महिला. लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महिला. लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

19 अगस्त 2013

पन्द्रह अगस्त के दिन दलितों पर हुए क्रूर अत्याचार की पहली रिपोर्ट.

वे जिन्हें लगता है कि जातिगत अत्याचार की घटनाएं पुरानी हो चुकी. वे जिन्हें लगता है कि समता के संवैधानिक नारों ने लोकतंत्र को अपनी पीठ पर लाद लिया है. जिन्हें लगता है कि दिन अच्छे आ गए हैं.... सवर्ण वर्चस्व और क्रूरताओं की लड़ाईयां अवशेष हो रही हैं. उन सबके लिए बिहार की यह घटना शायद फिर से सोचने को विवश करे. सवर्णों के क्रूर अत्याचारों ने पूरे एक गांव को ही नहीं तबाह किया है बल्कि पूरे समुदाय को आगाह किया है कि संविधान और लोकतंत्र से परे उनके साशन जिंदा हैं.   
बिहार
दिनांक 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस 2013 को ग्राम डडवा बडडी,  थाना शिवसागर जिला रोहतास में धर्म स्थल रबिदास मंदिर के परिसर में घुसकर र्गैर दलित राजपूत 300 के सख्या बल में आकर दलित समुदाय के  चमार जाति पर गोला-बारूद, लाठी-डंटा, भाला, गडासा के साथ एकाएक हमला बोल दिया. दलित महिला व पुरूष तथा बच्चो के साथ मारपीट किया, जिसमें एक व्यक्ति कि हत्या हो गई है, व 39 महिला व पुरूष तथा बच्चे गंभीर रूप से घायल हैं. गैर दलितों ने रबिदास का मंदिर व दलितो के घर में किरोसीन का तेल डालकर आग लगाकर जला दिया. रबिदास मंदिर को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया है व एक दलित व्यक्ति का घर जलाकर राख का दिया गया है.
घटना का अंजाम 9 बजे सुबह में गैर दलित राजपूत गुट बनाकर आये और दलितों के रबिदास मंदिर पर हमला बोल दिया और पहले मंदिर में किरोसीन डालकर आग लगाकर जलाकर क्षतिग्रस्त कर दिया और एक दलित महिला मंजू देवी का घर भी किरोसीन तेल डालकर आग लगाकर जला दिया, जिसमे दलित महिला के लाख रूपए से ज्यादा की जान माल का क्षति हुआ है. लाखों लाख की समपत्ति का नुकसान पहुचाया गया है.
इस घटना में दलित महिला व पुरूष तथा बच्चो को मारपीट कर गंभीर रूप से घायल कर दिया है, जिसमें घायलो को पटना पी. एम. सी. एच. में इलाज के लिए रेफर किया गया हैं बाकि लोगो का सासाराम सदर हॅास्पिटल में इलाज किया जा रहा हैं. एक अन्य व्यक्ति की भी मौत हो चुकी है, 5 लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है लेकिन 10 लोगों के मरने की संभवना है.
दलित अत्याचार के घटना के 1 घटे बाद जिला प्रशासन, जिला पदाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, पुलिस पदाधिकारी व पुलिस बल के साथ पहुचे हैं. घटना की जांच कर अपराधी पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. पुलिस अपराघियों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर छोड़ दिये गए हैं.
रोहतास के पुलिस अधीक्षक ने बातचीत के द्वौरान बताया है कि हम पूरी तरह से जांच कर कारवाई कर रहे हैं. अनुसूचित जाति जनताति अत्याचार अधिनियम के अंतर्गत एफ. आई. आर. कर रहे हैं.
पुलिस पदाधिकारी, सासाराम से जन अधिकार केन्द्र, चेनारी, अध्यक्ष रविन्द्र कुमार से बातचीत में कहा है कि यहॉं के राजपूत काफी दबंग है, हम पुलिस प्रशासन के तरफ से 9 लागों को हिरासत लिया गया है. सुरक्षा के रूप में घटना स्थल पर पुलिस कैंप करेगी.
घटना का कारण: अखिल भारतीय रबिदासिया धर्म संगठन के जिला अध्यक्ष काशी राम ने बताया कि रबिदास मंदिर स्थल पर निशान सिंह की प्रतिमा बनाने को लेकर तथा निशान सिंह का झंडा लगाने को लेकर  राजपूत जाति के लोगों से दो महीने से झगडा व विवाद चल रहा था. इस विवाद की सूचना दिनांक 7, 06 2013 को जिला पदाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक रोहतास को दी गई थी, जिसमें जिला पदाधिकरी व पुलिसअधीक्षक ने दलितो एवं गैर दलित दोनो पक्ष को शांति बनाये रखने का आदेश निकाला था कि किसी पक्ष को धार्मिक स्थल पर झंडा नहीं फहरना है. झंडा तोलन यदि करना है, तो सहायक थाना बडडी में आकर झंडा तोलन करना है अन्यथा नहीं करना है. दिनाकं 14/8/2013 को भी दोनों पक्ष को बुलाकर सहायक थाना बडडी में शांति बनाने व झंडा तोलन करने से स्पष्ट मना किया गया था. इसके बावजूद भी राजपूत लोग दलित के धर्म स्थ्ल के परिसर में शहीद निशान सिंह के नाम से आजादी के दिन जबरदस्ती झांडा तोलन करने लगे जिसमें सभी दलित मिलकर इसका विरोध किये और झंडा तोलन रोकने का प्रयास किये तो  राजपूत जाति के लोग 300- 400 कि संख्या में गुट बनाकर दलितों के मदिर में हमला बोल दिया, और आजादी का झंडा तोलन करने के बहाने से घटना का अंजाम दिया.
इस घटना की सूचना जिला पदाधिकारी रोहतास को 7/06/2012 एवं 13/8/2013 को आवेदन के माध्यम से दिया गया था, जिसमे जिला पदाधिकारी ने यह फैसला दिया था कि धर्मिक स्थ्ल पर किसी समुदाय का झंडा नहीं फहराया जायेगा. इसके बावजूद भी राजपूतों ने जिला पदाधिकारी के आदेश को नहीं माना और दलितों की हत्या कर दी.
राजपूत लोग अपने पूर्वज निशान सिंह का स्मारक बनाना चाहते हैं इसी कारण घटना को आंजाम दिया गया. निशान सिंह का स्मारक लगाने के लिए हाई स्कूल के बच्चे व शिक्षको को भी इस्तेमाल किया जाता है, पहले शिक्षकों के द्वारा स्कूल में झंडा फहराया जाता है. इसके बाद दलितों के धार्मिक स्थ्ल में राजपूत आकर झंडा फहराना शुरू किया, इसमे आलमपुर ग्राम के छात्र को भी गोली लगने कि सूचना है.
दलित किशोरी बच्चियो के साथ छेडखानी करने का दुसाहस:
राजकीय माध्यमिक विद्यालय बडडी में झंडा तोलन करने के बाद 10 बजे राजपूत का एक लड़का आकाश कुमार व कुछ अन्य उसके सहयोगियों ने जाकर दलित समुदाय के बच्चियो के बारे में मंटू नाम के शिक्षक से पूछने लगा कि हरिजन की लडकियो को उठाकर ले जाने चाहते हैं और दबाव बनाने लगा, तभी स्कूल का गेट खुलते ही सभी दलित बच्चियां भागी तो उनके द्वारा दौड़कर पकड़ने का प्रयास किया गया. रानी कुमारी पिता रादारायन राम की लड़की व उसके साथ अन्य सभी लड़कियां जान बचाकर किसी तरह भाग गई.  15 अगस्त के दिन दलित समुदाय की लड़्कियां दूसरे गांव में भी छुपी हुई थी.
बच्चो पर हमला: घटना के समय धर्म स्थल पर उस्थित नाबालिक दलित बच्चों पर भी हमला बोला गया और सामुदायिक भवन व मंदिर के छत पर से बच्चों को उठाकर पटक दिया गया और कुछ बच्चों को उठाकर बाहर फेंक दिया गया. जिसमें कई बच्चे भी गंभीर रूप से घायल है. जिसका इलाज सदर हॉस्पीटल सासाराम में चल रहा है.
घटना का आंजाम देने वाला समूह:
    नाम              पिता का नाम
डॉ शम्भू सिंह      स्वं बच्चन सिंह
लखन सिंह          स्वं केशो सिंह
अक्षयबर सिंह      स्व कमला सिंह
विनोद सिंह        स्वजगदीश सिंह
रामअशिष सिंह   भाईजी सिंह
उमाकान्त सिंह    मुन्सी सिंह
श्री राम सिंह       स्वं जीरी सिंह
दीपक सिंह        
आकाश सिंह        रामजी सिंह
विभूति सिंह        विश्वनाथ सिंह
अक्षय सिंह          अक्ष्यबर सिंह
रणविजय सिंह     स्वं कुलवंश सिंह
प्रकाश सिंह         रामप्रवेश सिंह
चन्द्रशेखर सिंह     बिन्दा सिंह
शेखर सिंह          स्व रामेश्वर सिंह
हरिओम सिंह      स्व सिगासन सिंह
विकास सिंह        भिखारी सिंह
प्रकाश सिंह         रामप्रवेश सिहं

इस अत्याचार में अज्ञात लोग भी शामिल है.
पीड़ित महिला व पुरूष तथा बच्चों की सूचि:
  1 बेलास राम           मृत्यू हो गई, अंतिम दाससंस्कार भी करवाया है.  16 कृष्णवती देवी
                                                                             17 बिन्दू देवी 
  2 शुकिया देवी                                                       18 देवती देवी
  3 विकास कुमार        घायल, बच्चा                            19 बिमला दवी            
  4 संतोष कुमार           ,                                           20 तेतरी देवी
  5 राजेशकुमार              ,,                                        21 अस्तारनी देवी
  6 राहुल कुमार            ,,                                         22 अनिता देवी
  7 हलखोरी राम                                                     23 प्रकाशराम
  8 आकाली देवी             महिला                               24 तेजा साधु  मंदिर पुजारी
  9 मीना देवी                 ,,                                       25 राजा राम             
 10 सरस्वती देवी                                                    26 नागिना राम
 11 जोखना देवी                                                      27 दीपक राम 
 12 चम्पा देवी       र्गभवती महिला                            28 मगरू राम            
 13 शुकिया देवी                                                      29 फुलकुमारी
  14 उमरावती कुवर    15 सरोजा देवी                       30 सुदामा राम
31 रामरतल राम                                                     32  सहतूराम
33 विद्यार्थी राम                                                      34 जिज्ञासी देवी
35 सरजु राम                                                          36 मनोज राम
37 नथुनि राम                                                         38 प्यारी देवी
 40 अमित नन्दन
 39 रमेश कुमार
ग्राम बडडी: यह राजपूत बहुल गांव है दलितों की संख्या काफी कम है. यहॉं से जिला मुखयालय कि दूरी 25 किलो मीटर थाना और प्रखण्ड भी लगभग 25 किलोमीटर है, लेकिन सहायक थाना से घटना स्थल कि दूरी 200 मीटर है. सहायक थाना भी समय पर नहीं पहुचा दलितो के सुरक्षा में. केन्द्र सरकार व राज्य सरकार तथा सरकार के सभी विभाग व आयोग तथा सामाजिक संगठनो से अनुरोध है कि दलितो कि सुरक्षा में मदद, एवं अपराधियों को गिरफ्तार कर सजा दिलाने में सहयोग प्रदान किया जाये. सभी दलितों को सम्मान से जीने के अधिकार की गांरटी दी जाये.
क्या यही देश की आजादी है? लोकतंत्र के नाम पर यह क्रूर अपमान: है. 15 अगस्त के दिन लम्बे चौड़े लोकतंत्र पर दिए गए भाषण पर शर्मिंदा होना चाहिए. प्रधान मंत्री एवं मुख्य मंत्री तथा अन्य नेताओं ने जो भी कहा कि दलितो के लिए ये  कर रहे हैं और देश आज़ाद है. वो सब झूठी दलीले हैं और यह सब बकवास है. आजाद भारत देश में दलित गुलाम है, जिसे वे स्वतंत्रता का दिन कहते हैं उसी दिन राजपूतों ने संविधान का अपमान एवं मौलिक अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, अभिक्ति का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जीवन के अधिकार का घोर उलंघन किया है.
                                          जन अधिकार केन्द्र,चेनारी रोहता, बिहार

संपर्क: 09572427099

14 जनवरी 2013

मैं अपनी जिंदगी के लिए लड़ी और जीत हासिल की

-सोहेला अब्दुलाली
तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.
मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.
यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.
वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.
जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.
मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.
बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.
उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.
इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.
मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.
जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.
रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.
मूलतः अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का पुष्यमित्र ने हिंदी में अनुवाद किया है.

26 मई 2012

माओवादी सिनी सय की कहानी.


सिनी साय

सारदा लहांगीर
सात मई को मेरे एक पत्रकार मित्र ने सूचना दी कि जाजपुर पुलिस ने एक बुजुर्ग महिला माओवादी को अस्पताल से गिरफ्तार किया है. नाम है उसका सिनी सय. नाम सुनकर मैं चौंकी. मैंने झटपट अपना कैमरा निकाला ओर जाजपुर की ओर निकल पड़ी. पिछले कई सालों से सिनी सय को मैं ढूढ रही थी पर उसका कोई अता-पता नहीं था.
रास्ते भर मैं सिनी सय के बारे में सोचती रही. पचपन साल की सिनी सय 1997 में जाजपुर जिले के गोबरघाटी गांव की सरपंच के तौर पर जानी जाती थी. इस तेज-तर्रार आदिवासी महिला सरपंच को लोग उसके व्यवहार कुशलता के कारण जानते थे. लेकिन यह सिनी सय का अधूरा परिचय है.
2006 में कलिंगनगर में टाटा कंपनी के खिलाफ जब आदिवासियों का आंदोलन शुरु हुआ तो इस विस्थापन विरोधी आंदोलन में सिनी सय ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी लेकिन इस सक्रियता की कीमत सिनी सय ने जिस रुप में चुकाई वह दहला देने वाला है. टाटा कंपनी की सुरक्षा और आदिवासियों को बेदखल करने की कोशिश ने पुलिस ने जिन चौदह आदिवासियों को गोलियों से भून दिया, उनमें सिनी सय का 25 साल का जवान बेटा भगवान सय भी शामिल था. जिस जवान बेटे को लेकर सिनी सय इस आंदोलन में गई थी, वहां से उनके बेटे की हाथ कटी हुई लाश घर लौटी.
सिनी सय के बारे में सोचते-सोचते मैं करीब साढे पांच बजे जाजपुर अस्पताल पहुंची. जाहिर है, वहां पुलिस का कड़ा पहरा था. आने-जाने वालों पर प्रतिबंध था. खासकर मीडिया पर. किसी तरह पुलिस वालों को मैंने राजी किया और दो मिनट के निर्देश के साथ मैं सिनी सय के कमरे में जा पहुंची. 
अस्पताल के बिस्तर पर एक साधारण-सी सूती साड़ी में सिनी सय लेटी हुई थी. मुझे पहचान नहीं पाई. मैंने याद दिलाया तो सबसे पहले मेरा हाल-चाल पूछा. फिर बहुत सुस्त और धीमी आवाज में उसने कहा-‘‘मेरी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती, मलेरिया हुआ है, जिसके ईलाज के लिए मैं यहां भर्ती हुई थी और तभी से पुलिस मेरे पीछे पड़ी हुई है.’’
सिनी सय बहुत कमजोर दिख रही थी लेकिन उसकी बातचीत से ऐसा लग रहा था, जैसे मैं उसी पुरानी सिनी सय से मिल रही हूं. उसका बोलना जारी था-’’मुझे जेल जाने का कोई दुख नहीं है. और ना ही मैं इस बात की परवाह करती हूं कि मेरे बारे में कोई क्या सोचता है. मैंने अपने लिए जो रास्ता चुना है, उसमें मुझे इस बात की संतुष्टि है कि अपने मरे हुए बेटे को मैं इंसाफ दिलाने की कोशिश कर रही हूं.’’
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उससे इस हालत में क्या सवाल करुं. मेरी चुप्पी को देखकर उसने फिर से कहना शुरु किया- “आप जानती है कि जमीन की लड़ाई, अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए मेरे बेटे ने अपने सीने पर पुलिस की गोली खाई. मेरे सामने उसे न सिर्फ बेरहमी से मारा गया बल्कि बाद में उसकी लाश के भी टुकड़े कर दिए गए. एक मां यह कैसे बर्दाश्त करती कि जिस बेटे को मैंने नौ महीने अपनी कोख में रखकर जन्म दिया, उसी बेटे को पुलिस वाले बेरहमी से एक लाश में बदल दें.’’
कमरे की बाहर की ओर बैठी पुलिस की तरफ इशारा करते हुए उसने फिर कहा-’’इन्होंने बड़ी कंपनियों की खातिर हमें अपने घर, अपनी जमीन, यहां तक की हमारी रोजी-रोटी से भी बेदखल कर दिया. इनकी सहायता, इनका पैसा क्या मुझे मेरा बेटा वापस लौटा सकता है? शायद नहीं, हमारे सारे दर्द, सारी तकलीफें और घुटन भरी जिंदगी की जिम्मेवार सरकार है. और मैं उसे कभी माफ नहीं कर सकती. अपने लोगों के हक के लिए लड़ना मैं नहीं छोड़ूंगी.’’ यह सब कुछ कहते हुए उसकी आंखों में मुझे एक अजीब सा आत्मविश्वास दिखाई दिया. मैं उससे कुछ और बात कर पाती कि एक पुलिस वाले ने मुझे बाहर जाने को कहा. बाहर आकर मैं फिर से एक बार उससे मिलने की उम्मीद में बैठी रही. पत्रकार हूं, मन में तरह-तरह के सवाल थे. पर पुलिस ने हमें मिलने की इजाजत नहीं दी. मैं अपने घर भुवनेश्वर के लिए निकल पड़ी.
सिनी सय से मेरी पहली मुलाकात दो जनवरी 2006 को हुई थी. दिन के दो बजे थे और हमें खबर मिली कि कलिंगनगर इलाके में पुलिस और आदिवासियों के बीच मुठभेड़ हो रही है. पुलिस की गोली से कुछ आदिवासियों के मरने की भी खबरें आ रही थी. मेरे साथ-साथ कुछ और पत्रकार साथी अपनी कैमरा टीम के साथ कलिंगनगर की ओर निकल पड़े. लगभग ढाई से तीन घंटे के बाद जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो हमने देखा कि सड़क के एक तरफ अपनी बंदूकें लिए पुलिस खड़ी थी और दूसरी तरफ अपना परंपरागत हथियार लिए आदिवासी. पुलिस वालों ने हमें सड़क पार करके दूसरी तरफ जाने से मना किया. लेकिन हम गांव की ओर बढ़ गए. अंधेरा घिर चुका था और चारों तरफ अलग-अलग गुटों में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी जगह-जगह खड़े थे. कुछ आदिवासियों ने हमें घेर लिया और वे हमें वहां से चले जाने को कहने लगे. वो इतने गुस्से में थे कि कुछ कहना-सुनना नहीं चाह रहे थे. आदिवासियों का एक दल गांव में पुलिस को घुसने से रोक रहा था तो कुछ और लोग इधर-उधर मरे पडे़ आदिवसियों की लाशों को इकट्ठा कर रहे थे. कलिंगनगर में टाटा कंपनी अपनी परियोजना के लिए आदिवासियों की जमीन पर कब्जा चाहती थी, जिसका आदिवासी विरोध कर रहे थे. हजारों आदिवासी अपने विस्थापित होने के खिलाफ थे जिसे लेकर यह संघर्ष हुआ था. टाटा कंपनी के साथ एमओयू कर चुकी सरकार का कहना था कि कंपनी के आने से विकास होगा. लेकिन आदिवासी अपने जल, जंगल, जमीन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे.
अंधेरे में एक लाश की तस्वीर लेने के लिए मेरे कैमरामेन ने जैसे ही कैमरा घुमाया तभी कुछ आदिवासी भड़क उठे और हमें मारने के लिए घेर लिया. हमारा कैमरा उनकी हाथ में था. इससे पहले कि वो सरकार और पुलिस का गुस्सा हम पर उतारते, हाथों में तीर-धनुष लिए हुए एक प्रौढ़ महिला सामने आई और उसने आदिवासियों को रोका. मैंने देखा, वह महिला बड़े आत्मविश्वास के साथ उनका नेतृत्व कर रही थी. उसने आदिवासियों को हमें किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाने की हिदायत दी. पूछने पर पता चला कि उस आदिवासी महिला का नाम सिनी सय है.  
रात के आठ बज चुके थे. हमें कुछ विजुअल और इंटरव्यू लेकर वापस होना था. जिससे जल्दी से जल्दी खबरें भेजी जा सके. जैसे-तैसे हमने कुछ शूट किया और वापस आ गए. देर रात भुवनेश्वर पहुंचने तक पुलिस की गोली से चौदह आदिवासियों और एक पुलिस वाले की मारे जाने की पुष्टि हो चुकी थी. अपनी खबर फाईल करने के बाद मैं अगले दिन की तैयारी करने लगी. वैसे भी आंखों में नींद कहा थी!
अगले दिन यानी तीन जनवरी 2006 को मैं अपनी टीम के साथ फिर से कलिंगनगर की ओर निकल पड़ी. उस सुबह तक देशी-विदेशी मीडिया के लिए कलिंगनगर हेडलाईन में तब्दील हो चुका था. जब हम कलिंगनगर पहुंचे तो गोबरघाटी गांव से एक किलोमीटर दूर मुख्य सड़क पर आदिवासियों ने लाशों को रखकर रास्ता जाम कर रखा था. हमने अपनी गाड़ी कलिंगनगर थाने के पास छोड़ी और उस ओर निकल पड़े, जहां चौदह लाशों को घेरकर आदिवासी खड़े थे और सरकार और पुलिस के खिलाफ नारा लगा रहे थे.
हमें देखकर आदिवासी फिर से तैश में आ गए थे. हमने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया कि हम पत्रकार हैं और हमारा काम खबरों को देश-दुनिया तक पहुंचाना है. आदिवासियों के गोल घेरे में जाने पर मैंने देखा कि सिनी सय अपने बेटे की लाश पर गिरकर बिलख-बिलखकर रो रही थी. मुझे देखकर उसने हाथ जोड़ा और रोते हुए कहा-’’मैडम पुलिसवालों ने मेरे जवान बेटे को मार डाला.’’
सिनी सय का 25 साल का बेटा भगवान सय, जो इस विधवा मां और छोटे-छोटे पांच भाई-बहनों का इकलौता सहारा था, इस आंदोलन की बलि चढ़ चुका था. उसने फिर रोते हुए कहना शुरु किया-’’मेरे बेटे को गोली लगी थी. पुलिस मेरे जख्मी बेटे को बेरहमी से मार रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाई. सरकार ने ये अच्छा नहीं किया हमारे साथ. मेरा बेटा हमारा सहारा था. अब मैं और मेरे बच्चे क्या करेंगे?’’
उसकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. माहौल भावुक हो रहा था. सब तरफ लाशें पड़ी थी, लोग रो रहे थे. किसी ने अपना बेटा तो किसी ने अपना पति खोया था. हमने कुछ लोगों से बातचीत की और फिर भुवनेश्वर लौट आए.
चौदह आदिवासियों के मारे जाने की इस बड़ी खबर के सिलसिले में हमें रोज भुवनेश्वर से कलिंगनगर जाना होता था. चार जनवरी को पुलिस ने लाशों का पोस्टमार्टम किया और फिर उन लाशों को उनके परिजनों को सौंप दिया गया. पांच जनवरी को जब हम गांव में पहुंचे तो आदिवासी सकते में डूबे हुए थे. हमने देखा, सिनी सय के बेटे भगवान सय के दोनों हाथ की कलाई कटी हुई थी. दूसरे आदिवासियों की लाश भी सलामत नहीं थी. मैंने देखा सिनी सय एकटक अपने बेटे की लाश को देखे जा रही थी. उसकी आंखों में आंसू का एक बूंद तक नहीं था. एक औरत होने के नाते मैं उसकी चुप्पी को महसूस कर पा रही थी. 
इस घटना के कई दिनों तक कलिंगनगर के इलाके में विभिन्न दलों के राजनेताओं, पत्रकारों और स्वयंसेवी संगठनों का आना-जाना चलता रहा. तीन-चार दिन के बाद आदिवासियों ने लाशों का अंतिम संस्कार किया. माहौल थोड़ा शांत हो रहा था पर तनाव फिर भी था. आदिवासियों का सड़क जाम आंदोलन जारी था. इस दौरान मैंने सिनी सय से कई दफा बातचीत की. बेटे की मौत का दर्द, सरकार के खिलाफ गुस्सा और आने वाली जिंदगी की चिंताएं उसके चेहरे पर हमेशा दिखती थी. लेकिन पहले दिन के बाद मैंने उसकी आंखों में आंसू नहीं देखे. 
इस घटना के एक साल बाद दो जनवरी 2007 को पुलिस गोली से मारे गए 14 आदिवासियों की पहली बरसी पर आयोजित शहीद दिवस के कार्यक्रम में मेरी मुलाकात सिनी सय से हुई. इस आयोजन में अलग-अलग राज्यों से हजारों की संख्या में आदिवासी पहुंचे थे. इसके अलावा देश भर के पत्रकार, स्वयंसेवी संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज तो थी ही.
इसी भीड़ में शामिल सिनी सय ने मुझे देखते ही पहचान लिया. एक बार फिर मैंने सिनी सय से लंबी बातचीत की. इस इंटरव्यू में सिनी सय ने एक बार फिर से अपनी पुरानी बातें दुहराई- “ये हमारे हक की लड़ाई है, अपनी जमीन, अपनी रोजी-रोटी हम किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकते. अपने लोगों के हक के लिए मैं एक तो क्या, दस बेटों को भी कुर्बान कर सकती हूं. हम अपने लोगों के शहादत को कैसे जाया कर सकते है ?”
सिनी सय का आत्मविश्वास मुझे हमेशा चौंकाता था. सहमति-असहमति के ढेरों मुद्दे थे लेकिन गांव की एक अनपढ़ आदिवासी महिला होकर भी सिनी सय अपने हक की लड़ाई के लिए जिस तरह सबसे आगे थी, एक औरत होने के नाते उसे देखकर मुझे गर्व होता था. बातचीत के बाद हमने एक-दूसरे से विदाई ली. यह सिनी सय से मेरी आखिरी मुलाकात थी.
2007 के बाद कलिंगनगर में आदिवासियों और टाटा कंपनी के बीच चल रहे संघर्ष को कवर करने के लिए मैं कई बार उस इलाके में गई. लेकिन सिनी सय से मेरी मुलाकात नहीं हो पाई. इस दौरान उस इलाके में छोटी-बड़ी कई घटनाएं हुईं. कुछ आदिवासी अपनी जमीन देने को राजी हो गए थे. मारे गए आदिवासियों के लिए सरकार मुआवजा दे रही थी. टाटा कंपनी और सरकार की तरफ से ढेरों लुभावने नारे हवा में तैर रहे थे. पर कुछ आदिवासी अभी भी अपनी जमीन छोड़ने को राजी नहीं थे. जो अपनी जिद पर अड़े थे, उनके घरों को बुलडोजर से तोड़ दिया गया. उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया. पुलिस ने गांव पर कब्जा कर लिया था और डरे-सहमे आदिवासी जंगलों में छुपते फिर रहे थे. बीमार बच्चों और महिलाओं का बुरा हाल था. पुलिस के डर से वे अस्पताल तक नहीं जा रहे थे.
इन आदिवासियों की भूख-गरीबी और उनके डर को मैंने कई बार अपने कैमरे में कैद किया. साल गुजरते गए, इस दौरान मैं कई-कई बार कलिंगनगर हो आई. जब भी मैं वहां गई सिनी सय को मैंने जरुर तलाशा लेकिन उसका कहीं अता-पता नहीं था.
अब इतने सालों बाद अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी हुई सिनी सय मुझे मिली. उसे इस हालत में देखकर और उसकी बातें सुनकर मैं ये सोच नहीं पा रही थी कि मैं क्या प्रतिक्रिया दूं.
सिनी सय के बारे में कुछ और जानने की इच्छा ने मुझे उसके मंझले बेटे लक्ष्मीधर सय से मिलाया. कलिंगनगर गोली कांड के समय लक्ष्मीधर सय बारहवीं में पढ़ता था. आज वो कलेक्टर के कार्यालय में जूनियर क्लर्क की नौकरी कर रहा है. यह नौकरी उसे भाई की मौत के मुआवजे के तौर पर मिली है.
लक्ष्मीधर से ये पता चला कि उसका छोटा भाई, जो उस समय सातवीं कक्षा में पढ़ता था, आज एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा है. तीन बहनों की भी शादी हो चुकी है. 
सिनी सय को बतौर मुआवजा 11 लाख रुपए भी मिले थे, जो उनके नाम से बैंक में जमा हुए थे. लक्ष्मीधर सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सब मुद्दों पर कोई भी बातचीत नहीं करना चाहता था. मैंने कैमरा बंद किया, फिर उसने बातचीत शुरु की. बातचीत में उसने वही पुराना मंजर उसने मेरी आंखों के सामने रख दिया-‘‘ उस घटना के वक्त मैं सोलह-सत्रह साल का था और मेरे भैया की मौत के साथ ही मेरा परिवार पूरी तरह बिखर गया था. मेरी पढ़ाई छूट गई. पिता का साया तो बचपन में ही उठ गया था लेकिन इस घटना ने मां को भी बुरी तरह से तोड़ दिया. मां हमसे भी कटी-कटी रहने लगी.’’
‘‘ इस घटना के बाद मैंने कभी भी मां को मुस्कुराते नहीं देखा. भाई की कटी हुई कलाई वाली लाश देखने के बाद तो मां मानो पत्थर की बन गई थी. उसकी आंखों में मैंने कभी आंसू भी नहीं देखे थे. घटना के एक साल के बाद मुझे यह नौकरी मिली और मैं यहां जाजपुर चला आया.’’
मुआवजे के बतौर जो पैसे मिले थे, वो सिनी के नाम से बैंक में जमा थे. उनमें से सिर्फ ढाई लाख रुपए उसने छोटे भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए खर्च किए थे. इस दौरान घर में लोगों का आना-जाना लगा रहता था. कोई इंटरव्यू के लिए आता था तो कोई शोक जताने, कोई सहानुभूति के शब्द कहने तो कोई अपना ही दुखड़ा रोने. फिर 2008 के आसपास एक दिन सिनी सय घर से चली गई. कहां, इसकी खबर तो घरवालों को भी नहीं थी.
लक्ष्मीधर के अनुसार अपनी मां से उनकी एक-दो बार बातचीत हुई. मां ने अपने इस तरह गायब होने को लेकर कोई बात नहीं बताई. लेकिन मां के जाने के बाद से ही घर में पुलिस वालों के आने का सिलसिला शुरु हो गया. पूछताछ के बहाने पुलिस कभी भी घर में आ धमकती. परिवार के लोग परेशान हो गए. फिर एक दिन सिनी ने लक्ष्मीधर को यह खबर भिजवाया कि वो उन लोगों से दूर ही रहेंगी क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि उनकी वजह से उनके परिवार को कोई परेशानी हो. पुलिस रिकार्ड में सिनी सय का नाम एक माओवादी के तौर पर दर्ज हो चुका था.
लक्ष्मीधर से विदा होते हुए मैंने पूछा-’’ तुम्हारी मां को पुलिस ने माओवादी के रुप में गिरफ्तार किया है. क्या सोचते हो ?’’
लक्ष्मीधर ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया- “पुलिस के लिए, आपके लिए मेरी मां एक माओवादी हो सकती है पर मेरे लिए वो सिर्फ एक मां है. एक ऐसी मां, जो अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है. एक ऐसी मां, जो अपनी ममता सिर्फ अपने बच्चों पर नहीं बल्कि दूसरों के बच्चों पर लुटाने और उनकी जिंदगी संवारने से पीछे नहीं हटती. ऐसी मां पर मुझे गर्व था, है और रहेगा.’’
सिनी सय और लक्ष्मीधर से मिलने के बाद मैं इन दिनों उहापोह में हूं. एक औरत होने के नाते सिनी के दर्द को मैं महसूस कर सकती हूं. एक आदिवासी महिला के संघर्ष और उसकी जीजिविषा को लेकर भी कई-कई सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं. एक गणतांत्रिक देश की नागरिक और पत्रकार होने के नाते मेरे लिए सिनी सय के किसी भी हिंसात्मक रास्ते का समर्थन करने का तो सवाल ही नहीं उठता लेकिन इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है कि सिनी सय सही थी या गलत. आप अगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाएं तो मुझे जरुर बताइएगा.
साभार-रविवार.कॉम.

04 मई 2012

ए प्रजेंटेशन विदाउट हेडिंग.


एक सेमिनार में पढ़े गए प्रपत्र का अंश.
 चन्द्रिका
रात के बारह बजे आप किसी महिला को एक पहाड़ी से दूसरी पहड़ी पर बेखौफ जाते हुए देख सकते हैं, दिल्ली में ८ बजे के बाद महिलाएं बसों में चढ़ते हुए डरती हैं. अरूंधती रॉय.
 यह दण्डकारण्य है, माओवादियों की जनताना सरकार. मनमोहन सिंह के लिये देश का सबसे बड़ा खतरा और एक महिला के लिये खतरे की सबसे बेखौफ जगह. मैं रुकमिणी, रूपा, हेमा अक्का, सरोज, नर्मदा जैसी महिलाओं के विस्थापन से अपनी बात शुरु करना चाहूंगा. मैं चाहूंगा कि जो नाम मुझसे छूट गये हैं उन्हें जोड़ लिया जाए. जबकि यहाँ मैं अपनी प्रस्तुति दे रहा हूं, शायद वे अपना नाम बदल रही होंगी, शायद उन्हें पकड़ लिया गया हो, शायद वे किसी मुठभेड़ में मारी गयी हों. या बगैर मुठभेड़ के मुठभेड़ में मारी गयी हों. या शायद............... कल भी यह शायद शायद ही बना रहेगा, हर बार की तरह. क्योंकि उनके मौत की खबरें अखबारों तक नहीं आयेंगी, कोई टीवी. उनकी तस्वीरें नहीं दिखायेगा.
क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, (के.ए.एम.एस.) आज देश का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत महिला संगठन. जिनके कंधों पर बंदूकें हैं, और जेहेन में वर्तमान संरचना का खारिजनामा. उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में बस वह जमीन चाहिए जहाँ उनकी पीढ़ीयां ६०० ईसा पूर्व से रहती आयी हैं. जिसे अब टाटा एस्सार और जिंदल को दिया जा रहा है. ६०० इसापूर्व से लेकर १३२४ तक दण्डकारण्य में गणतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी. यह आदिवासियों की अपने लिये अपनी संस्कृति के अनुरूप बनाई गयी प्रणाली थी. जिसके बाद यहां राजतंत्र का प्रभाव रहा पर वह प्रभाव ज्यादातर इस रूप में रहा कि दण्डकारण्य के जंगलों से राजाओं को हाथियों की जरूरत होती थी और इन जंगलों से वे इसकी पूर्ति करते थे. आदिवासी समाज में राजशाही गैर-आदिवासी समाजों जैसी कभी नहीं रही बल्कि यह संक्रमण था कि राजशाही जैसी व्यवस्थाएं आदिवासी समाजों में पहुंची. बावजूद इसके राजा की सेना वहां की पूरी जनता होती थी और राजा बाहरी संबंध बनाने का एक माध्यम. यह १९६५ तक (राजा भंजदेव) दंडकारण्य के इलाके में होता आया. आदिवासियों के समाज में बाहरी शासकों ने कोई सांस्कृतिक हस्तक्षेप नहीं किया. अंग्रेजी शासन काल में जब भी दण्डकारण्य में दखल का प्रयास किया गया, आदिवासियों ने उसका विरोध किया, जब मैं आदिवासियों कह रहा हूं तो इसमे महिला-पुरुष दोनों जुड़े हुए हैं और १७७४–१९१० तक १० विद्रोह हुए. १९१० महान भूमकाल के नाम से जाना जाता है.  
१९१० ई. के भूमकाल के पश्चात दण्डकारण्य के आदिवासियों के मन घायल थे और अब ये हिंसा के बजाय अहिंसा के मार्ग से जुड़ने लगे. ऐसी स्थिति में ताना भगत के आंदोलन ने इन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया था. ओरावों के भगत-सम्प्रदाय में सबसे प्रसिद्ध तानाभगत सम्प्रदाय रहा है. यह जबरा भगत के द्वारा १९१४ ई. में गुमगा जिले (बिहार) में प्रवर्त्तित किया गया था. इसने शौच, मितव्यवहार, तथा शराबबंदी के मुहाबरे को विकसित किया. कालांतर में कांग्रेस आंदोलन के प्रभाव से तानाभगतों का झुकाव स्वराज्य की ओर हुआ. जिससे  ऐसा लगा कि दण्डकारण्य में गाँधीराज आ गया है और वन भूमि उनकी अपनी पैतृक सम्पत्ति बन गयी. असहयोग आंदोलन के दौरान इन आदिवासियों ने जेल की यंत्रणायें सहीं. ये भारी तादात में कांग्रेस के अधिवेशनों में शामिल होने लगे. इन्होंने चरखा तथा तिरंगे का संदेश गाँव-गाँव तक फैलाया. इन्हें लगा कि जैसे ही आज़ादी मिलेगी, उन्हें अपनी जमीन का मालिकाना हक वापस मिल जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ.
वर्तमान में चल रहा माओवादी आंदोलन, व माओवादियों के नेतृत्व में आदिवासियों का यह आंदोलन, जो भारतीय लोकतंत्र की संरचना, जिसे उनके ऊपर थोपा जा रहा है वह आदिवासी इतिहास में किसी भी विद्रोह से ज्यादा लंबा और बृहद फैलाव के साथ मौजूद है. जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है.
अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण १९४७ के बाद ६० के दशक में राजा भंजदेव के नेतृत्व में फिर से विद्रोह प्रारम्भ हुए. बीच का समय भारतीय राज्य को आदिवासियों द्वारा दी गयी मोहलत के तौर पर देखा जा सकता है. भंजदेव के नेतृत्व में चले इस विद्रोह में. सितम्बर १९६३ को दो पुलिस के सिपाही हिड़मा (एक आदिवासी योद्धा जो राजा प्रवीर के नेतृत्व में चल रही मुक्ति की लड़ाई को लड़ रहा था) को गिरफ्तार करने के लिये भेजरीपदर गये. हिड़मा पर आरोप था कि उसने ६ मई से ११ मई के बीच राजमहल में विद्रोह को उकसाया था. भेजरी पदर जाने वाले दोनों पुलिस कर्मियों का गाँव वालों ने सिर काट डाला. भेजरीपदर से संलग्न जंगल में उनके मृत शरीर को फेंक दिया. उन दोनों के सिर कुछ दूर पर पंडरीपानी गाँव के शिलाखण्डों में दबे हुए मिले. दूसरे दिन हिड़मा और उसके साथी राजमहल में थे तथा यह अफवाह फैला रहे थे कि सिर ट्राफी के रूप में जगदलपुर लाये जा रहे हैं. दण्डकारण्य में हुए इस गोली कांड में बड़ी तादात में महिलाएं और बच्चे भी मारे गये थे.
अस्वीकृति के इस लम्बे इतिहास पर पूर्ववर्ती शासन ने कभी ध्यान नहीं दिया और आदिवासी विद्रोह को शांत करने के लिये बार-बार बंदूक का सहारा लिया. दण्डकारण्य को सभ्य बनाने के चक्कर में पारम्परिक मूल्य जिस प्रकार बार-बार विखण्डित हुए, उससे भ्रांत तथा निराश आदिवासियों ने अपनी अस्वीकृति को नक्सलियों के विद्रोही तथा उन्मूलनवादी तरीकों में ढाल लिया और अब इतिहास में पहली बार वे अपनी अस्वीकृति को संवैधानिक तरीकों से हटकर व्यक्त कर रहे हैं. दण्डकारण्य में सी.पी.आई. (एम.एल.) के “पीपुल्स वार ग्रुप’ द्वारा नक्सली गतिविधियाँ १९७० में परिलक्षित हुई तथा १९७४ से ये गतिविधियाँ धीरे-धीरे राज्य दमन के कारण प्रतिहिंसात्मक होती गयीं.
यह समय की जरूरत थी और आदिवासी महिलाएं माओवादियों के नेतृत्व में बने संगठन के. ए. एम. एस. , व ग्राम रक्षा कमेटी व अन्य सांस्कृतिक और सशस्त्र संगठनों के साथ जुड़ने लगी. १९९७ में तेंदूपत्ता को लेकर सुकुमा में हुए आंदोलन में ८००० आदिवासी महिलाओं ने भाग लिया. बाद के दिनों में यह संख्या और बढ़ती गयी और तीन वर्ष पश्चात दक्षिणी दण्डकारण्य में हुई बौठकों में २०,००० महिलाओं ने भाग लिया. एक तरफ ये भारतीय राज्य से लड़ रही थी तो दूसरी तरफ आदिवासी समाज में विद्यमान पित्रसत्ता के लिये आंदोलन के अंदर एक संघर्ष चल रहा था. जिसके मुद्दे थे एक पुरुष की दो पत्नियां न होना, शराब बंदी,  इसके अलावा अन्य कई मुद्दों को उन्होंने शामिल किया जो समय और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक बदलते रहे. समान भागीदारी और समानता के प्रश्न को आदिवासियों में के.ए.एम.एस. ने उठाया. यह वर्ग संघर्ष के अंदर पितृसत्ता की लड़ाई थी. पित्रसत्त एक सांस्कृतिक फेनामिना है इसलिये यह लड़ाई निश्चित तौर पर पुरुषवादी मानसिकता को बदलने के लिये सांस्कृतिक आधार पर ही लड़ी जा सकती है जो मनोदशा को परिवर्तित करने में सक्षम हो पाती है. लिहाजा दण्डकारण्य में सांस्कतिक संगठनों द्वारा इसे लड़ा गया और लड़ा जा रहा है. यदि इसके बरक्स आप भारतीय राज्य को देखें तो उसके द्वारा सांस्कृतिक तौर पर कोई सक्रिय प्रयास अब तक पित्रसत्ता, जाति धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं के लिये नहीं किया गया.
१९९९ तक दण्डकारण्य में माओवादी संगठनों में महिलाओं का प्रतिशत ४५ था. यह सलवा-जुडुम के कुछ साल पहले की बात है. सलवा-जुडुम से आप सब लोग परिचित होंगे अगर परिचित नहीं हैं तो परिचित होना चाहिये था. सलवा-जुडुम को लेकर आयी तमाम रिपोर्टों और फैक्ट-फाइंडिंग्स के अलग अलग आंकड़े हैं. तकरीबन ६०० गाँवों का विस्थापन या बेघर होना. इन बेघर लोगों में पुरुषों के साथ एक विकल्प था कि वे किसी शहर जा कर रोजगार कर सकते थे और उनमे से कुछ ने यह किया भी आप रायपुर के नजदीक सिलतरा में उन्हें पा सकते हैं. पर महिलाओं के साथ स्थितियां भिन्न थी उनके पास विकल्प बचा था माओवादियों के साथ जुड़ना और अपने गाँवों को वापस पाने के लिये लड़ना. हिमांशु कुमार दांतेवाड़ा की यदि माने तो सलवा-जुडुम ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को सश्स्त्र होने को मजबूर किया. आज इसका कोई ठीक आंकड़ा मौजूद नहीं है कि कितनी महिलाएं माओवादी सशस्त्र हैं पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य दमन की प्रक्रियाओं ने उनके सशस्त्र होने के प्रतिशत में बृद्धि कर दी है.