महेंद्र कर्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महेंद्र कर्मा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

05 जून 2013

सबसे बड़े लोकतंत्र का आदिवासी महिलाओं के साथ सुलूक तो देखिए.


प्रियंका शर्मा
फोटो- दख़ल की दुनिया

एक सवाल-एक बात: 3                                                

माओवादियों के द्वारा छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुई कार्रवाई के बाद कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार बहस का विषय बने हुए हैं. इन्हीं सवालों पर बहस के लिए 'एक सवाल-एक बात' शीर्षक से कुछ कड़िया प्रस्तुत की जा रही हैं. बहस के लिए आप अपने सवाल और अपनी बात dakhalkiduniya@gmail.com पर भेज सकते हैं.


सरकार द्वारा घोषित माओवदी इलाकों में; जहां सलवा जुड़ुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसी (जनसंहारकारी) योजनाएं चलाई जा रही हैं, वहां सरकार आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा/असुरक्षा के विश्लेषण का कोई रिकॉर्ड नहीं रखती है. यह रिकॉर्ड शायद इसलिए भी नहीं मिलता क्योंकि इस ‘सलवा जुड़ुम’ को 'राज्य सुरक्षा और शान्ति' की ज़मीन में बनाया गया है, और किसी भी संविधान, न्याय या कानून के लिए राज्य का जिम्मा पहला है. इस राज्य सुरक्षा के आड़ में देश में जगह-जगह सैन्यीकरण हो रहा है. क्योंकि भारतीय राज्य भी पुरुषवादी है, इसलिए ऐसे राज्यों में महिलाओं को इसकी कीमत बहुत बड़े पैमाने पर चुकानी पड़ी है/चुका रही है. इन सैन्यीकृत जगहों में महिलाओं पर सैन्य हिंसा की घटनाएं जब-तब मीडिया में भी आती रहती हैं, लेकिन अगर आप चाहें कि महिलाओं की सुरक्षा और इंसाफ का कोई ठीक-ठीक लेखा जोखा मिल जाए तो बस अन्यायों और नाइंसाफी का घिनौना ब्यौरा ही मिलता है.
सलवा जुडुम चलाए गए दंड्यकारण्य के जंगलों बसे चेरली, कोत्रापाल, मनकेली, कर्रेमरका, मोसला, मुण्डेर, पदेड़ा, परालनार, पूंबाड़, गगनपल्ली, लोहंड़ीगुडा, जगदलपुर, कारकेली, बेलनार,तालमेटला आदि ऐसे गांव हैं जहां के लोगों को सैन्यीकरण के चलते उन्हें जीवन यापन के साधनों; जंगल और ज़मीन को खो देना पड़ा है, यहां तक कि उन्हें ‘लंडा’ जैसा मोटे अनाज तक से भी वंचित होना पड़ा है, उनके घर जला दिए गए, अनाज, रुपए, पशु वगैरह सब लूट लिए गए, घरों से विस्थापित किया गया. महिलाओं के सामूहिक बलात्कार, पिटाई और हत्याएं की गई हैं.
देशद्रोह के केस में बंद सोनी सोरी का जेल से लिखा वह प्रश्न (पत्र) किसी भी संवेदंशील और इंसाफ पसंद व्यक्ति को आज भी याद होगा, “मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने (एस.पी. अंकित गर्ग ने) से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी? हम औरतों पर ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।” सोनीसोरी तो उन कई सैकड़ों शोषित महिलाओं से थोड़ा अलग; शिक्षिका होने के करण, महिला संगठनों से संपर्क होने कारण और बड़ा जन समर्थन होने के कारण उन्होंने अंकित गर्ग के खिलाफ केस दर्ज करा पाईं और अपनी न्याय की उम्मीद बनाए रखी और 1 मई को इस मामले में उन्हें eएक केस में बरी भी कर दिया गया, लेकिन उन पर जेल में यौनिक हिंसा करने वाले (वर्तमान कानूनी परिभाषा में इसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं माना जाता) अंकित गर्ग के खिलाफ आखिर कुछ भी नहीं हुआ और वह न सिर्फ साफ बच गया बल्कि उसका प्रमोशन भी हुआ और उसे वीरता पुरस्कार भी मिला भरत सरकार की तरफ से. महिलाओं पर सलवा जुडुम, पुलिस और पैरामिलिट्री के जवानों की हिंसा और उत्पीड़न के सभी मामले थाने और कोर्ट तक नहीं पहुंच पाते. 
अभी पिछले 28 मई को माओवादी पार्टी की तरफ से जारी की गई एक विज्ञप्ति में आंकड़े दिए गए हैं कि सलवा जुड़ुम ने केवल दो सालों में ही स्थानीय गुंडा गिरोहों और पुलिस के जवानों के साथ मिलकर सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया. 99 महिलाओं के केस तो सिर्फ भारत के सर्वोच्च न्यालय में ही दर्ज हैं. महिलाओं के खिलाफ की गई हिंसा में ये तो सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के है और इनमें तमाम वो मामले जो बड़ी संख्या में हैं जो निचली अदालतों चल रहे हैं और कितनी बड़ी संख्या होगी जो किसी कोर्ट में शामिल नहीं हो पाए हैं. छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के शामसेट्टी गांव की वो घटना इसमे शामिल नहीं हो पाई हैं जिसमे 6 आदिवासी महिलाओं ने 2009 में सलवा जुड़ुम के कार्यकर्ताओं के खिलाफ सामूहिक बलात्कार की प्राथमिकी दर्ज कराई, मजिस्ट्रेट के सामने बयान भी दिया लेकिन 5 मार्च 2013 को उन्होंने और उनके परिवार वालों ने अपना मुकदमा वापस ले लिया. साथ ही इस गिनती में जिला न्यालयों और उच्च न्यायालयों में चल रही सुनवाई व पेशियां भी शामिल होने से बच गई हैं. भारत का कोई भी व्यक्ति वाकई में इन मामलों की संख्या का अंदाजा बहुत आसानी से लगा सकता है कि इन आदीवासी महिलाओं के साथ कितनी ज्यादतियां हुई होंगी क्योंकि भारत में अधिकतर मामलों में न्याय की लंबी, जटिल और बेहद खर्चीली प्रक्रिया के कारण खासकर महिलाओं सबंधित मामले या तो प्राथमिकी तक भी नहीं जा पाते या फिर जिला न्यालयों में ही सुलह कर/करवा लिए जाते हैं.
दो साल पहले ही हमारे विश्वविद्यालय (वर्धा) के दलित छात्र की बहन के साथ गांव में सवर्ण गुण्डों ने सामूहिक बलात्कार किया लेकिन पुलिस स्टेशन में मामले की एफ.आई.आर. 4-5 दिन के बाद स्थानीय लोगों और शहरी महिला संगठनों के संघर्ष व हस्तक्षेप के बाद ही दर्ज कराई जा सकी. समझा जा सकता है कि उस लड़की को न्याय की कितनी उम्मीद बची होगी और अंतत: क्या न्याय मिला होगा! फिर आदिवासियों के ये मामले तो पुलिस और राज्य पोषित सलवा जुड़ुम, सी.आर.पी.एफ के सैनिकों के ही खिलाफ़ आते हैं जिसे दर्ज़ कराने में लोगों को क्या करना नहीं करना पड़ता होगा! उत्पीड़ित महिलाएं तो ऐसे जीवन स्तर और जगह से आती हैं जिन्हें इन घटनाओं की शिकायत के लिए पुलिस स्टेशन और न्यायालय तक जाने के लिए ढ़ंग से सड़क तक उपलब्ध नहीं है, जिन्हें सिर्फ राशन पाने के लिए ही 20 से 50 कि.मी. तक भी पैदल चल के जाना पड़ता है. ऐसी स्थिति में पुलिस स्टेशन और न्यालय का चक्कर लगाने की बात असंभव ही लगती है. और इन सबके बावजूद अगर कोई हिम्मत भी करे ‘पुलिस-थाना, कचहरी-पेशी’ करने कि तो मामलों को तमाम तरीकों से दबा दिया जाता है. पिछले 5 मार्च को 6 आदीवासी महिलाओं द्वारा अपने आरोपों को वापस लेने वाले केस को भी कैसे भुलाया जा सकता है एक-दो नहीं बल्कि छ: महिलाओं और तीन गवाहों ने अपने आरोप बदल दिए. इसका जबाब आखिर किससे पास है कि इतनी मुश्किलों और संघर्ष से इन जटिलता भरी कोर्ट तक पहुंचने के बाद आखिर उनको पीछे क्यों हटना पड़ा? क्या मामला इतना सीधा था? जैसा कि अखबारों से पता चला?  
दंड्कारण्य के इन जंगलों में अधिकतर वही जनता रहती है जिसे भारत सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रखा है (हालांकि बड़ा सवाल यह भी है कि भारत सरकार इनको भारतीय जनता मानती भी हो!, क्योंकि ऐसा तो कोई सरकार अपनी जनता के साथ नहीं करती, क्योंकि 25 मई के हमले के बाद 1 कांग्रेसी नेता ने दंड्यकारण्य के इलाके को दूसरा पाकिस्तान कहा था, जिसको किसी भी मीडिया माध्यम ने असंवैधानिक या अनैतिक नहीं कहा) जो 26 रुपए का नीचे गुज़ारा करती है. ऐसे में ये आदिवासी महिलाएं शायद इन बलात्कारों, शोषण, लूट और हत्याओं को किसी बहुत ज्यादा भयानक प्राकृतिक आपदाएं मानकर भुलाने की कोशिश कर रही हों या हो सकता है उनके पास उपलब्ध सबसे आसान और ज़मीनी तरीका; जिसे गैर-कनूनी और बार-बार अलोकतांत्रिक कहा जाता है; अपना लिया हो, खुद ही हथियार उठा कर खत्म कर देने का सपना देख रही हों. ये वो महिलाएं भी हैं जिन्होंने माओवादी प्रभाव से पहले जमींदारों के अनगिनत जुल्म झेले हैं और वर्षों-वर्षों जो इन ज़मीदरों/फॉरेस्ट ऑफीसरों से बलात्कृत होती रहीं. लेकिन सलवा जुड़ुम इन्हीं कहरों की इम्तेहां की तरह गुज़रा है. इससे पहले कम से कम उनकी अपनी ज़मीन और जंगल उनके पास था, सलवा जुड़ुम ने जिन्हें उजाड़ दिया और खत्म भी कर दिया.
सलवा जुड़ुम की सेना भर्ती के लिए 18 साल से कम उम्र की न जाने कितनी लड़कियों को SPO (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) बना दिया गया. कैंप्स में महिलाओं के साथ शारीरिक हिंसा और शोषण के भी बहुत से मामले सामने आए. महिला एस.पी.ओ. को भी रात में थाने में रुकने का नियम था; सिर्फ खाना खाने के लिए ही घर जाने की छूट थी, पे-स्केल बहुत कम थी और कई महिलाओं को महीनों वेतन नहीं दिया जाता था. दिसंबर, 2006 में प्रकाशित हुई CAVOW (कमेटी अगेंस्ट वॉयलेंस ऑन वीमेन) की दांतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) में चलाए जा रहे सलवा जुड़ूम एरिया की फैक्ट फाइंडिंग के लिए गई टीम को शारीरिक हिंसा और शोषण की बाबत पूछने पर बताया गया कि “बलात्कार और शोषण के मामले होते हैं पर वो सामने नहीं आते. बासागुड़ा के मुरोदोंडा से दो लड़कियों को पुलिस स्टेशन ले जाकर उनके साथ बलात्कार किया गया. शराब पीना और पोर्न फिल्में देखना पुलिस थानों में लगातार होता है. यहां तक कि महिला एस.पी.ओ. को पुरुष पुलिस कर्मियों के कमरों के नज़दीक सोने के लिए कहा जाता है.” (CAVOW रिपोर्ट, पृ-15) दोर्णापाल कैम्प की 22 और नज़दीकी गांव में भी लगभग इतनी ही संख्या में महिलाओं को पुलिस, सी.आर.पी.एफ., नगा, मिज़ो जवानों ने गर्भवती बना दिया. भैरमगढ़ के रिलीफ कैम्प में एस.पी.ओ. और पैरामिलिटरी के जवानों ने महिलाओं का यौन शोषण किया और दस महिलाओं को गर्भवती बना दिया. (CAVOW रिपोर्ट, पृ.-33)
सलवा जुड़ूम के जवानों की गोलीबारी में कईयों की जान चली गई. और कई महिलाओं को गैर-कनूनी ढ़ंग से जेल में बंद किया गया है. बेलनार गांव की सुदरी, फुलमती, श्यामवती को एस.पी.ओ. की गोलियां खेत में काम करते समय लगी और फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया. कोर्ट में दो पेशियों के बाद भी उन्हें नहीं बताया गया कि उन पर क्या मुकदमा चल रहा है. नक्सलवाद के नाम पर महिलाओं की कई महीनों तक जेल में रखने पर भी पेशी नहीं की जाती और न ही घर वालों को मिलने की इज़ाजत दी जाती है. पिछली 1 मई को 16 साथियों के साथ सोनी सोरी के दोषमुक्त होने पर दांतेवाड़ा के सीनियर वकील अशोक जैन कहते हैं कि ‘इससे बात साफ होती है कि आदिवासियों को कैसे झूठे ममलों में फंसाया जा रहा है जबकि इनके ऐसे लगभग 90 प्रतिशत मामले झूठे होते हैं.’(सुबोजितबागची*) सलवा जुड़ुम के गुंडों ने और सी.आर.पी.एफ. के जवानों ने सोनिया, इतवारिन पोतइ और पल्लीवाया गांव के DKAMS के नेता की पत्नी ओय्यम बाली के कपड़े उतारे, यौनिक हिंसा की और कई दूसरी महिलाओं को नक्सल समर्थक कहकर बेरहमी से पीटा. कोर्तापाल गांव की पूनियम, बूदरी मिदियम, सुख्खी, और मंगली पुडियम को SJ जवानों ने राशन की दुकान जाने पर पीटा. वेछम गांव की कंदली पांडे के साथ महेंद्र कर्मा की अगुवाई में SJ और पुलिस जवानों ने बलात्कार किया.कर्र्ले बेरला गांव की माधवी सविता, तीलम जमली को SJ और नगा के सैन्य बलों ने थाने ले जाकर 1 हफ्ते तक सामूहिक बलात्कार किया. जंग्ला गांव की काल्मु जय्यु, कोरसा मुन्नी और कोरसा बुटकी, कोरतापाल की 6 महिलाओं का सामूहिक बलात्कार SJ और पुलिस कर्मियों ने किया. पोतेनार की कुंजमलख्खा का रेप करके SJ लीडर विक्रम माधवी के घर पर हफ्तों रखा गया. इदवाड़ा की लख्खे के साथ एस.पी.ओ. के 15 लोगों ने रेप किया फिर बेडरे के सी.आर.पी.एफ. कैम्प में रखकर दोबारा शोषण किया. नंगूर गांव की जैनी को रामा और जोगल (एस.पी.ओ.) ने गांव से अगवा कर रेप किया और फिर उन्हें भीबेडरे के सी.आर.पी.एफ. कैम्प में रखकर दोबारा शोषित किया गया. इंगमेत्ता की 3 और लंका की 2 महिलाओं को बेडरे के सी.आर.पी.एफ. कैम्प में शारीरिक शोषण के लिए रखा गया. पहले SJ और NAGA के सैन्य बलों फिर CRPF कैम्प्स में महिलाओं को जबरदस्ती रखकर सामूहिक बलात्कार और दमन की ये लिस्ट और भी बहुत लंबी है. 
सलवा जुड़ुम और सी.आर.पी.एफ. कैम्प्स में सैकड़ों आदिवासी महिलाएं सामूहिक बलात्कार सहित दूसरे किस्म की यौनिक हिंसा की शिकार हुईं, अनगिनत महिलाओं के साथ-साथ मार-पीट, शोषण और लूटने की घटनाओं को अंजाम दिया गया. जिनमें से अधिकतर मामलों की पुलिस थानों में एफ.आई.आर. तक दर्ज नहीं की गई. बहुत सी आदिवासी महिलाएं एस.पी.ओ. या फोर्स की बंदूकों से मारी गईं और बहुत सी गुमनाम की सूची में चली गई.    
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रवक्ताओं के अनुसार शोषित महिलाओं की संख्या कोर्ट में संख्या से कहीं बहुत ज्यादा है. जिसे अभी तक न तो पीड़ितों को इंसाफ मिल सका है और न ही डॉक्यूमेंटेड किया जा सका है. अपनी किताब ‘उसका नाम वासु नहीं’ में दंड्यकारण्य के माओवादी इलाकों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सुभ्रांशु चौधरी ने बताया है कि उनका परिचय कई लड़कियों और महिलाओं से हुआ जिनके साथ 2005 में सलवा जुड़ूम के सैनिकों ने बलात्कार किया और उनके घर जला दिए. (पृ.54) और इस सभी मामलों को जांचने का कोई ठीक-ठीक कोई और तरीका नहीं हैं सिवाय इसके आप बरसों-बरस पत्रकारिता करते रहिए. पुलिस, प्रशासन और जंगलों में गहरे जाकर बसे लोगों के बीच; तब कहीं कभी-कभी इन घटनाओं की पुष्टि टुकड़ों-टुकड़ों में होती रहे.
आदिवासियों के शोषण और उत्पीड़न के इतने केस पुलिस, प्रशासन और कोर्ट के संज्ञान में आने के बावजूद और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुड़ुम को गैर संवैधानिक घोषित किए जाने बाद भी सलवा जुडुम को बंद या खत्म नहीं किया गया. पिछले साल तक झारखण्ड पुलिस ने गैर-कानूनी रूप से 3400 एस.पी.ओ. हथियार बंद नियुक्ति बरकरार रखी है. दांतेवाड़ा में भी लगभग 12000 एस.पी.ओ. भर्ती रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सी.आर.पी.एफ. और पुलिस के जवानों के जुल्म से आदिवासी महिलाएं मुक्त नहीं हो पाई हैं. 14 मार्च 2011 को दांतेवाड़ा में 300 घर जलाने के साथ सी.आर.पी.एफ. के जवानों ने 5 महिलाओं के साथ बलात्कार किया. 23 अक्टूबर 2012 को रांची जिला के डूंगराढ़ीह गांव की शुखरी के साथ पांच एस.पी.ओ. जवानों ने मिलकर बलात्कार किया.  
एक सरल अभिव्यक्ति अब तक लोकतंत्र का मतलब इंसाफ और बराबरी का राज, और नागरिकों की हर तरह सुरक्षा समझा गया है. लेकिन हमारे देश में इसके जिम्मेदार सरकारें शायद लोकतंत्र का यह अर्थ नहीं समझ पाई हैं और न ही उसे जनता तक ठीक-ठीक पहुचाने की कोशिश की है. भारत सरकार की नज़रों के सामने ही राज्य पोषित ऐसे गैर संवैधानिक हिंसा, शोषण और नाइंसाफी की कभी खत्म न होती श्रृंखला है और शायद इसी की वजह से ही शायद अधिकांश आदिवासी महिलाओं को माओवाद का रास्ता ही ठीक लगा है और सैकड़ों महिलाएं माओवादी पार्टी की सदस्य बन गईं. माओवादी पार्टी के प्रमुख नेता ‘कोसा’ कहते हैं कि अब पार्टी में 40-60% महिलाएं सदस्य हैं. ज़मीन के मुद्दों के बाद महिलाओं के मुद्दे ही पार्टी के लिए मुख्य हैं.... KAMS में लाख से अधिक महिलाएं हैं; दंड्यकारण्य में आदीवासी आंदोलन महिलाओं के बल पर चल रहा है. (सुभ्रांशु चौधरी, पृ.67) हालांकि माओवादी होने में भी जीवन शैली सरल नहीं है, सिर पर बिना छत महीनों चलते रहना और हर स्थिति में लड़ने को तैयार रहना जीवन के लिए एक मुश्किल चुनौती है. लेकिन उनके पास यह सिर्फ विकल्प ही नहीं, बल्कि राज्य की बनाई हुई स्थिति भी है. और यह सलवा जुड़ुम या ऑपरेशन ग्रीन हंट के विपरीत माओवाद का चुनाव महिलाओं की पुरुषवादी राज्य से विद्रोह का कदम भी है. इसीलिए यह भी कहा जा सकता है कि महिलाएं अधिक समता वाले कम पितृसत्तात्मक संरचना का निर्माण कर रहीं हैं.

प्रियंका शर्मा, पाण्डेचेरी विश्वविद्यालय में शोध कर रही हैं, उनसे sharrma.priyanka3@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

01 जून 2013

तो स्वतंत्रता संग्राम आतंकवादियों का संग्राम था?

एक सवाल-एक बात: 1

माओवादियों के द्वारा छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुई कार्रवाई के बाद कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार बहस का विषय बने हुए हैं. इन्हीं सवालों पर बहस के लिए 'एक सवाल-एक बात' शीर्षक से कुछ कड़िया प्रस्तुत की जा रही हैं. बहस के लिए आप अपने सवाल और अपनी बात dakhalkiduniya@gmail.com पर भेज सकते हैं.    

फोटो- दख़ल की दुनिया
47 के पहले यह शायद ठीक-ठीक रहा होगा पर उसके बाद यह ज्यादा गुलाम हुआ. ऐसा हम पुरानी किताबों के सहारे देख पाते हैं. यह हमारा ज़ेहन है. आवाम की ज़ेहनियत गुलाम की ज़ेहनियत बन गई. यह बात एक निर्णय जैसी है जिसकी सुनवाई अभी बाकी है. यह बात पिछले दिनों माओवादियों द्वारा छत्तीसगढ़ में हुई कार्यवाही के संदर्भ में है. जिसे लोकतंत्र पर हमला कहा जाने लगा. संसद पर जब हमला हुआ था तब भी ऐसा ही कहा गया था. सरकारी संस्थानों पर जब भी हमले हुए वे लोकतंत्र पर हमले के रूप में प्रचारित किए गए. सरकारें क्या लोकतंत्र होती हैं या उनके संस्थान लोकतंत्र होते हैं? लोकतंत्र शुरुआती दौर से ही एक मूल्य के रूप में स्थापित हुआ, जो कई व्यवस्थाओं को आधार प्रदान करता है. व्यवस्थाएं सरकारों को आधार देती हैं और सरकार संस्थानों को. इसलिए जब किसी संस्थान और पार्टी पर हमले को लोकतंत्र पर हमला कहा जाता है तो उस सरकार या व्यवस्था के आलोचना की गुंजाइश को वे खत्म कर देते हैं. क्योंकि जो यह बोल रहे होते हैं इस व्यवस्था के दायरे में उन्हें वे सुविधाएं मुहैया है और उनके अस्तित्व इसके साथ ही टिके होते हैं. यह उस भोंपू की बात है जो दमनकारी सरकार की जीभ को अपने चोंगे में भरकर जिंदा रहते हैं, आप उन्हें अखबार, टी.वी. कुछ भी कहें. इन पार्टियों, संस्थानों में उनके द्वारा, दो सौ साल पहले लोकतंत्र के नारे में जो मूल्य था उसे पाया हुआ सा मान लिया जाता है. यह समय का अवसरवाद है जो इस तरह के दुस्प्रचार को हवा देता है. जबकि इसके ठीक उलट वे रोज लड़ते हुए दिखते हैं कि असमानता की खाईं गहरी होती जा रही है. एक झूठी लड़ाई को वे लगातार जिंदा रखते हैं, एक से फारिग होकर दूसरे के कंधे पर जा टिकते हैं. फिर सवाल उठता है कि लोकतंत्र के उन मूल्यों को पाने की प्रक्रिया में क्या यह व्यवस्था काम कर रही है. सन्‍ 47 के बाद यह गुलामी शुरू हुई जिसने आवाम के ज़ेहन को सरकारी बना दिया और सरकारी संस्थानों पर हमले, लोकतंत्र पर हमले कहे जाने लगे. इसके पहले सरकार और उसके संस्थानों पर बस्तर में व्यापक हमले हुए और उसे स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का हिस्सा माना गया. एक आदिवासी के लिए क्या सन्‍ सैतालिस वैसा ही था जैसा अन्य के लिए. सन्‍ सैतालिस किसके लिए कैसा था. यह एक बरस था जब लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए थी… पर. बस्तर और पूरे दंडकारण्य के लिए क्या सत्ता के हस्तांतरण से कोई फर्क पड़ा. दरअसल अंग्रेजों ने जिस मुहिम की शुरुआत की थी भारतीय राज्य ने आदिवासी इलाकों में उसे विस्तार देने का ही काम किया. अगर अंग्रेजों के जमाने में वह गुलाम बनाए जाने की प्रक्रिया थी तो यह रंग बदले हुए प्रशासकों द्वारा गुलाम बनाए जाने की ही प्रक्रिया है. अंग्रेजों ने उनके गांवों और जमीनों को चिन्हित भर किया था और भारतीय राज्य उसे बेचने पर आमादा है. वे आदिवासियों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं और मुख्यधारा कहते हुए एक ऐसे पवित्रता का बोध जोड़ा जाता है जहाँ सबको समनता दे दी गई हो. मुख्यधारा क्या लोकतंत्र है, मुख्यधारा में क्या वह गुंजाइश है जहां एक आदिवासी अपने जीवनशैली के साथ जीने का हक पा सके? यह ऐतिहासिकता का सच है कि विविधताएं समुदायगत रूप में यहाँ बनी और उन विविधताओं ने भिन्न व्यवस्थाओं को निर्मित किया. प्रतिकार इसलिए है क्योंकि एकरूपी व्यवस्था सब पर लागू नहीं की जा सकती. ऐसे में यदि अंग्रेजों के साथ जैसा सलूक दंडकारण्य के आदिवासियों ने 1910 में या उससे पहले के विद्रोहों में किया वैसा ही सलूक भारतीय राज्य के साथ करना क्या इसलिए ज्यादती माना लिया जाए क्योंकि यह स्थानीय शासकों (भारतीय राज्य) का सलूक है? यह सोचना बेहद मुश्किल है. गैर आदिवासियों के द्वारा विकास के जो माडल खड़े किए गए हैं यदि आदिवासी समुदाय उन्हें स्वीकार नहीं करते तो यह प्रतिकार उनको स्वीकार नहीं होता. यह 47 के पहले की अंग्रेजीयत है जिसे गैर आदिवासी समुदाय आदिवासियों पर थोपना चाहते हैं. यदि वे इसे स्वीकार न करें तो वे आतंकवादी हैं और यदि उनसे जबरन स्वीकार करवाया जाए, उन पर हमले कर उन्हें विस्थापित होने को मजबूर किया जाए और वे प्रतिकार करें, हमले के खिलाफ कार्यवाही करें तो यह लोकतंत्र पर हमला माना जाए. यदि यह सब आतंकवाद है तो स्वतंत्रता संग्राम आतंकवादियों का संग्राम था. क्योंकि गैर समुदायों के द्वारा शासन को पसंद न किए जाने और उसके खिलाफ वह एक स्व शासन की ही लड़ाई थी. इसलिए एक बड़े वर्ग की मानसिकता 47 के बाद उस गुलामी की मानसिकता है जो भिन्न-भिन्न समुदायों, राष्ट्रीयताओं को अपनी गुलामी में रखना चाहती है. वह खुद के वर्चस्व और एक विनाशकारी व्यवस्था के लिए सिर्फ सहमति चाहती है, असहमति नहीं. जहाँ असहमति के लिए जगह न हो वह लोकतंत्र नहीं हो सकता. जहां भिन्न समुदायों को उनकी जीवनशैली के साथ जीने का हक न हो और दमन के साथ सब कुछ थोपा जा रहा हो उसे सहन करना और जीना मानवीय गरिमा के विरुद्ध है. 

28 मई 2013

माओवादियों द्वारा प्रेस को भेजी गई विज्ञप्ति

 पिछले तीन दिनों से छत्तीसगढ़ में माओवादियों द्वारा की गई कार्यवाही पर लगातार सोसल साइटों पर और टी.वी. अखबारों के जरिए बहस चल रही है. इस हमले को लेकर माओवादियों ने एक ऑडियो जारी किया है जिसके कुछ विन्दुओं को बीबीसी के छत्तीसगढ़ संवादाता ने बीबीसी की हिन्दी साइट पर खबर के रूप में प्रस्तुत किया है. मेल के जरिए प्राप्त प्रेसविज्ञप्ति को यहाँ बिना किसी काट छांट के प्रस्तुत किया जा रहा है. 


25 मई 2013 को जन मुक्ति गुरिल्ला सेना की एक टुकड़ी ने कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं के 20 गाड़ियों के काफिले पर भारी हमला कर बस्तर की उत्पीड़ित जनता का जानी दुश्मन महेन्द्र कर्मा, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कुल कम से कम 27 कांग्रेसी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस बलों का सफाया कर दिया। यह हमला उस समय किया गया था जब आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस के दिग्गज नेता ‘परिवर्तन यात्रा’ चला रहे थे। इस कार्रवाई में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल समेत कम से कम 30 लोग घायल हो गए। इस ऐतिहासिक हमले में उत्पीड़क, हत्यारा, बलात्कारी, लुटेरा और भ्रष्टाचारी के रूप में बदनाम महेन्द्र कर्मा के कुत्ते की मौत मारे जाने से समूचे बस्तर क्षेत्र में जश्न का माहौल बन गया। पूर्व में गृहमंत्री के रूप में काम करने वाला नंदकुमार पटेल जनता पर दमनचक्र चलाने में आगे ही रहा था। उसके समय में ही बस्तर क्षेत्र में पहली बार अर्द्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) की तैनाती की गई थी। यह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं कि लम्बे समय तक केन्द्रीय मंत्रीमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालयों को संभालने वाला वी.सी. शुक्ल भी जनता का दुश्मन है जिसने साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और जमींदारों के वफादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियों को बनाने और लागू करने में सक्रिय भागीदारी ली। इस हमले का लक्ष्य मुख्य रूप से महेन्द्र कर्मा तथा कुछ अन्य प्रतिक्रियावादी कांग्रेस नेताओं का खात्मा करना था। हालांकि इस भारी हमले में जब हमारे गुरिल्ला बलों और सशस्त्र पुलिस बलों के बीच लगभग दो घण्टों तक भीषण गोलीबारी हुई थी उसमें फंसकर कुछ निर्दोष लोगों और निचले स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं, जो हमारे दुश्मन नहीं थे, की जानें भी गईं। इनकी मृत्यु पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी खेद प्रकट करती है और उनके शोकसंतप्त परिवारजनों के प्रति संवेदना प्रकट करती है।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस हमले की पूर्ण जिम्मेदारी लेती है। इस बहादुराना हमले का नेतृत्व करने वाले पीएलजीए के कमाण्डरों, हमले को सफल बनाने वाले वीरयोद्धाओं, इसे सफल बनाने में प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग देने वाली जनता और समूची बस्तरिया क्रांतिकारी जनता का दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस मौके पर क्रांतिकारी अभिनंदन करती है। इस वीरतापूर्ण हमले से यह सच्चाई फिर एक बार साबित हो गई कि जनता पर अमानवीय हिंसा, जुल्म और कत्लेआम करने वाले फासीवादियों को जनता कभी माफ नहीं करेगी, चाहे वे कितने बड़े तीसमारखां भी क्यों न हो आखिर जनता के हाथों सजा भुगतनी ही होगी।
आदिवासी नेता कहलाने वाले महेन्द्र कर्मा का ताल्लुक दरअसल एक सामंती मांझी परिवार से रहा। इसका दादा मासा कर्मा था और बाप बोड्डा मांझी था जो अपने समय में जनता के उत्पीड़क और विदेशी शासकों के गुर्गे रहे थे। इसके दादा के जमाने में नवब्याहाता लड़कियों को उसके घर पर भेजने का रिवाज रहा। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका खानदान कितना कुख्यात था। इनका परिवार पूरा बड़े भूस्वामी होने के साथ-साथ आदिवासियों का अमानवीय शोषक व उत्पीड़क रहा। महेन्द्र कर्मा की राजनीतिक जिंदगी की शुरूआत 1975 में एआईएसएफ के सदस्य के रूप में हुई थी जब वह वकालत की पढ़ाई कर रहा था। 1978 में पहली बार भाकपा की तरफ से विधायक बना था। बाद में 1981 में जब उसे भाकपा की टिकट नहीं मिली थी तो कांग्रेस में चला गया। बीच में जब कांग्रेस में फूट पड़ी थी तो वह माधवराव सिंधिया द्वारा बनाई गई पार्टी में शामिल होकर 1996 में लोकसभा सदस्य बना था। बाद में फिर कांग्रेस में आ गया। 1996 मेें बस्तर में छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग से एक बड़ा आंदोलन चला था। हालांकि उस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से भाकपा ने किया था, उस समय की हमारी पार्टी भाकपा (माले) (पीपुल्सवार) ने भी उसमें सक्रिय रूप से भाग लेकर जनता को बड़े पैमाने पर गोलबंद किया था। लेकिन महेन्द्र कर्मा ने बाहर के इलाकों से आकर बस्तर में डेरा जमाकर करोड़पति बने स्वार्थी शहरी व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए उस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था। इस तरह उसी समय उसके आदिवासी विरोधी व दलाल चरित्र को जनता ने साफ पहचाना था। 1980 के दशक से ही बस्तर के बड़े व्यापारी व पूंजीपति वर्गों से उसके सम्बन्ध मजबूत हुए थे।
उसके बाद 1999 में ‘मालिक मकबूजा’ के नाम से चर्चित एक घोटाले में कर्मा का नाम आया था। 1992-96 के बीच उसने लगभग 56 गांवों में फर्जीवाड़े आदिवासियों की जमीनों को सस्ते में खरीदकर, राजस्व व वन अधिकारियों से सांठगांठ कर उन जमीनों के अंदर मौजूद बेशकीमती पेड़ों को कटवाया था। चोर व्यापारियों को लकड़ी बेचकर महेन्द्र कर्मा ने करोड़ों रुपए कमा लिए थे, इस बात का खुलासा लोकायुक्त की रिपोर्ट से हुआ था। हालांकि इस पर सीबीआई जांच का आदेश भी हुआ था लेकिन सहज ही दोषियों को सजा नहीं हुई।
दलाल पूंजीपतियों और बस्तर के बड़े व्यापारियों के प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस की ओर से चुनाव जीतने के बाद महेन्द्र कर्मा को अविभाजित मध्यप्रदेश शासन मेें जेल मंत्री और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद उद्योग मंत्री बनाया गया था। उस समय सरकार ने नगरनार में रोमेल्ट/एनएमडीसी द्वारा प्रस्तावित इस्पात संयंत्र के निर्माण के लिए जबरिया जमीन अधिग्रहण किया था। स्थानीय जनता ने अपनी जमीनें देने से इनकार करते हुए आंदोलन छेड़ दिया जबकि महेन्द्र कर्मा ने जन विरोधी रवैया अपनाया था। तीखे दमन का प्रयोग कर, जनता के साथ मारपीटकर, फर्जी केसों में जेलों में कैद कर आखिर में जमीनें बलपूर्वक छीन ली गईं जिसमें कर्मा की मुख्य भूमिका रही। नगरनार में जमीनें गंवाने वाली जनता को आज तक न तो मुआवजा मिला, न ही रोजगार मिला जैसे कि सरकार ने वादा किया था। वो सब तितर-बितर हो गए।
क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति महेन्द्र कर्मा शुरू से ही कट्टर दुश्मन रहा। ठेठ सामंती परिवार में पैदा होना और बड़े व्यापारी/पूंजीपति वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में ‘बड़ा’ होना ही इसका कारण है। क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ 1990-91 में पहला जन जागरण अभियान चलाया गया था। इसमें संशोधनवादी भाकपा ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। इस प्रति-क्रांतिकारी व जन विरोधी अभियान में कर्मा और उसके कई रिश्तेदारों ने, जो भूस्वामी थे, सक्रिय भाग लिया था। 1997-98 के दूसरे जन जागरण अभियान की महेन्द्र कर्मा ने खुद अगुवाई की थी। उसके गृहग्राम फरसपाल और उसके आसपास के गांवों में शुरू हुआ यह अभियान भैरमगढ़ और कुटरू इलाकों में भी पहुंच चुका था। सैकड़ों लोगों को पकड़कर, मारपीट करके जेल भेज दिया गया था। लूटपाट और घरों में आग लगाने की घटनाएं हुईं। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। हालांकि हमारी पार्टी और जन संगठनों के नेतृत्व में जनता ने एकजुट होकर इस हमले का जोरदार मुकाबला किया। इससे कम समय के अंदर ही वह अभियान परास्त हो गया था।
उसके बाद क्रांतिकारी आंदोलन और ज्यादा संगठित हो गया। कई इलाकों में सामंतवाद-विरोधी संघर्ष तेज हो गए। इसके तहत हुए जन प्रतिरोध में महेन्द्र कर्मा के सगे भाई जमींदार पोदिया पटेल समेत कुछ नजदीकी रिश्तेदार मारे गए थे। गांव-गांव में सामंती ताकतों व दुष्ट मुखियाओं की सत्ता को उखाड़ फेंककर क्रांतिकारी जन राजसत्ता के अंगों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। गांवों में जन विरोधी व सामंती तत्वों से जमीनें छीनकर जनता में बंटवारा करना, अतीत में जारी कबीले के मुखियाओं द्वारा नाजायज जुर्माने वसूले जाने की पद्धति को बंद कर जनता का जनवादी शासन को शुरू करना कट्टर सामंती अहंकार से सराबोर महेन्द्र कर्मा को बिल्कुल रास नहीं आया। महिलाओं की जबरिया शादियां करवाने पर रोक, बहुपत्नीत्व आदि रिवाजों को हतोत्साहित करना आदि प्रगतिशील बदलाव भी सामंती ताकतों के गले नहीं उतरे। उसी समय बस्तर क्षेत्र में भारी परियोजनाएं शुरू कर यहां की जनता को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर यहां की प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करने की मंशा से उतरे टाटा, एस्सार जैसे कार्पोरेट घरानों के लिए भी यहां का विकासशील क्रांतिकारी आंदोलन आंखों की किरकिरी बना था। इसलिए उन्होंने सहज ही महेन्द्र कर्मा जैसी प्रतिक्रांतिकारी ताकतों से सांठगांठ कर ली। उन्हें करोड़ों रुपए की दलाली खिला दी ताकि अपनी मनमानी लूटखसोट के लिए माकूल माहौल बनाया जा सके। दूसरी ओर, देश भर में सच्चे क्रांतिकारी संगठनों के बीच हुए विलय के बाद एक संगठित पार्टी के रूप में भाकपा (माओवादी) के आविर्भाव की पृष्ठभूमि में उसे कुचल देने के लिए शोषक शासक वर्गों ने अपने साम्राज्यवादी आकाओं के इशारों पर प्रतिक्रांतिकारी हमला तेज कर दिया। अपनी एलआईसी नीति के तहत महेन्द्र कर्मा जैसी कट्टर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को आगे करते हुए एक फासीवादी हमले की साजिश रचाई। इस तरह, कांग्रेस और भाजपा की सांठगांठ से एक बर्बरतापूर्ण हमला शुरू कर दिया गया जिसे ‘सलवा जुडुम’ नाम दिया गया। रमन सिंह और महेन्द्र कर्मा के बीच कितना बढ़िया तालमेल रहा इसे समझने के लिए एक तथ्य काफी है कि मीडिया में कर्मा को रमन मंत्रीमण्डल का ‘सोलहवां मंत्री’ कहा जाने लगा था। सोयम मूका, रामभुवन कुशवाहा, अजयसिंह, विक्रम मण्डावी, गन्नू पटेल, मधुकरराव, गोटा चिन्ना, आदि महेन्द्र कर्मा के करीबी और रिश्तेदार सलवा जुडूम के अहम नेता बनकर उभरे थे। साथ ही, उसके बेटे और अन्य करीबी रिश्तेदार सरपंच पद से लेकर जिला पंचायत तक के सभी स्थानीय पदों पर कब्जा करके गुण्डागर्दी वाली राजनीति करते हुए, सरकारी पैसों का बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करते हुए कार्पोरेट कम्पनियों और बड़े व्यापारियों का हित पोषण कर रहे हैं।
और सलवा जुडूम ने बस्तर के जन जीवन में जो तबाही मचाई और जो क्रूरता बरती उसकी तुलना में इतिहास में बहुत कम उदाहरण मिलेंगे। कुल एक हजार से ज्यादा लोगों की हत्या कर, 640 गांवों को कब्रगाह में तब्दील कर, हजारों घरों को लूट कर, मुर्गों, बकरों, सुअरों आदि को खाकर और लूटकर, दो लाख से ज्यादा लोगों को विस्थापित कर, 50 हजार से ज्यादा लोगों को बलपूर्वक ‘राहत’ शिविरों में घसीटकर सलवा जुडूम जनता के लिए अभिशाप बना था। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। कई महिलाओं की बलाात्कार के बाद हत्या कर दी गई। कई जगहों पर सामूहिक हत्याकाण्ड किए गए। हत्या के 500, बलात्कार के 99 और घर जलाने के 103 मामले सर्वोच्च अदालत में दर्ज हैं तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन अपराधों की वास्तविक संख्या कितनी ज्यादा होगी। सलवा जुडूम के गुण्डा गिरोहों, खासकर पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों, नगा और मिज़ो बटालियनों ने जनता पर जो कहर बरपाया और जो जुल्म किए उसकी कोई सीमा नहीं रही। ऐसी कई घटनाएं हुईं जिसमें लोगों को निर्ममता के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर नदियों में फेंक दिया गया। चेरली, कोत्रापाल, मनकेली, कर्रेमरका, मोसला, मुण्डेर, पदेड़ा, परालनार, पूंबाड़, गगनपल्ली... ऐसे कई गांवों में लोगों की सामूहिक रूप से हत्याएं की गईं। सैकड़ों आदिवासी युवकों को एसपीओ बनाकर उन्हें कट्टर अपराधियों में तब्दील कर दिया गया। महेन्द्र कर्मा ने खुद कई गांवों में सभाओं और पदयात्राओं के नाम से हमलों की अगुवाई की। कई महिलाओं पर अपने पशु बलों को उकसाकर बलात्कार करवाने की दरिंदगी भरे उसके इतिहास को कोई भुला नहीं सकता। जो गांव समर्पण नहीं करता उसे जलाकर राख कर देने, जो पकड़ में आता है उसे अमानवीय यातनाएं देने और हत्या करने की कई घटनाओं में कर्मा ने खुद भाग लिया था। इस तरह महेन्द्र कर्मा बस्तर की जनता के दिलोदिमाग में एक अमानुष हत्यारा, बलात्कारी, डकैत और बड़े पूंजीपतियों के वफादार दलाल के रूप में अंकित हुआ था। पूरे बस्तर में जनता कई सालों से हमारी पार्टी और पीएलजीए से मांग करती रही कि उसे दण्डित किया जाए। कई लोग उसका सफाया करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आए थे। कुछ कोशिशें हुई भी थीं लेकिन छोटी-छोटी गलतियों और अन्य कारणों से वह बचता रहा। आखिरकार, कल, जनता के सक्रिय सहयोग से किए गए इस बहादुराना हमले में हमारी पीएलजीए ने महेन्द्र कर्मा का सफाया कर बस्तर की जनता को बेहद राहत पहुंचाई।
इस कार्रवाई के जरिए हमने उन एक हजार से ज्यादा आदिवासियों की ओर से बदला ले लिया जिनकी सलवा जुडूम के गुण्डों और सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों हत्या हुई थी। हम उन सैकड़ों मां-बहनों की ओर से बदला ले लिया जो बेहद अमावीय हिंसा, अपमान और अत्याचारों का शिकार हुई थीं। हम उन हजारों बस्तरवासियों की ओर से बदला ले लिया जो अपने घरों, मवेशियों, मुर्गों-बकरों, गंजी-बर्तनों, कपड़ों, अनाज, फसलों... सब कुछ गंवाकर ठहरने की छांव तक छिन जाने से घोर बदहाली झेलने पर मजबूर कर दिए गए थे। घरबार गंवाकर, टिककर रहने तक की जगह के अभाव में, इस अनभिज्ञता से कि अपने प्रियजनों में कौन जिंदा बचा है और कौन खत्म हो गया, बदहवास तितर-बितर हुए तमाम लोगों के गुस्से और आवेश को एक न्यायोचित और आवश्यक अभिव्यक्ति देते हुए हमने महेन्द्र कर्मा का सफाया कर दिया।
इस हमले के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह... सभी ने इसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह आह्वान किया कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सबको मिलजुलकर नक्सलवाद और आतंकवाद का मुकाबला करना चाहिए। हम पूछते हैं कि क्या शोषक वर्गों के इन पालतू कुत्तों को लोकतंत्र का नाम तक लेने की नैतिक योग्यता है। अभी-अभी, 17 मई को बीजापुर जिले के एड़समेट्टा गांव में तीन मासूमों समेत आठ लोगों की जब पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों ने हत्या की तब क्या इनको ‘लोकतंत्र’ की याद नहीं आई? जिस काण्ड को खुद कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को भी मजबूरन ‘नरसंहार’ बताना पड़ा था, उस पर इन नेताओं के मुंह पर ताले क्यों लग गए थे? 1 मई को नारायणपुर जिले के मड़ोहनार गांव के फूलसिंह और जयसिंह नामक दो आदिवासी भाइयों को पुलिस थाना बुलाकर हरी वद्रियां पहनाकर गोली मारकर जब ‘मुठभेड़’ की घोषणा की गई थी तब क्या इनका ‘लोकतंत्र’ खुश था? 20-23 जनवरी के बीच बीजापुर जिले के पिड़िया और दोड्डि तुमनार गांवों पर हमले कर 20 घरों में आग लगाकर, जनता द्वारा संचालित स्कूल तक को जला देने पर क्या इनका ‘लोकतंत्र’ फलता-फूलता रहा? 6-9 फरवरी के बीच अबूझमाड़ कहलाने वाले बेहद पिछड़े आदिवासी इलाके के गरीब माड़िया लोगों का गांव गट्टाकाल पर जब सरकारी सशस्त्र बलों ने हमला कर, घरों को लूटकर, जनता के साथ मारपीट कर, गांव में क्रांतिकारी जनताना सरकार द्वारा संचालित स्कूल को जलाकर राख कर दिया था तब इनका ‘लोकतंत्र’ क्या कर रहा था? आज से ठीक 11 महीने पहले 28 जून 2012 की रात में सारकिनगुड़ा में 17 आदिवासियों के खून की होली खेलना और 13 युवतियों के साथ बलात्कार करना क्या ‘लोकतंत्रिक मूल्यों’ का हिस्सा था? क्या यह लोकतंत्र महेन्द्र कर्मा जैसे हत्यारों और नंदकुमार पटेल जैसे शोषक शासक वर्गों के गुर्गों पर ही लागू होता है? बस्तर के गरीब आदिवासियों, बूढ़ों, बच्चों और महिलाओं पर लागू नहीं होता? उनका चाहे कितनी बड़ी संख्या में, चाहे कितनी ही बार कत्लेआम करना क्या ‘लोकतंत्र’ का हिस्सा ही था? क्या इन सवालों का जवाब उन लोगों के पास है जो इस हमले पर हाय तौबा मचा रहे हैं?
2005 से 2007 तक चला सलवा जुडूम जनता के प्रतिरोध से पराजित हो गया। उसके बाद 2009 में कांग्रेस-नीत यूपीए-2 सरकार ने देशव्यापी हमले के रूप में आपरेशन ग्रीनहंट की शुरूआत की। इसके लिए अमेरिकी साम्राज्यवादी न सिर्फ मार्गदर्शन और मदद व सहयोग दे रहे हैं, बल्कि अपने स्पेशल फोर्स को तैनात करके काउण्टर इंसर्जेन्सी आपरेशन्स का संचालन करवा रहे हैं। खासकर माओवादी नेतृत्व की हत्या करने पर उनका जोर है। आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से ‘जनता पर जारी युद्ध’ के अंतर्गत कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने अभी तक 50 हजार से ज्यादा अर्द्धसैनिक बल छत्तीसगढ़ में भेज दिए। इसके फलस्वरूप नरसंहारों और तबाही में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई। अब तक 400 से ज्यादा आदिवासियों को केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भेजे गए सशस्त्र पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों ने मार डाला। 2011 के मध्य से यहां पर प्रशिक्षण के नाम से सैन्य बलों की तैनाती शुरू कर दी गई। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के अलावा पहले चिदम्बरम और शिंदे दोनों ही रमनसिंह द्वारा चलाए जा रहे हमले से खुश होकर लगातार वादे पर वादे कर रहे हैं कि मुंहमांगी सहायता दी जाएगी। रमनसिंह भी केन्द्र से मिल रही मदद पर तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। छत्तीसगढ़ में क्रांतिकारी आंदोलन के दमन की नीतियों के मामले में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच कोई मतभेद नहीं है। सिर्फ जनता के दबाव में और साथ ही, चुनावी फायदों के मद्देनजर कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं ने सारकिनगुड़ा, एड़समेट्टा जैसे नरसंहारों का खण्डन करने का दिखावा किया। जबकि उसमें ईमानदारी बिल्कुल अभाव है। राज्य में रमनसिंह द्वारा लागू जन विरोधी और कार्पोरेट अनुकूल नीतियों के प्रति और दमनात्मक नीतियों के प्रति कांग्रेस को कोई विरोध नहीं है। वह विरोध का महज दिखावा कर रही है जो अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं है। दमन की नीतियों को लागू करने में इन दोनों पार्टियों की समान भागीदारी है। इतना ही नहीं, आंध्रप्रदेश से ग्रेहाउण्ड््स बलों का बार-बार छत्तीसगढ की सीमा के अंदर घुसना और पहले कंचाल (2008) और अभी-अभी पुव्वर्ति (16 मई 2013) में भारी हत्याकाण्डों को अंजाम देना भी कांग्रेस द्वारा लागू दमनात्मक नीतियों का ही हिस्सा है। इसीलिए हमने कांग्रेस के बड़े नेताओं को निशाने पर लिया।
आज दण्डकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ खड़े हुए छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, मंत्री रामविचार नेताम, केदार कश्यप, विक्रम उसेण्डी, राज्यपाल शेखर दत्त, महाराष्ट्र गृहमंत्री आर.आर. पाटिल आदि; डीजीपी रामनिवास, एडीजी मुकेश गुप्ता जैसे पुलिस के आला अधिकारी इस गफलत में हैं कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। महेन्द्र कर्मा ने भी इस भ्रम को पाल रखा था कि जड प्लस सेक्यूरिटी और बुलेटप्रूफ गाड़ियां उसे हमेशा बचाएंगी। दुनिया के इतिहास में हिटलर और मुस्सोलिनी भी इसी घमण्ड में थे कि उन्हें कोई नहीं हरा सकता। हमारे देश के समकालीन इतिहास में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे फासीवादी भी इसी गलतफहमी के शिकार थे। लेकिन जनता अपराजेय है। जनता ही इतिहास का निर्माता है। मुठ्ठी भर लुटेरे और उनके चंद पालतू कुत्ते आखिरकार इतिहास के कूड़ादान में ही फेंक दिए जाएंगे।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी मजदूरों, किसानों, छात्र-बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों, तमाम जनवादियों से अपील करती है कि वे सरकारों से मांग करें कि आपरेशन ग्रीनहंट को तत्काल बंद कर दिया जाए; दण्डकारण्य में तैनात सभी किस्म के अर्द्धसैनिक बलों को वापस लिया जाए; प्रशिक्षण के नाम से भारत की सेना को बस्तर में तैनात करने की साजिशों को बंद किया जाए; वायुसेना के हस्तक्षेप को रोक दिया जाए; जेलों में कैद क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और आम आदिवासियों को फौरन व बिना शर्त रिहा किया जाए; यूएपीए, छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून, मकोका, अफस्पा जैसे क्रूर कानूनों को रद्द किया जाए; तथा प्राकृतिक संपदाओं के दोहन की मंशा से विभिन्न कार्पोरेट कम्पनियों के साथ किए गए एमओयू को रद्द किया जाए।

(गुड्सा उसेण्डी)
प्रवक्ता,
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)