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23 नवंबर 2016

नोटबंदी में बड़ी कंपनियों को लूट की छूट

दिलीप ख़ान

गुरुवार से सरकार ने बिग बाज़ार की पेशकश पर नई व्यवस्था लागू की है। अब बैंक और एटीएम के अलावा बिग बाज़ार से भी लोग कैश निकाल सकेंगे। शुरू में देश भर में फैली 258 दुक़ानों में ये व्यवस्था लागू होगी। बाद में इस दायरे को और बढ़ाया जाएगा। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया इसमें बिग बाज़ार की मदद कर रहा है। देखने-सुनने में शुरुआती तौर पर तो यही लगता है कि इससे लोगों को सहूलियत होगी। लोग बैंक और एटीएम के साथ-साथ पेट्रोल पंप और बिग बाज़ार से भी पैसे निकाल सकेंगे, लेकिन क्या ये वाकई सहूलियत का मामला है? क्या स्टेट बैंक ने सचमुच लोगों की परेशानी कम करने के लिए इस फ़ैसले को मंजूरी दी है? 

बिग बाज़ार में कई बड़े उद्योगपतियों के पैसे

 नोटबंदी के बाद सरकारी संस्थानों को सुदृढ़ करने के बजाए बिग बाज़ार जैसे निजी खिलाड़ियों को बैंक जैसी शक्ति क्यों दी जा रही है? सरकार ने सहकारी बैंकों के लाख विरोध के बावजूद अब तक उन्हें पुराने नोट बदलने की शक्ति नहीं दी है। केरल में विधान सभा का विशेष सत्र बुलाना पड़ा, महाराष्ट्र में तीन ज़िलों के सहकारी बैंकों ने इसे बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। बिहार के सहकारी बैंककर्मियों ने 25 तारीख़ को हड़ताल की धमकी दे दी, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही, जबकि करोड़ों लोग सहकारी बैंकों पर निर्भर हैं। तो ऐसा क्या है बिग बाज़ार में जो सहकारी बैंक में नहीं है?


पहले दिन से ये प्रचार किया जा रहा है कि नोटबंदी से ग़रीब और मध्यवर्ग को दीर्घकालीन फ़ायदा होगा। हम इन आंकड़ों पर अलग से बात कर लेंगे कि ये फ़ैसला कैसे ग़रीब विरोधी है, लेकिन फ़िलहाल हम इस पर ध्यान दें कि बिग बाज़ार को पैसे निकालने का मंच बनाने से किसको फ़ायदा होगा और किसको नुकसान? मान लीजिए आपने बिग बाज़ार से 2000 रुपए निकाले, तो ज़रूरत का सामान चारों तरफ़ देखकर आप ख़रीददारी भी करेंगे। नहीं करेंगे तो उनके कर्मचारी, जिनको इसी काम का वेतन मिलता है, आपको ज़रूर ऑफर करेंगे कि आप फलाना सामान ख़रीद लीजिए। इस तरह बिग बाज़ार से आप निकालने जाएंगे 2000 और घर लेकर आएंगे 1000 या फिर पांच सौ। नकदी के मामले में ख़ाली हाथ भी लौट सकते हैं। जो सामान आप मोहल्ले की किराना दुक़ान से ख़रीदते थे, वो आप बिग बाज़ार से ख़रीदेंगे। वहां आपको न कैश की दिक़्क़त है और न ही कार्ड एक्सेप्ट नहीं होने की। मोहल्ले का छोटा दुक़ानदार आपको ये सुविधा नहीं दे सकता। ये सुविधा बड़ा रिटेल चेन ही दे सकता है। बिग बाज़ार आपको दे रहा है। बिग बाज़ार की बिक्री बढ़ेगी। वैसे ही चारों तरफ़ ख़बरों के ज़रिए ये प्रचार हो रहा है कि 'आप पैसे बिग बाज़ार से भी निकाल सकते हैं'। बिग बाज़ार के लिए बिना पैसा ख़र्च किए इससे बढ़िया विज्ञापन क्या हो सकता है? 

अब एक बार बिग बाज़ार की मालिकाना संरचना समझ लेते हैं। बिग बाज़ार को चलाने वाली मदर कंपनी का नाम है फ्यूचर ग्रुप। किशोर बियानी इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। 2001 में इसकी स्थापना हुई थी और तबसे बिग बाज़ार देश के सैंकड़ों शहरों में अपनी शाखा खोल चुका है। 2015 में एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी भारती रिटेल और फ्यूचर ग्रुप मर्ज हो गए। यानी एक हो गए। इस तरह ये कंपनी 15 हज़ार करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली कंपनी बन गई। 
सहकारी बैंकों को नोट बदलने की शक्ति नहीं दी गई

मई 2012 में आदित्य बिड़ला समूह को फ्यूचर ग्रुप वालों ने पेंटालूंस की 51.1 फ़ीसदी हिस्सेदारी दे दी थी। 8000 करोड़ रुपए में ये डील हुई। फ्यूचर ग्रुप ने अपने क़र्ज़ का बोझ कम करने के लिए ये फ़ैसला किया। 


जब भारती ग्रुप के साथ फ्यूचर ग्रुप का मिलाप हुआ तो ‘इज़ीडे’ और बिग बाज़ार एक हो गए। ये जो ‘इज़ीडे’ है, ये भारत में वालमार्ट की सहयोगी कंपनी है। यानी बिग बाज़ार का दांव बहुत ऊपर तक लगा हुआ है। नोटबंदी से उपजे हालात में फ़ायदा लूटने के तार यहां से अमेरिका तक जुड़े हुए हैं। अगर आप बिग बाज़ार में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी तलाशेंगे तो कई बड़े नाम आपको एक साथ मिल जाएंगे। इनमें किशोर बियानी और सुनील भारती मित्तल के अलावा आदित्य बिड़ला तो हैं हीं, गोदरेज़ भी हैं और वॉलमार्ट भी हैं। फ्यूचर ग्रुप में इटली के जेनरली ग्रुप, फ्रांस के सेलियो, अमेरिका के स्टैपलेस, ब्रिटेन के क्लार्क समेत कई विदेशी कंपनियों ने साझा उपक्रम के तहत पैसे लगा रखा है। यही नहीं, गुजरात और पंजाब में फ्यूचर ग्रुप ‘आधार रिटेल’ चलाती है और इसमें गोदरेज इसका साझेदार है। 

इज़ी डे अब बिग बाज़ार वालों का है
इसी तरह बिग एप्पल को चार साल पहले किशोर बियानी ने ख़रीदा था। यानी KB’s फेयर प्राइस भी इस डील के बाद बिग बाज़ार वालों का हो गया। मुनीष हेमराजन से 62 करोड़ रुपए में ये सौदा पटा था। प्लानेट स्पोर्ट्स नाम की कंपनी भी फ्यूचर ग्रुप की है और इसमें यूरोप की कुछ कंपनियों ने भी पैसे लगा रखे हैं। यही नहीं, EZone online, Fool hall, Home Town, I am in, Central जैसे कई रिटेल स्टोर्स के मालिक किशोर बियानी हैं। 


नोटबंदी के बाद पेटीएम जैसी कंपनियों के धंधे बुलंद हुए तो नरेन्द्र मोदी की फोटो के साथ कई अख़बारों ने कंपनी ने इश्तेहार छापा। पेटीएम में चीनी कंपनी अलीबाबा का बड़ा शेयर है। नोटबंदी का पेटीएम को बड़ा फ़ायदा मिला है। अब बारी बिग बाज़ार की है। 

11 अगस्त 2015

खेती-किसानी और भारतीय राजनीति

दिलीप ख़ान

कौन बड़ा सेल्समैन?
नरेन्द्र मोदी मुझसे बढ़िया सेल्समैन हैं”- मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह का ये बयान बदले भारत में चल रही राजनीति के सारे पत्ते खोल देता है। पुरानी यूपीए-2 सरकार का मुखिया इस वक़्त के प्रधानमंत्री को जब सेल्समैन कह रहे हैं तो उसके साथ बढ़िया नाम का विशेषण भी लगाना नहीं भूल रहे। यानी इस वाक्य को ज़रा सा विस्तार देकर इसका अर्थ खोले तो कुल मतलब ये निकलता है कि मनमोहन सिंह ने अपने सेल्समैनशिप को पूरी तन्मयता से अंजाम देने की कोशिश की और उन्हें बढ़िया सेल्समैन नहीं होने का मलाल रह गया। बहस का एक मुद्दा तो ये है ही कि कैसे देश में प्रधानमंत्री का पद सेल्समैन में रिड्यूस हो गया। लेकिन बीते डेढ़-दो दशक की राजनीति पर नज़र रखने वालों को इसमें कोई चौंकाने वाला तथ्य हाथ नहीं लगा होगा, क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग़रीब-वंचितों के सवाल उठाने वालों ने लंबे समय से सत्ता गलियारे पर ये आरोप लगाए हैं कि ये अपनी उपलब्धियों से लेकर योजना, कार्यक्रम को बेचने की जद्दोजेहद में रहते हैं। यही नहीं प्राकृतिक संसाधनों को जिस आनन-फानन में कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की मुहिम चली है उसमें हर सरकार का कमोबेस समान रुख रहा है। हाल ही में अरावली पहाड़ों के आस-पास एक निश्चित दूरी पर कोई भी निर्माण कार्य पर रोक लगाने का जब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने फैसला सुनाया तो हरियाणा की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की तर्ज पर मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी इसे चुनौती देने की ठान ली।

सवाल ये है कि सेल्समैन के तौर पर कोई राजनेता किसको कोई चीज़ बेचेगा? ख़रीदने की स्थिति में कौन है? खेती-किसानी के सवाल को इस ज़मीन से देखने पर मौजूदा राजनीतिक स्पेस में किसानों की स्थिति का अंदाज़ा लगाना आसान होगा। हालांकि इस पर कोई ठोस आधिकारिक अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन छिट-पुट आंकड़े बताते हैं कि बीते 15 साल में लाखों की तादाद में लोगों ने खेती छोड़ दी। क्या खेती छोड़ने के बाद वो बेहतर आर्थिक कारोबार में शामिल हो गए इस पर अध्ययन होना चाहिए, लेकिन ये साफ है कि जो लोग खेती में जुटे हुए हैं उसका बड़ा तबका परेशानी और सतत दबाव में जी रहा है। सरकार उन्हें ये भरोसा दिलाने में नाकाम रही है कि फ़सल नष्ट होने पर सही मुआवज़ा या फिर बेहतर पैदावार ही हालत में अच्छे न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिल पाएंगे।
खेती की मुश्किलें

देश जब आज़ाद हुआ था तो उस वक़्त कुल जीडीपी में खेती और संबंधित क्षेत्र का योगदान 50 फ़ीसदी से ज़्यादा था। विकासशील अर्थव्यवस्था से जैसे-जैसे कोई मुल्क़ विकसित की तरफ़ कदम बढ़ाता है कृषि का जीडीपी में योगदान भी घटता जाता है, लेकिन क्या देश में खेती-किसानी सचमुच यूरोप या अमेरिकी मॉडल पर हो रही है और क्या भारत की सामाजिक बनावट उन मुल्क़ों की तरह है? दोनों सवाल का जवाब ना में है। इस वक़्त कुल जीडीपी में कृषि का योगदान महज 13 फ़ीसदी है, लेकिन प्लान आउटले के आंकड़ें देखें तो साफ़ हो जाता है कि सरकार का ध्यान इतने हिस्से पर भी ठीक से नहीं जाता। खेती का बजट आवंटन 8 फ़ीसदी के क़रीब है। भारत जैसे विशाल देश के लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि 13 फ़ीसदी जीडीपी में हिस्सेदारी वाला कृषि क्षेत्र की बदौलत ही सवा अरब लोगों का पेट भरता है। यानी जीडीपी की हिस्सेदारी से कहीं व्यापक महत्व खेती-किसानी का है जिसे नज़रअंदाज़ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही।

जाहिर है खेती पर दबाव है। दोतरफ़ा दबाव। यानी अगर पैदावार नष्ट हुई तो किसानों की लागत वसूली नहीं होती और अगर बंपर पैदावार हुई और न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया गया तो अनाज की क़ीमत में कमी आने की वजह से फिर से लागत निकालने के लाले पड़ जाते हैं। किसान उस छोर पर नहीं खड़ा है जहां वो सेल्समैन के उत्पादों को ख़रीद सके। राजनीतिक मोर्चे पर भी किसान लगातार रिसिविंग एंड पर पहुंचता जा रहा है। ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के ज़बर्दस्त प्रदर्शन के वावजूद सरकार अध्यादेश लाने पर अडिग रही। फिर, सेल्समैन में तब्दील हो चुकी सरकार को परवाह किसकी रहेगी? जाहिर है उनकी जो उनका माल ख़रीद सके। नागरिक से उपभोक्ता तक का विमर्श नवउदारवादी संरचना में बहुत पुराना है, लेकिन उसे जिस सरलीकृत तरीके से मनमोहन सिंह ने पेश किया वो बताता है कि जो ख़रीदने की स्थिति में है वही सरकार से मोल-तोल करने की भी हालत में है। या कहिए कि सरकार भी उसी से मोल-भाव कर रही है। वो कौन है? किसान तो कतई नहीं। वो वो हैं जो मुंबई में अपनी बहुमंजिला इमारत के एक फ्लोर पर बागवानी करते हैं। वो धान नहीं उगाते, ना ही गेहूं। वो शौकिया बागवानी करते हैं। ज़मीन से दर्जनों फुट की ऊंचाई पर। ऐसे खेतीहरों के कई रूप हैं। किसी का नाम अंबानी नामक शब्द पर ख़त्म होता है, किसी का वाड्रा और किसी का अदानी।

राहुल गांधी ने हाल ही में ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए देश के कई इलाक़ों का दौरा किया। रेल के साधारण डब्बे में बैठकर पंजाब गए  और पंजाब में जिन चंद किसानों से मिले और जिन्हें मदद का आश्वासन दिया गया, उनमें से एक बुजुर्ग किसान ने शुरुआती जून में थक-हारकर आत्महत्या कर ली। किसान आत्महत्याओं को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का काम लगातार बढ़ता जा रहा है। सबकुछ आंकड़ों में तब्दील हो गया है। 1995 में डब्लूटीओ सम्मेलन के ठीक सामने एक कोरियाई किसान ने जब किसानविरोधी नीतियों से विरोध जताते हुए आत्मदाह किया था उसके बाद से दुनिया में कुछ नहीं बदला। भारत में तो कतई नहीं। भारत के कई हिस्से आत्महत्या वाले नक्शे में अब एंट्री पा रहे हैं। पंजाब इनमें से एक है। विदर्भ, तेलंगाना, बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ तो पुराने इलाक़े हैं। इन आत्महत्याओं की वजहें क्या हैं? पहली, फ़सल नष्ट होना। दूसरी, तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। तीसरी, संकर नस्ल के बीजों का आगमन और पारंपरिक बीजों का लुप्तप्राय होना। चौथा, सिंचाईं का अभाव और पांचवां, विदर्भ जैसे इलाक़ों में खाद्यान्न के बदले नकदी फ़सलों का उत्पादन। ज़्यादातर मामलों में सीधी वजह इनमें से कोई नहीं होती। सीधा और तात्कालिक कारण क़र्ज होता है, लेकिन क़र्ज के तार इन्हीं कारकों से जुड़े हैं।

कपास उगाने वाले किसान की अगर फ़सल नष्ट हुई तो लागत तो डूबी ही, साथ ही खाद्यान्न उत्पादन करने वाले किसानों की तरह बची-खुची फ़सल वो खा भी नहीं सकता। सरकारी स्तर पर जो मुश्किले हैं वो मुख्यत: तीन हैं। पहली, मुआवज़े के बंटवारे की सही नीति का अभाव। दूसरी, कंटींजेंसी प्लान का सही तरीके से लागू ना हो पाना और तीसरा किसानों की पहचान। आम तौर पर किसानों की पहचान पर भारत के समकालीन कृषि विमर्श में चर्चा नहीं होती, लेकिन इससे बहुत सारी चीज़ें नत्थी हैं। एक मिसाल से समझिए। बुंदेलखंड के एक भूमिहीन किसान ने बड़े किसान से किराए पर साल भर के लिए ज़मीन ली। पैदावार अच्छी थी लेकिन जब कटने पर आई तो बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि के चलते फ़सल बर्बाद हो गई। लागत भी नहीं निलकी। सरकार ने मुआवज़े का ऐलान किया। नियम के मुताबिक़ ज़मीन के मालिक को मुआवज़ा मिला। अब जिस छोटे किसान ने किराए पर ज़मीन ली, जिसने मेहनत की, जिसका पैसा डूबा, जिसकी फ़सल डूबी, सरकार की पूरी नीति में वो कहीं मौजूद ही नहीं है।
खेती में फंसी जान


मुआवज़े के नाम पर कैसे 10 रुपए और 100 रुपए के चेक बांटे गए ये दो-तीन महीने पहले की राष्ट्रीय सुर्खियां थीं। जाहिर है ये कोई पहली बार नहीं हुआ। मुआवज़े की रकम किसानों तक पहुंचने से पहले लूट-खसोट और कमीशनखोरी का समूचा तंत्र बिछा है। फिर सवाल आता है कि मुआवज़ा किस हालात में? पहले आधी फ़सल नष्ट होने पर मुआवज़े का नियम था, मोदी सरकार ने इसे घटाकर 33 फ़ीसदी कर दिया। पहल अच्छी है, लेकिन किसान इसे दूसरे नज़रिए से देख रहा है। किसानों का कहना है कि अगर 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर उन्हें मुआवज़ा नहीं मिलेगा और 33 फ़ीसदी नष्ट होने पर मिलेगा तो 3 फ़ीसदी वो ख़ुद से नष्ट कर देंगे। ज़ाहिर है सरकार को किसानों की स्थिति का अंदाज़ा नहीं है कि प्राकृतिक वजहों से 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर वो कैसी परिस्थिति में फंस जाते हैं!

ये लगातार दूसरा साल है जब मौसम विभाग ने मानसून में 12 फ़ीसदी कमी का आकलन पेश किया है। बीते साल देश के कई इलाक़े सूखे की चपेट में थे और इस बार भी यही अंदेशा है। इससे किसानों की सेहत पर सीधे फर्क तो पड़ता ही है, लेकिन बाद की स्थिति से भी उसे जूझना पड़ता है। एक तो सिंचाईं के साधन नहीं होने के चलते पैदावार गई और दूसरा आमदनी नहीं होने के चलते हाथ में क्रयशक्ति नहीं रह गई जिससे बाज़ार से वो खाद्यान्न ख़रीद सके। देश में इस वक़्त भी 45 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्से पर सिंचाईं का पूरा दारोमदार बारिश के हाथों में है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरामेंट से जुड़ी चर्चित पर्यावरणविद सुनीता नारायण कई वाकयों पर इसी संदर्भ में एक बात दोहराती रहती हैं कि मानसून देश का वित्तमंत्री है। यानी मानसून समय पर नहीं आया या फिर बेमौसम बरसात हुई तो उत्पादन चौपट। सरकार इससे पार पाने के लिए दो तरीके अपना रही है। पहला, फौरी कदम के रूप में कंटींजेंसी प्लान। यानी वित्तीय राहत। दूसरा, भारतीय कृषि एवं अनुसंधान संस्थान इस दिशा में लगातार काम कर रहा है कि बीजों का वो नस्ल तैयार किया जाए जो देर से मानसून आने पर कम समय में उतनी ही पैदावार के लायक हो। यानी सामान्य तौर पर जो फ़सल चार महीने में तैयार होती है, उतनी ही फ़सल दो-ढाई महीने में तैयार हो जाए। लेकिन अभी इस प्रयोग को शहरों में भी ठीक से स्वीकृति नहीं हासिल हुई है और देहातों में तो खेती के योजनाकार पहुंचने में भी हिचकिचाहट दिखाते हैं।

खेती का संबंध सिर्फ़ खेती तक टिका नहीं है, जब तक खेती के अलावा इससे संबंधित क्षेत्रों को मिलाते हुए एक मुकम्मल योजना तैयार नहीं होती, कृषि का संकट बरकरार रहेगा। स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन के सपने देखने वाले गलियारे में लघु-कुटीर उद्योग के जाल को विस्तार देने की योजना प्राथमिकता में बहुत पीछे है। यही वजह है कि खाद्य मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती जाती है और सकल मुद्रास्फीति आंकड़ों में शून्य के स्तर पर दिखती रहती है। यही विडंबना है और यही देश में नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता और लोकेशन भी दर्शाता है। स्मार्ट सिटी को दो बार बेचा जा सकता है। पहले तो निर्माताओं के सामने योजना को बेचकर और फिर अपनी ताक़त दिखाने के लिए तैयार स्मार्ट सिटी को दुनिया के मानचित्र पर। सबकुछ बिकने और बेचने का मामला है। मामला सेल्समैन तक पहुंच गया और बेचने का हुनर बदल गया, लेकिन किसान अभी भी मंडी के चक्कर में ही चप्पलें घिस रहा है। उनके चप्पलों की आवाज़ छोटे मंडी कारोबारियों तक ही सीमित रहती है और बढ़िया सेल्समैन देश स्तर की नीतियां बेचते रहते हैं।  

(सबलोग के जुलाई महीने में प्रकाशित)


10 अप्रैल 2014

हिटलर और मोदीः साम्यताएं महज संयोग हैं क्या

अनिल यादव
मानव का स्वभाव है कि वह किसी चीज को किसी परिप्रेक्ष्य में रखकर ही पहचान सकता है, उसे पूरी तरह समझ सकता है। अब तो सापेक्षता विज्ञान की भी स्वीकृत धारणा है। कोई चीज किसी संदर्भ में ही मोटी-पतली या अच्छी-बुरी होती है। अगर इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा जाये तो तुलना और उदाहरण बुद्धि द्वारा विकसित बौद्धिक उपकरण हैं- इससे ही विकास की धारा का, इतिहास की दिशा का पता चलता है। वस्तुतः बिना दूरी लिए हम किसी भी वस्तु को पूर्ण रूप से नहीं देख सकते हैं और वर्तमान से दूरी लेने का एक ही तरीका है कि उसे अतीत से जोड़कर देखा जाए। इतिहास में एक परम्परा रही है कि किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘उसी जैसा’ व्यक्ति इतिहास की गर्त में खंघाला जाता है, इतिहास के विद्यार्थियों के पास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब वह किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझने के लिए अतीत की धारा में आगे-पीछे होते हंै। कभी किसी को ‘कश्मीर का अकबर’ तो कभी किसी को ‘भारत का नेपोलियन’ कह कर उसे आंकता है। अभी हाल में ही भारत में तमाम लोगों ने अन्ना हजारे को गांधी के सापेक्ष करके अतीत को खंघाला। खैर अभी हाल में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को हिटलर कह कर हमें फिर से अतीत की धारा में पीछे जाने के लिए विवश किया है। पूरी भारतीय राजनीति में हिटलर (जर्मनी का) फिर से चर्चा में है- आखिर कौन है ये हिटलर? नरेन्द्र मोदी से उसका क्या रिश्ता है? मोदी जिस संघ परिवार में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं क्या उसकी विचारधारा से हिटलर जुड़ा हुआ है? ये सारे सवाल आज राजनैतिक विश्लेषकों और मीडिया द्वारा उछाले जा रहे हैं।
हमें नरेन्द्र मोदी को समझने के लिए अतीत की धारा में लौटाना होगा- आॅस्ट्रिया के एक छोटे से शहर ब्रानों में, जहाँ 20 अप्रैल 1889 को हिटलर ने एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लिया, एक सैनिक के तौर पर हिटलर ने अपना जीवन शुरू किया परन्तु बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती गयी और अपनी जालसाजी और कुटिलता के चलते हिटलर जर्मनी का फ्यूहरर (प्रधान नेता) बन बैठा। इसी क्रम में हिटलर ने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल (नात्सीदल) के अध्यक्ष डेªक्सलर को भी अपने रास्ते से हटा दिया। इसी क्रम में यदि मोदी को देखा जाए तो हम आसानी से देख सकते हैं कि किस तरह नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए भाजपा के संस्थापक सदस्यों को ही अपने रास्ते से हटा दिया। लालकृष्ण आडवाणी सरीखे नेता जो भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ थे को भी नहीं बक्शा। इस क्रम में जसवंत सिंह, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, लाल जी टंडन जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी संघ परिवार के साथ मिलकर अपने रास्ते से लगभग हटा ही दिया है। ये नेता आज अपनी सीटों से बेदखल होकर अपनी स्वयं की जीत-हार में ही परेशान हैं।
हिटलर ने तात्कालीन जर्मनी के आर्थिक हालात का बड़ी चतुराई के साथ लाभ उठाया था। 1929 में आयी महा आर्थिक मंदी ने जर्मनी की व्यवस्था को चैपट कर दिया था। उस समय जर्मनी की सड़कों पर बड़ी संख्या में बेरोजगार गले में तख्ती लटकाये- ‘मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ’ दिखायी देने लगे थे। पूँजीपतियों को भय सताने लगा था कि कहीं जर्मनी में साम्यवादी क्रान्ति न हो जाये। आज भारत भी आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लूट-खसोट की नीतियों से पीडि़त है। अर्थव्यवस्था के हालात ठीक नहीं हैं, वस्तुतः इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब फासिस्ट संगठन अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो पूंजीपति वर्ग उनके साथ जुड़ जाता है। आज जब नरेन्द्र मोदी अम्बानी और आडानी के पैसों से उड़नखटोले में उड़ कर विकास का जुमला उछाल रहे हैं तो अनायास ही हिटलर के साथ जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बन्धों की यादें ताजा नहीं हो रही हैं। यहाँ जर्मनी के इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद उपयोगी होगा क्योंकि प्रश्न हिटलर और जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बंधों अथवा मोदी और अम्बानी के सम्बंधों का नहीं है बल्कि इसका है कि इन सम्बन्धों के चलते मनुष्यता को कैसे-कैसे दुख झेलने पड़ते हैं।
हिटलर के पतन के बाद न्यूरेमबर्ग में नाजियों के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें बाल्थर फंक नामक का एक व्यक्ति भी था जो जर्मनी के प्रसिद्ध आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर वोरसेन जेतुंग’ का सम्पादक था और पूंजीपतियों और हिटलर के बीच का महत्वपूर्ण कड़ी भी। उसने कई रहस्यों को उजागर किया जिससे हिटलर और पूंजीपतियों का संबंध उजागर हुआ। हिटलर ने कोयला खानों के मालिकों से पैसे वसूलने के लिए ‘सर ट्रेजरी’ नाम से एक फण्ड भी बनाया था। फंक ने एक लम्बी लिस्ट बतायी जिसमें काॅर्टन आई.जी. फाखेन, वान स्निजलर, अगस्त दिहन, जैसे उद्योगपति थे जो हिटलर को अपने स्वार्थों के लिए चंदा देते थे। आज भारत में खास कर के गुजरात में मोदी ने अडानी को 1 रू0 प्रति वर्गफुट से हिसाब से जमीने दी हैं, से साफ जाहिर है कि आडानी और अम्बानी मोदी को किस लिए पैसे दे रहे हैं? क्यों भारत के दो-तिहाई पूंजीपति मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं?
हिटलर ने अपना प्रचार करवाने के लिए एक पोस्टर जारी किया था- जिसमें सिर्फ हिटलर का एक फोटो था। यानि नाजीवादी पार्टी के अन्य नेताओं ने हिटलर के समक्ष समर्पण कर दिया था। भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम हैं जब एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी को हाइजैक कर लिया हो- तभी तो आज ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा उछाला जा रहा है। भारत के इतिहास में कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के लिए शायद ही इतना उतावला या हड़बड़ी में रहा हो। आज संसदीय गरिमा को ताक पर रखकर ‘प्रेसीडेन्सियल फोबिया’ से ग्रसित मोदी ‘प्रधानमंत्री का चुनाव’ लड़ रहे हैं।
मोदी अपनी छवि बनाने के लिए प्रतिदिन 25 हजार डाॅलर खर्च करते हैं। सोशल साइटों, फेसबुक, ट्यूटर, यू-ट्यूब पर हजारों की संख्या में पेशेवर लोग बैठाए गए हैं जो मोदी के भाषणों और वीडियो को अपलोड करते हैं। उनकी रैलियों को लाईव कवर करने के लिए टीवी चैनलों को अपना ओवी वैन नहीं भेजना पड़ता, उनकी पीआर एजेंसी खुद लाईव कवरेज चैनलों के दफ्तरों तक पहंुचाती है। यह तरीका कोई नया नहीं है जर्मनी में हिटलर भी ठीक इसी तरीके से अपना प्रचार करता था। उसने चार लाख रेडियो सेट बांटे थे जिस पर उसका भाषण सुनना अनिवार्य था। आज मोदी जिस तरह से ‘विकास-विकास’ रट रहे हैं, वह एक पुराना हथियार है। अपने चुनाव प्रचार में हिटलर ने भी एक पोस्टर जारी करवाया था- जिस पर लिखा हुआ था- ‘आपकी फाॅक्सवागन’। इसके जरिये यह एहसास करवाने की कोशिश की गयी कि अब आम मजदूर भी कार खरीद सकता है। आज भारत के 16वीं लोक सभा के चुनाव में भाजपा मध्यवर्ग को कुछ ऐसे ही सपने दिखा रही है।
भाषा का भ्रमजाल ऐसा होता है कि बहुत सारी चीजों पर लोग धूल डालने में सफल हो जाते हैं। यदि हम हिटलर के भाषणों को सुनंे तो पाएंगे कि उसने कुछ शब्द ईजाद किए थे जिसका वह बखूबी प्रयोग करता था। यहूदियों की हत्या और गैस चैम्बरों में दम घोट कर मारने वाली प्रक्रिया के लिए क्रमशः वह ‘अन्तिम समाधान’ और ‘इवैक्युएशन’ शब्द का प्रयोग करता था। आज मोदी भी अपने ‘राजधर्म’ की असफलता और गुजरात दंगे को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ कह कर अपने ‘खूनी दाग’ को छुपा लेते हैं। ठीक हिटलर की तरह वह भी अपने विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते नजर आते हैं।
खैर मोदी और हिटलर की इस बहस को आगे ले जाने के लिए हमें आर0 एस0 एस0 और नाजीवाद के संबंधों और विचार धारा को देखना होगा। जैसा कि हिटलर ने नाजी पार्टी को मजबूत करने के लिए एस0 एस0 नाम का एक सशक्त सैनिक दल बनाया जो भूरी रंग की कमीज पहनते थे। यह मात्र संयोग नहीं माना जाना चाहिए कि मोदी जिस संगठन में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं उसका नाम भी आर0 ‘एस0 एस0’ है। इनका पहनावा भी इन्हीं लोगों से प्रेरित है। संघियों के लिए गीता मानी जाने वाली पुस्तक ‘वी आॅर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में गोलवलकर ने राष्ट्र को परिभाषित भी हिटलर की तरह ही किया है। गोलवलकर ने राष्ट्र की परिभाषा में इसके पांच तत्वों को बताया है- भौगोलिक (देश), नस्वी (नस्ल) धार्मिक (धर्म), सांस्कृतिक (संस्कृति), भाषायी (भाषा), इसमें से एक भी तत्व हटा दिया जाए तो राष्ट्र समाप्त हो जाता है। आज जब भी मोदी राष्ट्र अथवा राष्ट्रीयता की बात करते हैं तो वह धर्म को नहीं भूलते हैं, तभी तो खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी कहते हैं। वस्तुतः नाजियों के लिए भी धर्म और नस्ल राष्ट्र के प्रमुख नियामक अंग होते थे। इसी आधार पर वे राष्ट्रीयता की जमीन तैयार करते थे। आज मोदी भी खुले मंचों से भारत को हिन्दुओं के लिए सुरक्षित जगह बनाने की गारंटी देते नजर आते हैं। नाजियों द्वारा राष्ट्र के लिए ‘वोल्क’ शब्द का प्रयोग किया जाता था जिसका अर्थ था- ‘धार्मिक-रक्त संबंधी एकता वाला जनसमूह’। ठीक इसी तर्ज पर संघ के लोगों ने ‘रेस’ की अवधारणा गढ़ी है।
वस्तुतः इतिहास वह प्रयोगशाला है जिसमें मानव-कृतियों का लेखा-जोखा सुरक्षित है। उसमें हिटलर के भी सारे कारनामे दर्ज हैं और जब-जब ऐसी परिस्थितियां बनेंगी तब-तब वर्तमान को इसी प्रयोगशाला में समझा जायेगा और मौजूदा दौर के हिटलर को पहचाना जायेगा ताकि हम अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को बचा सकें।

23 सितंबर 2012

कोलगेट : भूतपूर्व एयर मार्शल और भूतपूर्व मंत्रीजी की जुगलबंदी

-दिलीप खान

गांधी शांति प्रतिष्ठान में भारत-नेपाल संबंधों को लेकर महीने की शुरुआत में एक कार्यक्रम था। उमस भरी गर्मी में मंच से जो व्यक्ति नेपाली में लगातार बोले जा रहा था, पता चला कि वो नेपाल के भूतपूर्व विदेशमंत्री हैं। हॉल में कोई ताम-झाम, कोई डेकोरम नहीं था। भारत में एक बार जो मंत्री बन गया, वो मरते-मरते अपने भीतर मंत्री वाली शक्ति को टटोलते रहता है। हर पहर सुरक्षा वगैरह चाक-चौबंद। रसूख बरकरार रहता है। संन्यास लेने के बाद भी लोग मंत्रीजी ही बुलाते हैं। इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा सांसद प्रेमचंद गुप्ता ने तो सिर्फ़ पद ही खोया है, राजनीति में तो वो बरकरार है। एक समय वो कॉरपोरेट मामलों के कैबिनेट मंत्री थे। वर्षों से लालू प्रसाद (यादव) के काफ़ी करीब रहे हैं। प्रेमचंद गुप्ता के दो बेटे -मयूर गुप्ता और गौरव गु्प्ता- व्यवसायी हैं। इन दोनों में हालांकि गौरव गुप्ता को ज़्यादा तेज माना जाता है, लेकिन यहां उनकी प्रतिभा का हम तुलनात्मक अध्ययन करने नहीं जा रहे। कोलगेट से इनका क्या ताल्लुक है, इसपर बात करेंगे लेकिन उससे पहले एक और सज्जन से आपका परिचय करा देते हैं।  

नाम है डेंजल कीलोर। भूतपूर्व एयर मार्शल डेंजल कीलोर। युद्ध में डटकर लड़ने वाला - जैसा कि अमूमन हर फौजी होता है! (अन्ना हज़ारे बुरा न मानें)। थर्मामीटर से शूरता, वीरता और पराक्रम वगैरह को मापने पर बढ़िया नतीजे पर पहुंचा जा सकता है क्योंकि पाकिस्तान के साथ युद्ध में उन्होंने खूब वाहवाही लूटी थी। 1965 के युद्ध में। पदोन्नति भी मिली थी। आज भी अतीत में गोता लगाए रखते हैं। हमने दुश्मनों को ऐसे धूल चटाई तो वैसे धूल चटाई! बताया जाता है कि अपनी बातचीत में बरबस ही युद्ध की तान छेड़ने में उनको महारत हासिल है। हालांकि ये फौजदोष बेहद सामान्य है, फिर भी इसके जरिए अपने व्यक्तित्व में भूतपूर्व के एहसास को वे ताजेपन से ढंकना चाहते हैं। मंत्रीजी की तरह ही। 
कॉरपोरेट मामलों के पूर्व मंत्री प्रेमचंद गुप्ता

17 जून 2009 को कोयला मंत्रालय ने महाराष्ट्र का दहेगांव माकरधोकरा-IV कोयला खदान संयुक्त रूप से तीन कंपनियों को आवंटित करने की घोषणा की। गुजरात अंबुजा सीमेंट, लाफ़ार्ज इंडिया और आईएसटी स्टील एंड पावर लिमिटेड। इस खदान की कुल क्षमता 4.88 करोड़ टन है। इसका 53 फ़ीसदी हिस्सा आईएसटी स्टील एंड पावर लिमिटेड की झोली में आया। मयूर गुप्ता और गौरव गुप्ता इसके मालिक हैं। गौरव गुप्ता ही इसके निदेशक हैं और डेंजल कीलोर साहब अध्यक्ष।
 
जोहरा चटर्जी की अध्यक्षता वाला अंतर-मंत्रालयी समूह ने पहले चरण के अंत में जिन दो खदानों (इनको मिलाकर अब तक कुल 13 खदानों का अवंटन रद्द हुआ है) का आवंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की उनमें एक ब्लॉक दहेगांव माकरधोकरा-IV भी है। दूसरा खदान छत्तीसगढ़ का भास्करपारा है जिसे 21 नवंबर 2008 को संयुक्त रूप से ग्रासिम इंडस्ट्रीज (मिस्टर इंडिया जैसे सौंदर्य प्रतियोगिता के प्रायोजक बिड़ला समूह की कंपनी) और मुकेश भंडारी की कंपनी इलेक्ट्रोथर्म (इंडिया) लिमिटेड को दिया गया था। इसकी क्षमता 1.86 करोड़ टन है। इसमें इलेक्ट्रोथर्म की हिस्सेदारी 52 फीसदी और ग्रासिम इंडस्ट्रीज की 48 फ़ीसदी है। भास्करपारा के इस खदान में तो आदित्य मंगलम बिड़ला का पैसा लगा ही है लेकिन गुप्ता और डेंजल कीलोर को जो खदान आवंटित हुआ उसमें भी बिड़ला की सेंधमारी है क्योंकि लाफार्ज सीमेंट (फ्रांसीसी जोड़ीदार के साथ) बिड़ला का ही उत्पाद है। कोयला खदान आवंटन के समय बिड़ला ने जान-बूझकर अलग-अलग कंपनियों से दांव खेला, ताकि ज़्यादा खदान हासिल कर सके। हिंडालको तो खैर है ही। आप कहिए कि दहेगांव माकरधोकरा-IV खदान में नेता, फौजी और कॉरपोरेट तीनों की जुगलबंदी थी।
 
आरोप ये है कि खदान हासिल करने के लिए कंपनियों ने मंत्रालय को ग़लत जानकारी देकर गुमराह किया। कहा ये भी जा रहा है कि इसके लिए मंत्री जी का व्यक्तित्व भी बड़ा सहारा बना। हालांकि प्रेमचंद गुप्ता इससे लगातार इनकार कर रहे हैं। लेकिन कोयला खदान मामले में राजनीतिक टिप्पणियों पर नज़र दौड़ाएं तो आप देखेंगे कि कांग्रेस पर उठने वाली उंगली के बचाव में जितना कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के गले से आवाज़ नहीं निकली होगी उससे ज़्यादा ज़ोर से लालू प्रसाद (यादव) ने चीख़ निकाली है। यूपीए सरकार को देने वाले सिर्फ़ राजनीतिक समर्थन का मामला भर नहीं है ये! जब प्रेमचंद गुप्ता का नाम सार्वजनिक हुआ तो लालूजी थोड़ा मलिन पड़े। राजनीतिक दबाव के चलते प्रेमचंद बाबू के बेटे का खदान हो या फिर पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय के मानक निदेशक पद पर रहने वाले भाई सुधीर कुमार सहाय का खदान, सबको रद्द करना राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भी ज़रूरी था, लिहाजा सरकार और ख़ास तौर पर कांग्रेस यह कोशिश कर रही है कि विपक्ष को वो ऐसा मौका न दें कि सीधे-सीधे राजनीतिक परिवारवाद वाले मामले पर सरकार को वो लंबी दूरी तक घसीट ले जाए। सीबीआई ने भी जायसवाल समूह (अभिजीत समूह की सिस्टर कंपनी) के घसीटे में अरविंद और मनोज जायसवाल सहित कांग्रेस सांसद विजय दर्डा (लोकमत मीडिया समूह के मालिक) के बेटे देवेंद्र दर्डा पर पकड़ बनाई है। यह जांच से ज़्यादा राजनीतिक मजबूरी भी है। वरना सीबीआई की कार्यशैली तो सब जानते ही हैं।
 
लेकिन नेताओं और कॉरपोरेट के भ्रष्ट होने पर लगभग समहत हो चुके मध्यवर्ग को एयर मार्शल वाला तथ्य थोड़ा परेशान कर सकता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देशभक्ति और ईमानदारी के शब्दकोश में फौजी शब्द बेहद महत्वपू्र्ण है। यह ट्रेंड दुनिया भर में लगभग एक जैसा है। अभी हाल ही में अपने चुनाव प्रचार में बराक ओबामा ने देशभक्ति साबित करने के लिए यह जोर देकर कहा कि उनके दादा अमेरिकी सेना में रह चुके हैं। फौज की पात्रता पूरी नहीं करने वाले लोग एनसीसी वगैरह से ही काम चला लेते हैं। अन्ना हज़ारे ने अपने साल भर वैलिडिटी वाले आंदोलन में कई-कई बार अपनी फौजी पृष्ठभूमि और अविवाहित बने रहने कीख़ासियत पर ज़ोर दिया। लेकिन भारत में यह सर्वे का एक मजेदार विषय है कि सेना से रिटायर होने वाले अधिकारी बाद के दिनों में करते क्या हैं? निजी सुरक्षा एजेंसी खोलने से लेकर ट्रांसपोर्ट के धंधे में उतरने और खनन के काम में बड़ी संख्या में इन भूतपूर्व फौजियोंका दख़ल है। रियायती दरों पर कई पट्टे इन्हें हासिल होते हैं। कई धंधों में इन्हें ख़ास सहूलियत दी जाती है, लिहाजा पैसे वाली पार्टी के साथ सांठ-गांठकर कर ये गेम करते हैं। फ़ायदा दोनों का होता है। सामान्य ज्ञान के इस प्रश्न का उत्तर सब जानते हैं कि सफ़ेद सोना कपास को और काला सोना कोयला को कहते हैं।
मोर्चे पर जाते हुए डेंजल कीलोर की जवानी की तस्वीर
 
फ़ौजियों की गड़बड़ी, धोखाधड़ी को अमूमन ढंक दिया जाता है। मोराल डाउन होने जैसी भविष्यवाणियों के तले। संयोग देखिए कि इस कोलगेट में डेंजल कीलोर साहब का नाम सामने आया (टीवी चैनलों, अख़बारों में मत ढूंढिए, नहीं मिलेगा) और सबने देखा कि संसद संत्र में गतिरोध पैदा करने के साथ-साथ मनमोहन सिंह के इस्तीफ़े पर बीजेपी किस तरह अड़ी। इससे पहले 2जी को लेकर बीजेपी ने लगातार चिदंबरम का बहिष्कार किया, लेकिन दशक भर पहले फ़ौजियों के ताबूत घोटाला (कोफिनगेट) मामले में जब तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का नाम आया था तो कांग्रेस ने संसद नहीं चलने दी थी और दो साल तक फ़र्नांडीस का बहिष्कार किया था। बहिष्कार-बहिष्कार बराबर। संसद ठप्प-संसद ठप्प बराबर। कोयला खदान तब भी बंट रहे थे, अब भी बंट रहे हैं।  
 
लोहा, स्टील, सीमेंट और सबसे ज़्यादा बिजली बनाने के नाम पर जो कोयला खदान हासिल किए गए उनमें से ज़्यादातर खदानों का कंपनियों ने इस्तेमाल नहीं किया। चूंकि जिन उद्देश्यों के लिए खदान लिए जा रहे थे, उनमें कई दिक्कतें थीं। मसलन, पावर प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए कंपनी को मध्यप्रदेश में ज़मीन मिली ही नहीं है लेकिन महाराष्ट्र का कोयला खदान कंपनी ने अपने नाम करवा लिया। बाद में पता चला कि मध्यप्रदेश में कंपनी को पर्यावरण लायसेंस नहीं मिला। अब खदान पड़ा हुआ है। फ़ौजी, कॉरपोरेट और नेताजी को सस्ता खदान मिल गया। कभी-न-कभी खोद ही डालेंगे। दशक भर पहले लक्ष्य बनाया गया था कि सन 2012 तक हर गांव में बिजली पहुंच जाएगी, लेकिन कुछ हफ़्ते पहले देश का तीन बिजली ग्रिड फेल होने के बाद पूरा उत्तरी और पूर्वी हिस्सा अंधेरे में डूब गया था। न बिजली, न सीमेंट का उत्पादन, सिर्फ़ कोयला खदान का हुआ आवंटन!   

19 सितंबर 2012

कोयला के बदले पावर प्लांट मिले तो क्या दिक्कत!


-दिलीप खान

खुदरा क्षेत्र में एफ़डीआई, डीज़ल में मूल्यवृद्धि और रियायती दर पर रसोई गैस सिलेंडर हासिल करने का कोटा तय करने के बीच कोयला का मामला दब गया सा लगता है। मुद्दे आधारित राजनीति में नया मुद्दा आते ही पुराना मुद्दा किसी झाड़ी तले ढंक जाता है। लेकिन कोयला ब्लॉक की समीक्षा कर रही अंतर-मंत्रालयी समूह में जिस तरह की पड़ताल हो रही है और जैसे नतीजे सामने आ रहे हैं वो कई दफ़ा चौंकाते भी हैं। जिन 58 कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी हुए थे, उनमें से महज 29 की जांच हो पाई है और इनमें से आईएमजी ने सिर्फ़ 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की कोयला मंत्रालय से सिफ़ारिश की है। शुरुआत में 142 में से 58 को जांच पड़ताल के बाद सिर्फ़ इस आधार पर कारण बताओ नोटिस भेजा गया था कि इन सबकी प्रगति काफ़ी ढीली थी।

आईएमजी ने जिन 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की
ब्लॉक का नाम
राज्य
कंपनी का नाम
क्षमता
आवंटन वर्ष
चिन्होरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
2 करोड़ टन
2003
बरोरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
1.8 करोड़ टन
2003
लालगढ़ उत्तरी
झारखंड
डोमको स्मोकलेस फ्यूल्स
3 करोड़ टन
2005
ब्रह्मडीह
झारखंड
कैस्ट्रॉन माइनिंग
20 लाख टन
1996
रावणवाड़ा उत्तरी कोयला ब्लॉक
मध्य प्रदेश
एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड

2006
नई पात्रापाड़ा कोयला ब्लॉक
उड़ीसा
भूषण स्टील लिमिटेड एंड अदर्स
31.6 करोड़ टन
2006
गौरंगडीह एबीसी कोयला ब्लॉक
प. बंगाल
हिमाचल ईएमटीए पावर लिमिटेड और जेएसडब्लू स्टील लिमिटेड
6.15 करोड़ टन
2009
मचेरकुंडा ब्लॉक
झारखंड
बिहार स्पॉन्ज आयरन एंड स्टील

2008

आईएमजी की अगुवाई कर रही अतिरिक्त सचिव ज़ोहरा चटर्जी 21 तारीख़ को अमेरिका दौरे पर जा रही हैं और ऐसे में ये साफ़ लग रहा है मंगलवार को मचेरकुंडा ब्लॉक रद्द करने का फ़ैसला इस चरण का लगभग आख़िरी फ़ैसला है। निर्भीक और निष्पक्ष आईएमजी रिलायंस, टाटा, आर्सेलर-मित्तल और हिंडालको (बिड़ला समूह की कंपनी) से सवाल-जवाब करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि इनके खदानों को बरकरार रखा जाय। सारे बड़े घरानों के ब्लॉक बच गए। अंबानी, टाटा, मित्तल, बिड़ला। सबके। राजनीतिक गलियारे में जिन नेताओं के घर में कोयले का धुंआ उठ रहा था, उनपर पानी गिराया गया ताकि धुंए का गुबार शांत हो जाए। जाहिर है इसके लिए कुछ आवंटन रद्द भी करने पड़े। मिसाल के लिए पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय की चारों ओर थू-थू हो रही थी कि उन्होंने यह जानकारी छुपाते हुए प्रधानमंत्री (तत्कालीन कोयला मंत्री) मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड को खदान देने की सिफ़ारिश की थी कि उनका भाई सुधीर कुमार सहाय इस कंपनी का मानद निदेशक है। मंत्रालय ने अभूतपूर्व तेजी दिखाते हुए इस ब्लॉक को हरी झंडी दी थी। इसी तरह जायसवाल समूह के नाम पर घिरे मौजूदा कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी मंत्रालय से इतर कुछ कार्रवाई के चलते अपने दाग को मलिन होते देख रहे हैं। अभिजीत समूह की तीन कंपनियों जेएएस इंफ्रास्ट्रक्चर, जेएलडी यवतमाल और एएमआर आयरन एंड स्टील के मालिक भाइयों अरविंद जायसवाल और मनोज जायसवाल को सीबीआई ने पूछताछ की। इसी कंपनी के साथ कांग्रेस सांसद विजय दर्डा का नाम जुड़ा है। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि इन दोनों जायसवाल भाइयों ने विजय दर्डा को 26 फ़ीसदी हिस्सेदारी इस आधार पर देने की पेशकश की थी कि वो मंत्रालय से हरी झंडी दिलवाने में जायसवाल की मदद करें।

लेकिन खेल का मैदान काफ़ी चौड़ा है। इधर कोयला मंत्रालय इन कंपनियों के आवंटन रद्द कर रही है और उधर ऊर्जा मंत्री वीरप्पा मोइली इन कंपनियों को भविष्य में पावर प्लांट देने की बात कहकर ये यक़ीन दिला रहे हैं कि देश में कंपनियों द्वारा बरती गई अनियमितताओं को जुर्म के खांचे में रखने की मांग करने वाले लोग निरा बेवकूफ़ है। कंपनियों को किस तरह का घाटा होगा? मान लीजिए किसी सुबोधकांत सहाय के भाई को कोयला ब्लॉक के बदले पावर प्रोजेक्ट मिल जाए तो इसमें उन्हें क्या हर्ज हो सकता है? बड़ी बात यह कि राजनीतिक सफ़ेदी बरकरार रहते हुए ऐसा हो जाए तो क्यों नहीं कोयला खदान रद्द करावाए कोई? 10 ब्लॉकों के लिए अब तक 8 कंपनियों को बैंक गारंटी जमा करने या बैंक गारंटी रद्द करने की भी आईएमजी ने सिफ़ारिश की है।

कांग्रेस महकमे में आईएमजी की सिफ़ारिश को शो-रूम के बाहर सजे-धजे मॉडल्स की तरह पेश किया जा रहा है। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि आईएमजी के जरिए सरकार ही कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में पारदर्शिता बरतने की पहलकदमी कर रही है। उनके मुताबिक सरकार हमेशा धांधली के ख़िलाफ़ रही है और इसीलिए कंपनियों के आवंटन रद्द हो रहे हैं। लेकिन शर्मा ने यह नहीं बताया कि उनकी ईमानदार सरकार ने कैग की रिपोर्ट से पहले यह कदम क्यों नहीं उठाया? पहले दिन यानी 13 सितंबर को आईएमजी ने जिन चार कंपनियों को रद्द करने (टेबल में ऊपर की चार कंपनियां) की सिफ़ारिश की उनमें से सिर्फ़ एक कंपनी को यूपीए के शासनकाल में ब्लॉक आवंटित किया गया और बाकी तीन कंपनियां एनडीए के जमाने वाली थीं। यहां दो बातें साफ़ होती हैं। पहली, जो बीजेपी 17 अगस्त को संसद में कैग की रिपोर्ट पेश होने के बाद पूरे मानसून सत्र में सदन के भीतर नारेबाजी करके गला ख़राब करती रही, उसके जमाने में भी ऐसे ही कोयला खदान बांटे जाते रहे हैं। जाहिर है बीजेपी का मौजूदा विरोध किसी कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ न होकर यूपीए सरकार के साथ लगभग नत्थी हो चले घोटालों की श्रृंखला को लपककर राजनीतिक लाभ लूटने की है। दूसरी, आईएमजी ने पहले दिन ज़्यादातर एनडीए के जमाने में आवंटित हुए  कोयला खदानों को रद्द करने की सिफ़ारिश कर यूपीए सरकार को ये मौका दिया कि अब वो डीज़ल, रसोई गैस और एफ़डीआई पर खेल खेल सकती है क्योंकि कोयला पर एनडीए को आईना दिखाने वाली रिपोर्ट सामने है। यह महज संयोग नहीं है कि ठीक उसी दिन (13 सितंबर को) यूपीए ने डीज़ल और रसोई गैस वाला फ़ैसला लिया और अगले दिन, 14 सितंबर (जब हिंदी पट्टी के बुद्धिजीवी हिंदी दिवस मनाने में मशगूल थे) को खुदरा बाज़ार में 51 फ़ीसदी एफडीआई का।

सवाल अपनी जगह कायम है। कॉरपोरेट लूट और इसमें राजनीतिक सहभागिता पर लगाम कसने की कोशिश जिस संरचना के जरिए की जा रही है उसमें पार्टियों के बीच ज़्यादा फर्क नहीं है। भाजपा अथवा कांग्रेस सिर्फ़ विपक्ष में आने पर ही विरोध का स्वर अलापते हैं वरना नीतिगत स्तर पर दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। इसके कई उदाहरण अतीत में देखे गए हैं। गुजरे साल दिल्ली में कुछ किलोमीटर के अंतर में ही एक जगह भाजपा के लोग आदर्श सोसाइटी में हुए भ्रष्टाचार को लेकर धरने पर बैठे थे तो दूसरी जगह कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही कांग्रेस बैठी थी। मुद्दे और जगह में पाए जाने वाले अंतर को दरअसल सैद्धांतिक अंतर के तौर पर पेश करने की शातिराना राजनीति की जब परत उघड़ने लगती है तो नया शिगूफ़ा छोड़कर उसे शांत कर दिया जाता है। वरना इस नीति के साथ कोयला आवंटन पहली बार यूपीए ने तो किया नहीं। 1993 से यही नीति अमल में लाई जा रही है। और घोटाला अगर है तो सिर्फ़ 2004 से ही नहीं है...और अगर नहीं है तो फिर कोई सवाल ही नहीं है।