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03 सितंबर 2014

मीडिया ओनरशिप के मसले और मौजूदा हालात

-    दिलीप ख़ान
ट्राई ने 12 अगस्त को मीडिया ओनरशिप पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट दी
जिस पर मीडिया में चर्चा नहीं हुई। फोटो- मिंट से साभार

भारत में मीडिया को लेकर हाल के वर्षों में जो चिंता जताई गई है उस पर मीडिया के बाहर और भीतर लगातार चर्चा हुई, लेकिन उसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम ना के बराबर उठे। पिछले पांच-छह वर्षों में बड़े निगमों ने जिस स्तर पर मीडिया में निवेश किया है उसकी वजह से इसका चरित्र भी तेज़ी से बदला है। बिल्कुल नई क़िस्म की चुनौतियां इसके सामने खड़ी हुईं जो पहले या तो नहीं थीं, या फिर थीं भी तो सतह पर नहीं दिखती थीं। लेकिन इसके सूक्ष्म चारित्रिक बदलाव को अगर छोड़ भी दें तो तीन-चार ऐसे विचलन हैं जो असल में मीडिया की संरचना के साथ सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इनमें मीडिया के मालिकाने में आया बदलाव, निजी संधियां और पेड न्यूज़ सबसे अहम हैं। इन तीन समस्याओं के इर्द-गिर्द ही बाक़ी मुश्किलों की झोपड़ियां बसती हैं। इन तीनों के संबंध को भी अगर आपस में तलाशा जाए तो मीडिया ओनरशिप सबसे अहम चुनौती के तौर पर दिखता है। अब सवाल ये है कि जब मीडिया में इन बदलावों को साफ़ तौर पर चौतरफ़ा नोटिस किया जा रहा है तो इस पर लगाम कसने की कोई ठोस रणनीति क्यों नहीं बन पा रही? क्या सरकार और संसद की तरफ़ से कोताही बरती जा रही है या फिर मीडिया नाम के उद्योग की संरचना को लेकर ये पसोपेश कायम है कि इसे बाक़ी उद्योगों से अलग किस रूप में अलगाया जाए? ज़्यादा पीछे ना जाए तो पिछले 6 साल में संसद, सरकार और इसके अलावा कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं ने मीडिया को लेकर दर्ज़न भर से ज़्यादा रिपोर्ट्स जारी की हैं, पचासों टिप्पणियां की हैं और सैंकड़ों बार चिंता जताई हैं।
 
अभी हाल में 12 अगस्त को भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मीडिया ओनरशिप पर अपनी सिफ़ारिश सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सौंप दी। इस मसले पर ट्राई का ये तीसरा अध्ययन है। सबसे पहले साल 2008 में मंत्रालय ने ट्राई को मीडिया ओनरशिप के पैटर्न का अध्यन करने के बाद सुझाव देने को कहा था। 25 फ़रवरी 2009 को प्राधिकरण ने मीडिया पर चंद लोगों के नियंत्रण से उपजे हालात और क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर अपने सुझाव सौंप दिए। इसमें ख़ास तौर पर क्रॉस मीडिया ओनरशिप के ख़तरों से मंत्रालय को अवगत कराया गया था और बताया गया था कि देश के भीतर इसके चलते ख़बरों और विचारों की बहुलता किस तरह प्रभावित हो रही है। साथ ही विदेशों में इस पर बने नियम-क़ायदों से भी मंत्रालय को अवगत कराया गया था। 16 मई 2012 को मंत्रालय ने ट्राई को अपने इन सुझावों का पुनर्वालोकन करने को कहा जिसमें कुछ तकनीकी मसलों पर विस्तार देने की बात अंतर्निहित थी।
 
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित
मिसाल के लिए होरिजोंटल ओनरशिप और वर्टिकल ओनरशिप। होरिजोंटल क्रॉस मीडिया ओनरशिप का मतलब हैं एक ही समूह का प्रसारण के अलग-अलग माध्यमों पर कब्जा होना। यानी अख़बार, टीवी, रेडियो और पत्रिका अगर एक ही मालिक निकाल रहा हो तो ये होरिजोंटल ओनरशिप है। इसी तरह वर्टिकल ओनरशिप उसको कहेंगे जिसमें प्रसारण और वितरण के अलग-अलग व्यवसाय एक ही मालिक के कब्जे में हो। यानी अगर एक ही समूह का टीवी चैनल भी है और उसके वितरण के लिए डीटीएच और केबल प्रसारण भी तो ये वर्टिकल ओनरशिप है। इन दोनों मसलों की तहकीकात करते हुए 15 फ़रवरी 2013 को ट्राई ने मंत्रालय को एक परामर्श पत्र सौंपा जिसमें कुछ अंतिम टिप्पणियां की गईं थी। परामर्श पत्र सौंपने के बाद 22 अप्रैल से लेकर 29 अप्रैल 2013 तक प्राधिकरण ने मीडिया मालिकों के अलग-अलग पक्षों से पूरे मामले पर टिप्पणियां मांगी। 33 पक्ष में और 6 विपक्ष में आईं दलीलें थीं जो ट्राई की वेबसाइट पर चस्पां कर दी गईं। यही नहीं, इसके बाद देश के अलग-अलग पांच शहरों में खुली बहस भी कराई गईं। इसमें ट्राई के नज़रिए से अहमति जताते हुए जो तर्क आए उनमें सबसे प्रमुख ध्वनि ये थी कि भारत दुनिया के अन्य मुल्क़ों से कुछ महत्वपूर्ण अर्थों में भिन्न है। यहां पर जितनी भाषाओं में और जितनी तादादा में अख़बार और टीवी चैनल हैं उतने कहीं और मुमकिन नहीं, लिहाजा विचारों और ख़बरों की बहुलता यहां प्रभावित नहीं हो रही है। लेकिन ट्राई ने इस 12 अगस्त को जो अंतिम सिफ़ारिश सौंपी है उसमें ऐसे तमाम तर्कों के जवाब दिए गए हैं।
 
देश में अख़बारों, टीवी चैनलों और रेडियो स्टेशनों की बड़ी तादाद के बावजूद ये महसूस किया गया है कि असर और प्रसार के मामले में सब बराबर नहीं हैं। प्राधिकरण ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया है। रिपोर्ट में दिल्ली से निकलने वाले अख़बारों के उदाहरण से बताया गया है कि भले ही यहां दर्जन भर से ज़्यादा अख़बार निकलते हो, लेकिन दो-तीन अख़बार यहां के बाज़ार पर वर्चस्व बनाए हुए है, इसलिए उसकी तुलना छोटे-मझोले अख़बारों से करना ख़बरों की विविधता के अर्थ में बेमानी है। विविधता के मसले और कॉरपोरेट ओनरशिप के साथ-साथ धार्मिक व्यक्तियों और संस्थाओं तथा राजनीतिक ओनरशिप पर विस्तार से टिप्पणी की गई है। ये बात देश में अब शिद्दत से महसूस की जा रही है कि यदि किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी से जुड़े किसी व्यक्ति के हाथ में मीडिया हो तो वो उसका इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने या फिर विरोधी पार्टी के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा के लिए करता है। आंध्र प्रदेश में दो-तीन महीने पहले टीवी चैनलों और केबल प्रसारण पर राजनीतिक पार्टियों के बीच तकरार इतना तेज़ हो गया था कि तेलंगाना और आंध्र के कुछ इलाकों में हिंसक झड़पों के साथ-साथ ये मसला संसद में भी उठा। राजनीतिक मालिकाने को आम तौर पर दक्षिण भारत और उत्तर पूर्व के साथ लोग जोड़कर देखते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये अख़िल भारतीय चलन के तौर पर उभरा है।
रिलायंस का 'इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट' क्रॉस मीडिया ओनरशिप
की बड़ी मिसाल है। फोटो- इंडिया टुडे से साभार
 
पार्टी मुखपत्र को लोग उसी राजनीतिक दायरे और पार्टी लाइन का मानते हुए पढ़ते हैं, लिहाजा मुखपत्र में छपी बातों पर वो अपने तर्कों के ज़रिए राजनीतिक विभेद ढूंढ लेते हैं, लेकिन सामान्य समाचार मीडिया ने जो अपनी साख स्थापित की है, उसमें सेंधमारी के ज़रिए अगर कोई राजनेता ख़बरों को मरोड़ता है तो एक दर्शक/पाठक के लिए उसको नकार पाना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन ये सब ना सिर्फ़ जारी है, बल्कि इसे लगातार विस्तार दिया जा रहा है। ट्राई की सिफ़ारिश में इसको तत्काल प्रभाव से बंद करने की बात कही गई है और बताया गया है कि अगर पहले से कोई ऐसा मीडिया चालू हालात में है तो उसे बंद करने के रास्ते निकाले जाए।
 
रिपोर्ट में होरिजोंटल और वर्टिकल क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर भी एक हद तक पाबंदी की बात कही गई है। इसमें दो-तीन फॉर्मूलों के जरिए नियंत्रण की बात कही गई है और सुझाया गया है कि अगर प्रसारण और वितरण दोनों में किसी समूह का 32 प्रतिशत से ज़्यादा शेयर है तो किसी एक में उसे घटाकर 20 प्रतिशत के स्तर तक लाना होगा। इसी तरह अगर एक से अधिक मीडिया में उसका निवेश है तो उसे ‘प्रासंगिक बाज़ार में उसके असर’ को देखते हुए कतरा जाना चाहिए। प्रासंगिक बाज़ार की परिभाषा इस तरह की है कि अगर कोई मीडिया तेलुगू माध्यम का है तो ग़ैर-तेलुगू लोगों के लिए उसका कोई महत्व नहीं है, क्योंकि वो मीडिया ग़ैर-तेलुगू भाषी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकता। इसलिए भाषावार और क्षेत्रवार ऐसे प्रासंगिक बाज़ार तलाशे गए हैं। इसमें हिंदी बाज़ार के दायरे में 10 राज्यों को रखा गया है। लेकिन मुश्किल ये है कि प्राधिकरण की इस सिफ़ारिश से छोटे बाज़ार में सक्रिय मीडिया उद्यमियों पर तो लगाम लग जाएगा, लेकिन जो बड़े समूह है और जिनका एक साथ हिंदी, अंग्रेज़ी से लेकर दो-तीन भाषाओं के बाज़ार में दख़ल है उसके लिए मुश्किल उतनी बड़ी नहीं होगी क्योंकि उनके लिए हर बाज़ार में अलग-अलग हिस्सा तय होगा। 
 
मीडिया में जिस तरह गुपचुप तरीके से निवेश का चलन बढ़ा है उससे कई दफ़ा असली मालिक का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। इसको देखते हुए भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने रिलायंस के मीडिया समूह इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट का उदाहरण देते हुए दो साल पहले ये कहा था कि मीडिया उद्योग में ‘नियंत्रण’ को भी ओनरशिप की तरह देखा जाना चाहिए। अगर अध्ययनों का ही ज़िक्र किया जाए तो भारतीय प्रेस परिषद की 2009 में आई पेड न्यूज़ की रिपोर्ट के बाद संसद की स्थायी समिति ने पिछले साल इसी मसले पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट सौंपी। विधि आयोग ने मई 2014 में इस पर एक परामर्श पत्र दिया। एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया ने अपने अध्ययन के ज़रिए इस पर रोशनी डाली। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने इस चलन पर नए क़िस्म के तौर-तरीके अपनाने की वकालत की।
 
एक ही मालिक के हाथ में सारे मीडिया होने के चलते
विचारों की बहुलता ख़त्म हो रही
लेकिन इन तमाम अध्ययनों के बावजूद कोई ठोस रूप-रेखा अब तक तैयार नहीं हो पाई। ट्राई ने जो हाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफ़ारिशें सौंपी है, उसके बाद दो तथ्यों को देखते हुए उम्मीद जगती है। पहला, जब पहली दफ़ा मीडिया ओनरशिप पर ट्राई  ने 2008 में सुझाव दिए थे तो उस वक़्त इसके अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्रा थे, जो अब मोदी सरकार में प्रमुख सचिव हैं। दूसरा, संसद की स्थाई समिति ने पिछले साल जो पेड न्यूज़ पर रिपोर्ट दी थी उसके तत्कालीन अध्यक्ष राव इंद्रजीत सिंह अब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं और अब सत्ताधारी पार्टी के हिस्सा हैं। लेकिन मीडिया पर किसी भी तरह की कार्यवाही ना करने के पिछले कई साल के रिकॉर्ड को देखते हुए यही लग रहा है कि ये सरकार भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का काम आगे के लिए टाल देगी। टीवी में आत्म नियमन के तमाम निकाय बुरी तरह असफ़ल रहे हैं और प्रिंट के लिए भारतीय प्रेस परिषद कितना कारगर है ये मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है। ट्राई ने अपनी सिफ़ारिश अब सरकार को सौंप दी है। गेंद अब सरकार के पाले में है। लिहाजा देखना दिलचस्प होगा कि क्या उस गेंद पर शॉट भी लगाए जाते हैं या फिर पाले में आई हुई गेंद रखे-रखे पुरानी हो जाएगी।
 
                                


19 अगस्त 2013

देश की सबसे भीरू क़ौम का नाम है पत्रकार

-दिलीप ख़ान
द विलेन: मुकेश अंबानी
जिस दिन आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन के पत्रकारों ने सुबह-सुबह लालक़िले से प्रधानमंत्री के रस्मी संबोधन और ठीक उसके बाद गुजरात से नरेंद्र मोदी के 'ओवर-रेटेड' भाषण के साथ भारत की स्वाधीनता की सालगिरह मनाई, तो उनमें से कई लोगों को मालूम नहीं था कि इस स्वाधीनता के ठीक बाद का अगला दिन, यानी 16 अगस्त 2013, भारतीय टीवी उद्योग के काले दिनों की सूची में शामिल होने वाला है। उनको ये नहीं मालूम था कि उनके 'त्यागपत्र' की चिट्ठी कुछ इस तरह तैयार हो चुकी है कि उस पर उसी दिन हस्ताक्षर करके झटके में सड़क पर आ जाना है। ईएमआई पर जो गाड़ी ख़रीदी थी उसकी क़िस्त के पैसे का स्रोत इस तरह अचानक बिला जाएगा, ये शायद उसने नहीं सोचा था। और वो, जो गर्भवती थीं और अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लगातार डॉक्टर के संपर्क में थीं, उनको नहीं मालूम था एक ट्रॉमा जैसी स्थिति की शुरुआत उसी दिन हो जाएगी।

फ़िल्म सिटी, नोएडा की उस गली में नीम ख़ामोशी थी, बोलते हुए लोगों के मुंह से निकल रही आवाज़ बिखरकर हवा में कहीं गुम हो जा रही थी। कोई रो रहा था, तो कोई दिलासा पा रहा था, कोई नई योजना पर विचार कर रहा था तो कोई सिगरेट के सुट्टे के साथ अपने टेंशन को हवा में कहीं दूर उड़ा देना चाहता था। लेकिन ग़ुस्सा कहीं नहीं था। मजबूरी चारों तरफ़ थी। बेचारगी का भाव था सबके चेहरे पर। निस्सहाय ढंग से दुनिया देखी जा रही थी। चारों तरफ़ जो लोग आ-जा रहे थे वो वही थे जो दूसरे उद्योगों के मुद्दे पर टीवी में ख़बर चलाते हैं। लेकिन उस दिन हर कोई जानता था कि किसी टीवी चैनल पर यह ख़बर नहीं चलने वाली। 

कोई मीडिया समूह अपने दर्शकों/पाठकों को ये नहीं बताएगा कि लगभग 350 पत्रकारों को झटके में एक ही समूह के दो बड़े टीवी चैनलों ने जबरन 'त्यागपत्र' दिलवा कर नौकरी से निकाल दिया। लेकिन जिनको निकाला गया उनके मुंह से प्रतिरोध का एक शब्द नहीं निकला। सैंकड़ों पत्रकारों में से किसी ने भी मैनेजमेंट के बनाए गए त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार नहीं किया! वजह क्या है? किस चीज़ का डर है? दैनिक भास्कर ने हाल ही में दिल्ली की एक पूरी टीम को निकालने का फ़ैसला लिया। ठीक इसी तरह उसमें भी त्यागपत्र तैयार किया गया था। 16 में से दो पत्रकारों, जितेन्द्र कुमार और सुमन परमार, ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। भास्कर ने उन दोनों को 'निकाल' दिया। फ़र्क सिर्फ़ इतना रहा कि उन दोनों को बाक़ी पत्रकारों की तरह अगले कुछ महीनों का अग्रिम वेतन नहीं मिल सका, जो कि उस हस्ताक्षर से मिल सकता था। अब इन दोनों ने मामले को कोर्ट में खींचा है। शायद, टीवी-18 के इन दोनों चैनलों के पत्रकारों को 'त्यागपत्र देने' और 'निकाले जाने' का ये नज़ीर मालूम हो।

मीडिया उद्योग में प्रबंधन के ऐसे किसी भी फ़ैसले पर न तो भुक्तभोगी पत्रकार और न ही उस फ़ैसले से बच गए ईमानदार पत्रकार (बॉस के यसमैनों और प्रो-मैनेजमेंट पत्रकारों को छोड़कर) अपनी ज़ुबान खोलने की स्थिति में दिखते हैं। कारण साफ़ है। बीते कुछ वर्षों में, ख़ासकर टीवी न्यूज़ चैनलों के उगने के बाद से, मीडिया हाऊस के भीतर प्रबंधन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की आवाज़ को बर्दास्त करने का चलन ख़त्म हो गया है। अपनी तमाम खूबियों और क्षमताओं के बावजूद मीडिया हाऊस में टिकने की गारंटी बॉस की गुडबुक में नाम लिखा देना ही होता है। किसी भी तरह की यूनियन की सुगबुगाहट को मीडिया के भीतर तकरीबन अपराध जैसा घोषित कर दिया गया है। यूनियन को ख़त्म करने की प्रबंधन की चाह को ऊपर के पदों पर बैठे पत्रकारों/संपादकों का भी लगातार समर्थन हासिल हुआ है। 

दूसरी बात ये कि न्यूज़रूम के भीतर चापलूसी की संस्कृति लगातार पसरती गई और प्रबंधन से रिसकर आने वाले लाभ में हिस्सेदारी के लिए क्रमश: ऊपर से लेकर नीचे के लोग कोशिश करने में जुट गए। ऐसे हालात में जाहिर तौर पर पत्रकारों के भीतर से मज़दूर चेतना लगभग ग़ायब हो गई। नहीं तो, मानेसर में मारुति-सुज़ुकी के मज़दूरों की तरह आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन के भी पत्रकार तंबू डालकर बाहर धरने पर बैठ जाते!

राघव बहल
लेकिन मामला इतना सपाट भी नहीं है। मसला ये है कि जिस तरह पिछले सितंबर में एनडीटीवी से निकाले गए 50 से ज़्यादा पत्रकार, दैनिक भास्कर से 16 पत्रकारों, आउटलुक समूह की तीन पत्रिकाओं (मैरी क्लेयर, पीपुल इंडिया और जियो) के बंद होने से पीड़ित 42 पत्रकार झटके में बेरोज़गार हुए, वो अपनी बाक़ी की ज़िंदगी कहां गुजारेंगे? क्या वो पत्रकारिता को अलविदा कह देंगे? शायद नहीं। वो एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप का रुख करेंगे। वो उस समूह में कोशिश करेंगे, जहां उन्हें लगेगा कि नौकरी की गुंजाइश शेष है। बस यहीं पर दोतरफ़ा मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। पहला, अगर दूसरे समूह में नौकरी करनी है तो उसके प्रबंधन को लड़ाकू पृष्ठभूमि वाले पत्रकार की डिग्री आपके रिज़्यूमे के साथ नहीं चाहिए। सो अपने रिज़्यूमे को दुरुस्त रखने के लिए आपको ऐसे किसी भी प्रतिरोध से ख़ुद को हर संभव अवसर तक बचाए रखना ज़रूरी है। दूसरा, जिसे आप 'दूसरा समूह' समझ रहे हैं, असल में उनमें से कई 'दूसरा' है ही नहीं। 

मीडिया कॉनसॉलिडेशन, मर्जर और क्रॉस मीडिया ओनरशिप का जो पैटर्न भारत में है उसमें निवेशकों को ये छूट मिली हुई है कि वो एक साथ कई चैनलों, अख़बारों, पत्रिकाओं, पोर्टलों, रेडियो और डीटीएच में पैसा लगा सके। मुकेश अंबानी जैसे बड़े निवेशकों ने तो मीडिया में गुमनाम तरीके से निवेश का नया अध्याय शुरू किया है, जिसमें वो अपने दूसरे भागीदारों के मार्फ़त पैसा लगाते हैं। जिन दो चैनलों में निकाले गए पत्रकारों से बात शुरू की गई थी, उसमें भी अंबानी के निवेश का क़िस्सा दिलचस्प है। 2007-08 में जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की नीतियों के दबाव में अमेरिकी कंपनी ब्लैकस्टोन ने इनाडु समूह की फादर कंपनी उषोदया इंटरप्राइजेज में से अपने 26 फ़ीसदी शेयर खींच लिए, तो इस कंपनी की हालत बेहद पतली हो गई थी। तभी जे एम फायनेंसियल के अध्यक्ष नीमेश कंपानी ने ई टीवी चलाने वाली उषोदया इंटरप्राइजेज में 2,600 करोड़ रुपए लगातर कंपनी को डूबने के बचा लिया। बाद में पता चला कि कंपानी के मार्फ़त यह निवेश असल में अंबानी का है। दरअसल मुकेश के साथ नीमेश कंपानी का पुराना संबंध है। 

रिलायंस के बंटवारे के बाद जब पेट्रोलियम ट्रस्ट बनाया गया तो नीमेश कंपनी और विष्णुभाई बी. हरिभक्ति उसके ट्रस्टी थे। नागार्जुन फायनेंस घोटाले के बाद जब नीमेश कंपानी को ग़ैर-जमानती वारंट निकलने के कारण देश छोड़कर भागना पड़ा, तब जाकर मालिक के तौर पर अंबानी का नाम खुलकर सामने आया। बाद में टीवी-18 के मालिक राघव बहल ने मुकेश अंबानी से उस ईटीवी समूह को ख़रीद लिया। इस ख़रीद पर 2,100 करोड़ रुपए ख़र्च करने के बाद बहल पर आर्थिक बोझ इतना ज़्यादा हो गया कि उनके पुराने चैनल, आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन सहित सीएनबीसी आवाज़ को चलाने में दिक़्क़त आने लगी। जब इस बोझ ने राघव बहल को पस्त कर दिया, ठीक तभी मुकेश अंबानी ने एक बार फिर एंट्री मारी और इसमें 1,600 करोड़ रुपए लगाकर समूह को बचा लिया। यानी पहले अंबानी ने ईटीवी ख़रीदा फिर उसे राघव बहल को बेच दिया और राघव बहल को जब टीवी-18 को चलाने में मुश्किलें आने लगीं तो उसमें फिर पैसे लगा दिए! इसके बाद राघव बहल ने सार्वजनिक तौर पर दावा किया था कि अब उनका समूह बुलंद स्थिति में पहुंच गया है। पूरी घटना को महज डेढ़ साल हुए हैं। इस डेढ़ साल में ही टीवी-18 समूह ने कटौती के नाम पर पत्रकारों को निकाल दिया!

अब सवाल है कि पत्रकारों के निकाले जाने के कारण क्या हैं? जो दावे छनकर लोगों तक पहुंच रहे हैं उनमें कुछ निम्नलिखित हैं-
1. टीवी-18 समूह घाटे में है और कंपनी इससे उबरना चाहती हैं।
2. ट्राई ने अक्टूबर 2013 से एक घंटे में अधिकतम 10 मिनट व्यावसायिक और 2 मिनट प्रोमोशनल विज्ञापन दिखाने का दिशा-निर्देश दिया है। लिहाजा टीवी चैनल का राजस्व कम हो जाएगा।
3. हिंदी और अंग्रेज़ी में एक ही जगह पर रिपोर्टिंग के लिए अलग-अलग पत्रकारों (संसाधनों) को भेजने से लागत पर फ़र्क़ पड़ता है जबकि कंटेंट में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं होती।

सच्चाई ये है कि ये तीनों ही झूठे और खोखले हैं। टीवी-18 की बैलेंस शीट पहले दावे को झुठलाती है। वित्त वर्ष 2012-2013 में टीवी-18 समूह को 165 करोड़ रुपए का सकल लाभ हुआ है। बीते साल यही आंकड़ा 75.9 करोड़ रुपए का था। यानी एक साल में इस समूह ने अपना मुनाफ़ा दोगुना कर लिया है। 1999 में जब सिर्फ़ सीएनबीसी-18 और सीएनबीसी आवाज़ चैनल थे तो इस समूह का कुल राजस्व महज 15 करोड़ रुपए का था।  2005 में आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन की शुरुआत के समय इसका कुल राजस्व 106 करोड़ रुपए का था। यानी 10 साल पहले इस समूह का जितना राजस्व था उससे ज़्यादा मुनाफ़ा इसने अकेले बीते साल कमाया है। 

यह तर्क अपने-आप में खोखला है कि इन दोनों चैनलों पर लागत कम करने की ज़रूरत कंपनी को महसूस हो रही है। 2005 में 106 करोड़ रुपए वाली कंपनी का राजस्व इस समय 2400.8 करोड़ रुपए है। 24 गुना विस्तार पाने के बाद अगर मालिक (मैनेजमेंट) की तरफ़ से घाटे और कटौती की बात आ रही है तो झूठ और ठगी के अलावा इसे और क्या कहा जा सकता है? दिलचस्प ये है कि ये सारे आंकड़े खुद अपनी बैलेंस शीट में टीवी-18 समूह ने सार्वजनिक किए हैं। जहां तक ऑपरेटिंग लॉस की बात है, तो वो भी पिछले साल के 296 करोड़ के आंकड़े से घटकर 39 करोड़ रुपए पर आ ठहरा है। यानी लागत में और ज़्यादा कटौती की कोई दरकार काग़ज़ पर नज़र नहीं आती। अगर हम इस समूह के मनोरंजन चैनलों को हटा दें और सिर्फ़ सीएनबीसी टीवी18, सीएनबीसी आवाज़, सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 की बात करे, तो भी आंकड़े मैनेजमेंट की दलील से मेल नहीं खाते। वित्त वर्ष 2011-12 में इन चारों चैनलों को टैक्स चुकाने के बाद 9.2 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा हुआ था जबकि यही आंकड़ा 2012-13 में घटने की बजाय बढ़कर 10.2 करोड़ रुपए जा पहुंचा। कहां है घाटा? कहां है कटौती की दरकार?
राजस्व का ग्राफ देखिए! [ताज़ा आंकड़ा 2400.8 करोड़ रुपए का  है]

अब आते हैं दूसरे दावे पर। ट्राई ने जब चैनलों को विज्ञापन प्रसारित करने के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किया तो उसमें ये साफ़ कहा गया था कि यह कोई नया क़ानून नहीं है, बल्कि केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स रूल्स 1994 के तहत ही वो चैनलों को ये हिदायत दे रहा है। इससे महत्वपूर्ण यह है कि ट्राई ने साल भर पहले ही सारे चैनलों को ये चेतावनी दे दी थी कि वो यह बाध्यता लाने जा रहा है। अक्टूबर 2013 से ट्राई ने इसे किसी भी हालत में लागू करने की बात कही थी। लेकिन चैनलों की संस्थाओं की तरफ़ से सूचना प्रसारण मंत्रालय में लगातार संपर्क साधा गया और ताज़ा स्थिति ये है कि मंत्रालय सिद्धांत रूप से इस बात पर तैयार हो गया है कि इसे अक्टूबर 2013 से टालकर दिसंबर 2014 कर दिया जाए। इस समय न्यूज़ चैनलों में एक घंटे में औसतन 20-25 मिनट तक विज्ञापन दिखाए जाते हैं। अब सवाल ये है कि चैनलों को इस पर आपत्ति क्या है? पहली आपत्ति ये है कि चूंकि भारतीय टेलीविज़न इंडस्ट्री का रेवेन्यू मॉडल कुछ इस तरह का है कि इसकी 90 फ़ीसदी आमदनी का स्रोत विज्ञापन है। सिर्फ़ 10 प्रतिशत आमदनी सब्सक्रिप्शन से आ पाती है। 

इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डिजिटाइजेशन का विकल्प लाया गया। इसमें तकरीबन हर टीवी चैनल की स्वीकृति हासिल थी। डिजिटाइजेशन का एक चरण पूरा हो चुका है और दूसरे चरण का काम दिसंबर 2014 तक ख़त्म करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आमदनी के लिए चैनलों की निर्भरता विज्ञापन पर कम हो जाएगी और सब्सक्रिप्शन से होने वाली आय ज़्यादा हो जाएगी। शायद डिजिटाइजेशन पूरी नहीं होने की वजह से ही मंत्रालय ने दिसंबर 2014 तक ट्राई के फैसले को टालने की बात कही है, क्योंकि यही डिजिटाइजेशन की भी डेडलाइन है। अब अगर विज्ञापन में 12 मिनट की कड़ाई का नियम अगले डेढ़ साल के लिए टल जाता है तो इसको आधार बनाकर पत्रकारों को निकाला जाना सराकर बेईमानी और धोखा है। दूसरी बात, विज्ञापन की समय-सीमा कम होने से विज्ञापन की दर में भी उछाल आएगा और इस तरह 25 मिनट में जितने पैसे वसूले जाते हैं कम-से-कम उसका 70 फ़ीसदी पैसा तो 10 मिनट के विज्ञापन में वसूले ही जा सकते हैं।

'अन्ना क्रांति' पर किताब विमोचन के वक़्त
लेखक आशुतोष (बाए से दूसरे) और
राजदीप सरदेसाई (दाएं से दूसरे)
अब तीसरा तर्क। पत्रकारिता के लिहाज से यह ऊपर के दोनों तर्कों के बराबर और कई मायनों में उससे ज़्यादा विकृत तर्क है। यह एक बड़ी आबादी का निषेध करता हुआ तर्क है जोकि द्विभाषिया नहीं है। यह भाषा को माध्यम के बदले ज्ञान करार दिए जाने का तर्क है। यह एक ऐसा तर्क है जिसका एक्सटेंशन प्रिंट में नवभारत टाइम्स का हुआ। हिंदी और अंग्रेज़ी में अलग-अलग पत्रकारों के बदले एक ही पत्रकारों से दोनों की रिपोर्टिंग और पैकेजिंग कराने की बात असल में उस भाषाई संस्कार और जातीयता को सिरे से दबा जाती है। भाषाई खिचड़ी का जो तेवर टीवी चैनलों ने अबतक हमारे सामने पेश किया है उसे और ज़्यादा गड्ड-मड्ड करने की कोशिश है ये। नवभारत टाइम्स का सर्कुलेशन इस प्रयोग से बढ़ने की बजाय घटा है। तो ऐसा नहीं है कि इससे लागत कम हो जाएगी। और इस मुद्दे पर तो कम-से-कम भाषाई विमर्श तक खुद को महदूद कर लेने वाले बड़े पत्रकारों/संपादकों को मुंह खोलना ही चाहिए। सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 की ये परिपाटी अगर बाज़ार में और ज़्यादा फॉलो की गई तो इसी तर्ज पर आज-तक और हेडलाइंस टुडे भी छंटनी कर सकता है।

मुकेश अंबानी या राघव बहल किसी भी तरह के घाटे में नहीं है। मीडिया अगर उनके लिए घाटे का सौदा होता तो मुकेश अंबानी अभी एपिक टीवी में 25.8 प्रतिशत शेयर नहीं ख़रीदे होते। इस नए चैनल में मुकेश के बराबर ही आनंद महिंद्रा ने भी 25.8 प्रतिशत शेयर ख़रीदे हैं। चार साल तक डिज़्नी इंडिया के हेड रहने वाले महेश सामंत इसकी कमान संभालने वाले हैं। सामंत साहब इससे पहले जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी में लंबी पारी खेल चुके हैं। जाहिर है पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं है। उनके लिए कंटेंट कैसे महत्वपूर्ण हो सकता है? पत्रकारों की चिंता उन्हें क्यों होगी? और ग़ौरतलब यह है कि भारतीय मीडिया उद्योग के लिए ऐसी मालिकाना संरचना कोई नई परिघटना नहीं है। 1950 के दशक में पहले प्रेस आयोग ने अपनी सिफ़ारिश में लिखा था, "अख़बारों का आचरण अब न तो मिशन और न ही प्रोफेशन जैसा रह गया है, यह पूरी तरह उद्योग में तब्दील हो चुका है। इसका मालिकाना हक़ अब उन लोगों के हाथों में आ गया है जिन्हें पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं है, यहां तक कि कोई पृष्ठभूमि भी नहीं है। इसलिए उनका आग्रह अब किसी भी तरह की बौद्धिक चीज़ों में नहीं है, बल्कि वो ज़्यादा-से-ज़्यादा मुनाफ़ा बटोरना चाहते हैं।" (अध्याय-12, पेज 230)

तेरा क्या होगा कालिया?
जाहिर है ये मालिकानों की नीयत में आया बदलाव नहीं है। उनका ध्येय बिल्कुल साफ़ है। वो किसी भी हद तक जाकर अपना मुनाफ़ा बढ़ाना चाहते हैं। अब आख़िरी सवाल। जिन पत्रकारों की छंटनी हुई है उनकी चुप्पी का संदेश क्या है? एक कारण शुरू में ही बताया गया है कि मीडिया में प्रतिरोधी आवाज़ का मतलब बाकी मीडिया घरानों में भी अपनी संभावित नौकरी से हाथ गंवाना है। लेकिन, उनमें से कुछ फेयरवेल पार्टी के बाद सुख-दुख के भाव को तय नहीं कर पा रहे। बड़े पदों पर रहे लोगों को एकमुश्त 5-10 लाख रुपए मिल गए। इस स्थिति को कुछ लोग 'ठीक है' की शक्ल में टालना चाहते हैं। बाकी कुछ ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि उनको लेकर विरोध तो दर्ज़ हो, लेकिन उसमें उनके हस्ताक्षर न हो। अपना पूरा जीवन मज़दूर विरोधी ख़बरों को लिखने-दिखाने में लगाने वाले ऐसे लोगों के साथ कोई हमदर्दी भी मुश्किल से दिखाई जा सकती है जोकि रैली या आंदोलन को 'जाम' के फ्लेवर में टीवी स्क्रीन पर परोसने में आनंद पाते हों। लेकिन इन सबके बावज़ूद अगर व्यापक चुप्पी बाहर वालों की तरफ़ से भी बरकरार रही तो ये साफ़ हो जाएगा कि पत्रकारों से ज़्यादा कमज़ोर, लोलुप और असुरक्षित क़ौम शायद इस देश में कोई नहीं है।

08 अप्रैल 2013

दैनिक भास्कर समूह: धंधा अखबार तक महदूद नहीं है

-दिलीप खान
(मूल रूप से शोध पत्रिका जन मीडिया के वर्ष-2, अंक-13 में प्रकाशित। पीडीएफ में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।)

अमेरिका और यूरोप के ज़्यादातर देशों की तरह भारत में क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर पाबंदी नहीं है। [1] नतीजतन कोई मीडिया कंपनी धीरे-धीरे चीनी का व्यवसाय शुरू कर देती है [2] और कोई ऊर्जा उत्पादन और तेल के धंधे में पैर पसार लेती है। [3] इसके उलट कई बार चिट फंड और रियल एस्टेट जैसी गैर-मीडिया कंपनियां भी अख़बार और टीवी चैनल खोलकर लोगों से मुखातिब हो जाती हैं। [4] पिछले एक दशक में मीडिया कारोबार में यह चलन बड़े स्तर पर सामने आया है। लोगों के बीच अपने मुताबिक सामग्री प्रस्तुत करने का जो विकल्प अख़बार या फिर टीवी चैनल खोल लेने के बाद कंपनियों को हासिल होता है वो किसी भी हद तक छूट मिलने के बावज़ूद विज्ञापन से हासिल नहीं किया जा सकता। इस तरह अगर एक कंपनी के पास अख़बार भी है, टीवी चैनल भी, रेडियो भी, पत्रिका भी और वेबसाइट-पोर्टल भी तो अपने दूसरे धंधों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में वो उस हद तक सतर्कता बरतने का प्रयास करती है जिससे उसका मुनाफा बुलंद रहे। कई मामलों में यह प्रयास सतर्कता से आगे पहुंच जाता है और अख़बार अपने समूह के दूसरे व्यवसाय से जुड़ी खबरों को इस तरह पेश करता है कि पाठक के सामने उसके सामाजिक तौर पर जिम्मेदार समूह की छवि उभर कर सामने आए। यह किसी एक समूह तक सिमटा मसला नहीं है, बल्कि सतही निरीक्षण से ही इस तथ्य को नियमित अंतराल पर उजागर किया जा सकता है। 
टाइम्स ऑफ इंडिया के समीर जैन की तरह रमेश चंद्र अग्रवाल ने विदेश में पढ़ाई नहीं की है। भास्कर का
 विस्तार उसने 'स्वदेशी' तरीके से किया है।

1958 में क्षेत्रीय स्तर पर अखबार शुरू करने वाले दैनिक भास्कर समूह, जोकि पिछले तीन दशक में अकूत विस्तार पाकर 13 राज्यों में फैल चुका है और अब डीबी कॉर्प प्राइवेट लिमिटेड नाम से शेयर बाजार में सूचीबद्ध है, ने हाल ही में नई दिल्ली में 'तीसरा पावर विजन कॉनक्लेव' का आयोजन किया। [5] 28 मार्च को यह कार्यक्रम हुआ लेकिन उससे पहले के एक हफ्ते में इससे जुड़ी खबर डीबी कॉर्प समूह के मुख्य अखबार दैनिक भास्कर में तीन बार पहले पृष्ठ पर छपी। [6] एक बार एक कॉलम में और दो बार दो-दो कॉलम में।

तीनों खबर में एक ही बात बताई गई कि 28 तारीख को 'तीसरा पावर विजन कॉनक्लेव' नई दिल्ली में होना है जिसमें 'फोकस स्टेट' मध्य प्रदेश होगा। खबर के लिहाज से देखें तो तीन बार दोहराए जाने के पैमाने पर यह खरा नहीं उतरती। [7] लेकिन दैनिक भास्कर में न सिर्फ यह तीन बार छपी बल्कि हर बार इस खबर को पहले पन्ने पर जगह मिली। यह अपने समूह द्वारा होने वाले आयोजन का एक तरह से प्रचार था जिसे अखबार का मंच मुफ्त में उपलब्ध होने की वजह से बार-बार खबर बनाकर प्रस्तुत किया गया। लेकिन मजेदार यह है कि एक भी मौके पर दैनिक भास्कर में यह जानकारी नहीं दी गई कि इस समूह का पावर (ऊर्जा) के क्षेत्र के साथ आर्थिक हित जुड़े हैं। 

पाठकों को ये जरूर बताया गया कि इस कॉनक्लेव के प्रायोजक में सुकैम, जिंदल पावर, बंगाल ऐमटा, वेदांता और पहाड़पुर पावर शामिल हैं, लेकिन यह जानकारी छुपा ली गई कि दैनिक भास्कर समूह की डिलीजेंट पावर प्राइवेट लिमिटेड (इसको डीबी पावर प्राइवेट लिमिटेड भी कहा जाता है।) तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में सक्रिय कंपनी है। इस तरह खबर को पढ़ने के बाद पाठकों को एकबारगी यही लगेगा कि भास्कर समूह देश की ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए काफी हद तक चिंतिंत होने की वजह से यह आयोजन जनता के हित में कर रहा है। 

दैनिक भास्कर की फादर कंपनी डीबी कॉर्प प्राइवेट लिमिटेड द्वारा आयोजित यह तीसरा कॉनक्लेव था। सबसे पहले साल 2011 में समूह ने जो आयोजन किया था उसमें 'फोकस स्टेट' के तौर पर छत्तीसगढ़ और राजस्थान को शामिल किया गया फिर इसके बाद 2012 में हरियाणा पर केंद्रित करते हुए कार्यक्रम हुआ। [8] डीबी पावर लिमिटेड का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। पांच साल से कम उम्र की इस कंपनी को उत्पादन के लिए तैयार करने के बाद दैनिक भास्कर समूह की गतिविधियों पर नज़र रखी जानी चाहिए। गौरतलब है कि पावर क्षेत्र में कंपनी की शुरुआत करने के बाद ही दैनिक भास्कर समूह ने 'पावर कॉनक्लेव' का आयोजन भी शुरू किया। पहले कॉनक्लेव के 'फोकस स्टेट' छत्तीसगढ़ में कार्यक्रम से पहले ही इस कंपनी ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे और 2011 के उस कॉनक्लेव के बाद छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में मौजूद इसके प्लांट में काम की गति तेज हो गई।
मध्यप्रदेश: जहां नया प्लांट बनना है

आज छत्तीसगढ़ में डीबी पावर के पास 1200 मेगावाट का प्लांट है। [9] छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की सिफारिश पर केंद्र ने कंपनी को दो कोयला ब्लॉक आवंटित किया था जिन्हें इसी पावर प्लांट के लिए इस्तेमाल में लाया जाना है। कोयला ब्लॉक आवंटन के चर्चित मुद्दे पर दैनिक भास्कर की रिपोर्टिंग पर गौर करे तो ये साफ लगेगा कि उस दौर में भास्कर ने बेहद चयनित होकर और भरपूर सावधानी से पूरे मसले को अपने पन्नों में जगह दी। कोयला ब्लॉक मामले में दैनिक भास्कर (जोकि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है) के अलावा महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला लोकमत समूह भी शामिल था। [10] महाराष्ट्र में मनोज जायसवाल के साथ मिलकर राजेंद्र दर्डा और उनके भाई, कांग्रेस सांसद एवं लोकमत मीडिया समूह के मालिक विजय दर्डा ने जस इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपिटल प्राइवेट लिमिटेड में दांव खेला था।

मामले की तहकीकात के दौरान सीबीआई ने विजय दर्डा के बेटे देवेन्द्र दर्डा से भी पूछ-ताछ की थी। इसके अलावा प्रभात खबर की फादर कंपनी ऊषा मार्टिन को भी कोयले का पट्टा हासिल हुआ था। [11] इन तीनों अखबारों में कोयला ब्लॉक आवंटन मुद्दे की रिपोर्टिंग अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए दूसरी (प्रतिद्वंद्वी) कंपनियों पर निशाना साधने की कोशिश ज्यादा साफ दिखती है। कहने का मतलब ये कि ऐसी मीडिया कंपनियां जो दूसरे धंधों में उतरी हुई हैं वे उन्हें वैधता देने के लिए अपने मीडिया मंच का इस्तेमाल करती हैं। 

छत्तीसगढ़ को फोकस स्टेट रखने के तुरंत बाद दैनिक भास्कर समूह की कंपनी डीबी पावर ने वहां पर प्लांट बनाया और यह महज संयोग नहीं है कि मध्य प्रदेश में जब इस समय डीबी पावर (डिलीजेंट पावर) 1,320 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगाने की योजना पर काम कर रही है तो 'पावर कॉनक्लेव' में फोकस स्टेट मध्य प्रदेश है। [12] जाहिर है फोकस स्टेट के चुनाव में दैनिक भास्कर अपनी सिस्टर कंपनियों की हित को ध्यान में रखकर कॉनक्लेव का आयोजन करता है। लेकिन यह हित पाठकों के सामने उजागर न हो इसके लिए पूरी रिपोर्टिंग में कहीं भी भास्कर यह तथ्य जाहिर नहीं करता कि तापीय ऊर्जा के साथ उसके आर्थिक हित नत्थी हैं। 

छत्तीसगढ़ में अपनी सिस्टर कंपनी डीबी पावर के काम शुरू करने के बाद छत्तीसगढ़ की ऊर्जा जरूरतों पर जब दैनिक भास्कर बात कर रहा था तो जाहिर है कि उसमें अधिकाधिक तापीय ऊर्जा निर्माण पर ही जोर दिया जा रहा था। राज्य के जांजगीर-चांपा जिले के प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान कंपनी को स्थानीय स्तर पर बहुतेरे विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा लेकिन राज्य में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले इस अखबार से वो खबरें नदारद रहीं। [13] डभरा विकासखंड के तहत आने वाले गांव टुण्ड्री के स्थानीय लोगों ने भास्कर से रवैये पर काफी ऐतराज जताया था। अगर किसी कंपनी के पास कोई अखबार हो तो जाहिर है उसे अपने खिलाफ दिखने वालीं खबरें दबाने में काफी सहूलियत होती है। 
पावर प्लांट के लिए विकसित किया जा रहा जलाशय

व्यावसायिक चिकनाई को बरकरार रखने की राह में यह काफी मददगार साबित होते हैं। यही कारण है कि जब छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में डीबी पावर प्राइवेट लिमिटेड को नौ करोड़ 16 लाख टन क्षमता वाला कोयला ब्लॉक मिला और अपनी बिजली परियोजना पर इसने काम करना शुरू किया उसी के आस-पास दैनिक भास्कर का रायगढ़ संस्करण भी लॉन्च किया गया। [14] दैनिक भास्कर अब मध्य भारत के खनिज प्रधान हर राज्य में प्रमुखता से फैल रहा है। झारखंड में बेहद आक्रामता से इसने बाजार पर कब्जा किया और खनन में संलग्न एक दूसरी कंपनी ऊषा मार्टिन के अखबार प्रभात खबर के जमे-जमाए पाठक वर्ग को लुभावने सब्सक्रिप्सन ऑफर से झकझोर दिया। 

छत्तीसगढ़ में मीडिया का यह तेवर महज भास्कर के मामले तक महदूद नहीं है बल्कि राज्य के दूसरे सबसे बड़े अखबार हरिभूमि की फादर कंपनी आर्यन कोल बेनीफिशिएशन है जो एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और 30 मेगावाट क्षमता वाला एक पावर प्लांट चलाती है। [15] यानी खनन, रियल एस्टेट, बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों की कंपनियां या तो मीडिया की तरफ रुख कर रही हैं या फिर मीडिया की कंपनियां इन क्षेत्रों की तरफ। जाहिर है अगर कोई ठोस आर्थिक मुनाफे का मामला नहीं होता तो यह चलना इतना आम नहीं होता। 

दैनिक भास्कर इन दिनों जेपी मॉर्गन, आईडीएफसी और कार्लाइल समेत कई प्राइवेट इक्विटी कंपनियों से बातचीत कर रही है ताकि वो साल के अंत तक मध्य प्रदेश में बिजली संयत्र शुरू करने के लिए 800 करोड़ रुपए का फंड जमा कर सके। [16] इसी तरह पहले पावर कॉनक्लेव के बाद भास्कर ने 2011 में वारबर्ग पिनकस से पैसे जमा कर जांजगीर-चांपा में बिजली संयंत्र की शुरुआत की। [17] मध्य प्रदेश में डीबी पावर अपने विस्तार की नई संभावना तलाश रहा है और अपने मुताबिक नीति के लिए बेहद जरूरी है कि वहां के हुक्मरान तक अपने दस्तावेज पहुंचाए। 28 मार्च को नई दिल्ली में जो कार्यक्रम हुआ उसकी रिपोर्टिंग में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को दैनिक भास्कर ने आधी जगह दी। पहले पेज पर दो कॉलम की खबर में एक कॉलम और पृष्ठ संख्या आठ पर पांच कॉलम की खबर में दो कॉलम शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य पर आधारित हैं। [18] 

संयोग से इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद इसी दिन (29 मार्च को) दैनिक भास्कर ने पाठकों को ये भी सूचना दी कि भास्कर समूह देश का सबसे बड़ा अखबार समूह है। जाहिर है इस समय 13 राज्यों में समूह के 65 संस्करण अलग-अलग चार भाषाओं में निकल रहे हैं। लेकिन देश का सबसे बड़ा अखबार समूह अपने व्यवसाय की जानकारी देने में पाठकों से बच रहा है तो इसकी वजह शायद अब भी यही है कि पाठक पत्रकारिता को पवित्र और मिशनरी धंधा मानने के मुगालते में जीवित है। वाक्यों के बीच में पढ़ना अभी तक ठीक-ठीक तरीके से देश के पाठकों को आया नहीं है। जॉन पिल्गर ने अपने एक लेख में जिक्र किया कि स्टालिन के शासन के दौरान 1970 के दशक में वो चेकोस्लोवाकिया में एक फिल्म बना रहे थे जिसमें उस शासन से असंतुष्ट गुट के एक व्यक्ति और उपन्यासकार जेनर उर्बानेक ने जॉन को बताया कि वो देश के किसी भी मीडिया कंटेंट पर [आंख मूंदकर] भरोसा नहीं करते, बल्कि खबर पढ़ने के बाद उसके पंक्तियों के बीच छुपी असलियत को भांपने की कोशिश करते हैं। [19] भारत में भी मीडिया मालिकाना की संरचना और उसकी कार्यशैली को देखते हुए हर पाठक को अपने भीतर यह गुण विकसित करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए। 
छत्तीसगढ़ में दैनिक भास्कर समूह का तैयार पावर प्लांट

दैनिक भास्कर के लिए रायगढ़ में संस्करण निकालना इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े जिलों में से एक जांजगीर-चांपा  में 6,640 करोड़ रुपए की लागत वाले पावर प्लांट के लिए हर साल 52 लाख 29 हजार टन कोयले की जरूरत थी और डीबी पावर को मांड-रायगढ़ कोल ब्लॉक से 20 लाख टन प्रति साल कोयला निकालने का पट्टा हासिल हुआ। [20] मामले का न सिर्फ स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ था बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी आवाजें गूंजी लेकिन अखबार के पन्ने इससे अनभिज्ञ रहे। जांजगीर-चांपा में संयंत्र के लिए कंपनी को 1,077 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करना था जो काम लगातार विरोध के बावजूद लगभग पूरा हो चुका है। [21] राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कहा कि जांजगीर-चांपा में बिजली संयंत्र बनने से वहां के फसलों की पैदावार नष्ट हो जाएगी। [22] जाहिर है भास्कर के लिए ऐसे बातों का काट प्रस्तुत करना जरूरी हो चला था। लिहाजा दैनिक भास्कर में इस तरह की खबरें लगातार छपी कि बिजली संयंत्र बनने से उस इलाके का कायाकल्प हो जाएगा!

मुख्य व्यवसाय के तौर पर यह समूह अभी भी मीडिया को आगे रख रहा है लेकिन दैनिक भास्कर समूह बिजली उत्पादन, कपड़ा उद्योग, अयस्क निष्कर्षण, खाद्य तेल रिफाइनिंग और रियल एस्टेट में भी उतरा हुआ है। [23] समूह की मुख्य कंपनी डीबी कॉर्प जोकि मीडिया की अगुवाई कर रही है उसका कुल राजस्व 1,246 करोड़ रुपए का है लेकिन इक्विटी के साथ मिलाकर डीबी पावर का राजस्व 6,640 करोड़ रुपए का है। [24] आप खुद समझ सकते हैं कि ज्यादा बड़ा आर्थिक हित कहां जुड़ा हुआ है। धीरे-धीरे कौन कंपनी सहायक बनती जा रही है और कौन सी प्रमुख। भास्कर समूह का लक्ष्य है कि 2017 तक वो अपने बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 5,000 मेगावाट कर ले। [25] 

दिलचस्प ये है कि वो सिर्फ दो राज्यों की संभावना के आधार पर यह दावा कर रहा है। देश में फिलहाल बिजली उत्पादन में सबसे ज्यादा 53.7 प्रतिशत भागीदारी तापीय ऊर्जा क्षेत्र का है जो इस समय 167.3 गीगावाट से ज्यादा बिजली पैदा कर रही है। [26] भास्कर समूह इसमें बेहतर भविष्य देखते हुए निवेश कर रहा है और इस निवेश को वैचारिक मजबूती और वैधता देने के लिए अपने मीडिया उपकरणों का इस्तेमाल कर रहा है।

बहरहाल सवाल ये है कि दैनिक भास्कर अगर बिजली में निवेश कर भी रहा है तो आपत्ति की वजह क्या है? आपत्ति इसलिए है क्योंकि भास्कर ने जिस मुद्दे पर कॉनक्लेव आयोजित किया और जिस राज्य को उसने 'फोकस स्टेट' घोषित किया वहां पर कंपनी के ऊंचे आर्थिक हित दांव पर लगे हुए हैं लेकिन अखबार ने भाग लेने वाली बाकी सारी कंपनियों का जिक्र किया लेकिन खबर में अपनी कंपनी डीबी पावर या डिलीजेंट पावर का कहीं नाम तक नहीं आने दिया। यानी भास्कर समूह पाठकों को यह नहीं बताना चाहता कि कार्यक्रम के आयोजन के जरिए वो राज्य पर एक खास तरह का दबाव बनाना चाहता है कि ताकि उसके आर्थिक सड़क पर दौड़ने वाली गाड़ी की रफ्तार तेज हो जाए। दूसरी वजह यह हो सकती है कि पावर, टाऊनशिप, खनन या फिर रियल एस्टेट से जुड़े किसी भी धंधे के साथ दाग की एक ऐसी मुहर पिछले कई सालों से छप चुकी है कि सामान्य लोगों के जेहन में एकबारगी यहीं बात कौंधती है कि हेर-फेर से ही कंपनी ने कुछ किया होगा! भास्कर समूह पाठकों के बीच इस संतुलन को बनाए में लगातार सफल हो रहा है इसलिए अपनी पाठक संख्या में हर साल कुछ आंकड़े वो जोड़ ले जाता है। [27]

डीबी कॉर्प प्राइवेट लिमिटेड (मीडिया समूह) ने 2011-12 में 202 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। [28] दिसंबर 2009 की स्थिति के मुताबिक देश में इस कंपनी के कुल 58,787 शेयरधारक हैं जो दिन-रात कंपनी की तरक्की में अपनी तरक्की की आस लगाए बैठे रहते होंगे। [29] इन आधे लाख से ज्यादा लोगों में दैनिक भास्कर के जितने भी पाठक होंगे उन्हें अखबार के कंटेंट की राजनीति और अर्थव्यवस्था से ज्यादा मतलब होगा कि इस समूह की कोई भी कंपनी कुलांचे मारकर आगे बढ़े ताकि उसके असर से डीबी कॉर्प के शेयर में उछाल आ सके और उसके असर तले शेयरधारकों की जेब का वजन कुछ बढ़ पाए। डीबी कॉर्प के 18 करोड़ 15 लाख शेयर में ही पत्रकारिता का सबकुछ छुपा है। [30] इसलिए दैनिक भास्कर को समझने के लिए उसके पन्नों के बराबर ही दलाल स्ट्रीट पर भी नजर रखने की जरूरत है।  
  
पुनश्च-
दैनिक भास्कर ने 30 मार्च को पावर विजन नाम से आठ पेज का अलग से सप्लिमेंट जारी किया जिसमें देश और खासकर मध्य प्रदेश की ऊर्जा जरूरतों को कैसे मिटाया जाए उसकी रूपरेखा खींची गई थी।

संदर्भ

1. क्रॉस मीडिया ओनरशिप दो तरह के होते हैं। पहला, जब एक ही कंपनी अखबार, पत्रिका, रेडियो या फिर टीवी में से एकाधिक पर मालिकाना दिखाए तो वो वर्टिकल क्रॉस मीडिया ओनरशिप है। दूसरा, जब एक मीडिया कंपनी मीडिया से बाहर के क्षेत्र में निवेश कर मालिकाना हक हासिल करे। ये होरिजोंटल क्रॉस मीडिया ओनरशिप कहलाता है। अमेरिका सहित यूरोप के ज्यादातर देशों में इस पर पाबंदी है। 
2. दैनिक जागरण अखबार निकालने वाले दैनिक जागरण प्राइवेट लिमिटेड का सहारणपुर में चीनी का व्यवसाय है। 
3. दैनिक भास्कर का ऊर्जा उत्पादन और तेल का व्यवसाय भी है। 
4. आर्यन कोल बेनीफिशिएशन कंपनी ने जैसे हरिभूमि अखबार शुरू कर दिया। देश में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं।
5. दैनिक भास्कर, 29 मार्च 2013, राष्ट्रीय संस्करण, 
6. भास्कर में इससे जुड़ी खबरें 24, 25 और 27 मार्च को छपीं। 
7. चूंकि बाद की खबरों में कुछ भी नई घोषणा या फिर विस्तृत जानकारी नहीं दी गईं इसलिए एक ऐसे आयोजन की खबर जो आने वाले दिनों में होने जा रहा हो, बिना किसी नए अपडेट के बार-बार नहीं छापी जा सकती। 
8. दैनिक भास्कर, 27-03-2013, राष्ट्रीय संस्करण
9. http://diliigentpower.com/html/aboutus.html
10. कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट। इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी- http://www.indianexpress.com/news/coalgate-cbi-grills-amrs-arvind-jayaswal/1003757 
11. कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट। और देखें- http://www.hindustantimes.com/business-news/CorporateNews/DB-Power-may-lose-coal-block/Article1-922146.aspx
12. दैनिक भास्कर इस प्लांट को लेकर लगातार कोशिश कर रहा है और कई निजी इक्विटी कंपनियों से बात कर रहा है। इकनॉमिक टाइम्स ने इस पर कई स्टोरी की। यहां देखें- http://articles.economictimes.indiatimes.com/2013-02-06/news/36949657_1_power-projects-pe-investors-chhattisgarh-project 
13. आशीष खेतान, लूट की छूट, तहलका, 03.10.2013 वेब लिंक- http://www.tehelkahindi.com/rajyavar/%E0%A4%9B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC/1432.html
14. Dainik Bhaskar: First newspaper printed at Raigarh; Chhattisgarh. वेब लिंक- http://www.dainikbhaskargroup.com/archives.php   
15.  http://www.edelweissfin.com/Portals/0/Documents/Investment_banking/part1_ACB_INDIA_LIMITED_31stMay.pdf 
16. देखें- इकनॉमिक टाइम्स। वेब लिंक- http://articles.economictimes.indiatimes.com/2013-02-06/news/36949657_1_power-projects-pe-investors-chhattisgarh-project
17. वही
18. दैनिक भास्कर, 29 मार्च 2013, राष्ट्रीय संस्करण
19. John Pilger, War by Media, वेब लिंक- http://www.informationclearinghouse.info/article13629.htm 
20. केयर रेटिंग्स (CARE Ratings) की डीबी पावर पर रिपोर्ट। वेब लिंक - http://www.careratings.com/Portals/0/CareAdmin/CompanyFiles/RR/DB%20Power%20Limited-06202011.pdf 
21. वही और आशीष खेतान, लूट की छूट, तहलका, 03.10.2013
22. आशीष खेतान, लूट की छूट, तहलका, 03.10.2013 
23. केयर रेटिंग्स की डी बी पावर पर रिपोर्ट। वेब लिंक- http://www.careratings.com/Portals/0/CareAdmin/CompanyFiles/RR/DB%20Power%20Limited-06202011.pdf और डीबी पावर विजन का आधिकारिक पेज - http://dbpowervision.com/about 
24. डी बी कॉर्प का फायनेंसियल हाइलाइट्स के तहत कंपनी का कुल मूल्य वित्त वर्ष 2011-12 में 1,246 करोड़ रुपए का था। केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ के पावर प्लांट के लिए डीबी पावर प्राइवेट लिमिटेड ने इक्विटी कंपनियों की मदद से 6,640 करोड़ रुपए लगाए। 
25. http://diliigentpower.com/html/mission.html
26. केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट। 
27. आईआरएस रिपोर्ट के मुताबिक भास्कर को 2012 की चौथी तिमाही में पढ़ने वाले लोगों की संख्या 1 करोड़ 44 लाख है। 
28. Statement of consolidated unaudited results of the quarter and nine months ended December 31, 2012
29. 31 दिसंबर 2009 तक की स्थिति के मुताबिक। Share holding patterns. वेब लिंक- http://investor.bhaskarnet.com/pages/shares.php?id=3 
30. वही। 



31 मई 2012

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग-3)


अपवाद नहीं, नियम हैं साक्षी 
-दिलीप खान
क्रमवार लिंक
इधर बीच नज़र दौड़ाए तो पत्रकारों को राज्यसभा भेजने का प्रचलन लगातार बढ़ा है। बीते कुछ सालों में बड़े कॉरपोरेट और पत्रकारों की चहलकदमी राज्यसभा के गलियारों में तेज हुई है। चाहे वो सीएमवाईके प्रिंटेक लिमिटेड के मालिक चंदन मित्रा हो चाहे लोकमत न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष विजय दर्डा। पार्टी और विचारधारा अलग-अलग हो सकती है लेकिन प्रचलन एक है। चंदन मित्रा पायनियर के मालिक हैं, जो अंग्रेज़ी और हिंदी में अख़बार निकालने के अलावा पत्रकारिता का एक संस्थान भी चलाते हैं। विजय दर्डा का लोकमत समूह मराठी में लोकमत, हिंदी में लोकमत समाचार और अंग्रेज़ी में लोकमत टाइम्स निकालने के साथ-साथ टीवी-18 समूह के साथ साझा उपक्रम में आईबीएन-लोकमत नाम से मराठी न्यूज़ चैनल भी चलाता है। व्यवसाय, राजनीति और मुनाफे के शुद्ध मिश्रण के तले नेता मीडिया मंडी में उतर रहे हैं। कांग्रेस के रसूखदार नेता राजीव शुक्ला अपनी पत्नी अनुराधा प्रसाद के साथ ब्रॉडकास्ट इंडिया लिमिटेड के तहत न्यूज़ 24 टीवी चैनल चलाने के साथ-साथ एक स्वतंत्र प्रोडक्शन हाउस भी चलाते हैं। बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड नाम का यह प्रोडक्शन हाउस टीवी धारावाहिक की दुनिया में काफ़ी मशहूर है। इसके अलावा आपनो 24, ई 24 नाम के चैनल और रेडियो धमाल भी राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद की ही मिल्कियत है। इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड इंटरटेनमेंट इंस्टीट्यूट के बैनर तले वो मीडिया कर्मियों को प्रशिक्षण भी देते हैं। अतिरिक्त सूचना यह है कि अनुराधा प्रसाद रिश्ते में बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद की बहन है। राजीव शुक्ला टीवी में हाथ आजमाने के साथ ही बेशुमार पैसा वाले धंधा क्रिकेट में भी खासा रुचि रखते हैं। बीसीसीआई में कई महत्वपूर्ण ओहदा संभावलने के अतिरिक्त अभी-अभी संपन्न आईपीएल के वो कमीश्नर (अध्यक्ष) थे। कमीश्नर यानी ललित मोदी वाला पद।  पीवी नरसिंहा राव की सरकार में मंत्री रह चुके हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा इनफॉरमेशन टीवी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के बड़े शेयरधारक हैं। यही कंपनी हमारे बीच इंडिया न्यूज़ नाम का टीवी चैनल और आज समाज नाम का अख़बार लेकर आती है। 

गुवाहाटी में चलने वाला ऊ लाला एफएम रेडियो द डर्टी
 पिक्चर फिल्म के
गाने  से पहले से बाज़ार में है और लोकप्रिय है।
राजनेताओं के साथ मीडिया के गठजोड़ की जब भी चर्चा उठती है लोग दक्षिण भारत का नाम ले लेते हैं। यह ज़रूर है कि दक्षिण भारत में यह प्रचलन ज़्यादा वृहद और पुराना है लेकिन कमोबेस यह प्रैक्टिस भारत के हर कोने में समान है। पता नहीं द डर्टी पिक्चर में लिखा गया गाना ऊ ला ला...किससे प्रेरित है, लेकिन इसी नाम का एफ एम चैनल गुवाहाटी में काफ़ी लोकप्रिय है जिसके मालिक कभी कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से मंत्री रह चुके, कभी पार्टी ने निष्कासित हो चुके और फिर वापसी कर चुके मतांग सिंह हैं। पॉजिटिव रेडियो प्राइवेट लिमिटेड नाम की उनकी कंपनी रेडियो ऊ लाला चलाती है और पॉजिटिव टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले मतंग सिंह एन.ई. टीवी, फोकस टीवी, एनई बांग्ला, एनई हाई फाई, हमार और एचवाई टीवी चलाते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से असम में मंत्री पद पर रहने वाले हेमंत बिश्व शर्मा की पत्नी रिंकी भुयन शर्मा प्राइड ईस्ट इंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड की मालकिन हैं और न्यूज़ लाइव तथा रंग नाम का चैनल चलाती हैं। दशरूपा इंजीनियरिंग एंड पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड के मालिक अंजन दत्ता अजीर दैनिक नाम का अख़बार चलाते हैं और लोग उन्हें कांग्रेस विधायक के तौर पर भी जानते हैं। असम में ही जनसाधारण प्रिटिंग्स एंड पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी जनसाधारण अख़बार निकालती है और इसके मालिक रोकिबुल हुसैन हैं जो राज्य में कई बार मंत्री रह चुके हैं। ऐसा नहीं है कि असम में सिर्फ़ कांग्रेस के ही नेता मीडिया में हाथ आजमा रहे हैं बल्कि असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बदरुद्दीन अजमन की कंपनी यूनिटी मीडिया एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड गणाधिकार नामक अख़बार निकालती है। अजमल एयूडीएफ के अलावा दारुल उलूम देवबंद से भी संबंधित हैं और असम के बड़े कारोबारी हैं।
इसलिए मेरी नज़र में मीडिया में नेताओं के निवेश को दक्षिण की परिघटना कहने वाले लोग बड़ी भूल कर रहे हैं। पंजाब दक्षिण में नहीं है और न ही असम, हरियाणा भी दक्षिण का राज्य नहीं है और नागालैंड तो कतई नहीं। नागालैंड के मुख्यमंत्री नीफ्यू रियो नागालैंड फ्री प्रेस नामक कंपनी के भी मालिक हैं जोकि ईस्टर्न मिरर नामक अख़बार निकालती है। जगनमोहन रेड्डी के साक्षी को इसलिए नेता-मीडिया गठजोड़ के बड़े मिसाल के तौर जाना जाता है क्योंकि पांच साल के भीतर ही साक्षी देश के शीर्ष 10 दैनिकों में शुमार हो गया। लेकिन वाईएसआर के गुजरने के बाद साक्षी के रुतबे और बैंक खाते पर भी असर पड़ा। और वित्तीय तौर पर पछाड़ खाने के बाद जब दिसंबर 2011 में साक्षी ने अपनी कीमत 2.50 रुपए से बढ़ाकर 3 रुपए किया तो जगनमोहन रेड्डी ने अख़बार में लिखे गए खत में यह बताने की कोशिश की कि असल में यह पूरा मामला ‘पीले ब्रिगेड की साजिश’ का नतीजा है। पीला तेलुगुदेशम पार्टी का रंग है और पीले ब्रगेड से यहां आशय टीडीपी के साथ-साथ इनाडु और आंध्र ज्योति अख़बार से है। इससे पहले जून 2009 में साक्षी ने अपनी कीमत 2 से बढ़ाकर 2.5 रुपए किया था। अपनी शुरुआत के वक्त साक्षी की क़ीमत 2 रुपए थी और उस समय जगन रेड्डी विरोधी अख़बारों को लेकर लगातार फिकरे कसते रहते थे कि अगर साक्षी से मुकाबला करना है तो क्यों नहीं वे भी अपनी क़ीमत 2 रुपए कर देते हैं। जगन के इस बात से नाराज होकर आंध्र ज्योति के संपादक राधाकृष्णा ने लिखा था, ‘अगर मैं किसी मुख्यमंत्री का बेटा होता और मेरे पास अनअकाउंटेड धन होता तो मैं मुफ्त में अख़बार बांटता।’

चित्र पहेली: ये भारत में सबसे ज़्यादा वेतन पाने
वाले व्यक्ति की तस्वीर है।
(सही उत्तर देने पर ख़ास ईनाम की व्यवस्था है। :D)
मीडिया को लेकर यह प्रतिस्पर्धा आंध्र के कोने-कोने में देखी जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में यह स्थापित सत्य की तरह हो गया है कि हर अख़बार और टीवी चैनल का किसी न किसी पार्टी के साथ गठजोड़ है। बड़े नाम से शुरू करें तो एआईडीएमके की मुखिया और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता मैविस सैटकॉम लिमिटेड कंपनी की मालकिन हैं और उनकी यह कंपनी अलग-अलग ब्रांड नेम से तमिलनाडु में कई टीवी चैनल चलाती है। जया टीवी, जया मैक्स, जया प्लस और जे मूवीज इनमें प्रमुख हैं। लेकिन जयललिता का मीडिया साम्राज्य कलानिधि मारन के सामने बेहद छोटा है। क्या आपको मालूम है कि भारत में सबसे ज़्यादा वेतन पाने वाला व्यक्ति कौन हैं? अगर आपका उत्तर मुकेश अंबानी है तो आप सामान्य बोध के आधार पर ग़लत दिशा में भटक रहे हैं। सही उत्तर है- कलानिधि मारन।  
कलानिधि मारन देश के सबसे बड़े टीवी समूहों में से एक सन टीवी नेटवर्क लिमिटेड के मालिक हैं। कल रेडियो लिमिटेड, साउद एशिया एफएम लिमिटेड और कल पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड भी कलानिधि मारन की ही मिल्कियत हैं। अपनी पत्नी सहित वो इन कंपनियों के 77 फ़ीसदी शेयर पर कब्जा रखते हैं। लगभग दर्जन भर से ज्यादा टीवी चैनल उनके नाम हैं। सन टीवी, सन न्यूज़, केटीवी, सन म्यूजिक, चुट्टी टीवी, सुमंगली केबल, आदित्य टीवी, चिंटू टीवी, किरण टीवी, खुशी टीवी, उदय कॉमेडी, उदय म्यूजिक, जैमिनी टीवी, जैमिनी कॉमेडी और जैमिनी मूवीज जैसे टीवी चैनलों के अलावा सूर्या एफएम और रेड एफएम उनका ही है। रेड एफएम, बजाते रहो! तमिल का बड़ा अख़बार दिनाकरण भी कलानिधि मारन ही निकालते हैं। कलानिधि मारन से अगर संक्षेप में आपका परिचय कराएं तो हम कह सकते हैं कि वो डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मुरासोली मारन के बेटे और दयानिधि मारन के भाई हैं। इसके साथ-साथ तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की बहन के वो पोते हैं। लेकिन कलानिधि मारन के मीडिया समूह से एम करुणानिधि पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने कलाइगनार टीवी प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की और कलाइगनार टीवी के मालिक बन गए। डीएमके के करीबी व्यवसायी एम राजेंद्रन राज टीवी नेटवर्क लिमिटेड में 11 फीसदी शेयरधारक हैं। इस तरह राज टीवी और राज डिजिटल प्लस नामक चैनल भी डीएमके के कब्जे में हैं। 
अंबुमनी रामदॉस के पिता और पीएमके प्रमुख एस रामदॉस मक्काल टीवी चलाते हैं और मक्काल थोलई थोडारपु कुझुमम लिमिटेड के वो सबसे बड़े शेयरधारक हैं। कांग्रेस नेता एच. वसंतकुमार भी न्यूज़ मीडिया में सक्रिय हैं। वो तमिलनाडु में वसंत टीवी चलाते हैं। कांग्रेस के ही सांसद और पूर्व मंत्री केवी थंगबालू मेगा टीवी के मालिक हैं। उनकी कंपनी का नाम हैं, सिल्वरस्टार कम्यूनिकेशंस लिमिटेड। कर्नाटक और केरल में भी नेताओं का मीडिया से अच्छी दोस्ती है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की पत्नी अनीता कुमारस्वामी कन्नड़ कस्तूरी टीवी चैनल की मालिकन हैं। लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता मुरली (जिनका 2009 में निधन हो गया) केरल में कैराइल टीवी और पीपुल टीवी चलाते थे। मुस्लिम लीग से संबद्ध एम के मुनीर इंडियाविजन नामक टीवी चैनल के मालिक हैं। इसी चैनल की फादर कंपनी इंडियाविजन सैटेलाइट कम्यूनिकेशंस लिमिटेड में केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 20 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
बीजू जनता दल के सांसद बैजंत ‘जे’ पांडा की पत्नी जगी मंगत पांडा ओडिसा टेलीविजन लिमिटेड के तहत चलने वाले ओटीवी की मालकिन हैं। ओटीवी ओडिसा का सबसे लोकप्रिय क्षेत्रीय टीवी चैनल है। पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक के दामाद और उद्योग मंत्री रहे निरंजन पटनायक के भाई सौम्या रंजन पटनायक ओडिसा से निकलने वाले दैनिक अख़बार संबाद, कनक टीवी और रेडियो चॉकलेट के मालिक हैं। ईस्टर्न मीडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के वो मालिक हैं। 
तो जाहिर है कि पूरब-पश्चमि-उत्तर-दक्षिण में मीडिया-राजनेता के बीच के संबंध लगातार गहरे होते जा रहे हैं। जगन रेड्डी के साक्षी पर सीबीआई के कसे गए शिकंजे से इस प्रचलन में कोई कमी आएगी, ऐसा नहीं है। हां, यह ज़रूर है कि मीडिया को विस्तार देने में अब ज़्यादा सावधानी बरती जाएगी। जगन पर कई गंभीर आरोप हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने साक्षी शुरू करने के लिए कई फ़र्ज़ी कंपनियों का सहारा लिया और उन कंपनियों से बरास्ते मॉरिशस आने वाले पैसों को जगति प्रकाशन में झोंका। मॉरिशस टैक्स हैवन कंट्री है, जहां से निवेश करने में भारत सरकार कई करों में छूट देती है और यही वजह है कि ज़्यादातर यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करने से पहले मॉरिशस में एक ठौर ढूंढ़ती है और फिर इधर का रुख करती है। आंध्र ज्योति और इनाडु ने जगन के ख़िलाफ़ शुरू किए गए अभियान में यह भी दिखाया कि किस तरह एपीआईआईसी (आंध्र प्रदेश इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रीयल कॉरपोरेशन) के पैसों को जगति प्रकाशन में लगाया गया। 
मीडिया एक ऐसा धंधा है जिसके बारे में कई जानकार बताते हैं कि काले धन को सफ़ेद करने में इस कारोबार से बेहतर कोई दूसरा काम नहीं है। 2004 में जगनमोहन रेड्डी जब कडप्पा से चुनाव लड़ रहे थे तो चुनाव अधिकारी को सौंपे गए ब्यौरे में उन्होंने अपनी आमदनी 10 लाख रुपए बताई थी। अगस्त 2011 में जगन ने घोषणा की कि उनके पास 365 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति है। इसके अलावा 41.33 करोड़ रुपए की संपत्ति उनकी पत्नी के नाम अलग से थी। जगन की संपत्ति में वृद्धि दर को अंकगणित के प्रश्न के तौर पर विद्यार्थियों से प्रतियोगिता परीक्षा में पूछा जाना चाहिए। 2004 में 9.18 लाख रुपए से बढ़कर यह 2009 में 77 करोड़ हुई, फिर 2011 में बढ़कर 365 करोड़ हुई। परीक्षार्थी कुल वृद्धि दर की गणना करें! सही उत्तर: 3 लाख 90 हज़ार फीसदी से ज़्यादा। इस दौरान जगन अगर भारत के किसी भी बैंक में वो पैसा जमा किए होते तो हद-से-हद 20 लाख रुपए तक पहुंच पाते। इससे साबित होता है कि बैंक में पैसा रखना प्रगति की राह में रोड़ा है। प्रगति अगर कहीं है तो मीडिया में है! 

30 मई 2012

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग- 2)

पार्टी मुखपत्र का ज़माना लद गया
-दिलीप खान
इससे पहले इन दोनों लिंक पर घूम आए
1- तुम बेचो, मैं ख़रीदूं उर्फ़ मीडिया मंडी की नीलामी गाथा.
2- जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग-1)

वाईएसआरकी छवि के बाद जगन के पास राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली बनने के लिए जो सबसे अहम हथियारहै, वो है साक्षी। यह जगन भी जानते हैं और विरोधी पार्टियां भी। इसलिए बाकी पार्टियांजगन से ज़्यादा उसके मीडिया समूह पर निशाना साध रहे हैं और जगन अपने मीडिया समूह केबचाव को खुद का बचाव समझते हुए लगभग अभियान चलाए हुए हैं। आंध्र प्रदेश में यदि साक्षी-जगनमोहनके रिश्तों की पड़ताल होती है तो इसके साथ-साथ इनाडु और टीडीपी के रिश्तों की भी होनीचाहिए, क्योंकि जगन का हमेशा ये तर्क रहा है कि उन्होंने इनाडु-रिलायंस-टीडीपी की दुरभिसंधिको ध्वस्त करने के लिए ही अपना अख़बार शुरू किया। मुख्यमंत्री किरण रेड्डी उस समय बेहदपरेशान थे जब मुख्यमंत्री के दौर में चलने वाले हर उम्मीदवार पर साक्षी चोट कर रहाथा। चाहे किरण रेड्डी हो, चाहे रोसैया। किरण रेड्डी के पास ऐसा कोई मीडिया नहीं हैजो खुलकर उनकी सलामी बजाए। टीडीपी के पास है, वाईएसआर कांग्रेस के पास है। असल मेंआंध्र में कांग्रेस पार्टी के भीतर ही कई गुट हैं। इसलिए एक आम राय किसी ख़ास नेताके बारे में मीडिया में नहीं उभर पाती। हां, किरण के पास मुश्किल ही सही लेकिन रास्तेहैं। इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल उन्होंने अभी जगन के ख़िलाफ़ किया। सीबीआई की छापेमारीको सीधे-सीधे किरण की बाजी न भी कहें तो साक्षी में दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनोंपर पाबंदी कुछ ऐसा ही कदम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि आंध्रमें कांग्रेस पार्टी मीडियाविहीन है। कांग्रेस सांसद टी सुब्बीरामी रेड्डी के भतीजेटी वेंकटरामी रेड्डी का दक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स कंपनी में 21 फ़ीसदी शेयर है। इसतरह दक्कन क्रॉनिकल, एशियन एज, फाइनेंसियल क्रॉनिकल और आंध्र भूमि में उनकी बड़ी हिस्सेदारीहै। साक्षी प्रकरण में इन अख़बारों की सरकारी भूमिका और पक्षधरता इस बात को पुख्ताकर रही थी कि कम से कम आंध्र प्रदेश में मीडिया अब राजनीतिक तौर पर टुकड़ों में बंटचुका है।
असलमें पार्टी मुखपत्र का जमाना अब लद गया। राजनीतिक दल यह जानने लगे हैं कि मुखपत्र कोया तो पार्टी कैडर पढ़ते हैं या फिर आलोचना के वास्ते विरोधी पार्टियां। हद से हद किसीविषय पर पार्टी का पक्ष जानने के लिए मीडिया उससे गुजरता है। लेकिन मीडिया की मौजूदागति मुखपत्र की बजाए रोजमर्रा के स्रोतों से ख़बर जमा करने की वजह से ही कायम हुई है।इस लिहाज से मुखपत्र उनके एजेंडे में उपयुक्त नहीं बैठता। लेकिन राजनीतिक पार्टी केनजरिए से सोचें तो यदि मीडिया मुखपत्र को पढ़ता भी है तो इससे पार्टी को कितना लाभहोगा? कोई ज़रूरी नहीं है कि उसी राजनीतिक नजरिए से मीडिया पार्टी की बात को जनता केबीच रखे। इसलिए बरास्ते मीडिया अपनी बात रखने-रखवाने में राजनीतिक दलों और नेताओं कोएक अवरोध तो दिखता ही है। ज़्यादा मुफीद यह होगा कि मुखपत्र के जरिए मीडिया तक बातपहुंचाने की बजाए सीधे मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाए। नेताओं ने इस योजनापर बीते वर्षों में तेजी से काम किया है और अब वो सीधे-सीधे मीडिया के मालिक बन रहेहैं। भारतीय राजनीति में ये हाल के बदलाव हैं, लेकिन बड़े बदलाव हैं। अपनी राजनीति,अपनी ख़बर, अपना मीडिया।
प. बंगाल में कुछ अखबारों पर लगी पाबंदी को बयान करता कार्टून

दक्षिणभारत में सघन दिखने वाला मीडिया-राजनीति का यह रूप धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहाहै। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में घोषणा की कि वो पार्टीकी तरफ़ से नया अख़बार और टीवी चैनल लॉन्च करेंगी। नाम तक उन्होंने जाहिर कर दिया।दैनिक पश्चिमबंग और पश्चिमबंग टीवी। इस नामकरण और घोषणा को एक ख़ास पृष्ठभूमि में ममताने पेश किया। उन्होंने पहले राज्य के सरकारी पुस्तकालयों में अंग्रेज़ी अख़बार सहितकुछ बड़े बांग्ला अख़बारों पर यह कहकर पाबंदी लगा दी कि वो राजनीतिक तौर पर पूर्वाग्रहीसमाचारपत्र हैं। फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि तृणमूल कांग्रेस के काम-काजोंको चूंकि ये अख़बार ठीक से जनता के बीच पेश नहीं कर पाते, इसलिए जनता तक बात पहुंचानेके लिहाज से वो मीडिया में हाथ आजमा रही हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसे कई मीडियासमूह हैं जिनपर तृणमूल कांग्रेस की अच्छी पकड़ है। आरपी ग्रुप के चैनल कोलकाता टीवीको तृणमूल कांग्रेस ने बेल-आउट के लिए संपर्क किया था। तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ सेराज्यसभा सांसद स्वपन सदन बोस यानी टुटू बोस संबाद प्रतिदिन नाम से अख़बार चलाते हैं।प्रतिदिन प्रकाशन के वो मालिक हैं। बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जो चैलन-10 चलातीहै वो तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हमेशा ख़बर चलाता है। इसके मालिक शांतनु घोष औरश्रीमति सुदेशना घोष तृणमूल के प्रति वफ़ादार हैं। इस वफ़ादारी की कहानी काफी पुरानीहै। सीपीएम के कब्जे में भी मीडिया है। आकाश बांग्ला और ज़ी न्यूज़ के साझा उपक्रमज़ी आकाश में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले अवीक दत्ता सीपीएम कार्यकर्ता हैं। वो सीपीएमके पत्र गणशक्ति के सहायक संपादक हैं और सीपीएम के छात्र नेता रह चुके हैं। अवीक दत्तान सिर्फ़ आकाश बांग्ला चलाते हैं बल्कि एक और टीवी चैनल 24 घंटा भी चलाते हैं।
अबतकरीबन हर राज्य में राजनीतिक पार्टियों के बीच मीडिया का बंटवारा हो रहा है। या तोखुद राजनेता ही मीडिया कारोबार में उतर जा रहे हैं या फिर संपादकों को राज्यसभा जानेकी उम्मीद जगाकर अपने पक्ष में कर ले रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार के मीडियापर प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू ने टिप्पणी की थी कि वहां का मीडियाआज़ाद नहीं है। जाहिर है जवाब सरकार को देना चाहिए, लेकिन झारखंड के एक बड़े अख़बार,जोकि बीते कुछ सालों से बिहार के बाज़ार में भी संभावना तलाश रहा है, ने काट्जू केबयान के विरोध में दो पेज का लेख छापा। अख़बार के प्रधान संपादक ने उसे लिखा था, जिनकेबारे में आजकल चर्चा गरम है कि वो जनता दल (यूनाइटेड) की तरफ़ से राज्यसभा आने की हरसंभवकोशिश में लगे हैं। झारखंड में मीडिया, राजनेता और कॉरपोरेट की भूमिका पर यहां चर्चाकरना बहुत मुफ़ीद नहीं है, लेकिन संक्षेप में यह बता दिया जाए कि झारखंड और बिहार सेनिकलने वाले प्रभात ख़बर की फादर कंपनी ऊषा मार्टिन खनन कारोबार में भी संलग्न है।जाहिर है राजनेताओं के साथ गठजोड़ उनकी ज़रूरत है। उसी राज्य से अनाधिकारिक तौर परयह ख़बर भी मिल रही है कि देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले हिंदी अख़बारों मेंसे एक ने जिंदल ग्रुप के साथ यह समझौता किया है कि वो जिंदल के पक्ष में अगले पांचसाल तक स्टोरी करेगा। बिहार के मीडिया में प्रकाश झा के पैसों की बहुत चर्चा है औरलोग जानते हैं कि प्रकाश झा का जनता दल (यू) के साथ क्या संबंध है।
वापसआंध्र प्रदेश चलते हैं। वहां जनाधार को विस्तार देने की खातिर हर बड़ी पार्टी ने अपना-अपनामीडिया खोल रखा है या यूं कहें कि हर मीडिया वाली राजनीतिक पार्टी बड़ी पार्टी बन गईहै। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव टी-न्यूज़ नाम से चैनल चलातेहैं। चंद्रशेखर राव तेलंगाना ब्रॉडकास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिकहैं और यही कंपनी टी-न्यूज़ चैनल की फादर कंपनी है। अलग तेलंगाना के मुद्दे को लेकरसबसे बड़े नेता के तौर पर चंद्रशेखर राव के उभार में उनकी पृथक पार्टी के साथ-साथ इसचैनल का भी बड़ा योगदान है। इस तरह साक्षी कोई अपवाद नहीं बल्कि वहां की राजनीति केलिए नियम है।
मीडियाबाज़ार की गुपचुप शैली में यह पता लगाना काफ़ी मुश्किल है कि किस कंपनी के साथ किसकाहित नत्थी है। साक्षी ने शुरुआत से ही लगातार यह इल्जाम लगाया कि इनाडु, रिलायंस औरटीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के बीच गठजोड़ है। इसी बीच इनाडु ने यह आधिकारिक घोषणा कीकि उषोदया इंटरप्राइजेज में 40 प्रतिशत शेयर ख़रीदने के साथ ही ईटीवी के 10 चैनलोंके सौ फ़ीसदी शेयर का मालिक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड हो गया है। सिर्फ तेलुगू ईटीवीऔर ईटीवी-2 पर रामोजी राव की पकड़ कायम रही, जहां वो 51 फ़ीसदी और रिलायंस 49 फ़ीसदीशेयर के मालिक हैं। इस तरह साक्षी के आरोप को बल मिला। साक्षी ने यह भी कहा कि नीमेशकंपानी के मार्फत रिलायंस ने उषोदया इंटरप्राइजेज में जो निवेश किया है वो इसलिए हैताकि केजी बेसिन मामले में रिलायंस को चंद्रबाबू नायडू का लाभ मिल सके। उस समय साक्षीने यह दावा किया कि खरीद-बिक्री का ये पूरा मामला फर्जीवाड़े पर आधारित है और अगर कोर्टमें मामला साबित हो गया तो रामोजी राव पर 7700 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लग सकता है।

मुकेश अम्बानी और नीमेश कम्पानी: मीडिया खेल के बाजीगर
लेकिनजानकारी, सूचना और आरोप-प्रत्यारोप का यह अद्भुत दौर है। इनाडु-रिलायंस के जिन रिश्तोंको जोड़-शोर से साक्षी ने उठाया उसका दूसरा सिरा पकड़ते हुए टीडीपी नेता रेवंत रेड्डीने दिसंबर 2011 में एक नया रहस्योद्घाटन किया। उनका आरोप है कि नीमेश कंपानी ने जगनमोहनरेड्डी के साक्षी मीडिया समूह में भी निवेश किया है। रेवंत का कहना है कि जेएम फाइनेंसिल्स,लैटिट्यूड और मर्केंटाइल प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष नीमेश कंपानी ने 27.65 करोड़रुपए मेटाफर रियल एस्टेट एंड प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में निवेश किया जोकि पटलूरी वाराप्रसाद की कंपनी है। रियल एस्टेट का धंधा करने वाले प्रसाद को वाईएस राजशेखर रेड्डीपरिवार का करीबी माना जाता है। तो कहानी यह है कि प्रसाद की कंपनी में 27.65 करोड़लगाने के एवज में नीमेश कंपानी ने प्रसाद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो जगति प्रकाशनमें कुछ निवेश करे और डील के मुताबिक प्रसाद ने बाद के दिनों में जगनमोहन रेड्डी केजगति प्रकाशन में 10 करोड़ रुपए का निवेश किया।
मीडियाअध्ययन में मीडियाटाइजेशन का सिद्धांत है जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह मीडियाआज की राजनीति को संचालित करता है। एजेंडा सेटिंग जैसे सिद्धांत से यह महत्वपूर्ण अर्थमें भिन्न है। एजेंडा सेटिंग सिर्फ यह बताता है कि मीडिया किसी देश में एक कम महत्वपूर्णमुद्दे को भी सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर स्थापित करने की शक्ति रखता है, लेकिन मीडियाटाइजेशनयह कहता है कि असल में राजनीति की दिशा और दशा दोनों को मोड़ने में आज का मीडिया बेहदमहत्वपूर्ण हो गया है। इस तरह अगर किसी राजनेता या पार्टी के पास मीडिया है तो वह विरोधीपार्टी से एक हाथ ऊपर है। इसमें राज्य मायने नहीं रखता। आंध्र प्रदेश हो चाहे तमिलनाडुया फिर पंजाब, मीडिया अपने असर के मामले में स्थान निरपेक्ष है। शिरोमणि अकाली दल केसुखबीर सिंह बादल सिर्फ पार्टी में मालिकाना भाव नहीं रखते बल्कि वो पंजाब के लोकप्रियटीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज़ के भी मालिक हैं। जी-नेक्स्ट मीडिया प्राइवेट लिमिटेडनाम की उनकी मीडिया कंपनी है। बीते दिनों संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में जब राजनीतिकप्रचार अभियान चल रहा था तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सहित अन्य कई नेताओं ने बादलपरिवार पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखाहै। पंजाब के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता में वापसीकी। शिरोमणि अकाली दल को बड़ी जीत हासिल हुई। कुछ-न-कुछ राहुल गांधी के आरोप में तोवजन होगा, कुछ-न-कुछ पीटीसी न्यूज़ का तो असर होगा!