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18 मई 2015

सलवा-जुड़ुम -2 सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना

फोटो: साभार बीबीसी
यूपीए ने जिस सलवा-जुडुम की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के साथ मिलकर की थी. अब उसे क्रमांक में लिखने की जरूरत आन पड़ी है. उसे सलवा जुड़ुम-1 कहा जाएगा. क्योंकि बीजेपी शासन की मदद से सलवा-जुड़ुम -2 की शुरुआत करने की घोषणा स्थानीय नेताओं द्वारा कर दी गई है. इन घोषणाओं से यह भ्रम पैदा होता है कि सलवा-जुड़ुम -१ ख़त्म हो गया था. शायद उसे महेन्द्र कर्मा की मौत के बाद ख़्त्म हुआ मान लिया गया हो या यह 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर द्वारा जो आदेश दिया गया था उसके बाद खत्म मान लिया गया रहा हो. आदेश में इसे पूरी तरह से बंद करने को कहा गया था और सरकार को जनसंहारो में संलिप्त बताया गया था. सलवा-जुडुम पर यह फैसला इसके शुरू होने के लगभग 6 साल बाद आया था. इन 6 सालों में हत्या, बलात्कार और आगजनी की जाने कितनी घटनाएं घटी. छः लाख लोग अस्त-व्यस्त हो गए और कई अपने गांव फिर कभी लौटकर नहीं आए. राज्य के इस अभियान के खिलाफ उनमें से कई आदिवासी माओवादियों के साथ भी जुड़े, वे लड़कियां भी जिनके भाई सलवा-जुड़ुम में शामिल थे. और उन्होंने एक मजबूत विरोध जताया. क्या फिर से सलवा-जुडुम-2 का शुरू होना इन घटनाओं का दुहराव होगा. क्या इतिहास खुद को दुहराता है. क्या यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं है. निश्चय ही यह सब सवाल जब तक हल किए जाएंगे. जब तक इन पर नागरिक समाज से आवाज़ें उठनी शुरू होंगी कई कत्लेआम कर दिए जाएंगे. जबकि यह सच है कि सलवा-जुडुम के बंद करने के आदेश के बाद यह कभी बंद नहीं हुआ था. सरकार और विपक्ष के राजनेता इस पर पूरी तरह से खामोश हैं. क्योंकि आदिवासियों के साथ होने वाले सुलूक में संसद का पक्ष-विपक्ष एक साथ खड़ा है. भाकपा माओवादी ने इस पर अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी की है जिसे यहां देखा जा सकता है.  विज्ञप्ति: हिन्दी अंग्रेजी       

13 मई 2014

'राष्ट्रद्रोह' 'राष्ट्रभक्त' का विलोम नही होता

वे जो देशद्रोही हो गए. जिन्हें आने वाले दिनों में और भी देशद्रोही हो जाना है. जिनके लिए राष्ट्र का हर प्रतीक विलोम की शब्दावलियों में लिखा जा रहा है. राजधानी में जिनका हर व्याकरण उल्टा सा पढ़ा जा रहा है. वे सब अपने घरों के भीतर बुदबुदा रहे हैं. जैसे बच्चों को आने वाले दिनों का किस्सा सुना रहे हैं. उन्हें जब-जब सुरक्षा मुहैया कराई जाती है तो अपने बच्चों की कुछ और लाशें वे अपने कंधों पर ढोकर दफना आते हैं. गांव और पड़ोस उन्हें शहीद कहते हैं और अखबार उन्हें कहता है ‘माओवादी’ या ‘देशद्रोही’. अखबार और सरकार पिछले कई सालों से उनके लिए एक जैसे हो चुके हैं. राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर जिनके लिए कुछ और सैनिक कुछ और बंदूकें उनके गावों-कस्बों की तरफ कूच कर रही हैं लगातार. ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर जाने कितनी गोलियां उनके सीने में दब चुकी हैं और कितने जख़्म उभर आए हैं. गड़चिरौली में ११ मई २०१४ को माओवादियों के द्वारा भारतीय सी- ६० सैन्यबलों पर की गई कार्यवाही से जब सभी अखबार, समाचार और सरकार बड़े हमले के रूप में दिखा रहे हैं ऐसे में सी- ६० के द्वारा ७ जुलाई २०१३ को मेड्री गांव गड़चिरौली में हुई झूठी मुठभेड़ और नृशंसता को दिखाता यह विडियो देखना जरूरी है. कि देशभक्ति के मायने उलट जाते हैं. सवाल फिर से वहीं ठहर जाते हैं कि देश के वे कौन लोग हैं जो बंदूक उठाते हैं और वे बंदूक क्यों उठाते हैं? 



31 अगस्त 2013

नियमगिरि : देश में जारी जनांदोलनों के लिए नजीर

लिंगराज आजाद
साक्षात्कार

नियमगिरि की पहाड़ियों में बसे डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने पिछले 19 अगस्त को रायगढ़ा जिले की जरपा गांव में संपन्न हुई अंतिम पल्ली सभा में भी ब्रितानी कंपनी वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को नामंजूर कर दिया। ओडिसा सरकार उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर कालाहांडी और रायगड़ा जिले में कुल बारह पल्ली सभा ( ग्राम सभा) आयोजित की थी, ताकि आदिवासी इस परियोजना के पक्ष या विपक्ष में प्रस्ताव पारित करें। पल्ली सभाओं का यह एकमुश्त फैसला वेदांता कंपनी और राज्य सरकार के लिए एक शिकस्त की तरह है। इस फैसले का असर कितना व्यापक होगा और क्या नियमगिरि की पहाड़ियां इससे महफूज रहेंगी, इसी मसले पर नियमगिरि सुरक्षा समिति के महामंत्री और समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव लिंगराज आजाद से
अभिषेक रंजन सिंह ने बातचीत की, प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश...

प्रश्न- आजाद जी, सभी बारह पल्ली सभाओं ( ग्राम सभाओं) ने एक स्वर में नियमगिरि की पहाड़ियों पर वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना को खारिज कर दिया है। इस फैसले को किस तरह देखते हैं आप ?
उत्तर- सबसे पहले तो मैं उच्चतम न्यायालय को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस मामले की गंभीरता समझते हुए 18 अप्रैल 2013 को ओडिसा सरकार को पल्ली सभा आयोजित कराने का आदेश दिया था। जैसा कि आपको पता है कि डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने सभी पल्ली सभाओं में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को सिरे से खारिज कर दिया। मेरे ख्याल से आदिवासियों का यह फैसला देश में जल, जंगल, जमीन और पहाड़ों को बचाने के लिए जारी जनांदोलनों के लिए एक नजीर पेश करेगा। नियमगिरि की पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने जो एकजुटता दिखाई है, हम उसे सलाम करते हैं।  
प्रश्न- कालाहांडी और रायगढ़ा जिले में नियमगिरि की पहाड़ियों पर कुल 112 गांव बसे हैं, फिर ओडिसा सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में ही पल्ली सभाओं का आयोजन क्यों किया ?
उत्तर- यह सवाल काफी महत्वपूर्ण है। नियमगिरि सुरक्षा समिति भी यह मांग कर रही थी कि उन सभी गांवों में पल्ली सभाएं आयोजित हों, जहां डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध आदिवासी निवास करते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों पर 112 गांवों में डोंगरिया कोंध और पहाड़ के नीचे तराई में 50 गांवों कुटिया कोंध आदिवासी रहते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं का आयोजन किया। दरअसल, ओडिसा सरकार ने कालाहांडी और रायगढ़ा जिले की सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाकर उच्चतम न्यायालय के फैसले की मनमानी व्याख्या की है, जो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करती है। अगर सरकार ने सभी गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाती, तो निश्चित रूप से बारह की बजाय 162 गांव नियमगिरि में खनन परियोजना को नामंजूर कर देती।
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह इतनी आसानी से पीछे हट जाएगी?
उत्तर- यह कहना जल्दबाजी होगी कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह चुपचाप बैठ जाएगी, क्योंकि कंपनी ने इस इलाके में करोड़ों रुपये का निवेश किया है। निश्चित रूप से वह नई रणनीति बनाएगी। हमें पता है कि उनके पास बेशुमार दौलत और ओडिसा सरकार का समर्थन भी हासिल है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों के पास सिर्फ हिम्मत है उनसे लड़ने के लिए। पल्ली सभाओं की जीत से ग्रामीणों का हौसला बुलंद हुआ है। यह संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए है और इसकी रक्षा के लिए हम आखिरी दम तक लड़ेंगे। देश की न्यायपालिका पर हमें पूरा यकीन है कि वह गरीब और लाचार आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
प्रश्न- पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नियमगिरि की पहाड़ियों का कितना महत्व है?
उत्तर- पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए सिर्फ नियमगिरि की पहाड़ियों और यहां मौजूद जंगल ही नहीं, बल्कि सभी पहाड़ों और जंगलों की अहमियत एक जैसी है। नियमगिरि की श्रृंखलाएं हजारों साल पुरानी हैं। यहां के जंगलों में वृक्षों की सैंकड़ों किस्में हैं, अनगिनत जड़ी-बूटियां हैं और वन्यजीवों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, वराह, हिरण, हाथी समेत कई जीव-जंतु रहते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों की वजह से यहां अच्छी बारिश होती है। स्थानीय आदिवासियों की जीविका इन्हीं पहाड़ों और जंगलों पर निर्भर है। धान यहां की मुख्य फसल है, जबकि पानी की उपलब्धता से तराई इलाकों में मछली पालन भी किया जाता है। यहां खेतों में पूर्णतः प्राकृतिक ढंग से सिंचाई होती है। बोरिंग और कुएं की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यहां दर्जनों की संख्या में झरने मौजूद हैं। अब आप फर्ज कीजए, अगर बॉक्साइट के लिए नियमगिरि के जंगलों को नष्ट कर पहाड़ों को बारूदी सुरंग से तोड़ दिया जाएगा, तो यहां की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली कैसे महफूज रह पाएगी। एक तरफ पूरी दुनिया वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से चिंतित है साथ ही वन्यजीवों को बचाने के लिए नित्य नए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर पहाड़ों और जंगलों के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया जा रहा है।
प्रश्न- इन सबके बावजूद विकास की जरूरत को कैसे खारिज किया जा सकता है ?
उत्तर- सरकार की नजर में विकास क्या है ? क्या विकास की एकमात्र परिभाषा आर्थिक विकास ही हैं वह भी प्राकृतिक संसाधनों और इंसानी जान की कीमत पर। माफ कीजए, अगर सरकार की दृष्टि में विकास का अर्थ यही है, तो हमें उनका यह मॉडल स्वीकार नहीं है। आर्थिक विकास के नाम पर पिछले ढाई दशकों के दौरान काफी तबाही हो चुकी हैं। भारत में तथाकथित विकास के नाम पर 10 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ है। विस्थापित होने वालों में आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है, जिन्हें जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया है। आज तक उनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस इंतजामात नहीं किए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकारें ब्रिटिश राज्य में बनी भूमि अधिग्रहण कानून के सहारे किसानों से उनकी जमीनें छीनकर पूंजीपतियों के हवाले कर रही हैं। इसके खिलाफ जहां आवाजें उठती हैं, उन आवाजों को गोलियों और लाठियों के सहारे दबाने का प्रयास किया जाता है।
प्रश्न- नियमगिरि की पहाड़ियों में वेदांता कंपनी को खनन की इजाजत मिले अथवा नहीं इस बारे में राजनीतिक दलों की क्या राय है?
उत्तर- प्रदेश की सत्ताधारी बीजू जनता दल की भूमिका के विषय में कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नवीन पटनायक सरकार पूरी तरह उसके पक्ष में खड़ी है। वर्ष 2009 में पर्यावरणीय मंजूरी निरस्त होने के बाद वेदांता कंपनी की बजाय ओडिसा माइनिंग कॉरपोरेशन ने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल की थी, इससे साफ जाहिर होता है कि राज्य सरकार हर स्तर पर वेदांता कंपनी का सहयोग कर रही है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है, तो पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी साल 2009 में नियमगिरि के इलाकों में आए थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमारी पार्टी आपके साथ खड़ी है और आप हमें नियमगिरि आंदोलन में अपना सिपाही समझें। हालांकि कांग्रेस ने केंद्र और राज्य स्तर पर अभी तक कोई ऐसा प्रयास नहीं किया है। कम्युनिस्ट पार्टियों का समर्थन इस आंदोलन को जरूर हासिल है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी शक्ति उतनी नहीं है कि वे कुछ ज्यादा कर सकें।
प्रश्न- ओडिसा सरकार का आरोप है कि नियमगिरि सुरक्षा समिति की अगुआई में चल रहे इस आंदोलन को माओवादियों का समर्थन हासिल है, इस बात में कितनी सच्चाई है ?
उत्तर- केंद्र और राज्य सरकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जा रहीं आंदोलनों को माओवादी आंदोलन कहकर कुचलना एक शगल बन चुका है। यह पहला जनांदोलन है, जहां कानूनी हस्तक्षेप ( उच्चतम न्यायालय की ओर से पल्ली सभा कराने का आदेश ) जनांदोलनों में सकारात्मक भूमिका निभा रही है। बात जहां तक माओवादियों के समर्थन की है, तो राज्य सरकार को यह पता होना चाहिए कि माओवादियों ने पिछले दिनों पर्चा चस्पां कर पल्ली सभा को नौटंकी करार दिया था। हमारे और माओवादियों के सिद्धांत में काफी अंतर है। यह अलग बात है कि नियमगिरि बचाओ आंदोलन में उनकी ओर से कोई बाधा नहीं पहुंचाई जा रही है। हमारा यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है, वैसे भी उड़ीसा शांतिपूर्ण आंदोलनों का गढ़ रहा है। गंधमर्दन, बालियापाल, चिल्का और हीराकुंड किसान आंदोलन इसके सुंदर उदाहरण हैं।
प्रश्न- मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दावा है कि उनके शासन में प्रदेश का चौतरफा विकास हुआ है और वे राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए कृतसंकल्प हैं?

उत्तर- बेशक, विकास जरूर हुआ है, लेकिन जनता का नहीं, बल्कि उनकी सरकार में शामिल मंत्रियों, उनकी पार्टी के विधायकों और सांसदों का। बीजेडी के शासन में जनता भले ही समृद्ध नहीं हुई हो, लेकिन नौकरशाहों और अधिकारियों की चौतरफा कमाई जरूर बढ़ी है। इतिहास में नवीन पटनायक का नाम एमओयू मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज किया जाएगा, जिन्होंने निजी कंपनियों के साथ अनगिनत समझौते पर दस्तखत ओडिसा की जनता और उसकी खुदमुख्तारी को गिरवी रख दिया। 

12 जून 2013

हम हरियाली की तरह बार-बार उगे हैं

रेयाज़ उल हक़

जब राज्य...अपराधी-राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के गिरोह का रक्षक और समर्थक हो जाए. जब यह सब आकस्मिक घटना न होकर एक सोची समझी नीति और पूर्वाग्रह के तहत हो रहा हो. तब जनता के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता इसके सिवाय कि वह इस प्रकार के राज्य को उखाड़ फेंकने की बातें करे. ऐसी असामान्य परिस्थितियों में हिंसा अपरिहार्य और न्यायसंगत है.
-आनंद तेलतुंबड़े

सारी हस्तियों का मानना था कि गोलियां; लोकतंत्र, भाषण की स्वतंत्रता, शांति और उन सभी प्यारी-प्यारी चीजों पर चलाई गई थीं, जिनका नाम लेने का अवसर वो कभी हाथ से नहीं जाने देते थे. हत्यारे की तलाश जारी थी.
-ओरहान पामुक

शीर्षक के वाक्य को अली सरदार जाफरी ने मौलाना रूमी की शायरी से लेकर अपनी नज़्म ‘मेरा सफर’ में दर्ज किया था. यह हरियाली सिर्फ घास और पौधों पर लागू नही होती, संघर्ष के जीवन में यह हर वक्त की बुदबुदाहट होती है. उम्मीद इस पंक्ति का बुनियादी अहसास है.

p-dakhalkiduniya
हम जिस राज्य में रहते हैं, उसकी विचारधारा हमें यकीन दिलाने की कोशिश करती है कि भविष्य खत्म हो चुका है और सारी उम्मीदें सूदखोर के पैसों, मासिक किस्तों और सट्टा बाजार में गिरवी रखी जा चुकी हैं. उनके लिए उम्मीद कुछ पलों की खुशी भर है जिसकी अवधि किसी फाइव स्टार मॉल में की गई शॉपिंग के अनुपात में घटती-बढ़ती है. इसने उम्मीद को गिनी जा सकने वाली निर्जीव संख्याओं में बदल दिया है, जिसे आप कैश ऑन डिलीवरी के जरिए घर बैठे भी हासिल कर सकते हैं- इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले पैकेज में गिफ्ट वाउचरों के साथ. और यहीं, इस विचारधारा का भविष्यहीन, नाउम्मीदी से भरा खोखलापन जाहिर हो जाता है. इसके हिमायती और पैरोकार लोग इसे बचाने की कोशिशें करते हैं. इन कोशिशों में वे लोगों के कत्ल और हत्याओं को पहाड़े की तरह गिनते हैं.

लेकिन उम्मीदों की इस आभासी दुनिया से परे उम्मीदों की एक सच्ची दुनिया भी है. देहातों, शहरों, कस्बों, जंगलों और पहाड़ों में फैली हुई उस विशाल आबादी की दुनिया, जहां मूल्यों और विश्वासों की एक अलग ही व्यवस्था है. हालांकि इतिहास से लेकर अब तक उनकी उम्मीदों पर हमलों की कम कोशिशें नहीं हुई हैं लेकिन जनता का यह हिस्सा जानता है कि उसे अपनी उम्मीदों की हिफाजत कैसे करनी है. उम्मीद: वे जानते हैं कि स्वर्ग की सारी कल्पनाएं इसी उम्मीद को जिंदा और महफूज रखने के खयाल से बुनी गई हैं. दुनिया भर का लेखन, दुनिया भर के गीत, फिल्में, कहानियां, कविताएं, नाटक, किताबें, मजाक, चुटकुले...उम्मीदों को बचाए रखने की इंसानी जद्दोजहद का हिस्सा हैं.

बावजूद इसके कि आर्थिक विकास दर से जनता का कत्लेआम किया जा रहा है, जनता की उम्मीदें कायम हैं. यह उम्मीद ही है, जो जनता को अपराजेय बनाती है. 1857 में जो जनता कुचल दी गई थी (उसने ब्रिटिश साम्राज्य को तब तक की सबसे बड़ी पराजय से परिचित कराया था और उसकी सबसे महत्वपूर्ण औपनिवेशिक राजधानी पर कब्जा कर लिया था. नेतृत्वकारी ताकतों की कमजोरी ने जनता को इस विजय के निर्णायक प्रभावों से वंचित कर दिया, ब्रिटिश राज के पलट कर किए गए हमले में कई हजार लोग मारे गए), जिसके जंगलों और पहाड़ों को ढाई सदियों से शिकारगाहों में तब्दील कर दिया गया है. आदिवासी जहां पैदा हुए उस जमीन और संसाधनों का वे अपने गुजर बसर के लिए इस्तेमाल करते थे. इसके लिए उन्हें किसी से इजाजत लेने या खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी. औपनिवेशिक शासन ने पहली बार इन इलाकों और संसाधनों को अपने कब्जे में करने की कोशिश की. आदिवासियों ने इन कोशिशों का मुंहतोड़ जवाब दिया और ब्रिटिश कभी कामयाब नहीं हो पाए. उनकी विरासत को अपनें कंधों पर उठाए भारतीय शासक वर्ग उनकी कोशिशों को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन आदिवासी जनता ने भी अपनी संघर्षों की विरासत को छोड़ा नहीं है. 1947 से लेकर आज तक, लगातार फासीवादी हमलों में जिस जनता का कत्लेआम किया गया (हैदराबाद रियासत को भारतीय राज्य में मिलाने के नाम पर बीस हजार से अधिक मुसलमानों का कत्ल भारतीय राज्य की सेना ने किया, दोषियों और सजा के बारे में भूल जाइए, कभी इस अपराध को कबूल तक नहीं किया गया, यह इस लोकतंत्र के स्थापित होने से भी पहले की एक मिसाल है. उसके बाद की मिसालें भी आप कमोबेश जानते हैं) उस जनता ने हार नहीं मानी है. वह 20 रुपए रोज से कम पर गुजर करती है, उसका एक बड़ा हिस्सा भुखमरी का शिकार है (करीब 20 करोड़ लोग, भोजन के अतिरिक्त भंडार वाले देश में भोजन की असुरक्षा के बीच जीते हैं. योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट भारत को एक स्थायी भुखमरी वाले देश के रूप में चिह्नित करती है. लेकिन अगर आप यहां रोज 20 रुपए खर्च कर सकते हैं तो आप गरीब नहीं माने जाएंगे. इतने में आप फुटपाथ पर तीन रोटियां और एक साधारण सी सब्जी खा सकते हैं) बीमारियों और बदतरीन जीवन स्थितियों ने उसे तोड़ रखा है (भारत दुनिया का सबसे निजीकृत स्वास्थ्य सेवाओं वाला देश है, जहां की आबादी के खर्चों में दूसरा सबसे बड़ा खर्च उसके इलाज पर होता है. लेकिन तब भी इलाज मिल जाएगा और खर्च करने पर भी आप अच्छा और भरोसेमंद इलाज पा सकेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. मलेरिया, टीबी और दूसरी ऐसी अनगिनत बीमारियां यहां अब भी महामारियों की तरह मौजूद हैं, जिनका अस्तित्व दुनिया के दूसरे हिस्सों में खत्म माना जा चुका है). लेकिन उसने अपनी उम्मीदों को बीमार नहीं होने दिया है.

तब इस बात का क्या मतलब है कि निराशा में हाथ मलते हुए पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, पुराने कार्यकर्ता और अनेक दूसरे लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि दुनिया दिन ब दिन नाउम्मीदी से भरती जा रही है. तब इस तथ्य को हम कैसे देखते हैं कि अकेले भारत में पिछले 20 वर्षों में ढाई लाख से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है.

तथ्य कभी कभी निराश कर सकते हैं लेकिन मिसालें उम्मीदों से भरी हुई हैं. मई के इस आखिरी हफ्ते में, जब गर्मी तेज होती जा रही है और बारिश का मौसम शुरू होने में महीने भर की देर है, किसानों ने धान के बीजों की साफ-सफाई शुरू कर दी है. सब्सिडी वाले खाद और बीजों से महरूम कर दिए जाने के बावजूद, सिंचाई के सस्ते और सार्वजनिक साधनों को गैरभरोसेमंद बना दिए जाने के बावजूद और अपनी जमीन पर खेती करने की उनकी अब तक पूरी न हो पाई हसरतों के बावजूद, वे पहली बारिश पड़ते ही खेतों में बीज डालेंगे. उसी विदर्भ में, जिसका पर्याय पिछले कुछ वर्षों से किसानों की खुदकुशियां बन गई हैं, कपास की फसलें हर साल उगाई जा रही हैं. क्या इनमें कहीं निराशा के बीज दिखते हैं? कहीं कोई नाउम्मीदी? बीजापुर के वे आदिवासी भी जिनका कत्ल राज्य की सेनाओं (और कभी कभी सलवा जुडूम) द्वारा पिछले माह और उससे पहले पिछले बरस और उससे भी पहले के कई बरसों में किए जाते रहे, वे फिर से अपने जीवन में उम्मीदों के बीज बोने के लिए जमा हो रहे हैं. 

अगर ऐसा है, तो शायद इस निराशा का रिश्ता जीने और सोचने के तौर तरीके से नहीं है और न ही यह जीवन के मूल्यों से जुड़ी हुई है. इसका संबंध उस रिश्ते से है जो जीने और सोचने के हर तौर तरीके को तय करता है. पारिवारिक रिश्ते नहीं- वे तो उस व्यापक रिश्ते के दयनीय शिकार भर हैं. वह रिश्ता जो जीने, खाने, काम करने, रहने, पढ़ने, लिखने और उत्पादन करने के दौरान बनता है. सामाजिक और राजनीतिक रिश्ता. सत्ता का रिश्ता. उसे व्यवस्था कहा जाता है, हालांकि हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि शब्दों से उनकी सारी उम्मीदें छीन कर किस कदर उन्हें बेजान कर दिया गया है. आबादी के बड़े हिस्से के लिए वे उल्टे मतलब देने लगी हैं. यह व्यवस्था है, जिसने जीवन को अव्यवस्थित कर दिया है. जो लोगों में निराशा भरती है, उन्हें नाउम्मीदी की तरफ धकेलती है. इस निराशा की जड़ें नॉर्थ और साउथ ब्लॉकों में घूमने वाले वर्ल्ड बैंक के अधिकारियों और अंबानियों-टाटाओं के एजेंटों की अटैचियों तक में फैली हुई हैं. संसद की कार्यवाहियों में दायर हैं इस निराशा की वजहें. इसीलिए उम्मीद की हर कोशिश संसद, टाटाओं-अंबानियों और वर्ल्ड बैंक के खिलाफ गुस्से और नफरत से ही शुरू होती है.

आप जहां भी जाएं, इस व्यवस्था के जड़ हो चुके, सड़ रहे हिस्सों से रू ब रू होंगे. शादियों में बजने वाले फूहड़ गीतों से लेकर संसद की फूहड़ कार्रवाइयों तक एक हिंसक नाउम्मीदी, ठहराव और निराशा पसरी हुई है. चीजों की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं. सब्सिडियों को हमेशा के लिए बंद किया जा रहा है. रोजगार खत्म किए जा रहे हैं और बेरोजगारी की दर हर साल बढ़ रही है (2012 में यह 9.3 प्रतिशत थी, इस साल 9.4 फीसदी है जबकि आबादी 1.37 फीसदी की रफ्तार से ही बढ़ रही है. यह साफ है कि आबादी के बढ़ने का बेरोजगारी से कोई सीधा संबंध नहीं है). अगर आप अगले साल भी मौजूदा जीवन स्तर को, जो पहले से ही बेहद दयनीय है, बनाए रखना चाहते हैं तो आपको अपनी आमदनी की दर को शायद अनिल अंबानी के मुनाफे की दर से ऊपर ले जाना होगा. राज्य युद्ध स्तर पर यह तय कर रहा है कि रियायतें खत्म की जाएं, कि जमीनें छीन ली जाएं और बड़े बांधों के जरिए लोगों विस्थापित किया जाए, कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को मंजूरी देकर किसानों और फेरीवालों को तबाह कर दिया जाए. शिक्षा को बड़ी कंपनियों और कारोबारियों के हाथों बंधक बना कर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, मुस्लिमों और दूसरे वंचित तबकों के जनवादी अधिकारों को खारिज कर दिया जाए. और यह सब राज्य की दखलंदाजी को कम करने के नाम पर किया जा रहा है. शब्दों ने अपने मतलब उलट लिए हैं.

ऐसा लग सकता है कि शब्दों ने अपने मतलब उलट लिए हैं. जैसे कि लोकतंत्र का मतलब फासीवाद हो गया है. विकास का मतलब तबाही और विस्थापन. सशक्तीकरण लोगों से उनके अधिकार और संसाधनों को छीने जाने की ही दूसरा नाम है. सम्मान, अपमान का एक बेहद घिनौना रूप है. राष्ट्रीय सुरक्षा जनता को असुरक्षित बनाने का राजकीय अभियान है और विकास तथा तरक्की जनता के खिलाफ एक और युद्ध को दिए गए अच्छे लगने वाले संबोधन हैं. शांति अभियान नाम उस हत्यारे फासीवादी गिरोह को दिया जाता है, जिस पर एस्सार और टाटा जैसी कंपनियों के लिए आदिवासियों से जमीनें छीनने की जिम्मेदारी है. इस गिरोह के हत्यारे अभियानों में 644 तबाह गांवों, तीन लाख से अधिक उजड़े हुए आदिवासियों, हत्याओं और बलात्कारों के सैकड़ों मामलों को मिला कर जो दर बनती है, उसे राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि की प्रस्तावित दर कहा जाता है. जब तक अदालत इस अभियान को रोकने के आदेश जारी करती, जनता का हथियारबंद संघर्ष इस अभियान को धूल में मिला चुका था. अदालती व्यवस्था के जनविरोधी होने का अंदाजा इस कदर लगाया जा सकता है कि अपराधों को दर्ज करते हुए भी वो इन अपराधों के लिए उसके कर्ताधर्ताओं के खिलाफ एक केस तक दर्ज नहीं करा सकी. फिर भी शब्दों के अर्थों की उलट दी गई दुनिया में जनता की कार्रवाई आतंकवाद कहलाई और अदालती फैसला इंसाफ कहलाया. जिसे इंसाफ की जरूरत है और जिसका इंसाफ पर एकाधिकार रखने का दावा है, उनके बीच का फासला युगों में ही मापा जा सकता है. यह फासला किसी तरक्की या पिछड़ेपन से जुड़ा हुआ नहीं है. इसका अर्थ मूल्यों और मकसद के उस दो अलग-अलग निजामों से है, जिसका ये दोनों प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन जनता इस फासले को मिटा रही है. वह इंसाफ और अदालतों में फर्क नहीं करती. उसने अपना इंसाफ हासिल करने के लिए अपनी अदालतों का सिलसिला शुरू किया है. जनता की इन अदालतों को हिंसक और बर्बर कह कर उन्हें अपमानित किया जाता है. लेकिन क्या इंसाफ अहिंसक हो सकता है?

इंसाफ एक हिंसक संभावना है, क्योंकि यह अनिश्चित भविष्य के अनिश्चित नतीजों पर निर्भर नहीं करता. यह एक ठोस मांग है, एक ठोस उम्मीद जिसे पीड़ित छू सके, देख सके, महसूस कर सके. इसकी बुनियादी शर्त है कार्रवाई और वह भी सामूहिक कार्रवाई. क्योंकि समूह या समुदाय ही इस इंसाफ के गवाह बनते हैं और उसे भविष्य के लिए दर्ज करते हैं.

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लेकिन समुदाय की सक्रियता कैसी होगी अगर वह भूख और बीमारियों के अपार विस्तार में रोटियों और इलाज के लिए तरसते हुए दम तोड़ते अपने परिजनों को देखने को मजबूर होता है? जब उससे सिंचाई के बिना सूखती फसलों और छीनी जा रही जमीन के आगे हाथ बांधे खड़े रहने की अपेक्षा की जाती है? जब उससे कहा जाता है कि वो सूदखोरों और जमीन के मालिकों के, कारखानेदारों के, पुलिस और फौज के बंधुआ मजदूरों की तरह जीने और सोचने के तरीके को अपना ले? जब मेहनत से कमाई गई थोड़ी सी रकम को उसे ब्याज, पुलिस के हफ्ते, डॉक्टरों की फीस और पुजारियों की रस्मों के नाम पर लुटा देना पड़े? या फिर दलितों की जली हुई बस्तियों में इंसाफ का चेहरा कैसा होगा? (धर्मापुरी में पिछले साल नवंबर में दलितों के 160 घर जला दिए गए. हरियाणा और देश के दूसरे हिस्सों में लगभग रोज ही ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं). गिरफ्तार किए जा रहे, जेलों में बंद और हिरासत में मारे जा रहे मुसलमान युवकों के लिए इंसाफ का चेहरा कैसा होगा? जनसंहारों में मारे जा रहे अल्पसंख्यकों के लिए? क्या अपमान और गुलामी से गुजरे हजारों सालों के लिए इंसाफ का मतलब थोड़ा सा और अपमान होगा? थोड़ी सी और गुलामी? और बलात्कार की शिकार हुई एक महिला के लिए और उस बच्चे के लिए जिसकी उंगलियां चार बरस की उम्र में काट की जाएं? बासागुड़ा के पिताओं के लिए जिनके बच्चे धरती की सतह से इस तरह मिटा दिए गए मानो उनका जन्म लेना ही अपराध था? या फिर कश्मीर की वादियों के लिए? उत्तर-पूर्व के गांवों के लिए? नहीं. यह हिंसक होगा ही. पुरानी पीड़ाएं जब आंखों में उतरती हैं तो मध्यवर्गीय नैतिकताएं दरकिनार हो जाती हैं. 

इस देश के आदिवासी पिछले ढाई सौ बरसों से इसी इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं. नारायणपटना में पोस्को के खिलाफ, झारखंड में गांवों को उजाड़े जाने के खिलाफ, महाराष्ट्र के दलित उत्पीड़न के खिलाफ, कुडनकुलम के निवासी परमाणु रिएक्टर के खिलाफ, कश्मीर और मणिपुर, असम, नागालैंड के लोग अपनी आजादी के लिए.

देश और दुनिया भर में हर जगह लोग इस सवाल से रू ब रू हैं...कि क्या उम्मीद हमेशा के लिए खत्म कर दी जाएगी? कि क्या बिना उम्मीद के भविष्य की कल्पना की जा सकती है? कि खुद भविष्य कैसा होगा? वे हिंसा या अहिंसा के मुद्दे को अपने रास्ते में नहीं आने देते, क्योंकि यह उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है. उनका सवाल सीधा है: क्या एक ऐसा भविष्य मुमकिन है जिसमें जिंदगी बराबरी, इज्जत और इंसाफ के साथ जी जा सके? उनका सबकुछ इसके जवाब पर निर्भर करता है और इसके रास्ते में आने वाली हर रुकावट को वे पूरी निर्ममता से खारिज कर देते हैं.

उनका सवाल जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सरल. और उतना ही सच्चा, ठोस. वे एक नई दुनिया बना रहे हैं. वे पुरानी शासन व्यवस्थाओं को तबाह कर रहे हैं. भयानक दमन और घोर अभावों में जीते हुए भी वे अपनी इस दुनिया का ताना-बाना खुद खड़ा कर रहे हैं- वे जमीनें बांट रहे हैं, वे बीज बो रहे हैं, मिलकर खेतों को जोत रहे हैं, नहरें बना रहे हैं, तालाबों की खुदाई कर रहे हैं. उनकी अपनी सरकार है, सरकार के अपने विभाग हैं, अदालतें हैं, हिफाजत के लिए समितियां हैं, दस्ते हैं, सेना है. उनके अपने सांस्कृतिक संगठन हैं, गीत हैं, नाटक हैं, पत्रिकाएं हैं. वे अपने जालिमों को उनकी गंध और धमक से पहचानते हैं. वे जानते हैं कि उस पर कब और कहां और कैसे हमला करना है. उनका हमला अचूक है और इंसाफ सुनिश्चित. वे शब्दों को उनके असली मायने लौटा रहे हैं. मुखौटों वाली दुनिया के लिए उनके खुरदरे और सख्त हाथ असली चेहरे गढ़ रहे हैं.

लेकिन मुखौटों वाली दुनिया चीख उठती है कि ‘वे लोकतंत्र पर हमला कर रहे हैं,’ मगर वे ऐसी किसी चीज पर हमला कैसे कर सकते हैं जो है ही नहीं. लोकतंत्र का मतलब चुनावी अभियान, वोट, चुनावी पार्टियां, संस्थान और इमारतें भर नहीं हैं. लोकतंत्र फैसलों के निर्माण को उत्पीड़ित जनता की इच्छा और उसके हितों के मातहत ले आने की राजनीतिक कार्रवाई है. व्यापक जनता की बदहाली, विस्थापन, भुखमरी, जनसंहार और दूसरी सारी समस्याएं अप्रत्याशित और अनचाही नहीं है. वे मौजूदा व्यवस्था की योजनाबद्ध नीतियों के ऐसे नतीजे हैं, जिनके बारे में शुरुआती दिनों से ही चेतावनी दी जाती रही है. इसलिए अगर व्यापक जनता इस व्यवस्था को लोकतंत्र मानने से इन्कार करती है और उसके मुंह पर उसी की शैली में पलटवार करती है तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. वह जानती है कि मौजूदा लोकतंत्र मुट्ठी भर ऊपरी तबके और प्रभुत्वशाली जातियों की तानाशाही है. जनता को हक है कि वह इस तानाशाही को चकनाचूर कर दे और लोकतंत्र को उसका असली रूप लौटा दे.

इन तानाशाहियों को छुपाने के लिए पारदर्शिता और सुशासन के मुखौटे इस्तेमाल में लाए जाते हैं. लेकिन मुखौटे चेहरों को छुपा सकते हैं, चरित्र को नहीं. आप इस तानाशाही को हर जगह महसूस कर सकते हैं-सूखती हुई नदियों से लेकर परती पड़ी जमीन के टुकड़ों तक और फर्जी मुठभेड़ों से लेकर भरी हुई जेलों तक, अपनी बारीक और भ्रम में डाल देनेवाली तानाशाहियां छुपे हुए रूप में काम करती हैं. ताकत, एकाधिकार और मुनाफा- दुनिया की सारी तानाशाहियों के स्रोत हैं.

इसीलिए, जनता जब इन तानाशाहियों के हजार हाथों में से एक को कुचलती है तो सत्ता और उसके हिमायतियों के गलियारों से शोर उठता है: ‘क्या लोकतंत्र में हिंसा जायज है?’ ‘ये बर्बर और असभ्य लोग अहिंसक लोगों पर हमले कर रहे हैं.’

इसीलिए, अब जब कुछ लोग ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार को वे जंगल में सेना भेजने पर राजी कर लेंगे और कुछ दूसरे लोग कोसते हुए कह रहे हैं ऐसे हमले करके संघर्षरत आदिवासी जंगल में सेना और दमन को न्योता दे रहे हैं, बस्तर के आदिवासी इन ऐलानों और मन ही मन लगाए गए हिसाबों से परे, अपने पर थोप दिए गए ढाई सौ वर्षों पुराने युद्ध के अगले कदम की तैयारी कर रहे हैं. वे जानते हैं कि उनकी लड़ाई महज सरकारों से नहीं, साम्राज्यों से है. वे यह भी जानते हैं कि जिस वक्त साम्राज्यों ने उनके जीने के तरीकों को गैरकानूनी बना दिया है, तो इस कानून को ध्वस्त करके ही वे अपने जीने के तरीकों को बनाए रख सकते हैं और उसका आगे विकास कर सकते हैं.

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एक छोटी सी मिसाल: 2009 में जब लालगढ़ में आदिवासियों के संगठित संघर्ष के दौरान सीआरपीएफ को इलाके के अपने कैंप खाली करने थे तो स्थानीय लोगों ने इस प्रस्ताव को सिरे से ही खारिज कर दिया कि उन कैंपों को स्कूल या अस्पताल में बदल दिया जाए. उनका कहना था कि ‘ब्रिटिश’ लोगों से जुड़ी किसी भी चीज का वे अपने जीवन में इस्तेमाल नहीं करेंगे.

ब्रिटिश! वे 2009 में सीआरपीएफ की बात कर रहे थे. उन्होंने शब्दों को उनके पांवों पर खड़ा कर दिया था. और अब वे दुनिया को उसके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए उनमें कोई भ्रम नहीं है. वे जानते हैं कि अगर इन्हें नइंसाफियों और शोषण के सिलसिले को उलट देना है तो उन्हें राजनीतिक ताकत के सवाल को हल करना होगा. उन्हें अपने संघर्ष और एकजुटता से, न कि समझौतों के जरिए, यह ताकत हासिल करनी होगी. बिना इसके दूसरी सारी कोशिशें और उपलब्धियां नाकाम बना दी जाएंगी. वे इस बात को जानते हैं कि राज्य शासक वर्ग के हाथों में जनता के उत्पीड़न का औजार है और अगर उन्हें उत्पीड़ित जनता को इस उत्पीड़न से मुक्त करना है तो इस शासक वर्ग को बेदखल करना होगा. उन्हें इसको लेकर भी कोई भ्रम नहीं है कि इस कार्रवाई का दमनकारी होना उसी अनुपात में लाजिमी है जिस अनुपात में मौजूदा शासक वर्ग दमनकारी है. फर्क बस यह होगा कि जनता की तरफ से दमन का निशाना प्रतिक्रियावादी ताकतें और ऊपर के कुछ फीसदी प्रभुत्वशाली लोग होंगे.

इसलिए जनता अपनी हिंसा और हथियारों की जिम्मेदारी इस या उस सरकार पर नहीं डालती. वह राज्य की ऐतिहासिक उत्पत्ति और भूमिका को सामने रखती है. वह इसकी तरफ इशारा करती है कि राज्य दमनकारी होता ही है. अगर उस राज्य पर अधिकार करना है तो उसके दमन से लड़ने में सक्षम होना जरूरी है. इसीलिए ऐसे वर्ग संघर्ष की कल्पना करना नामुमकिन है, जिसमें जनता ताकत का इस्तेमाल नहीं करे.

लेकिन मध्यवर्ग हिंसा को ऐसे देखता है मानो यह कोई दूर की पराई चीज हो. मानो इसका हमारे समाज और इसकी सत्ता संरचना से कोई रिश्ता ही न हो. मानो किसी दूसरे ग्रह के निवासियों ने हमारी दो अंकों की वृद्धि दर से जलते हुए हमें शाप दे दिया हो (जो अब मुंह के बल नीचे आ रही है). सदियों से जाति की अमानवीय व्यवस्था के रूप में चली आ रही आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक हिंसा को भूल जाने का अभिनय करता है. वह स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ निरंतर हो रही हिंसा को भी भूल जाता है. वह भूल जाता है कि हिंसा को उत्पीड़ित जनता के संघर्षों ने नहीं, बल्कि उत्पीड़कों की व्यवस्था ने पैदा किया है. वह पूछता है कि आखिर एक ऐसे देश में लोगों के हाथ में रॉकेट लॉंचर और बारूदी सुरंगों का क्या काम जहां सब्सिडियां तक घर बैठे बैंक खाते में जमा करा दी जाती हों और तेंडुलकर के शतकों को गिनना लगभग नामुमकिन सा हो चला हो. क्या यह बहुत पुरानी बात है जब खुद इसी मध्यवर्ग ने भ्रष्टाचार और बलात्कारों के खिलाफ एक शांतिपूर्ण विरोध करते हुए दिखा नहीं दिया था कि शांति अभी भी इस देश के मूल्यों के बाजार से बाहर नहीं हुई है?

भारत का मध्यवर्ग- आबादी का 20 फीसदी हिस्सा- अभी गुलाबी सपनों पर सवार तबका है. वैश्वीकरण ने इस तबके के लिए अनपेक्षित फायदों और सुविधाओं के दरवाजे खोले हैं. लेकिन इसने कीमत भी भरपूर वसूली है: अनिश्चितता और असुरक्षित भविष्य इस तबके के सबसे बड़े दु:स्वप्न हैं. इनका यह डर इंडिया गेट पर प्रदर्शनों में उजागर होता है, जहां अब देश की 75-80 फीसदी आबादी को प्रदर्शन की इजाजत नहीं है. इस तबके की मजबूरियां इसे उत्पीड़ित जनता के संघर्षों के साथ ले आती हैं, लेकिन वह इसमें भी अपनी महानता बोध के साथ ही आता है. वह मांगों और दलीलों की एक फेहरिश्त पेश करता है, जिसे संघर्षों को मानना ही होगा. वह इस तरह व्यवहार करता है कि मानो उसने हिमायत करके कोई एहसान कर दिया हो और अब इस एहसान का बदला चुकाने की बारी संघर्ष कर रही उत्पीड़ित जनता की है.

लेकिन उत्पीड़ित जनता के हित दूसरे हैं और मकसद भी. वह इस फेहरिश्त को मान नहीं सकती. इसलिए मध्यवर्ग उसकी हर जुझारू उपलब्धि पर कई कदम पीछे हटते हुए अपना सीना पीटता है: अब सरकार का दमन और बढ़ जाएगा. अब सेना और वायुसेना उतारे जाएंगे. ये लोग जानबूझकर दमन को बुलावा दे रहे हैं.

मानो सेना और राज्य के दूसरे सशस्त्र बलों का अस्तित्व ही जनता के दमन के लिए नही हो. मानो राज्य की ताकत जनता के प्रतिरोध का दमन करने के लिए ही नहीं बनी हो. मानो जनता की कार्रवाइयों के बिना राज्य उत्पीड़न और नाइंसाफियों से मुंह मोड़ लेगा. जमीनी सच्चाइयों को समझे बिना ऐसी बातें करने पर राज्य की दलीलें ही मजबूत होती हैं. जनता इस शोर-शराबे से प्रभावित नहीं होती. उसे पता है कि राज्य का होना भर ही दमनकारी है. वह राज्य पर कब्जा करके ही दमन के इस सिलसिले को उलट सकती है और इससे निजात पा सकती है, चुप बैठे रह कर नहीं. उसे पता है कि मौजूदा व्यवस्था सलवा जुडूम की नाइंसाफियों का इंसाफ नहीं कर सकती थी. वह सिर्फ 2002 के गुजरात और 1984 के दिल्ली की ही नहीं ऐसे ही कई वर्षों और महीनों की पीड़ित रही है, वह लगातार इस राज्य के दमन को देखती और सहती है. उसे पता है कि दमन और उत्पीड़न दुखद लगने वाले शब्द भर नहीं हैं. कि वे कितने ठोस हैं और उनकी ताकत क्या है. इसलिए वह कुछेक कानूनों और अदालती फैसलों का इंतजार नहीं करती, क्योंकि इस राज्य द्वारा बनाए गए अनगिनत कानूनों के बावजूद दलितों और आदिवासियों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं खत्म नहीं हुई हैं, बल्कि वे बढ़ती जा रही हैं. अपने अनुभव से उसने देखा है कि जब जब जनता अपनी पूरी ताकत से जुल्म से लड़ी है, जालिमों को हार माननी पड़ी है.

और इसीलिए उम्मीद और इंसाफ हिंसक संभावनाएं हैं और इन्हें टाला नहीं जा सकता. और इसीलिए मौजूदा व्यवस्था उम्मीद और इंसाफ से डरती है. वह दुनिया के सबसे बड़े सैन्य बल के जरिए, ताकतवर मीडिया और रीढ़विहीन साहित्य के जरिए इस उम्मीद को कुचलना चाहती है. लेकिन खेतों, खलिहानों, घाटियों, गांवों और जंगलों में उम्मीद की फसल उग रही है.

इसी जून महीने में जब धूप सबसे तेज होती है और मिट्टी में जरा भी नमी नहीं होती, किसान खेतों को जोत कर छोड़ देते हैं. इससे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली पतवारों की जड़ें मिट्टी में ऊपर आ जाती हैं और झुलसा देने वाली धूप उनको बीजों समेत सुखा डालती है.

यह पतवारों के खिलाफ किसानों का दीर्घकालीन युद्ध है. वे जानते हैं कि दुश्मन पर कब हमला करना है और कब नहीं. यह मानने की कोई वजह नहीं है चेरुकुरी राजकुमार आजाद की इस बात का कि ‘दुश्मन पर हम तब हमला करेंगे जब हम चाहेंगे, तब नहीं जब वो चाहेगा’ किसानों के इस तौर-तरीके से कोई रिश्ता नहीं है.

बस कुछ वक्त बाद ही, अभी सूखी और सपाट दिख रही धरती पर फसलों का सिलसिला एक बार फिर शुरू होगा. जिन फसलों को पतवारों ने तबाह करना चाहा, मौसमों ने जिनसे मुंह मोड़ लिए, जिन पर कीड़ों और जानवरों का खतरा हमेशा मंडराता रहा, उन्हीं के बीज धरती को एक बार फिर हरियाली से भर देंगे.

इस बार उनके रास्ते में जो आएगा, उसे पतवारों के अंजाम को याद रखना चाहिए.

11 जून 2013

झूठ, अर्धसत्य. अर्धतथ्य का पुलिंदा है शुभ्रांसु की किताब: गुड्सा उसेंडी

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में दरभा घाटी की कार्रवाई के बाद से लगातार बहस चल रही है, शुभ्रांसु चौधरी ने बी.बी.सी. पर एक आलेख के माध्यम से बहस को एक नया मोड़ दिया था. कुछ ही महीने पहले शुभ्रांसु की पुस्तक ‘लेट्स कॉल हिम वासु’ पेंग्विन से हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, जो कई विवादित तथ्यों से भरी रही, पर किसी प्रतिबंधित पार्टी पर लिखे गए तथ्यों की जाँच आम पाठक के लिए तो मुश्किल ही होती है. उनके द्वारा लिखे गए आलेख और इस पुस्तक के संदर्भ में माओवादी पार्टी ने एक प्रेस नोट जारी किया है. मेल द्वारा प्राप्त इस प्रेस नोट को बगैर कैंची का इश्तेमाल किए यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है: मॉडरेटर

5 जून 2013
शुभ्रांशु चौधरी की टिप्पणियां माओवादी संघर्ष को नीचा दिखाने के प्रयासों का हिस्सा ही हैं!
25 मई को छत्तीसगढ़ के झीरमघाटी के पास पीएलजीए द्वारा किए गए हमले के बाद, जिसमें महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल समेत कुछ अन्य लोग मारे गए थे, पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक था - ‘मास्टर के हाथ नक्सलियों की कमान?’, जिसे कई अन्य मीडिया संस्थाओं ने भी प्रकाशित व प्रसारित किया। इसमें उन्होंने इस हमले से हमारी पार्टी की दण्डकारण्य इकाई के नेतृत्व में हुए परिवर्तन को जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि कामरेड कोसा की जगह पर कामरेड रामन्ना के सचिव चुने जाने पर अब हिंसात्मक कार्रवाइयों पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। अपने इस मनगढ़ंत विश्लेषण को सही ठहराने के लिए उन्होंने आगे यह लिखा कि ‘रामन्ना कोसा जैसे नेताओं को पसंद नहीं करते हैं’। हमारी दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी मानती है कि ये सब कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं हैं। इस संदर्भ में कामरेड रामन्ना के साथ हुई अपनी कथित बातचीत का हवाला देते हुए उन्होंने कई आपत्तिजनक बातें लिखीं। हमारी कमेटी शुभ्रांशु की इन भद्दी टिप्पणियों की कड़ी निंदा करती है।
शोषणकारी राजसत्ता हमारी पार्टी के नेतृत्व में जारी क्रांतिकारी आंदोलन का सफाया करने के लिए आज एक भारी दमनात्मक युद्ध चला रही है, जिसका एक महत्वपूर्ण अंग है मनोवैज्ञानिक युद्ध। इसके तहत मीडिया के जरिए और कई अन्य साधनों से झूठों, मनगढ़ंत कहानियों और अफवाहों को फैलाया जा रहा है। इसमें नेतृत्व को खासतौर पर निशाना बनाया जा रहा है। नेतृत्व के बीच मतभेद व मनमुटाव होने का दुष्प्रचार भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है ताकि जनता को गुमराह किया जा सके। हमें लगता है कि जाने या अनजाने में शुभ्रांशु चौधरी भी इसका हिस्सा बन गए हैं।
उसके बाद 1 जून को बीबीसी रेडियो के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘इंडिया बोल’ में भाग लेते हुए शुभ्रांशु ने हमारे आंदोलन के संदर्भ में कुछ और टिप्पणियां कीं। उनका कहना है कि माओवादियों का राजनीतिक लक्ष्य और उनके नेतृत्व में लड़ रहे आदिवासियों के मुद्दे दोनों अलग-अलग हैं। बकौल उनके, ‘‘कुछ लोग माओवाद के नाम पर दुनिया में राजनीति को बदलना चाहते हैं। और अधिक लोग... जिनको आप आदिवासी कहते हैं, जिनको हम पैदल सेना कहते हैं, वे उनके साथ इसलिए जुड़ते हैं क्योंकि आज की इस व्यवस्था से उनको न्याय नहीं मिलता है... माओवादी लाल किले में लाल झण्डा फहराना चाहते हैं। माओवादियों की लड़ाई जंगल और जमीन की लड़ाई नहीं है।... वे इस दुनिया में समाजवाद और उसके बाद साम्यवाद लाना चाहते हैं....’’ आदि-आदि।
गौरतलब है कि शुभ्रांशु चौधरी ने माओवादी आंदोलन के बारे में हाल ही मे एक किताब लिखी है जिसका नाम ‘लेट्ज़ काल हिम वासु’ - हिंदी में ‘उसका नाम वासु नहीं’ है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अपनी किताब में माओवादियों के साथ सात साल संपर्क रखने का दावा करने वाले शुभ्रांशु ने हमारे आंदोलन को गहराई से समझने की कभी गंभीर कोशिश की ही नहीं। उन्होंने वर्ग संघर्ष के बुनियादी नियमों तक को समझने की कोशिश नहीं की। आदिवासियों के तमाम संघर्ष, चाहे वे माओवादियों के नेतृत्व में चलें या उसके बगैर, राजसत्ता के खिलाफ जारी वर्ग संघर्ष का हिस्सा ही हैं। इसमें दो राय नहीं कि लम्बे परिप्रेक्ष्य से या अंतिम तौर पर भाकपा (माओेवादी) का मकसद राज्यसत्ता को छीन लेना है जिसके बगैर हम अपने देश के लोगों को साम्राज्यवाद, सामंतवाद और दलाल नौकरशाह बुर्जुआ की जकड़ से मुक्ति नहीं दिला सकते, यानी मौजूदा अन्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को नहीं बदल सकते। और कम्युनिस्टों ने, यहां तक कि कार्ल मार्क्स ने भी, सशस्त्र क्रांति के जरिए राजसत्ता पर कब्जा करने और समाजवाद व साम्यवाद की स्थापना करने का महज ‘सपना’ नहीं देखा था। वह मजदूर वर्ग समेत तमाम शोषित वर्गों की समस्याओं तथा समाज की आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों और तमाम वर्ग संघर्षों के समग्र और वैज्ञानिक विश्लेषण का निचोड़ है। मौजूदा राजसत्ता को उखाड़ फेंककर मजदूर-किसानों की एकता के आधार पर चार वर्गों के संयुक्त मोर्चा - जिसमें मध्यम और निम्न पूंजीपति वर्ग भी शामिल हैं - द्वारा राजसत्ता पर कब्जा करने की राजनीतिक रणनीति भारतीय समाज के ठोस और समग्र विश्लेषण के आधार पर तैयार हुई है, न कि चंद लोगों की दिमागी कल्पनाओं से। यह हमारी पार्टी का फौरी कार्यक्रम है जिसे हम नई जनवादी क्रांति कहते हैं।
भारत के अर्द्धसामंती और अर्द्धउपनिवेशी समाज में मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, छोटे व मध्यम पूंजीपतियों आदि शोषित वर्गों तथा आदिवासियों, दलितों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि उत्पीड़ित तबकों की तमाम बुनियादी समस्याओं का स्थाई समाधान तभी हो सकता है जब इस व्यवस्था को जड़ से बदला जाएगा और शोषित वर्गों की जनवादी राजसत्ता स्थापित की जाएगी। और इस क्रांतिकारी प्रक्रिया की हमारी पार्टी अगुवाई कर रही है।
इसी लक्ष्य से हमारी पार्टी भाकपा (माओेवादी) पिछले कई दशकों से तमाम शोषित जनता को संगठित कर रही है जिसमें आदिवासी एक मुख्य हिस्सा हैं। जनता के हित ही पार्टी के हित हैं। जल-जंगल-जमीन समेत जनता की रोजमर्रा की सारी समस्याओं को लेकर वह जन संघर्षों का निर्माण कर रही है और शोषित जनता को विभिन्न जन संगठनों में गोलबंद कर रही है। इतिहास पर नजर डालें तो विश्व में अब तक हुई कोई भी क्रांति जनता के रोजमर्रा के मुद्दों से अछूती नहीं रही। बल्कि जनता की आकांक्षाओं और जरूरतों की सही अभिव्यक्ति के रूप में ही क्रांतियां सफल हो पाईं। 1917 की रूसी क्रांति ‘शांति और रोटी’ के नारे से सफल हुई थी। उसी तरह भारत में भी जल-जंगल-जमीन का मुद्दा कृषि क्रांति का हिस्सा है जो नई जनवादी क्रांति की धुरी है। लेकिन माओवादी आंदोलन में शामिल आदिवासियों और आंदोलन के नेतृत्व के बीच शुभ्रांशु कृत्रिम तरीके से विभाजन करके उनके लक्ष्यों को अलग-अलग दिखाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। माओवादी आंदोलन में भागीदार आदिवासियों को ‘पैदल सेना’ की संज्ञा देना भी उनकी तंग मानसिकता का ही परिचायक है।
शुभ्रांशु यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आदिवासियों ने किन्हीं दूसरों के ‘राजनीतिक लक्ष्य’ के तहत नहीं, बल्कि अपनी मुक्ति के लिए यह लड़ाई लड़ रहे हैं। देश के इतिहास में आज तक जहां कहीं भी आदिवासियों के संघर्ष या विद्रोह हुए, उनका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में जल-जंगल-जमीन से जुड़ा ही रहा। और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे का सीधा सम्बन्ध राजसत्ता से है। औपनिवेशिक दौर मेें आदिवासियों ने, जिनको शुभ्रांशु ‘पैदल सेना’ कहकर पुकार रहे हैं, अंग्रेजों के खिलाफ दर्जनों बार विद्रोह किया था। लेकिन अगर कोई यह कहेगा कि उन आदिवासियों के मुद्दे अलग थे और भारत की आजादी का लक्ष्य अलग था, उस पर हंसा ही जा सकता है। दरअसल आदिवासियों को लेकर शुभ्रांशु का नजरिया ही बुरी तरह गड़बड़ है। शुभ्रांशु आदिवासियों के मुद्दों की बात तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि उनका हल कैसे हो सकता है। वे इस सच्चाई को समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन पर अधिकार या शुभ्रांशु के मुताबिक ‘न्याय’ तब तक नहीं मिलने वाला है जब तक कि राजसत्ता पर सामंतशाहों और दलाल पूंजीपतियों का कब्जा रहेगा जिन्हें साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त है। आज देश भर में, खासकर आदिवासी इलाकों में खदानों, बड़े बांधों, भारी उद्योगों, एक्सप्रेस हाइवे, अभयारण्य और सैन्य छावनियों के निर्माण की परियोजनाओं से करोड़ों लोगों का विस्थापन किया जा रहा है। इस कार्पोरेट लूटखसोट, जिसने उन्हें जीवन-मरण के संघर्ष में धकेल दिया, के साथ मौजूदा व्यवस्था और उसके द्वारा लागू नवउदार नीतियों के सम्बन्ध को भी वे समझ नहीं पा रहे हैं। या फिर शायद वे इस भ्रम में होंगे कि मौजूदा शोषणकारी और पीड़ादायक व्यवस्था को बरकरार रखते हुए ही कुछेक ‘बैंड-एइड सोल्यूशन्स’ के जरिए लोगों के मुद्दों का हल किया जा सकता है या किया जाना चाहिए।
आज दण्डकारण्य में, देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी अगर माओवादी आंदोलन में संगठित हो गए हैं, तो यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें हमारी पार्टी द्वारा शुरू से ही राजसत्ता छीनने के लक्ष्य से प्रेरित किया गया था। शुरू से ही उनके तमाम संघर्षों मेें केन्द्र बिंदु के तौर पर राजसत्ता का सवाल ही रहा। आज यहां क्रांतिकारी जनताना सरकार का निर्माण भी हुआ है जोकि जनता की जनवादी राजसत्ता का भ्रूण रूप है। भले ही उनमें से बहुतेरे ने रायपुर, दिल्ली जैसे शहरों को नहीं देखा हो, जैसा कि शुभ्रांशु ने अपनी किताब में कई बार अप्रसन्नता भरे अंदाज में कहा, लेकिन इतना तो समझ ही गए हैं कि पिछले पैंसठ सालों में दिल्ली और रायपुर ने उनके साथ क्या किया था और उन्हें क्या दिया था। और लाल क़िले पर लाल झण्डा फहराना भी सिर्फ भाकपा (माओवादी) का सपना नहीं है जैसा कि शुभ्रांशु कह रहे हैं। यह भारत के तमाम शोषित, उत्पीड़ित व मेहनतकश जन समुदायों का दशकों पुराना सपना है क्योंकि उन्हें पता है कि तभी उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ इज्जत के साथ जीने के अधिकार की गारंटी मिल सकती है।
चलते-चलते उनकी उपरोक्त किताब पर हमारी कमेटी संक्षेप में कुछ टिप्पणियां करना चाहती है। यह किताब ढेर सारे झूठों, बहुत से अर्द्ध सत्यों और थोड़े-बहुत तथ्यों का पुलिंदा भर है। तथ्यों को भी उन्होंने काफी हद तक तोड़-मरोड़कर ही पेश किया। उसमें दिए गए कई अंश सफेद झूठ तो हैं ही, खासकर डाक्टर बिनायक सेन प्रकरण पर, जीत और मुक्ति के साथ हमारी पार्टी के कथित सम्बन्धों के बारे में और एस्सार कम्पनी से पैसा लेने के मामले में - इन तीन मुद्दों पर उन्होंने जो कुछ लिखा उसका हमारी कमेटी कड़े शब्दों में खण्डन करती है। हमें लगता है कि इस तरह वही आदमी लिख सकता है जो जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों को और उन आंदोलनों के शुभचिंतकों को नुकसान पहुंचाना चाहता हो; जो उन आंदोलनों का दमन कर रही राजसत्ता के पक्ष में खड़े रहना चाहता हो।
 (गुड्सा उसेण्डी)
प्रवक्ता
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

07 जून 2013

लोकतंत्र पर हमला या लोकतंत्र विरोधियों पर हमला?


सुनील कुमार

एक सवाल-एक बात: 6 

फोटो: दख़ल की दुनिया
माओवादियों के द्वारा छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुई कार्रवाई के बाद कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार बहस का विषय बने हुए हैं. इन्हीं सवालों पर बहस के लिए 'एक सवाल-एक बात' शीर्षक से कुछ कड़िया प्रस्तुत की जा रही हैं. बहस के लिए आप अपने सवाल और अपनी बात dakhalkiduniya@gmail.com पर भेज सकते हैं. 


25 मई, 2013 की शाम, लगभग 5 बजे सुकमा जिले के दरभा घाटी में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा कांग्रेस के ‘परिवर्तन यात्रा’ पर हमला किया गया। इस हमले में बस्तर का टाईगर कहे जाने वाले महेन्द्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल, पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित 29 लोगों की मृत्यु हो गई जिसमें कांग्रेसी नेता, कार्यकर्ता और पुलिस बल के जवान थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित करीब 32 लोग घायल हो गये। इस हमले के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी ने गले फाड़-फाड़ कर चिल्लाना शुरू कर दिया कि यह हमला ‘भारतीय लोकतंत्र’ पर हमला है। उन्होंने कहा कि इस हमले से निपटने (दमन चक्र चलाने) के लिए हम सभी को दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को कुचल देना ही ‘लोकतंत्र’ पर हमले से बचने का एक मात्र रास्ता है।
25 मई, 2013 की घटना से पहले 17 मई, 2013 की रात बीजापुर के एड़समेटा गांव में जब गांव के आदिवासी अपना बीज पर्व मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे, उसी समय अर्द्धसैनिक बल के जवानों ने उनके ऊपर फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें तीन मासूम बच्चों सहित 8 लोगों की मौत हो गई और 5 घायल हो गये। घायल 4 लोग जब अस्पताल गये तो उनको देखने के लिए कोई कर्मचारी तक नहंीं आया और उनको भूखे रहकर वहीं रात गुजारनी पड़ी। घायलों में से एक तो अस्पताल गया ही नहीं। एक साल पहले 28 जून, 2012 की रात बीजापुर के सरकिनगुड़ा में बीज पर्व पर बात करने के लिए इकट्ठा हुए थे, उस रात भी ‘बहादुर’ सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन के जवानों ने 17 ग्रामिणों को मौत की नींद सुला दिया, जिसका जश्न रायपुर से लेकर दिल्ली तक मनाया गया और कहा गया कि हमारे बहादुर जवानों को बहुत बड़ी सफलता मिल गई है। ऐसी छोटी-बड़ी घटनायें लगातार छत्तीसगढ़ में होती रहती हैं और होती रहंेगी। सीआरपीएफ प्रमुख प्रणय सहाय के अनुसार वामपंथी उग्रवाद प्रभावित नौ क्षेत्रों में 84000 सीआरपीएफ के जवान तैनात किये गये हैं; इसके अलावा कोबरा, बीएसएफ, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, ग्रेहाउंड, इत्यादि के अलावा राज्य पुलिस के जवानों को इन क्षेत्रों में लगाया गया है। इतनी भारी संख्या में जब जवान होंगे तो क्या करेंगे? उनको कुछ तो अपने ‘कर्तव्य का पालन करना पड़ेगा ही’। जब इन जवानों के कर्तव्य का खुलासा डॉ विनायक सेन व हिमांशु जैसे लोग करते हैं तो उनको फर्जी तरीके से फंसाया जाता है, उनके आश्रम को तोड़ दिया जाता है, यहां तक कि पुलिस अधिकारियों द्वारा पत्रकारों को मारने की खुली छुट वायरलेस पर दी जाती है।
बस्तर का टाइगर
महेन्द्र कर्मा बस्तर टाइगर के नाम से जाने जाते थे। मेरी राय में महेन्द्र कर्मा टाइगर ही नहीं खूंखार टाइगर थे, जिनकी भूख कभी शांत होने वाली नहीं थी। महेन्द्र कर्मा ने अपनी राजनीति की शुरूआत सीपीआई के साथ की थी और 1978 में सीपीआई के टिकट पर पहली बार विधायक चुने गये थे। सत्ता के लोभ में फंसे कर्मा को जब दुबारा टिकट नहीं मिला तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। 1996 में जब सीपीआई ने संविधान की पांचवी और छठवीं अनुसूची को लागू कराने के लिए आन्दोलन शुरू किया तो महेन्द्र कर्मा ने इसका विरोध किया। कर्मा भोले-भाले आदिवासियों को फंसाकर उनकी जमीनें ले लिया करते थे और उसमें लगे बेशकीमती पेड़ों को कटवा कर बेच दिया करते थे। यह कांड ‘मालिक मकबूजा’ के नाम से जाना जाता है। महेन्द्र कर्मा ने आदिवासियों की जमीन और खनिज संपदा हड़पने के लिए सलावा जुडूम अभियान चलाया, जिसमें लगभग 650 गांवों को जला दिया गया, हजारों लोगों की नृशंसता पूर्वक हत्या की गई, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, यहां तक कि मासूम बच्चों को भी मारा गया, उनकी ऊंगलियां काट दी गई। 50000 आदिवासियों को उनके गांव से उठाकर सलावा जुडूम के कैंप में रखा गया। कैम्पों में इन आदिवासियों को जानवरों जैसा रखा जाता था और महिलाओं के साथ क्या सलूक होता रहा है यह छुपी हुई बात नहीं है। छत्तीसगढ़ के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजित योगी अपने भाषाणों में बार-बार एक घटना का जिक्र करते हैं कि उनके एक कार्यकर्ता ने शाम के समय फोन करके ‘‘गाली देते हुए कहा कि तुम आदिवासियों के नेता बनते हो आज हमारी बेटी को सलवा जुडूम वालों ने उठा लिया है और तुम कुछ नहीं कर सकते।’’ सलावा जुडूम के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकार ने अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध कराया तो इस कैम्प का खर्च टाटा और एस्सार ने उठाया। इससे यह बात साफ हो जाती है कि सलावा जुडूम का मकसद क्या था। इस तरह इस टाइगर और उनके पूर्वजों की अनेकों कहानियां मिल जायेंगी।
25 मई, 2013 की घटना के बाद एसौचेम (पूंजीपतियों की संस्था) के अध्यक्ष राजकुमार एन. धूत ने कहा कि ‘‘नक्सल प्रभावित राज्यों में काम करने वाले लोगों के बीच असुरक्षा का जिस तरह का माहौल है उसे लेकर संगठन बेहद चिंतित है ........। इसके लिए आर्थिक या किसी और स्तर पर जिस भी तरह की मदद की दरकार सरकार को होगी उसमें भारतीय औद्योगिक जगत सदैव साथ देगा।’’ एसौचेम की बात से बिल्कुल साफ है कि पूंजीपतियों की लूट को बनाये रखने के लिए सरकार को चाहे जितने भी निर्दोष लोगों की खून बहाना पड़े, जितनी भी मां-बहनों के साथ बलात्कार करना पड़े, करेंगे।
लोकतंत्र पर हमला
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के हमले को भारतीय लोकतंत्र पर हमले की बात शासक वर्ग के मीडिया में जोर-शोर से कही जा रही है। शासक वर्ग द्वारा चलाये गये अभियान सलावा जुडूम, ग्रीन हंट द्वारा अपनी जीविका के साधन, जल-जंगल-जमीन, बचाने के आन्दोलन में मारे गये लोगों के लिए क्या सरकार ने कभी खेद प्रकट किया है और हत्यारों, बलात्कारियों को सजा दी है? क्या एड़समेट्टा और सारकिनगुड़ा के हत्यारे दोषी अधिकारियों, मंत्रियों को सजा दी है या कभी दे पायेगी?  इन निहत्थे आदिवासियों की हत्या और बलात्कार पर भारत का लोकतंत्र शर्मसार क्यों नहीं होता? उड़ीसा से लेकर झारखंड तक पूंजीपतियों की लूट को बनाये रखने के लिए जनता के आन्दोलनों को कुचला जा रहा है, फर्जी केस लगाकर जेलों में डाल दिया जा रहा है, महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। क्या आम जनता के लिए भी कोई लोकतंत्र है? भारत में किसान विरोधी नीतियों के कारण लगभग 5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। क्या इन हत्यारी नीतियों पर कभी विचार किया गया है? इस देश में मां-बहनों को अपने पेट की भूख मिटाने के लिए अपने ही जिस्म का सौदा करना पड़ता है, अपने बच्चों को चंद रुपये की खातिर बेच दिया जाता है, जिससे कि वे कुछ दिन और जिन्दा रह सकें। जब मजदूर इसी लोकतंत्र द्वारा दिये गये अपने कानूनी अधिकार की मांग करते हैं तो हजारों मजदूरों को एक साथ नौकरी से निकाल कर उनके परिवारों को तिल-तिल मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। उससे भी जब उनके मनोबल को नहीं तोड़ पाते है तो इन मजदूरों को सालों-साल जेल में रखकर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है- जैसा कि मारूति सुजुकी, ग्रेजियानो, निप्पोन इत्यादि मजदूरों के साथ किया जा रहा है। 19 मई, 2013 को ही जब कैथल में मारूति सुजुकी के मजदूर, उनके परिवार और समर्थक मारूति सुजुकी मजदूरों पर हो रहे अन्याय की मांग को लेकर हरियाणा के उद्योग मंत्री से मिलना चाहते थे तो महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया, पानी की बौछार की गई तथा चुन-चुन कर नेतृत्वकारी मजदूरों और उनके समर्थकों को पकड़ा गया और फर्जी धाराओं के तहत उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। ये घटनाएं लोकतंत्र का संचालन करने वाली संसद से मात्र कुछ दूरी पर एनसीआर में ही हो रही है, दूर-दराज की बात तो छोड़ ही दीजिये कि वहां जनता पर किस तरह के जुल्मों-सितम ढाये जा रहे हैं। इससे साफ है कि इस लोकतंत्र में से लोक (जनता) गायब है और तंत्र ही बच गया है और जब इस तंत्र पर हमला होता है तो शासक वर्ग तिल मिला उठता है जो आवाज तंत्र के खिलाफ हो उस आवाज को कुचलने के लिए दिन-रात एक कर देता है। रातों रात राहुल गांधी रायपुर पहुंच गये, दूसरे दिन प्रधानमंत्री से लेकर सोनिया गांधी तक छत्तीसगढ़ पहुंच जाते हैं। लेकिन ये लोग चंद दूरी पर मजदूरों पर हो रहे हमले पर जाना या उनके अधिकारों के विषय में बोलना उचित नहीं समझते। जिस देश में ‘लोकतंत्र’ के ढांचे में ही हिंसा है; जहां जाति, धर्म, लिंग के नाम पर लोगों को मार दिया जाता है और ‘लोकतंत्र’ का मुखिया कहता है कि ‘‘बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’’ तो दूसरी घटना में राजधर्म निभाने की बात कही जाती है तो कभी बेटियों के पिता होने की दुहाई दे कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर ली जाती है।  राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री तक सभी एक सुर में कह रहे हैं कि लोकतंत्र में किसी भी प्रकार के हिंसा का स्थान नहीं है। क्या अब तक सलावा जुडूम या जीविका के साधन के लिए आंदोलन कर रहे लोगों पर हो रहे हमले लोकतंत्र का हमला नहीं है? दिल्ली में भी माओवादी हमले कर सकते हैं इस तरह की अफवाह फैला कर, क्या दिल्ली व दिल्ली जैसे शहरों भी जनवाद पंसद लोगों पर दमन चक्र चलाने की साजिश की जा रही है। क्या यहां पर लोकतंत्र बचा है? ‘लोकतंत्र’ पर हमला हो रहा है या ‘लोकतंत्र’ विराधियों पर हमला हो रहा है?
मीडिया का रोल
प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह द्वारा मुख्यमंत्रियों की बैठक में कहा गया था कि मिडिया को भी को-आपट करना चाहिए। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया शासक वर्ग की बातों को ही जोर-शोर से प्रचारित कर रही है या उनके सुर में सुर मिलाने वाले लोगों की बातों को ही तवज्जो दे रही है।  ज्यादातर ऐसे लोगों को चर्चा में बुलाया जा रहा है जो कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) यानी शोषित-पीड़ित जनता के आन्दोलन को बर्बर तरीके से कुचलने के पक्ष में है। अगर इस चर्चा में कोई तथ्यों को रखते हुए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से बिना शर्त बातचीत का सुझाव देता है तो उसे माओवादी का प्रवक्ता का संज्ञा दे दी जाती है। जल-जंगल-जमीन की लूट में से एक हिस्सा इन मीडिया को भी मिलता है विज्ञापन के रूप में, जो कि सरकार व कम्पनियों द्वारा दिया जाता है। बहुत सारे मीडिया घराने अब तो सीधे सीधे जल-जंगल-जमीन के लूट में लगे हुए हैं- जैसे कि दैनिक भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश चंद अग्रवाल को रायगढ़ में कोल ब्लॉक का आवंटन किया गया है। इसी तरह नवभारत ग्रुप ने बस्तर में आइरन स्पंज प्रोजेक्ट के लिए 8 सितम्बर, 2003 को 1460 करोड़ रु. का छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इकरारनामा (डवन्) किया है।
नक्सलवाद ने जहां सामंतों की चुलें हिला दी वहीं नक्सलवाद का विकसित रूप माओवाद ने आज समांतो व पूंजीपतियों के मनसूबों पर पानी फेर दिया है। टाटा कोे बस्तर में  5.5 मिलियन टन का स्टील प्लांट लागने के लिए 2044 हेक्टेअर भूमि चाहिए जिसके लिए 6 जून 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इकरारनामा (डवन्) हुआ है। लेकिन तीन बार इकरारनामा का नवीनीकरण होने के बाद भी आज तक अपने मकसद में टाटा कमायब नहीं हो पाया। इसी तरह एस्सार कम्पनी के साथ भी जुलाई 2005 में इकरारनामा हुआ है। एस्सार कम्पनी दंतेवाड़ा जिले के भांसी में 3.2 मिलियन टन का प्लांट लगाना चाहती है लेकिन ये कम्पनी भी आज तक कामयाब नहीं हो पाई है (ये दोनों कम्पनियों ने सलवा जुडूम कैम्प का खर्च दिया था)। अनिल अग्रवाल (जो कि वेदांता कम्पनी के भी मालिक हैं और उड़ीसा के नियामगिरी को भी बर्बाद करने पर लगे हुए हैं) बाल्को की क्षमता को 1 लाख टन प्रति वर्ष से बढ़ा कर 7 लाख टन प्रतिवर्ष करना चाहते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार 2001 से 2010 तक पूंजीपतियों के साथ 192126.09 करोड़ रु. का 121 इकरारनामा (डवन्) किया है। अपने जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में आदिवासियों का जो संघर्ष चल रहा है इस इकरारनाम को लागू नही होने दे रहा है। पूंजीपतियों के लूट को बनाये रखने के लिए देश की जनता पर अघोषित युद्ध थोप दिया गया है। इस अघोषित युद्ध को छिपाने के लिए ही प्रचारित किया जा रहा है कि नक्सलवाद अपने वैचारिक संघर्षों से भटक गया है और आतंकवाद व गुंडा गिरोह में तब्दील होकर चंदा उगाही कर रहा है; माओवादी नेताओं और बुद्धिजीवयों में राजनीति करने का धैर्य और विवेक नहीं है। जहां पीढ़ी दर पीढ़ी जनता आज तक अपने को लूटती हुई देखती आई है जहां लोगों को दो जून की रोटी, पीने का स्वच्छ पानी तक नहीं है- शिक्षा और स्वास्थ्य तो दूर की बात है, जो भी उनके पास है उसको भी लूटा जा रहा है और हम उनसे धैर्य की बात कर रहे हैं।
इस लूट को बनाये रखने के लिए सीआरीपीएफ, कोबरा, बीएसएफ, भारत तिबब्त सीमा पुलिस, ग्रेहाउण्ड, वायु सेना, प्रशिक्षण के नाम पर सेना इसके अलावा सलावा जुडूम, कोया कमांडो, नागरिक सुरक्षा समिति जैसे कई प्राइवेट सेनायें भी बनाई व लगाई गई हैं। अमेरिका और इस्राइल द्वारा तकनीक से लेकर ट्रेनिंग तथा हथियार दिया जा रहा है। सेटेलाइट और यूएवी (मानवरहित एरियल व्हेकल)  के सहारे फोटो लेकर हमले किये जाते रहे हैं। शासक वर्ग सैनिक, अर्द्धसैनिक बलों के बल पर दमन चक्र चला कर लूट को बनाये रखना चाहती है। यह सैनिक, अर्द्धसैनिक बल उसी शोषित-पीड़ित के घर से आते हैं जिसकी राजनीति भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) करती है और जिस दिन वे इन बलों को अपनी राजनीति को समझा दिया उस दिन सब कुछ बदल जायेगा।
माओवादियों का विदेशी सम्बंध
गृहमंत्री रहते हुए पी. चिदम्बरम ने संसद में बयान दिया है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को विदेशों से मद्द मिलने का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन बार-बार इस बात को उछाला जाता है कि माओवादियों का तार विदेशों से जुड़े हैं, इनको पास काफी संख्या में आधुनिक राइफलें हैं। दरभा घाटी के हमले में माओवादियों ने 1830-1840 दशक के भरमार बंदूकों का इस्तेमाल किया है; इस बात की पुष्टि घायल और अन्य लोगों के शरीर से पुराने हथियारों की गोली मिलने से होती है। रामकृष्ण केयर अस्पताल के संचालक डॉ संदीप दवे के अनुसार 99 प्रतिशत घायलों के शरीर से पहले भी पुराने हथियारों की ही गोलियां निकलती रही हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि आज भी माओवादियों के पास ज्यादातर पुराने हथियार हैं। माओवादियों पर क्रूरतापूर्वक हत्या करने की बात कही जा रही है जब कि ‘परिवर्तन यात्रा’ में शामिल डॉ. शिव नरायण के अनुसार,  ‘‘मेरे पैर से खून बहता देख उनके कमांडर ने कहा कि डॉक्टर साहब को इंजेक्शन लगा दो।’’ इस तरह माओवादियों ने कई घायलों का इलाज किया और पानी पिलाया और महेन्द्र कर्मा, नन्द कुमार पटेल और उनके बेटे के अलावा सभी आत्मसमर्पण करने वालों लोगों को छोड़ दिया। हमले के दो घंटे बाद पत्रकार नरेश मिश्रा बाइक से घटना स्थल पर पहुंचे और घायलों को मदद करने लगे; जब वह घायलों के मदद में लगे थे उसी समय कांग्रेसी नेता कवासी लखमा उनकी बाइक लेकर भाग गये, इस कारण उनको पैदल ही वापस आना पड़ा।
समाधान
भारत का शासक वर्ग इस समस्या का समाधान दमन के रूप में देख रहा है। लेकिन जरूरत है कि अभी तक पूंजीपतियों की लूट के लिए जो भी हमले जनता पर किये गये है उन हमले के जिम्मेदार लोगों को सजा हो। आदिवासी क्षेत्रों में संविधान की अनुच्छेद 5 और 6 को लागू किया जाये और लोगों के सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार दिया जाये। सभी इकरारनामा (डवन्) को रद्द किया जाये। किसी भी प्रकार के इकरारनामा करते समय लोगों की अनुमति ली जाये। आपॅरेशन ग्रीन हंट सहित, सैनिक, अर्द्धसैनिक को वापस बुलाया जाये और माओवादियों से बिना शर्त बात की जाये। जेलों में बंद सभी आन्दोलनकारियों को रिहा किया जाये। शासक वर्ग के दमन से माओवाद समाप्त नहीं होगा।
सुनील कुमार से आप sunilkumar102@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.



आवाजें जो वर्गीय तहखानों से उठती हैं.


एक सवाल-एक बात: 5 
राज्य हत्या: कॉमरेडों की याद में बनाए गए स्तूपम (DK) 

माओवादियों के द्वारा छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुई कार्रवाई के बाद कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार बहस का विषय बने हुए हैं. इन्हीं सवालों पर बहस के लिए 'एक सवाल-एक बात' शीर्षक से कुछ कड़िया प्रस्तुत की जा रही हैं. बहस के लिए आप अपने सवाल और अपनी बात dakhalkiduniya@gmail.com पर भेज सकते हैं. 

अजीत हर्षे की बात-                                               

जब से नक्सली हमले में कुछ सफेदपोश लोग मारे गए हैं चर्चा छिड़ी हुई है कि माओवादी हत्याएं गलत हैं या सही। हर हत्या गलत है, इसमें किसी को क्या शक हो सकता है, विशेषकर जब निर्दोष मारे जा रहे हों। तो जहां तक मेरा मानना है, बहस का विषय यह नहीं है। बहस का विषय है: हत्याएँ क्यों हो रही हैं और आगे से न हों इसके लिए क्या किया जाए। (यहाँ मैं उन हत्याओं की बात नहीं कर रहा हूँ जो साधारण अपराध की श्रेणी में आती हैं। मैं संगठित हत्याओं की बात कर रहा हूँ, जिसे आतंकवाद कह दिया जाता है। और चर्चा भी इन्ही हत्याओं की चल रही है।) प्रश्नों पर आने से पहले संविधान में दिये गए मूल अधिकारों को एक बार याद कर लें: 1)समानता 2)स्वतन्त्रता 3)शोषण का विरोध 4)धर्म और शिक्षा की स्वतन्त्रता और 5) संपत्ति का अधिकार।  
अब पहले प्रश्न को लेते हैं कि हत्याएँ क्यों हो रहीं हैं:आम तौर से कह दिया जाता है भूख के कारण हत्याएँ हो रही हैं। मगर ऐसा नहीं है। कश्मीर में और उत्तर पूर्व में भूख इसका कारण नहीं है। दरअसल अन्याय के कारण हत्याएँ होती हैं, न्याय न मिलने के कारण हत्याएँ होती हैं और आतंकवाद पनपता है। लोगों को न्याय दे दीजिये, आतंकवाद अपने आप समाप्त हो जाएगा। लेकिन साधारण जनता को न्याय प्रदान करना इस संविधान के अंतर्गत सरकारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। जो जितना गरीब है न्याय उससे उतना ही दूर है।
यहाँ बंगाल, झारखंड से लेकर महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश तक फैले आदिवासी बेल्ट में फैले माओवादी आतंकवाद की बात हो रही है। यह इलाका देश का सबसे गरीब और पिछड़ा इलाका है। संयोग से प्रकृतिक संपदाओं के लिहाज से वह सबसे सम्पन्न भी है। इस सम्पदा पर सबसे पहले उन्हीं आदिवासियों का हक है इस बारे में अगर किसी को संदेह है तो आगे न पढ़ें। और अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो आदिवासियों के साथ पिछले 66 सालों में कितना ज़बरदस्त अन्याय हुआ है यह आप देख सकते हैं। और फिर आपकी इस बात से भी सहमति स्वाभाविक है कि यही माओवादी आतंकवाद का कारण है।   इस चर्चा को यहीं समाप्त करें, क्योंकि इस पर चर्चा काफी हो चुकी है और न्याय के बारे में इससे महत्वपूर्ण सवाल मैं उठाना चाहता हूँ। और वह इस प्रकार है:
हम जानते हैं कि देश में गरीबी रेखा तय कर दी गई है और वह है शहरों में, लगभग 900 प्रतिव्यक्ति रुपए प्रतिमाह और गावों में 700 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति माह। यह तो कम से कम है, इसके नीचे बहुत बड़ी खाई है मित्रों। गावों और उन आदिवासी क्षेत्रों में यह खाई कितनी गहरी है इसका अनुमान इन क्षेत्रों में भूख से होने वाली मौतों (या हत्याओं?) से जाना जा सकता है, कुपोषण के आंकड़े देखे जा सकते हैं। देश की औसत प्रति व्यक्ति आय है 5700 रुपए। अगर मैं कहूँ कि इससे ज़्यादा कमाने वाला किसी न किसी रूप में देश में चल रही अन्यायी व्यवस्था से जुड़ जाता है तो फेसबुक पर बैठे सभी मित्र मुझे पागल कहेंगे। मगर सच यही है। इसे थोड़ा बढ़ा (10-20 प्रतिशत) लें या कम कर लें क्योंकि गरीबों में, कामकाजियों में थोड़ा बहुत फर्क तो हो ही सकता है। वैसे भी यह औसत तो है ही। अब पहले इस बात पर थोड़ी चर्चा हो जाए कि कैसे इस औसत से ज़्यादा पाने वाले (कमाने वाले, नहीं कह रहा हूँ क्योंकि मैं न्यायपूर्ण कमाई की बात करना चाहता हूँ।) शोषण में किस तरह सहभागी हैं।
देश में पंजीकृत रोजगार देने वाली मुख्य रूप से दो ही संस्थाएँ हैं: सरकार और कारपोरेट घराने। और इन संस्थाओं में काम करने वाले सबसे छोटे कर्मचारी का ही वेतन (ऊपरी आमदनी छोडकर) इस औसत के (परिवार में 3-4 सदस्य मनाने पर) करीब होता है। दूसरे अधिकांश कर्मचारियों के वेतन तो बहुत ज़्यादा होते हैं। यह अतिरिक्त वेतन कहाँ से आता है? दरअसल यह उसी लाभ का हिस्सा है जो ये सरकारें और कारपोरेट घराने बाकी जनता का शोषण करके कमाती हैं। कर्मचारियों को संतुष्ट रखने के लिए जिनकी तनख़्वाहें इसी नाजायज कमाई में से समय-समय पर बढ़ा दी जाती हैं। अब आप कहेंगे कि सरकारें तो कारपोरेट नहीं हैं। अब इसी समझ में समस्या है। बात यह है कि आर्थिक न्याय की अवधारणा को सरकारीकरण से जोड़ने का समय कम से कम 60-70 साल पुराना हो चुका है। 70 के आसपास का वह दौर हम पार कर आए हैं और चीन तो इसका ज्वलंत उदाहरण है ही। अब दुनिया की कोई सरकार, जनतान्त्रिक-पूंजीवादी, सैनिक-तानाशाही, धार्मिक और यहाँ तक कि कम्यूनिस्ट सरकारें भी एक विशाल कारपोरेट के सिवा कुछ नहीं है। दुनिया भर में सरकारें इस वक़्त दोहरी भूमिका में है। खुद (और अपने कर्मचारियों के लिए) लाभ कमाओ (इसके लिए यहाँ तक कि चोरी करो, डाका डालो, हत्याएँ करो) और कारपोरेट की सेवा और सुरक्षा करो। इस लाभ के गणित की चर्चा भी इस दौरान बहुत हो चुकी है। उसे छोड़ें। 
अब इन सरकारी और कारपोरेट कर्मचारियों में उन्हें और जोड़ लें जो छोटे दुकानदार हैं, मध्यम और बड़ी  खेती वाले किसान हैं, तो इस पूरे शोषण तंत्र में हिस्सेदार मध्यवर्ग का कोरम पूरा हो जाता है। ये लोग दरअसल इन्हीं सरकारों और कारपोरेट घरानों की भीख पर पल रहे नौकर हैं जिनमें से कई संवेदनहीन नौकर उनके एजेन्टों का काम भी करते हैं।
इस चर्चा के बाद यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि 25 मई की माओवादी हत्याओं के बाद माओवादियों के विरुद्ध जनाक्रोश क्यों उमड़ पड़ा। इस विरोध के पीछे इस मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हि छिपा हुआ है। बहुत से लोग सिर्फ अंबानी, अनिल अग्रवाल, टाटा वगैरह को गलियाँ देकर समझ रहे हैं कि कर्तव्य की इतिश्री हो गई। इनमें से अधिकांश सरकारी नौकर होंगे। सोचते हैं, हम तो सरकारी कर्मचारी हैं। अगर टाटा या पोस्को की जगह कोल इंडिया या सेल यही काम करे तो इन्हें कोई परेशानी नहीं होने वाली। दरअसल कर भी रही है कई जगह। इनके निजीकरण के विरोध के पीछे भी यही बात है। इनकी 70 साल पुरानी अवधारणा ही यह है सरकारी है तो वह न्यायपूर्ण भी है! सोवियत संघ के पतन के बाद भी इनकी आँखें नहीं खुलीं। खैर।
यह स्पष्ट करने के बाद कि इन आतंकी हत्याओं का जन्म ही अन्याय से हुआ है, हम दूसरे प्रश्न पर आते हैं कि इन हत्याओं को रोका कैसे जाए। कई मित्र यह कहते हैं कि आदिवासियों का शोषण और दमन हो रहा है यह वे मानते हैं मगर माओवादियों की हत्याओं को वे जायज़ नहीं ठहरा सकते। कुछ गांधीवादी हैं और कुछ यह समझते हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और ये माओवादी आदिवासियों को बहला फुसलाकर, डरा-धमकाकर और अपनी सत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से ऐसा कर रहे हैं और दरअसल आदिवासी तो भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हैं। बताइये, अगर इन पढे लिखे लोगों का भोलापन देखकर हंसी न आए तो क्या हो। उनसे पूछना ही होगा कि क्या आप भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हैं। दिल्ली, पटना, बंगलोर, मुंबई वासियों से और गावों में रहने वाले आप जैसे लोगों से ही मैं पूछना चाहता हूँ, जिनके बच्चे आरक्षण विरोध में आत्मदाह कर रहे हैं, जिनकी लड़कियों को बलात्कार और हत्या करके सड़कों पर डाल दिया जाता है, युवाओं को प्रेमविवाह करने पर फांसी पर चढ़ा दिया जाता है। मुझे नहीं लगता कि आदिवासियों का इतने अत्याचारों के बाद देश की न्याय व्यवस्था में रत्ती भर भी विश्वास हो सकता है। कानूनों पर हो सकता है, न्यायाधीशों पर हो सकता है मगर व्यवस्था पर नहीं। वैसे तो ईमानदार कर्मचारियों पर, नेताओं पर (विशेषकर कम्यूनिस्ट नेताओं पर, जो बेचारे आजकल उन इलाकों में माओवादियों के डर से जा भी नहीं पाते), एनजीओज़ पर भी हो सकता है। मगर इतना ही काफी नहीं है। और जब ऐसा है तो वे न्याय की गुहार किसके पास करें? तब उन्हें माओवादी ही दिखाई देते हैं जो कार्पोरेट्स से उगाही करते होंगे मगर उनकी हत्याओं का, गलत ही सही, तुरंत बदला भी लेते हैं। वे जंगलों की रक्षा का, अपने मतलब से ही सही, दावा करते हैं, भले ही टीवी नहीं आने देते। वे सोचते हैं इन माओवादियों का साथ देने पर परेशानियाँ तो बहुत हैं मगर आदिकाल से जैसे वे जी रहे थे उसमें इनका कोई सीधा हस्तक्षेप भी नहीं है।
अब सवाल यह है कि आदिवासियों का भारतीय न्याय व्यवस्था पर विश्वास कैसे कायम किया जाए। सीधी सी बात है कि उन्हें न्याय मुहैया कराके। आतंकवादियों से उनका पीछा छुड़ाकर। उन्हें भोजन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य मुहैया कराके। उन्हें अपनी मर्ज़ी से जीवन जीने की आज़ादी देकर। यह हो सकता है, उनसे संवाद करके। आप पूछेंगे वे हैं कौन तो वे सबसे पहले माओवादी ही हैं। कम से कम इस समय, जब कि सरकारें, एनजीओज़ ईमानदार कम्यूनिस्ट पार्टियां वहाँ जाने में नाकाम हैं, आदिवासी, माओवादियों से डरकर या उन्हें अपना समझकर उनके साथ हैं तो फिर बात माओवादियों से ही करनी होगी। सिर्फ बात। उनके विरुद्ध कोई भी सैनिक कार्रवाही कारगर नहीं हो सकती, क्योंकि आदिवासी ही उनका ह्यूमन-शील्ड हैं। पहले उनसे बात करें, फिर आदिवासियों के बीच जाकर धीरे धीरे उन्हें अपनी बात समझाएँ। सबसे बड़ी बात उन इलाकों का औद्योगीकरण उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध करने की जल्दबाज़ी न करें।
देश को यह समझना होगा कि यही वे लोग हैं जिनके पास जंगल और पहाड़ खोने के बाद खोने के लिए कुछ भी नहीं बचता और ऐसे लोगों को ही सर्वहारा कहा जाता है। ऐसे लोग खुद पर अन्याय होने पर कुछ भी कर सकते हैं, माओवादी, माओ-आतंकवादी (या क्रांतिकारी) हो जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी। पूंजीवादी-जनतांत्रिक सरकारों को खुद अपने आपको बचाने के लिए उन्हीं के संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताएँ जनता को फौरी तौर पर मुहैया करा देनी होंगी अन्यथा हिंसा का दौर कभी खत्म नहीं होने वाला। इन्हीं स्वतंत्रताओं को प्रदान करने का सरकारों का अस्वीकार ही इस समस्या का मूल कारण है।