसकी राह आने वाले दिनों में कहां तक पहुंच पाएगी?

अब दो प्रमुख मुद्दे उभरते हैं एक तो बिहार की राजनीति में बीफ़ पॉलिटिक्स की दरकार और दूसरा बीफ़ को लेकर प्रचलित मान्यताओं की हक़ीक़त। बढ़ती महंगाई से लेकर बेरोज़गारी, पलायन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते बिहार में विकास की बात हर पार्टी कर रही है और हर पार्टी का दावा है कि उनके लिए यही सबसे बड़ा एजेंडा है, लेकिन इन बयानों के समानांतर ये भी साफ़ हो चला है कि पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा गहरे स्तर तक ये चुनाव जातिगत और धार्मिक आधार पर लड़ा जा रहा है। महागठबंधन के भीतर जहां आरजेडी मंडल-2 की बात उछालकर सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग को अपना प्रमुख एजेंडा बनाकर प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ उसकी सहयोगी जेडीयू अपने प्रचार में विकास और नीतीश सरकार के काम-काज को रैलियों में तरजीह दे रही है। यानी दोनों पार्टियों ने रणनीतिक तौर पर मतदाताओं के लिए मुद्दे बांट लिए हैं। लालू प्रसाद यादव को तो अगड़े-पिछड़े पर दिए गए एक बयान के बाद चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेज दिया।

जातिगत समीकरण के लिहाज से बीजेपी के लिए इस चुनाव को मुफ़ीद नहीं माना जा रहा है, लिहाजा उसके लिए जातिगत अस्मिता को धार्मिक अस्मिता के लबादे से ढंकना फ़ायदे का सौदा है। बीफ़ एक ऐसा शब्द है जो राजनीतिक तौर पर हिंदू पहचान को समेटने की कोशिश में क़ामयाबी देने का माद्दा रखता है। ये अलग बात है कि ऐतिहासिक तौर पर और इस वक़्त भी हिंदुओं का एक तबका बीफ़ खाता ज़रूर है लेकिन राजनीतिक माहौल में बीफ़ को धार्मिक पहचान का मुद्दा मानते हुए वो लकीर के एक तरफ़ खड़ा हो सकता है।

इस पूरे मामले में ग़ौरतलब बात ये है कि बिहार में जातीय पहचान को दरकिनार करने की दो कोशिशें हुईं और दोनों बीजेपी के चलते। एक कोशिश बीफ़ की और दूसरी बिहारी उपराष्ट्रवाद की। नरेन्द्र मोदी ने बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर की पहली चुनावी रैली में जब नीतीश कुमार को लेकर डीएनए वाला बयान दिया तो महागठबंधन ने इसे 180 डिग्री मोड़ते हुए बिहारी अस्मिता पर चोट करार दिया। डीएनए जांच करने के लिए कैंप लगाने की राजनीतिक नौटंकी हुई और मामला कुल ऐसा बना कि बिहारी नाम की कोई एक पहचान बिहार के भीतर रह रहा है जिसको अपमानित किया गया। शैवाल गुप्ता ने इसे बिहार के सुसुप्त राष्ट्रवाद को उछालने का मामला बताया। यानी, जिस तरह तमिलनाडु में तमिल अस्मिता, पश्चिम बंगाल में बांग्ला अस्मिता भारतीय राष्ट्रवाद के समानांतर चलती रहती है उस तर्ज पर उत्तर भारत में कभी भी उपराष्ट्रवाद सतह पर नज़र नहीं आया।

डीएनए और स्पेशल पैकेज देने के वक़्त नरेन्द्र मोदी की भंगिमा को जिस तरह महागठबंधन ने बिहारी अस्मिता से जोड़ा वो इस चुनाव में पहली बार बिहारियों को एक ठोस आइडेंटिटी के नीचे खड़ा कर दिया। दूसरी तरफ़ बीजेपी ने बीफ़ को हिंदू अस्मिता के साथ जोड़ते हुए जातीय पहचान को पाटने की कोशिश की। बड़ा सवाल तो ये है कि दोनों गठबंधनों के बीच जिस चुनाव को सीधा मुक़ाबला माना जा रहा है, क्या उसमें जातियों के चक्रव्यूह को भेदने की कोशिश में दोनों आश्वस्त नहीं है?

तीसरा मामला ये है कि बीफ़ को लेकर जिस तरह की अफ़वाह दादरी से लेकर बिहार के मैदान तक फैलाई गई, उसकी सच्चाई क्या है? राजनीतिक बिसात पर बीफ़ का उदय हाल के दिनों में नरेन्द्र मोदी की देन है, जब लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कई रैलियों में ‘पिंक रिवोल्यूशन’ का मुद्दा उठाया। ज़्यादा विस्तार में ना जाते हुए दो-तीन बातों का ज़िक्र करना ज़रूरी है। पहली, भारत गोमांस का निर्यात नहीं करता। दूसरी, बीफ़ की अंतरराष्ट्रीय श्रेणी में गाय के अलावा भैंसे का भी मांस आता है और साल भर पहले तक भारत बीफ़ (यानी भैंसे का मांस) निर्यात में दूसरे नंबर पर था और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नंबर वन बन गया। तीसरी, देश के कई राज्यों में गोमांस खाना बूचड़खानों में गाय काटना भी क़ानूनी है और जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के अलावा किसी भी राज्य में बीजेपी सरकार ने इस पर पाबंदी लगाने की कोई कोशिश नहीं की।

बिहार में गाय की राजनीति को हवा
इन तमाम तथ्यों का बिहार से सीधे तौर पर लेना-देना नहीं है, लेकिन चुनावी बयार में बीफ़ को लेकर चुनिंदा तथ्यों को जिस तरह राजनेता पेश कर रहे हैं उसमें इस लिहाज से ये ज़रूरी है कि अचानक राजनीति में बीफ़ के उदय को मतदाता किस तरह देखें। बिहार अगले एक महीने तक ऐसे कई मुद्दों से होकर गुजरेगा जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए कतई मुद्दा नहीं है। ऐसे आसमानी मुद्दे कई दफ़ा वास्तविक मुद्दों को पीछे धकेलने में क़ामयाब हो जाती है। लिहाजा इस क़ामयाबी को असफ़ल करने का पूरा दारोमदार उस समूह पर है, जिसे लोकतंत्र में मतदाता के नाम से बुलाया जाता है।

जो बिहार मानव विकास सूचकांक पर निचले पायदानों पर लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज करता रहा है, उसके लिए बीफ़ मतदान का बड़ा मुद्दा नहीं हो सकता। लेकिन, दादरी में बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई घटना को बिहार में राजनीतिक बढ़त के लिए इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश इसी दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। इस मामले के बाद बीफ़ को लेकर सच्चाई बयान करने का जोखिम भी विपक्ष नहीं उठा सकता, क्योंकि अगर ये मुद्दा लंबा खिंचा तो सबसे ज़्यादा फ़ायदा बीजेपी को होगा। तो, बिहार में जातीय पहचान को ओवरलैप करने की दो कोशिशों (बिहारी उपराष्ट्रवाद के ज़रिए और धार्मिक पहचान के ज़रिए) का अंजाम क्या होना है? क्या विकास की बात करने वाली तमाम पार्टियां हमेशा इस फिराक में रहती हैं कि विकास को आगे कर जनता की संवेदनशील नस को किन मुद्दों के ज़रिए छुएं?  चुनाव के बीच में दशहरा और मुहर्रम दोनों होने हैं और बीफ़ जैसे संवेदनशील मुद्दे बिहार की राजनीति को ग़लत दिशा में मोड़ सकते हैं।

फ़िलहाल बिहार के अलावा पूरे देश में जिस तरह की राजनीति इस मसले पर चल रही है उस लिहाज से सभी पार्टियों को समाज के व्यापक हित में इसे बंद कर बिहार की बुनियादी सुविधाओं की बात करनी चाहिए और ये दिखाना चाहिए कि किसके पास बिहार को बेहतर बनाने का अच्छा मॉडल है। एनडीए की मुश्किल ये है कि विकास और तरक्की की बात करेगी तो महंगाई समेत कई मुद्दों पर वो ख़ुद घिर जाएगी क्योंकि केंद्र में वो सत्ता में है और महागठबंधन की मुश्किल ये है कि विकास की बात करते ही बिहार के पिछड़ेपन के लिए नीतीश और पूर्ववर्ती लालू सरकार पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
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22 अगस्त 2015

बीफ़=गौमांस में अफ़वाहों का संचारशास्त्रीय अध्ययन

-दिलीप ख़ान
विश्वसनीयता की जांच-परख किए बग़ैर जारी कोई बयान या रिपोर्ट अफ़वाह है। लेकिन इसका उद्देश्य होता है कि लोग उस बयान या रिपोर्ट पर भरोसा कर लें।
- अलपोर्ट और पोस्टमैन*
3 अक्टूबर 2008 को वेबसाइट आईरिपोर्ट पर एक सूचना छपी कि एप्पल के (दिवंगत) सीईओ स्टीव जॉब्स को हृदयाघात होने वाला है। जल्द ही ये सूचना दुनिया के व्यापारिक और उद्योग जगत में तेज़ी से फैल गई। सूचना की तहकीकात की कोशिश नहीं हुई और ना ही इसकी वैधानिकता की जांच की ही। नतीजा ये हुआ कि $105.04 से गिरकर एप्पल के शेयर का भाव $94.65 रह गया। कंपनी को 9 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। [1] डेविड डुबॉयस ने अफ़वाहों पर अध्ययन में पाया कि उद्योग जगत में इस तरह की कई सूचनाएं छोड़ दी जाती हैं जो आकर्षक और लोगों की भावनाओं से जुड़ी हों। ऐसी सूचनाएं तेज़ी से फैलती हैं और लोग इसकी विश्वसनीयता की जांच किए बगैर इसे आगे बढ़ा देते हैं। मैक्डोनल्ड के बारे में किए गए एक दिलचस्प अध्ययन में डेविड ने पाया कि किस तरह सोशल मीडिया पर कोई सूचना आने के बाद वो बिजली की तेज़ी से लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है। मैक्डोनल्ड के बारे में एक अफ़वाह फैली कि रेस्तरां के बाहर एक बोर्ड लगा है जिसमें कहा गया है कि अश्वेत लोगों को वहां खाने के बदले में डेढ़ डॉलर का ज़्यादा भुगतान करना होगा। इसके बाद फेसबुक और ट्विटर पर इस अफवाह ने गति पकड़ ली और दुनिया भर के मुल्क़ों में मैक्डोनल्ड के खिलाफ माहौल बन गया। [2]  

अफ़वाहों को लेकर दुनिया भर में कई उदाहरण हैं जिनपर अकादमिक शोध हो चुके हैं। कई अफ़वाह ऐसी हैं जो हमारे आस-पास मौजूद हैं, कुछ ऐसीं जिन्हें हम बचपन से सुनते रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कई मान्यताएं/सूचनाएं आगे बढ़ती रहती हैं और लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हुए सूचनाओं को आगे बढ़ाते रहते हैं। लकड़सुंघवा की कहानियों से लेकर आत्मा की खोजके लिए शीशे की बंद केबिन में किए गए प्रयोग तक कहानियों की लंबी श्रृंखला हैं जिन्हें देश में लाखों लोगों ने सुन रखी हैं। अफ़वाहों के फैलने की वजह क्या है? क्यों तेज़ी से ये फैलती हैं और लोग ऐसी सूचनाओं पर भरोसा करते हुए उन्हें आगे क्यों बढ़ाते हैं? ये कुछ बुनियादी सवाल हैं जो अफ़वाह शब्द के साथ ही दिमाग़ में कौंधते हैं। डिफ्रांज़ो और बोर्दिया ने अफ़वाह को परिभाषित करते हुए कहा कि लोगों के बीच फैलने वाली ऐसी सूचनाएं जो मोटे तौर पर प्रासंगिक लगती हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता जांची नहीं होती [3]  

मोटे तौर पर प्रासंगिक लगने का मसला दिलचस्प है। यानी समाज की मान्यता के दायरे में किसी बात को अगर कान में डाल दी जाए तो अपरिचित नहीं लगने की वजह से लोग उस पर भरोसा कर सकते हैं। यानी मान्यता, भरोसा और विश्वसनीय लग सकने भर के आस-पास की बात पर लोग आसानी से यक़ीन कर सकते हैं। एक बार किसी समूह ने उस पर मुहर लगा दी तो फिर रोमांच और मान्यताओं के चलते वो आगे बढ़ती रहेगी। आधिकारिक चैनलों से सूचना के अभाव (या फिर इस पर विश्वास के अभाव) के चलते लोग एक-दूसरे की कही-सुनी बातों पर यक़ीन करने लगते हैं और इस तरह एक-दूसरे की समस्या की सामूहिक निपटान प्रक्रिया के तहत अफ़वाह का जन्म होता है। [4] 

सांस्कृतिक और सामाजिक बनावट को चुनौती देने वाली कोई भी बात इस दायरे में बिल्कुल फिट बैठती है। खान-पान चूंकि इस बनावट का ज़रूरी हिस्सा है इसलिए लोग इसे लेकर ना सिर्फ़ चौकस रहते हैं बल्कि दूसरे समुदाय पर नज़र भी रखते हैं। भारत में ऐसी ही एक मान्यता गौमांस को लेकर विकसित हुई है, बल्कि यूं कहें कि हाल में ये मान्यता ज़्यादा तेज़ी से फैली है। इसकी ज़द में ना सिर्फ़ समाज का वो हिस्सा आया जिसे हम संचार की भाषा में इनफॉर्मल रिसिविंग समूह कह सकते हैं, बल्कि वो भी आया जोइंप्रोवाइज़्ड न्यूज़ए सोशियोलॉजिकल स्टडी ऑफ़ रियूमर किताब के लेखर टी शिबूतानी की भाषा में एक हद तकआधिकारिक समूह है। यानी मीडिया। जिस मीडिया के समाज के बड़े तबके को ये अपेक्षा होती है कि वो किसी मान्यता या किसी बयान की सच्चाई की पड़ताल करेगा, वो मीडिया देश में गौमांस को लेकर मौजूद धारणाओं का सच दिखाने के बदले उन मान्यताओं को स्वीकार करता दिखा। अंग्रेज़ी के बीफ़ शब्द का अनुवाद हिंदी में मीडिया के बड़े हिस्से ने गौमांस किया।

कम्यूनिकेशन के लिहाज से ये बेहद महत्वपूर्ण बात है कि कैसे मीडिया ने प्रचलित धारणाओं की ज़द में रहते हुए बीफ़ को (सिर्फ़) गौमांस कहा और अफ़वाह और इसको लेकर चल रहे प्रोपेगैंडा को एक तरह से ज़मीन मुहैया कराई। सच्चाई को जानने-समझने और समझाने का प्रयास चूकता दिखा। सच्चाई ये है कि बीफ़ की अंतरराष्ट्रीय श्रेणी में गाय-बछड़ों के अलावा भैंस भी शामिल हैं। इस तथ्य के अभाव के चलते बीफ़ के अनुवाद ने देश में कई बार दंगे की हालत पैदा कर दी। 2013 के अगस्त में दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर धारूहेरा में आरएसएस और बजरंग दल की अगुवाई में लोगों ने मिलकर 70 से ज़्यादा ट्रकों को खाक़ कर दिया। एक ट्रक में गौमांस होने की आशंका के बाद वहां लोग जमा हुए और इसे आस्था का मसला करार देते हुए तोड़-फोड़ करते रहे। कस्टम के अधिकारियों ने जब जांच की तो पता चला कि वो गाय नहीं भैंसे का मांस है। [5]

बीफ़ को गौमांस समझने के चलते देश में कई मुश्क़िलें खड़ी हुईं। इस लेख में बाक़ी मुश्क़िलों के बजाए गड्ड-मड्ड हुई धारणाओं के चलते जो व्यापक जनमानस में बदलाव आया है उसको संचार के नज़रिए से समझने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान देश भर में घूम रहे थे तो उन्होंने कई रैलियों में पिंक रिवोल्यूशन का मसला उठाया। ज़ोर दिया गया कि भारत ने हाल के वर्षों में गोमांस का निर्यात तेज़ किया है। [6] मीडिया में भी यही ख़बरें छपीं। बाद में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2014 के विजयादशमी के दिन अपने संघ मुख्यालय में भाषण में देश के सामने अपील की कि गोमांस निर्यात पर पाबंदी लगनी चाहिए। [7] बड़ी तादाद में लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। निर्यात के पक्ष और विपक्ष, दोनों में।

आरएसएस और अन्य संगठन की गौमांस निर्यात पर पाबंदी की मांग पहली नज़र में ही तथ्यात्मक तौर पर ग़लत है।गौमांस निर्यात’ विवाद का मुद्दा बन ही नहीं सकता क्योंकि देश में गौमांस पर पूरी तरह पाबंदी है। क़ानूनी पाबंदी। नरेन्द्र मोदी जब चुनाव प्रचार के दौरान इसे यूपीए सरकार का गुप्त एजेंडा कह रहे थे तो उससे ऐसी ध्वनि निकल रही थी जैसे भारत की जनता से चुरा-छिपाकर सरकार गौमांस का निर्यात करती हो। लेकिन समय बदला और सरकार बदली, लेकिन तथ्य नहीं बदले। नरेन्द्र मोदी अब देश के प्रधानमंत्री हैं। तथ्य ये है कि मोदी सरकार ने चीन और रूस दोनों को बीफ़ निर्यात बढ़ाने का आश्वासन दिया है। रूस और चीन दुनिया में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा मांस का आयात करने वाले मुल्क़ हैं। फ़िलहाल भारत इन दोनों देशों को सीधे मांस निर्यात नहीं करता, बल्कि वियतनाम के रास्ते यहां मांस भेजा जाता है। सरकार की कोशिश है कि अब सीधे मांस इन दोनों देशों तक पहुंचाया जाए। [8]

असल में गौमांस का मसला भारत के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं से जुड़ा है और राजनीतिक संचार की रणनीति के तहत अगर इस तथ्य को देखा जाए तो गोलबंदी के लिहाज से बहुसंख्यक समुदाय को उपयुक्त लगने वाली बात कहकर उसे अपने पक्ष में किया जा सकता है। राजनीतिक संचार में बहुसंख्यक समुदाय को उपयुक्त लगने वाली बात में अफ़वाह और प्रोपेगैडा को लेकर विमर्श नया नहीं है, बल्कि जिस वक़्त ठोस तरीके से कम्यूनिकेशन स्टडीज़ की सैद्धांतिकी गढ़ी गई उसी वक़्त से इन अवधारणाओं पर भी शोध हुए। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ियों के प्रोपेगैंडा पर दर्जनों शोध हो चुके हैं और सैंकड़ों लेख लिखे जा चुके हैं कि किस तरह उस वक़्त यहूदियों के ख़िलाफ़ ऐसे तथ्य लोगों तक पहुंचाए जाते थे जो नाज़ियों को गोलबंद करने में कारगर साबित हो। साथ ही विश्वयुद्ध में शरीक दुश्मन मुल्क़ों के बारे में रेडियो के ज़रिए कई तरह की अफ़वाहें और प्रचार (प्रोपेगैंडा) फैलाए जाते थे ताकि रणनीतिक बढ़त हासिल हो सके। [9]

अफ़वाह और प्रोपेगैंडा जब वांछित लाभ के लिए समाज में फैलाए जाते हैं तो उसमें तथ्यों की जांच की संभावना बहुत सीमित रह जाती है, अगर उस पर बड़े हिस्से ने यक़ीन करना शुरू कर दिया हो। बड़े हिस्से के यक़ीन को आधिकारिक सूचना के ज़रिए भी संतुष्ट करना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि आधिकारिक सूचना से ज़्यादा विश्वसनीयता उन्हेंसामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए एक-दूसरे की सुनी-सुनाई बातों से हासिल हो रही होती है। [10] मनोविज्ञान के साथ इसका गहरा ताल्लुक है। चर्चित मनोविश्लेषक जी ली बॉन ने 19वीं सदी के अंत में लिखी अपनी प्रसिद्ध किताब द क्राउड में लिखा है कि किसी एक व्यक्ति के मुक़ाबले भीड़ का व्यवहार पूरी तरह अलहदा होता है। 

उनके मुताबिक़ “भीड़ में शामिल लोग किसी भी तरह के हों, सच्चाई ये है कि वो भीड़ का हिस्सा बन चुके हैं। लिहाजा उनके सोचने-समझने की दिशा सामूहिकता के साथ जुड़ जाती है। यही सामूहिकता तय करती है कि वह व्यक्ति किस तरह सोचेगा, महसूस करेगा और किसी ख़ास परिस्थिति में किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। [11] उन्होंने ये भी कहा कि भीड़ की बौद्धिकता भीड़ से अलग एक व्यक्ति की बौद्धिकता से कमतर होती है क्योंकि भीड़ तार्किक तरीके से सोचने में सक्षम नहीं हो पाती। भीड़ हमेशा मौक़े के मुताबिक़ रिएक्ट करती है। मनोविज्ञान के मुताबिक़ भीड़ तस्वीरों में सोचती है और एक तस्वीर तत्काल कई तस्वीरों का निर्माण कर देती है। कोई ज़रूरी नहीं है कि बाद की तस्वीरों का कोई सीधा संबंध पहली तस्वीर के साथ हो ही। इस तरह जो सोचने की प्रक्रिया है वो क्षणिक तौर पर मान्यताओं के दायरे में गढ़ी गई दुनिया को बचाने और उसको विस्तार देने की कोशिश का नतीजा होती है जिसकी कोई तार्किक परिणति हो, ज़रूरी नहीं।

गौमांस को लेकर गढ़ी गई मान्यताओं में दो जीज़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहली, बहुसंख्यक समुदाय के भीतर इसको लेकर मौजूद धारणा और दूसरी बहुसंख्यक समुदाय को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल होने वाली राजनीतिक शब्दावली और रूपक। अगर किसी राजनीतिक पार्टी के लिए गौमांस का निर्यात किसी दूसरी सरकार का गुप्त एजेंडा है तो उस राजनीतिक पार्टी को सत्ता मिलने के बाद उस गुप्त एजेंडा का या तो बंद करना चाहिए या फिर उसका तथ्यात्मक पर्दाफाश। लेकिन पिंक रिवोल्यूशन सिर्फ़ रैलियों के नारों में ही सिमटकर रह गया और नई सरकार उसी गुप्त एजेंडे को चुपचाप आगे बढ़ाने लगी। भारत दुनिया में बीफ़ का निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। [12] लेकिन बीफ़ में भारत सिर्फ़ भैंस के मांस का निर्यात करता है। बीफ़ के प्रचलित अनुवाद के चलते इस उद्योग से जुड़े कारोबारियों को भी कई दफ़ा मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बीफ़ के साथ गौमांस अनुवाद’ के अलावा दो-तीन धारणा और भी मौजूद हैं। पहला ये कि सबसे ज़्यादा बीफ़ निर्यात खाड़ी के देशों में होता है। तथ्य ये है कि भारत सबसे ज़्यादा बीफ़ निर्यात दक्षिण-पूर्वी एशिया के मुल्क़ों को करता है, जिनमें वियतनाम शीर्ष पर है। [13] दूसरा, बीफ़ कारोबार में सिर्फ़ मुसलमान लगे हुए हैं। तथ्य ये है कि इसमें सवर्ण हिंदू’ [14] और यहां तक कि जैन समुदाय (जो धार्मिक मान्यताओं के चलते शाकाहारी होते हैं) के लोग भी बड़ी संख्या में इस कारोबार में शामिल हैं। [15]

निर्यात से जुड़ी अफवाहों के अध्ययन में रियूमर और प्रोपेगैंडा के अलावा मीडिया की भूमिका भी पड़ताल के क़ाबिल है, लेकिन मीडिया ने इसको लेकर कब और क्या छापा-दिखाया, वो इस लेख के केंद्र में नहीं है। अफ़वाहों में भीड़ या समुदाय की सुरक्षा और दूसरी अस्मिताओं के बरअक्स अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को वर्चस्वशाली तरीके से पेश करने की प्रवृत्ति उत्प्रेरक का काम करती हैं। फ़ेसबुक और ट्विटर पर फैलाई गई अफ़वाहों के चलते बेंगलुरू में पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ़ हुई हिंसा और नतीजतन बड़ी तादाद में उनके फौरी पलायन को इसकी नजीर माना जा सकता है। [16] विलियम जेम्स नेप्रिंसिपल ऑफ़ साइकोलॉजी में इस बात पर ज़ोर दिया है कि हिंसात्मक चेतना को अफ़वाहों के ज़रिए और ज़्यादा विस्तार दिया जा सकता है। उनके मुताबिक़ ऐसी चेतना से लैस लोगों के बीच अफ़वाहों का एक टुकड़ा गिरने के बाद अनवरत तौर पर अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है। यानी एक अफ़वाह अपने साथ पुछल्लों की तरह कई अफ़वाह समेटे आती हैं। [17] 

इस तरह समूह (या कहें भीड़) के ग़ुस्से को मज़बूती देने में अफ़वाहों की बड़ी भूमिका होती है। इस लेख की शुरुआत में ही मैकडोनल्ड का उदाहरण दिया गया। वो एक तरह से सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ के साथ जुड़ी अफ़वाह थीं, लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं जो सीधे-सीधे खान-पान के साथ नत्थी हैं। एक शोध में डेविड डुबॉयस ने प्रयोग किया। उन्होंने कई लोगों को जमा कर एक-दूसरे को एक बात कहने के लिए तैयार किया। बात ये थी कि अमुक रेस्तरां के हैमबर्गर में कीड़े का मांस मिलाया जाता है। लेकिन ये ख़बर पुष्ट नहीं है जब इस संदेश को कई लोगों ने एक-दूसरे तक पहुंचाया तो आख़िर में हालात ऐसे बने कि ये ख़बर पुष्ट नहीं है वाले हिस्से पर किसी का ध्यान नहीं रह गया और प्रयोग में शामिल कई लोग ख़ुद उस रेस्तरां में जाने से कतराने लगे। [18] संचार अध्ययन में ऐसे कई शोध हुए हैं कि जिनमें न्वाइज़ (यानी कही गई बात को पूरी तरह उसी अर्थ में नहीं समझना) को केंद्र में रखा गया है। अफ़वाह के मामले में इसका घनत्व और बढ़ जाता है। अफ़वाहों के रास्ते कई दफ़ा दूसरों के व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है और इसका दायरा ना सिर्फ़ असंगठित या छितराए हुए दायरे में होता है बल्कि दफ़्तर के भीतर भी अफ़वाह को इसका ज़रिया बनाया जाता है। [19] ऑफ़िस में किसी के व्यवहार को नियंत्रित करने में अफ़वाह का सहारा जब लिया जा सकता है तो ज़ाहिर है कि सामाजिक दायरे को तोड़ने वालों को नियंत्रित करने में इसका इस्तेमाल ज़्यादा आसान है।

भारत में बीफ़ को लेकर ऐसी ही अफ़वाहों को मान्य बनाने की कोशिश हुई है और इसे लगातार वांछित नतीजे की तलाश में उछाला गया है। बीफ़ जिनकी फूडहैबिट में शामिल हैं उनको बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय का वर्चस्वशाली हिस्सा द अदरके तौर पर देखते हुए नियंत्रित करने की कोशिश में रहता है। कई अध्ययन ऐसे हैं जिनमें पाया गया है कि बीफ़ के मुक़ाबले वे लोग मटन (बकरे का मांस) पसंद करते हैं जिनकी आमदनी में सुधार हुआ है। ये सिर्फ़ भारत के भीतर ही चलन नहीं है बल्कि दूसरे देशों में भी फूड हैबिट में ये ट्रेंड देखने को मिला है। बांग्लादेश और जापान जैसे दो अलग-अलग धार्मिक कंपोजिशन वाले देशों में भी मांस के चयन में क़ीमत के महत्व को महसूस किया गया है। [20] 

यानी जो मांस सस्ता है और वहां की औसत आमदनी और धार्मिक मान्यताओं के लिहाज से मुफ़ीद है वो उस समुदाय में ज़्यादा लोकप्रिय है, लेकिन आमदनी बढ़ने के साथ ही उसका रुझान भी बदलता है। भारत में बीफ़ निर्यात को लेकर बनी धारणाओं में अफ़वाहों का बड़ा योगदान है और इसकी विश्वसनीयता की  परख में मीडिया की चूक (या लापरवाही या अनदेखापन या सचेतन कोशिश) ने इस अफ़वाह की आंच को बढ़ाने में और योगदान दिया। अनुवाद की ग़लती महज अनुवाद तक सीमित ना रहकर पूरी सामजिक मान्यता, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक वर्चस्व तक खिंच गई और बीफ़ मतलब गाय भैंस दोनों का मांस होता है ये बात दबी रह गई। भारत में कारोबारियों ने इसके लिए सचेतन बफेलो मीट शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लेकिन बीफ़=गौमांस ने संचार और राजनीति दोनों में शोध के लिए कई ऐसे पहलू छोड़ दिया है जिनपर काम अब भी बाक़ी है।

(मूल रूप से मीडिया स्टडीज़ ग्रुप की पत्रिका जनमीडिया के जून अंक में प्रकाशित)

[*]Allport, G. W., & Postman, L. J. (1947). The psychology of rumor. New York: Holt, Rinehart & Winston. Rosnow, R. L. (2001). Rumor and gossip in interpersonal interaction and beyond: A social exchange perspective. In R. M. Kowalski (Ed.),
Behaving badly: Aversive behaviors in interpersonal relationship

[1] From Rumors to Facts, and Facts to Rumors: The Role of Certainty Decay in Consumer Communications
- DAVID DUBOIS, DEREK D. RUCKER, and ZAKARY L. TORMALA?

[2]. David Dubois, Rumors: How they spread and how to combat them [web link- http://www.hec.edu/Knowledge/Marketing/Consumer-Behavior/Rumors-How-They-Spread-and-How-to-Combat-Them]

[3] DiFonzo, N., & Bordia, P. (2007a). Rumor psychology: Social and organizational
approaches. Washington, DC: American Psychological Association.
Page-16
[4] Shibutani, T. (1966). Improvised news: A sociological study of rumor. Indianapolis,
IN: Bobbs-Merrill.
[5] Jo winterbottom and Meenakshi Sharma, In the land of the holy Cow, fury over beef export, Reuters    [Web link- http://in.reuters.com/article/2013/12/12/india-beef-idINDEE9BB00O20131212, Last accessed – 18-05-2015]

[6] https://www.youtube.com/watch?v=1ElnjqtBbuc Last accessed – 18-05-2015
[7] Full text of speech by RSS sarsanghchalak Mohan Bhagwat on Vijaya Dashmi- 2014, Nagpur [Web link- http://samvada.org/2014/news/full-text-of-speech-by-rss-sarasanghchalak-mohan-bhagwat-on-vijaya-dashmi-2014-nagpur/ Last accessed – 18-05-2015]
[8] Dilip Khan, Special report on Meat industry in india, RSTV [web link- https://www.youtube.com/watch?v=6n6WTwOsG-A , Last accessed – 18-05-2015 ]

[10] Shibutani, T. (1966). Improvised news: A sociological study of rumor. Indianapolis,
IN: Bobbs-Merrill.
[11] LE BoN, G. "Psychologie des. Foules " (English translation " The Crowd," Lond.,
1896).
[12] Russia allows buffalo meat imports from india, December 4, 2014 [Web link- http://thebricspost.com/russia-allows-buffalo-meat-imports-from-india/#.VVmjOflViko , Last accessed – 18-05-2015]
PK Krishnakumar, ET Bureau , India’s beef exports rise 31% in 2013-14, Economic times [http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-06-25/news/50856076_1_buffalo-meat-beef-exports-meat-export , Last accessed – 18-05-2015]

[13] Agricultural and processed food products export development authority, ministry of commerce and industry, government of india [web link- http://apeda.gov.in/apedawebsite/MEAT_MANUAL/Chap2/Chap2.pdf, Last accessed – 18-05-2015
[14] सवर्ण हिंदू शब्द पर ज़ोर इसलिए है क्योंकि हिंदुओं में दलित समुदाय की कई जातियों में आज भी गौमांस खाने का चलन है।
[15] Dilip Khan, Special report on Meat industry in india, RSTV [web link- https://www.youtube.com/watch?v=6n6WTwOsG-A , Last accessed – 18-05-2015 ]
[16] After rumours, northeast people flee Bangalore, The hindu [web link- http://www.thehindu.com/news/national/karnataka/after-rumours-northeast-people-flee-bangalore/article3776549.ece  Last accessed – 18-05-2015 ]

[17] JAMES, WILLIAM. " The Principles of Psychology," 1890, i, p. 292, and ii, p. 412.
[18] DAVID DUBOIS
[19] Rumor as Revenge in the Workplace Prashant Bordia1, Kohyar Kiazad2, Simon Lloyd D. Restubog1, Nicholas DiFonzo3, Nicholas Stenson4, and Robert L. Tang5
[20] Koizumi, S., S. Kobayashi, S. Takaku and M. Nishino 2000. "Study on consumer behaviorf or meat consumptionin Japan".A nimal sciencejo urnal. Vol. 71' No. 6.
Md. Salauddin Palashl S. A. Saburr, CONSUMPTION LEVEL AND CONSUMER BEHAVIOUR OF MEAT IN DHAKA CITY