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04 फ़रवरी 2013

विश्वरूपम बवालिया नहीं सवालिया फ़िल्म है


-दिलीप खान
आतंकवाद के मसले पर जिस ट्रीटमेंट के साथ देश में फ़िल्में बनती रही हैं, विश्वरूपम उससे अलग नहीं है। हमें एक अदद अभिनेता की दरकार होती है जो पहले दूसरे रूप धड़कर अपनी मासूमियत से लोगों को मोहे और फिर अचानक फुर्तीले, गठीले और बहादुर बनते हुए हमें अपनी ग़लती का एहसास वो हॉल में ताली बजवाकर करवाएं। किसी देश के इंटेलिजेंस अधिकारी के किरदार को फ़िल्मों ने ज़्यादातर इसी रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसी फ़िल्मों को देखते हुए दर्शकों की जो कुल भावना विकसित होती है उसकी दिशा अभिनेता के मायावी होने की ओर केंद्रित रहती है, राजनीतिक विषयों पर ध्यान नहीं जाता। मार-धाड़-एक्शन से भरपूर थ्रिलर फ़िल्मों में तो दर्शक चकित-चौकन्ने होकर अभिनेता के करतब देखता है। मसलन उनका अभिनेता कठिनतम क्षणों में भी हार नहीं मानेगा, वो 50-60 लोगों को कभी भी चित्त कर सकता है और ख़ासकर अगर फ़िल्मों में दक्षिण भारतीय टच ज़रा-सी भी रह जाए तो हीरो का फ़ौलाद में तब्दील होना लाजिमी है। 
विश्वरुपम फ़िल्म का एक दृश्य
बॉलीवुड में ये गौरव सन्नी देओल और उनके पिताश्री धर्मेंद्र सहित बहुत कम लोगों को हासिल है। कमल हासन इस फ़िल्म के भीतर रॉ के अधिकारी हैं और हिंदी के अलावा मूल रूप से फ़िल्म तमिल में बनाई गई है तो ऊपर के सारे गुणों को अपने भीतर समेटे पर्दे पर वो नमूदार होते हैं। स्त्रैण व्यवहार के साथ कृष्ण और गोपी वाले गाने में नाचते हुए वो जब पहली बार फ़िल्म में दिखते हैं तो तालियां बजती हैं। डॉ निरुपमा (पूजा कुमार) का ऑफ़िस में अफ़ेयर है और उसको शक रहता है कि उनके पति विश्वनाथ (कमल हासन) की ज़िंदगी भी बिना किसी अफ़ेयर के नहीं चलती होगी, चाहे वो औरत के साथ हो या फिर किसी मर्द के साथ।  

तो, सबकुछ पारिवारिक नोंक-झोंक व शक-सुबहा के इर्द-गिर्द चलता रहता है और इसी क्रम में पत्नी एक प्राइवेट जासूस कमल हासन के पीछे लगा देती है। होता कुछ ख़ास नहीं है बुद्धू से दिखने वाले विश्वनाथ को पता चल जाता है कि पत्नी ने उसके पीछे जासूस छोड़ रखा है जो खोजी कुत्ते की तरह उसके पीछे चिपका हुआ है। शेखर कपूर की सलाह पर कमल हासन उससे पीछा छुड़ाने के लिए तेज दौड़ लगाता है और एक दीवार की ओट से चकमा देकर उसी दिशा में वापस भाग लेता है। अब एक नौसिखिए की तरह वो जासूस सामने की इमारत में ताक-झांक करता है और फिर जो कुछ होता है, फ़िल्म की असल शुरुआत भी वहीं से होती है। इमारत से निकलने वाला आदमी जासूस के सर पर ज़ोर से लोहे का सरिया दे मारता है और बाद में पड़े कुछ और चोटों से उसकी मौत हो जाती है। असल में वो इमारत उमर (राहुल बोस) की प्रयोगशालानुमा जगह है जहां आतंकी गतिविधियों को उनके शागिर्द अंजाम देने का हुनर सीखते हैं। 

अब यहां से घटनाओं की कड़ियां जुड़ती चली जाती हैं। जासूस की डायरी से क्लाइंट का नाम पता हासिल करने के बाद अंतत: पत्नी के बॉस-कम-प्रेमी दीपक के रास्ते विश्वनाथ  और डॉ निरुपमा आतंकियों के कब्जे में आते हैं। और यहीं पर निरुपमा के साथ-साथ दर्शकों को पहली बार पता चलता है कि कमल हासन असल में है कुछ और ही बला। वो सिर्फ़ घूंघरू बांध के नाचता नहीं है बल्कि दर्ज़नों लोगों को अकेले मारकर बिल्कुल हीरो की माफिक पिछले दरवाज़े से पत्नी के साथ भाग लेता है। उमर (राहुल बोस) कमल हासन को पहचानता है और यही पहचान दिखाने के लिए फ़िल्म फ्लैशबैक में चली जाती है। फिर अमेरिका से निकलकर फ़िल्म सीधे अफ़गानिस्तान में आ गिरती है। फ़िल्म में भारत कहीं नहीं है। है तो सिर्फ़ अमेरिका और अफ़गानिस्तान। ज़िक्र में भारत भी है, पाकिस्तान भी, नाइजीरिया भी और कुछ और देश भी। भारतीय ज़मीन पर तो विश्वरूपम-2 उतरेगी जिसकी मुनादी फ़िल्म के बिल्कुल आखिर में की जाती है। ख़त्म होने के बाद। तो, रहस्योद्घाटन ये होता है कि कमल हासन ने उमर (राहुल बोस) के साथ अल-क़ायदा में साथ-साथ काम किया है।  
कश्मीर के मुजाहिद के तौर पर कमल हासन का नया परिचय हमें मालूम होता है और नया नाम भी- विसाव अहमद कश्मीरी। ये भी पता चलता है कि उसके पिताजी उससे भी बड़े मुजाहिद थे। विसाव अहमद कश्मीरी (हासन) के नाम पर 5 लाख रुपए (शायद रुपए ही) का ईनाम भारत सरकार ने घोषित कर रखा है ये पोस्टर पूरी फ़िल्म में दो-तीन बार स्क्रीन पर चमकता है। और कहानी यही कहती है कि ईनामी आतंकवादी होने की वजह से भारत छोड़कर वो अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के साथ जुड़कर कुछ अलग करना चाहता है। राहुल बोस अल-क़ायदा से जुड़ा है। हासन उसके पास पहुंचता है और पहली मुलाक़ात में ही ये साबित करता है कि वो न सिर्फ़ शानदार लड़ाका है बल्कि लोगों को जानने-पहचानने का भी उसमें बेहद बारीक हुनर है। अल-क़ायदा के लड़ाकों को प्रशिक्षित करने के क्रम में ही वो उमर यानी राहुल बोस के काफ़ी करीब हो जाता है। वो उमर से अमेरिकी बंधकों का ठिकाना जानना चाहता है, अल-क़ायदा के लड़ने के तरीके जानना चाहता है और ये भी जानना चाहता है कि अफ़गानी उमर को हिंदी बोलना कैसे आता है? इस दौरान छोटी-छोटी घटनाओं के आइने से ये दिखाया गया कि हासन के भीतर बर्बरता का एलिमेंट मुजाहिद बनने के हिसाब से कम है। 
अल-क़ायदा के मुजाहिद उमर की भूमिका में राहुल बोस

बहरहाल, मैं यहां पूरी कहानी लिखने की बजाय फ़िल्म से निकल रहे संदेश पर बात करना पसंद करूंगा। फ़्लैशबैक से तीन-चार इस्तेमाल से अलग-अलग सेगमेंट में बंटे विश्वरूपम में दर्शकों के सामने खुलासा होता है कि कमल हासन न तो सामान्य गृहस्थ है और न ही आतंकवादियों के गुट का कोई लड़ाका, बल्कि वो भारतीय खुफ़िया एजेंसी का कोई अधिकारी है। एक जांबाज अधिकारी! और अल-क़ायदा के भीतर सेंधमारी कर वो उसे भीतर से नष्ट करने की तैयारी में था। उसी क्रम में जब हासन सा’ब उमर से सवाल पूछते हैं कि उसने हिंदी कहा सीखी, तो जवाब मिलता है- अयोध्या, मुंबई, कश्मीर और मालेगांव के दौरे से। फ़िल्म को विशुद्ध मनोरंजन मानने वाले लोगों को ऐसे डॉयलॉग से कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन जब फ़िल्मों में किसी वास्तविक जगह और घटनाओं का ज़िक्र होता है तो उसे पेश करने में राजनीतिक ईमानदारी बरतनी चाहिए। उमर के जवाब से ये ध्वनित होता है कि इन जगहों पर अल-क़ायदा ने आतंकी वारदातों को अंजाम दिया और उसी मिशन को पूरा करने के लिए वो गलियों की खाक छानते रहे और हिंदी सीख ली। यानी अयोध्या में जब-कभी (याद है न कब?) जो-कुछ हुआ उसके लिए अल-क़ायदा और मुस्लिम ज़िम्मेदार है और मालेगांव में भी। विश्वरूपम के रिलीज होने से महीनों पहले कोर्ट का (जिस पर लोग यक़ीन करते हैं) फ़ैसला आ गया कि मालेगांव धमाके में पकड़े गए 9 मुस्लिम निर्दोष हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एंड कंपनी ने उस धमाके में संलिप्तता पर अपनी सहमति जाहिर की है। फ़िल्म में कई जगह ऐसी चालाकियां बरती गई हैं।

फ़िल्म साल 2011 आस-पास चलती है, जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और अफ़गानिस्तान पर हमले को जायज ठहराने वाला सबसे बड़ा प्रमाणपत्र ओसामा-बिन-लादेन मारा जाता है। फ़िल्म के शुरुआती कुछ दृश्यों में ओबामा को टीवी पर भाषण देते दिखाया जाता है और विश्वरूपम इसी से काल को भी स्थापित करता है। फ़िल्म के भीतर ये दिखाया गया है कि दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी एक-दूसरे से गहरे नेटवर्क के साथ जुड़े हैं और अफ़गानिस्तान में लगभग हर घर में बम-बारूद-बंदूक का जखीरा है और लोग धर्म के नाम पर ही मर-मिटने को तैयार हैं। वे बंदूक चलाते हैं धर्म के नाम पर, हत्या करते हैं धर्म के नाम पर और धर्म के नाम पर खुद को उड़ा लेना चाहते हैं। सबकुछ धर्म तय कर रहा है। 9/11 कब का बीत चुका है और लादेन को ढूंढने के लिए अमेरिका और नाटो ने अफ़गानिस्तान को गर्द में तब्दील कर दिया है। लेकिन नहीं, वे सिर्फ़ लादेन को ही नहीं ढूंढ रहे हैं बल्कि अपने बंधक सैनिकों को बचाने के लिए वो बम फोड़ते हैं। नाटो की ज़्यादातर कोशिश ‘निर्दोषों’ को गुफा से बाहर निकालकर दुनिया की रोशनी दिखाने की है। और, भारत उसका सक्रिय सहयोगी है। अफ़गानिस्तान का मिशन नाटो ने भारतीय मदद से जारी रखी है। 

फ़िल्म ये भी दिखाती है कि अफ़गानिस्तान में अभी नाटो के रहने की कितनी ज़रूरत है! [अब ये तथ्य दिमाग में मत लाइए कि 2014 तक सैन्य वापसी की बात अमेरिका सहित नाटो कर रहे हैं क्योंकि फ़िल्म ने शुरुआत में ही घोषणा कर दी है कि वो काल्पनिकता की डोर थामे हैं। ये भी दिमाग़ में मत लाइए कि हॉलीवुड की कई फ़िल्में सिर्फ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद को लोकप्रिय संस्कृति के जरिए वैधता देने के लिए बनाई गईं।] फ़िल्म की माने तो ये वापसी वैश्विक शांति के लिए ग़लत साबित होगी। संक्षेप में कहें तो विश्वरूपम ‘वॉर ऑन टेरर’ की अमेरिकी मुहिम को जायज ठहराने के लिए मनोरंजक तरीके से जनमत निर्माण करती है। 

राहुल बोस एक अच्छे अभिनेता हैं इस स्थापना को इस फ़िल्म के मार्फ़त कुछ और अंक हासिल कर उन्होंने मज़बूत किया है। डॉ. निरुपमा की भूमिका में पूजा कुमार को देखकर बरबस चक्रव्यूह फ़िल्म की रिया मेनन (एशा गुप्ता) याद आएगी जिन्हें पता ही नहीं कि भोलेपन को भी किस भोलेपन के साथ निभाना होता है। शेखर कपूर और कमल हासन बड़े नाम हैं और एक्टिंग के जरिए उन्होंने निराश भी नहीं किया। फ़िल्म में ख़र्चा हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बुढ़ाते कमल हासन को स्टंट कराते दिखाने में ही काफ़ी मेहनत और धन जेब से निकल गया होगा। एडिटिंग बहुत अच्छी नहीं है, दो-तीन जगह तो जर्क साफ़-साफ़ पता चल रहा था और हिंदी का जो प्रिंट हमने देखा वो शायद बिना कट के रिलीज हुई फ़िल्म थी, तो वास्तविक एडिटिंग में ही कोई गड़बड़ी है। 

ये फ़िल्म मिक्स फ्रूट चाट है। इसमें दबंग भी है, ए वेडनसडे भी, रोजा भी और द हीरो भी। रिलीज होने पर बवाल उन लोगों ने काटा होगा जिन्हें इससे पहले की फ़िल्मों के बारे में कोई जानकारी नहीं रही होगी। जो भारतीय फ़िल्म परंपरा से परिचित हैं वो काहे को बवाल काटे भई! नमाज अता कर बम फोड़ना है, फोड़ो। फ़िल्म देखने आप जाएंगे तो पाएंगे कि रॉ के अधिकारी विश्वनाथ (कमल हासन) इतने जांबाज हैं कि समूची एफ़बीआई को अकेले हैंडल करते हैं, अपने इशारों पर नचाते हैं और पूरी फ़िल्म में हैरान-परेशान रहने वाली अपनी पीएच.डी पत्नी के साथ मिलकर अमेरिका को नाभिकीय बम (सिसमिक बम) के प्रकोप से बचा डालते हैं। जाहिर है इतने बहादुर प्रोटैगोनिस्ट अगर निर्माता-निर्देशक और कहानीकार की जेब में हो तो फ़िल्म का सीक्वल ज़रूरी है। तो, अमेरिका को बचाने की अपार सफ़लता के बाद अगली फ़िल्म में विश्वरूपम साहब भारत में होंगे और भारत को बचाएंगे। इंतज़ार कीजिए विश्वरूपम-2 का दबंग-2, रेस-2, जिस्म-3 के माफ़िक। 

04 मई 2012

ए प्रजेंटेशन विदाउट हेडिंग.


एक सेमिनार में पढ़े गए प्रपत्र का अंश.
 चन्द्रिका
रात के बारह बजे आप किसी महिला को एक पहाड़ी से दूसरी पहड़ी पर बेखौफ जाते हुए देख सकते हैं, दिल्ली में ८ बजे के बाद महिलाएं बसों में चढ़ते हुए डरती हैं. अरूंधती रॉय.
 यह दण्डकारण्य है, माओवादियों की जनताना सरकार. मनमोहन सिंह के लिये देश का सबसे बड़ा खतरा और एक महिला के लिये खतरे की सबसे बेखौफ जगह. मैं रुकमिणी, रूपा, हेमा अक्का, सरोज, नर्मदा जैसी महिलाओं के विस्थापन से अपनी बात शुरु करना चाहूंगा. मैं चाहूंगा कि जो नाम मुझसे छूट गये हैं उन्हें जोड़ लिया जाए. जबकि यहाँ मैं अपनी प्रस्तुति दे रहा हूं, शायद वे अपना नाम बदल रही होंगी, शायद उन्हें पकड़ लिया गया हो, शायद वे किसी मुठभेड़ में मारी गयी हों. या बगैर मुठभेड़ के मुठभेड़ में मारी गयी हों. या शायद............... कल भी यह शायद शायद ही बना रहेगा, हर बार की तरह. क्योंकि उनके मौत की खबरें अखबारों तक नहीं आयेंगी, कोई टीवी. उनकी तस्वीरें नहीं दिखायेगा.
क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, (के.ए.एम.एस.) आज देश का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत महिला संगठन. जिनके कंधों पर बंदूकें हैं, और जेहेन में वर्तमान संरचना का खारिजनामा. उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में बस वह जमीन चाहिए जहाँ उनकी पीढ़ीयां ६०० ईसा पूर्व से रहती आयी हैं. जिसे अब टाटा एस्सार और जिंदल को दिया जा रहा है. ६०० इसापूर्व से लेकर १३२४ तक दण्डकारण्य में गणतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी. यह आदिवासियों की अपने लिये अपनी संस्कृति के अनुरूप बनाई गयी प्रणाली थी. जिसके बाद यहां राजतंत्र का प्रभाव रहा पर वह प्रभाव ज्यादातर इस रूप में रहा कि दण्डकारण्य के जंगलों से राजाओं को हाथियों की जरूरत होती थी और इन जंगलों से वे इसकी पूर्ति करते थे. आदिवासी समाज में राजशाही गैर-आदिवासी समाजों जैसी कभी नहीं रही बल्कि यह संक्रमण था कि राजशाही जैसी व्यवस्थाएं आदिवासी समाजों में पहुंची. बावजूद इसके राजा की सेना वहां की पूरी जनता होती थी और राजा बाहरी संबंध बनाने का एक माध्यम. यह १९६५ तक (राजा भंजदेव) दंडकारण्य के इलाके में होता आया. आदिवासियों के समाज में बाहरी शासकों ने कोई सांस्कृतिक हस्तक्षेप नहीं किया. अंग्रेजी शासन काल में जब भी दण्डकारण्य में दखल का प्रयास किया गया, आदिवासियों ने उसका विरोध किया, जब मैं आदिवासियों कह रहा हूं तो इसमे महिला-पुरुष दोनों जुड़े हुए हैं और १७७४–१९१० तक १० विद्रोह हुए. १९१० महान भूमकाल के नाम से जाना जाता है.  
१९१० ई. के भूमकाल के पश्चात दण्डकारण्य के आदिवासियों के मन घायल थे और अब ये हिंसा के बजाय अहिंसा के मार्ग से जुड़ने लगे. ऐसी स्थिति में ताना भगत के आंदोलन ने इन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया था. ओरावों के भगत-सम्प्रदाय में सबसे प्रसिद्ध तानाभगत सम्प्रदाय रहा है. यह जबरा भगत के द्वारा १९१४ ई. में गुमगा जिले (बिहार) में प्रवर्त्तित किया गया था. इसने शौच, मितव्यवहार, तथा शराबबंदी के मुहाबरे को विकसित किया. कालांतर में कांग्रेस आंदोलन के प्रभाव से तानाभगतों का झुकाव स्वराज्य की ओर हुआ. जिससे  ऐसा लगा कि दण्डकारण्य में गाँधीराज आ गया है और वन भूमि उनकी अपनी पैतृक सम्पत्ति बन गयी. असहयोग आंदोलन के दौरान इन आदिवासियों ने जेल की यंत्रणायें सहीं. ये भारी तादात में कांग्रेस के अधिवेशनों में शामिल होने लगे. इन्होंने चरखा तथा तिरंगे का संदेश गाँव-गाँव तक फैलाया. इन्हें लगा कि जैसे ही आज़ादी मिलेगी, उन्हें अपनी जमीन का मालिकाना हक वापस मिल जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ.
वर्तमान में चल रहा माओवादी आंदोलन, व माओवादियों के नेतृत्व में आदिवासियों का यह आंदोलन, जो भारतीय लोकतंत्र की संरचना, जिसे उनके ऊपर थोपा जा रहा है वह आदिवासी इतिहास में किसी भी विद्रोह से ज्यादा लंबा और बृहद फैलाव के साथ मौजूद है. जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है.
अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण १९४७ के बाद ६० के दशक में राजा भंजदेव के नेतृत्व में फिर से विद्रोह प्रारम्भ हुए. बीच का समय भारतीय राज्य को आदिवासियों द्वारा दी गयी मोहलत के तौर पर देखा जा सकता है. भंजदेव के नेतृत्व में चले इस विद्रोह में. सितम्बर १९६३ को दो पुलिस के सिपाही हिड़मा (एक आदिवासी योद्धा जो राजा प्रवीर के नेतृत्व में चल रही मुक्ति की लड़ाई को लड़ रहा था) को गिरफ्तार करने के लिये भेजरीपदर गये. हिड़मा पर आरोप था कि उसने ६ मई से ११ मई के बीच राजमहल में विद्रोह को उकसाया था. भेजरी पदर जाने वाले दोनों पुलिस कर्मियों का गाँव वालों ने सिर काट डाला. भेजरीपदर से संलग्न जंगल में उनके मृत शरीर को फेंक दिया. उन दोनों के सिर कुछ दूर पर पंडरीपानी गाँव के शिलाखण्डों में दबे हुए मिले. दूसरे दिन हिड़मा और उसके साथी राजमहल में थे तथा यह अफवाह फैला रहे थे कि सिर ट्राफी के रूप में जगदलपुर लाये जा रहे हैं. दण्डकारण्य में हुए इस गोली कांड में बड़ी तादात में महिलाएं और बच्चे भी मारे गये थे.
अस्वीकृति के इस लम्बे इतिहास पर पूर्ववर्ती शासन ने कभी ध्यान नहीं दिया और आदिवासी विद्रोह को शांत करने के लिये बार-बार बंदूक का सहारा लिया. दण्डकारण्य को सभ्य बनाने के चक्कर में पारम्परिक मूल्य जिस प्रकार बार-बार विखण्डित हुए, उससे भ्रांत तथा निराश आदिवासियों ने अपनी अस्वीकृति को नक्सलियों के विद्रोही तथा उन्मूलनवादी तरीकों में ढाल लिया और अब इतिहास में पहली बार वे अपनी अस्वीकृति को संवैधानिक तरीकों से हटकर व्यक्त कर रहे हैं. दण्डकारण्य में सी.पी.आई. (एम.एल.) के “पीपुल्स वार ग्रुप’ द्वारा नक्सली गतिविधियाँ १९७० में परिलक्षित हुई तथा १९७४ से ये गतिविधियाँ धीरे-धीरे राज्य दमन के कारण प्रतिहिंसात्मक होती गयीं.
यह समय की जरूरत थी और आदिवासी महिलाएं माओवादियों के नेतृत्व में बने संगठन के. ए. एम. एस. , व ग्राम रक्षा कमेटी व अन्य सांस्कृतिक और सशस्त्र संगठनों के साथ जुड़ने लगी. १९९७ में तेंदूपत्ता को लेकर सुकुमा में हुए आंदोलन में ८००० आदिवासी महिलाओं ने भाग लिया. बाद के दिनों में यह संख्या और बढ़ती गयी और तीन वर्ष पश्चात दक्षिणी दण्डकारण्य में हुई बौठकों में २०,००० महिलाओं ने भाग लिया. एक तरफ ये भारतीय राज्य से लड़ रही थी तो दूसरी तरफ आदिवासी समाज में विद्यमान पित्रसत्ता के लिये आंदोलन के अंदर एक संघर्ष चल रहा था. जिसके मुद्दे थे एक पुरुष की दो पत्नियां न होना, शराब बंदी,  इसके अलावा अन्य कई मुद्दों को उन्होंने शामिल किया जो समय और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक बदलते रहे. समान भागीदारी और समानता के प्रश्न को आदिवासियों में के.ए.एम.एस. ने उठाया. यह वर्ग संघर्ष के अंदर पितृसत्ता की लड़ाई थी. पित्रसत्त एक सांस्कृतिक फेनामिना है इसलिये यह लड़ाई निश्चित तौर पर पुरुषवादी मानसिकता को बदलने के लिये सांस्कृतिक आधार पर ही लड़ी जा सकती है जो मनोदशा को परिवर्तित करने में सक्षम हो पाती है. लिहाजा दण्डकारण्य में सांस्कतिक संगठनों द्वारा इसे लड़ा गया और लड़ा जा रहा है. यदि इसके बरक्स आप भारतीय राज्य को देखें तो उसके द्वारा सांस्कृतिक तौर पर कोई सक्रिय प्रयास अब तक पित्रसत्ता, जाति धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं के लिये नहीं किया गया.
१९९९ तक दण्डकारण्य में माओवादी संगठनों में महिलाओं का प्रतिशत ४५ था. यह सलवा-जुडुम के कुछ साल पहले की बात है. सलवा-जुडुम से आप सब लोग परिचित होंगे अगर परिचित नहीं हैं तो परिचित होना चाहिये था. सलवा-जुडुम को लेकर आयी तमाम रिपोर्टों और फैक्ट-फाइंडिंग्स के अलग अलग आंकड़े हैं. तकरीबन ६०० गाँवों का विस्थापन या बेघर होना. इन बेघर लोगों में पुरुषों के साथ एक विकल्प था कि वे किसी शहर जा कर रोजगार कर सकते थे और उनमे से कुछ ने यह किया भी आप रायपुर के नजदीक सिलतरा में उन्हें पा सकते हैं. पर महिलाओं के साथ स्थितियां भिन्न थी उनके पास विकल्प बचा था माओवादियों के साथ जुड़ना और अपने गाँवों को वापस पाने के लिये लड़ना. हिमांशु कुमार दांतेवाड़ा की यदि माने तो सलवा-जुडुम ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को सश्स्त्र होने को मजबूर किया. आज इसका कोई ठीक आंकड़ा मौजूद नहीं है कि कितनी महिलाएं माओवादी सशस्त्र हैं पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य दमन की प्रक्रियाओं ने उनके सशस्त्र होने के प्रतिशत में बृद्धि कर दी है.

14 मार्च 2012

काज़मी केस: आतंकवाद का नया फॉर्मूला


-दिलीप खान

बीते एक दशक से आतंकवाद को लेकर खुफ़िया एजेंसियों के बीच दुनिया भर में तमाम प्रयोग हो रहे हैं। भारत में इस आधार पर 9/11 के बाद के समय को तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहले भाग में वह दौर है जब किसी भी बम विस्फ़ोट के बाद पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इसमें सब कुछ पाकिस्तानी इशारों पर देश में घटित होता है। पाकिस्तान से आतंकवादी आते हैं, बम फोड़कर चले जाते हैं या फिर पुलिस की गिरफ़्त में आ जाते हैं। जिन मामलों में कोई सबूत नहीं मिलते उसमें मीडिया पाकिस्तान की ओर उंगली उठाना शुरू कर देता है और पुलिस और ख़ुफिया महकमों में मीडिया ख़बरों के आधार पर पाकिस्तान पर दोष मढा जाता है। फिर पुलिस के हवाले से आई ख़बर को मीडिया प्रमाणिकता के साथ लोगों के बीच पेश करता है।

26/11 के बाद यह दौर सुस्त पड़ गया, लेकिन अब भी पाकिस्तान निशाने में नंबर वन है। दूसरा दौर 2008 के आस-पास शुरू होता है और इसमें विदेश से आए आतंकवादी की जगह ‘होम ग्रोन टेररिस्ट’ ले लेते हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का एक ख़ौफ़नाक आतंकी संगठन ज़्यादातर बम विस्फोट को अंजाम देता है। जयपुर धमाके में पहली बार इस संगठन का नाम आता है। इस संगठन के साथ-साथ ही एक और संगठन अस्तित्व में आता है-हूजी। जयपुर और बंगलौर धमाके में इन दोनों के नाम लिए जाते हैं। कभी आईएम तो कभी हूजी। लेकिन बीते 9 (और उससे पहले के 3 यानी सभी) मामलों में हूजी को लेकर एक भी सबूत खुफिया एजेंसियां इकट्ठा नहीं कर पाई है। हूजी के अड्डे को लेकर खुफ़िया एजेंसी भी अभी तक साफ़ नहीं है कि इसका मुख्यालय कराची में है या ढाका में, लेकिन ये ज़रूर स्थापित किया जा रहा है कि आईएम और हूजी देश में आतंकवाद का जखीरा तैयार कर रहा है। बड़े पैमाने पर इन संगठनों के नाम पर देश में गिरफ़्तारियां हुईं। मालेगांव से लेकर मक्का मस्जिद तक, हर मामले में मुसलमानों को पकड़ा जाता है। (बाद में 2006 के मालेगांव मामले में 5 साल से ज़्यादा जेल काटने के बाद 7 लोगों को रिहा किया जाता है। उधर आंध्र प्रदेश सरकार अपनी ग़लती सुधारने के लिए चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर लोगों को रिहा करती है और हर्जाना भी भरती है।)

मालेगांव विस्फोट मामले में फ़र्ज़ी गिरफ़्तारी के 5 साल बाद निर्दोष
करार दिए गए अभियुक्त

इसी दौर में एक नया खुलासा होता है। समझौता एक्सप्रेस में पाकिस्तानी हाथ होने का हल्ला मचाने वाला मीडिया और ख़ुफ़िया बाद में उससे मुकरते हैं और असीमानंद एंड कंपनी अपना जुर्म कबूल कर जेल जाती है। आंतरिक आतंकवाद का मामला बड़े स्तर पर हमारे बीच उपस्थित होता है। असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा जैसे उदाहरणों के बावजूद आतंकवादी के रूप में मोटे तौर पर मुस्लिमों को ही हमारे बीच पेश किया जाता है। ख़ुफ़िया एजेंसी आंतरिक आतंकवाद को इस समय विदेशी आतंकवाद से ज़्यादा बड़ा ख़तरा करार दे रहे हैं। ये दोनों दौर एक-दूसरे को ओवरलैप करते हुए चलते हैं लेकिन ट्रेंड में आ रहे अंतर को साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है।

लेकिन आतंकवाद के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर दुनिया में बहुचर्चित ओसामा-बिन-लादेन की प्रचारित हत्या के बाद देश में नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। अब आंतरिक आतंकवाद, पाकिस्तानी-बांग्लादेशी आतंकवाद के साथ-साथ भारतीय आतंकवाद के नेटवर्क को ‘वैश्विक इस्लामी आतंकवाद’ के साथ जोड़ने की कोशिश चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट बम विस्फोट में पहले हूजी और फिर आईएम का नाम आया और अब हिज़बुल मुजाहिद्दीन का नाम बताया जा रहा है। लेकिन शुरुआती दौर में दो स्कैच जारी करने के बाद इसकी जांच प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं देखी गई। स्कैच को लेकर भी एनआईए ने बाद में आपत्ति जाहिर की थी कि वो स्कैच ठीक नहीं है और नए खेप में स्कैच बनाने के लिए मुंबई से टीम बुलाई गई थी। हमेशा की तरह एनआईए सहित बाकी जांच एजेंसियों ने अब तक कोई ठोस सबूत हासिल नहीं किए हैं, लेकिन अपनी जांच-पड़ताल के समय ही खुफ़िया विभाग ने ये बारीक इशारा ज़रूर कर दिया था कि अब देश में आतंकवाद के नेटवर्क को कहां से जोड़ा जाएगा! हाई कोर्ट बम विस्फ़ोट में सबसे ज़्यादा एनआईए और मीडिया ने जिस बात पर ज़ोर दिया वो था विस्फोटक के तौर पर पीईटीएन का इस्तेमाल। पीईटीएन को अलक़ायदा के ट्रेड-मार्क के तौर पर सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफ़िया सहित पुलिस विभाग ने लोगों के बीच पेश किया। इस घटना के बाद भारत में आतंकवाद को पहली बार अलक़ायदा से सीधे-सीधे जोड़ा गया और इस तरह दुनिया में जिस आतंक के ख़िलाफ़ ‘वार ऑन टेरर’ छेड़ा गया है भारत के साथ उसका सिरा जुड़ जाता है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों में अलकायदा का जो भूत नाच रहा है वो अब भारत पर भी नाचने लगा। इस तरह इन देशों के बीच कुछ साझापन-सा बन गया है। इसके बाद दिल्ली में इज़रायली दूतावास के सामने कार में विस्फोट होता है। दिल्ली पुलिस की घोषणा से पहले ही इज़रायल ये घोषणा करता है कि इसमें ईरान का हाथ है। रॉयटर्स से ईरान को लेकर ख़बरें चलने लगती हैं। इसके ठीक एक दिन बाद बैंकॉक में तीन विस्फोट होते हैं। फिर ईरान का हाथ बताया जाता है। इज़रायल-ईरान के रिश्तों पर मैं यहां सिर्फ़ एक वाक्य में चर्चा करूंगा कि नाभिकीय बम के बहाने ईरान पर अमेरिका और इज़रायल उसी तरह आक्रमण करने के फिराक में है जिस तरह जैविक हथियार के बहाने इराक पर किया था। दिल्ली पुलिस ये बताती है कि कोई मोटरसाईकिल सवार कार से बम चिपकाकर भाग गया। फिर लाडो सराय से एक लाल बाईक पकड़ी जाती है। बाद में पुलिस कहती है कि वो ग़लत बाईक पकड़ ली थी।  
पत्रकार काज़मी की गिरफ़्तारी खुफिया विभाग के नए और ज़्यादा
ख़तरनाक फॉर्मूले की तरफ़ इशारा कर रहा है।

इसके बाद ख़बर आती है कि सीसीटीवी में किसी भी बाईक सवार को नहीं देखा गया। बाईक फॉर्मूले को पुलिस छोड़ देती है और फिर अचानक काज़मी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस ये तर्क देती है कि काज़मी के घर से लावारिस स्कूटी बरामद हुई है। बाईक फॉर्मूले को पुलिस फिर से जीवित करती है जो सीसीटीवी वाली बात के मुताबिक झूठी है। जिन आरोपों के आधार पर काज़मी को पकड़ा गया उसकी चर्चा इससे पहले वाली रिपोर्ट में की जा चुकी है।

अब सवाल है कि काज़मी को गिरफ़्तार करने के पीछे क्या हित हो सकते हैं? असल में भारत इस समय सबसे ज़्यादा तेल ईरान से खरीद रहा है, जाहिर है ईरान के साथ भारत के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं इसलिए इस बम विस्फ़ोट को लेकर इज़रायली बयान के बाद गृह मंत्रालय ने ये सफ़ाई दी थी कि उसे ईरान के हाथ होने के सबूत नहीं मिले हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर भारत ईरान के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। लेकिन भारत इज़रायल से सबसे ज़्यादा हथियार खरीदता है और अमेरिका के साथ अपने संबंध को हमेशा मधुर देखना चाहता है। जाहिर है दूसरे पक्ष को यह बिल्कुल इग्नोर नहीं कर सकता। तो खुफिया स्तर पर ‘जांच-पड़ताल’ के बाद काज़मी को पकड़ा गया।

काज़मी को गिरफ़्तार कर देश में पहली बार ‘ईरानी आतंकवाद’ के साथ सीधे संबंध को स्थापित किया जा रहा है। आतंकवाद को लेकर देश में ये सबसे नया ट्रेंड है। एक नए दौर की शुरुआत। ऐसे में राजनीतिक तौर पर भारत ईरान को ये जवाब देने की स्थिति में अब है कि ये तो खुफिया विभाग की कार्रवाई है और पूरा मामला राजनीतिक दबाव से मुक्त है। दूसरा, आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर अब शहरी और शिक्षित लोगों को गिरफ़्तार करने की गति तेज हुई है और काज़मी भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। इस गिरफ़्तारी के बाद अब देश में ये तस्वीर बन गई कि भारत वैश्विक आतंकवाद के साथ सीधा जुड़ा हुआ है। इस स्थापना के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो अपनी वैश्विक पहुंच रखते हो और काज़मी इसके लिए उपयुक्त थे!

08 मई 2011

ओसामा की हत्या पर नोम चोम्स्की की प्रतिक्रिया

अमेरिका के अपराध नाजियों के अपराधों से भी बढ़ कर हैं



नोम चोम्स्की
हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई ईराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुस कर उनकी हत्या कर देता और उनकी लाश अटलांटिक में बहा देता.

यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध हत्या का अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों का उल्लंघन भी उतना ही गहराता जा रहा है. संभवतः 80 कमांडो उस निहत्थे पीड़ित को पकड़ सकते थे, लेकिन यह भी साफ हो चुका है कि उन्होंने इसकी कोई कोशिश नहीं की. जबकि उन्हें वास्तव में किसी भी तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, सिवाय - उन्हीं के दावे के मुताबिक – लादेन की बीवी को छोड़ कर जो उनकी तरफ लपकी थी. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़ कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है. मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर पर जोर दे रहा हूं. अप्रैल, 2002 में एफबीआई के मुखिया रॉबर्ट मुलर ने प्रेस को बताया था कि इतिहास की सबसे सघन जांच के बाद एफबीआई इससे अधिक कुछ भी नहीं कह सकती कि उसका ‘मानना’ है कि योजना अफगानिस्तान में बनी, हालांकि संयुक्त अरब अमीरात और जर्मनी में उसे लागू किया गया. जो वे अप्रैल, 2002 में ‘मानते’ थे, जाहिर है कि उसे वे आठ महीना पहले उस समय नहीं जानते थे जब वाशिंगटन ने तालिबान के ढीले-ढाले प्रस्तावों को खारिज कर दिया था (वे कितने गंभीर थे, यह हम नहीं जानते, क्योंकि उन्हें खारिज कर दिया गया) कि अगर अमेरिका सबूत पेश करे तो तालिबान बिन लादेन को उन्हें सौंप देंगे. पर हमने अभी-अभी जाना है कि वे सबूत वाशिंगटन के पास थे ही नहीं. यानी ओबामा तब साफ झूठ बोल रहे थे जब उन्होंने अपने व्हाईट हाउस के बयान में कहा कि ‘हमने तत्काल जान लिया था कि 11 सितंबर के हमले अल कायदा द्वारा किए गए थे.’
तब से लेकर अब तक कुछ भी ऐसा नहीं पेश किया गया है जो गंभीर हो. बिन लादेन के कबूलनामे के बारे में बहुत चर्चा हुई है लेकिन उसका उतना ही महत्व है जितना मेरे मेरे इस कबूलनामे का कि मैंने बोस्टन मैराथन जीता है. लादेन ने उस बात की डींग हांकी जिसे वह एक बड़ी उपलब्धि मानता था.
मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे. पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिक ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया. पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी गुस्सा पहले से ही बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा. जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है.
हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई ईराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुस कर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता. यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं है, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये. उसने सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए आदेश दिए, जो दूसरे युद्धापराधों से इस मायने में अलग हैं कि वे अपने में उन सारे अपराधों को समेटे हुए हैं (न्यूरेमबर्ग ट्रिब्यूनल को उद्धृत करूं तो) जिनके लिए नाजी अपराधियों को फांसी पर लटकाया गया थाः लाखों मौतें, दसियों लाख शरणार्थी, अधिकतर देश को तबाह कर देना और एक कटु सांप्रदायिक विवाद को पैदा करना जो अब बाकी इलाके में फैल गया है.
अभी फ्लोरिडा में शांति से मरे (क्यूबाई एयरलाइन बॉम्बर ओरलांडो) बोश के बारे में भी बहुत कुछ कहना है, और अभी ‘बुश डॉक्ट्रिन’ का भी हवाला देना है कि जिसके अनुसार वे समाज जहां आतंकवादी पनाह लेते हैं, उतने ही बड़े अपराधी हैं जितने आतंकवादी और उनके साथ वैसा ही सलूक किया जाना चाहिए. किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि ऐसा कह कर बुश अमेरिका पर हमले और इसके विनाश तथा इसके अपराधी राष्ट्रपति की हत्या का ही आह्वान कर रहा था.
अब इस ऑपरेशन के नाम पर- ऑपरेशन गेरोनिमो. पूरे पश्चिमी समाज में साम्राज्यवादी मानसिकता इस कदर गहरी है कि कोई अंदाजा तक नहीं लगा सकता कि जनसंहारकर्ता हमलावरों के खिलाफ साहसी प्रतिरोध के साथ बिन लादेन को जोड़ कर उसकी शान को बढ़ा ही रहे हैं. यह अपने मारक हथियारों को उन लोगों के नाम दे देना है, जो हमारे अपराधों के पीड़ित रहे हैः अपाचे, टॉमहॉक... यह ऐसा है मानों लुफ्टवाफे (Luftwaffe) ने अपने लड़ाकु हवाई जहाजों को ‘यहूदी’ और ‘जिप्सी’ का नाम दिया होता.
अभी बहुत कुछ कहना है, लेकिन ऐसा होना चाहिए कि बहुत जाहिर और शुरुआती तथ्यों पर भी हम सोच सकें. साभार-हाशिया