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22 अप्रैल 2014

शायर और शहज़ादी: शकीरा के बारे में मार्केस




वे दोनों महानतम कोलम्बियनों में शुमार हैं: शकीरा और गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़. नैसर्गिक था कि वे कहीं न कहीं मिलते.


एक फ़रवरी को शकीरा मायामी से बूएनोस आइरेस पहुंची, एक रेडियो प्रोग्राम के लिए उससे फ़क़त एक सवाल पूछने का इच्छुक एक पत्रकार उन का पीछा करता आ रहा था. कई वजूहात से वह ऐसा नहीं कर सका तो उसने अपनी रपट का शीर्षक रखा: "शकीरा तब क्या कर रही होती है जब उनसे कोई ढूंढ ही नहीं सकता?" हंसी से दोहरी होती हुई शकीरा हाथ में डायरी थामे समझाती है. "मैं ज़िन्दगी जी रही हूं."

वह एक फ़रवरी की शाम को बुएनोस आइरेस पहुंची थी, और अगले दिन वह दोपहर से लेकर आधी रात तलक काम करती रही; उस दिन उसका जन्मदिन था, लेकिन उसे मनाने को उसके पास समय ही नहीं था. बुधवार को वह वापस मायामी चल दी, जहां उसने एक लम्बे पब्लिसिटी शूट में हिस्सा लिया और कई घन्टे अपने ताज़ा अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण के लिए रेकॉर्डिंग की. शुक्रवार की दोपहर दो बजे से शनिवार की सुबह तक उसने दो गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग पूरी की. उसके बाद वह तीन घन्टे सोई और दोबारा स्टूडियो पहुंची जहां उसने दोपहर तीन बजे तक काम किया. उस रात वह थोड़ा सोई और इतवार की भोर लीमा जाने वाले हवाई जहाज़ पर सवार हुई. सोमवार की पूर्वान्ह वह एक लाइव टीवी शो में उपस्थित थी; चार बजे उसका एक टीवी विज्ञापन शूट हुआ; शाम को वह अपने पब्लिसिस्ट द्वारा दी गई एक पार्टी में मौजूद थी जहां वह भोर तक जगी रही. अगले दिन यानी नौ फ़रवरी सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक को उसने रेडियो, टीवी और अख़बार के लिए आधे आधे घन्टे के ग्यारह इन्टरव्यू दिए. बीच में एक घन्टा लंच के लिए निकाला गया. उसे वापस मायामी पहुंचना था मगर अन्तिम क्षणों में उसने बोगोटा में ठहरना तय किया, जहां वह भूकम्प के शिकार लोगों तक अपनि सहानुभूति जताने पहुंची.

उसी रात वह किसी तरह मायामी जाने वालि आख़िरी फ़्लाइट पकड़ पाने में कामयाब हुई जहां अगले चार दिनों तक वह स्पेन और पेरिस में होने वाली अपनी कन्सर्ट्स के लिए रिहर्सल में व्यस्त रही. अपने अल्बमों के अंग्रे़ज़ी संस्करणों के लिए उसने शनिवार लंचटाइम से लेकर सुबह साढ़े चार बजे तक ग्लोरिया एस्टेफ़ान के साथ काम किया. दिन फटने पर वह वह अपने घर पहुंची जहां उसने एक कॉफ़ी पी, डबलरोटी का एक टुकड़ा खाया और पूरे कपड़ों में सो गई. मंगलवार सोलह तारीख़ को वह कोस्टा रिका में एक लाइव टीवी शो में मौजूद थी. बृहस्पतिवार को वह वापस मायामी पहुंची जहां उसने 'सेन्सेशनल सैटरडे' नाम के एक टीवी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था.

वह बमुश्किल सो पाई - 21 को उसने वेनेज़ुएला से लॉस एन्जेलीस पहुंचकर ग्रैमी समारोह अटैन्ड करना था. उसे विजेताओं की सूची में होने की उम्मीद थी पर अमरीकियों ने तमाम मुख्य पुरुस्कार जीत लिए. लेकिन इस से उसकी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई: 25 को वह स्पेन में थी जहां उसने 27 और 28 फ़रवरी को काम किया. एक मार्च तक आखीरकार वह मैड्रिड के एक होटल में पूरी रात सो पाने का समय निकाल सकी. उस समय तक वह एक महीने में एक पेशेवर फ़्लाइट अटैन्डेन्ट के बराबर यानी चालीस हज़ार किलोमीटर की यात्राएं कर चुकी थी.

ठोस धरती पर भी शकीरा का काम कोई कम मुश्किल न था. उसके साथ चलने वाली संगीतकारों, लाइट टैक्नीशियनों और साउन्ड इंजीनियरों इत्यादि की टीम किसी लड़ाकू दस्ते जैसी नज़र आती है. वह हर चीज़ पर ख़ुद निगाह रखती है. उसे संगीत पढ़ना नहीं आता पर उसकी विशुद्ध आवाज़ और पूरा फ़ोकस इस बात की गारन्टी करते हैं कि उसके संगीतकार एक-एक नोट को सही सही लगा सकें. अपनी टीम के हर सदस्य के साथ उसके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं. वह अपनी थकान को जाहिर नहीं होने देती पर इस से आपको छलावे में नहीं पड़ना चाहिये. अर्जेन्टीना के चालीस कन्सर्ट्स वाले दौरे के आख़िरी दिनों में उसके एक सहायक को उसे बस में चढ़ने में मदद करनी पड़ी थी. कभी कभी उसकी धड़कनें बढ़ जाती हैं और उसे त्वचा की एलर्जी जैसी शिकायतें भी हो जाया करती हैं.

'दोन्दे एस्तान लोस लाद्रोनेस?' (सारे चोर कहां हैं?) अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण की तैयारी में एमीलियो एस्टेफ़ान और उसकी पत्नी ग्लोरिया के साथ की गई उसकी कड़ी मेहनत ने स्थिति को और भी मुश्किल बना दिया था. इस समय शकीरा को अपने जीवन के सबसे दबावभरे समय से जूझना पड़ा था: वह ठीकठाक अंग्रेज़ी बोल लेती है पर अपने उच्चारण को ठीक बनाने के लिए उसने इस कदर ऑब्सेशन की हद तक काम किया था कि वह सपने में भी कभी कभी अंग्रेज़ी बोला करती थी.

कोलम्बिया के बारान्कीया के एक जौहरी विलियम मेबारेक और उसकी पत्नी नाइदिया रिपोल के अरबी मूल के कलाप्रेमी परिवार में जन्मी थी शकीरा. उसकी कड़ी मेहनत और असाधारण बुद्धिमत्ता का परिणाम था कि अपने शुरुआती सालों में उसने इतना सारा सीख लिया जिसे सीखने में सामान्य लोग दसियों साल लगा देते हैं. सत्रह माह की आयु में वह अक्षरमाला सीखना शुरू कर चुकी थी और तीन साल की उम्र में गिनती करना. चार साल की आयु में बारान्कीया के अपने स्कूल में वह बैली-डान्सिंग सीख रही थी. सात साल की आयु में उसने अपना पहला गीत कम्पोज़ किया. आठ की आयु में कविता लिखनी शुरू की और दस की होते होते बाकायदा अपने ओरिजिनल गीत लिख और कम्पोज़ कर लिए थे. इसी दरम्यान उसने अटलांटिक के तट पर मौजूद 'एल कोर्रेहोन' कोयला खदानों के कामगारों के मनोरंजन हेतु अपने पहले कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त कर लिए थे. उसने अभी सेकेन्डरी स्कूल में दाख़िला लेना बाकी था जब एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ने उसे पहला पेशेवर प्रस्ताव दिया.

"मुझे अपनी अपार रचनात्मकता के बारे में हमेशा मालूम था," वह कहती है. "मैं प्रेम कविताओं का पाठ किया करती थी, कहानियां लिखती थी और गणित को छोड़कर सारे विषयों में सबसे अच्छे नम्बर लाती थी." उसे बहुत खीझ होती थी जब घर पर आए मेहमान उस से गाने की फ़रमाइश किया करते थे. "मैं तीस हज़ार लोगों के सामने गाना पसन्द करती बजाय पांच गधों के आगे गाने और गिटार बजाने के." वह थोड़ा कमज़ोर दिखती है मगर उसे पक्का यकीन था कि एक दिन सारी दुनिया उसे जानेगी. किस बात के लिए और कैसे, यह उसे पता नहीं था पर उसका भरोसा मजबूत था. यही उसकी नियति भी होनी थी.

आज उसके सपने पूरे होने से कहीं ज़्यादा पूरे हो चुके हैं. शकीरा का संगीत किसी और के जैसा नहीं सुनाई पड़ता और उसने मासूम सेन्सुअलिटी का अपना एक ब्रान्ड भी बना लिया है. "अगर मैं गाऊंगी नहीं तो मर जाऊंगी!" यह बात अक्सर हल्के फ़ुल्के तरीके से कही जाती है लेकिन शकीरा के मामले में यह एक सच्चाई है: जब वह गा नहीं रही होती वह बमुश्किल ज़िन्दा रहती है. भीड़ के बीच रहने में ही उसके भीतर शान्ति उभरती है. स्टेज का डर उसे कभी महसूस नहीं हुआ. उसे स्टेज पर न होने से डर लगता है: "मुझे लगता है" वह कहती है "जैसे वहां मैं जंगल में किसी शेर जैसी हो जाती हूं." स्टेज पर ही वह शकीरा बन पाती है जो कि वह असल में है.

कई गायक स्टेज से परे तेज़ रोशनियों पर निगाहें गड़ा लेते हैं ताकि श्रोताओं की भीड़ की निगाहों का सामना न करना पड़े. शकीरा इसका ठीक उल्टा करती है; वह अपने टैक्नीशियनों से कहती है कि दर्शकों श्रोताओं पर सबसे तेज़ रोशनियां डालें ताकि वह उन्हें देख सके. "तब जा कर संवाद सम्पूर्ण बनता है" वह कहती है. वह एक अजानी अनाम भीड़ को अपनी सनक और प्रेरणा के हिसाब से जैसा चाहे वैसा ढाल लेती है. "गाते हुए मुझे लोगों की आंखों में देखना अच्छा लगता है." कभी कभी वह भीड़ में ऐसे चेहरे देखती है जिन्हें उसने कभी नहीं देखा होता लेकिन वह उन्हें पुराने दोस्तों की तरह याद करती है. एक बार तो उसने एक ऐसे आदमी को पहचान लिया जो कब का मर चुका था. एक बार उसे ऐसा महसुस हुआ जैसे कोई उसे किसी दूसरे जन्म के भीतर से देख रहा हो. "मैंने पूरी रात उस के लिए गाया." वह बताती है. इस तरह के चमत्कार कई महान कलाकारो के लिए महान प्रेरणा के और अक्सर महान विनाशों के कारण बनते रहे हैं

शकीरा के मिथक का सबसे बड़ा आयाम है बच्चों के भीतर उसकी इस कदर गहरी पैठ. जब उसका अल्बम 'पीएस देस्काल्ज़ोस' 1996 में रिलीज़ हुआ तो उसके पब्लिसिस्ट्स ने तय किया कि उसे कैरिबियन लोकसमारोहों के इन्टरवलों में प्रमोट किया जाएगा. उन्हें यह नीति बदलनी पड़ी जब तमाम बच्चे "शकीरा! शकीरा!" के नारे लगाते हुए सारी शाम उस के गीतों को बजाने की मांग करने लगे. आज यह करिश्मा डॉक्टरेट के किसी महत्वपूर्ण विषय में तब्दील हो चुका है. हर सामाजिक तबके के प्राइमरी स्कूल की बच्चियां पहनावे, बोलने और गाने के अन्दाज़ में शकीरा की नकल करती हैं. छः साला बच्चियां उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिकाएं हैं.

इन्टरवल के दौरान उसके अल्बमों की सस्ती पाइरेटेड प्रतियों की अदलाबदली हुआ करती है. दुकानों में पहुंचते ही उसके आभूषणों की नकलें हाथोंहाथ निकल जाती हैं. बाजारों में हेयरडाईज़ की होलसेल बिक्री होती है ताकि लड़कियां शकीरा के हेयरस्टाइल की नकल कर सकें उसके नए अल्बम की पहली स्वामिनी स्कूल की सबसे लोकप्रिय लड़की बन जाती है. सबसे ज़्यादा पॉपुलर स्टडी-ग्रुप स्कूल के बाद किसी लड़की के घर में जमते हैं जहां पहले थोड़ा सा होमवर्क होता है और उस के बाद धमाल. जन्मदिन की दावतें नन्हीं शकीराओं का जमावड़ा हुआ करता है. बिल्कुल विशुद्धतावादी समूहों में - जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा है - लड़कों को नहीं बुलाया जाता.

अपनी असाधारण संगीत प्रतिभा और मार्केटिंग के बावजूद शकीरा अपनी परिपक्वता के बगैर वहां हो ही नहीं सकती थी जहां वह अब है. यह यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि इस लड़की के भीतर इतनी ताकत आती कहां से है जो हर दिन अपने बालों का रंग बदल देती है - कल काला, आज लाल, कल हरा. कई उम्रदराज़ महिला गायकों से कहीं ज़्यादा ईनामात वह हासिल कर चुकी है. आप देख कर बता सकते हैं कि वह कहां पहुंचना चाहती है: बुद्धिमान, असुरक्षित, शालीन, मधुर, आक्रामक और सघन! अपने पेशे के चरम पर पहुंच चुकने के बाद भी वह बारान्कीया की एक लड़की भर है - जहां भी होती है उसे घर की मुलेट मछली और मैनियोक ब्रैड की याद आती है. अभी वह अपने सपनों का घर नहीं ले सकी है - समुद्र किनारे ऊंची छतों वाला एक शान्त मकान और दो घोड़े. उसे किताबें अच्छी लगती हैं - वह उन्हें खरीदती है उन्हें प्यार करती है अलबत्ता पढ़ने के लिए उसके पास उतना वांछित समय नहीं होता. एयरपोर्टों पर जल्दबाज़ी में विदा लेने के बाद उसे अपने दोस्तों की बहुत याद आती है मगर उसे मालूम होता है कि अगली मुलाकात होने में कितना वक़्त लग सकता है.

उसने कितना पैसा कमाया है, इस बाबत वह कहती है "जितना मैं बताती हूं उस से ज़्यादा मगर जितना लोग बताते हैं उस से कम." संगीत सुनने का उसका प्रिय स्थान होता है गाड़ी के भीतर पूरे वॉल्यूम में बजता प्लेयर - वह शीशे चढ़ा लिया करती है ताकि दूसरों को दिक्कत न हो. "ईश्वर से बात करने, अपने से बात करने और समझने का यह आदर्श स्थान होता है." उसे टीवी से नफ़रत है. उसके हिसाब से उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है अनन्त जीवन पर उसका विश्वास और मृत्यु का असह्य खौफ़.

वह एक दिन में चालीस इन्टरव्यू तक दे चुकी है और उसने किसी भी बात को दोहराया नहीं. कला, जीवन. अगले जन्म, ईश्वर प्रेम और मत्यु को लेकर उसके अपने विचार हैं. लेकिन उसके इन्टरव्यू लेने वालों ने इन विषयों पर खुल कर बताने को उस से इतनी दफ़ा पूछ लिया है कि अब वह उन से बचकर निकलना सीख गई है. उसके उत्तर जितना बताते हैं उस से कम ही छिपाते हैं और यह सबसे उल्लेखनीय बात है. वह इस बात को सीधे सीधे खारिज कर देती है कि उसकी प्रसिद्धि अस्थाई है और यह कि ज़्यादा गाने से उसकी आवाज़ पर असर पड़ेगा. "भरी धूप के बीच में सूर्यास्त के बारे में नहीं सोचना चाहती." जो भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं चूंकि उसकी आवाज़ की प्राकृतिक रेन्ज उसकी तमाम ज़्यादतियों के बावजूद बची रहेगी. बह बुखार और थकान से गा कर उबरी है. "गायक के लिए सबसे बड़ी कुंठा यह हो सकती है," हमारे इन्टरव्यू के आखीर में तनिक हड़बड़ी में वह कहती है "कि वह गाने को अपना कैरियर बना चुकने के बावजूद गा न सके."

उसके लिए सबसे रपटीला विषय होता है प्यार. वह उसका गुणगान करती है, वही उसके संगीत की प्रेरणा होता है पर बातचीत में वह उस पर अपने ह्यूमर की परत चढ़ा लेती है. "सच तो यह है कि मुझे मौत से ज़्यादा शादी से डर लगता है." यह आम जानकारी है कि उसके चार बॉयफ़्रैन्ड्स रह चुके हैं हालांकि वह शरारत के साथ बताती है कि तीन और थे जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं. वे सब तकरीबन उसी की उम्र के थे पर उनमें से कोई भी उस जैसा परिपक्व नहीं था. शकीरा उन्हें बहुत अपनेपन और दर्द के साथ याद करती है. ऐसा लगता है वह उन्हें नश्वर प्रेतों की तरह देखा करती है जिन्हें उसने अपनी अल्मारी में टांग दिया है. भाग्यवश यह कोई बहुत हताशा की बात भी नहीं है: अगली दो फ़रवरी को वह फ़क़त छब्बीस साल की हो जाने वाली है.


(हिंदी अनुवाद के लिए कबाड़खाना का आभार)

20 अप्रैल 2014

इस युग का कथाशिल्पी मार्केज


पंकज सिंह

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज का 87 वर्ष की उम्र में निधन हो गया, यह समाचार सारी दुनिया के उन तमाम लोगों के लिए आघात पहुंचाने वाली एक बड़ी खबर है जो साहित्य-कला-संस्कृति की मानवीय संपदा को मनुष्य के लिए एक जरूरी और गतिमान निधि मानते हैं। मार्केज को 1982 में उनके महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘एकांत के सौ बरस’ पर साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

लेकिन नोबेल पुरस्कार से विभूषित होने के बहुत पहले से मार्केज को स्पेनी भाषा का ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर का कालजयी कथाशिल्पी माना जा चुका था। 23 वर्ष की उम्र में अपना पहला लघु उपन्यास लिखने के बाद मार्केज दक्षिण अमरीका के स्पेनी लेखकों में चर्चा का विषय बन चुके थे।

उस काल में उन्होंने ‘लीफ स्टार्म’ और ‘नो वन राइट्स टू द कोलोनेल’नाम के दो लघु उपन्यास लिखे थे। उन उपन्यासों का प्रभाव ऐसा था कि नये सिरे से इस मुद्दे पर बहस छिड़ गयी थी कि मार्केज की इन दो कृतियों को लंबी कहानी माना जाए या लघु उपन्यास। मार्केज ने अपने कथाकार जीवन के आरंभ से ही अपनी निजी कथा शैली की पहचान बनानी शुरू कर दी थी जिसके विकास के साथ उन्हें ‘जादुई यथार्थवाद’ का आविष्कारक होने का श्रेय दिया गया। हालांकि स्वयं गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ने जादुई यथार्थवाद नाम की विशिष्ट शैली का जनक होने का कोई दावा कभी नहीं किया परंतु उनके लेखन में लातीन अमरीकी समाजों और परंपराओं के यथार्थ में चमत्कारों और अजीबोगरीब किस्म की घटनाओं, अनोखी चीजों और जीव जगत की अविश्वसनीय स्थितियों का जो मनोहारी मिश्रण और सामंजस्य पैदा हुआ उसने न सिर्फ उनकी कृतियों को विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर का दर्जा दिलाया बल्कि सारी दुनिया में अनेकानेक भाषाओं के लेखन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। ‘एकांत के सौ बरस’ का प्रथम प्रकाशन 1967 में हुआ था। तब से लेकर अब तक उस महान उपन्यास का दुनिया की लगभग तीन दजर्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और उसकी पांच करोड़ से ज्यादा प्रतियां साहित्य प्रेमियों के घरों में पहुंच चुकी हैं। सिर्फ उस एक उपन्यास के आंकड़ों के आधार पर यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि मार्केज इतिहास में लातीन अमरीका के सभी लेखकों से ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक रहे। गाब्रिएल गार्सिया मार्केज मूलत: कोलंबिया के थे जहां उनका जन्म हुआ और उन्होंने शिक्षा और संस्कार पाने के बाद वहां अपने जीवन का आधी सदी का सफर तय किया। पिछले तीस वर्षो से मार्केज मेक्सिको की राजधानी मेक्सिको सिटी में अपने परिवार के साथ रहते आए थे। 1999 में उन्हें कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ने ग्रस लिया था, लेकिन मार्केज उचित चिकित्सा के कारण उसके चंगुल से बाहर आ गये थे। लेकिन उसके बाद उन्हें एक दूसरी खतरनाक बीमारी ‘अल्जाइमर्स’ ने अपना निशाना बना लिया और मार्केज की स्मृति क्रमश: गायब हो गयी।

लातीन अमरीका के महान कवि पाब्लो नेरुदा ने कहा था कि स्पेनी भाषा में मिगुएल द सर्वातेस के क्लासिक उपन्यास, ‘दोन किहोते’ के बाद मार्केज का उपन्यास ‘एकांत के सौ बरस’उस भाषा की महानतम अभिव्यक्ति है। 1982 में जब मार्केज को स्वीडन के राजा एक भव्य समारोह में नोबेल पुरस्कार से विभूषित कर रहे थे तो पुरस्कार की निर्णायक समिति की ओर से पढ़े जा रहे प्रशस्ति पत्र में कहा गया कि गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ऐसे लेखक हैं जिनकी हर नयी कृति के आने पर उस कृति के विषय में जो समाचार बनता है वह अंतरराष्ट्रीय स्तर का होता है और दुनिया की सभी भाषाओं में उसकी गूंज-अनुगूंज सुनायी देने लगती है।

कहना न होगा कि मार्केज के देहांत पर सारी दुनिया में जो शोक की लहर छायी है उससे केवल साहित्यिक-सांस्कृतिक समुदायों के लोग ही प्रभावित नहीं हुए हैं, बल्कि पढ़े-लिखे समाजों में जीवन के हर क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों ने उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए शोक-संदेश जारी किए हैं। अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा के शोक संदेश से ज्यादा भावपूर्ण भाषा में अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बड़ी विनम्रता से मार्केज के साथ अपनी बीस साल पुरानी दोस्ती का हवाला देते हुए कहा है कि उन्हें इस बात का गर्व महसूस होता रहा है कि मार्केज उनके मित्र रहे।

मार्केज की वैचारिकता सदा बहुत स्पष्ट रही। उन्होंने लातीन अमरीकी समाजों के जिस संष्टि यथार्थ को अपने कथा साहित्य में रूपायित किया उसमें यह साफ दिखाइ देता है कि साधारण से लेकर विशिष्ट जन तक की जीवन शैलियों, मनोविज्ञान, क्रिया-प्रतिक्रिया और जीवन के व्यापक विस्तार पर उनकी जो सूक्ष्म और पैनी निगाह लगातार बनी रही उसमें उनकी प्रगतिशील-जनवादी प्रतिबद्धता का सहज स्पर्श हर कहीं महसूस होता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उनकी पुस्तक ‘ एकांत के सौ बरस ’ के विस्मयजनक प्रभाव से यह स्थिति बनी कि उन्होंने जिस काल्पनिक दक्षिण अमरीकी गांव माकोंदो और वहां रहने वाले बुएंदिया खानदान की जिन कई पीढ़ियों का चित्रण सैकड़ों पात्रों के साथ किया वह सब दक्षिण अमरीका की रहस्यमयी और अल्पज्ञात परंपराओं के श्रेष्ठ और अत्यंत प्रामाणिक रूपों की तरह अमिट रूप से साहित्यिक इतिहास में दर्ज हो चुका है। इस उपन्यास की रचना-प्रक्रिया से जुड़ी हुई अनेक कथाएं हैं। इसकी शुरुआत यूं हुई कि मार्केज अपनी गाड़ी में कहीं जा रहे थे और बीच के नीरव और सुनसान इलाके में उनकी कल्पना में उपन्यास की कथा का आरंभ उभरने लगा। उन्होंने कहीं रुककर उपन्यास के पहले अध्याय को लिपिबद्ध किया। कुछ ही समय बाद जब वे अपने घर गये तो उन्होंने अपनी प्रिय सिगरेट के बहुत सारे पैकेट अपने कमरे में भर लिए और पूरी तरह तल्लीन होकर, तन्मय भाव से लिखने में जुट गये। लंबी अवधि के बाद जब वे उपन्यास को पूरा करके निकले तो उनके पास तेरह सौ पृष्ठों की सामग्री थी। यह बात और है कि उस पूरी अवधि में किसी आर्थिक आय का कोई अता-पता नहीं था और वे तथा उनका परिवार बारह हजार डॉलर के कर्ज में डूब चुके थे। अपने कार्य जीवन की शुरुआत मार्केज ने एक पत्रकार के रूप में की थी। पत्रकारिता भी उन्होंने जमकर की थी। बाद के दौर में उन्होंने फिल्म पटकथा लेखन सहित कई तरह का ऐसा गद्य लेखन किया जिससे उन्हें ठीकठाक आय हुई। परंतु इस दौर में पत्रकारिता से लगभग विमुख होकर उन्होंने सिर्फ रचनात्मक लेखन पर खुद को केन्द्रित कर लिया था। उस दौर में अपने घर के प्रवेश द्वारा पर ताला लगाकर वे छिपकर पिछले दरवाजे से अपने घर में आते- जाते थे, ताकि उन्हें कर्ज देने वाले घर में घुसकर अपने पैसे वापस न मांगने लगें।

क्यूबा के क्रांतिकारी जननायक और भूतपूर्व राष्ट्रपति फीदेल कास्त्रो से मार्केज की दोस्ती निरंतर चर्चा और विवाद का विषय बनी रही। मार्केज ने अमरीकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध काफी तीखे वक्तव्य समय-समय पर दिये थे। संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार उन्हें विध्वंसक व्यक्ति मानती रही और उन्हें अमरीका यात्रा के लिए वीजा देने से इनकार करती रही। वह तो बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने के बाद ही संभव हुआ कि इस महान प्रतिभा पर लगा अमरीकी यात्रा-प्रतिबंध समाप्त हुआ। फीदेल कास्त्रो के बारे में मार्केज का कहना था कि फीदेल अत्यंत सुसंस्कृत व्यक्ति हैं और मिलने पर वे दोनों साहित्यिक वार्तालाप किया करते हैं।

मार्केज के अन्य बहुचर्चित उपन्यासों में ‘हैजा के दिनों में प्यार’ ,‘पूर्व घोषित मौत का सिलसिलेवार ब्योरा’,‘अपनी भूल-भुलैया में जनरल’,‘प्रभु पुरुष का पतझड़’ आदि बहुख्यात कृतियां हैं। उनकी अन्य दो उल्लेखनीय कृतियों में एक तो कोलंबिया में मादक द्रव्यों का अवैध कारोबार चलाने वाले मेदेलिन कार्तेल नामक भयावह संगठन द्वारा किए गए अपहरणों पर एक पत्रकारीय पुस्तक है और दूसरी पुस्तक उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने ‘कथा कहने के लिए जीते हुए’ नाम दिया था।

क्या उनकी मृत्यु के दुख का दंश हमें इस बात से कम महसूस होगा कि वे कैंसर से लड़कर जीते, मगर दु:साध्य रोग अलजाइमर्स ने उनकी स्मृति छीन ली थी और आखिरकार न्यूमोनिया ने उनके दैहिक विनाश की भूमिका बना दी थी?

शायद नहीं।


कल्पतरु एक्सप्रेस से साभार

गाब्रिएल गार्सिया मार्केस से एक बातचीत



गाब्रिएल गार्सिया मार्केस के साथ पीटर एच. स्टोन की बातचीत का सम्पादित अंश. जानकीपुल से साभार

प्रश्न- टेपरिकार्डर के उपयोग के बारे में आप क्या सोचते हैं?

मुश्किल यह है कि जैसे ही आपको इस बात का पता चलता है कि इंटरव्यू को टेप किया जा रहा है, आपका रवैया बदल जाता है. जहाँ तक मेरा सवाल है मैं तो तुरंत रक्षात्मक रुख अख्तियार कर लेता हूँ. एक पत्रकार के रूप में मुझे लगता है कि हमने अभी यह नहीं सीखा है कि इंटरव्यू के दौरान टेपरिकार्डर किस तरह से उपयोग किया जाना चाहिए. सबसे अच्छा तरीका जो मुझे लगता है कि पत्रकार लंबी बातचीत करे जिसके दौरान वह किसी प्रकार का नोट नहीं ले. बाद में उस बातचीत के आधार पर उसे वह लिखना चाहिए जैसा उसने उस साक्षात्कार के दौरान महसूस किया, ज़रूरी नहीं है कि वह हुबहू वही लिखे जिस तरह से इंटरव्यू देने वाले ने बोला. टेपरिकार्डर से जो भान होता है वह यह कि वह उस व्यक्ति के प्रति ईमानदार नहीं होता जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा हो क्योंकि यह उसको भी रिकॉर्ड करके दर्ज कर लेता है जब सामने वाला अपना मजाक उड़ा रहा होता है. इसीलिए जब सामने टेपरिकार्डर होता है तो मैं इसको लेकर सजग होता हूँ कि मेरा इंटरव्यू लिया जा रहा है; लेकिन जब टेपरिकार्डर नहीं होता है मैं सहज और स्वाभाविक रूप से बात करता हूँ.

प्रश्न- तो आपने इंटरव्यू के लिए कभी टेपरिकार्डर का इस्तेमाल नहीं किया?

पत्रकार के तौर पर तो मैंने कभी उसका उपयोग नहीं किया. मेरे पास एक बहुत बढ़िया टेपरिकार्डर है लेकिन मैं उसका उपयोग केवल संगीत सुनने के लिए करता हूँ. लेकिन यह भी है कि पत्रकार के रूप में मैंने कभी इंटरव्यू नहीं किया, मैंने रिपोर्ट किए लेकिन सवाल-जवाब वाला इंटरव्यू तो कभी नहीं किया.

प्रश्न- मैंने आपके एक मशहूर इंटरव्यू के बारे में सुना है, जो एक जहाजी से था जिसका जहाज़ टूट गया था...

वह सवाल-जवाब के रूप में नहीं था. उस जहाजी ने मुझे अपने अनुभव बताये थे, मैंने उसे लिखा और यह कोशिश की उसी के शब्दों में लिखूं. मैंने कोशिश कि कि प्रथम पुरुष में लिखूं, ताकि यह लगे कि वही लिख रहा है. बाद में वह एक समाचारपत्र में धारावाहिक छपा, दो सप्ताह तक रोज उसका एक-एक खंड प्रकाशित हुआ, तो वह उसके नाम से छपा था, मेरे नाम से नहीं. जब 20 सालों बाद जब वह पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ तब लोगों को इस बात की जानकारी हुई कि उसे मैंने लिखा था. किसी संपादक को तब तक ऐसा नहीं लगा था कि वह अच्छा है जब तक कि मैंने वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड नहीं लिखा था.


प्रश्न- हमने बातचीत की शुरुआत पत्रकारिता के बारे में बात करने से आरम्भ की थी, फिर से पत्रकारिता से जुड़ना कैसा लगता है, जबकि इतने दिन से आप उपन्यास लिख रहे हैं? क्या कुछ अलग तरह का महसूस होता है, क्या नजरिया कुछ बदल जाता है?

मुझे हमेशा से इस बात का भरोसा रहा है कि मेरा असली पेशा पत्रकारिता ही है. पहले इसके बारे में जो बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी वह काम करने की स्थितियां थीं, साथ ही, मुझे अपने सोच-विचारों को अखबार के हितों के मुताबिक़ ढालना पड़ता था. अब उपन्यास लिखकर मैंने आर्थिक स्वतंत्रता अर्जित कर ली है. अब मैं अपनी रूचि और विचारों के मुताबिक़ लिख सकता हूँ. वैसे भी, पत्रकारिता के माध्यम से जब भी मुझे कुछ अच्छा लिखने अवसर मिलता है तो मुझे बहुत आनंद आता है.

प्रश्न- पत्रकारिता का अच्छा नमूना क्या है आपके लिए?

जॉन हर्सी का हिरोशिमा पत्रकारिता का असाधारण नमूना है.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि उपन्यास कुछ ऐसा कर सकता है जो पत्रकारिता नहीं कर सकती?

कुछ भी नहीं. मुझे नहीं लगता कि इनमें कोई अंतर है. इनके स्रोत एकसमान होते हैं, सामग्री समान होती है, संसाधन और भाषा भी समान ही होती है. डेनियल डेफो का जर्नल ऑफ द प्लेग इयर्स एक महान उपन्यास है जबकि हिरोशिमा पत्रकारिता का बेहतरीन नमूना.

प्रश्न- सत्य बनाम कल्पना के बीच संतुलन बनाने में पत्रकारों और उपन्यासकारों की अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां होती हैं?

पत्रकारिता में अगर एक तथ्य भी गलत हो तो वह पूरे लेख को संदिघ्ध बना देता है. इसके विपरीत अगर उपन्यास में अगर एक तथ्य भी सही हो तो वह पूरी कृति को वैध बना देता है. यही एक अंतर है और यह लेखक के कमिटमेंट पर निर्भर करता है. एक उपन्यासकार जो चाहे वह कर सकता है जब तक कि लोग उसमें विश्वास करें. 

वैसे अब उपन्यास और पत्रकारिता दोनों के लिए लिख पाना मुझे पहले से मुश्किल लगने लगा है. जब मैं अखबार में काम करता था तो मैं अपने लिखे प्रत्येक शब्द को लेकर उतना सजग नहीं रहता था, जबकि अब रहता हूँ. जब मैं बोगोटा में एल स्पेक्तादोर में काम कर रहा था तब मैं सप्ताह में कम से कम तीन ‘स्टोरी’ करता था, रोज तीन सम्पादकीय लिखता था, फिर मैं सिनेमा के रिव्यू लिखता था. फिर रात में जब सब चले जाते थे तब मैं वहीँ रुककर उपन्यास लिखता था. मुझे लिनोटाइप मशीनों की आवाजें अच्छी लगती थी, जो सुनने में बारिश की तरह लगती थी. अगर वे थम जाते तो मैं ख़ामोशी के साथ तनहा रह जाता था, फिर मैं लिख नहीं पाता था. अब उसके मुकाबले मैं कम लिखता हूँ. जिस दिन सुबह के 9 बजे से दोपहर के दो या तीन बजे तक अच्छी तरह काम कर लूं तो मैं मुश्किल से चार-पांच पंक्तियों का एक पैराग्राफ लिख पाता हूँ, जिसे अक्सर अगले दिन मैं फाड़ देता हूँ.

प्रश्न- क्या आपके लेखन में यह परिवर्तन इसलिए आया है क्योंकि आपकी कृतियों को काफी सराहना मिली है या किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण?

ऐसा दोनों कारणों से हुआ है. मुझे लगता है कि यह विचार कि मैं उससे कहीं अधिक लोगों के लिए लिख रहा हूँ जितनी कि मैंने कभी कल्पना की थी, ने खास तरह की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी है जो सहित्यिक भी और राजनीतिक भी.

प्रश्न- आपने लिखना कैसे शुरू किया?

रेखांकन बनाने से. कार्टून बनाने से. जब मैं पढ़ना-लिखना नहीं जानता था तो मैं घर और स्कूल में कॉमिक्स बनाया करता था. मजेदार बात यह है कि जब मैं हाईस्कूल में पढता था तो उस समय मेरी ख्याति एक लेखक के रूप में थी जबकि तब तक मैंने कुछ भी नहीं लिखा था. कोई परचा लिखना होता था या किसी तरह का पिटीशन तो मुझे याद किया जाता था क्योंकि मुझे लेखक के तौर पर जाना जाता था. जब मैं कॉलेज में गया तो सामान्य तौर पर मेरे दोस्तों के मुकाबले मेरी साहित्यिक पृष्ठभूमि अच्छी मानी जाती थी. बोगोटा में विश्वविद्यालय के दिनों में मेरी कुछ ऐसे लोगों से दोस्ती हुई जिन्होंने मेरा परिचय समकालीन लेखकों से करवाया. एक रात मेरे एक दोस्त ने मुझे फ्रांज़ काफ्का की कहानियों की  किताब पढ़ने को दी. उसमें उनकी कहानी मेटामॉर्फोसिस भी थी. उसकी पहली पंक्ति पढते ही मैं अपने बिस्तर से उछल पड़ा- ‘उस सुबह जब ग्रेगरी साम्सा असहज सपने से जगा तो उसने पाया कि वह बिस्तर पर एक बहुत बड़े कीड़े में बदल गया है.’ इस लाइन को पढकर मैंने यह सोचा कि यह तो मुझे पता ही नहीं था कि कोई इस तरह से भी लिख सकता था, किसी को इस तरह से लिखने की इजाज़त भी मिल सकती थी. अगर मुझे पता होता तो मैंने बहुत पहले ही लिखना शुरू कर दिया होता. फिर मैंने तत्काल कहानियां लिखनी शुरू कर दी. वे पूरी तरह से बौद्धिक कहानियां थी जो मेरे साहित्यिक अनुभवों पर आधारित थी और तब तक जीवन और साहित्य के बीच का सूत्र मुझे नहीं मिला था. वे कहानियां उस दौर में एल स्पेक्तादोर के साहित्यिक परिशिष्ट में छपी और उस दौर में उनको कुछ सफलता भी मिली- उसका कारण शायद यह था कि उस ज़माने में कोलंबिया में कोई बौद्धिक कहानियां नहीं लिख रहा था. मेरी आरंभिक कहानियों के बारे में कहा गया कि उनके ऊपर जेम्स जॉयस का प्रभाव है.

प्रश्न- आपने तब तक जॉयस को पढ़ा था?

मैंने तब तक उनको पढ़ा नहीं था, इसलिए मैंने यूलिसिस पढ़ना आरम्भ कर दिया. उनसे मैंने आतंरिक एकालाप की तकनीक सीखी. बाद में मैंने वह तकनीक वर्जीनिया वुल्फ में भी देखी और मुझे अच्छा लगा, वे उस तकनीक का जॉयस से भी अच्छी तरह उपयोग करती थी. हालाँकि मैंने बाद में पाया कि आंतरिक एकालाप की तकनीक को इजाद करनेवाला लेखक लाजरिलो दे तोर्म्स का गुमनाम लेखक था.

प्रश्न- उस समय आप किसके लिए लिख रहे थे? आपके पाठक कौन थे?

लीफ स्टोर्म उपन्यास मैंने मैंने अपने उन दोस्तों के लिए लिखा था जो मेरी मदद कर रहे थे, मुझे किताबें उधार देते थे और सामान्य तौर पर मेरे लेखन को लेकर प्रोत्साहित रहते थे. मुझे लगता है कि आप सामान्य तौर पर किसी न किसी के लिए लिखते हैं. जब मैं लिख रहा होता हूँ तो मुझे लिखते हुए इस बात का अहसास हो जाता है कि फलां को यह पसंद आएगा, अमुक दोस्त इस अनुच्छेद को पसंद करेगा, मैं उन अलग-अलग खास लोगों के बारे में सोचता रहता हूँ. आखिरकार सभी पुस्तकें अपने दोस्तों के लिए ही तो लिखी जाती हैं. वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड लिखने के बाद यह हुआ है कि लाखों-करोड़ों पाठकों में मैं किसके लिए लिख रहा हूँ इस बात का मुझे पता नहीं होता, इससे मैं असहज हो जाता हूँ. यह कुछ वैसे ही है लाखों आँखें आपको देख रही हों और आपको पता नहीं चले कि वे क्या सोच रहे हैं.

प्रश्न- आपके गल्प-लेखन पर पत्रकारिता के प्रभावों के बारे में आपका क्या कहना है?

मुझे यह दोतरफा लगता है. उपन्यासों ने मेरे पत्रकारिता-लेखन की इस दिशा में मदद की है उसके कारण उसमें साहित्यिक मूल्य पैदा हुआ. पत्रकारिता ने मेरे उपन्यासों की इस तरह मदद की है कि उसने मुझे हमेशा यथार्थ के करीब रखा है.

प्रश्न- लीफ स्टॉर्म से लेकर वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड शैली की जो तलाश आपकी रही, उसको आप किस तरह देखते हैं?

लीफ स्टॉर्म लिखने के बाद मुझे लगा कि गांव और अपने बचपन के बारे में लिखना असल में देश के राजनीतिक यथार्थ से पलायन है. मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं देश के राजनीतिक हालात से भागने के क्रम में एक प्रकार के नॉस्टेल्जिया के पीछे छिप रहा हूँ. वही समय था जब साहित्य और राजनीति के संबंधों को लेकर खूब चर्चा होती थी. मैं उन दोनों के बीच की दूरी को पाटने की कोशिश करता रहा. पहले मैं फौकनर से प्रभावित था, बाद में हेमिंग्वे का प्रभाव पड़ा. मैंने नो वन राइट्स टू कर्नल, इन एविल आवर, द फ्यूनरल ऑफ ग्रेट मैट्रियार्क लिखे, जो कमोबेश एक ही दौर में लिखे गए थे और उनमें काफी समानताएं थीं. लीफ स्टॉर्म और वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के मुकाबले उनका परिवेश अलग था. वह एक ऐसा गांव था जहाँ कोई जादू नहीं था. वह पत्रकारीय साहित्य था. लेकिन जब मैंने ‘इन एविल आवर’ लिखा तो मैंने पाया कि मेरे सारे दृष्टिकोण गलत साबित हुए. मैंने पाया कि बचपन को लेकर लिखते हुए मैंने जो लिखा उसका सम्बन्ध राजनीति से अधिक और मेरे देश के यथार्थ से अधिक था जितना मैंने सोचा था. इन एविल आवर के बाद मैंने पांच सालों तक कुछ नहीं लिखा. मुझे इसकी कुछ समझ तो थी कि मैं क्या लिखना चाहता था, लेकिन कुछ था जो उनमें रह जाता था, नहीं आ पाता था. आखिरकार मैंने वह स्वर पा लिया, जिसका मैंने बाद में वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड में उपयोग किया. वह उस पर आधारित था जिस तरह कि मेरी नानी मुझे कहानियां सुनाती थीं. वे जो बातें बताती थी वे पराभौतिक और काल्पनिक प्रतीत होती थीं, लेकिन उनको पूरे स्वाभाविकता के साथ सुनाया करती थीं. जब मुझे वह स्वर मिल गया जिसमें मैं लिखना चाहता था तो उसके बाद मैं 18 महीनों तक बैठकर लिखता रहा, हर दिन.

प्रश्न- उस तकनीक में कुछ पत्रकारीय भंगिमा भी लगती है. आप कल्पनाजनित घटनाओं का भी इतनी गहराई से वर्णन करते हैं कि वह उनको एक तरह का यथार्थ प्रदान कर देता है. यह कुछ ऐसा है जो लगता है आपने पत्रकारिता से सीखा?

यह एक पत्रकारीय युक्ति है जिसको आप साहित्य में आजमा सकते हैं. उदाहरण के लिए, अगर आप कहें कि आकाश में हाथी उड़ रहे हैं तो कोई विश्वास नहीं करनेवाला. लेकिन अगर आप कहें कि आकाश में कुल 425 हाथी हैं तो शायद लोग आपका विश्वास कर लें. वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड इस तरह की चीज़ों से भरा हुआ है. यह ठीक वही तकनीक है जिसका मेरी नानी उपयोग किया करती थीं. मुझे वह कहानी खास तौर पर याद है जो एक ऐसे आदमी के बारे में है जो पीली तितलियों से घिरा रहता था. जब मैं बहुत छोटा था तो हमारे घर में एक बिजली का काम करनेवाला आता था. मुझे उसको लेकर बहुत उत्सुकता रहती थी क्योंकि वह अपने साथ एक बेल्ट लेकर आता था जिससे वह खुद को बिजली के खम्भे से बाँध लेता था. मेरी नानी कहतीं कि जब यह आदमी आता है घर तितलियों से भर जाता है. जब मैं इस बात को लिख रहा था तो मुझे लगा कि अगर मैंने नहीं कहा कि तितलियाँ पीली थीं तो लोग विश्वास नहीं करेंगे.

प्रश्न- वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड के ‘बनाना फीवर’ के बारे में आपका क्या कहना है? यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के कारनामों से उसका कितना संबंध है?

‘बनाना फीवर’ का काफी कुछ सम्बन्ध यथार्थ से है. वास्तव में, मैंने कुछ ऐसी साहित्यिक युक्तियों का प्रयोग किया है जिनको ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए, चौक में हुए जनसंहार की घटना बिलकुल सत्य है, मैंने उसे दस्तावेजों और बयानों के आधार पर लिखा है, लेकिन इस बात का कभी पता नहीं चल पाया कि कितने लोग उस घटना में मारे गए. मैंने मरनेवालों की संख्या 3000 लिखी, जो ज़ाहिर है अतिरंजना थी. लेकिन मेरी बचपन की स्मृतियों में उस ट्रेन को देखना भी है जो बहुत लंबी थी जो बागानों से केले भरकर लौटी थी. उसमें तीन हज़ार मृत हो सकते थे, जिनको समुद्र में फेंक दिया गया. लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि अब संसद और अखबारों में 3000 मृतकों की बात होने लगी है. मुझे लगता है कि हमारा आधा इतिहास इसी तरह से बना हुआ है. ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क में तानाशाह कहता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह अभी सत्य नहीं है, लेकिन आनेवाले समय में यह बात सच साबित होगी. आनेवाले समय में जनता सरकार के बजाय लेखकों पर अधिक भरोसा करेगी.

प्रश्न- क्या आपको अंदाजा था कि वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड को ऐसी अप्रत्याशित सफलता मिलने वाली है?

मैं इतना तो जानता था कि यह किताब मेरे दोस्तों मेरी अन्य किताबों के मुकाबले अच्छी लगेगी. लेकिन जब मेरे स्पेनिश प्रकाशक ने कहा कि वह इसकी आठ हज़ार प्रतियाँ छापने जा रहा है तो मैं सन्न रह गया, क्योंकि मेरी अन्य किताबें 700 प्रतियों से ज्यादा नहीं बिकी थीं. मैंने उनसे कहा कि शुरुआत कम से करनी चाहिए, उसने जवाब दिया कि उसे पक्का विश्वास है कि यह एक अच्छी किताब है और मई से दिसंबर के दरम्यान सभी प्रतियाँ बिक जाएंगी. वास्तव में ब्यूनस आयर्स में वे सभी एक सप्ताह के अंदर बिक गईं.

प्रश्न- आपको क्या लगता है वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड इतनी पसंद क्यों की गई?

इसका मुझे बिलकुल अंदाज़ नहीं है क्योंकि मैं अपनी रचनाओं का बहुत बुरा आलोचक हूँ. इसकी एक व्याख्या जो मैंने अक्सर सुनी है वह यह है यह किताब लैटिन अमेरिका के लोगों की निजी जिंदगियों के बारे में है, तथा यह अंतरंगता से लिखी गई है. इस व्याख्या से मुझे आश्चर्य होता है क्योंकि जब मैंने इसे लिखने का पहला प्रयास किया था तब इसका नाम द हाउस होनेवाला था. मैं यह चाहता था कि इस उपन्यास की घटनाएँ घर के अंदर ही घटित हों तथा बाहरी संसार का इसमें वही कुछ आये जो इस बात को दिखाने के लिए हो कि उसका घर पर क्या प्रभाव पड़ा. इसकी एक और व्याख्या मैंने यह सुनी है कि प्रत्येक पाठक इसके पात्रों में से किसी न किसी के साथ अपनी छवि देख सकता है. मैं नहीं चाहता कि इसके ऊपर कोई फिल्म बने क्योंकि फिल्म देखने वाले एक चेहरा देखेंगे, जिसके बारे में हो सकता है कि उन्होंने कल्पना भी नहीं की हो.

प्रश्न- क्या इसके ऊपर फिल्म बनाने को लेकर आपकी कोई रूचि है?

मेरी एजेंट ने इसके फिल्म अधिकार के दस लाख डॉलर की दर तय की थी ताकि कोई इसके ऊपर फिल्म बनाने की न सोचे. लेकिन जब कुछ प्रस्ताव आये तो उसने इसे बढ़ाकर 30 लाख डॉलर कर दिया. मेरी कोई रुचि नहीं है कि इसके ऊपर किसी तरह की फिल्म बने और जब तक मैं रोक सकता हूँ तब तक इसके ऊपर फिल्म बनने से मैं रोकूँगा. मैं तो यही चाहूँगा कि पाठकों और इस किताब के बीच एक तरह का निजी रिश्ता बना रहे.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि किसी किताब का फिल्म में अच्छी तरह रूपांतरण हो सकता है?

मुझे किसी ऐसी फिल्म का ध्यान नहीं आता जो किसी अच्छे उपन्यास से अच्छी बनी हो लेकिन मुझे कई ऐसी अच्छी फिल्मों का ख्याल आता है जो बुरे उपन्यासों पर बनी हैं.

प्रश्न- क्या आपने कभी खुद फिल्म बनाने के बारे में सोचा?

एक समय में मैं फिल्म निर्देशक बनना चाहता था. मैंने रोम में फिल्म निर्देशन की पढ़ाई भी पढ़ी. मैं सोचता था कि सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसकी कोई सीमा नहीं है और जिसमें कुछ भी संभव है. मैं मेक्सिको इसीलिए रहने आया क्योंकि मैं फिल्मों में पटकथा लेखक के रूप में काम करना चाहता था. लेकिन सिनेमा की एक बड़ी सीमा यह है कि यह यह एक औद्योगिक कला है, उद्योग है. फिल्मों में जो आप कहना चाहते हैं उसकी अभिव्यक्ति बहुत मुश्किल है. मैं अभी भी इसके बारे में सोचता हूँ, लेकिन अब यह मुझे विलासिता लगती है, जिसे आप दोस्तों के साथ करना चाहें बिना इस बात कि उम्मीद किये कि मैं स्वयं को अभिव्यक्त कर पाउँगा. इसलिए मैं सिनेमा से दूर बहुत दूर होता चला गया. इसके साथ मेरा सम्बन्ध उस जोड़े की तरह है जो अलग-अलग नहीं रह सकते लेकिन वे साथ-साथ भी नहीं रह सकते. मुझे फिल्म कंपनी और जर्नल में से एक चुनने को कहा जाए तो मैं जर्नल को ही चुनूंगा.

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि किसी लेखक के जीवन में सफलता या प्रसिद्धि का बहुत ज़ल्दी आ जाना अच्छा नहीं होता?

यह तो किसी भी उम्र में बुरा ही होता है. मैं तो यह चाहता कि मेरी किताबें मेरी मृत्यु के बाद प्रसिद्ध हुई होती, कम से कम पूंजीवादी देशों में, जहां आप एक तरह से माल में बदल दिए जाते हैं.

प्रश्न- अपनी प्रिय पुस्तकों के अलावा आप इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं?

मैं अजीब-अजीब तरह की किताबें पढता हूँ. एक दिन मैं मोहम्मद अली के संस्मरण पढ़ रहा था. ब्रेम स्टोकर का ड्रैकुला बड़ी अच्छी किताब है, अगर मैंने उसे कुछ साल पहले नहीं पढ़ा होता तो हो सकता है कि मैं कहता कि उसे पढ़ना समय बर्बाद करना है. लेकिन मैं किसी किताब को तब तक नहीं पढता जब तक उसके बारे में मुझे कोई ऐसा आदमी नहीं बताता जिसके ऊपर मैं विश्वास करता हूँ. मैं अब उपन्यास नहीं पढ़ता. मैंने अनेक संस्मरण और दस्तावेज़ पढ़े हैं, चाहे वे जाली दस्तावेज़ ही क्यों न हों. और मैं अपनी पसंदीदा किताबों को फिर-फिर पढता हूँ. पुनर्पठन का एक फायदा यह होता है कि आप किसी भी पेज को खोलकर अपने मनपसंद हिस्से को पढ़ सकते हैं. अब मैं केवल ‘साहित्य’ पढ़ने के पवित्र विचार को खो चुका हूँ. मैं कुछ भी पढ़ लूँगा. मैं अपने आपको अपटुडेट रखने की कोशिश करता हूँ. मैं हर् सप्ताह दुनिया भर की सारी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं को पढ़ जाता हूँ. जब मैं दुनिया की सारी गंभीर और महत्वपूर्ण पत्रिकाओं को पढ़ जाता हूँ तो मेरी पत्नी आकर कोई ऐसा समाचार सुनती है जिसके बारे में मैंने नहीं सुना होता है. जब मैं उससे पूछता हूँ कि उसने कहाँ से पढ़ा तो वह कहती है कि उसने ब्यूटी पार्लर में एक मैगज़ीन में पढ़ा. इसलिए मैं फैशन मैगजीन्स तथा औरतों की हर तरह की पत्रिकाएं, गॉसिप की पत्रिकाएं, सारी पढता हूँ. और मैं बहुत कुछ सीखता हूँ जो केवल उनको पढ़ने से ही सीखा जा सकता है. इसके कारण मैं बहुत व्यस्त रहता हूँ.

गाबो को अलविदा


गाब्रिएल गार्सिया मार्केस और उनके युवावस्था के पत्रकार मित्र प्लीनीयो आपूलेयो मेन्दोज़ा के बीच हुई एक लम्बी बातचीत पुस्तक फ्रेगरेंस ऑफ गुआवा  की शक्ल में छपी थी. उसी किताब से एक अध्याय. उनके परिवार के बारे में जानिए. 

अलविदा उस्ताद.
–कबाड़खाना

मेरे भीतर सबसे स्पष्ट और निरंतर स्मृति लोगों की बनिस्बत उस मकान की है आराकाटाका में जिसके भीतर मैं अपने नाना-नानी के साथ रहा था. यह लगातार आने वाला एक स्वप्न है जिसे मैं आज भी देखता हूं. और अपने पूरे जीवन में हर दिन में जब भी जागता हूं मुझे अनुभूति होती है, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, कि मैंने सपने में देखा है कि मैं सपने में उस घर के भीतर था. ऐसा नहीं है कि मैं वापस वहां गया होऊं; किसी भी उम्र में, या बिना किसी विशेष वजह के - पर मैं तो वहीं हूं - जैसे मैंने उसे कभी छोड़ा ही नहीं था. आज भी मेरे सपनों में रात समय का वह निषेध बनी हुई है जिसने मेरे पूरे बचपन को घेरा हुआ था. यह एक बेकाबू झुरझुरी थी जो हर शाम जल्दी शुरू होकर मेरे नींद को कोंचती रही थी जब तक कि मैं दरवाजे़ की दरार से भोर का होना नहीं देख लेता था. मैं बहुत ठीक-ठाक इसके बारे में नहीं बता सकता पर मेरे ख़्याल से वह निषेध इस तथ्य में निहित था कि रात के समय मेरी नानी के सारे प्रेत और आत्माएं साकार हो जाया करते थे. कुछ उस तरह का हमारा सम्बंध था. एक तरह का अदृश्य धागा जो हमें परामानवीय संसार से बांधे रखता था. दिन के समय मेरी नानी का जादुई संसार मुझे सम्मोहित किये रखता था - मैं उसमें डूबा रहता था, वह मेरा संसार था. लेकिन रात को वह मुझे भयभीत करता था. आज भी, जब मैं दुनिया के किसी हिस्से के किसी अजनबी होटल में अकेला सोया होता हूं, मैं अक्सर डरा हुआ जागता हूं, अंधेरे में अकेला होने के भय से हिला हुआ, और शांत होकर वापस सो जाने में हमेशा मुझे कुछ मिनट लगते हैं. वहीं मेरे नानाजी, नानी के अनिश्चितता भरे संसार में संपूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व किया करते थे. उनके होने पर मेरी सारी चिंताएं गायब हो जाती थीं. मुझे दोबारा वास्तविक संसार के ठोस धरातल पर खड़े होने का बोध होता था. अजीब बात यह थी कि मैं अपने नाना जैसा होना चाहता था - यथार्थवादी, बहादुर, सुरक्षित - लेकिन नानी के संसार में झांकने का निरंतर लालच मुझे वहीं ले जाया करता था.

अपने नाना के बारे में मुझे बतलाओ. कौन थे वो? उनके साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता था?

कर्नल निकोलास रिकार्दो मारकेज़ मेहीया - यह उनका पूरा नाम था - एक ऐसे शख़्स थे जिनके साथ संभवतः मेरी सबसे बढि़या बनती थी और जिनके साथ मेरी आपसी समझदारी सबसे ज़्यादा थी. लेकिन करीब पचास साल बाद पलटकर देखता हूं तो लगता है कि उन्होंने संभवतः कभी भी इस बात का अहसास नहीं किया. पता नहीं क्यों पर इस अहसास ने, जो पहली बार मुझे किशोरावस्था में हुआ था, मुझे बहुत खिन्न किया है. यह बहुत कुंठित करने वाला होता है क्योंकि यह एक लगातार बनी रहने वाली कचोट के साथ जीने जैसा है जिसे साफ़-सपाट कर लिया जाना चाहिए था पर वह अब नहीं हो सकेगा क्योंकि मेरे नाना की मौत तब हो चुकी थी जब मैं आठ साल का था. मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा क्योंकि उस वक्त मैं आराकाटाका से बहुत दूर था, और मुझे यह समाचार नहीं दिया गया हालांकि जहां मैं रह रहा था उस घर के लोगों को मैंने इस बाबत बात करते हुए सुना. जहां तक मुझे याद पड़ता है, मुझ पर इस समाचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तो भी एक वयस्क के तौर पर जब भी मेरे साथ कुछ भी विशेषतः अच्छी घटना होती है तो मुझे अपनी प्रसन्नता सम्पूर्ण नहीं लगती क्योंकि मैं चाहता हूं कि मेरे नाना उसे जान पाते. इस तरह से एक वयस्क के तौर पर मेरी तमाम ख़ुशियों पर इस एक कुंठा का कीड़ा लगा रहता है, और ऐसा हमेशा होता रहेगा.

क्या तुम्हारी किसी किताब का कोई चरित्र उनके जैसा है?

‘लीफ़ स्टॉर्म’ का बेनाम कर्नल एकमात्र चरित्र है जो मेरे नानाजी से मिलता-जुलता है. असल में वह पात्र उनके व्यक्तित्व और आकृति की बारीक प्रतिलिपि है. हालांकि यह एक व्यक्तिगत सोच है क्योंकि उपन्यास में कर्नल का बहुत वर्णन नहीं है और संभवतः पाठकों के मन में बनने वाली छवि मेरी सोच से फ़र्क हो सकती है. मेरे नानाजी के एक आंख गंवाने की घटना किसी उपन्यास का हिस्सा बनने के लिहाज से अतिनाटकीय हैः वे अपने दफ्तर की खिड़की से एक सफेद घोड़े को देख रहे थे जब उन्हें अपनी बांई आंख में कुछ महसूस हुआ; उन्होंने अपना हाथ उस पर रखा और बिना किसी दर्द के उनकी बांई आंख की रोशनी चली गई. मुझे इस घटना की याद नहीं है पर बचपन में मैंने इसके बारे में बातें सुनी थीं और हर दफ़े आखिर में मेरी नानी कहा करती थीं, "उनके हाथ में आंसुओं के अलावा कुछ नहीं बचा." ‘लीफ़ स्टॉर्म’ के कर्नल में यह शारीरिक कमी बदल दी गई है - वह लंगड़ा है. मुझे पता नहीं मैंने उपन्यास में यह लिखा है या नहीं पर एक बात मेरे दिमाग़ में हमेशा थी कि उसका लंगड़ापन एक युद्ध की चोट का परिणाम था. इस शताब्दी के शुरूआती वर्षों में कोलंबिया में हुए ‘हज़ार दिनी युद्ध’ के दौरान क्रांतिकारी सेना में मेरे नाना ने कर्नल की पदवी हासिल की थी. उनकी सबसे स्पष्ट स्मृति मेरे लिए इसी तथ्य से सम्बंधित है. उनके मरने से ठीक पहले उनके बिस्तर पर उनका निरीक्षण करते हुए एक डॉक्टर ने (मुझे पता नहीं क्यों) उनके पेड़ू के पास एक घाव का निशान देखा था. "वो एक गोली थी" मेरे नाना बोले. उन्होंने मेरे साथ गृहयुद्ध के बारे में अक्सर बातचीत की थी और उन्हीं के कारण उस इतिहास-काल में मेरी दिलचस्पी पैदा हुई जो मेरी सारी किताबों में आता है लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया था कि वह घाव एक गोली का परिणाम था. जब उन्होंने डॉक्टर को यह बात बताई, मेरे लिये वह एक महान गाथा के प्रकट होने जैसा था.

मैं हमेशा सोचता था कि कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया तुम्हारे नानाजी से मेल खाता होगा....

नहीं, कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया मेरे नाना की मेरी इमेज से बिल्कुल उलट है. मेरे नाना गठीले थे, उनकी रंगत दमकभरी थी और मेरी याददाश्त में वे सबसे बड़े भोजनभट्ट थे. इसके अलावा, जैसा मुझे बाद में ज्ञात हुआ, वे एक भीषण स्त्रीगामी थे. दूसरी तरफ़ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदिया देखने में जनरल राफ़ाएल उरिबे उरिबे जैसा है और उन्हीं का जैसा सादगीपूर्ण जीवन का हिमायती भी. मैंने उरिबे उरिबे को कभी नहीं देखा पर नानी बताती थीं कि वे एक दफ़े आराकाटाका आये थे और उन्होंने अपने दफ्तर में मेरे नाना और अन्य पूर्व-सैनिकों के साथ कुछ बीयर की बोतलें पी थीं. उनकी जो छवि मेरी नानी की मन में थी वह ‘लीफ़ स्टॉर्म’ में उस फ्रांसीसी डाक्टर के वर्णन से मेल खाती है जो कर्नल की पत्नी आदेलाइदा के मन में हैः वह कहती है कि जब वह उसे पहली बार देखती है उसे वह एक सिपाही जैसा नजर आता है. गहरे भीतर मुझे पता है कि उसे वह जनरल उरिबे उरिबे जैसा नजर आता था.

अपनी मां के साथ अपने सम्बंधों को तुम किस तरह देखते हो?

मेरी मां के साथ मेरे संबंधों की सबसे बड़ी ख़ासियत बचपन से ही उसकी गंभीरता रही है. संभवतः वह मेरे जीवन का सबसे गंभीर संबंध है. मुझे यक़ीन है कि एक भी ऐसी बात नहीं है जो हम एक दूसरे को न बता पाएं और ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर हम बात न कर सकें लेकिन हमारे दरम्यान हमेशा एक पेशेवर औपचारिकता जैसी रही है न कि अंतरंगता. इस बारे में बता पाना मुश्किल है पर यह ऐसा ही है. शायद ऐसा इस कारण भी था कि जब मैं नाना जी की मृत्यु के बाद अपने माता-पिता के साथ रहने गया तो मैं अपने बारे में सोच सकने लायक बड़ा हो चुका था. उनके लिये मेरे आने का मतलब यह रहा होगा कि उनके अनेक बच्चों के साथ (बाकी सारी मुझसे छोटे थे) एक बच्चा और आ गया है जिससे वह असल में बात कर सकती थीं और जो घरेलू समस्याओं का समाधान करने में उनकी सहायता करता. उनका जीवन कठोर और पुरुस्कारहीन था - कई दफ़े वे भीषण गरीबी में रही थीं. इसके अलावा हम बहुत लंबे समय तक एक छत के नीचे नहीं रहे क्योंकि कुछ साल बाद जब मैं बारह का था, पढ़ने के लिये मैं पहले बारान्कीया और फिर जि़पाकीरा चला गया. तब से हमारी मुलाकातें बहुत संक्षिप्त रही हैं, शुरू में स्कूल की छुट्टियों के वक्त और बाद में जब भी मैं कार्तागेना जाता हूं - वह भी साल भर में एक बार से ज़्यादा कभी नहीं होता और कभी भी दो सप्ताह से ऊपर नहीं. इसके कारण हमारा संबंध दूरीभरा हो गया है. इसने एक विशेष औपचारिकता का निर्माण भी किया है जिसके कारण हम एक दूसरे के साथ तभी खुल पाते हैं जब गंभीर होते हैं. हालांकि, पिछले बारह-एक सालों से, जब से मेरे पास साधन हैं, हर इतवार को एक ही समय पर मैं उन्हें टेलीफोन करता हूं, चाहे संसार के किसी भी हिस्से में होऊं. बहुत कम दफ़े जब मैं ऐसा नहीं कर पाया हूं, वह तकनीकी दिक्कतों के कारण हुआ है. ऐसा नहीं है कि मैं ‘अच्छा बेटा’ हूं जैसा कहा जाता है. मैं औरों से बेहतर नहीं हूं पर मैं ऐसा इसलिये करता हूं कि मैंने हमेशा सोचा है कि इतवार को टेलीफ़ोन करना हमारे संबंधों की गंभीरता है हिस्सा है.

क्या यह सच है कि तुम्हारे उपन्यासों की चाभी उन्हें आसानी से मिल जाती है?

हां, मेरे तमाम पाठकों में सबसे अधिक ‘इंन्स्टिंक्ट’ और निश्चय ही सबसे अधिक सूचनाएं उन्हीं के पास होती हैं और वे मेरी किताबों के चरित्रों के पीछे के वास्तविक लोगों को पहचान लेती हैं. यह आसान नहीं है क्योंकि मेरे तकरीबन सारे पात्र कई अलग-अलग लोगों और थोड़ा बहुत ख़ुद मेरे हिस्से की बनी पहेलियों जैसे होते हैं. इस बाबत मेरी मां की विशेष प्रतिभा इस बात में वैसी ही है जैसे किसी पुराशास्त्री को उत्खनन के दौरान पाई गई चन्द हड्डियों की मदद से किसी प्रागैतिहासिक जीव का पुनर्निर्माण करना होता है. जब वे मेरी किताबें पढ़ती हैं तो स्वतः ही उन सारे हिस्सों को मिटा देती हैं जो मैंने जोड़े होते हैं और वे उस मुख्य हड्डी को, उस केंद्रबिंदु को पहचान लेती हैं, जिसके इर्द-गिर्द मैंने अपने पात्र का सृजन किया होता है. कभी-कभी जब वे पढ़ रही होती हैं आप उन्हें कहते हुए सुन सकते हैं, "ओह बेचारा मेरा कोम्पाद्रे , तुमने उसे एक वास्तविक पैंज़ी के फूल में बदल दिया है", मैं उन्हें कहता हूं कि वह पात्र उनके कोम्पाद्रे जैसा नहीं है, लेकिन ऐसा मैं यूं ही कहने के लिये कह देता हूं क्योंकि वे जानती हैं कि मैं जानता हूं कि वे जानती हैं.


तुम्हारा कौन सा स्त्री-पात्र उन जैसा है?

‘क्रोनिकल ऑफ़ अ डैथ फोरटोल्ड’ तक मेरा कोई भी पात्र उन पर आधारित नहीं था. ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिड्यूड’ की उर्सुला इगुआरान में उनके चरित्र के कुछ हिस्से हैं पर उर्सुला और भी कई स्त्रियों से बनी हैं जिन्हें मैंने जाना है. सच तो यह है कि उर्सुला मेरे लिये इस लिहाज़ से एक आदर्श स्त्री है कि उसमें वे सारी बातें हैं जो मेरे हिसाब से एक स्त्री में होनी चाहिये. आश्चर्य की बात यह है कि इसका बिल्कुल विपरीत सच है. जैसे-जैसे मेरी मां बूढ़ी होती जा रही हैं वे उर्सुला की उस विराट छवि जैसी बनती जा रही हैं और उनका व्यक्तित्व उसी दिशा में बढ़ रहा है. इस कारण ‘क्रोनिकल ऑफ़ अ डैथ फोरटोल्ड’ में उनका प्रकट होना उर्सुला के पात्र का दोहराव लग सकता है पर ऐसा नहीं है. यह पात्र मेरी मां की मेरी इमेज का ईमानदार चित्र है और इसीलिये उसका नाम भी वही है. उस पात्र के बारे में उन्होंने एक ही बात कही जब उन्होंने देखा कि मैंने उनका दूसरा नाम, सांटियागा, इस्तेमाल किया है. "हे ईश्वर" वे बोलीं "मैंने पूरी जि़न्दगी इस भयानक नाम को छिपाने की कोशिश में बिताई है और अब यह सारी दुनिया में तमाम भाषाओं में फैल जाएगा."

तुम कभी भी अपने पिता के बारे में बात नहीं करते. उनकी क्या स्मृतियां हैं तुम्हारे पास? अब तुम उन्हें कैसे देखते हो?

जब मैं तैंतीस साल का हुआ तो मुझे अचानक अहसास हुआ कि मेरे पिताजी भी इतने ही सालों के थे जब मैंने उन्हें अपने नाना-नानी के घर में पहली बार देखा था. मुझे यह बात अच्छी तरह याद है क्योंकि उस दिन उनका जन्मदिन था और किसी ने उनसे कहा, "अब तुम्हारे उम्र ईसामसीह जितनी हो गई है." सफ़ेद ड्रिल सूट और स्ट्रा बोटर पहने हुए वे छरहरे, गहरी रंगत वाले एक बुद्धिमान और दोस्ताना व्यक्ति थे. तीस के दशक के एक आदर्श कैरिबियाई ‘जैन्टलमैन’. मजे़ की बात यह है कि हालांकि अब वे अस्सी के हैं और काफी ठीकठाक हालत में हैं, मैं अब भी उन्हें वैसा नहीं देखता जैसे वे अब हैं बल्कि वे हमेशा मुझे वैसे ही दिखते हैं जैसा उन्हें मैंने पहली बार अपने नाना जी के घर में देखा था. हाल ही में उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं सोचता था कि मैं शायद उन मुर्गियों में से था जो बिना किसी भी मुर्गे की मदद से पैदा हो जाती हैं. उन्होंने यह बात मज़ाक में कही थी. उनका परिष्कृत ‘ह्यूमर’ शायद थोड़ी सी उलाहना से भी भरा था क्योंकि मैं हमेशा अपनी मां के साथ अपने संबंधों के बारे में बात करता हूं - उनके साथ कभी-कभार ही. वे सही भी हैं. लेकिन मैं उनके बारे में बात इसलिये नहीं करता क्योंकि असल में मैं उन्हें जानता ही नहीं, कम से कम उतना तो नहीं जानता जितना मां को जानता हूं. ऐसा अब जाकर हुआ है जब हम दोनों करीब-करीब एक ही उम्र के हैं (जैसा मैं कभी-कभी उनसे कहता भी हूं) कि हमारे बीच शांत समझदारी का एक बिंदु आया है. मैं इसके बारे में बता सकता हूं शायद. जब आठ की उम्र में मैं अपने माता-पिता के साथ रहने गया था मेरे भीतर पहले ही से पिता की एक मजबूत छवि बन चुकी थी - मेरे नानाजी की, न सिर्फ़ मेरे पिता मेरे नानाजी जैसे नहीं थे वे उनके बिल्कुल उलटे थे. उनका व्यक्तित्व, अधिकार के बारे में उनके विचार और बच्चों के साथ उनका संबंध - सब कुछ बिल्कुल भिन्न था. यह बिल्कुल मुमकिन है कि उस उम्र में मैं अचानक आये उस परिवर्तन से प्रभावित हुआ होऊं और इसी कारण किशोरावस्था तक मुझे अपना संबंध उनके साथ बहुत मुश्किल लगने लगा हो. मुख्यतः ग़लती मेरी थी. उनके साथ कैसे व्यवहार किया जाये मुझे निश्चित कभी पता नहीं होता था. मुझे नहीं पता था उन्हें ख़ुश कैसे किया जाय और उनके कठोर स्वभाव को मैंने ग़लती से समझदारी की कमी समझ लिया था. इसके बावजूद मेरे विचार से हमने इस संबंध को ठीक-ठाक निभा लिया क्योंकि हमारे बीच कोई गंभीर झगड़ा कभी नहीं हुआ.

दूसरी तरफ़, साहित्य के प्रति मेरी रुचि के लिए मैं बहुत सीमा तक उनका आभारी हूं. अपनी युवावस्था में वे कविताएं लिखा करते थे, और हमेशा छुप कर नहीं; और जब आराकाटाका में टेलीग्राफ़ आपरेटर थे वे वायलिन बजाया करते थे. उन्हें साहित्य सदा पसंद आया है और वे बढि़या पाठक हैं. जब हम उनके घर जाते हैं हमें कभी नहीं पूछना होता कि वे कहां होंगे क्योंकि हमें पता होता है कि वे अपने शयनकक्ष में कोई किताब पढ़ रहे होंगे. उस पागल घर में वही इकलौती शांत जगह है. आपको कभी पक्का पता नहीं होता कि खाने पर कितने लोग होंगे क्योंकि वहां अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त असंख्य बच्चों, पोते-पोतियों, भतीजे-भतीजियों की बढ़ती-घटती जनसंख्या का आवागमन लगा रहता है. पिताजी को जो मिलता है, उसे पढ़ते हैं - श्रेष्ठ साहित्य, अख़बार-पत्रिकाएं, विज्ञापनों के हैण्डआउट, रेफ़्रीजरेटर की मैनुअल - कुछ भी. मुझे और कोई नहीं मिला जिसे साहित्य के कीड़े ने इस कदर काटा हो. बाक़ी की बातों के हिसाब से देखें तो उन्होंने अल्कोहल की एक बूंद नहीं पी, न सिगरेट पी लेकिन उनके सोलह वैध बच्चे हुए और भगवान जाने कितने और. आज भी वे मेरी जानकारी में सबसे फु़र्तीले और स्वस्थ अस्सी वर्षीय व्यक्ति हैं और ऐसा लगता नहीं कि उनका तौर-तरीक़ा बदलेगा - बल्कि ठीक उल्टा ही सच है.


तुम्हारे सारे दोस्तों को तुम्हारे जीवन में मेरसेदेज़ की भूमिका के बारे में पता है. मुझे बताओ तुम्हारी मुलाकात कहां हुई, तुम्हारी शादी कैसे हुई और ख़ास तौर पर यह कि तुम यह दुर्लभ काम - एक सफल विवाह कैसे कर सके?

मेरसेदेज़ से मेरी मुलाकात सुक्रे में हुई, जो कैरीबियाई तट के बस भीतरी इलाक़े का एक क़स्बा है जहां हम दोनों के परिवारों ने कई साल बिताये थे और जहां हम दोनों अपनी छुट्टियों में जाया करते थे. उसके पिता और मेरे पिता लड़कपन के दोस्त थे. एक दिन, ‘स्टूडेंट्स डांस’ के दौरान, जब वह केवल तेरह की थी, मैंने उससे शादी करने का प्रस्ताव किया. अब मुझे लगता है कि वह प्रस्ताव एक तरह से ऐसा था कि सारे पचड़े खत्म किये जाएं और उस संघर्ष से बचा जाये जो उन दिनों एक गर्लफ्रैंड ढूंढ़ने के लिये करना पड़ता था. उसने उसे ऐसा ही समझा होगा क्योंकि हमारी मुलाकातें कभी-कभार होती थीं और बेहद हल्की-फुल्की, लेकिन मेरे ख़्याल से हम दोनों में से किसी को भी इस बात का संदेह नहीं था कि सब कुछ एक दिन वास्तविकता बन जाएगा. वास्तव में यह कहानी, बिना किसी सगाई वगैरह के, दस वर्ष बाद असलियत बनी. बिना जल्दीबाज़ी और हड़बड़ी के हम सिर्फ दो लोग थे जो अंततः उस निश्चित घटना का इंतज़ार कर रहे थे. हमारे विवाह के पच्चीस साल होने को हैं और हमारा कोई भी गंभीर विवाद नहीं हुआ है. मैं समझता हूं कि इसका रहस्य यह है कि हम चीज़ों को अब भी उसी तरह देखते हैं जैसे शादी से पहले देखा करते थे. विवाह, जीवन की ही तरह अविश्वसनीय रूप से मुश्किल होता है क्योंकि आप को हर रोज़ नये सिरे से शुरूआत करनी होती है और ऐसा जि़न्दगी भर किये जाना होता होता है. यह एक सतत और अक्सर क्लांत कर देने वाला युद्ध होता है, पर अंततः उसके लायक भी. मेरे एक उपन्यास का एक पात्र इस बात को अधिक कच्चे शब्दों में यूं कहता हैः "प्यार एक ऐसी चीज़ है जिसे आप सीखते हैं."

क्या मेरसेदेज़ ने तुम्हारे किसी चरित्र की रचना को प्रेरित किया है?

मेरे किसी भी उपन्यास का कोई भी पात्र मेरसेदेज़ जैसा नहीं है. वह ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑ सॉलीट्यूड’ में अपने ही रूप में अपने ही नाम के साथ एक कैमिस्ट के बतौर दो बार आती है और उसी तरह वह दो दफ़े ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डैथ फ़ोरटोल्ड’ में भी आती है, मैं उसका बहुत अधिक साहित्यिक इस्तेमाल नहीं कर पाया हूं - इसके पीछे एक ऐसा कारण है जो बहुत काल्पनिक लग सकता है पर है नहीं - मैं अब उसे इतनी अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे जरा भी गुमान नहीं कि वास्तव में वह कैसी है?

तुम्हारे सारे दोस्तों को तुम्हारे जीवन में मेरसेदेज़ की भूमिका के बारे में पता है. मुझे बताओ तुम्हारी मुलाकात कहां हुई, तुम्हारी शादी कैसे हुई और ख़ास तौर पर यह कि तुम यह दुर्लभ काम - एक सफल विवाह कैसे कर सके?

मेरसेदेज़ से मेरी मुलाकात सुक्रे में हुई, जो कैरीबियाई तट के बस भीतरी इलाक़े का एक क़स्बा है जहां हम दोनों के परिवारों ने कई साल बिताये थे और जहां हम दोनों अपनी छुट्टियों में जाया करते थे. उसके पिता और मेरे पिता लड़कपन के दोस्त थे. एक दिन, ‘स्टूडेंट्स डांस’ के दौरान, जब वह केवल तेरह की थी, मैंने उससे शादी करने का प्रस्ताव किया. अब मुझे लगता है कि वह प्रस्ताव एक तरह से ऐसा था कि सारे पचड़े खत्म किये जाएं और उस संघर्ष से बचा जाये जो उन दिनों एक गर्लफ्रैंड ढूंढ़ने के लिये करना पड़ता था. उसने उसे ऐसा ही समझा होगा क्योंकि हमारी मुलाकातें कभी-कभार होती थीं और बेहद हल्की-फुल्की, लेकिन मेरे ख़्याल से हम दोनों में से किसी को भी इस बात का संदेह नहीं था कि सब कुछ एक दिन वास्तविकता बन जाएगा. वास्तव में यह कहानी, बिना किसी सगाई वगैरह के, दस वर्ष बाद असलियत बनी. बिना जल्दीबाज़ी और हड़बड़ी के हम सिर्फ दो लोग थे जो अंततः उस निश्चित घटना का इंतज़ार कर रहे थे. हमारे विवाह के पच्चीस साल होने को हैं और हमारा कोई भी गंभीर विवाद नहीं हुआ है. मैं समझता हूं कि इसका रहस्य यह है कि हम चीज़ों को अब भी उसी तरह देखते हैं जैसे शादी से पहले देखा करते थे. विवाह, जीवन की ही तरह अविश्वसनीय रूप से मुश्किल होता है क्योंकि आप को हर रोज़ नये सिरे से शुरूआत करनी होती है और ऐसा जि़न्दगी भर किये जाना होता होता है. यह एक सतत और अक्सर क्लांत कर देने वाला युद्ध होता है, पर अंततः उसके लायक भी. मेरे एक उपन्यास का एक पात्र इस बात को अधिक कच्चे शब्दों में यूं कहता हैः "प्यार एक ऐसी चीज़ है जिसे आप सीखते हैं."

क्या मेरसेदेज़ ने तुम्हारे किसी चरित्र की रचना को प्रेरित किया है?

मेरे किसी भी उपन्यास का कोई भी पात्र मेरसेदेज़ जैसा नहीं है. वह ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑ सॉलीट्यूड’ में अपने ही रूप में अपने ही नाम के साथ एक कैमिस्ट के बतौर दो बार आती है और उसी तरह वह दो दफ़े ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डैथ फ़ोरटोल्ड’ में भी आती है, मैं उसका बहुत अधिक साहित्यिक इस्तेमाल नहीं कर पाया हूं - इसके पीछे एक ऐसा कारण है जो बहुत काल्पनिक लग सकता है पर है नहीं - मैं अब उसे इतनी अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे जरा भी गुमान नहीं कि वास्तव में वह कैसी है?
(कबाड़खाना से साभार)

19 अप्रैल 2014

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड कैसे लिखा गया


आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है. साभार.

उनके दिमाग में बरसों पुराना उपन्यास ‘द हाउस’ घूमने लगा था। लेकिन उसे लिखें कैसे यह सोचते-सोचते बरसों बीत चुके थे। दो उपन्यास, कहानियों का संकलन प्रकाशित हो चुका थे लेकिन वह उपन्यास... बीच-बीच में उसका नाम मार्केज़ के दिमाग में कौंधता रहता था- ‘द हाउस’। अंतरराष्ट्रीय लेखक बनने की सारी तैयारी हो चुकी थी। कमी थी तो बस उस उपन्यास की जो उनको उस स्तर पर स्थापित कर देता।

बड़े नाटकीय ढंग से एक दिन उनको उस उपन्यास को लिखने का तरीका भी सुझाई दे गया। 1965 की बात है। गेराल्ड मार्टिन ने लिखा है कि एक सप्ताहांत वे अपने परिवार को घुमाने के लिए आकपुल्को ले जा रहे थे। उस पहाड़ी कस्बे तक पहुंचने का रास्ता बड़ा घुमावदार था। गाड़ी चलाते-चलाते उनको उपन्यास की पहली पंक्ति कौंध गई। उनको समझ में आ गया था कि कैसे उस उपन्यास को लिखना है जिसके बारे में वे करीब 20 साल से सोच रहे थे। उन्होंने तत्काल गाड़ी मोड़ी और मेक्सिको सिटी की ओर वापस चल पड़े। वापस पहुंचते ही उन्होंने लिखना शुरु कर दिया। 18 महीने तक खुद को उन्होंने कमरे में बंद कर लिया। 18 महीने के बाद जब वे बाहर आए तो उनके हाथ में उस उपन्यास की पांडुलिपि थी जिसने उनको बाद में नोबेल पुरस्कार दिलवाया और उनकी पत्नी के हाथों में 18 महीने के भुगतान न किए गए तरह-तरह के बिल। अपनी एक भेंटवार्ता में मार्केज़ ने बाद में कहा, ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड’ को मैंने करीब दो साल में लिखा। लेकिन टाइपराइटर पर बैठने से पहले मैंने पंद्रह या सोलह सालों तक उसके बारे में सोचा था। उनके जीवनीकार ने लिखा है कि अठारह साल तक उसके बारे में सोचा था। 

उनकी पत्नी को याद आया बरसों पहले फटेहाली की अवस्था में मार्केज़ ने उनसे बड़ी गंभीरता से कहा था, जब मैं चालीस साल का हो जाउंगा तो कुछ ऐसा लिखूंगा जो यादगार होगा। 1967 में जब ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ नामक वह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो मार्केज़ की उम्र संयोग से चालीस की हो चुकी थी। संघर्ष का दौर बीत चुका था। लेखकीय उपलब्धियों और समृद्धि का दौर शुरु हो चुका था जिसकी उन्होंने बरसों प्रतीक्षा की थी। ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ के कर्नल की तरह जो अपने कभी न आनेवाले पेंशन की प्रतीक्षा किया करता है। फर्क बस इतना था कि मार्केज़ नामक इस लेखक की प्रतीक्षा फलदायी साबित हुई। 

वे अठारह महीने मार्केज़ की पत्नी मरसेदेस के लिए शायद सबसे असुरक्षा भरे दिन थे। विज्ञापन लेखक और फिल्म पटकथा लेखक के रूप में मार्केज़ का कैरियर अच्छा चल रहा था कि अचानक उन्होंने फिर से सब कुछ छोड़ दिया। शुरुआती महीनों में तो पिछली जमा-पूंजी से घर का खर्च चलता रहा। फिर समस्या शुरु हुई। सबसे पहले मार्केज़ ने अपनी गाड़ी बेची। वह ओपेल कार जो उनको बहुत प्रिय थी और पहली बार जब उनको अपने उपन्यास के लिए पुरस्कार मिला था वह उसके पैसे से खरीदी गई थी। फिर टेलिफोन कटवाना पड़ा। एक तो घर का खर्च कम करने के लिए, दूसरे फोन रहने पर मित्रों से बात करने में उनका काफी समय बर्बाद हो जाता था। फोन नहीं रहने पर समय भी बचने लगा और बातचीन न करने पर खर्च भी। उसके बाद एक-एक करके फ्रिज, टेलिविजन, रेडियो का नंबर आया। उसके बाद बच्चों की नियमित फीस जमा हो सके इसको ध्यान में रखते हुए मरसेदेस ने अपने गहने बेचने शुरु कर दिए। दुकानदार ने दयानतदारी दिखाते हुए उनको लंबी उधारी पर सामान देना स्वीकार कर लिया जिससे घर का चूल्हा जलता रहा। मकान मालिक भी इसके लिए तैयार हो गया कि वह बिना किराया लिए उनको लंबे समय तक घर में रहने देगा। घर में उन अठारह महीनों में सामान के नाम पर मरसेदेस का हेयर ड्रायर, हीटर, बच्चों के कुछ सामान और एक टेप रेकार्डर रह गया लिखते समय जिस पर मार्केज़ गाने सुना करते थे। बीटल्स का गाना ‘हार्ड डेज़ नाइट’ उस दौरान उनका प्रिय गीत बना रहा।

पहली बार 39 साल की अवस्था में मार्केज़ कुछ ऐसा लिख रहे थे जिसकी सफलता को लेकर वे स्वयं मुतमइन थे। हालांकि कुछ ही दिनों पहले लुई हार्स्स ने प्रमुख लैटिन अमेरिकी लेखकों से बातचीत पर आधारित अपनी किताब जब अर्जेंटीना के एक प्रमुख प्रकाशक सुदामेरिकाना को दी तो उसने उनसे मार्केज़ के बारे में पूछा क्योंकि बाकी सारे लेखकों को तो वह जानता था बस एक गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के बारे में उसने नहीं सुन रखा था। उसने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने मशहूर लैटिन अमेरिकी लेखकों के बीच यह लगभग गुमनाम लेखक कौन है? हेस्स ने जवाब दिया कि आने वाले समय में देखिएगा यह बाकी सारे लेखकों से भी मशहूर हो जाएगा। खैर, और कोई आश्वस्त हो न हो मार्केज़ को लगने लगा था कि यही वह उपन्यास है जो उनको गुमनामी के अंधेरे से निकालेगा। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचाएगा।

इसीलिए इसे लिखते हुए वे बीच-बीच में अपने मित्रों के संपर्क में भी आए। विशेषकर उन मित्रों के जिनके साथ संघर्ष के दिनों में उन्होंने लेखक-वेखक बनने का सपना देखा था। बीच में एक छोटी सी यात्रा उन्होंने अराकाटक की भी की लेकिन इस बार वहां वे अपनी मां के साथ नहीं गए बल्कि उन्हीं मित्रों के साथ। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने मित्र मेंदोज़ा से कहा था, यह मेरे बाकी उपन्यासों से एकदम हटकर है। इसमें मैंने जान लगाई है। देखना या तो इस उपन्यास से या तो मैं अर्श पर होउंगा या फर्श पर गिर जाउंगा। या तो लोग इसके दीवाने हो जाएंगे या इसे पढ़ते हुए अपने बाल नोचेंगे। इन बातों से लगता है कि बहुत सोच-समझकर उन्होंने इसे लिखने का रिस्क लिया था।

इससे पहले तो यह हुआ था कि उनके उपन्यास ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ को कोलंबिया की एक लघुपत्रिका ने कृपापूर्वक प्रकाशित किया था लेकिन ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ का एक अध्याय उन्होंने स्वयं कोलंबिया के मशहूर अखबार ‘एल स्पेक्तादोर’ को प्रकाशन के लिए दिया जिसमें उनकी आरंभिक कहानियां छपी थीं। जिसके एक स्तंभकार ने उनकी आरंभिक कहानियों को पढ़कर यह घोषणा की थी कि एक नए सितारे का आगमन हो गया है। ‘एल स्पेक्तादोर’ ने उपन्यास का वह अंश 1 मई 1966 के अंक में बहुत प्रमुखता से छापा। जो पाठकों को पसंद भी आया। उनके मित्र और मेक्सिकन लेखक कार्लोस फुएन्तेस उन दिनों पेरिस में थे। मार्केज़ ने उपन्यास के पहले तीन अध्याय उनको पढ़ने के लिए भेजे। उन्होंने बाद में लिखा कि उसे पढ़कर वे चकित रह गए कि कोई लेखक इस तरह से भी लिख सकता है। उन्होंने तुरंत वह अंश लैटिन अमेरिका के एक अन्य कद्दावर लेखक जूलियो कोर्ताज़ार को पढ़ने के लिए भेज दिया। संयोग से उनकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही थी। ध्यान रहे कि मार्केज़ के विपरीत इन दोनों लेखकों की लैटिन अमेरिकी लेखक के तौर पर तब तक अंग्रेजी में पहचान बन चुकी थी। इनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से मार्केज़ का आत्मविश्वास निश्चित तौर पर और बढ़ा होगा।

कार्लोस फुएन्तेस तो उन अंशों को पढ़कर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको छपने के लिए पेरिस से प्रकाशित होनेवाली एक साहित्यिक पत्रिका के प्रवेशांक के लिए दे दिया। उसी अंक में कार्लोस फुएन्तेस का एक इंटरव्यू भी प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कहा, उन्होंने ‘हाल ही में मार्केज़ के लिखे जा रहे उपन्यास के पहले 75 पेज पढ़े। निस्संदेह यह एक मास्टरपीस है। पूरा होने के बाद जब यह छपकर आएगा तो निश्चिय ही लैटिन अमेरिका के अब तक के सारे लेखन को पीछे छोड़ देगा’। उपन्यास के छपने से पहले यह बहुत बड़ी भविष्यवाणी थी। वह भी एक जाने-माने लेखक द्वारा की गई। लोग अचंभित रह गए क्योंकि इससे पहले ऐसा कभी हुआ नहीं था।

बहरहाल, इस सारे हो-हल्ले के बीच बिना उससे प्रभावित हुए उन्होंने अपना उपन्यास पूरा कर लिया। उपन्यास पूरा होने के बाद उन्होंने दोस्त मेंदोज़ा को सबसे पहले पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा कि उपन्यास 11 बजे के करीब पूरा हो गया लेकिन घर में मरसेदेस नहीं थी कि उसे बता पाते। फोन था नहीं कि दोस्तों को फोन करके बता पाते। तीन बजे तक उनको मन मसोसकर रहना था जब घर के बाकी सदस्य आते। इस बीच उनके घर के पास एक नीली कार आकर रुकी और थोड़ी देर में उनके दोनों लड़के आए। उनके कपड़ों पर जगह-जगह नीले रंग लग गए थे जो उन्होंने पेंटिंग करते हुए लगाए थे। मार्केज़ को लग गया कि यह किताब खूब बिकनेवाली है। क्योंकि नीले रंग को वे अपने लिए शुभ मानते थे और इस किताब को पूरा करने के बाद उनको सबसे पहले नीला रंग दिखा था। उनको इसमें शुभ संकेत लग रहा था। लेखक के रूप में बेहतर भविष्य का।

इससे पहले के मार्केज़ के किताब को प्रकाशक बड़ी मुश्किल से मिले थे लेकिन इस उपन्यास को छापने के लिए अर्जेंटीना का वही मशहूर प्रकाशक पहले से ही तैयार था जिसने प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी लेखकों की भेंटवार्ताओं की किताब में मार्केज़ का नाम देखकर यह जिज्ञासा प्रकट की थी कि यह लेखक कौन है। सुदामेरिकाना नामक उस प्रकाशक को भेजने से पहले उन्होंने उपन्यास की एक पांडुलिपि बोगोटा में अपने दोस्त जरमन वर्गास को भेजी और पूछा कि उसने अपना और बारांकीला के अपने दोस्तों के जो संदर्भ दिए हैं क्या वे उचित हैं? पहले वर्गास और फिर फुएनमेयर ने लिखा कि वे बुएंदिया घराने के आखिरी वारिस के दोस्त बनकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। बाद में जरमन वर्गास ने बोगोटा के एक पत्र में उपन्यास पर लेख लिखा, एक किताब जिसकी धूम मचने वाली है। अप्रैल 1967 में प्रकाशित यह लेख एक तरह से कोलंबिया की धरती से उपन्यास की सफलता को लेकर की गई पहली घोषणा थी। बाद में जरमन वर्गास के इस लेख की भी खूब चर्चा हुई।

उसके बाद उन्होंने उपन्यास की पांडुलिपि अपने दोस्त प्लीनियो मेंदोज़ा को भिजवायी। उसने उपन्यास पढ़ने के लिए ऑफिस से छुट्टी ले ली। उपन्यास खत्म करने के बाद उसने अपनी पत्नी से कहा कि इस बार मार्केज़ ने बाज़ी मार ली है। देखना यह उपन्यास अपने जलवे बिखेरेगा। उसने कुछ और दोस्तों को भी पढ़ने के लिए उपन्यास दिया और सबकी यही राय थी कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ जैसा उपन्यास उन्होंने नहीं पढ़ा है। इसी बीच जुलाई 1966 में अखबार के लिए पांच साल बाद मार्केज़ ने कोई लेख लिखा। अखबार था वही ‘एल स्पेक्तादोर’। लेख का शीर्षक था- ‘पुस्तक के लेखक का दुर्भाग्य’। इसमें उन्होंने लिखा कि पुस्तक लिखना अपने आप में एक आत्मघाती व्यवसाय है। कोई और पेशा ऐसा नहीं है जो इतना अधिक श्रम, इतनी अधिक एकाग्रता की मांग करता हो। जबकि बदले में तात्कालिक तौर कोई लाभ नहीं होता। लेकिन सवाल उठता है कि जब लेखन के साथ इस कदर दुर्भाग्य जुड़ा है तो लेखक आखिर लिखता क्यों है। इसका जवाब है कि एक आदमी उसी तरह से लेखक होता है जिस तरह से कोई आदमी अश्वेत होता है या कोई यहूदी होता है। सफलता से प्रोत्साहन मिलता है, पाठकों के प्यार से तोष मिलता है, लेकिन ये एक तरह से अतिरिक्त लाभ हैं क्योंकि एक अच्छा लेखक तो वैसे भी लिखता रहेगा, चाहे उसके जूते मरम्मत की मांग कर रहे हों और उसकी किताबें बिक नहीं रही हों।

बहरहाल, पूरी तरह से आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने पांडुलिपि अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में प्रकाशक सुदामेरिकाना को भेजने का निश्चय किया। पत्नी मरसेदेस के साथ वे पोस्ट ऑफिस गए पांडुलिपि को ब्यूनस आयर्स के प्रकाशक को भेजने के लिए। पैकेट में टाइप किए हुए 490 पृष्ठ थे। वजन करके काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा, कुल बयासी पेसो हुए। मरसेदेस ने अपने पर्स से पैसे निकाले तो केवल पचास पेसो निकले। आधी पांडुलिपि ही उतने पैसे में भेजी जा सकती थी। भेजकर घर आए और हेयर ड्रायर और हीटर भी बेच दिया। उससे जो पैसे आए बाकी पांडुलिपि उससे प्रकाशक के पास भेज दी। कुछ दिनों बाद जब उनके मित्र अलवारो मुतिस अर्जेंटीना जा रहे थे तो उनके हाथ से उपन्यास की एक और प्रति उन्होंने प्रकाशक के पास भिजवा दी। इस उपन्यास के चक्कर में घर सारा खाली हो गया था। उपन्यास के पक्ष में सकारात्मक बात अब तक केवल यही हुई थी कि इस बार पहली बार उनको प्रकाशक नहीं ढूंढना पड़ा था। खैर, जब अलवारो मुतिस ने अर्जेंटीना पहुंचकर सुदामेरिकाना के संपादक को फोन करके बताया कि वह मार्केज़ के उपन्यास की पांडुलिपि लेकर आए हैं तो उसने छूटते ही जवाब दिया कि मैंने पढ़ लिया है और वह सचमुच बेजोड़ है।     

आखिरकार उपन्यास प्रकाशित हुआ। कहते हैं कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ उपन्यास के प्रकाशन ने केवल मार्केज़ नामक उस लेखक की तस्वीर ही नहीं बदली उसने विश्व साहित्य का मानचित्र भी बदलकर रख दिया। इस उपन्यास ने इतनी बड़ी विभाजक रेखा खींची इससे पहले किसी गैर-यूरोपीय लेखक ने नहीं खींची थी। विलियम केनेडी ने इस उपन्यास के बारे में अपने आकलन में लिखा  कि ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ के बाद लिखी गई यह पहली साहित्यिक कृति है तथा समस्त मानवजाति को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। कार्लोस फुएन्तेस ने इस उपन्यास को लैटिन अमेरिका का बाइबिल बताया। एक और प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी उपन्यासकार मारियो वर्गास ल्योसा ने इसके बारे में कहा कि यह लैटिन अमेरिकी वीरता का महान उपन्यास है। अपने एक लेख में उन्होंने इसे एक असाधारण उपन्यास बताया।

30 मई 1967 को उपन्यास प्रकाशित हुआ। स्पेनिश भाषा में करीब 352 पन्नों के इस उपन्यास की कीमत करीब दो अमेरिकी डॉलर रखी गई। पहले प्रकाशक ने तय किया कि 3000 प्रतियों का संस्करण छापा जाए। जो लैटिन अमेरिका के लिहाज से अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन जिस तरह से लैटिन अमेरिकी साहित्य के दिग्गजों ने इसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिक्रिया दिखाई थी उसके बाद प्रकाशक ने सोचा कि संस्करण को बढ़ाकर 5000 प्रतियों का कर दिया जाए। लेकिन पुस्तक विक्रेताओं ने जिस तरह से इस उपन्यास को लेकर उत्साह दिखाया उससे उत्साहित होकर प्रकाशक ने पुस्तक के प्रकाशन के दो सप्ताह पहले संस्करण को बढ़ाकर 8000 प्रतियों का कर दिया। पहले सप्ताह में पुस्तक की 1800 प्रतियां बिक गईं और बेस्टसेलर लिस्ट में उपन्यास तीसरे स्थान पर आ गया। दूसरे सप्ताह तक पहले संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। अगले छह महीनों में पुस्तक के तीन संस्करण आए और उसकी 20000 प्रतियां और बिक गईं। करीब 20 साल पहले ‘एल स्पेक्तादोर’ अखबार के समीक्षक की भविष्यवाणी आखिरकार सही साबित हुई। एक नए सितारे का जन्म हो चुका था। उस समय लैटिन अमेरिकी लेखन के तीन सितारे माने जाते थे- कार्लोस फुएन्तेस, कोर्ताज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा। यह चौथा नाम उन सब पर भारी पड़ रहा था। ऐसी असाधारण सफलता के बारे में लैटिन अमेरिका के किसी लेखक ने कभी सोचा भी नहीं था। एक आलोचक ने लिखा कि लोगों ने इसे उपन्यास की तरह से नहीं लिया बल्कि जीवन के रूप में देखा।

18 अप्रैल 2014

यह लड़का तो लेखक बनने वाला है!



आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है.

जैसे-जैसे गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ नामक वह बालक अपने नाना के घर में बड़ा होने लगा उसको लेकर घर के बड़े-बुजुर्ग तरह-तरह के सपने बुनने लगे। आखिर वह घर का पहला लड़का था, घर के सारे सपने तब उसी से जुड़ने लगे थे। बचपन में मार्केज़ को दीवार पर चित्रकारी करने की आदत पड़ गई। नाना का प्रोत्साहन था। लेकिन घर की औरतों ने जब बालक गाबितो को इसके लिए टोकना शुरु किया और घर की दीवार को गंदा करने से रोकना शुरु किया तो नाना ने अपने ऑफिस की एक दीवार को सफेद रंग से पेंट करवा दिया और बाजार से उनके लिए चित्रकारी की तरह-तरह की पेंसिलें ले आए ताकि उनके दुलारे नाती के चित्रकला अभ्यास में किसी तरह की बाधा नहीं आए। मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक दिन उन्होंने सुना कि नाना किसी से कह रहे थे कि एक दिन उनका नाती पेंटर बननेवाला है, लेकिन मार्केज़ ने उनकी इस बात को कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि पेंटर का मतलब उन्होंने समझा दरवाजे की रंगाई करनेवाला, जिसमें उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।

अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि करीब चार साल की उम्र में जो लोग उनको जानते थे वे उनको याद करते तो कहते,  वह एक दुबला-पतला लड़का था, अपने में खोया रहनेवाला। जो तरह-तरह की कहानियां बनाता था, कभी झूठे-कभी सच्चे, अक्सर झूठे। उनकी सुनाई ज्यादातर कहानियां रोजमर्रा की घटनाओं को लेकर होती थीं। वह उनको इस तरह सुनाते कि कहानियां लगने लगतीं। अक्सर वे बड़े-बुजुर्गों की कही हुई बातों को ही अपने अंदाज में सुना दिया करते। इस तरह से सुनाते कि कहानी का भ्रम होने लगता। उनको इस तरह से कहानियां सुनाते देखकर अतीन्द्रिय शक्तियों में जबर्दस्त आस्था रखनेवाली उनकी नानी इस नतीजे पर पहुंची कि हो न हो यह लड़का बाद में भविष्यवक्ता निकले, समय के आरपार देख लेने वाला।

इसका कारण यह था कि अपनी नानी की ही तरह बालक गाबितो तरह-तरह के सपनों को याद करके सुनाया करता था। जैसे एक बार उसने कहा कि कल रात मैंने एक सपना देखा है जिसमें नाना के मुँह से एक जिन्दा पक्षी निकलता दिखाई दे रहा था। नानी इस सपने से डर गईं और उनको लगा कि यह सपना इस बात की ओर संकेतित कर रहा है कि उनकी मृत्यु होनेवाली है। मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अब सोचने पर लगता है कि इस तरह की किस्सागोई जिसे आम तौर पर परिवार वाले झूठ या बातें बनाने के खाते में डालते थे असल में एक उभरते हुए लेखक की बुनियादी तकनीक थी ताकि यथार्थ को और अधिक मनोरंजक और समझने योग्य बनाया जा सके, लोगों के लिए उसे रुचिकर बनाया जा सके। 

लेकिन जल्दी ही वह वक्त आया जिसके सन्दर्भ में मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा ‘लिविंग टु टेल द टेल’ में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की इस उक्ति को उद्धृत किया है, ‘बहुत कम उम्र में ही मुझे अपनी शिक्षा को बाधित करना पड़ा स्कूल जाने के लिए’ यानी उनकी औपचारिक शिक्षा का दौर आरंभ हुआ। मार्केज़ के बचपन के किस्सों के संदर्भ में यह बात आई थी कि अराकाटक के घर में रहते हुए बचपन में उनकी व्यावहारिक शिक्षा पुष्ट हुई। लेकिन कर्नल के इस सबसे बड़े नाती की औपचारिक शिक्षा भी तो अच्छी होनी चाहिए थी। मार्केज़ के पिता अभावों के कारण तथा किसी प्रकार के आर्थिक समर्थन न होने के कारण सेकेंडरी से आगे नहीं पढ़ पाए थे लेकिन उनकी माँ ने अराकाटक के पास के शहर के बेहतरीन स्कूल में शिक्षा पाई थी। इसलिए कर्नल ने अपने नाती का नामांकन शहर के एक मांटेसरी स्कूल में करवाया ताकि वह अंग्रेजी सीखकर अमेरिका में अपने जीवन को बेहतर बनाने जा सके। उसको घर में पढ़ाने के लिए एक शिक्षिका को भी नियुक्त किया गया। लेडी फर्गुसन वह महिला थी जो मार्केज़ की पहली ट्यूटर बनीं। 

मार्केज़ ने अपने शिक्षा के दिनों को याद करते हुए लिखा है कि उनको आरंभ में पढ़ने में, पढ़ना सीखने में बहुत मुश्किल हुई। यानी आम बच्चों की तरह अक्षरों-शब्दों को पढ़ना वे सहजता से नहीं सीख पाए। पढ़ना सीखने के बाद जो पहली किताब उन्होंने पढ़ी उसका नाम उनको बहुत बाद में पता चला। अपने घर के स्टोररूम में उनको एक फटी-चिटी किताब मिली जिसके कई पन्ने भी गायब थे। लेकिन उसको पढ़ने में उनको बेहद आनंद आया और उनको पहली बार लगा कि पढ़ना भी उतना ही आनंददायक हो सकता है जितना कि अराकाटक की गलियों में घूमना या झूठ-सच बातें बनाना। उस किताब की अपनी सबसे प्रिय कहानी भी उन्होंने अपनी आत्मकथा में उन्हीं दिनों की स्मृतियों के आधार पर उद्धृत की है। कहानी यह है कि एक मछुआरे ने अपने पड़ोसी से कहा कि वह अगर उसे अपना जाल दे दे तो वह उस दिन जो पहली मछली पकड़ेगा उसे दे देगा। मछुआरे ने अपना वादा पूरा किया। बाद में उसके पड़ोस में रहनेवाली महिला ने मछली को तलने के लिए काटा तो उसे बादाम के आकार का एक हीरा उसके पेट से मिला। बहुत बाद में मार्केज़ को पता चला कि उस किताब का नाम था- ‘द थाउजेंड एंड वन नाइट्स’। बहरहाल, उस किताब को डूबकर पढ़ते देख उस दिन उसके घर के एक सदस्य ने कहा था- ‘अरे! यह लड़का तो एक दिन लेखक बननेवाला है’।

31 अगस्त 2013

नियमगिरि : देश में जारी जनांदोलनों के लिए नजीर

लिंगराज आजाद
साक्षात्कार

नियमगिरि की पहाड़ियों में बसे डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने पिछले 19 अगस्त को रायगढ़ा जिले की जरपा गांव में संपन्न हुई अंतिम पल्ली सभा में भी ब्रितानी कंपनी वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को नामंजूर कर दिया। ओडिसा सरकार उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर कालाहांडी और रायगड़ा जिले में कुल बारह पल्ली सभा ( ग्राम सभा) आयोजित की थी, ताकि आदिवासी इस परियोजना के पक्ष या विपक्ष में प्रस्ताव पारित करें। पल्ली सभाओं का यह एकमुश्त फैसला वेदांता कंपनी और राज्य सरकार के लिए एक शिकस्त की तरह है। इस फैसले का असर कितना व्यापक होगा और क्या नियमगिरि की पहाड़ियां इससे महफूज रहेंगी, इसी मसले पर नियमगिरि सुरक्षा समिति के महामंत्री और समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव लिंगराज आजाद से
अभिषेक रंजन सिंह ने बातचीत की, प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश...

प्रश्न- आजाद जी, सभी बारह पल्ली सभाओं ( ग्राम सभाओं) ने एक स्वर में नियमगिरि की पहाड़ियों पर वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना को खारिज कर दिया है। इस फैसले को किस तरह देखते हैं आप ?
उत्तर- सबसे पहले तो मैं उच्चतम न्यायालय को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस मामले की गंभीरता समझते हुए 18 अप्रैल 2013 को ओडिसा सरकार को पल्ली सभा आयोजित कराने का आदेश दिया था। जैसा कि आपको पता है कि डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने सभी पल्ली सभाओं में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को सिरे से खारिज कर दिया। मेरे ख्याल से आदिवासियों का यह फैसला देश में जल, जंगल, जमीन और पहाड़ों को बचाने के लिए जारी जनांदोलनों के लिए एक नजीर पेश करेगा। नियमगिरि की पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने जो एकजुटता दिखाई है, हम उसे सलाम करते हैं।  
प्रश्न- कालाहांडी और रायगढ़ा जिले में नियमगिरि की पहाड़ियों पर कुल 112 गांव बसे हैं, फिर ओडिसा सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में ही पल्ली सभाओं का आयोजन क्यों किया ?
उत्तर- यह सवाल काफी महत्वपूर्ण है। नियमगिरि सुरक्षा समिति भी यह मांग कर रही थी कि उन सभी गांवों में पल्ली सभाएं आयोजित हों, जहां डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध आदिवासी निवास करते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों पर 112 गांवों में डोंगरिया कोंध और पहाड़ के नीचे तराई में 50 गांवों कुटिया कोंध आदिवासी रहते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं का आयोजन किया। दरअसल, ओडिसा सरकार ने कालाहांडी और रायगढ़ा जिले की सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाकर उच्चतम न्यायालय के फैसले की मनमानी व्याख्या की है, जो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करती है। अगर सरकार ने सभी गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाती, तो निश्चित रूप से बारह की बजाय 162 गांव नियमगिरि में खनन परियोजना को नामंजूर कर देती।
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह इतनी आसानी से पीछे हट जाएगी?
उत्तर- यह कहना जल्दबाजी होगी कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह चुपचाप बैठ जाएगी, क्योंकि कंपनी ने इस इलाके में करोड़ों रुपये का निवेश किया है। निश्चित रूप से वह नई रणनीति बनाएगी। हमें पता है कि उनके पास बेशुमार दौलत और ओडिसा सरकार का समर्थन भी हासिल है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों के पास सिर्फ हिम्मत है उनसे लड़ने के लिए। पल्ली सभाओं की जीत से ग्रामीणों का हौसला बुलंद हुआ है। यह संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए है और इसकी रक्षा के लिए हम आखिरी दम तक लड़ेंगे। देश की न्यायपालिका पर हमें पूरा यकीन है कि वह गरीब और लाचार आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
प्रश्न- पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नियमगिरि की पहाड़ियों का कितना महत्व है?
उत्तर- पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए सिर्फ नियमगिरि की पहाड़ियों और यहां मौजूद जंगल ही नहीं, बल्कि सभी पहाड़ों और जंगलों की अहमियत एक जैसी है। नियमगिरि की श्रृंखलाएं हजारों साल पुरानी हैं। यहां के जंगलों में वृक्षों की सैंकड़ों किस्में हैं, अनगिनत जड़ी-बूटियां हैं और वन्यजीवों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, वराह, हिरण, हाथी समेत कई जीव-जंतु रहते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों की वजह से यहां अच्छी बारिश होती है। स्थानीय आदिवासियों की जीविका इन्हीं पहाड़ों और जंगलों पर निर्भर है। धान यहां की मुख्य फसल है, जबकि पानी की उपलब्धता से तराई इलाकों में मछली पालन भी किया जाता है। यहां खेतों में पूर्णतः प्राकृतिक ढंग से सिंचाई होती है। बोरिंग और कुएं की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यहां दर्जनों की संख्या में झरने मौजूद हैं। अब आप फर्ज कीजए, अगर बॉक्साइट के लिए नियमगिरि के जंगलों को नष्ट कर पहाड़ों को बारूदी सुरंग से तोड़ दिया जाएगा, तो यहां की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली कैसे महफूज रह पाएगी। एक तरफ पूरी दुनिया वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से चिंतित है साथ ही वन्यजीवों को बचाने के लिए नित्य नए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर पहाड़ों और जंगलों के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया जा रहा है।
प्रश्न- इन सबके बावजूद विकास की जरूरत को कैसे खारिज किया जा सकता है ?
उत्तर- सरकार की नजर में विकास क्या है ? क्या विकास की एकमात्र परिभाषा आर्थिक विकास ही हैं वह भी प्राकृतिक संसाधनों और इंसानी जान की कीमत पर। माफ कीजए, अगर सरकार की दृष्टि में विकास का अर्थ यही है, तो हमें उनका यह मॉडल स्वीकार नहीं है। आर्थिक विकास के नाम पर पिछले ढाई दशकों के दौरान काफी तबाही हो चुकी हैं। भारत में तथाकथित विकास के नाम पर 10 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ है। विस्थापित होने वालों में आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है, जिन्हें जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया है। आज तक उनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस इंतजामात नहीं किए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकारें ब्रिटिश राज्य में बनी भूमि अधिग्रहण कानून के सहारे किसानों से उनकी जमीनें छीनकर पूंजीपतियों के हवाले कर रही हैं। इसके खिलाफ जहां आवाजें उठती हैं, उन आवाजों को गोलियों और लाठियों के सहारे दबाने का प्रयास किया जाता है।
प्रश्न- नियमगिरि की पहाड़ियों में वेदांता कंपनी को खनन की इजाजत मिले अथवा नहीं इस बारे में राजनीतिक दलों की क्या राय है?
उत्तर- प्रदेश की सत्ताधारी बीजू जनता दल की भूमिका के विषय में कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नवीन पटनायक सरकार पूरी तरह उसके पक्ष में खड़ी है। वर्ष 2009 में पर्यावरणीय मंजूरी निरस्त होने के बाद वेदांता कंपनी की बजाय ओडिसा माइनिंग कॉरपोरेशन ने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल की थी, इससे साफ जाहिर होता है कि राज्य सरकार हर स्तर पर वेदांता कंपनी का सहयोग कर रही है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है, तो पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी साल 2009 में नियमगिरि के इलाकों में आए थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमारी पार्टी आपके साथ खड़ी है और आप हमें नियमगिरि आंदोलन में अपना सिपाही समझें। हालांकि कांग्रेस ने केंद्र और राज्य स्तर पर अभी तक कोई ऐसा प्रयास नहीं किया है। कम्युनिस्ट पार्टियों का समर्थन इस आंदोलन को जरूर हासिल है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी शक्ति उतनी नहीं है कि वे कुछ ज्यादा कर सकें।
प्रश्न- ओडिसा सरकार का आरोप है कि नियमगिरि सुरक्षा समिति की अगुआई में चल रहे इस आंदोलन को माओवादियों का समर्थन हासिल है, इस बात में कितनी सच्चाई है ?
उत्तर- केंद्र और राज्य सरकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जा रहीं आंदोलनों को माओवादी आंदोलन कहकर कुचलना एक शगल बन चुका है। यह पहला जनांदोलन है, जहां कानूनी हस्तक्षेप ( उच्चतम न्यायालय की ओर से पल्ली सभा कराने का आदेश ) जनांदोलनों में सकारात्मक भूमिका निभा रही है। बात जहां तक माओवादियों के समर्थन की है, तो राज्य सरकार को यह पता होना चाहिए कि माओवादियों ने पिछले दिनों पर्चा चस्पां कर पल्ली सभा को नौटंकी करार दिया था। हमारे और माओवादियों के सिद्धांत में काफी अंतर है। यह अलग बात है कि नियमगिरि बचाओ आंदोलन में उनकी ओर से कोई बाधा नहीं पहुंचाई जा रही है। हमारा यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है, वैसे भी उड़ीसा शांतिपूर्ण आंदोलनों का गढ़ रहा है। गंधमर्दन, बालियापाल, चिल्का और हीराकुंड किसान आंदोलन इसके सुंदर उदाहरण हैं।
प्रश्न- मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दावा है कि उनके शासन में प्रदेश का चौतरफा विकास हुआ है और वे राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए कृतसंकल्प हैं?

उत्तर- बेशक, विकास जरूर हुआ है, लेकिन जनता का नहीं, बल्कि उनकी सरकार में शामिल मंत्रियों, उनकी पार्टी के विधायकों और सांसदों का। बीजेडी के शासन में जनता भले ही समृद्ध नहीं हुई हो, लेकिन नौकरशाहों और अधिकारियों की चौतरफा कमाई जरूर बढ़ी है। इतिहास में नवीन पटनायक का नाम एमओयू मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज किया जाएगा, जिन्होंने निजी कंपनियों के साथ अनगिनत समझौते पर दस्तखत ओडिसा की जनता और उसकी खुदमुख्तारी को गिरवी रख दिया। 

24 जून 2013

वरवर राव से बातचीत का दूसरा भाग.


यूरोपियन मीडिया, लैटिन-अमेरिकी देशों की मीडिया या अन्य देशों की मीडिया जिसकी किसी भूमिका से आप बहुत प्रभावित हुए हों?

वैसे तो मैं मीडिया की भूमिका से प्रभावित नहीं हूँ मगर मीडिया में लिखने वाले कुछ लेखकों से जरूर प्रभावित हूँ। खासकर एदुआर्दो गालेआनो एक जर्नलिस्ट है, लैटिन अमेरिका में। ज्यादातर उसने ‘गडमेला के स्टेबल’ को लेकर बहुत कुछ लिखा है पर समग्रता से पूरे लैटिन अमेरिका में, जितने भी देशों में अमेरिकन साम्राज्य के विरोध में संघर्ष चल रहा है, उसके बारे में रिपोर्टिंग करने और किताबें लिखने के लिए एदुआर्दो गालेआनो से बेहतर और कोई नहीं है। आजकल जेम्स पेत्रास है जो खासकर भूमंडलीकरण के विरोध में लिख रहा है। वैसे देखें तो ज्यादातर लोग फ्रीलांस करने वाले इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट हैं, इन्हें हम मीडिया नहीं कह सकते। मगर वो अपने लेखन से ऐसी जगह पहुँच गए हैं कि वे जो भी लिखें तो मीडिया लेता है, रॉयल्टी देता है क्योंकि लोग पढ़ते हैं। उनका लेखन बिकता है। जेम्स पेत्रास लिखे तो बिकता है, एदुआर्दो गालेआनो लिखे तो बिकता है, चॉम्स्की लिखे तो बिकता है।

एक समय था जब बाजार सहमति का निर्माण कर रहा था, Manufacturing the consent, कन्सेंट को मेन्यूफेक्चर कर रहा था। पहले इतना प्रचार करते हैं कि आप एक खास ‘ब्रांड’ का टूथ-पेस्ट उपयोग करें मगर आपके दाँत वैसे सफेद नहीं हो सकते। पहले टूथ-पेस्ट खरीदने के लिए मानसिकता को बनाता है (माइंड सेट करता है), बाद में टूथ-पेस्ट को प्रोड्यूस करता है। यानी सहमति की उत्पत्ति होती है। यह स्थिति थी। आज यहाँ तक कि मेन्यूफेक्चरिंग डिसेंट भी मार्केट करता है। अब देखिए, तेलंगाना में एक समय हमारी न्यूज छापना अख़बार बेचने के लिए एक अच्छी चीज थी। खासकर टास्क के समय में (2004 में), फर्स्ट पेज पर हेडलाइन होती थी हमारी न्यूज। अब रामकृष्णा का इतना प्रचार हुआ टास्क के समय में, खासकर बंदूक रखे हुए जो फोटो हैं, हजारों फोटो छापे हैं हजारों न्यूज पेपर में, क्योंकि वह बिकता है। मीडिया के बारे में बात करना, एक तरह का रोजॉर्न ऑन द कन्ट्राडिक्शन्स। उसका मालिक होता है, उसका प्रॉपराइटर होता है, उसके लिए निहित स्वार्थ होता है, उसमें काम करने वाले होते हैं, खासकर जो ग्रास-रूट लेवल में स्ट्रिंगर्स से लेकर। मीडिया से जनता जो आशा करती है, वे उससे जानकार लोग होते हैं, होना चाहिए, नहीं होते हैं यह दूसरी बात है, होना चाहिए। उससे बहुत माने हुए लेखक आए हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी बहुत बड़ी भूमिका है, वाल्टेयर मूवमेंट में पत्रकारों की जो भूमिका है। जब समझते हैं कि ‘हमारे लिए इंडस्ट्री, खासकर न्यूज पेपर में काम नहीं मिल सकता है’, तो बाहर जाकर लिखते हैं। इमरजेंसी में बहुत से पत्रकारों को भी अरेस्ट किया था। कुलदीप नैयर तो जेल में था क्योंकि इमरजेंसी का विरोध कर रहा था, बाद में उसने अपने अनुभवों को लिखा। वैसे तो बहुत से माने हुए यूरोपियन जर्नलिस्ट भी हैं, मगर मेरे ऊपर जो प्रभाव है, एदुआर्दो गालेआनो का है। ऐसे भी लैटिन अमेरिका के जितने भी लेखक हैं, वे पत्रकार भी हैं, जैसे मैं हूँ। (गाब्रिएल गार्सिया) मार्केस, एक तो उपन्यासकार थे और वो रिपोर्टिंग भी कर रहे थे। यूरोप में हेमिंग्वे, जो लेखक था, वह युद्ध की रिपोर्टिंग करता था। द्वितीय विश्व युद्ध में, he was the reporter. ऐसे लोगों का प्रभाव है, हेमिंग्वे का तो बहुत प्रभाव है।



नेपाल में जनता क्रांति कर रही थी और पड़ोसी देश भारत का मीडिया क्रांति को आतंकवाद कह रहा था। आपने तब भारत की मीडिया के बारे में क्या राय बनाई थी?

नेपाल की क्रांति जब तक क्रांति रही है, वहाँ और यहाँ भी क्रांति को आतंकवाद ही कहा गया है। मगर नेपाल में जब क्रांति संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुई तब वहाँ और यहाँ की मीडिया उसकी बहुत प्रशंसा कर रही है। आपने बहुत अच्छा सवाल पूछा है। शायद एक सप्ताह पहले दिल्ली में प्रचंड आया था और द हिन्दू में दो दिनों तक सिलसिलेवार उसका साक्षात्कार आया और वह कहता है कि भारत-नेपाल का सम्बन्ध बहुत अच्छा होना चाहिए। भारत हमारी बहुत सहायता करता है। हम क्रांति छोड़कर 'प्लूरल डेमोक्रेसी' में आये हैं। हम में से जो लोग गए हैं उनसे क्रांति नहीं आ सकती, वे कुछ निश्चय कर सकते हैं मगर क्रांतिकारी नहीं हो सकते। हमें कहना है कि आज के प्रचंड और बाबूराम भट्टराई को लेकर सीताराम येचुरी हों या मनमोहन सिंह हों, बहुत प्रशंसा करते हैं क्योंकि इन लोगों ने क्रांति छोड़ दी है। ऐसा नहीं है कि नेपाल में क्रांति हो रही है तो यहाँ की क्रांति को आतंकवाद कहते हैं। क्रांति कहीं भी होती है तो इसे आतंकवाद ही कहते हैं। क्रांति नहीं हो रही है, क्रांति के नाम पर क्रांति का विरोध हो रहा हो तो बहुत प्रशंसा होती है। जो आज चल रहा है वो एक ‘continuation of corolism’ है। एक समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार थी, आज मल्टीनेशनल कंपनी की सरकार है। ईस्ट इंडिया कंपनी के इंटरेस्ट में 1857 में संघर्ष हुआ था जब ईस्ट इंडिया कंपनी से कुछ नहीं हो सका तो उससे ब्रिटिश सरकार बनी जो कंपनी की हिफाजत करती थी। क्लाइव के बारे में, वारेन हेस्टिंग्स के बारे में उसके बयान को देखें तो कंपनी को कितना फायदा मिला है? कितना नुकसान किया है? इंग्लिश पार्लियामेंट में बहुत चर्चा चली है, उसके बारे में। आज की स्थिति में देखा जाए तो यह बहुत छोटी बात है।

आज बुश क्या काम कर रहा है? या दूसरे अमेरिकन प्रेसिडेंट जो रिटायर्ड हुए हैं, क्या कर रहे हैं? ये लोग बड़ी-बड़ी कंपनियों में लग गए हैं, कम्पनियाँ इनके इंटरेस्ट में चल रही है, जिसमें क्लिंटन भी शामिल है। क्लिंटन दवा-उद्योग में है तो कोई शस्त्र-उद्योग में। तो वो इंटरेस्ट में ही राजनीति में आते हैं। अब 1930-40 के जर्मनी की स्थिति देखिए। हिटलर चुनाव में जाने से पहले 'नेशनल सोशलिज्म' का स्लोगन लेकर चुनाव लड़ा था। उसने कहा था कि ‘मैं सरकार में आऊंगा तो 'नेशनल सोस्लिज्म' लाऊंगा।’ एक तो 'नेशनल' बोलकर सेंटीमेंट को अपील कर रहा था और 'सोशलिज्म' बोलकर रिवर्सिटी को अपील कर रहा था। हिटलर का मानना था कि जर्मन ही शासन कर सकते हैं। उसको यहूदियों से समस्या थी और ‘यहूदी को ख़त्म करो’ कहते हुए उसने लगभग 90 प्रतिशत यहूदियों को ख़त्म किया। दूसरी तरफ 'नेशनलिटी' के विषय में उसका कहना था कि जर्मन, आर्यन हैं और आर्यन ही पूरी दुनिया पर शासन कर सकते हैं। एक समय था, सिकंदर का मानना था कि ग्रीक राजा ही पूरी दुनिया को जीत सकता है। इसीलिए सिकंदर दुनिया को जीतने निकला था। वह सिविल सोसाइटी का समय था। यूरोप में तो एक कहावत भी है कि जो भी नेशनल स्टेट हैं इनमें से एक-एक को अपने बारे में एक अलग भावना होती है।

फ्रांस की जनता समझती है कि वो बहुत सभ्य हैं और जर्मनी के लोग असभ्य। किसी को गाली देनी है तो उसे 'जर्मन' बोलते हैं। जर्मन समझते हैं कि हम आर्यन हैं और हम सबसे ज्यादा सभ्य हैं। इसी प्रकार अंग्रेज लोगों का मानना है कि जो हैं सो हम ही हैं और पूरी दुनिया पर हमने ही शासन किया है। सबका यही रवैया है। अब संस्कृत में देखिए आप, ‘म्लेच्छ’ कहते हैं, ‘अनटचेबल’ जो यहाँ के दलित लोग होते हैं। ‘अनटचेबल’ यूरोप में भी होते हैं। ये जो माइंड सेट होता है, इसी माइंड सेट को अपील करके वो सरकार में आया। अपनी कंपनी का यह रूल लागू करने के लिए पार्लियामेंट में उसके लिए बहुत मुश्किल हो गई और काम नहीं बना तो तो पार्लियामेंट को जला कर कम्युनिस्टों के ऊपर इसका इल्जाम लगाया और दो कम्पनियों की हिफ़ाजत के लिए वहाँ फासिज्म लाया, इसी तरह द्वितीय विश्वयुद्ध आया। आज हम देखें तो पूरी दुनिया की स्थिति एक-जैसी हो गई है। एक तरफ़ तो क्राइसिस है उनके इम्पीरियलिज्म का, दूसरी तरफ़ उस क्राइसिस से बाहर आने के लिए फ़ासिज्म। पार्लियामेंट की स्थिति देखिए आप। पार्लियामेंट चलता ही नहीं और संविधान के तहत जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसके दायरे में काम नहीं चल रहा है। सी.बी.आई. है, यह एक स्टेच्यूटरी बॉडी है। उसे जो जाँच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया है, वह अपनी रिपोर्ट कानून मंत्री को बताता है।

आदिवासियों के बारे में देखिए। फिफ्थ शिड्यूल है, सिक्स्थ शेड्यूल है, अपने जल-जंगल-जमीन के लिए तो...उसके ऊपर उनका हक है। दूसरी तरफ़ जैसे नॉर्थ-ईस्ट स्टेट्स बने हैं। यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन में जल-जंगल-जमीन के ऊपर ही नहीं, इलाके की बात भी आई है। एक तरफ़ इंटरनेशनल लॉ और यहाँ के संविधान के तहत इतने हक हैं, दूसरी तरफ़ पूरे भारत में पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक सेंट्रल इंडिया में लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों से छीन ली जा रही है, विस्थापन हो रहा है। बात क्रांति की नहीं है। संविधान कहाँ लागू हो रहा है? मौलिक अधिकार कहाँ लागू हो रहे हैं? संविधान की प्रस्तावना कहाँ लागू हो रही है? डायरेक्टिव पॉलिसीज को तो छोड़ दीजिए क्योंकि डायरेक्टिव पॉलिसीज में तो...अस्पृश्यता मिट जाना, हरेक को शिक्षा मिलना, समानता की बातें हैं। डायरेक्टिव बिल तो सरकार की तरफ से कोई बंधन नहीं है। ‘it is not binding on the part of Sarkar’, मगर एक आदर्श है। जो ‘bindingly’ सरकार के ऊपर जो धारा-56 है, वह भी नहीं लागू हो रही है। यानी जैसा संकट बढ़ता है, खासकर जो साम्राज्यवाद का संकट बढ़ता है, साम्राज्यवाद के प्रभाव में हैं सरकारें। जितने भी कानून बनाते हैं, जितने भी पार्लियामेंट-असेम्बली चलाते हैं, वे भी नहीं चल सकते। यानी उनका कानून ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है। उनका शासन ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है और उसको छोड़कर अपने असली रूप, जो फासिज्म का रूप होता है, वह दिखता है। इसमें और एक समझने वाली बात है कि यूरोप, जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की जन्म-भूमि है, खासकर इंग्लैंड और फ्रांस, वे देश भी द्वितीय विश्व युद्ध के समय संकट में आ गए। जर्मनी, इटली और जापान में पार्लियामेंट खत्म होकर फासिज्म-नाजिज्म लागू हुआ। तो तीसरी दुनिया के बारे में क्या समझ सकते हैं जहाँ संसदीय लोकतंत्र के लिए कोई जगह ही नहीं है। इसलिए कहते हैं कि संसदीय लोकतंत्र के लिए यहाँ जगह नहीं है, इसीलिए यहाँ जो लोकतंत्र आना है, वो नया लोकतंत्र ही हो सकता है जो क्रांति से होता है, शस्त्र-संघर्ष से होता है। आज वही चल रहा है भारत में।

अहिन्दी क्षेत्र की ख़बरें, राष्ट्रीय समाचार पत्र हिंदी क्षेत्र में नहीं पहुँचाते हैं। ऐसे में क्या राष्ट्रीय अखंडता प्रभावित होती है?

अब आज की स्थिति ऐसी आ गई है कि जिला संस्करण होते हैं। एक जिले की खबर दूसरे जिले में नहीं जाती है। अब हैदराबाद को ही लीजिए। एक दिलसुखनगर का संस्करण होता है, एक चिकटपल्ली का और एक उस्मानिया कैम्पस का संस्करण। दिलसुखनगर की ख़बरें आपके इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में ही रह जाती है। यानी न्यूज़ को कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और दमन को नेशनलाइज्ड कर दिया है। जनता क्या सोच रही है इसको कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और इस सोच को लेकर सरकार जो दमन चला रही है वह सेंट्रलाइज्ड रहे, कॉरपोरेटाइज्ड बना रहे। ख़ास कर आन्ध्र प्रदेश में 1974 से ईनाडु दैनिक शुरू हुआ है तभी से जिला संस्करण शुरू हुआ और न्यूज़ कम्पार्टमेंटलाइज्ड हुआ है।

हम वारंगल में रहते थे, बड़ा रेडिकल मूवमेंट था। उस रेडिकल मूवमेंट को लेकर जिला प्रशासन जो दमन चलाती थी वह खबर जिले के ही अखबार में आती थी। लेकिन अगर उसके ऊपर किसी कांग्रेसी नेता या एम.एल.ए. की प्रतिक्रिया आती तो पूरे आन्ध्र प्रदेश में खबर आती। तो बाहर वाले पूछते कि आपने यह क्या किया है? समझिये इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में एक संघर्ष चल रहा है और कुलपति का पुतला फूँका गया। कुलपति सेन्ट्रल के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट का है और उसका पुतला फूँका गया तो पूरी दिल्ली में खबर पहुँचती है। क्योंकि दिल्ली में उसी समय उसकी किताब का राष्ट्रपति उद्घाटन भी कर रहा होता है। लेकिन दिल्ली के इफ्लू में रहने वाले छात्रों पर पुलिस ने दमन किया तो यह जिला संस्करण में आता है। यह तो हो ही रहा है। देखिये न, अभी कितनी आत्महत्याएँ हुई हैं इफ्लू में। अब देखिए स्थितियाँ कितनी बदल गई हैं? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में राधाकृष्णन कुलपति बनाए गए थे। राष्ट्रीय आन्दोलन का समय था। विश्वविद्यालय के अन्दर और बाहर बहुत संघर्ष चल रहे थे। विश्वविद्यालय के अन्दर आर्मी भेजनी पड़ी थी। जब राधाकृष्णन को ले जाया गया तो उन्होंने कहा कि ‘जब तक सेना कैम्पस से बाहर नहीं आती, तब तक मैं अपना कुलपति पद नहीं संभालूँगा।’ तो प्रशासन को मानना पड़ा। पुलिस बाहर आई तो वे अन्दर गए और पद संभाला। अब उस वैल्यू सिस्टम की आज के वैल्यू सिस्टम से तुलना कीजिए। अब के कुलपति आते ही पुलिस को बुलाकर लाते हैं। हॉस्टल में स्टूडेंट की समस्या हुई है, एक मरा, दूसरा मरा! यह कौन हल करेगा? शिक्षक का क्या कर्तव्य है? मैं क्लास में पढ़ा रहा हूँ। 120 छात्र हैं, इन 120 छात्रों को पचास मिनट के लिए कंट्रोल करने का जो मेरा मोरल अथॉरिटी, मोरल रिस्पांसिबिलिटी होती है, क्या मैं ये पुलिस की सहायता से कर सकता हूँ? कैम्पस में कितने भी...यानी you lost your moral responsibility and the authority, and that’s …..लाठी बुला रहा है। यही हर जगह हो रहा है। 1982 से 1984 तक हमारे वारंगल के 12 कॉलेजों में रेडिकल मूवमेंट के कारण धारा-144 लगाई गई थी। मैं क्लास में पढ़ाता था तो खिड़की से बाहर बन्दूक दिखती था। मैंने एक जगह लिखा भी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में जर्मनी में यह बात फैल रही थी कि अब जर्मनी, पेरिस नगर पर कब्ज़ा करेगा। इस पर एक अच्छी फिल्म भी 'लास्ट लेसन' आई है। फ्रेंच शिक्षक रोजाना सबक पढ़ाता कि कल से फ्रेंच भाषा नहीं पढ़ाई जाएगी क्योंकि जर्मन लोग आ जाएंगे। The last date for teaching वाली स्थिति हमारे यहाँ भी दो सालों तक रही थी। तो यह स्थिति आजकल हर जगह हो गई है। चाहे केंद्रीय विश्वविद्यालय हो, इफ्लू हो या उस्मानिया कैम्पस हो। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के बाहर पुलिस ने मुझको रोका कि कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो? तब प्रो. वी. कृष्णा ने उनको मुझे अन्दर आने देने को कहा, तब जाकर मुझे अन्दर जाने दिया गया। यह कैसी स्थिति आ गई है? अब मीडिया को भी देखिए आप, ईनाडु के ऑफिस में प्रवेश नहीं कर सकते है! हर जगह दिखने वाला स्टेट कंट्रोल है और स्टेट के ऊपर कॉरपोरेट कंट्रोल है।

अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल को मीडिया ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नायक घोषित किया। मीडिया की इस भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

अब देखिए, तो 11 अप्रैल, 2011 को जब पहली बार अन्ना ने आन्दोलन शुरू किया था तो उस दिन मैं एम.एल. पार्टी के क्रन्तिकारी नेतृत्वकर्ता वासुदेव राव का पहला मेमोरी लेक्चर दे रहा था। मैंने कहा था कि ये तो अन्नलू के विरोध में अन्ना को लाया है। अन्नलू नक्सल को कहते हैं जिसका मतलब होता है भाई। जंगलमहल से लेकर बारह राज्यों में जो माओवादी आन्दोलन आया है, उसे मनमोहन सिंह देश के लिए बहुत बड़ा खतरा समझता है।  तो अन्नलू के प्रभाव का क्या करे, तो अन्ना हजारे को लाया। अन्ना हजारे सरकार और मीडिया दोनों के द्वारा मिलकर खड़ा किया गया है। इसके पीछे की कहानी यह है कि एक तरफ बी.जे.पी. बाबा रामदेव को प्रमोट कर रही थी। अब आप यह भी देखिए कि देश में बाबा रामदेव के बहुत उद्योग हैं, बहुत-सी दुकानें हैं। अब उन दुकानों के विज्ञापन के लिए उसको एक आश्रम चाहिए, एक पॉलिटिक्स चाहिए। अब ये सब तो एक घेरे के तहत होता है न। राजा दुष्यंत का राज चलना है तो राज चलने के लिए एक आश्रम होता है, वहाँ ऋषि होते हैं और उन ऋषियों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन देते हैं, गायें देते हैं। तो वे उसके धर्म को पालते हैं। ये ब्राह्मण हैं, वे क्षत्रिय हैं। वैसे ही रामदेव का आश्रम है, हर तरीके की बहुत-सी दुकानें हैं। अब उसको चलाना है तो उसके लिए एक धर्मनीति और एक राजनीति जरूरी हो जाती है और बी.जे.पी. उसको एक वाइस प्रेसीडेंट कैंडीडेट के रूप में देखती है। एक रामदेव है, योग वगैरह भी सिखा रहा है, उसका प्रभाव हो रहा है जिसका मीडिया भी खूब प्रचार कर रहा है। सरकार ने सोचा हम किसको लाएँ? तो अन्ना को लाया गया। सेबेस्टियन जो कि हमारे CPDR (Committee for Protection of Democratic Rights) का प्रेसीडेंट है। वह हैदराबाद के एक डेमोक्रेटिक राइट्स मूवमेंट में कह रहा था कि (अन्ना हजारे) गाँव में लोगों को पीटता है, प्रतिरोध पर लिखित रूप से प्रतिबंध लगाता है। ये कैसे प्रतिबंध लगते हैं? कैसे लागू करते हैं? ये अस्पृश्यता को बनाए रखना चाहता है। ये वैसा ही धर्म चाहता है, जैसा गाँधी ने चलाया था। खैर, जो भी हो, वैसे दो-तीन गाँवों में सुधार करने वाला आदमी जब दिल्ली में बैठता है और मीडिया का इतना बड़ा रिस्पॉन्स मिलता है तो वह अपने आपको बहुत बड़ा समझता है। यह बंबई आया था, सैकड़ों-हजारों गाड़ियाँ आई थीं। तो यह समझा कि ‘ये सब मेरे लिए आए हैं।’ अरे, ये सब तुम्हारे लिए नहीं, अपने इंटरेस्ट के लिए आए हैं। बासागुडा मुठभेड़ के बाद हम दिल्ली में धरना पर थे। कोई भी मीडिया वाला हमारे पास नहीं आया। दूसरी तरफ अन्ना हजारे का आन्दोलन चल रहा था, पूरा मीडिया वहाँ जमा हुआ थी। लगभग पचास चैनल्स स्थापित किए थे उन्होंने! अब देखिये, मीडिया के लिए अन्ना हजारे में कोई आकर्षण नहीं है। तो अब केजरीवाल को लाए हैं, अब केजरीवाल को प्रमोट किया जा रहा है। हमारा जैसा अनुभव है कि आम आदमी के टोपी वाले ने अज्ञान की रक्षा की है। आने वाले समय में कैसे डेमोक्रेसी हो सकती है? यानी "one can do or undo" आज स्थिति यह है कि कॉरपोरेट कम्पनियाँ किसी को ऊपर उठा भी सकती हैं और किसी को गिरा भी सकती हैं। अब अन्ना हजारे हो या जो भी हो। समझना यह है कि संकट क्या है? राजनीतिक अर्थशास्त्र का संकट क्या है? संसदीय लोकतंत्र का संकट क्या है? इसको ख़त्म करने के लिए अलग-अलग प्रयोग कर रहे हैं। एक तरफ दमन का दौर चल रहा है तो दूसरी तरफ ये नीति कभी शासक के लिए स्टिकेन कैरेक्टर का होता है। स्टिकी होता है और उसके साथ कैरेक्टर भी होता है। दमन तो चलता रहता है, शासन का दबाव भी बढ़ता रहता है। कभी-कभी इतिहास का भी इस्तेमाल होता है, वह चाहे अन्ना हजारे का हो या अरविन्द केजरीवाल का या फिर आम आदमी का हो। ‘आम आदमी’ भी आज कोई आम आदमी नहीं है। आम आदमी ग्रास रूट लेवल के सेंस में है।    

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग मानता है कि मीडिया भारत में माओवादियों को बहुत कवरेज देता है?


कहाँ दे रहा है सही कवरेज? जब चाहा तब बहुत कवरेज दिया। मेरा अनुभव कहता है कि एक साल पहले मुझे अंग्रेजी इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले NEWS6  हो, NDTV हो, HEAD LINES  हो या TIMES NOW  हो, महीने में चार-पाँच बार बुलाते थे। TIMES NOW  हम नहीं जाते थे,  इन्कार करते थे। एक तरफ से सभी बुलाते थे, बहस होती थी। अब तो मीडिया में कवरेज ही नहीं है। उन्होंने जब चाहा तब किया। ये भी इसलिए कि सरकार इसका प्रचार करके उसके ऊपर दमन लाने के लिए या बुद्धिजीवियों के ऊपर जो इसका प्रभाव है उसको ख़त्म करने के लिए। इनको भी बुलाएँगे उनकी राय जानने के लिए और दूसरे लोगों से उसका खंडन भी करवाएँगे। मुद्दे के अंग-अंग का खंडन करते हैं और हमें यह बताना चाहते हैं कि कोई इसका जवाब नहीं दे सका है। मगर इसमें ये असफल हुए हैं। जब असफल हो गए तो साइलेंस किलिंग शुरू किया है। मीडिया आज कोई भी बड़ा विस्फोट हो या एनकाउण्टर हो, बाहर आने नहीं देती है।