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18 मई 2017

वैकल्पिक मीडिया की भ्रामक अवधारणा


सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ने के बाद इसे वैकल्पिक मीडिया करार देने की बहस भी तेज़ी से बढ़ी है। जब भी वैकल्पिक मीडिया की बात होती है तो समान्य तौर पर लोग इसे सोशल मीडिया से जोड़ देते हैं। कुछ वर्ष पहले तक वैकल्पिक मीडिया का पर्याय लघु पत्रिकाओं या फिर छोटे-मझोले अख़बारों को माना जाता था। वक़्त बदला, तकनीक बदली तो फेसबुक, ब्लॉग्स और वेबसाइट्स ने इस अवधारणा को बदल डाला, लेकिन इससे बुनियादी नहीं बदल जाते। वो सवाल आज भी यही है कि असल में वैकल्पिक मीडिया कहा किसे जाए?

 18 मई 2017 के दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित
वैकल्पिक शब्द आते ही ये साफ़ हो जाता है कि किसी संरचना/विचार या फिर किसी ईकाई के बरअक्स कोई ऐसा ढांचा, जो उससे अलग और कई अर्थों में उलट तौर पर हमारे बीच पेश आएं। जब वैक्लपिक मीडिया नाम का शब्द सामने आता है तो इसे कथित मुख्यधारा मीडिया के समानांतर पेश किया जाता है। लेकिन क्या कोई मीडिया अपने-आप में वैकल्पिक या समानांतर होता है? मीडिया अपने-आप में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो हमारी ‘वैकल्पिकता’ की मंशा के मुताबिक़ व्यवहार करे। 

मीडिया किसी विचार/ख़बर या मुद्दे को पेश करने का ज़रिया भर है। यह एक माध्यम है। विचार और ख़बर किसी भी मीडिया के ज़रिए हम तक पहुंच सकते हैं। मिसाल के लिए जिसे लोग मुख्यधारा का मीडिया कहते हैं उसमें प्रिंट भी शामिल है और टीवी भी। यानी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के दो अलग-अलग खांचों में बंटे होने के बावजूद वो “मुख्यधारा” बना रहता है। लेकिन, उसी के बरअक्स लघु पत्रिकाओं और छोटे अख़बारों को जब वैकल्पिक मीडिया के तौर पर हम चिह्नित करते हैं तो हम किस बिंदु पर उसे अलग कह रहे होते हैं? क्या माध्यम के बिंदु पर? माध्यम के लिहाज से देखें तो लघु पत्रिका और छोटे अख़बार प्रिंट की श्रेणी में गिने जाएंगे। ज़ाहिर है फर्क मीडियम का नहीं है, फर्क है विषयवस्तु का।

विषय-वस्तु से ही लोग तय करते हैं कि समानांतर या फिर वैकल्पिक किसे कहा जाए। यानी नैरेटिव ही वैकल्पिक होने का मूल है, मीडिया नहीं। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा बुनियादी तौर पर भ्रामक है। बढ़ते ऑनलाइन यूजर्स के बाद ऐसा ज़रूर हुआ है कि कई ख़बरों और मुद्दों को सोशल मीडिया में उछलने के बाद ही बड़े मीडिया घरानों में जगह मिल पाई। इसे सोशल मीडिया की सफ़लता के तौर पर भी पेश किया गया। लेकिन, ‘बड़े मीडिया घरानों’ में जगह दिलाने को उपलब्धि के तौर पर क्यों पेश किया जाए? 


क्या सोशल मीडिया सच में वैकल्पिक मीडिया है?
ऐसी कई घटनाओँ की दर्जन भर से ज़्यादा लोकप्रिय मिसालें पिछले दो-तीन वर्षों के दरम्यान ही गिनाईं जा सकती हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया मोबलाइज़ेशन इतना कारगर रहा कि कई मुल्कों में सियासत की तस्वीर तक बदल गई। कई जगहों पर सोशल मीडिया के ज़रिए ही लोग साझे मुद्दे और साझे संघर्ष में एकजुट हुए। इसे सोशल मीडिया की बड़ी ताक़त के तौर पर पेश किया जाता रहा है। लेकिन ये विमर्श का दूसरा मुद्दा है। सोशल मीडिया मोबलाइजेशन का बड़ा टूल बनकर उभरा है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या जिन मुद्दों को एक पक्ष अपनी ताक़त के तौर पर पेश करता है वो संपूर्णता में ताक़तवर है? क्या सोशल मीडिया की ये ताक़त सच में उन्हीं विचारों को हासिल है, जिन्हें ‘मुख्यधारा के मीडिया’ में जगह नहीं मिल पाती?

अगर बड़े मीडिया घरानों में ‘जगह दिलाने में क़ामयाब होने’ को हम ताक़त मान लें, तो इसकी एकमात्र वजह उस ख़ास मुद्दे को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाए जाने के भाव से जुड़ा है। अब अगर किसी स्थापित मीडिया से ज़्यादा पहुंच किसी निजी वेबसाइट या फिर निजी सोशल मीडिया एकाउंट की हो तो क्या उसे ‘मुख्यधारा’ कहा जाएगा? ये कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिनपर वैक्लपिक बनाम ‘मुख्यधारा’ की बहस के दरम्यांन फिर से सोचा-देखा जाना चाहिए।

मीडियम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है मीडियम पर पकड़ और स्वामित्व। यही नैरेटिव को भी तय करता है और कंटेंट को भी। फ़ेसबुक अगर किसी सामाजिक बदलाव का मंच साबित हो रहा है तो इसी फेसबुक पर भड़काऊ, झूठे और आधारहीन ख़बरें भी चलाई जा रही हैं। बंगलुरू में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के ख़िलाफ़ जिस तरह ऑनलाइन अभियान चला, वो ज़मीन पर उतरकर और भी ज़्यादा हिंसक हो गया था। फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने तथ्य को कई चेहरों में बांट दिया है। जिसके हाथ में जो ‘तथ्य’ है, वो उसी को ‘असली’ तथ्य मान रहा है। अफ़वाह/झूठ की भी फ़सल यहां लहलहा रही है। पूरा मामला इस पर निर्भर करता है कि फ़ेसबुक या किसी भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस लिहाज से कौन कर रहा है। अगर वो वर्चस्वशाली विचारधारा के समानांतर कोई नैरेटिव खड़ा कर रहा है तो वो वैकल्पिक पत्रकारिता का मंच हो सकता है, लेकिन वो महज मंच ही है, वैकल्पिक मीडिया नहीं।

फ़ेसबुक एक कंपनी है, जिसपर सारा नियंत्रण मार्क ज़करबर्ग है। यूजर के पास सिर्फ़ अपना कंटेंट तय करने का अधिकार है। मीडियम के गणित और सॉफ्टवेयर को अपने मुताबिक़ ढालने का नहीं। पिछले कुछ वर्षों में इसमें भी कई बदलाव देखने को मिले हैं। फ़ेसबुक के एल्गोरिद्म को इस तरह बदल दिया गया है कि एक यूजर जिन यूजर्स के साथ जितना परस्पर संवाद करेगा, उनकी न्यूज़ फीड में उतनी ही ज़्यादा उन व्यक्तियों का लिखा हुआ कंटेंट दिखेगा। अगर परस्पर संवाद कम हुआ, तो दिखना भी कम। ऐसे में ‘वैकल्पिक मीडिया’ के तौर पर इसे अगर पेश किया जाए और फॉलो करने वाले यूजर्स की संख्या को एक मानक मान लें, तो भी इस एल्गोरिद्म के चलते एक ख़ास विचारधारा वालों के बीच ही वो बातें अटककर रह जाती हैं, या फिर उस विचारधारा से इतर उन लोगों के बीच, जो सच में उस कंटेंट में रुचि रखते हों।

वैक्लपिक नैरेटिव के बिना वैक्लपिक मीडिया कुछ नहीं है
फ़ेसबुक अपने-आप में कंपनी के बतौर किसी भी कंटेंट का उत्पादन नहीं करता। ये यूजर्स जेनेरेटेड कंटेंट का एक मंच है। लेकिन, वो मुनाफ़ा कमाने में दुनिया के बड़े अख़बारों को बहुत पीछे छोड़ चुका है। 2016 के आख़िरी चौथाई में फ़ेसबुक ने 3600 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया, तो वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसी दौरान पिछली चौथाई के मुक़ाबले तीन करोड़ का नुकसान सहा। अब अगर न्यूयॉर्क टाइम्स को ‘मुख्यधारा का मीडिया’ मान लें और फ़ेसबुक को ‘वैकल्पिक मीडिया’ तो किसी भी पैमाने पर ये मुफ़ीद नहीं बैठता। 

जिस तरह कोई आम यूजर अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने के लिए फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स भी फ़ेसबुक के ज़रिए अपनी बात और ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में जुटा है। यानी ये सबके लिए खुला मंच है। वैकल्पिक मीडिया के बदले इसलिए वैकल्पिक पत्रकारिता की अवधारणा पर ज़ोर दिया जाना चाहिए क्योंकि ‘मीडिया और तकनीक’ पर नियंत्रण किसी भी आम व्यक्ति से ज़्यादा आसानी से कोई स्थापित ‘मुख्यधारा मीडिया घराना’ कर सकता है। वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा तकनीकी तौर पर भ्रामक है, वैकल्पिक अगर कुछ है तो सिर्फ़ नैरेटिव, राजनीति और विचारधारा।

23 नवंबर 2016

नोटबंदी में बड़ी कंपनियों को लूट की छूट

दिलीप ख़ान

गुरुवार से सरकार ने बिग बाज़ार की पेशकश पर नई व्यवस्था लागू की है। अब बैंक और एटीएम के अलावा बिग बाज़ार से भी लोग कैश निकाल सकेंगे। शुरू में देश भर में फैली 258 दुक़ानों में ये व्यवस्था लागू होगी। बाद में इस दायरे को और बढ़ाया जाएगा। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया इसमें बिग बाज़ार की मदद कर रहा है। देखने-सुनने में शुरुआती तौर पर तो यही लगता है कि इससे लोगों को सहूलियत होगी। लोग बैंक और एटीएम के साथ-साथ पेट्रोल पंप और बिग बाज़ार से भी पैसे निकाल सकेंगे, लेकिन क्या ये वाकई सहूलियत का मामला है? क्या स्टेट बैंक ने सचमुच लोगों की परेशानी कम करने के लिए इस फ़ैसले को मंजूरी दी है? 

बिग बाज़ार में कई बड़े उद्योगपतियों के पैसे

 नोटबंदी के बाद सरकारी संस्थानों को सुदृढ़ करने के बजाए बिग बाज़ार जैसे निजी खिलाड़ियों को बैंक जैसी शक्ति क्यों दी जा रही है? सरकार ने सहकारी बैंकों के लाख विरोध के बावजूद अब तक उन्हें पुराने नोट बदलने की शक्ति नहीं दी है। केरल में विधान सभा का विशेष सत्र बुलाना पड़ा, महाराष्ट्र में तीन ज़िलों के सहकारी बैंकों ने इसे बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। बिहार के सहकारी बैंककर्मियों ने 25 तारीख़ को हड़ताल की धमकी दे दी, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही, जबकि करोड़ों लोग सहकारी बैंकों पर निर्भर हैं। तो ऐसा क्या है बिग बाज़ार में जो सहकारी बैंक में नहीं है?


पहले दिन से ये प्रचार किया जा रहा है कि नोटबंदी से ग़रीब और मध्यवर्ग को दीर्घकालीन फ़ायदा होगा। हम इन आंकड़ों पर अलग से बात कर लेंगे कि ये फ़ैसला कैसे ग़रीब विरोधी है, लेकिन फ़िलहाल हम इस पर ध्यान दें कि बिग बाज़ार को पैसे निकालने का मंच बनाने से किसको फ़ायदा होगा और किसको नुकसान? मान लीजिए आपने बिग बाज़ार से 2000 रुपए निकाले, तो ज़रूरत का सामान चारों तरफ़ देखकर आप ख़रीददारी भी करेंगे। नहीं करेंगे तो उनके कर्मचारी, जिनको इसी काम का वेतन मिलता है, आपको ज़रूर ऑफर करेंगे कि आप फलाना सामान ख़रीद लीजिए। इस तरह बिग बाज़ार से आप निकालने जाएंगे 2000 और घर लेकर आएंगे 1000 या फिर पांच सौ। नकदी के मामले में ख़ाली हाथ भी लौट सकते हैं। जो सामान आप मोहल्ले की किराना दुक़ान से ख़रीदते थे, वो आप बिग बाज़ार से ख़रीदेंगे। वहां आपको न कैश की दिक़्क़त है और न ही कार्ड एक्सेप्ट नहीं होने की। मोहल्ले का छोटा दुक़ानदार आपको ये सुविधा नहीं दे सकता। ये सुविधा बड़ा रिटेल चेन ही दे सकता है। बिग बाज़ार आपको दे रहा है। बिग बाज़ार की बिक्री बढ़ेगी। वैसे ही चारों तरफ़ ख़बरों के ज़रिए ये प्रचार हो रहा है कि 'आप पैसे बिग बाज़ार से भी निकाल सकते हैं'। बिग बाज़ार के लिए बिना पैसा ख़र्च किए इससे बढ़िया विज्ञापन क्या हो सकता है? 

अब एक बार बिग बाज़ार की मालिकाना संरचना समझ लेते हैं। बिग बाज़ार को चलाने वाली मदर कंपनी का नाम है फ्यूचर ग्रुप। किशोर बियानी इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। 2001 में इसकी स्थापना हुई थी और तबसे बिग बाज़ार देश के सैंकड़ों शहरों में अपनी शाखा खोल चुका है। 2015 में एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी भारती रिटेल और फ्यूचर ग्रुप मर्ज हो गए। यानी एक हो गए। इस तरह ये कंपनी 15 हज़ार करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली कंपनी बन गई। 
सहकारी बैंकों को नोट बदलने की शक्ति नहीं दी गई

मई 2012 में आदित्य बिड़ला समूह को फ्यूचर ग्रुप वालों ने पेंटालूंस की 51.1 फ़ीसदी हिस्सेदारी दे दी थी। 8000 करोड़ रुपए में ये डील हुई। फ्यूचर ग्रुप ने अपने क़र्ज़ का बोझ कम करने के लिए ये फ़ैसला किया। 


जब भारती ग्रुप के साथ फ्यूचर ग्रुप का मिलाप हुआ तो ‘इज़ीडे’ और बिग बाज़ार एक हो गए। ये जो ‘इज़ीडे’ है, ये भारत में वालमार्ट की सहयोगी कंपनी है। यानी बिग बाज़ार का दांव बहुत ऊपर तक लगा हुआ है। नोटबंदी से उपजे हालात में फ़ायदा लूटने के तार यहां से अमेरिका तक जुड़े हुए हैं। अगर आप बिग बाज़ार में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी तलाशेंगे तो कई बड़े नाम आपको एक साथ मिल जाएंगे। इनमें किशोर बियानी और सुनील भारती मित्तल के अलावा आदित्य बिड़ला तो हैं हीं, गोदरेज़ भी हैं और वॉलमार्ट भी हैं। फ्यूचर ग्रुप में इटली के जेनरली ग्रुप, फ्रांस के सेलियो, अमेरिका के स्टैपलेस, ब्रिटेन के क्लार्क समेत कई विदेशी कंपनियों ने साझा उपक्रम के तहत पैसे लगा रखा है। यही नहीं, गुजरात और पंजाब में फ्यूचर ग्रुप ‘आधार रिटेल’ चलाती है और इसमें गोदरेज इसका साझेदार है। 

इज़ी डे अब बिग बाज़ार वालों का है
इसी तरह बिग एप्पल को चार साल पहले किशोर बियानी ने ख़रीदा था। यानी KB’s फेयर प्राइस भी इस डील के बाद बिग बाज़ार वालों का हो गया। मुनीष हेमराजन से 62 करोड़ रुपए में ये सौदा पटा था। प्लानेट स्पोर्ट्स नाम की कंपनी भी फ्यूचर ग्रुप की है और इसमें यूरोप की कुछ कंपनियों ने भी पैसे लगा रखे हैं। यही नहीं, EZone online, Fool hall, Home Town, I am in, Central जैसे कई रिटेल स्टोर्स के मालिक किशोर बियानी हैं। 


नोटबंदी के बाद पेटीएम जैसी कंपनियों के धंधे बुलंद हुए तो नरेन्द्र मोदी की फोटो के साथ कई अख़बारों ने कंपनी ने इश्तेहार छापा। पेटीएम में चीनी कंपनी अलीबाबा का बड़ा शेयर है। नोटबंदी का पेटीएम को बड़ा फ़ायदा मिला है। अब बारी बिग बाज़ार की है। 

20 अक्टूबर 2016

मोदी जी, ऐसे लड़ेंगे आतंकवाद से?

- दिलीप ख़ान

ब्रिक्स में भारत का सबसे बड़ा एजेंडा क्या था? इसका जवाब टीवी देखने वाला कोई भी व्यक्ति दे सकता है। हर कोई जानता है कि ब्रिक्स और बिम्सटेक देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे ज़्यादा पाकिस्तान और आतंकवाद की बात की। मोदी ने यहां तक कहा कि आतंकवाद की निंदा से आगे बढ़कर दुनिया को अब कार्रवाई की तरफ़ आगे बढ़ना चाहिए। दुनिया से भारत ने इस दिशा में सहयोग मांगा। उरी हमले के बाद जिस तरह का माहौल बना, उसमें भारत ने पहले ही ये संकेत दे दिया था कि ब्रिक्स सम्मेलन से पाकिस्तान को काटने के लिए सार्क के बदले बिम्सटेक देशों को न्यौता दिया जाएगा। न्यौता दिया गया और पाकिस्तान को सम्मेलन से काट दिया गया। अगर इसे कूटनीतिक जीत मान लें, तो उम्मीद बंधी थी कि ब्रिक्स में भारत लश्कर-ए-तैय्यबा समेत जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के ख़िलाफ़ वैश्विक सहयोग हासिल करने में क़ामयाबी पाएगा। लेकिन क्या ये हो पाया?

ज़ाहिर है कि नहीं। गोवा घोषणापत्र में जिन आतंकवादी संगठनों के नाम हैं, वो हैं- ISIL और अल नुसरा। यहीं असल पेंच फंसता है। अल नुसरा के नाम पर ज़रा ग़ौर कीजिए। इस संगठन को अगर आपने फॉलो किया है, तो शायद इसके बारे में कुछ बुनियादी जानकारी आपको होगी। ये संगठन सीरिया में सक्रिय है और दावा करता है कि वो आईएस और सीरियन सरकार, दोनों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है। सीरिया में मोटे तौर पर तीन पार्टियां सक्रिय हैं।

1. सीरिया की बशर अल-असद सरकार। असद को रूस और ईरान का समर्थन हासिल है।
2. फ्री सीरियन आर्मी+ अल नुसरा+ अमेरिका+ फ्रांस+ सऊदी+ तुर्की+ और भी कई संगठन
3. आईएसआईएस

छोटी-मोटी और भी पार्टियां हैं, लेकिन मोटे तौर पर यही तीन गुट आपस में लड़ रहे हैं। बशर अल-असद सरकार बाक़ी दोनों से लड़ रही है। फ्री सीरियन आर्मी भी बाक़ी दोनों से और आईएसआईएस तो ज़ाहिर तौर पर बाक़ी दोनों से लड़ ही रहा है। यानी हर किसी के दो-दो दुश्मन हैं, लेकिन जब सवाल आता है ISIS का तो उसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस और अमेरिका दोनों ये दावा करते हैं कि वो सीरिया में ‘शांति बहाली’ और ISIS को नेस्तनाबूद करने के लिए बम बरसा रहे हैं।

पार्टी-1.


रूस अल नुसरा फ्रंट को आतंकवादी संगठन मानता है। फ्री सीरियन आर्मी में शामिल कई गुटों को रूस आतंकवादी मानता है। और यही वजह है कि ब्रिक्स सम्मेलन के बाद जारी गोवा घोषणापत्र में रूस ने अल नुसरा का नाम शामिल किया। अब सवाल ये है कि इसमें भारत कहां खड़ा है और कूटनीतिक तौर पर भारत का क्या स्टैंड है? या फिर साफ़-साफ़ कहें तो भारत कहां फंस रहा है?


पार्टी-2.


जहां रूस एक तरफ़ अल नुसरा को आतंकवादी संगठन मानता है, वहीं अमेरिका का रुख बिल्कुल उलट है। अमेरिका की रुचि ISIS के अलावा बशर अल-असद सरकार को उखाड़ फेंकना भी है। अल नुसरा फ्रंट बशर अल-असद सरकार के ख़िलाफ़ शुरू से सक्रिय रहा है। अमेरिका फ्री सीरियन आर्मी को आर्थिक सहायता और हथियार सप्लाई करता है। अल नुसरा भी इसी गुट में रहकर लड़ाई कर रहा है। ओबामा सरकार ने इस गुट को 50 करोड़ डॉलर की मदद की। सब कुछ ऑन रिकॉर्ड है।


भारत की मुश्किल


दिलचस्प ये है कि अल-क़ायदा ही सीरिया में अल नुसरा नाम से काम करता है। कुछ वक़्त पहले तक अमेरिका का दुनिया में सबसे बड़ा दुश्मन अल-क़ायदा था। फ़िलहाल ISIS है। अमेरिका सीधे तौर पर अल नुसरा के साथ गुटबंदी करने से इनकार करता रहा है, लेकिन फ्री सीरियन आर्मी के लड़ाके खुले तौर पर मानते हैं कि अल नुसरा का उन्हें समर्थन हासिल है और वो साथ में लड़ते हैं। यानी अमेरिका के सहयोगी का सहयोगी हुआ अल नुसरा। अब गोवा घोषणापत्र में अल नुसरा को आतंकवादी संगठन माना गया है।

भारत ने गोवा घोषणापत्र के मुताबिक़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई का संकल्प लिया है। लेकिन दिक़्क़त ये है कि भारत जब अमेरिका के साथ द्विपक्षीय या बहुपक्षीय मंचों पर बैठता है तो आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका और भारत का एक ही रोडमैप हो जाता है। यानी अल नुसरा के ख़िलाफ़ जहां भारत एक तरफ़ कड़ी कार्रवाई की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ़ अल नुसरा को बढ़ावा देने में मदद करने वाले अमेरिका को पार्टनर भी मानता है। ऐसे में कैसे होगी आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई?

24 जनवरी 2015

जेटली जी विज्ञापन को छुट्टा रखेंगे

-दिलीप ख़ान

अभी टीवी मीडिया में विज्ञापन की सीमा को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के प्रस्ताव को दो साल भी नहीं हुए थे कि नए सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने इसको लागू करने पर अनचाहापन जाहिर किया। जेटली के मुताबिक़ ऐसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ धोखा होगा। पहला जे एस वर्मा स्मृति संबोधन देते हुए उन्होंने कहा कि टीवी न्यूज़ मीडिया के लिए प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की बाध्यता अंतत: संविधान के अनुच्छेद 19(1) के साथ मेल नहीं खाती। ट्राई ने 2013 के मार्च महीने में सारे टीवी न्यूज़ चैनलों को एक एक नोटिस दिया था कि अक्टूबर 2013 से प्रति घंटे 12 मिनट से ज़्यादा विज्ञापन नहीं दिखाए जा सकते। उस वक़्त ब्रॉडकास्टरों ने अपने राजस्व में कमतरी का तर्क देते हुए कहा था कि इतनी कम समयावधि में अगर इसे लागू किया गया तो सारे न्यूज़ चैनल घाटे में चले जाएंगे। 
मूल रूप से राष्ट्रीय सहारा में छपा लेख

मंत्रालय ने इसके लिए दिसंबर 2014 तक के लिए समय सीमा बढ़ाई जब तक डिज़िटाइजेशन की प्रक्रिया पूरा करने का मंत्रालय ने लक्ष्य रखा था। डिज़िटाइजेशन के साथ इसको लागू करने का तर्क ये था कि एक बार अगर ये प्रक्रिया पूरी होती है तो राजस्व का जो हिस्सा चैनलों को विज्ञापन से हासिल होता है उसका बड़ा टुकड़ा सब्सक्रिप्शन पर शिफ्ट हो जाएगा। यानी सेट टॉप बॉक्स और सब्सक्रिप्शन के ज़रिए चैनलों को होने वाली मात्र 10 फ़ीसदी की आमदनी बढ़कर 30-40 फ़ीसदी के स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन ना ये पूरा हुआ और ना ही विज्ञापन की समय सीमा निर्धारित हो पाई। सब्सक्रिप्शन के चलते ग्राहकों पर तो बोझ बढ़ गया लेकिन ना ही उनके सामने टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन कम हुए ना ही पुरानी दर में न्यूज़ देखा मुमकिन हो पाया।

पूरे मीडिया उद्योग में ये अफ़वाहें तैरती रही कि ट्राई का ये नियम 'नया' और प्रतिकामी है। हक़ीकत ये है कि केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स रूल्स 1994 के तहत ही उसने चैनलों को ये हिदायत दी थी। इस सरकारी क़ानून को मंत्रालय ने जब मंजूर किया है तो फिर मंत्रालय इसको लागू कराने के प्रति गंभीरता क्यों नहीं दिखा रहा? अगर नियम में कोई पेंच है तो उसमें संशोधन होना चाहिए या पूरे क़ानून को निरस्त कर देना चाहिए फिर नियम लागू होना चाहिए। लेकिन हो ये रहा है कि क़ानून भी है क़ानून का पालन भी नहीं हो रहा। उसी अधिनियम में एडवर्टाइज़मेंट कोड ऑफ़ टीवी नेटवर्क (विनियमन) रूल 1994 के तहत ये भी चर्चा की गई है कि टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन इस तरह के होंगे ताकि वो उसके मुख्य विषय सामग्री से अलग दिखे। क्या टीवी में इस नियम को फॉलो किया जाता रहा है? 

अगर नहीं, तो इस पर मंत्रालय ने क्या कार्रवाई की? निर्मल बाबा का प्रायोजित शो (विज्ञापन) जब चैनलों के लिए झमाझम टीआरपी का ज़रिया बना तो एक के बाद एक चैनलों पर उसका प्रसारण शुरू हुआ। उसमें स्क्रीन पर बेहद छोटे अक्षर में चालाकी बरतते हुए एडीवीटी (Advt.) लिखा होता था जिसे किसी दर्शक के लिए देख पाना मुश्किल था। तमाम आलोचनाओं के बाद इस शो को कुछ चैनलों ने बंद कर दिया और जो चलाते रहे उन्होंने एडीवीटी का फोंट बढ़ा दिया।

विज्ञापन के मोर्चे पर नियम-क़ायदे को लागू करने का मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी से टकराव का मामला नहीं है। किसी भी टीवी न्यूज़ चैनल को जब मंत्रालय लायसेंस देता है तो वो न्यूज़ नाम की सामग्री के प्रसारण के लिए होता है। विज्ञापन उसकी आमदनी का ज़रिया है ताकि ख़बर को चलाए रखने लायक राजस्व चैनल बना पाए। इस तरह ये पूरा मामला मीडिया के पत्रकारिता वाले पक्ष का नहीं बल्कि उद्योग वाले पक्ष का है। उद्योग के लिए नियम लागू करना कहीं से भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ना तो चोट है ना ही किसी भी तरह का अंकुश। दूसरी बात, क्या विज्ञापन का जो मौजूदा स्लैब है जिसमें चैनल मनमाना तरीके से 20-22 मिनट तक विज्ञापन दिखाते रहते हैं, इसमें छोटे-मझोले चैनलों के लिए प्रतियोगिता में टिके रहने का कोई स्कोप है? 

अगर विज्ञापन पर बने नियम को हम अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ भी दें तो इसमें लोकतांत्रिक रवैया कहां है? बड़े चैनलों और बड़े समूहों के पास ज़्यादा विज्ञापन झटकने के सौ तरीके हैं और छोटे चैनल इस पूरे परिदृश्य में टिक नहीं पाते। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने भी चैनलों के रवैये पर दो-तीन बार गंभीर टिप्पणी की है। विज्ञापन लाने का जो प्रमुख जरिया चैनलों के पास है वो है टीआरपी। लिहाजा विज्ञापन को लुभाने के लिए चैनल टीआरपी को लुभाते हैं और टीआरपी को लुभाने के लिए कई दफ़ा विषय सामग्री में गंभीरता की बजाए सनसनी और हल्केपन की चाशनी लपेट देते हैं। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन जुटाने का संबंध सीधे तौर पर कंटेंट से भी जुड़ा है। चैनलों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए इस तरह का कोई आयोग नहीं है जो उन्हें दिशा-निर्देश दे सके। चैनलों के स्व-नियमन की कुछ संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में इतने मौक़ों पर असफ़ल साबित होते रहे हैं कि ऐसे किसी भी संस्था का वजूद सतह पर मालूम ही नहीं पड़ता।

प्रिंट मीडिया के लिए समाचार और विज्ञापन का अनुपात बहुत पहले से निश्चित है। टीवी इससे बाहर क्यों रहे? लेकिन टीवी मीडिया ने इतनी आक्रामकता से अपनी मौजूदगी दर्ज की है कि इसको लेकर नियम-क़ायदे बनाने के लिए सरकार के पास कोई समय मिलता ही नहीं दिख रहा। 2013 में ही 'पेड न्यूज़' पर संसद की स्थाई समिति की लंबी चौड़ी-रिपोर्ट में भी विज्ञापन को लेकर कई चिंताएं जताई गईं। पेड न्यूज़ ख़ुद में विज्ञापन का ही रूप है। क्या नई सरकार उस रिपोर्ट को लागू कराने के पक्ष में है? अगर विज्ञापन को लेकर खुली छूट जारी रही और एडवर्टाइज़मेंट स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया के हाथ में मौजूद शक्ति असल में विज्ञापनदाताओं को ताक़तवर बनाने को लेकर झुकी रही तो टीवी की ख़बरों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहेंगे।