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27 अप्रैल 2016

जेएनयू के सौरभ शर्मा के नाम एक टीचर का खुला ख़त

(ये ख़त 19 मार्च को लिखा गया है। लेखिका ने अभी भेजा तो देर से छाप रहा हूं- मॉडरेटर )

प्रिय सौरभ शर्मा,

        मैं बहुत दिनों से तुमसे बात करने की सोच रही थी। परसों जब मैं JNU में अपनी बेटी से मिलने गई थी तो तुम मुझे दिखे भी थे। अनुपम खेर के लिए इंतजाम करने में मशगूल। सोचा भी कि तुमसे मिलकर आऊं, लेकिन तभी उमर और अनिर्बान की ज़मानत की ख़बर आई और देखते ही देखते एडमिन ब्लॉक पर लगने वाले नारों में मैंने ख़ुद को बह जाने दिया। उस खुशी का हिस्सा बन गई, जिसमें हमारी अगली पीढ़ी महफूज़ रहती है। पिछले कई दिनों (11 फरवरी ) से मैं ठीक से सो नहीं पाई थी। चिंता, परेशानी, डर, घृणा, अफ़सोस के साथ हतप्रभ थी। मैंने सोचा नहीं था मैं अपने जीवन में यह दिन देखूंगी। इमरजेंसी के समय मैं बहुत छोटी थी, कुछ भी याद नहीं है। बस सुना ही है उसके बारे में। लेकिन यह जो गुज़री हम सब पर यह भी कम ख़ौफ़नाक नहीं था। युद्ध जब युद्ध के नाम पर हो तब अपना पक्ष तय करना आसान होता है पर जब युद्ध प्रेम, संस्कृति, आस्था, शिक्षा, देश और विकास के नाम पर हो तो लड़ने के लिए बहुत ताक़त लगानी पड़ती है। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन इस लड़ाई की शुरुआत तुमने कर दी है। हालांकि मैं यह मानती हूँ कि तुम सिर्फ एक मोहरा हो और तुम्हारा इस्तेमाल किया गया है। जिन्होंने यह किया है उनका इतिहास दाग़दार है, हम सब यह जानते हैं। नमो गंगे से नमो दंगे तक की सारी प्रक्रिया से हम सब, पूरा देश वाकिफ़ है।
जेएनयू का प्रशासनिक भवन, जो प्रतिरोध की जगह में तब्दील हो गया
        दूसरी तरफ मैं यह भी मानती हूं कि तुम्हारा विश्वविद्यालय भी अल्टीमेट नहीं है वहाँ भी ज़रूर कुछ कमियां, कुछ ज्यादतियां और परेशानियां होंगी। इसका साफ प्रमाण है कि तुम वहां से चुनाव जीते और तुम्हारे विश्वविद्यालय ने तुम्हें JNU में काम करने का एक बेहतरीन मौका दिया लेकिन अफ़सोस तुमने यह बड़ा मौका गवां दिया और उस जमात में जा शामिल हुए जो बहुत दिनों से रंगे सियार की तरह तुम्हारे विश्वविद्यालय पर नज़रें गड़ाए हुए थे।  JNU की सारी कमियों के बावजूद तुम्हें भी यह मानने में परहेज़ नहीं होगा कि JNU हमेशा से सत्ता विरोधी रहा है। नंदीग्राम से लेकर पता नहीं कितने मुद्दों पर हर वक़्त बहस करने को भी तैयार रहता है। वैचारिक विरोध का मतलब वहां दुश्मनी तो कतई नहीं है। सौरभ मैं तुम्हें बताऊं मेरी बेटी तीन साल से वहाँ पढ़ रही है। मैं और उसके बाबा दोनों ही वहाँ पढ़ना चाहते थे पर पढ़ नहीं सके।  जिसका अफ़सोस थोड़ा कम हुआ जब हमारी बेटी ने वहां का एंट्रेंस क्लियर किया। हमने उसे शुरू से ही तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखने वाला इंसान बनाने की कोशिश की है और उसका व्यक्तित्व स्वतंत्र हो, किसी की छाया नहीं, दूसरों की बात सुनने-समझने का माद्दा हो। गलत चीज पर उसे बहुत गुस्सा आए। झूठ-फरेब से नफरत करे।  ऐसी कोशिश हमारी रही है। (कितनी पूरी हो पाई नहीं जानती, क्योंकि सीखने का कोई अंतिम दिन नहीं होता)। कुल मिलाकर मोटे तौर पर तुम यह कह सकते हो कि कुछ वामपंथियों जैसी विचारधारा वाला घर उसे मिला।

        JNU, जिसे वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है बड़ा ही स्वाभाविक था कि वह जाते ही किसी वामपंथी स्टूडेन्ट यूनियन से जुड़ जाती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और किसी वाम धड़े ने उसे बाध्य भी नहीं किया। उसने तय किया कि अभी वो सबको, सबके काम को देखेगी फिर सोचेगी कि किसके साथ जुड़ना है, हो सकता था कि तुमसे जुड़ती। 'था' इसलिए लिख रही हूं कि अब ऐसा कभी नहीं होगा। तार्किक, समझदार और ईमानदार लोगों के लिए तुमने अपने रास्ते बंद कर लिए हैं। 

शेहला, रामा और कन्हैया
         मैं ये पत्र इसलिए लिख रही हूं कि मैं तुम्हारी, तुम जैसे युवा की पूरी बनावट समझना चाहती हूं। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि एक युवा दिमाग जो सबसे ज्यादा सवाल पूछता है, असहमतियां दर्ज करता है। लड़ता है, जूझ़ता है, ग़लत चीजों से सीधे जाकर भिड़ जाता है। कैसे, किसके प्रभाव से षड़यंत्र करने लगा, साम्प्रदायिक हो गया और सबसे बड़ी बात कि वर्ग शत्रु बन गया। दिल पर हाथ रख कर कहो सौरभ जब तुम्हारे साथियों (विरोधी ही सही) को पुलिस घसीट कर ले जा रही थी। तुम्हारे दिल की धड़कने बढ़ नहीं गई थीं ? आंखें भर नहीं आईं थी? जब कन्हैया को बेरहमी से मारा जा रहा था। असहाय होने की पीड़ा से तुम गुस्से से छटपटा नहीं रहे थे? जब उमर सिर्फ एक मुसलमान में बदल दिया गया और 'मास्टर माइंड' जैसी गालियों से मर रहा था। तुम्हारा दिमाग क्या शांत रह पाया था? वहाँ कोई हलचल नहीं हुई? रामा नागा, अनंत, अनिर्बान, आशुतोष तुम्हारे ही जैसे हाड़-मांस के स्टूडेन्ट जब 'देशद्रोही' में बदल दिए गए। तुम्हे अपने आकाओं से घृणा नहीं हुई? रामा तो शायद तुमसे भी ज्यादा ग़रीब परिवार का लड़का है। चलो इन सबको छोड़ो, शायद इन नामों से तुम्हे गुस्सा आता हो, कि ये सब तुम्हारे विरोधी हैं। लेकिन तुम्हें रोहित वेमुला से भी कोई लेना-देना नहीं है? टी.वी. पर जब तुमने कहा कि खेतों में पानी देकर तुमने पढ़ाई की है तो मुझे सुनकर अच्छा लगा, आज तुम अपनी मेहनत से JNU में हो यह जानकर और अच्छा लगा। लेकिन इसी तरह से रोहित के पढ़ने से तुम्हें खुशी क्यूं नहीं होती? उसकी मेहनत और तुम्हारी मेहनत में क्या फर्क रह जाता है? ऐसा क्या गुज़रता है कि रोहित की संस्थागत हत्या होती है और तुम एक लोकतांत्रिक संस्था की हत्या के अगुआ या चेहरा बन जाते हो? अपराध तुमसे हुआ है सौरभ लेकिन तुम स्टूडेन्ट हो इसलिए हम हमेशा इसे एक गलती कह कर सम्बोधित करेंगे क्योंकि अपराध की सज़ा होती है और गलतियां सुधारी जाती हैं। अपराधी से घृणा होती है और गलती करने वाले को सुबह का भूला कह कर सब कुछ भूल जाने का मन करता है। 

       हो सकता है अभी कुछ लोग तुमसे नफरत कर बैठे हों पर एक टीचर होने के नाते मैं तुमसे नफरत नहीं कर सकती। हां तुमसे नाराज़ हूं और बेहद नाराज़ हूं। हो सकता है तुम भी अपनी संस्था से नाराज़ हो और अलग पार्टी, अलग विचारधारा को अपना कर तुम अपनी नाराज़गी जता ही रहे थे फिर ऐसा क्या हुआ कि नाराज़ होते-होते तुम व्यक्तियों (कन्हैया, उमर, बान, अनंत, आशुतोष, शेहला, रामा आदि) से नफरत करने लगे। इतनी नफरत कि चुपके से तुमने ज़ी न्यूज़ को अपनी संस्था में सेंध लगाने के लिए बुला लिया। बहुत कुछ गुज़र गया सौरभ और जो कुछ घट चुका उसे लौटाया नहीं जा सकता-रोहित वेमुला को नहीं लौटाया जा सकता, कन्हैया, उमर और बान के जेल में बिताए दिन नहीं लौटाए जा सकते, कन्हैया की पिटाई का अपमान नहीं लौटाया जा सकता, उनके परिवारों पर जो गुज़री वो नहीं लौटाया जा सकता, तुम्हारे लोगों द्वारा दी गई भद्दी गालियों का दंश नहीं लौटाया जा सकता लेकिन फिर भी एक चीज़ है जो लौटाई जा सकती है और वो है तुम्हारी समझ और तुम्हारी मरी हुई आत्मा। 

उमर और अनिर्बान
      अगर ये लौट आए तो JNU  के बेलौस बेफिक्र दिन और रात लौट आएंगे। इस देश के दिलों में पड़ी दरार भर जायेगी। बसंत का मौसम लौट आएगा। राधिका वेमुला के होठों की मुस्कान लौट आयेगी। संघ अपने दड़बे में लौट जायेगा और एमएचआरडी के फरमान लौट जायेंगे। सौरभ तुम्हें लौटना इसलिए भी चाहिए कि जिस तरफ तुम खड़े हो उधर नफरत, घृणा, हिंसा, झूठ, कायरता, साम्प्रदायिकता और फासिज़्म है जिसे अंत में खुद की कनपटी पर गोली मारकर आत्महत्या करनी पड़ती है। और एक टीचर होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि तुम्हारा नाम इतिहास में एक धोखेबाज़ और विभीषण के तौर पर दर्ज़ हो क्यूंकि अगर ऐसा हुआ तो जब मेरी बेटी की बेटी JNU में पढ़ने जायेगी तो उसके सीनियर भी उसे सुनायेंगे ये कथा कि एक समय में यहाँ एक सौरभ शर्मा हुआ करता था...............। 

नोट: मेरा एक सुझाव है कि रबीन्द्र नाथ टैगौर का उपन्यास "गोरा" पढ़ लेना। शायद तुम्हें वापस लौटने में मदद मिले।     

05 दिसंबर 2011

गुप्तांगों में एसपी ने पत्थर भर डाले थे !


हिमांशु कुमार
माननीय न्यायाधीश महोदय,
सर्वोच्च न्यायालय,
नईदिल्ली
यह पत्र मैं आपको सोनी सोरी नाम की आदिवासी लड़की के सम्बन्ध में लिख रहा हूँ, जिसके गुप्तांगो में दंतेवाडा के एस.पी. ने पत्थर भर दिये थे और जिसका मुकदमा आपकी अदालत में चल रहा हैІ उस लड़की की मेडिकल जाँच आपके आदेश से कराई गई और डाक्टरों ने उस आदिवासी लड़की के आरोपों को सही पाया और डाक्टरी रिपोर्ट के साथ उस लड़की के गुप्तांगो से निकले हुए तीन पत्थर भी आपको भेज दिये І
कल दिनांक 02-12-2011 को अपने वो पत्थर देखने के बाद भी उस आदिवासी लड़की को छत्तीसगढ़ के जेल में ही रखने का आदेश दिया और छत्तीसगढ़ सरकार को डेढ़ महीने का समय जवाब देने के लिए दिया हैІ
जज साहब मेरी दो बेटियाँ हैं अगर किसी ने मेरी बेटियों के साथ ये सब किया होता तो मैं ऐसा करने वाले को डेढ़ महीना तो क्या डेढ़ मिनट की भी मोहलत न देता! और जज साहब अगर यह लड़की आपकी अपनी बेटी होती तो क्या उसके गुप्तांगों में पत्थर डालने वालों को भी आप पैंतालीस दिनों का समय देते? और क्या उससे ये पूछते कि आपने मेरी बेटी के गुप्तांगों में पत्थर क्यों डाले? पैंतालीस दिन के बाद आकर बता देना और तब तक तुम मेरी बेटी को अपने घर में बंद कर के रख सकते हो !
पत्थर डालने वाले उस बदमाश एस. पी. को पता है कि उसकी रक्षा करने के लिये आप यहाँ सुप्रीमकोर्ट में बैठे हुए हैं इसलिए वह बेफिक्र होकर खुलेआम इस तरह की हरकत करता है और आपके कल के आदेश ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है, कि इस तरह से हरकत करने वालों की रक्षा सुप्रीमकोर्ट लगातार उसी तरह करता रहेगा जिस प्रकार वो अंग्रेजों के समय से सरकारी पुलिस की रक्षा के लिए करता रहा हैІ
जज साहब ये अदालत उस आदिवासी लड़की की रक्षा के लिए बनायी गयी थी उस बदमाश एस.पी. के लिए नहीं І ये इस लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च न्यायालय है और इसका पहला काम देश के सबसे कमजोर लोगों की रक्षा सबसे पहले करने का है !आपको याद रखना पड़ेगा कि इस देश के सबसे कमजोर लोग महिलायें, आदिवासी, दलित, भूख से मरते हुए करोडों लोग हैं और इस अदालत को हर फैसला इन लोगों के हालत को बेहतर बनाने के लिए देना पड़ेगाІ लेकिन आजादी के बाद से इन सभी लोगों को आपकी तरफ से उपेक्षा और इनकी दुर्गति के लिए जिम्मेदार लोगों को संरक्षण दिया गया हैІ
मेरे पिताजी इस देश के आजादी के लिए लड़े थेІ उन सभी आजादी के दीवानों के क्या सपने थे? उन लोगों ने कभी कल्पना भी की होगी कि आज़ादी मिलने के बाद एक दिन इस देश की सर्वोच्च न्यायालय एक आदिवासी बच्ची के बजाय उसपर अत्याचार करनेवाले को संरक्षण प्रदान करेगीІ
हमें बचपन से बताया गया इस देश में लोकतंत्र है.इसका मतलब है करोडों आदिवासियों, करोडों दलितों, करोडों भूखों का तंत्र І लेकिन आपके सारे फैसले इन करोडों लोगों को बदहाली में धकेलने वाले लोगों के पक्ष में होते हैं І आपको जगतसिंहपुर उडीसा में अपनी जमीन बचाने के लिए गर्म रेत पर लेटे हुए औरतें व बच्चे दिखाई नहीं देते? उनके लिए आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता अभय साहू को जमीन छीनने वाले कंपनी मालिकों के आदेश पर सरकार द्वारा गिरफ्तारी आपको दिखाई नहीं देती?
आपकी अदालत में गोम्पाड गांव में सरकारी सुरक्षाबलों द्वारा तलवारों से काट डाले गये सोलह आदिवासियों का मुकदमा पिछले दो साल से घिसट रहा हैІ इस अदालत में उन आदिवासियों को लाते समय मुझे एक नक्सलवादी नेता ने चुनौती दी थी और कहा था कि इन आदिवासियों की हत्या करने वाले पुलिसवालों को अगर तुम सजा दिलवा दोगे तो मैं बंदूक छोड़ दूँगाІ
लेकिन मैं हार गयाІ इस अदालत में आने के सजा के तौर पर पुलिस ने उन आदिवासियों के परिवारों का अपहरण कर लिया और वे लोग आज भी पुलिस की अवैध हिरासत में हैं І आपने दोषियों को अब तक सजा न देकर इस देश की सरकार को नहीं जिताया, आपने मुझे चुनौती देने वाले उस नक्सलवादी को जीता दियाІ अब मैं किस मुंह से उस नक्सलवादी के सामने इस देश के महान लोकतंत्र और निष्पक्ष न्यायतंत्र की डींगे हांक सकता हूँ? और उसके बन्दूक उठाने को गलत ठहरा पाऊँगा ?
अगर इस देश में तानाशाही होती तो हमें संतोष होता, हम उस तानाशाही के खिलाफ लड़ रहे होते, परन्तु हमसे कहा गया कि देश में लोकतंत्र है ! परन्तु इस तंत्र की प्रत्येक संस्था, विधायिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका मिलकर करोडों लोगों के विरुद्ध और कुछ धनपशुओं के पक्ष में पूरी बेशर्मी के साथ कार्य कर रहे हैंІ इसे हम लोकतंत्र नहीं लोकतंत्र का ढोंग कहेंगे और अब हम लोकतन्त्र के नाम पर इस ढोंगतंत्र को एक दिन के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं І
आज मैं प्रण करता हूँ कि आज के बाद किसी गरीब का मुकदमा लेकर आपकी अदालत नहीं आऊंगाІ अब मैं जनता के बीच जाऊंगा और जनता को भड़काऊगा कि वह इस ढोंगतंत्र पर हमला करके इसे नष्ट कर दें ताकि सच्चे लोकतन्त्र की ईमारत खड़ी करने के लिए स्थान बनाया जा सकेІ
अगर आप इस लड़की को इसलिए न्याय नहीं दे पा रहे हैं कि उससे सरकार नाराज हो जाएगी और उससे आपकी तरक्की रुक जायेगी І तो ज़रा इतिहास पर नजर डालिए ! इतिहास गलत फैसला देने वाले न्यायाधीशों को कोई स्थान नहीं देता І सुकरात को सत्य बोलने के अपराध की सजा देने वाले न्यायाधीश का नाम कितने लोगों को याद है?
जीसस को चोरों के साथ सूली पर कीलों के साथ ठोक देने वाले जज को आज कौन जानता है? आपके इस अन्याय के बाद सोनी सोरी इतिहास में अमर हो जायेगी और इतिहास आपको अपनी किताब में आपका नाम लिखने के लिए एक छोटा सा कोना भी प्रदान नहीं करेगा І
हाँ अगर आप संविधान की सच्ची भावना के अनुरूप इस कमजोर, अकेली आदिवासी महिला को न्याय देते हैं तो सत्ताधीश भले ही आपको तरक्की न दें लेकिन आप अपनी नजरों में, अपनी परिवार के नजरों में और इस देश के नजरों में बहुत तरक्की पा जायेंगेІ
अगर आप इस पत्र को लिखने के बाद मुझे गिरफ्तार करते हैं तो मुझे गिरफ्तार होने का जरा भी दुःख नहीं होगा क्योंकि उसके बाद मैं कम से कम अपनी दोनों बेटियों से आँख मिलाकर बात तो कर पाउँगा,और कह पाउँगा कि मैं सोनी सोरी दीदी के साथ होनेवाले अत्याचारों के समय डर के कारण चुप नहीं रहा, और मैंने वही किया जो एक पिता को अपनी बेटी के अपमान के बाद करना चाहिए थाІ (जनज्वार से साभार) 


30 अक्टूबर 2011

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को खुला पत्र

सेवा में,
मुख्यमंत्री महोदया,
पश्चिम बंगाल सरकार
कोलकाता।
मैडम,
पिछले सप्ताह इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले हम में से कुछ लोगों ने आपको एक खुली अपील भेजकर प्रार्थना की थी कि आप व्यक्तिगत पहलकदमी लेकर माओवादियों के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करें। क्योंकि हमारा मत है कि केवल इसी तरीके से हम उन लोगों से मतभेदों को हल कर सकते हैं जोकि इसी धरती के बेटें और बेटियां हैं, और हमारे दुश्मन नहीं हैं। हम इस पर भी जोर देते हैं कि मुद्दा केवल कानून और अर्थव्यवस्था से ही जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सामाजिक-आर्थिक तंगहाली में है और इसलिए यह एक पूर्णतया अलग तरह की मांग करता है। माओवादी की तरफ से हथियारबंद कार्रवाई पर रोक लगाने के बारे में आपके द्वारा बनाए गए मध्यस्थों के समूह ने भी 30 सितम्बर, 2011 को माओवादियों की राज्य नेतृत्व के साथ एक संयुक्त घोषणा की थी जिसकी शर्त यह थी कि आपकी सरकार भी ऐसा ही करेगी।
इस संदर्भ में, आपके द्वारा सम्बोधित की गई झारग्राम जनसभा का विशेष महत्व था। ऐसी आशा की जा रही थी कि आप संयुक्त बलों की वापिसी, राजनैतिक बंदियों की रिहाई और निसंदेह माओवादियों से बातचीत की जरूरत के बारे में कुछ घोषणा करेंगी। परन्तु सभा में जो तमाशा लफ्फाजी, ढोंग हुआ, वह उस पूर्व के निश्चय के साथ विश्वासघात था जो आपने जंगलमहल के लोगों के साथ होने वाले अन्याय की गंभीरता की तरफदारी करने में दिखाई थी। विश्वास का यह संकट उन सबके लिए अपमान के समान है जो जंगलमहल के लोगों द्वारा उठाए गए सवालों को सुलझाने के लिए न्याय के सिद्धांत को मुख्य आधार बनाकर नई रोशनी में इस मुद्दे को हल करने के उद्देश्य से पहलकदमी ले रहे थे।
माओवादियों द्वारा साफतौर पर की गई युद्धविराम की पेशकश के केन्द्रीय मुद्दे को एक तरफ करके माओवादियों को ‘सुपारीकिलर’ और ‘जंगलमाफिया’ के रूप में आरोपित करना गैर-जरूरी है। ममता बनर्जी ने उस गंभीरता और समझ से विश्वासघात करके मामले को ज्यादा खराब किया है जिसके तहत एक मुख्यमंत्री के रूप में वह हरेक को यह विश्वास दिलाना चाहती थी कि उसकी सरकार माओवादियों द्वारा सामने लाए गए मुद्दों को हल करने में सक्षम है। ऐसे कथनों की निंदा ही की जा सकती है। इसके साथ इस पूरे मामले को ऐतिहासिक रूप से देखना भी प्रसांगिक होगा कि नक्सलवादी आन्दोलन ही पहली बार विकास के सवाल को केन्द्र बिन्दू में लाया था। और इसी विरासत के तौर पर माओवादी आन्दोलन ही तंगहाल आदिवासियों, दलितों और अन्य वंचित अल्पसंख्यकों को विकास पर बहस के केन्द्र में खींच कर लाया था जोकि आपकी सरकार द्वारा प्रस्तावित विजिन के एकदम विपरित रूख रखता है। माओवादियों ने बार बार साफतौर पर कहा है कि यदि सारा विकास आदिवासियों, दलितों और अन्य उत्पीड़ित व वंचित तबकों के हितों को केन्द्र में रखता है तो वे स्वतः विकसित हो जाएंगें और शेष उपमहाद्विप उनका अनुसरण करेगा।
दूसरे शब्दों में, यदि किसी भी गंभीर व्यक्ति को चालीस सालों से अस्तित्वमान इस महत्वपूर्ण सवाल को हल करने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। सरकारी नौकरशाहों और अधिकारियों, केन्द्र और विभिन्न सरकारों द्वारा नियुक्त विभिन्न कमेटियों की रिपोर्टांे सहित कई लोगों ने इस बात की पुष्टि की है। लोगों की वास्तविक मांगों को दरकिनार कर आपने जिस तरीके से जंगलमहल के विकास का आश्वासन दिया है उसे सरकार के बतौर उपयुक्त और पर्याप्त समझ नहीं माना जा सकता। हम आपसे आग्रह करते हैं कि जंगल महल के दृढ़निश्चयी लोगों द्वारा सरकार की और किए गए सवालों का निड़रता से हल करें। हाल में दो खबरों ने इस बिंदु पर जोर दिया है।
17 अक्टूबर, 2011 को द हिंदु में छपी रिपोर्ट के अनुसार - ‘मध्यस्थों की छः सदस्यों की टीम के मुखिया सुजातो भद्रों ने कहा कि मुख्यमंत्री को ‘‘शब्दों का प्रयोग करने में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। यह सच है कि सरकार और माओवादियों में अभी भी तनाव कायम है। परन्तु ऐसी टिप्पणी राजनैतिक दूरी ही बनाएंगी।’’ यह उन्होंने एक प्रेस वार्ता में कहे। वह शनिवार को पश्चिमी मिदनापुर के झारग्राम में हुई रैली में सुश्री बनर्जी द्वारा प्रयोग किए गए ‘सुपारीकिलर’ और ‘जंगलमाफिया’ जैसे शब्दों के संदर्भ में यह बात कह रहे थे। 17 अक्टूबर, 2011 को ही हिंदूस्तान टाईम्स में छपा - ‘एक मध्यस्थ ने कहा है कि ‘‘...ऐसे समय में जब शान्ति प्रक्रिया जारी है, उनकी भावना और शरीर की हरकतें इतनी खराब थी कि अब से शान्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना निरर्थक है..। शीर्ष माओवादी नेता आकाश ने इसी साल के तीन अक्तुबर से एक माह के युद्धविराम की पेशकश की थी। तब से वे अपने वचन पर कायम रहे हैं। परन्तु राज्य सरकार इसके ठीक विपरित चलती नजर आ रही है। ऐसे में क्यों आगे बढ़ें? इससे अच्छा होगा कि हमें मध्यस्थता करने के कार्यभार से मुक्त कर दिया जाए।’’ इन शब्दों के प्रयोग को नियंत्रित करना, और इससे भी महत्वपूर्ण, इन राजनैतिक ताकतों के प्रति दृष्टिकोण को बदलना समय की मांग है।
आपने भाषण में कहा कि माओवादी हिंसा में लिप्त हो रहे हैं। उन्होनें तीन लोगों को मार दिया है। जबकि संयुक्त सैन्य बल कोई सैन्य अभियान नहीं चला रहे हैं। यह अधुरा सच नहीं है। पिछले कई दशको सहित चुनाव पूर्व और बाद के दौर में हुई कितने लोगों की हत्याओं में मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टीयां संलिप्त रही हैं? सच यह है कि 30 सितम्बर, 2011 को आपके मध्यस्थों द्वारा संयुक्त घोषणा किए जाने के बाद से एक हत्या में भी माओवादियों का हाथ नहीं है। यह आपके अपने मध्यस्थों ने ही उस समय चिन्हित किया है जब केन्द्र सरकार और केन्द्र व राज्य की नौकरशाही व शीर्ष पुलिस अधिकारी जंगलमहल में अपने ही देशवासियों, जिसमें माओवादी भी शामिल हैं, के खिलाफ युद्ध के नगाड़े बजा रहे हैं। दूसरी तरफ, आपकी पुलिस और संयुक्त बल हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठें हैं, चाहे आप और आपके शीर्ष अधिकारी कितनी ही उची आवाज में बोलकर जनता को इसका विश्वास दिलाने की कोशिश क्यों न कर रहे हों। मीडिया, भुक्तभोगियों और उनके रिश्तेदारों के जरिए पुलिस और संयुक्त बलों द्वारा गिरफ्तार करने, बलात्कार करने और छापामारी करने की खबरें सामने आ रहे हैं। वे गांवों में छापामारी कर रहे हैं, ग्रामीणों को भगा रहंे हैं और तंग कर रहे हैं, गुजारा चलाने के लिए साल पत्तों और जलावन को इक्ठ्ठा करने से भी रोक रहे हैं। हमें नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के जरिए यह जानकारी मिली है कि सालबोनी के बांकीसोल की हालिया मुठभेड़ की कहानी झूठी थी। दस्ता सदस्यों के रूप में गिरफ्तार दिखाए गए तीन लोग वास्तव में साधारण ग्रामीण थे जो जलावन इक्ठ्ठा करने गए थे। इसके साथ, जिला प्रशासन ने जनवादी सभा करने और अभिव्यक्ति व आलोचना की स्वतंत्राता के जनता के संवैधानिक अधिकारों पर अलिखित प्रतिबंध लगा दिया है। अभी तक आपके बलों ने लगभग 80 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें वो आठ लोग भी शामिल हैं जिन्हें बेलपहाड़ी से गिरफ्तार किया गया था और बाद में पड़ोसी राज्य में यूएपीए में केस दर्ज करने के लिए झारखंड पुलिस को सौंप दिया गया। व्यापक जनमत से बनी नवनिर्मित सरकार तथ्यों को दबाकर गैरकानूनी चीजें कैसे कर सकती है? 21 अक्टूबर को लोधा-शबर कल्याण समिति ने पश्चिमी मिदनापुर जिला मजिस्ट्रेट को शिकायत की कि तलाशी अभियान के नाम पर पुलिस और संयुक्त सैन्य बल निरिह लोगों को यातनाएं दे रहे हैं और इस कारण अल्गेरिया गांव के 16 शबर परिवारों को गांव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। (आनन्द बाजार पत्रिका, 22 सितम्बर, 2011)। 26 अक्टुबर को हमें नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने बताया की कि गोलटोर इलाके के पटासोल गांव में भैरव वाहिनी ने गोपाल पांडे के घर को लूट लिया। हालांकि गोपाल बच गया, परन्तु उसकी 62 साल की मां अरूणा पांडे, 30 वर्षीय पत्नी सरिता पांडे और 9 साल की बेटी छोटी को उठा ले गए। अभी तक पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। एक मुख्यमंत्राी सह पुलिस मंत्राी होने के नाते इतनी ठोस वास्तविकताओं को आप नजरंदाज नहीं कर सकते। जंगलमहल में ‘भैरव वाहिनी’ के बतौर प्रसिद्ध नए दमनकारी गुंडा बल के बारे में आपको बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आप इसके बारे में जानती ही होंगी। लोगों को कहना है कि यह बल आपके अपने टीएमसी के लोगों ने ही बनाया है जो सीपीएम के ‘हरमदों’ की जगह ले रहा है और जंगल माफिया की तरह काम कर रहा है और लोगों को मार रहा है। वे सादी वर्दी वाले बलों के साथ आधुनिक हथियार लेकर घूम रहा है और उनसे उसी प्रकार संरक्षण प्राप्त कर रहा है जिस तरह पुराने शासन के तहत सीपीएम हरमदों को संरक्षण देती थी।
स्थानीय लोगों, स्थानीय जन संगठनों से बातचीत करना ज्यादा सार्थक होता जोकि आपसे मिलकर लिखित में अपनी शिकायतें देना चाहते थे। और निश्चित रूप से एक राजनैतिक नेता के बतौर जमीनी स्थिति का सीधे अनुभव लेते जब लोग मुख्यमंत्राी से मिलकर बात करने की इच्छा जाहिर कर रहे थे। यह दुर्भाग्य है कि आपने अपने खुफिया अधिकारियों, नौकरशाहों और अपनी पार्टी के एक हिस्से से बात कर जमीनी स्थिति को जानने का निर्णय लिया।
अपने भाषण में, आपने उन टीएमसी सदस्यों के परिवार के सदस्यों को मुआवजा देने की घोषणा की जो आपके अनुसार माओवादियों द्वारा मारे गए थे। सभी मौतें- विशेषतः हमारी धरती के बेटे-बेटियों की मौंतें- दर्दनाक होती हैं। तब संयुक्त बलों, पुलिस और हरमद की गोलियों से मारे गए लोगों को मुआवजा क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? लालमोहन टुड्डु, सिद्धु सोरेन और उमाकांत महतो जैसे बड़ी संख्या में झूठी मुठभेडों में मारे गए आदिवासियों और अन्य गरीब लोगों का क्या किया होगा? उन महिलाओं का क्या होगा जिनके साथ राज्य बलों और हरमदों ने बलात्कार किया था जिन्हें उत्पीड़ित किया था? क्या वे मुआवजे के योग्य नहीं हैं? क्या वे हमारी धरती की बेटे-बेटियां नहीं हैं? क्या आपको दिल से महसूस नहीं होता कि उनके साथ गंभीर अन्याय हुआ है और आतंक व निर्ममता के लिए जिम्मेवार लोगों पर भी केस दर्ज होने चाहिए? आपकी और पालानिआपन चिदम्बरम की सशस्त्रा बलों के दोषियों की सूची बहुत लम्बी है। क्यों आप स्वतंत्रा जांच करवाने के लिए तैयार नहीं हो और क्यों आप लोगों के खिलाफ खुंखार अपराध करने वाले पुलिस और संयुक्त बलों पर कार्रवाई नहीं कर रही है? ऐसा नहीं करके क्या आप ‘हम’ और ‘वे’ का उसी तरह का भेद पैदा नहीं कर रही है जैसाकि आपके पूर्व के लोगों ने किया था और उसके परिणामस्वरूप तबाह हो गए थे?
अपने भाषण में एक बार फिर आपने ‘कुछ लोगों’ को चेतावनी दी है जो जंगलमहल के लोगों को उकसाने के लिए कोलकाता से आते हैं। यह बात अलिमुद्धिन स्ट्रीट के उस्तादों द्वारा पहले के दिनों में उठाई गई ‘बाहरी लोगों’ के बहाने का स्मरण कराती है। आपको यह याद दिलाना प्रसांगिक होगा कि नंदीग्राम और सिंगुर के संघर्षरत् लोगों के साथ एकजुटता में गए अन्य लोगों के साथ आप भी ‘बाहरी’ ही थे। यह अजीब है कि आप भी अपने आलोचकों के खिलाफ वही बहाना बना रही हैं। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इसे केवल एक तरीके से ही समझ सकता है कि पहले आप सत्ता में नहीं थी और अब आप सत्ता में हैं।
14 अक्टूबर को झारग्राम में आपके भाषण से सिर्फ एक दिन पहले संयुक्त बल और पुलिस बल बेलपहाड़ी थाना के अंतर्गत शिमुलपाल इलाके के सुसनीजोबी गांव के निवासी सुजन सिंहा के घर में उसे गिरफ्तार करने गए। उस समय सुजन घर में नहीं था। पुलिस और संयुक्त बलों को घर में उसकी पत्नी शिबानी मिली जिसके साथ उन्होनें कुकर्म और बलात्कार किया। आत्मसम्मान को पहुंची इस ठेस को वो सहन नहीं कर पाई और उसने अपनी जिंदगी खत्म करने के लिए जहर खा लिया। उसे सबसे पहले बेलपहाडी प्रखंड के स्वास्थय केन्द्र में ले जाया गया और उसके बाद अचेतन अवस्था में ही उसे झारग्राम अस्पाताल में भर्ती करवाया गया। झारग्राम के एसपी गौरव शर्मा ने उसके परिवार के सदस्यों को मैडिकल रिपोर्ट देने से इन्कार कर दिया। डाक्टर के प्रयासों का शुक्रिया जिसके कारण शिबानी की चेतना लौट आई और उसकी शिकायत पर उसके परिवार के सदस्यों ने बेलपहाड़ी थाने द्वारा अविश्वसनीय कारणों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने से मना करने के बाद झारग्राम के एसपी के आफिस में प्राथमिकी दर्ज करवाई। यह खबर मीडिया में उसी दिन आई थी जिस दिन आपने झारग्राम का दौरा किया था। क्या आपको याद है कि आपने सार्वजनिक तौर पर क्या कहा था? आपने कहा था कि जब भी पुलिसवाले गांवों में जांच के लिए घुसते हैं जो उन पर बलात्कार के आरोप लगा दिए जाते हैं। इसका क्या मतलब निकाला जाए? इसका मतलब है कि आपके पुलिस बल जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं और यदि वे यौन उत्पीड़न या बलात्कार भी करेंगें तो उन्हें आपकी और से सुरक्षा दी जाएगी। यह बलात्कार का लाईसैंस देने के बराबर है। क्या आप उन दिनों को पूरी तरह भूल गई हैं जब पुराने शासन के दौरान चापला सरदार के बलात्कार का केस सामने लाने के कारण आपकों पुलिस बलों ने राईटर बिल्ड़िंग से घसीटते हुए बाहर निकाल दिया था?
युद्धभेरी बजाने में किसका हित है? निसंदेह हरेक केन्द्रीय सत्ता अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले युद्ध पिपासु बन गए हैं। राज्य नौकरशाहों और शीर्ष पुलिस अधिकारियों का एक हिस्सा खुफिया गुप्तचर नेटवर्क बनाने के नाम पर लाखों रूपये छाप रहा है। उन्होंने पुराने शासन के दौरान सार्वजनिक धन का नाश किया है। पश्चिम मेदनीपुर के पुराने एसपी मनोज वर्मा, जो बदमाश के रूप में जाना जाता है, इनमें से एक है। नकदी की कमी वाले राज्य में इतना भारी खर्च क्यों किया जाए? क्या आप इसे दमन अभियानों पर खर्च करने की बजाए सार्वजनिक जनसुविधाओं के काम पर खर्च करना बुद्धिमानी नहीं समझती?
आपने दो कमेटिया बनाई - एक राजनैतिक बंदियों के केसों की समीक्षा के लिए और दूसरी माओवादियों से बात करने वाले सरकारी मध्यस्थों की। परन्तु समीक्षा कमेटी की शक्तियां क्या हैं? समीक्षा कमेटी ने पहले दौर में 78 राजनैतिक बंदियों को रिहा करने का अनुशंसा की। आपने उस सूची में से कुछ नाम हटा दिए, जोकि सभी माओवादी बंदी थे, और इस घटाकर 52 कर दिया। इन्हें 15 अगस्त को रिहा किया जाना था। उसके बाद आपने दो अन्य नामों का हटा दिया, इस बार भी माओवादी कैदियों के नाम हटाए गए। और अभी तक किसी को केस वापिस लेकर रिहा नहीं किया गया है। हम चकित हैं कि क्या चुनाव पूर्व के वायदे सिर्फ तोड़ने के लिए और लोगों को धोखा देने के लिए किए गए थे!
18 अक्टूबर को आप अपने मध्यस्थतों के साथ शीर्ष पुलिस अधिकारियों, नौकरशाहों और कुछ मुठ्ठी-भर मंत्रियों सहित मिले और मीडिया में छपी खबरों से पता लगता है कि इस सोच में शायद ही कोई बदलाव आया है। यह सारा खेल ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ का अभिन्न अंग है जिसे केन्द्र सरकार विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और घरेलू बड़े पूंजीपतियों के हित में अपने देश की जनता के खिलाफ ही चला रही है। इसका हिस्सा मत बनिए। अगर आप सात दिनों के बाद हमारे अपने लोगों के खिलाफ हर तरीका अपनाने के स्टैंड पर अडिग रहीं तो इसके परिणाम के बारे में भी थोड़ा सोचो कि यह कितने लोगों की बलि लेगा और इससे हमारे देशवासियों को कितनी परेशानी होगी। कितने आदमी और औरतें पुलिसवालों और संयुक्त बलों की गोलियों से मारे जाएंगें, कितने लोग जिंदगी भर के लिए अपंग हो जाएंगें, कितनी महिलाएं आपके बलों की वासना का शिकार बनेगीं? कितने लोग हमेशा के लिए गायब हो जाएंगें? कितनों को गिरफ्तार किया जाएगा और जेल भेजा जाएगा? जंगलमहल का लोगों को काफी मुसीबत झेलनी पड़ रही है। उन्हें इसलिए मुसीबत झेलनी पड़ रही है क्योंकि वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं। आज तक उन्हें न्याय देने से इन्कार किया जाता रहा है। क्या आप उनकी मुसीबतों को बढ़ाना चाहती हैं और उन्हें न्याय देने से इन्कार करना चाहती हैं? या क्या आप अपने सबसे अच्छे प्रयास करके यह देखना चाहती हैं कि न्याय का प्रसार हो और अत्याचारियों को सजा दी जाए? पुराना घृणास्पद शासन अपने अहंकार और जनता से अलगाव के कारण तबाह हो गया। इस पर दोबारा विचार कीजिए।
हम आपसे एकबार फिर अपील करते हैं कि माओवादियों और विभिन्न जनवादी संगठनों के प्रतिनिधियों जोकि जंगलमहल में पूर्व और हाल में भी राजकीय दमन के शिकार बने हैं, के साथ बातचीत करने के लिए बैठें। हम संयुक्त बलों को वापिस बुलाने, सभी राजनैतिक बंदियों की बेशर्त रिहाई और बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाने की मांगों को दोबारा दोहराते हैं।
हस्ताक्षरकर्ता:
तरूण सान्याल, एस ए आर गिलानी, जी एन साईंबाबा, मेहर इंजिनियर,अमित दियुति कुमार, हिमाद्री शंकर बनर्जी, रमेश राय, संमातानाथ घोष, कंचन कुमार, सुमन कल्याण मौलिक, वरवरा राव, गौतम नवलखा, अरूप दास गुप्ता, सुभेंदू दास गुप्ता, दीपांकर चक्रोबर्ती, कल्याण राय, देबाश्री दे, मुक्तेश घोष, प्रणब नायक, देबब्रत पांडा, नबारूण भट्टाचार्य, सरोज गिरी, रोना विल्सन, सुखेंदू भट्टाचार्य, रत्न दास गुप्ता, अनुराधा राय, गुरूप्रसाद कार, स्वाति घोष, पार्थो सारथी राय, अमित भट्टाचार्य।
(अमित भट्टाचार्य ने 27अक्टुबर, 2011 को हस्ताक्षरकर्ताओं की ओर से जारी किया गया पत्र) from- janmukti blog

25 जून 2011

राष्ट्रपति के बयान पर माओवादी पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति.

कल छत्तीसगढ़ की विधान सभा को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा जिसके जबाब में माओवादी पार्टी द्वारा यह प्रेस विज्ञप्ति मेल से प्राप्त हुई है जिस हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

अपने रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि ‘माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्य धारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें’। राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें। वे ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।
देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है। दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीज़िल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!
भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।
और श्रीमति प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।
60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ ं को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।
इसलिए, देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।
आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।
आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।
(अभय)
प्रवक्ता
केन्द्रीय कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)