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03 फ़रवरी 2016

एक लेखक को मारने के हज़ार तरीके

पंकज मिश्रा 

पंकज मिश्रा अंग्रेज़ी के प्रतिष्ठित लेखक हैं और राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर टिप्‍पणी लिखते हैं। उनकी यह टिप्‍पणी 2 फरवरी, 2016 को दि गार्डियन में प्रकाशित हुई है। हम इसे वहीं से साभार ले रहे हैं। सारी तस्‍वीरें भी वहीं से साभार हैं। अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव का है। 

अरुंधति रॉय के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। ज़ाहिर है, मोदी की सरकार ने कला और विचार के खिलाफ़ इस अपराध के मौका-ए-वारदात पर अपनी उंगलियों के कोई निशान नहीं छोड़े हैं।
मिस्र और तुर्की की सरकारें इस समय लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों पर चौतरफा हमले की अगुवाई में पूरी ढिठाई से जुटी हुई हैं। तुर्की के राष्‍ट्रपति रेसेप तयिप एर्दोगन ने पिछले महीने तुर्की के अकादमिकों द्वारा अपनी आलोचना को खारिज करते हुए उन्‍हें विदेशी ताकतों की देशद्रोही कठपुतलियों की संज्ञा दे डाली थी, जिसके बाद से कई को निलंबित और बरखास्‍त किया जा चुका है। तुर्की और मिस्र दोनों ने ही अपने यहां पत्रकारों को कैद किया है जिसका विरोध अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के प्रदर्शनों में देखने को मिल चुका है। भारत, जिसे औपचारिक तौर पर मुक्‍त लोकतांत्रिक संस्‍थानों के देश के रूप में अब तक जाना जाता रहा है, वहां बौद्धिक और रचनात्‍मक आज़ादी का दमन हालांकि कहीं ज्‍यादा कुटिल तरीके अख्तियार करता जा रहा है।

उच्‍च जाति के हिंदू राष्‍ट्रवादियों द्वारा नियंत्रित भारतीय विश्‍वविद्यालय बीते कुछ महीनों से अपने पाठ्यक्रम और परिसरों से ''राष्‍ट्र-विरोधियों'' को साफ़ करने में जुटे हुए हैं। पिछले महीने एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में हैदराबाद के एक शोध छात्र रोहित वेमुला ने अपनी हत्‍या कर ली। भारत की एक परंपरागत रूप से वंचित जाति से आने वाले इस गरीब शोध छात्र पर ''राष्‍ट्र-विरोधी विचारों'' का आरोप मढ़कर पहले इसे निलंबित किया गया और बाद में उसका वजीफा बंद कर के छात्रावास से बाहर निकाल दिया गया। दिल्‍ली में बैठी मोदी सरकार द्वारा विश्‍वविद्यालय प्रशासन को भेजे एक पत्र में इस तथ्‍य का उद्घाटन हुआ कि प्रशासन पर परिसर में मौजूद ''अतिवादी और राष्‍ट्र-विरोधी राजनीति'' पर कार्रवाई करने का भारी दबाव था। वेमुला का हृदयविदारक सुसाइड नोट एक प्रतिभाशाली लेखक और विचारक के क्षोभ और अलगाव की गवाही देता है।

उच्‍च जाति के राष्‍ट्रवादियों का विस्‍तारित कुनबा अब सार्वजनिक दायरे में अपना प्रभुत्‍व स्‍थापित करने को अपना स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य बना चुका है, लेकिन अपने आभासी दुश्‍मनों को कुचलने के लिए वे इस विशालकाय राज्‍य की ताकत को ही अकेले अपना औज़ार नहीं बना रहे, जैसा कि स्‍थानीय और विदेशी आलोचक पहली नज़र में समझ बैठते हैं। यह काम व्‍यक्तिगत स्‍तर पर पुलिस के पास दर्ज शिकायतों और निजी कानूनी याचिकाओं के रास्‍ते भी अंजाम दिया जा रहा है- भारत में लेखकों और कलाकारों के खिलाफ तमाम आपराधिक शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल कायम कर देते हैं जहां दुस्‍साहसी गिरोह अखबारों के दफ्तरों से लेकर कला दीर्घाओं और सिनेमाघरों तक पर हमला करने की खुली छूट हासिल कर लेते हैं।

अपने संदेश को प्रसारित करने के लिए वे तमाम तरीकों से माध्‍यमों का इस्‍तेमाल करते हैं और इस तरह से वे माध्यमों को संदेश में रूपांतरित कर डालते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी के करीबी बड़े कारोबारी आज भारतीय टेलीविज़न पर बर्लुस्‍कोनी की शैली में तकरीबन कब्‍ज़ा जमा चुके हैं। हिंदू राष्‍ट्रवादियों ने अब नए मीडिया को अपने हक़ में इस्‍तेमाल करने और जनधारणा को प्रभावित करने की तरकीब भी सीख ली है: एर्दोगन के शब्‍दों में कहें, तो वे अपने लक्षित श्रोताओं को गलत सूचनाओं के सागर में डुबोने के लिए सोशल मीडिया पर एक ''रोबोट लॉबी'' को तैनात करते हैं, तब तक, जब तक कि दो और दो मिलकर पांच न दिखने लगे।  

कारोबार, शिक्षण तंत्र और मीडिया के भीतर ऐसे संस्‍थानों और व्‍यक्तियों की पहचान करना बिलकुल संभव है जो सत्‍ताधारी दल की पहरेदारी करने में जुटे हुए हैं और उसी के आदेश पर कुत्‍ते की तरह हमला करने को दौड़ पड़ते हैं। चापलूस संपादकों से लेकर पीछा करने वाले हुड़दंगी गिरोहों तक फैला राजनीतिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक सत्‍ता का यह जकड़तंत्र साथ मिलकर प्रवृत्तियों का निर्माण करता है और धारणाओं को नियंत्रित करता है। इनकी सामूहिक ताकत इतनी ज्‍यादा है कि रोहित वेमुला के मुकाबले किसी कमज़ोर व्‍यक्ति के ऊपर तो वे तमाम रास्‍तों से चौतरफा दबाव बना सकते हैं।

पिछले हफ्ते जब उपन्‍यासकार अरुंधति रॉय को ''न्यायालय की अवमानना'' के मामले में अचानक आपराधिक सुनवाई झेलनी पड़ी जिसके चलते उन्‍हें जेल भी हो सकती है, उसी दौरान एक संदेश प्रसारित किया गया कि यह लेखिका रोहित वेमुला की हत्‍या में लिप्‍त उन ईसाई मिशनरियों के षडयंत्र का हिस्‍सा है जो भारत को तोड़ना चाहते हैं। इस घटिया और मनगढ़ंत बकवास को इतनी आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता था। इसके बाद भारत के मुख्‍यधारा के मीडिया में उदासीनता के साथ ही सही जो खबर चली, वह किसी को भी यह मानने को बाध्‍य कर देती कि रॉय की जवाबदेही तो बनती ही है।

वास्‍तविकता यह है कि जिसे रॉय की अदालती ''अवमानना'' बताया जा रहा है, वह पिछले साल मई में प्रकाशित उनका एक लेख है जिसमें उन्‍होंने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अंग्रेज़ी के लेक्‍चरार साईबाबा के उत्‍पीड़न की ओर ध्‍यान दिलाया था, जो गंभीर रूप से विकलांग हैं और जिन्‍हें पुलिस ने अगवा कर के ''राष्‍ट्र-विरोधी गतिविधियों'' के आरोप में जेल में कैद किया हुआ है। लेख में रॉय की दलील थी कि दर्जनों हत्‍याओं में दोषी मोदी के सहयोगियों को यदि ज़मानत मिल सकती है तो वीलचेयर पर चलने वाले उस शख्‍स को भी मिल सकती है जिसकी सेहत वैसे भी लगातार गिरती जा रही है।

सात महीने बाद नागपुर के एक जज ने ज़मानत को खारिज करते हुए रॉय को ''अश्‍लील'', ''असभ्‍य'', ''अशिष्‍ट'' और ''बेअदब'' व्‍यक्ति करार देते हुए कहा कि यह लेख साईबाबा को ज़मानत पर बाहर निकालने के एक जघन्‍य ''गेमप्‍लान'' का हिस्‍सा है जिसे अदालत अपनी अवमानना के तौर पर लेती है (जबकि सचाई यह है कि रॉय का लेख जब प्रकाशित हुआ था उस वक्‍त साईबाबा की ज़मानत की अर्जी लंबित नहीं थी, न ही किसी लंबित कानूनी प्रक्रिया की मांग करते हुए रॉय ने अदालत के किसी फैसले या जज की कोई आलोचना ही की थी)। जज ने आरोप लगाया कि रॉय ''भारत जैसे अतिसहिष्‍णु देश'' के खिलाफ प्रचार करने के लिए ''प्रतिष्ठित पुरस्‍कारों'' का इस्‍तेमाल कर रही हैं जो ''उन्‍हें मिले बताए जाते हैं''। रॉय इधर बीच अपने दूसरे उपन्‍यास पर काम कर रही हैं। इस अदालती फैसले से वे अचानक उन लोगों की दुश्‍मन बना दी गई हैं ''जो देश में गैरकानूनी और आतंकी गतिविधियों को रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं''।
आपको भी ऐसा विश्वास करने में कोई दिक्‍कत नहीं होती यदि आपने हाल ही में रॉय पर बनाई गई एक लघु फिल्‍म भारत के सवाधिक लोकप्रिय टीवी चैनलों में से एक पर देख ली होती, जिसे ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ेज़ चलाता है जो भारत की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में एक है और मोदी का सबसे जोशीला चीयरलीडर भी है। नवंबर में प्रसारित इस फिल्‍म का दावा है कि एक राष्‍ट्र-विरोधी तत्‍व का 'सच्‍चा'' और पूरी तरह कलंकित चेहरा अपने दर्शकों को दिखाना ही उसका उद्देश्‍य है।

इस तरह कानून की अदालत समेत जनमानस में भी रॉय के संभावित दुश्‍मन तैयार कर दिए गए हैं और उन्‍हें सबसे निपटना है; इन सबकी उलाहनाएं और झूठे आरोप न केवल रॉय की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं, बल्कि दुनियावी कोलाहल और बाधाओं से उस तुलनात्‍मक राहत को भी नष्‍ट कर रहे हैं जिसके आसरे एक लेखक अपने कमरे में महफ़ूज़ होकर लिखता-पढ़ता है। ज़ाहिर है, मोदी की सरकार ने कला और विचार के खिलाफ़ इस अपराध के मौका-ए-वारदात पर अपनी उंगलियों के कोई निशान नहीं छोड़े हैं। इसी तरह भारत जैसे एक औपचारिक लोकतंत्र में कलाकारों और बुद्धिजीवियों का दमन कई जटिल स्‍वरूपों में हमारे सामने आता है।
इसमें न सिर्फ एक बर्बर सत्‍ता की ओर से बंदिशें तारी की जाती हैं, बल्कि उसके शिकार कमज़ोर व्‍यक्तियों की ओर से खुद पर ही बंदिशें लगा ली जाती हैं। बात इससे भी ज्‍यादा व्‍यापक इसलिए है क्‍योंकि यह सब कुछ दरअसल सार्वजनिक व निजी नैतिकता के धीरे-धीरे होते जा रहे पतन पर टिका हुआ है, जहां घेर कर आखेट करने वाली भीड़ की सनक बढ़ती जाती है तो नागरिक समाज का लहजा भी मोटे तौर पर तल्‍ख़ होता जाता है। इस स्थिति के बनने में पंचों से लेकर मसखरों तक की बराबर हिस्‍सेदारी होती है।

जिस दिन नागपुर में रॉय आपराधिक सुनवाई का सामना कर रही थीं, संयोग से उसी दिन जयपुर लिटररी फेस्टिवल में अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर एक परिचर्चा रखी गई थी, जिसका प्रायोजक ज़ी है। ''क्‍या अभिव्‍यक्ति की आज़ादी निरपेक्ष होनी चाहिए''? इस विषय के खिलाफ़ सबसे उज्‍जड्ड तर्क रखने वाले और कोई नहीं बल्कि अनुपम खेर थे, जो बॉलीवुड में अपने नाटकीय मसखरेपन के लिए जाने जाते हैं। पिछले नवंबर में खेर ने उन भारतीय लेखकों के खिलाफ एक प्रदर्शन आयोजित किया था जिन्‍होंने तीन लेखकों की हत्‍या और मुस्लिमों व दलितों के क़त्‍ल के खिलाफ विरोध में अपने-अपने साहित्यिक पुरस्‍कार लौटा दिए थे। ''लेखकों को जूते मारो'' जैसे नारे लगाने के बाद उन्‍होंने दिल्‍ली में प्रधानमंत्री के सरकारी आवास पर मोदी के साथ तस्‍वीरें खिंचवाई थीं।

परदे पर एक विक्षुब्‍ध मसखरे से राजनीति में एक खतरनाक भांड़ में कायांतरित हो चुके अनुपम खेर की एक साहित्यिक समारोह में मौजूदगी तब भी उतनी ही बुरी होती अगर उन्‍होंने वहां ''मोदी, मोदी'' चिल्‍ला रहे श्रोताओं के बीच अपनी मुट्ठी नहीं लहरायी होती या फिर उन्‍होंने या दूसरे वक्‍ताओं ने अरुंधति रॉय का जि़क्र ही कर दिया होता। लेकिन तब, कम से कम एक जीवंत मेधा और वैयक्तिक चेतना की बढ़ती जा रही उपेक्षा- और उसके बढते अनुकूलन- के बारे में कुछ बात आ जाती। आदम मीत्‍सकेविच से लेकर रबींद्रनाथ टैगोर तक तमाम लेखकों ने कभी राष्‍ट्रीय चेतना को अपने लेखन से जीवंत किया था। आज हिंदू राष्‍ट्रवादी राष्‍ट्रीय चेतना के समक्ष इस बात का प्रदर्शन कर रहे हैं कि एक लेखक की हत्‍या कितने तरीकों से की जा सकती है।
साभार: जनपथ 

06 नवंबर 2015

अरुंधति रॉय मैं अपना पुरस्कार क्यों लौटा रही हूँ

हालांकि मैं यह नहीं मानती कि पुरस्कार हमारे काम को मापने का कोई पैमाना होते हैं, मैं लौटाए गए पुरस्कारों के बढ़ते ढेर में 1989 में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए जीता गया अपना राष्ट्रीय पुरस्कार जोड़ना चाहूंगी. इसके अलावा, मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं यह पुरस्कार इसलिए नहीं लौटा रही हूँ क्योंकि मैं मौजूदा सरकार द्वारा पोसी जा रही उस चीज को देखकर "हैरान" हूँ जिसे "बढ़ती असहिष्णुता" कहा जा रहा है. सबसे पहले तो यह कि इंसानों की पीट-पीट कर हत्या, उन्हें गोली मारने, जलाकर मारने और उनकी सामूहिक हत्या के लिए "असहिष्णुता" गलत शब्द है. दूसरे, भविष्य में क्या होने वाला है इसके कई संकेत हमें पहले ही मिल चुके थे, इसलिए इस सरकार के भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ उसके लिए मैं हैरान होने का दावा नहीं कर सकती. तीसरे, ये भयावह हत्याएँ एक गंभीर बीमारी का लक्षण भर हैं. जीते-जागते लोगों की ज़िंदगी नर्क बनकर रह गई है. करोड़ों दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और ईसाइयों की पूरी-पूरी आबादी दहशत में जीने के लिए मजबूर है कि क्या पता कब और किस तरफ से उनपर हमला बोल दिया जाए.आज हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जिसमें नई व्यवस्था के ठग और गिरोहबाज जब "अवैध वध" की बात करते हैं तो उनका मतलब क़त्ल कर दिए गए जीते जागते इंसान से नहीं, मारी गई एक काल्पनिक गाय से होता है. जब वे घटनास्थल से "फॉरेंसिक जांच के लिए सबूत" उठाने की बात करते हैं तो उनका मतलब मार डाले गए आदमी की लाश से नहीं, फ्रिज में मौजूद भोजन से होता है. हम कहते हैं कि हमने "प्रगति" की है लेकिन जब दलितों की हत्या होती है और उनके बच्चों को ज़िंदा जला दिया जाता है तो हमला झेले, मारे जाने, गोली खाए या जेल जाए बिना आज कौन सा लेखक बाबासाहब अम्बेडकर की तरह खुलकर कह सकता है कि, "अछूतों के लिए हिंदुत्व संत्रासों की एक वास्तविक कोठरी है"? कौन लेखक वह सब कुछ लिख सकता है जो सआदत हसन मंटो ने "अंकल सैम के लिए पत्र" में लिखा? इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि हम कही जा रही बात से सहमत हैं या असहमत. यदि हमें स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं होगा तो हम बौद्धिक कुपोषण से पीड़ित एक समाज में, मूर्खों के एक देश में बदलकर रह जाएंगे. पूरे उपमहाद्वीप में पतन की एक दौड़ चल रही है जिसमें नया भारत भी जोशो खरोश से शामिल हो गया है. यहां भी अब सेंसरशिप भीड़ को आउटसोर्स कर दी गई है.मुझे बहुत खुशी है कि मुझे (काफी पहले के अपने अतीत से कहीं) एक राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया है जिसे मैं लौटा सकती हूँ क्योंकि इससे मुझे देश के लेखकों, फिल्मकारों और शिक्षाविदों द्वारा शुरू किए गए एक राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा होने का मौका मिल रहा है. वे एक प्रकार की वैचारिक क्रूरता और हमारी सामूहिक बौद्धिकता पर हमले के विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं. यदि इसका मुकाबला हमने अभी नहीं किया तो यह हमें टुकड़े-टुकड़े कर बहुत गहरे दफ़न कर देगा. मेरा मानना है कि कलाकार और बुद्धिजीवी इस समय जो कर रहे हैं वह अभूतपूर्व है जिसकी इतिहास में कोई मिसाल नहीं है. यह अलग साधनों से की जा रही राजनीति है. इसका हिस्सा होना मेरे लिए गर्व की बात है. और आज इस देश में जो हो रहा है, उसपर मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ.पुनश्च: रिकार्ड के लिए यह भी बता दूँ कि 2005 में कांग्रेस की सत्ता के दौरान मैंने साहित्य अकादमी सम्मान ठुकरा दिया था. इसलिए कृपया कांग्रेस बनाम भाजपा वाली पुरानी बहस से मुझे बख्शे रहें. अब बात इस सबसे काफी आगे निकल गई है. धन्यवाद!      (अनुवाद: मनोज पटेल)

23 अप्रैल 2014

चुनावों की चालबाजियां: आनंद तेलतुंबड़े


मौजूदा चुनावी प्रक्रिया, इसके जातीय पहलू और जनता के हितों के अनुकूल एक मुनासिब चुनावी प्रणाली के विकल्पों पर आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. द हिंदू में  प्रकाशित, अनुवाद: रेयाज उल हक

कुछ ही दिनों में सोलहवें आम चुनावों की भारी भरकम कसरत पूरी हो जाएगी. और इसी के साथ भारत के सिर पर लगे दुनिया के सबसे महान कार्यरत लोकतंत्र के ताज में एक और हीरा जड़ जाएगा, जबकि यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेचारगी और छीन ली गई आवाजों के साथ अपने वजूद के संघर्ष में फिर से जुट जाएंगे. लोकतंत्र के कुछ महीने लंबे नाच के आखिर में चुने हुए प्रतिनिधि बच जाएंगे जो अपने करोड़ों के निवेश पर पैसे बनाने के धंधे में लग जाएंगे. इस गरीब देश को चुनावों की इस प्रक्रिया की जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसकी तुलना सिर्फ अमेरिका से ही हो सकती है (ऐसा कहा गया है कि भारतीय राजनेता 2012 के पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में खर्च की गई 7 बिलियन डॉलर की राशि के बरअक्स 5 बिलियन डॉलर खर्च करने वाले हैं) और इस पूरी प्रक्रिया में वे सब साजिशें और छल-कपट किए जाते हैं, जिनकी कल्पना कोई इन्सान कर सकता है. जाहिर है कि तब इन सबकुछ को सिर्फ मुट्ठी भर अमीरों के निजाम और अपराधों के जरिए ही कायम रखा जा सकता है. चूंकि हकीकत में ऐसा ही होता रहा है, इसलिए इस पर गौर करना होगा कि भारत की खामियों को तलाशते हुए चुनावों की इस प्रक्रिया की पड़ताल जरूरी है.

जनता के साथ धोखा

उदारवादी ढांचे में प्रत्यक्ष लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. चुनावों का मकसद लोकतंत्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों को चुनना है. हालांकि लोगों की पसंद राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों और कुछ निर्दलियों तक सीमित होती है, जिनमें से ज्यादातर तो मुख्य राजनीतिक दलों के चुनावी गुना-भाग में मदद करने के लिए कठपुतली उम्मीदवार के रूप में खड़े होते हैं. यही वजह है कि बिना किसी काम का सबूत दिए, चुनाव दर चुनाव समान लोगों का समूह चुना जाता रहा है. यह पूरी प्रक्रिया [बाकियों के] भीतर दाखिल होने की रुकावट के रूप में काम करती है. मिसाल के लिए, लोक सभा के उम्मीदवार को अधिकतम 75 लाख रुपए खर्च करने की इजाजत है, यह खर्च सिर्फ मुख्यधारा के राजनीतिक दल ही उठा सकते हैं. लेकिन असली खर्च तो इससे कई गुना ज्यादा होता है. अगर चुनावों में कोई भारी पूंजी लगाने का जोखिम उठाता है, तो सैद्धांतिक रूप से इस निवेश पर उसे फायदा भी होना चाहिए. चूंकि इसका [कानूनन] कोई फायदा नहीं है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है. इसने राजनीति को टिकटों के बड़े कारोबार में बदल दिया है, जिसमें बेजोड़ मुनाफा है और यह सब लोगों की नजरों से छुपा हुआ होता है. नेता सामंत बन जाते हैं और निर्वाचन क्षेत्र उनकी जागीर, जिसकी किलेबंदी बाहुबल और धनबल से होती है.

एक एनजीओ एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के सौजन्य से चुनावों में हिस्सा लेने वाले नेताओं के बारे में जानकारी अब सरेआम है. नेता चुनाव आयोग को जो हलफनामे जमा करते हैं, एडीआर ने उनमें से जानकारियां जुटा कर उन्हें इस तरह पेश किया है कि लोग समझ सकें. हालांकि ये आंकड़े नेताओं द्वारा खुद कबूल किए जाते हैं और इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि उन्हें बहुत घटा कर बताया जाता होगा लेकिन इसके बावजूद इन आंकड़ों से यह उजागर होता है प्रतिनिधियों में करोड़पतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. पंद्रहवीं लोकसभा चुनावों में 1205 करोड़पति उम्मीदवार थे, जिनमें से 300 से ज्यादा संसद में पहुंचे. अपराधों के आंकड़े भी उनकी बढ़ती हुई दौलत के साथ बढ़ते जाते हैं और ये सभी दलों में मौजूद हैं. दो मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा से जुड़े करोड़पति सांसदों की संख्या 2004 में क्रमश: 29 और 26 थी, जो 2009 में बढ़ कर 42 और 41 हो गई. ये उस जनता, उस व्यापक बहुसंख्या के प्रतिनिधि थे जो 20 रुपए रोज पर गुजर करती है! हरेक चुनाव में उनकी बेपनाह दौलत के बढ़ने की दर इससे भी अधिक दिलचस्प है. एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच (एनइडब्ल्यू) ने अपने विश्लेषण में पाया कि फिर से चुनाव लड़ रहे 317 उम्मीदवारों की दौलत 1000 प्रतिशत बढ़ गई थी. ये दरें तो कॉरपोरेट दुनिया में भी नहीं सुनी जाती हैं. एक औसत क्षमता का इंसान, जो ऊपर से गरीबों की सेवा में लगा हो, यहां बेहतरीन फंड प्रबंधकों को मात दे देता है! आम मामलों में ऐसे सबूत आयकर और भ्रष्टाचार-निरोधक अधिकारियों के कान खड़े कर देते हैं, लेकिन इन दौलतमंदों के राजनीतिक रिश्ते उन्हें ऐसे दुनियावी खतरों से बचाए रखते हैं. यहां इस दौलत के स्रोतों के बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा रहा है, जबकि यह जानी हुई बात है कि पूरी मशीनरी जनता के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और दूसरे धन्ना सेठों के लिए काम करती है.

चुनावों की पद्धति

जब भारत आजाद हुआ, तो नए शासकों के सामने सबड़े बड़ी चुनौती जनता की वे उम्मीदें थीं, जो आजादी के संघर्ष के दौरान पैदा हुई थीं. ये उम्मीदें क्रांति के बाद के रूस (सोवियत संघ) द्वारा हासिल की गई शानदार तरक्की, दूसरे विश्व युद्ध के बाद की कल्याणकारी तौर-तरीकों और पड़ोसी चीन में क्रांति जैसी घटनाओं से कई गुना बढ़ गई थीं. सत्ता हस्तांतरण के दौरान भड़की सांप्रदायिक उथल पुथल, रियासतों के रूप में मौजूद 600 राजनीतिक इकाइयों का भारत के भीतर एकीकरण, देश के कुछ इलाकों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हथियारबंद संघर्षों और निचली जातियों के उभार ने एक साथ मिल कर नए शासकों के सामने एक भारी चुनौती पेश की थी. उन्होंने जो गणतांत्रिक संविधान बनाया था, उसमें इन उम्मीदों की झलक थी. हालांकि वास्तविक अर्थों में, सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी, बुर्जुआ हितों की प्रतिनिधित्व करती थी और उसे बड़ी कारीगरी से उसे बढ़ावा भी देना था. एक तरफ जनता की उम्मीदों को पूरा करने का दिखावा करने की जरूरत और दूसरी तरफ वास्तव में पूंजी के हितों को बढ़ावा देने से एक तनाव पैदा हुआ. यह तनाव इसकी एक के बाद एक बेईमानी भरी कार्रवाइयों की श्रृंखला में भी दिखा. समाजवादी दिखावे के लिए पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की गई लेकिन भीतर ही भीतर बंबई योजना को अपनाया गया था-जिसे तब के देश के आठ शीर्ष पूंजीपतियों ने बनाया था. या फिर भूमि सुधारों की शुरुआत की गई, लेकिन इसमें सुनिश्चित किया गया कि उन पर इस तरह अंकुश बना रहे कि व्यापक देहातों में सहयोगी के रूप में धनी किसानों का एक वर्ग बनाया जा सके. या फिर भूख खत्म करने के नाम पर देहातों में पूंजीवादी संबंधों के प्रसार के लिए हरित क्रांति को आगे बढ़ाया गया. ये महज कुछेक मिसालें हैं. लोकतंत्र को चलाने के लिए राजनीतिक रूप से एक ऐसी पद्धति जरूरी थी, जिससे उन्हें सत्ता पर पूरा नियंत्रण हासिल होता.

सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित करने वाली चुनावी [एफपीटीपी-फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम] व्यवस्था शासक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने वाली ऐसी ही पद्धति थी. यों यह व्यवस्था औपनिवेशिक शासन से विरासत में अपनाई गई थी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश रह चुके दूसरे सभी देशों में हुआ था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जो भारत को अपने हालात के मुताबिक एक बेहतर पद्धति को अपनाने के लिए इसे छोड़ने से रोकता. आज हम खुद को जिन बुराइयों से घिरा हुआ पाते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी एफपीटीपी व्यवस्था से पैदा हुई हैं. असाधारण रूप से ऐसी विविधता भरे राज्यतंत्र में होने वाले चुनावों में एक अकेले विजेता का होना बहुसंख्यक तबके के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था. इसका नतीजा यह हुआ कि समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को बहुसंख्यक तबके के हितों के साथ समझौता करना पड़ा, जिसने इन समूहों को मिला लिए जाने [को-ऑप्शन] और दूसरी धांधलियों का रास्ता खोल दिया. देश में हितों की विविधता अभी भी अनेक दलों को आगे ले आ सकती है, जो बुनियादी रूप से प्रतिस्पर्धी एफपीटीपी चुनावों को और भी बदतर बना देगी, जिसके साथ साथ बढ़ी हुई दर के साथ भारी खर्चे बढ़ते जाएंगे जिन्हें बड़े कारोबार पूरा करेंगे. इसी में जातियों, समुदायों, धर्म वगैरह जैसी मौजूदा खामियों और बेशक बाहुबल का बेरोकटोक इस्तेमाल भी बढ़ेगा. दलगत सीमाओं से ऊपर उठ कर, अनिवार्य रूप से यह सभी शासक वर्गों के मुट्ठीभर लोगों की शक्ति संरचना में रूप में विकसित हो गया है, जिसकी अनेक तरीकों से हिफाजत की जाती है और जिसकी सर्वोच्च ताकत पुलिस और फौज है.

एक वैकल्पिक मॉडल

क्या चुनावों की इस पद्धति का कोई विकल्प नहीं था? देश में शक्ल ले रहा विविधतापूर्ण राज्यतंत्र चुनावों के एक अलग मॉडल की तरफ इशारा करेगा. इसे हम आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कह सकते हैं. यह वो व्यवस्था है जो ज्यादातर यूरोपीय लोकतंत्रों और उन अनेक दूसरे देशों में अपनाई जाती है जिनका लोकतांत्रिक रेकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हालांकि व्यावहारिक रूप में आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था की अनेक किस्में हैं. लेकिन बुनियादी रूप से ये दलों या सामाजिक समूहों के लिए मतदान की व्यवस्था देती हैं (न कि किसी व्यक्ति को वोट देने के), जो अपने मतों के हिस्से के अनुपात में प्रतिनिधित्व पाते हैं. मिसाल के लिए दलित भारत में 17 फीसदी हैं लेकिन हरेक निर्वाचन क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के कारण वे एफपीटीपी व्यवस्था में कभी भी स्वतंत्र रूप से नहीं चुने जाते, आरक्षित सीटों पर भी नहीं. आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था संसद और विधान सभाओं में उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करेगी और यह उन्हें अपने जनाधार का विस्तार करने वाली शक्ति भी मुहैया करा सकती है. आज जिसे थोड़े नरम शब्दों में बहुजन कहा जाता है, उसका निर्माण इसी प्रक्रिया के जरिए मुमकिन था. सामाजिक पहचान की जगह वर्गीय चेतना लेगी और पूरी राजनीति को वर्गीय धुरी पर केंद्रित करेगी. इस व्यवस्था में कोई गलाकाट मुकाबला भी नहीं होगा, क्योंकि हरेक समूह को तर्कसंगत रूप से उनके हिस्से का प्रतिनिधित्व मिलेगा. इसके बजाए मुकाबला संसद के भीतर होने लगेगा, जिसे बहुसंख्यक जनता के हितों में नीतियां बनानी होंगी. एफपीटीपी व्यवस्था में, एक बार चुनाव हो जाने के बाद, नीतिगत मामलों पर संसद में बहस के लिए प्रेरणा देने वाली कोई ताकत नहीं होती. जनता पर असर डालने वाली सरकार की ज्यादातर भौतिक नीतियां (जैसे कि आपातकाल लागू किया जाना और नवउदारवादी आर्थिक सुधार) पर संसद में कभी बहस ही नहीं हुई.

एफपीटीपी चुनावों में सैद्धांतिक खामी यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को आधे मतदाताओं का वोट भी मुश्किल से ही मिला होता है. यह खामी आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में इस तरह दूर हो जाती है कि यह समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को उनकी उचित हिस्सेदारी देता है. एफपीटीपी चुनावों में गहन मुकाबले के नतीजे में भारी खर्चे होते हैं और उसके बाद भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होती है, जिन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में दूर किया जा सकता है. सबसे अहम बात यह कि भारत के संदर्भ में, यह शासक वर्गों द्वारा जनता को जातियों और समुदायों में बांटने के बुरे मंसूबों पर लगाम लगाती है. मिसाल के लिए, दलितों के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत नहीं रह जाएगी और इस तरह दलित होने के ठप्पे की भी जरूरत नहीं रहेगी. इस तरह राजनीति में से जातियों का बोलबाला भी खत्म हो जाएगा. हालांकि कोई भी व्यवस्था किसी को अपने समुदाय से अलग होकर उसे समुदाय हितों के खिलाफ काम करने से नहीं रोक सकती, लेकिन आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था समुदाय को उसकी उचित हिस्सेदारी देकर इसकी ढांचागत गुंजाइश को खत्म कर सकती है. दलित पूना समझौते के जरिए गांधीवादी ब्लैकमेल पर बरसों से अफसोस जताते आए हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि यह समझौता एफपीटीपी व्यवस्था पर टिका था. पूना समझौता आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता खो देगा. इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि जातियों की पहचान को बनाए रखने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी और इसी तरह खत्म हो जाएंगी वे सारी तकलीफदेह मुश्किलें भी, जो इस जरूरत से पैदा हुई हैं.

सचमुच, भारत को इससे भारी फायदा होगा, लेकिन क्या शासक वर्ग को इसकी परवाह होगी?

03 सितंबर 2013

गडचिरौली मुठभेड़: मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट

दख़ल की दुनिया के लिए हिन्दी में अनुवाद किया है प्रेम प्रकाश ने. 
गडचिरोली जिले में इस वर्ष मुठभेड़ की छः वारदातों की खबरें मीडिया व प्रेस में आयीं। इन मुठभेड़ों में कुल 26 व्यक्तियों की जिंदगी खत्म हो गई। जहाँ पर मुठभेड़ हुई वहाँ के लोगों ने पुलिस द्वारा बताई गयी बात की सच्चाई पर सवाल खड़े किए हैं।  
            विभिन्न राज्यों के अखिल भारतीय नागरिक आजादी और जनतांत्रिक अधिकारों की संयुक्त संस्था ‘जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय’ (सी.डी.आर.ओ.) ने भारतीय जन वकील संघ (इंडियन एसोशिएसन आफ पीपुल्स लायर) के साथ मिलकर सत्य को सुनिश्चित करने के लिए तथ्यों की जाँच-पड़ताल को अंजाम दिया। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली के सात संगठनों के 23 सदस्यीय दल ने 23 से 26 अगस्त 2013 तक गडचिरोली जिले का दौरा किया। दल नें पाँच गाँवों-  धानोरा तहसील के सिंदेसुर, कुरखेड़ा तहसील के भगवानपुर, एटापल्ली तहसील के मेंधरी और अहेरी तहसील के गोविंदगाँव व भाटपार का भ्रमण किया जहाँ मुठभेड़ हुई थी। जाँच दल नें पांचों गाँवों के लोगों, जन प्रतिनिधियों, मीडिया के लोगों, राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों और पुलिस से मुलाक़ात की। 
जाँच दल की तात्कालिक प्राप्तियाँ निम्नलिखित हैं:
1.      सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा पहले गोलाबारी शुरू की गयी। भगवानपुर और गोविंदगाँव की  घटनाओं  में जो लोग मारे गए उनकी तरफ से कोई जवाबी गोलाबारी नहीं हुई।
2.         सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा चेतावनी व समझाने का कोई प्रायस नहीं किया गया। पुलिस द्वारा तथाकथित माओवादियों से अपना हथियार डालने के लिए कोई घोषणा नहीं की गई। भगवानपुर, मेंधरी, गोविंदगाँव और भाटपार की घटनाओं में जहाँ लोग पुलिस द्वारा चारो तरफ से घेर लिए गए थे, पुलिस द्वारा आत्मसमर्पण करने के लिए घोषणा नहीं की गई और लोगों को बाद में मार डाला गया।
3.         मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में हुई हत्याएं फर्जी मुठभेड़ थी। मेंधरी गाँव में छः महिला माओवादियों ने मारे जाने से पहले ही अपने हथियार डाल दिये थे और समर्पण कर दिया था। भगवानपुर में जो व्यक्ति मारा गया वह मारे जाने से पहले पुलिस हिरासत में था।
4.      भगवानपुर, मेंधरी और भाटपार गाँव की घटनाओं में गाँव वालों को पुलिस द्वारा बुरी तरह पीटा गया। भगवानपुर में 10 व्यक्तियों को सारी रात सड़क पर पीटा गया। मेंधरी में एक व्यक्ति को पुलिस द्वारा लोगों को पीटने तथा दुर्व्यवहार से बचाने के लिए गोली मार दी गयी। भाटपार गाँव के तीन लोगों को दो दिन तक पुलिस स्टेशन में रोक कर रखा गया और पीटा जाता रहा। 
5.    मुठभेड़ में हत्या की सभी घटनाओं में यह अनिवार्य है कि अपराध की जाँच ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा हो जो हत्या में शामिल पुलिस बल और पुलिस स्टेशन से स्वतंत्र हो। हमारी अधिकतम जानकारी के अनुसार इसका पालन नहीं किया गया।
6.       पुलिस अधीक्षक नें हमसे कहा की उचित पंजीयन और जाँच को सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक मुठभेड़ में हत्या की आंतरिक जाँच एक उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी द्वारा की जा रही है। यद्यपि उसने पुष्ट किया कि इन घटनाओं की जाँच रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है। आंतरिक जाँच होने की वजह से इसमें न तो पारदर्शिता होगी और न ही निष्पक्षता।
7.       मेंधरी मुठभेड़ मामले में मजिस्ट्रेट स्तर की जाँच का आदेश दिया गया है। परंतु हमें मजिस्ट्रेट द्वारा ग्रामीणों के बयान दर्ज करने के प्रयास का एक भी साक्ष्य नहीं मिला। किसी भी तरह अधिशासी मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच इस तरह के मामले की जाँच में निष्पक्षता नहीं प्रदान कर सकती।
8.      कम से कम सिंदेपुर की दो हत्याओं को “द्विपक्षीय क्षति” कहा जा सकता है। पुलिस और प्रशासन का इस मामले में रवैया अत्यंत निर्मम है। गाँव के दो युवा लड़के दो-तरफा गोलाबारी में मारे गए। अभी तक उन परिवारों को न तो कोई मुआवजा मिला और न ही राज्य द्वारा उन परिवारों से कोई संवेदना प्रकट की गई। इसके विपरीत सरकार ने बड़ी फुर्ती से अपने “मानवीय सरोकार” के प्रमाण के रूप में प्रत्येक परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता के बड़े विज्ञापन बोर्ड जिले भर में लगा दिया है।
9.   भाटपाल गाँव में मारी गई महिलाओं में से एक उसी गाँव की निवासी थी। उसके माँ-बाप के अनुनय-विनय और सारे गाँव के पुलिस थाने पर इकट्ठा होने के बावजूद पुलिस ने अंतिम अधिकार के रूप में मृत शरीर को उन्हें देने से इंकार कर दिया। यह अत्यंत निंदनीय है। अन्य मामलों में भी लाशें लंबे समय तक बिना पहचाने ही पड़ी रहीं, उनकी तस्वीरें प्रकाशित नहीं की गईं तथा माँ-बाप व संबंधियों को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया व अंतेष्टि में शामिल होने की संभावना को खत्म कर दिया गया।   
           
उपरोक्त के प्रकाश में सीडीआरओ इस विचार पर पहुंचा है कि पांचों मुठभेड़ों में हुई जीवन की क्षति को आसानी से बचाया जा सकता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के क्रिया-कलाप को निर्देशित करने के लिए आरपीसी में दिये गए स्थापित मानकों का पालन इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त हो सकता था। इन परिस्थितियों में गोलाबारी करना गाँव के हिसाब से गलत  था जो न तो “आत्म रक्षा” और न ही ‘दोषियों” को हिरासत में लेने की दृष्टि से उपयोगी था। वास्तव में उपरोक्त प्रत्येक मामला दोषियों को हिरासत में लेने की अत्यधिक असफलता थी।  यह शक्ति का अतिरिक्त व अनाधिकृत गठन था।   
            समान तरह की घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति बताती है कि बंदियों के लिए कोई कार्यकारी नीति नहीं है और उनको माओवादी होने के संदेह में मारा जा रहा है। यह प्रशासन द्वारा विभिन्न जगहों पर लगाए गए बैनर में स्पष्ट दिखाता है जो मेंधरी में मारी गई महिला माओवादियों की तस्वीरों से भरा है । यह कहता है कि ‘सामान्य जनतेवार अन्याय करल, तार पोलिसांच्या बंदुकीनेच मारल’ (अगर तुम सामान्य जन के साथ अन्याय करोगे तो तुम पुलिस की बंदूकों से मारे जाओगे)
            इस तरह पुलिस के खतरे की एक झलक को इस बंदूक के आनंद की प्रवृत्ति में देखा जा सकता है जो भगवानपुर की घटना में दिखाई दी। उपचारात्मक उपायों से दूर पुलिस अधीक्षक गडचिरोली ने पुलिस की भाषा ही दोहराते हुये कहा कि इससे कोई मतलब नहीं की यह कितना अविश्वासनीय है कि सामान्य ग्रामीण रहवासी जोकि माओवादियों से संबन्धित नहीं है पुलिस पर गोलाबारी किए जबकि उनसे रुकने के लिए कहा गया। इस तरह की नीति भविष्य में भयानक अनहोनी की पूर्व-सूचना देती है ।      
            चारो मामले में पुलिस का विवरण हमारी खोज तथा ग्रामीणों के विवरण से गंभीर रूप से भिन्न है। प्रेस को दी गई पुलिस रिपोर्ट तथा एफ़आईआर चौंकाने वाली है जिसमें कहा गया है कि जाँच पूर्णतया हत्या में शामिल पुलिस दल के विवरण पर आधारित है। यह नागरिक न्यायशास्त्र के विचार से पूर्णतया उलट है। हत्यारा, सूचनादाता, जाँच और न्यायाधीश एक दूसरे से अलग होने चाहिए। और यह कानून तथा व्यवहार में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 
उपरोक्त के प्रकाश में हम मांग करते हैं कि:
           
1.      बंदियों को गिरफ्तार करने के बजाय उनको जान से मारना तथा अधिकतम नुकसान पहुंचाना अवश्य ही बंद किया जाय।
2.       मुठभेड़ के सभी मामलों में जिम्मेदार पुलिस दल के खिलाफ आपराधिक मानवहत्या की एफ़आईआर दर्ज हो। इसकी जाँच दूसरे जिले के पुलिस अधिकारी को सौंपी जाय।
3.      भाटपाल, मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में जहाँ लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया, की न्यायिक जाँच की जाय।
4.      न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रत्येक मुठभेड़ की घटना की मजिस्ट्रेट स्तरीय जाँच की जाय और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान उनके घर पर भयमुक्त वातावरण में दर्ज किया जाय तथा इस तरह के गवाहों पर भविष्य में पुलिस प्रताड़ना के मामलों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएँ।
5.      भगवानपुर से गिरफ्तार दो व्यक्तियों को अविलंब रिहा किया जाय।
6.      भगवानपुर गाँव के देवराव व बुधनाथ के परिवारों को अविलंब मुआवजा दिया जाय। 

द्वारा जारी: 
·       जनतान्त्रिक अधिकार संघ,पंजाब (Association for Democratic Rights, Punjab)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संघ, पश्चिम बंगाल(Association for the Protection of Democratic Rights, West Bengal)
·        नागरिक स्वतन्त्रता समिति, आंध्र प्रदेश (Civil Liberties Committee, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा समिति, मुंबई (Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai)
·       भारतीय जन वकील संघ (Indian Association of People’s Lawyers)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संगठन, आंध्र प्रदेश(Organisation for the Protection of Democratic Rights, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार जनसंघ, दिल्ली (People’s Union for Democratic Rights, Delhi)


गाँव की जाँच-प्राप्ति  का विवरण: संक्षिप्त रूप
(Village Accounts of our Findings – Short Version)

1-गोविंदपुरगाँव, अहेरी तहसील: 11 जनवरी को मावोवादियों के 11 सदस्यीय समूह की  ग्रामीणों के साथ शाम 7 बजे बैठक हुई। बैठक के दौरान माओवादियों नें गाँव में शराब उत्पादन और शराब पीने की बंदी के लिए, परिवार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए, ग्रामीणो में झगड़े और तनाव को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने और बिजली के तारों से शिकार के खतरनाक तरीकों को बंद करने के लिए अभियान चलाया। उन्होने  सरकार की लघु-बचत योजना ‘बचत घट’ के विरोध का लोगों से आह्वान किया। गाँव में रात्रि भोज के बाद मावोवादी दल बस्ती से अभी बाहर गया ही होगा कि “सुरक्षा बल” के लोगों ने ग्रामीणों को घेर लिया और उन पर गोलियां बरसाने लगे।
            छः व्यक्ति वारदात की जगह पर ही मारे गए जबकि बाकी माओवादी बच निकलने में  सफल हो गए। प्रतिरक्षा में माओवादियों द्वारा कोई गोलीबारी नहीं की गई। मृतकों में दो महिलाएं थी। गाँव से कुछ व्यक्तियों को मृतकों की पहचान के लिए लाया गया।

2- भगवानपुर, कुरखेडा तहसील: 16 जुलाई 2013 को रात के लगभग 10 बजे गाँव के 11 लोग जंगल में शिकार के लिए गए। उसमें से 8 लोग तीन स्कूटरों पर गए जिसके कुछ देर बाद तीन लोग दूसरे स्कूटर पर गए। बाद में गए लोग अपने साथ एक भामार (एक देशी बंदूक), एक कुल्हाड़ी, एक चाकू तथा एक टोपी वाली टार्च ले गए।  
करोडी गाँव के महात्मा फुले स्कूल के नजदीक मुख्य सड़क पर उन्होन्नें सी – 60 कमांडो दल को देखा और जल्दी से निकल जाने का निश्चय किया। पुलिस दल जो तीन गाड़ियों में था ने उनका पीछा किया और उन्हें रोक लिया। उनमें से तीन ग्रामीणों नें पुलिस को समझाने की कोशिश की कि उनके 8 साथी नीचे है। लेकिन सब कुछ अनसुना कर पुलिस द्वारा पीटे जाने के बाद आनंदराव मार दिया गया। आनंदराव घटना की जगह पर ही गिर गया और मर गया उसकी पसलियों के ठीक नीचे दो गोली मारी गई थी। साक्षियों ने बताया कि जिन पुलिस वालों  ने आनंदराव को मारा वे उसे पहले से जानते थे।   
            पुलिस ने अन्य आठ व्यक्तियों के लौटने की प्रतीक्षा की और उन्हें पकड़कर भोर के 4 बजे तक लगातार पीटती रही जबकि 10 ग्रामीणों व लाश को दो गाड़ियों में अरमोरी पुलिस थाने लाया गया। वहाँ आनंदराव के साथ दो व्यक्तियों देवराव राजाराव उसेंदी तथा बुधनाथ पांडुरंग तुलावी पर आईपीसी की धारा 307 व 353 के तहत केस दर्ज की गई। वर्तमान में वे दोनों चंद्रपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं। बाकी बचे लोगों को जिन्हें पुलिस नें हवालात में बंद कर रखा  था बाद में छोड़ दिया गया।   

3- सिंदेसूर, धनोरा तहसील: 12 अप्रैल की सुबह सिंदेसूर गाँव से 12 लोगों का एक समूह पहाड़ी की तली में अपने खेतों के निकट जंगल से महुआ के फूलों को इकट्ठा कर रहा था। कुछ समय बाद चार माओवादी वहाँ आए और उन्होनें 20 साल के दो लड़कों से गाँव से पीने के लिए पानी लाने को कहा। जब ये लड़के पानी लेकर लौट रहे थे तो पुलिस ने अचानक आकार गोलीबारी शुरू कर दी। परिणाम स्वरूप जवाबी गोलीबारी हुई और दोनों लड़के उसकी चपेट में आ गए। दोनों ही मुकेश दुरु हुड़को तथा सुखदेव वरलू गवडे मारे गए। गोलीबारी के अंत में एक पुलिस  और चार माओवादी मृत पाये गए। दो मृतक ग्रामीण लड़कों के लिए मुआवजे की घोषणा की गई है परंतु अभी तक वह अंधेरे में ही अटकी हुई है।

4- मेंधरी, एटापल्ली तहसील: 7 जुलाई की सुबह 6 औरतों व दो पुरुषों का एक मावोवादी समूह गाँव के निकट एक नाले के पास था। उनमें से दो औरतें नहाने के लिए नाले में गईं तथा शेष गाँव की एक युवती के साथ चाय पीते हुये बातचीत करनें लगीं जबकि दो पुरुष सदस्य गाँव में चीनी तथा चाय खरीदने चले गए। नजदीक ही एक पुलिस को छिपते हुये देखकर गाँव की युवती अपने घर भाग गई और उसके कुछ क्षण बाद ही गोलीबारी शुरू हो गई। महिला मावोवादी अपना बैग वहीं छोड़कर बंदूकों के साथ दौड़ीं तथा जवाबी गोलीबारी शुरू हो गई। बिना युद्ध सामाग्री के भागते हुये महिलाओं नें गाँव की शरण लेने की कोशिश की लेकिन पुलिस नें खुले खेतों में उनका पीछा किया। दूसरी तरफ से अन्य पुलिस वाले आ गए और महिलाओं ने अपने आपको फंसा हुआ पाया, उन्होने अपनी बंदूकें फेंक दीं तथा आत्मसमर्पण में अपने हाथ उठा दिये। उनमें से एक नें अपनी बंदूक फेककर उसी खेत में महुआ के पेड़ पर चढ़ गई। इसके बाद पुलिस महिलाओं के निकट पहुंची, आत्मसमर्पण की हुई महिलाओं को नजदीक से मारा तथा पेड़ पर छिपने का प्रयास कर रही महिला को भी मार गिराया। 10 से अधिक गाँव वालों को खींचकर बाहर लाया गया और उन्हें पीटा गया जबकि वे मृतकों को पहचानने में असमर्थ थे। एक ग्रामीण को तब मार दिया गया जब वह शवों से दूर भागने की कोशिश कर रहा था।     

5- भाटपार, अहेरी तहसील: तीन अप्रैल की शाम चार सशस्त्र मावोवादियों का एक समूह ग्रामीणों के साथ बैठक कर रहा था। बाद में उस रात वे गाँव छोड़ दिये और आधा किलोमीटर दूर नदी के किनारे रुके। उनके साथ गाँव की दो औरतें भी थीं। दूसरे दिन तड़के सुबह गाँव वालों नें गोली की आवाज सुनी और उनमें से एक औरत भागती हुई गाँव में आई। बाकी पांचों की लाशों को पुलिस नदी के इस पार लायी। गाँव वालों नें पुलिस से कुम्मा ताड़ो की बेटी सुनीता की लाश को परिवार वालों को देने की मांग की। पुलिस नें लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी, जबकि तीन ग्रामीणों को खेत से पकड़ा, उनको पीटा और अपने साथ धोजराज पुलिस थाने लाये। अगले दिन सुबह अधिकतम ग्रामीण थाने गए और मृतक की लाश को वापस करने तथा चार ग्रामीणों को छोड़ने की मांग किए। वे चार ग्रामीणों के साथ वापस आए। लाश को कभी भी परिवार वालों को नहीं सौंपा गया। 
जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय
(Coordination of Democratic Rights Organisations)

08 मार्च 2013

क्योंकि मृत्युदंड टी20 का मैच नहीं है


-युग मोहित चौधरी*
युग मोहित चौधरी ने 9 फरवरी 2013 को दूसरे शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान में जो भाषण दिया उसका ये संपादित रूप है। मृत्युदंड की अवधारणा पर करारा चोट करता यह भाषण उन सबके लिए  हैं जो देश 
को कम हिंसक और कम प्रतिक्रियावादी जगह के तौर पर देखना चाहते हैं। लेख लंबा है लेकिन किस्तों की बजाए एक बार में इसलिए छाप रहे हैं ताकि लयात्मकता बरकरार रहे। मूल रूप से  अंग्रेज़ी में 
दिए गए भाषण का लिप्यांतरण  दीप्ती स्वामी, धीरज पांडेय और अनुराग सेठी ने किया।  
(महताब आलम के लगातार आग्रह पर हिंदी अनुवाद : दिलीप ख़ान)

अधिवक्ता युग मोहित चौधरी

फरमन वनाम जॉर्जिया (1972) केस में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड की मुखालफत की। न्यायाधीश मार्शल ने कहा कि अगर नागरिकों को इस बात की पूरी जानकारी हो कि लोगों को किस तरह मृत्युदंड सुनाए जाते हैं तो उन्हें लगेगा कि मौत की सजा स्तब्धकारी, ग़लत और अस्वीकार्य है। हालांकि भारत में मृत्युदंड उन्मूलन अभियान में ऐसे शोध और लोगों के बीच जागरुकता अभियान जैसे काम को सर्वाधिक नज़रंदाज किया गया है। भारत में मृत्युदंड की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले अंतिम तीन बिंदुओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया, क्योंकि उन्मूलन के दावों को समर्थन देने के लिए कोई अनुभवजन्य आंकड़ें (empirical data) नहीं थे। अफ़सोसजनक ये है कि परिस्थिति में अब भी कोई बदलाव नहीं आया है। अब भी इस मामले पर शायद ही कोई शोध हुआ है। इसलिए मृत्युदंड के ऊपर अनुभवजन्य शोध करना उन्मूलन अभियान की प्राथमिकता में शीर्ष पर होना चाहिए। हरेक प्रस्तावित मृत्युदंड को रोकने की हरसंभव कोशिश में विफल रहने के बाद हमें कम-से-कम राज्य को उस स्थिति तक पहुंचाना चाहिए कि अगले मामले में मृत्युदंड देना उसके लिए मुश्किल भरा काम बन जाए। इसके लिए हरसंभव क़ानूनी, राजनीतिक और सामाजिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। मृत्युदंड का उन्मूलन कभी भी एक झटके में नहीं हुआ है और न ही ऐसा होगा। इस दिशा में होने वाली प्रगति की रफ़्तार सुस्त होगी और ये हम पर निर्भर करता है कि हम सरकार, अदालत, संसद और लोगों को ये समझा सके कि इससे हमें कुछ भी हासिल नहीं होता, अलबत्ता हमारे मानवीय स्तर को ये नीचे ज़रूर गिराता है। 

आज मृत्युदंड का विरोध करने के अनेक कारण हैं। लोग यह आसानी से महसूस सकते हैं कि किसी को मारना नैतिक तौर पर ग़लत है, कि सजा के तौर पर एक हत्यारे की हत्या करना पाखंड है, कि आजीवन कारावास की बजाय मृत्युदंड देने से अपराध की मात्रा में कोई कमी नहीं आती। मृत्युदंड की मुख़ालफ़त के पीछे जो एक और कारण हैं वो ये कि इस सजा को वापस नहीं लिया जा सकता। ऐसे कई मामले हैं जब अदालती फ़ैसले ग़लत साबित हुए और जिन्हें दुरुस्त करने का कोई मौका नहीं बचा। एक बार जिसे मौत दे दी गई, उसे ठीक करने का कोई तरीका नहीं होता। मौत के घर से वापसी नहीं होती। चलिए हम तीन सामाजिक संस्थाओं के संदर्भ में मृत्युदंड की चर्चा करते हैं, ताकि इसके उन्मूलन के लिए तर्क निकल सके। ये तीन संस्थाएं हैं, पुलिस, जोकि सबूत इकट्ठा करने वाली इकाई है; अदालत, जोकि दोष तय करने और उपयुक्त सजा सुनाने वाली इकाई है और कार्यपालिका, जोकि क्षमा याचिका पर विचार करने वाली ईकाई है।  

इस बात को बहुत ज़ोर देकर उभारने की ज़रूरत नहीं है कि हमारे यहां, भारत में, पुलिस बल बदमाश, भ्रष्ट, बेईमान और आपराधिक है। अदालत में जो सबूत पेश होते हैं उसे यही पुलिस जमा करती है। हम इन्हीं सबूतों के बिनाह पर ये तय करते हैं कि किसी को मौत की सजा सुनाई जाए या नहीं। यह अपने-आप में सोचने वाली बात है कि जिस पुलिस के बारे में हम जानते हैं कि वो भ्रष्ट और बेईमान है, उसके द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर सजा तय होती है। इसके मुतल्लिक मैं कुछ उदाहरण पेश करता हूं :- मुंबई में कुछ साल पहले एक आदमी को एक बच्चे की हत्या और बलात्कार के मामले में दोषी पाते हुए सजा सुनाई गई। अर्जी उच्च न्यायालय में अटकी थी और इसी दरम्यान पुलिस अधिकारियों को जांच-पड़ताल के बाद ये पता चला कि वो मामला आत्महत्या का है और पुलिस ने आत्महत्या नोट बरामद करते हुए माना कि उस आदमी को उन लोगों ने ख़ामख़्वाह पकड़ लिया था। अब रिकॉर्ड में जो सबूत हैं उसके आधार पर उस आदमी को निर्दोष नहीं माना जा सकता क्योंकि सबूत काफी मज़बूत थे। सुसाइड नोट सबूत का हिस्सा नहीं था और उसके बग़ैर वो आदमी मौत के पार पहुंच सकता था। बंबई उच्च न्यायालय ने अपारंपरिक तौर पर उस सुसाइड नोट पर ग़ौर करते हुए उस आदमी को बरी कर दिया। अगर मामला इस तरह हल नहीं हुआ होता तो कल्पना कीजिए क्या घटित हो चुका होता? 

मैं आपको कुछ दूसरे उदाहरण दूंगा। जिन मामलों को शाहिद (शाहिद आज़मी**) देख रहे थे उन्हें आज-कल मैं देख रहा हूं। वो मामला है, 2006 का मालेगांव बम धमाका। शब-ए-बरात की पवित्र रात या बड़ी रात को मुस्लिम बाहुल्य शहर मालेगांव में मस्जिद के बाहर बम धमाके हुए। नौ लड़कों को इस मामले में पकड़ा गया और उनपर उन धमाकों के आरोप लगाए गए। नौ स्वीकृतियां (कनफेसन) रिकॉर्ड में दर्ज हैं। पुलिस का दावा है कि उसने उन लोगों के घर से आरडीएक्स सहित अन्य विस्फोटक सामग्रियां जब्त की। पुलिस ने ये भी दावा किया कि उन नौ में से एक लड़के का जमीर जाग गया और वो अपने सहयोगियों के ख़िलाफ़ राज्य के लिए गवाह बनने को तैयार हो गया। मामले में आरोप पत्र दायर किया गया। मुंबई में पूरे मामले पर गर्माहट के बाद केस सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने एक पूरक आरोप पत्र दायर किया जोकि मुंबई पुलिस द्वारा किए गए जांच-पड़ताल से संबंधित था। और फिर, एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी), जोकि समझौता एक्सप्रेस धमाकों की जांच कर रही थी, उसने स्वामी असीमानंद को गिरफ़्तार किया। असीमानंद ने बाद में ये स्वीकारा कि उसने ही मालेगांव के तीन धमाकों को अंजाम दिया। उसने बताया कि उसके हिंदूवादी दक्षिणपंथी आतंकी समूह ने मालेगांव में धमाका किया है। तो, उन तमाम सबूतों का क्या हुआ, उन स्वीकृतियों का क्या हुआ और उस आरडीएक्स का? कहां से वो आरडीएक्स आया था और कहां ग़ायब हो गया?

अब आप खुद को वकील की जगह रखकर देखें, एक केस में पुलिस कोर्ट के सामने आरडीएक्स ये कहते हुए पेश कर रही है कि उसने आरोपियों के घर से उसे जब्त किया है। बचाव पक्ष का वकील कह रहा है कि सबूत गढ़ा गया है। जज पूछता है, "पुलिस ने इसे फिर कहां से बरामद किया?" आप इस सवाल का जवाब कैसे देंगे? जज अपने सामने पेश किए गए उस सबूत पर यकीन करेगा और ये मानेगा कि वाकई आरडीएक्स जब्त किया गया होगा क्योंकि लोगों के पास आखिरकार कहां से आरडीएक्स आएगा? सामान्य लोगों के पास आरडीएक्स नहीं होता। लेकिन स्वामी असीमानंद की स्वीकृति जाहिर होने से पहले इन नौ लोगों के सर पर तलवार लटकी थी। सबके ऊपर। ये कोई अलग-थलग मामला नहीं है। 

11 जुलाई 2006 को आधे घंटे के दरम्यान मुंबई की ट्रेन में सात धमाके हुए। पुलिस ने सिमी (स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) के तेरह लड़कों को ये कहते हुए गिरफ़्तार किया कि उन्हीं लोगों ने इन धमाकों को अंजाम दिया है। गिरफ़्तारी के समय उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए। मजिस्ट्रेट के सामने रिमांड आवेदन पेश करते हुए पुलिस ने लिखित तौर पर कहा कि उनके मोबाइल फोन को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है और मोबाइल सेवा प्रदाता से मिलकर उनकी कॉल का विवरण भी खंगाला जा रहा है। कॉल रिकॉर्ड के बिनाह पर पुलिस ने दावा किया कि षडयंत्र को तय करने की खातिर वो तेरहों लड़के आपस में संपर्क में थे। इसके अतिरिक्त पुलिस ने ये भी कहा कि उनका पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से भी संपर्क था और वे लोग नौजवानों को आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए सीमा पार पाकिस्तान भी भेजते थे। ये सब पुलिस ने महज रिमांड आवेदन में ही नहीं कहा बल्कि हफ़्तों तक बार-बार इस बात को दोहराते रहे ताकि उन लड़कों की बढ़ी हुई हिरासत अवधि को वैधता दे सके। 189 लोग उन धमाकों में मारे गए। कोई भी मजिस्ट्रेट या जज ऐसे मामलों में बेल नहीं देगा, ख़ासकर तब जब पुलिस इतने मज़बूत फॉरेंसिक सबूत पेश कर रही हो। लश्कर-ए-तैयबा के साथ संपर्क में रहना और आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए लोगों को उनके पास भेजना बेहद गंभीर मामला है। 
  
बहरहाल, कुछ समय बाद, मुंबई पुलिस की दूसरी शाखा ने कुछ अन्य लोगों को पकड़ा जो यह मान रहे थे कि उन्होंने मुंबई की रेलों में धमाके किए। उनके पास आत्मस्वीकृति के रिकॉर्ड थे। जब सिमी वाले मामले में आरोपपत्र दाखिल किए गए थे तो उन लड़कों ने अपने मोबाइल रिकॉर्ड की प्रतियां मांगी क्योंकि पुलिस ने आरोपपत्र के साथ उसे नत्थी नहीं किया था। यह बहुत अचंभित करने वाला तथ्य है कि पुलिस ने उन्हीं फोन रिकॉर्ड के आधार पर ये दावा किया था कि उन लड़कों का लश्कर के साथ ताल्लुक है और बाद में उन्हीं मोबाइल फोन रिकॉर्ड को सार्वजनिक नहीं कर रही! पुलिस ने आरोपपत्र के साथ उन रिकॉर्ड को नत्थी क्यों नहीं किया?
मौत के घर से वापसी नहीं होती।
उन लड़कों ने हमेशा कहा कि अगर अदालत के सामने उन रिकॉर्ड को पेश किया जाता है तो घटना में उनकी निर्लिप्तता साबित हो जाएगी। लोग जान जाएंगे कि वे निर्दोष हैं। तथ्य ये है कि बम धमाकों के समय वे सब किसी दूसरी जगह पर मौजूद थे। (मोबाइल) टावर का लोकेशन ये साफ़ बता रहा था कि पुलिस के दावों के विपरीत वे चर्च गेट स्टेशन के पास नहीं थे। उनमें से एक तो मुंबई से बाहर बिहार में कहीं था। कुछ चर्च गेट स्टेशन से बिल्कुल उल्टे छोर पर उत्तरी मुंबई में थे। इसलिए उन लड़कों ने लगातार ये कहा कि उनके बचाव के लिए वो फोन रिकॉर्ड्स अहम दस्तावेज़ है। बचाव पक्ष के वकील द्वारा छह साल के भीतर उन रिकॉर्ड्स की प्रतिलिपि मांगने के लिए छह बार आवेदन दिया गया जिन्हें पुलिस ने (कथित तौर पर) अपने पास जमा रखा था। लेकिन पुलिस ये कहकर रिकॉर्ड्स देने से लगातार मना करती रही कि चूंकि आरोप पत्र में उन्होंने उन रिकॉर्ड्स को चस्पां नहीं किया है इसलिए आरोपित को दस्तावेज़ देने के लिए वो बाध्य नहीं है। लेकिन जैसा कि आतंकवाद से जुड़े मुक़दमें में ज़्यादातर होता है, चौतरफ़ा दबाव के चलते अभियोजन पक्ष द्वारा रखी गई दलीलों पर जज सिर्फ़ मुहर लगाता चलता है, उन फोन रिकॉर्ड्स के लिए छह साल में किए गए छह आवेदनों को जज ने खारिज कर दिया। 

पुलिस लगातार उन रिकॉर्ड्स को देने से इनकार करती रही, लेकिन उस मामले के मुतल्लिक और कुछ भी कहने से बचती रही। आख़िरकार हमने उच्च न्यायालय का रुख किया और वहां उन रिकॉर्ड्स को मांगने के लिए अपील की। उच्च न्यायलय ने उन रिकॉर्ड्स को प्रासंगिक और ज़रूरी माना और पुलिस को निर्देश दिया कि वो दस्तावेज़ हमें सौंपे। छह साल बाद और आख़िरी बार जब पुलिस ने हमें रिकॉर्ड्स देने से मना किया था उसके तीन महीने बाद उच्च न्यायालय में पहली बार पुलिस ने मुंह खोला और कहा कि उसने उन रिकॉर्ड्स को नष्ट कर दिया है! जबकि पुलिस बीच-बीच में ये दावा कर रही थी कि उन दस्तावेज़ों के आधार पर कुछ आरोपितों को अभी पकड़ा जाना बाकी है, वो कैसे उन रिकॉर्ड्स को नष्ट कर सकती है? 
सामान्य अपराध के मामलों में आत्म-स्वीकृति को बतौर सबूत मामूली भाव मिलता है, क्योंकि एक पुलिस अधिकारी की कही गई बातों पर कोई किस तरह भरोसा कर ले? न्यायिक सिद्धांत में इसी आधार पर आत्म-स्वीकृति को सबूत से अलग कर दिया गया। लेकिन, गंभीर अपराधों में आत्म-स्वीकृति को सबूत के तौर पर लिया जाता है। ये हैरतअंगेज़ व्यवस्था है। अगर आत्म-स्वीकृति को सामान्य अपराध में सबूत के तौर पर मान्य नहीं ठहराया जाता तो फिर गंभीर क़िस्म के अपराध में आरोपियों के ऊपर इसे क्यों लादा जाता है? लेकिन हमारे यहां क़ानूनन यह व्यवस्था है। आतंकवाद के मामले में यह विशेष व्यवस्था लागू होती है। इसलिए 2006 के मालेगांव मामले में पुलिस ने अदालत के सामने हमेशा नौ आत्म-स्वीकृतियों को सबूत के तौर पर पेश किया। हां, साथ में आरडीएक्स बरामदगी की मनगढंत कहानी ज़रूर चस्पां की। कोई भी वास्तविक सबूत नहीं पेश हुआ। एक आत्म-स्वीकृति को अपने मुताबिक ढालने में ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती जब उसका सत्यापन भी ख़ुद पुलिस अधिकारियों को ही करना हो!

इंदिरा गांधी हत्याकांड में उनके सुरक्षा दस्ते में से एक सुरक्षाकर्मी बलवंत सिंह को फौरन गिरफ़्तार कर लिया गया। हत्या के तुरंत बाद, ग़ैरक़ानूनी तरीके से। हालांकि उनकी गिरफ़्तारी को दिखाया नहीं गया लेकिन यमुना वेलोड्रम के छोर से ग़ैरक़ानूनी तरीके से उसको उठाकर कई दिनों तक रखा गया। उस दौरान हिरासत में उसको भीषण यातनाएं दी गईं और बाद में छोड़ दिया गया। उसके एक या दो दिन बाद जब वो आईएसबीटी में बस में चढ़ने जा रहा था तो उसकी गिरफ़्तारी गिखाई गई। पुलिस ने दावा किया कि उसकी जेब से चिट्ठी की शक्ल में पूरा का पूरा आत्म-स्वीकृति नोट बरामद हुआ है, जिसमें विस्तार से उसके बयान दर्ज़ थे। पुलिस के दावों पर यक़ीन करें तो वो अपनी जेब में आत्म-स्वीकृति नोट लेकर दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा था! यह इंदिरा गांधी हत्याकांड का सच है! ट्रायल कोर्ट ने इस क़िस्से पर अपना भरोसा जताया और बलवंत सिंह को मौत की सजा सुना दी। हाई कोर्ट ने भी भरोसा का इजहार किया और बलवंत सिंह की मौत की सजा को बरकरार रखा। 
इसलिए मैं वापस उसी सवाल पर आना चाहता हूं: क्या ऐसे सबूत के आधार पर लोगों को मौत की सजा सुनाना जायज है? 
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मृत्युदंड में संलिप्त दूसरी संस्था है- न्यायपालिका, और न्यायपालिका की ग़लती करने की क्षमता उतनी ही है जितनी भारत में किसी दूसरी संस्था की। इसमें उसी तरह के लोग शामिल हैं जैसे समाज के अन्य दूसरी संस्थाओं में होते हैं। ग़लतियां लोगों से होनी अवश्यंभावी हैं। मृत्युदंड के संदर्भ में ख़ास तौर पर इसे परखा जाना चाहिए क्योंकि 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' का समूचा मसला इतना व्यक्तिकेंद्रित होता है कि इसकी पड़ताल में नज़रियों का फर्क आसानी से पाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ये माना है कि मृत्युदंड के उसके फैसले भी चुनिंदा होते हैं और इसके नियम में कोई स्थिरता या फिर सामान्यता नहीं है। इस आधार पर देखें तो न्याय हासिल करने में समानता के अधिकार का लगातार उल्लंघन होता रहा है। बच्चन सिंह (1982) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भगवती ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट 'मनमौजी और सनकनपन' में मृत्युदंड सुनाता है। क्या वो ग़लत थे? 


फरमन बनाम जॉर्जिया मामले में जस्टिस स्टीवर्ट ने कहा था कि मृत्युदंड मनमाने और क्रूर तरीके से सुनाया जाता है। किसी को पता नहीं होता कि अगली बारी किसकी है। जिसको सजा सुनाई गई, उसे उसका दुर्भाग्य ही समझा जाना चाहिए! हरबन सिंह (1982) के मामले में इसे हम स्पष्ट तौर पर देख सकते हैं। हत्या के एक ही तरह के तीन मामलों में तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई गई और सुप्रीम कोर्ट की तीन अलग-अलग खंडपीठ ने उन मामलों पर नाटकीय तौर पर तीन अलग-अलग फैसले सुनाए। कश्मीरा के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया, जीता की अपील ठुकरा दी गई और उसे फांसी हुई और हरबन को राष्ट्रपति के यहां से क्षमादान मिली, जबकि कोर्ट ने उसकी शुरुआती अपील और पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था। 

मृत्युदंड के फैसले में ये उदाहरण 'भ्रम, विचलन और विरोधाभास' की तस्वीर पेश करते हैं। एकसमान मामलों पर अलग-अलग फैसले पर्याप्त संख्या में मौजूद है और ये चिंता का विषय है। इन मामलों में जिनको मौत मिली और जिनको आजीवन कारावास मिली उनके बीच सिवाय अलग खंडपीठ के और कोई बड़ा अंतर नहीं था। जहां न्यायमूर्ति बालाकृष्णन और सिन्हा ने बच्चों के बलात्कार और हत्या के सारे मामलों में मिले मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया, वहीं जस्टिस पसायत ने लगभग हर मामले में मृत्युदंड को या तो बरकरार रखा या फिर नए सिरे से यह सजा सुनाई, यहां तक कि उन मामलों में भी जिनमें निचली अदालतों ने आरोपी को मुक्त कर रखा था। मृत्युदंड ऐसे में इस पर निर्भर हो जाता है कि आख़िरकार उसको सुनाने वाला जज कौन है। यह ऐसा जुआ बन जाता है जिसमें यह देखना सबसे ज़्यादा दिलचस्प होता है कि किसी ख़ास जज की मौजूदगी से मृत्युदंड की सांख्यिकी में कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक फ़र्क़ पैदा होता है। यानी जीने और मरने की संभावना सबूतों की बजाय जज पर निर्भर करता है! तीन जजों की तुलना से यह साफ़ हो जाएगा कि किस तरह मृत्युदंड को लेकर जजों का निजी नजरिया फैसलों में जाहिर होता है। 

क्रिकेट की छोटी शैली में इस्तेमाल होने वाली भाषा के सहारे कहें तो जस्टिस पसायत का "स्ट्राइक रेट" लगभग 73 फीसदी है, जोकि उनके कार्यकाल में रहने वाले बाकी सारे जजों के सम्मिलित स्ट्राइक रेट (19 फ़ीसदी) से काफ़ी ज़्यादा है। इस तरह जो मामला जस्टिस पसायत की खंडपीठ को नहीं सौंपा गया, उसमें मृत्युदंड से बचने की संभावना चौगुनी बढ़ जाती है। मृत्युदंड के एक मामले की सुनवाई जस्टिस पसायत और जस्टिस सिन्हा के पास होने की संभावना लगभग बराबर का है, लेकिन आरोपी के ज़िंदा रहने की संभावना 100 फ़ीसदी हो जाती है अगर वो केस जस्टिस सिन्हा के पास पहुंचा हो। एक कैदी के ज़िंदा रहने की संभावना 50 फ़ीसदी बढ़ जाती है अगर वो केस जस्टिस पसायत की खंडपीठ की बजाय जस्टिस बालाकृष्णन के पास पहुंचे। क्या मृत्युदंड की अपील करने वाले एक व्यक्ति को यह सवाल नहीं पूछना चाहिए, "मैं जिंदा रहूंगा या नहीं यह मेरे केस में मौजूद सबूत से तय होगा या फिर गठित होने वाली खंडपीठ से?" इससे भयावह नहीं तो कम से कम फैसलों में ऐसा ही अंतर ब्लैकशील्ड (1972-1976) के अध्ययन में भी जाहिर होता है। भगवती के इस बयान पर शक की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए कि "कोई व्यक्ति जिएगा या मरेगा यह बहुत कुछ खंडपीठ में शामिल जजों के समिश्रण पर निर्भर करता है और यही बात मृत्युदंड को मनमाना मामला बना देता है"। जीवन की पवित्रता, बदतर अपराधियों के भीतर ‘पापमुक्ति’ की हमेशा मौजूद रहने वाली संभावना और मृत्युदंड की बर्बरता पर जस्टिस कृष्णा अय्यर की टिप्पणी के बाद इस पर कोई प्रमाण देने की ज़रूरत नहीं रह जाती। बच्चन सिंह के फैसले के बाद खेद जताते हुए कुछ जजों का ये सोचना था कि “दुर्भाग्य” से उस फैसले ने और अधिक मृत्युदंड देने से उन्हें रोक दिया!  
जस्टिस पसायत को फांसी की सजा सुनाने में
विशेषज्ञता हासिल है!

भारत में मृत्युदंड की नींव बच्चन सिंह (के फ़ैसले) से रखी गई और उसके बाद के फ़ैसले से ये उम्मीद रखी गई कि वो उसके अनुरूप ही रहे। बच्चन सिंह मामले में ये साफ़ हो गया कि जजों को अपराध के जुड़ी परिस्थितियां और अपराधियों से जुड़ी परिस्थितियां, दोनों तरफ देखनी चाहिए। हालांकि कुछ जघन्य अपराधों और आतंकवाद के मामलों में न्यायिक सतर्कता थोड़ी दूसरी तरफ़ डिग जाती है जोकि अपराध से पैदा हुई तब्दीली के कारण ज़्यादा होती है। एक व्यक्ति रावजी ने अपने परिवार का क़त्ल किया क्योंकि उसे शक था कि उसकी पत्नी उसके प्रति वफ़ादार नहीं है और उसके बच्चे नाजायज़ हैं। अब इस मामले में वो अगर अपराध की परिस्थितियों को देखें तो निश्चित तौर पर अपराधी को फांसी की सजा सुना देंगे, लेकिन अगर अपराधी की परिस्थिति पर वो ग़ौर करें तो वो उसे शायद मानसिक तौर पर विक्षिप्त करार दें और उसके बाद बहुत संभव है कि उसे क्षमादान मिल जाए या फिर फांसी का फंदा। लेकिन अपराध इतना भयानक और स्तब्धकारी है कि इसे आगे घटित नहीं होना चाहिए! इसलिए एक क़ानून बना कि ऐसे जघन्य मामलों में अपराधियों से जुड़ी परिस्थितियों पर हमें विचार करने की ज़रूरत ही नहीं है। इन मामलों में सिर्फ़ अपराध के इर्द-गिर्द की परिस्थितियों को परखा जाना चाहिए! और इस तरह रावजी को फांसी के तख़्त पर भेज दिया गया। 

बच्चन सिंह के मामले में तय किए गए सिद्धांत के मुताबिक़ क़ानून चलने लगा। इसी तरह सुरजा राम को फांसी हुई। और इसके अगले एक दशक में 12 लोगों को फांसी पर झुलाया गया। लगभग 15 लोगों को इस ग़लत सिद्धांत के आधार पर मौत की सजा मुकर्रर हुई। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने रावजी के अलावा सात और मामलों को ग़लत बताया और कहा कि इसमें क़ानूनी चूक हुई थी। इसके बाद दो और खंडपीठों ने यही निष्कर्ष निकाले। लेकिन तब तक फांसी के फंदे पर झूल चुके रावजी सहित बाकी कैदियों के लिए बहुत देर हो चुकी थी। उसके बाद एक क़ैदी को किशोर घोषित किया गया और बाक़ी चार के मृत्युदंड को सरकार ने माफ़ कर दिया। सात क़ैदी मृत्युदंड की कतार में खड़े रहे, इसके बावज़ूद कि सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में ये माना कि उनके फ़ैसलों में चूक हुई है। 

जब उच्च और उच्चतम न्यायलय के 14 जजों ने राष्ट्रपति से लिखकर इन मृत्युदंडों को माफ़ करने की अपील की तो उसके बाद एक सघन अभियान चलाया गया। इनमें सायबाना का मामला भी शामिल था। गृह मंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति ने हाल ही में सायबाना की दया याचिका ख़ारिज कर दी है। सायबाना को अब कभी भी फांसी के तख़्ते पर भेजा जा सकता है। बाकी छह क़ैदियों की दया याचिका पर फैसले अभी लंबित हैं। 
सायबाना केस के बारे में मैं कुछ जानकारी देता हूं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 303 में एक उपबंध हुआ करता था कि अगर आजीवन कारावास काट रहा कोई व्यक्ति उसी दौरान दूसरी हत्या करता है तो उसे निश्चित तौर पर मौत की सजा मिलेगी। यह अनिवार्य मृत्युदंड था। 1983 में क़ानून के इस खंड को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। क़ानून में इस संशोधन के 20 साल बाद सायबाना पर 303 के तहत आरोप लगाए गए। यानी जिस समय विधि संहिता से उस उपबंध को हटा दिया गया उसके बाद उस विलुप्त क़ानूनी धारा के तहत उसे 'अनिवार्य मृत्युदंड' सुनाया गया। उसके वकील ने ट्रायल कोर्ट में जज के सामने यह बात रखी कि उनके मुवक्किल को जिस सेक्शन के तहत मौत की सजा दी गई है वो क़ानून में मौजूद ही नहीं है। यहां अनिवार्य मृत्युदंड और विवेकाधीन मृत्युदंड में फर्क़ को समझना ज़रूरी हो जाता है। विवेकाधीन मृत्युदंड में आरोपी के पास ये अधिकार होता है कि वो कोर्ट के सामने उन परिस्थितियों को जाहिर करें जिनके तहत उसने घटना को अंजाम दिया। कोर्ट उस पर विचार करने के बाद ये तय करता है कि मामले में सही सजा क्या मुकर्रर की जाए, क्योंकि ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कह रखा है कि सुनवाई के वक़्त अपराध और अपराधी दोनों की परिस्थितियों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए। इसलिए ऐसे मौक़े पर यह सुनवाई निर्णायक हो जाती है। 

सायबाना केस में चूंकि जज ने धारा 303 के तहत कार्यवाही की, जहां अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान है, इसलिए वहां सजा सुनाने के बीच किसी भी तरह की सुनवाई का या फिर परिस्थितिजन्य सबूत पेश करने का कोई मौका ही नहीं था। इस तरह सायबाना पर आरोप तय हुए। मामला जब उच्च न्यायालय में पहुंचा तो ग़लती की पड़ताल हुई कि आरोपित को धारा 303 के तहत दोषी ठहराया गया। धारा 303 को विधि संहिता से हटाने के 23 साल बाद की ये घटना है। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने ये पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सायबाना पर धारा 303 के तहत आरोप तय किया है और उच्च न्यायालय ने धारा 302 के तहत फ़ैसले को बरक़रार रखा है। मामले में चूंकि रिकॉर्ड पर शमन परिस्थितियां दर्ज़ नहीं थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने धारा 302 के तहत मृत्युदंड को बरकार रखा। केस में धारा 302 कहीं से भी परिदृश्य में नहीं था और रिकॉर्ड भी उतना ही साफ़ था। जब मामले की कोई सुनवाई ही नहीं हुई तो शमन परिस्थितियां कैसे मौजूद हो सकती है? इसके बावज़ूद कि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में मामले को PER INCURIAM (यानी जिस मामले का कोई वैधानिक प्रावधान न हो और नही किसी पुराने फैसले से उसके तार जुड़ते हो) बताया और 14 जजों ने राष्ट्रपति से लिखकर क्षमादान का समर्थन किया, राष्ट्रपति ने उसकी क्षमाचायना को अस्वीकार कर दिया। 

फांसी किसको मिलती है, ज़रा अमेरिका के आंकड़े देखिए।
भारत के मामले में ब्लैक को दलित-अल्पसंख्यक-
आदिवासी-ग़रीब पढ़िए
अब राजीव गांधी हत्याकांड पर आते हैं। ट्रायल कोर्ट में 26 लोगों पर राजीव गांधी की हत्या का मुकदमा चला। सभी 26 लोगों को दोषी पाया गया और सबको मौत की सजा सुनाई गई। उनपर टाडा के तहत आरोप तय किए गए, जहां से हाई कोर्ट में अपील का कोई प्रावधान नहीं था क्योंकि वो फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह काम कर रहा था। इसलिए मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड की सजा पाए 26 में से 19 लोगों को बरी कर दिया। पहले सुनाए गए फैसले और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच के विशाल अंतर को देखिए! न्यायव्यवस्था में कुछ तो भयानक गड़बड़ी है कि पहले यह 26 लोगों के नाम मौत की सजा का फरमान जारी करती है और पहली चुनौती में ही 19 को दोषमुक्त बताती है। बचे हुए सात लोगों में से चार को सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक उनमें से एक लड़के का दोष महज इतना है कि उसने उन लोगों के लिए 14 वोल्ट की बैटरी लाने का काम किया जिन्होंने धानू में बम प्लांट किया था। 

मैंने पहले ही ये कहा है कि सामान्य क़ानून के तहत आत्म-स्वीकृति को सबूत के तौर पर नहीं स्वीकारा जाता लेकिन टाडा जैसे विशेष क़ानून के तहत आरोपी की स्वीकृति को सबूत समझा जाता है। राजीव गांधी हत्या मामले में इन सात लोगों की आत्म-स्वीकृति को रिकॉर्ड किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को माना कि वहां पर टाडा के तहत गिने जाने वाले अपराध को नहीं माना जाएगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें टाडा से मुक्त कर दिया। अब अगर टाडा उन पर लागू ही नहीं होता तो उनकी आत्म-स्वीकृतियों को भी बतौर सबूत ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'नहीं'। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि चूंकि उन्हें टाडा के तहत पकड़ा गया है और टाडा यह कहता है कि आत्म-स्वीकृति को दोष साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है इसलिए उसे पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता। तो कल को आप एक ऐसे चोर को टाडा के तहत दोषी मानते हुए पकड़ते हैं, जिनपर और कोई दूसरे आरोप न हो, तो टाडा के अलावा चोरी के तहत दोषी पाए जाने पर उनका क्या करेंगे? इस तरह के जजों की तर्क पद्धति यही है कि उन्हें आतंकवाद के मामलों से तो बरी कर दिया जाए लेकिन चोरी की सजा मिले!

मनमाना होने के अलावा मृत्युदंड भेदभाव से भी भरा हुआ है। जस्टिस कृष्णा ने राजेंद्र प्रसाद के मामले में ये महसूस किया कि मृत्युदंड में वर्गीय नज़रिया शामिल था। जिन 12 निर्दोष क़ैदियो को फांसी हुईं उनमें से 12 का मुकदमा सरकारी ख़र्चे पर लड़ा जा रहा था। आम तौर पर मृत्युदंड वाला मामला 6-9 महीनें तक खिंचता है। ज़्यादातर जगहों पर सरकारी वक़ीलों को एक मृत्युदंड के मामले में 500 से 2000 रुपए भुगतान किए जाते हैं, ट्रायल और हाई कोर्ट में यही दर है। सुप्रीम कोर्ट में अपील जाने पर उन्हें 4000 रुपए दिए जाते हैं। दशकों से यह फीस यहीं पर अटकी हुई है और इसमें आने-जाने और विविध मदों में होने वाले ख़र्चों को शामिल नहीं किया जाता। क़ानूनी सहायता के नियम के मुताबिक़ मृत्युदंड के हर मामले में किसी वरिष्ठ वकील को केस लड़ने का प्रावधान है, लेकिन विरले ही ऐसा हो पाता है। नए अनुभवहीन रण बांकुड़ों को केस की लगाम थमाकर अनुभवी अहाते से बाहर खड़े रहते हैं। इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि जिस कोर्ट में अपील होती है वो ज़्यादातर ऐसे मामलों को वापस ट्रायल कोर्ट में भेज देती है, क्योंकि वहां पर क़ैदी का ठीक तरीके से बचाव ही नहीं होकर आता। लेकिन इनमें से ज़्यादातर मामलों में जहां-तहां दरार पड़ी होती है। इसलिए ये चौंकाने वाला तथ्य नहीं है कि फैसलों में लापरवाही, ग़लत तरीके से आरोप तय करने से लेकर फ़ांसी तक की सजा को (सरकारी) क़ानूनी सहायता से नहीं लड़ा जा सकता। मृत्युदंड के ऐसे क़ैदी जो ग़रीबी की मार झेल रहे हो उन्हें मामूली सरकारी चंदे वाली क़ानूनी सहायता देकर फिर से उस चक्र में झोंक दिया जाता है।  

संविधान में हरेक नागरिक को क़ानून से सामने समानता का अधिकार हासिल है, जिसका मतलब है कि किसी की वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखे बग़ैर मुकदमा में सबको समान फ़ैसला मिलेगा। अदालत को इस वायदे का निर्वाह करना चाहिए क्योंकि न्यायिक वैधानिकता की वो जड़ है। चूंकि मृत्युदंड में अब तक ऐसी समानता, स्थिरता और साफ़गोई देखने को नहीं मिली है, इसलिए इसका उन्मूलन होना चाहिए। नहीं तो, ईर्ष्या के एवज में हुई हत्या और न्यायिक हत्या में क्या फ़र्क रह जाएगा?   

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अब तीसरे भाग की तरफ़ चलते हैं। फांसी देने के तरीकों पर बात करते हैं। ऐतिहासिक तौर पर क्षमादान की शक्ति प्रभु वर्ग के हाथ में निहित है। इस शक्ति को बनाए रखने का यह बेहतर तरीका है। ये एक जरिया है ताकि न्यायिक प्रशासन की ग़लतियों को भी दुरुस्त किया जा सके। ग़ुस्सैल फ़ैसले पर ठंडा पानी छिड़कने के लिए यह प्रावधान है। न्याय के अर्थ का दायरा जिस हद तक व्यापक है वहां तक क़ानून नहीं पहुंच सकता। इसलिए इस शक्ति को बनाए रखना ज़रूरी भी है। यही वजह है कि लगभग सारे देशों के पास क्षमादान की व्यवस्था है। लेकिन अगर क्षमादान की शक्ति के इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर नज़र दौड़ाएं तो आप पाएंगे कि सरकार के लिए अलग-अलग तात्कालिक मुद्दों से मुंह चुराने के लिए यह हथकंडे के तौर पर उभरी है। आप अजमल कसाब की फांसी के समय को देखिए। आप सिर्फ़ समय को देखते रहिए। अजमल, अफ़जल सबके समय को। 2001 में संसद पर हुआ, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया, 2013 में अफ़जल को फांसी पर लटकाया गया। आठ साल बाद और संयोग से आज ही (9 फरवरी)। मैं यह कह सकता हूं कि संसद भवन पर हमले के जुर्म में उसे फांसी नहीं दी गई है। आठ साल से क्षमा चायिका को लंबित रखा गया और आज उस समय, जब यूपीए सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध सहित कई मोर्चों पर बीजेपी पीछे धकेल रही है, अचानक उसे फांसी चढ़ा दी गई। संसद का सत्र इस बार भी जल्द ही शुरू होने वाला है, ठीक वैसे ही जैसे कसाब की फांसी के बाद हुआ था।  
मृत्युदंड-विरोधी आंदोलन दुनिया के कई देशों में लंबे समय से चल रहा है।

फांसी के तरीकों और निहितार्थ पर सवाल ज़रूर उठने चाहिए। संविधान की धारा 21 अपरिहार्य रूप से सारे मनुष्य पर लागू होती है, उन पर भी जो भारत का नागरिक नहीं है। अनुच्छेद 21 कहता है कि क़ानूनी रूप से स्थापित प्रक्रियाओं के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी और निजी आज़ादी से बेदख़ल नहीं किया जा सकता। और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ वो क़ानूनी प्रक्रिया निष्पक्ष, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। अगर आप किसी व्यक्ति की ज़िंदगी लेने जा रहे हैं तो आप इन क़ानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही ऐसा कर सकते हैं। क़ानूनी तौर पर ये प्रक्रिया क्या है? इस मुद्दे पर सरकारी नियम कहता है कि जब कोई क्षमा याचिका दायर की जाती है तो उस याचिका को ख़ारिज करने के बाद उस व्यक्ति को सूचित किया जाना चाहिए जिसने वो याचिका दायर की है। क़ैदी और परिवार के सदस्यो को याचिका ख़ारिज किए जाने और फांसी की तारीख़ के बारे में पहले से सूचित किया जाना चाहिए।  

कसाब के मामले में जब याचिका ख़ारिज की गई तो एक पत्रकार ने इस मामले पर आरटीआई किया और ख़ारिज किए जाने के एक दिन बाद उन्हें लिखित में जवाब आया कि वो मामला अभी भी लंबित है! ऐसे झूठ बोलने की ज़रूरत क्यों है? एक सरकार को झूठ नहीं बोलना चाहिए। ख़ुद सरकार द्वारा तय की गई प्रक्रिया का उल्लंघन करने की ज़रूरत क्यों आन पड़ती है? सरकार के पास पहले से जब कसाब को फांसी देने के न्यायिक वारंट मौजूद है तो बिना उसके परिवार को इत्तला किए और दुनिया को अंधेरे में रखकर वो क्यों फांसी दे रही है? उसके पास उसके परिवार का पता मौजूद है। बड़ी तादाद में लोगों ने कसाब के लिए क्षमादान की याचिका लगाई। उन्हें इस बात की कोई भनक तक नहीं है कि उनकी याचिका ख़ारिज की जा चुकी है। नियम के मुताबिक़ याचिकाकर्ता को ये सूचना अनिवार्य तौर पर दी जानी चाहिए। नियम ऐसा क्यों कहता है? क्योंकि अंतिम सांस तक किसी व्यक्ति को न्यायिक उपचार का अधिकार हासिल है और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ अगर दया याचिका को ख़ारिज किए जाने में लंबा वक़्त लगता है तो वह फिर से सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने मृत्युदंड को माफ़ करने के लिए अर्जी लगा सकता है। अगर अधिकार मौजूद है तो उसका इस्तेमाल होने देना चाहिए। इसलिए याचिका ख़ारिज किए जाने और फांसी की तारीख़ के बीच के खंड में आरोपी इस अधिकार का इस्तेमाल करता है। लेकिन अजमल कसाब और अफ़जल गुरु, दोनों को यह मौका नहीं दिया गया। कसाब की फांसी के बाद केंद्रीय गृह मंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने आधिकारिक तौर पर ये कहा कि उन्होंने कसाब को गुपचुप फांसी इसलिए दी क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि लोग कोर्ट का रुख करे।    
   
अफ़जल गुरु की फांसी के बाद गृह मंत्री ने इसे फिर दोहराया। लोकतंत्र के लिए यह एक हैरतअंगेज़ कथन है। देश के गृह मंत्री द्वारा विधि सम्मत नियम की यह बेशर्म उपेक्षा है। क्या हम पुलिस राज्य में नहीं तब्दील होते जा रहे हैं? अफ़जल गुरु के पास पत्नी थी, परिवार था और वो भी दिल्ली से बहुत दूर नहीं। विधि संहिता द्वारा एक क़ैदी को उनसे मिलने का जो अधिकार प्राप्त है उससे उनको वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पहले कसाब के साथ उन्होंने ऐसा किया और अब अफज़ल गुरु के साथ।    

हाल ही में ये दिखाने के लिए कि वो महिला अधिकार को लेकर कितने सचेत और अपराध पर कितने अड़ियल है, भूतपूर्व सब इंस्पेक्टर और हमारे मौजूदा गृहमंत्री ने गौरवान्वित भाव से ये कहा कि वे किसी भी बलात्कारी के मृत्युदंड की क्षमा चायिका को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। जाहिर है, इससे महिलाओं के लिए सड़कें ज़्यादा महफ़ूज हो जाएंगी, ठीक वैसे ही जैसे कसाब को फांसी चढ़ाने से भारत पर आतंकवादी हमले बंद हो गए और जिस तरह सायबाना और दास को फांसी चढ़ाने से दोहरी हत्याकांड देश से विलुप्त हो जाएंगी! फांसी और इसके समर्थन में उठी आवाज़ें राजनेताओं के लिए रंगमंच की सामग्री का काम करती है और इस बिनाह पर वो दावा करते हैं कि अपराध पर वो बेहद सख़्त हैं। अपराध के कारणों की तह तक पहुंचने और भविष्य में किसी भी तरह के हमलों से बचने के लिए सुरक्षा के जो अनिवार्य, लेकिन मुश्किल और जटिल, तरीके हो सकते हैं उनपर तवज्जों देने और उसे सुलझाने के बजाए एक व्यक्ति के जीवन का दांव लगाकर बेहद आसान और सस्ते तरीके से लोगों के ग़ुस्से को ये कहकर शांत कर दिया जाता है कि इन समस्याओं से निजात दिलाने के लिए ऐसे कदम की सरकार को दरकार है! 

वास्तव में मृत्युदंड ध्यान भटकाव का एक ठोस तरीका है ताकि सरकार ऐसे मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा सके जिनपर चर्चा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। यह लोगों के भीतर अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जो ख़ून की भूख उठती है उसे तुष्ट करने का जरिया है। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि एक व्यक्ति की मौत से मौजूदा समस्या शांत नहीं होती और न ही स्थाई तौर पर किसी भी मामले का निदान होता है, अलबत्ता इससे मामला ढंक-छिप ज़रूर जाता है। राज्य-समर्थित फांसी विपत्ति के समय ख़ून की हमारी प्यास को बुझाने के अलावा और कुछ नहीं करती। ख़ून के इस प्यास को बुझाने की कवायद और राज्य द्वारा किसी अपराधी को बधिया करने जैसे सजा के नए ख़यालात हमारे समाज से हिंसा ख़त्म करने की बजाए हमें और ज़्यादा हिंसक समाज में तब्दील कर देगा। अगर हमें नैतिक और करुणादायक समाज के रूप में ख़ुद को विकसित करना है और अपने बच्चों के सामने कम हिंस्र समाज का मॉडल ले जाना है तो हमें अपने भीतर से ऐसे ख़ूनी प्रतिकार के भाव को तजना होगा। 

एक फांसी के पीछे के सच हैं: न्यायिक चूक, मनगढ़ंत सबूत और कार्यान्वयन में हेरा-फेरी। इन्हीं तीन के मिश्रण से फांसी संपन्न होती है। मौत की सजा आम तौर पर रहस्यमयी क़ानूनी जिरह के बाद मटमैले कोर्टरूम में सुनाई जाती है जिन्हें समझना आम आदमी के लिए बेहद मुश्किल है। फिर ऊंची दीवारों से घिरे जेल परिसर में इसे अंजाम दिया जाता है। हालांकि व्यक्ति को मारकर सजा देने के राज्य के अधिकार पर ख़ूब चर्चा हुई हैं, लेकिन क़ैदी को जेल की खोली से फांसी के चबूतरे तक ले जाने की प्रक्रिया अभी भी गुप्त है। चूंकि हमारे नाम पर फांसी दी जाती है, इसलिए इसे जानने और अपनी पसंद तय करने का हमें पूरा हक़ है 
   
*युग मोहित चौधरी मुंबई उच्छ न्यायालय में अधिवक्ता हैं और भारत में मृत्युदंड के ख़िलाफ़ सक्रिय तौर पर अभियान चलाने वाले गिने-चुने लोगों में शुमार हैं।

**शाहिद आज़मी की 11 फरवरी 2010 को 32 साल की उम्र में उसके दफ़्तर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस वक़्त शाहिद आतंकवाद से जुड़े मसलों का केस लड़ रहे थे, जिनमें मालेगांव धमाकों में झूठे आरोप लगाकर पकड़े गए और 26/11 मुंबई हमलों के आरोप में गिरफ़्तार किए गए लोगों के मामले शामिल थे।