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11 अगस्त 2015

खेती-किसानी और भारतीय राजनीति

दिलीप ख़ान

कौन बड़ा सेल्समैन?
नरेन्द्र मोदी मुझसे बढ़िया सेल्समैन हैं”- मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह का ये बयान बदले भारत में चल रही राजनीति के सारे पत्ते खोल देता है। पुरानी यूपीए-2 सरकार का मुखिया इस वक़्त के प्रधानमंत्री को जब सेल्समैन कह रहे हैं तो उसके साथ बढ़िया नाम का विशेषण भी लगाना नहीं भूल रहे। यानी इस वाक्य को ज़रा सा विस्तार देकर इसका अर्थ खोले तो कुल मतलब ये निकलता है कि मनमोहन सिंह ने अपने सेल्समैनशिप को पूरी तन्मयता से अंजाम देने की कोशिश की और उन्हें बढ़िया सेल्समैन नहीं होने का मलाल रह गया। बहस का एक मुद्दा तो ये है ही कि कैसे देश में प्रधानमंत्री का पद सेल्समैन में रिड्यूस हो गया। लेकिन बीते डेढ़-दो दशक की राजनीति पर नज़र रखने वालों को इसमें कोई चौंकाने वाला तथ्य हाथ नहीं लगा होगा, क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग़रीब-वंचितों के सवाल उठाने वालों ने लंबे समय से सत्ता गलियारे पर ये आरोप लगाए हैं कि ये अपनी उपलब्धियों से लेकर योजना, कार्यक्रम को बेचने की जद्दोजेहद में रहते हैं। यही नहीं प्राकृतिक संसाधनों को जिस आनन-फानन में कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की मुहिम चली है उसमें हर सरकार का कमोबेस समान रुख रहा है। हाल ही में अरावली पहाड़ों के आस-पास एक निश्चित दूरी पर कोई भी निर्माण कार्य पर रोक लगाने का जब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने फैसला सुनाया तो हरियाणा की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की तर्ज पर मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी इसे चुनौती देने की ठान ली।

सवाल ये है कि सेल्समैन के तौर पर कोई राजनेता किसको कोई चीज़ बेचेगा? ख़रीदने की स्थिति में कौन है? खेती-किसानी के सवाल को इस ज़मीन से देखने पर मौजूदा राजनीतिक स्पेस में किसानों की स्थिति का अंदाज़ा लगाना आसान होगा। हालांकि इस पर कोई ठोस आधिकारिक अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन छिट-पुट आंकड़े बताते हैं कि बीते 15 साल में लाखों की तादाद में लोगों ने खेती छोड़ दी। क्या खेती छोड़ने के बाद वो बेहतर आर्थिक कारोबार में शामिल हो गए इस पर अध्ययन होना चाहिए, लेकिन ये साफ है कि जो लोग खेती में जुटे हुए हैं उसका बड़ा तबका परेशानी और सतत दबाव में जी रहा है। सरकार उन्हें ये भरोसा दिलाने में नाकाम रही है कि फ़सल नष्ट होने पर सही मुआवज़ा या फिर बेहतर पैदावार ही हालत में अच्छे न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिल पाएंगे।
खेती की मुश्किलें

देश जब आज़ाद हुआ था तो उस वक़्त कुल जीडीपी में खेती और संबंधित क्षेत्र का योगदान 50 फ़ीसदी से ज़्यादा था। विकासशील अर्थव्यवस्था से जैसे-जैसे कोई मुल्क़ विकसित की तरफ़ कदम बढ़ाता है कृषि का जीडीपी में योगदान भी घटता जाता है, लेकिन क्या देश में खेती-किसानी सचमुच यूरोप या अमेरिकी मॉडल पर हो रही है और क्या भारत की सामाजिक बनावट उन मुल्क़ों की तरह है? दोनों सवाल का जवाब ना में है। इस वक़्त कुल जीडीपी में कृषि का योगदान महज 13 फ़ीसदी है, लेकिन प्लान आउटले के आंकड़ें देखें तो साफ़ हो जाता है कि सरकार का ध्यान इतने हिस्से पर भी ठीक से नहीं जाता। खेती का बजट आवंटन 8 फ़ीसदी के क़रीब है। भारत जैसे विशाल देश के लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि 13 फ़ीसदी जीडीपी में हिस्सेदारी वाला कृषि क्षेत्र की बदौलत ही सवा अरब लोगों का पेट भरता है। यानी जीडीपी की हिस्सेदारी से कहीं व्यापक महत्व खेती-किसानी का है जिसे नज़रअंदाज़ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही।

जाहिर है खेती पर दबाव है। दोतरफ़ा दबाव। यानी अगर पैदावार नष्ट हुई तो किसानों की लागत वसूली नहीं होती और अगर बंपर पैदावार हुई और न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया गया तो अनाज की क़ीमत में कमी आने की वजह से फिर से लागत निकालने के लाले पड़ जाते हैं। किसान उस छोर पर नहीं खड़ा है जहां वो सेल्समैन के उत्पादों को ख़रीद सके। राजनीतिक मोर्चे पर भी किसान लगातार रिसिविंग एंड पर पहुंचता जा रहा है। ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के ज़बर्दस्त प्रदर्शन के वावजूद सरकार अध्यादेश लाने पर अडिग रही। फिर, सेल्समैन में तब्दील हो चुकी सरकार को परवाह किसकी रहेगी? जाहिर है उनकी जो उनका माल ख़रीद सके। नागरिक से उपभोक्ता तक का विमर्श नवउदारवादी संरचना में बहुत पुराना है, लेकिन उसे जिस सरलीकृत तरीके से मनमोहन सिंह ने पेश किया वो बताता है कि जो ख़रीदने की स्थिति में है वही सरकार से मोल-तोल करने की भी हालत में है। या कहिए कि सरकार भी उसी से मोल-भाव कर रही है। वो कौन है? किसान तो कतई नहीं। वो वो हैं जो मुंबई में अपनी बहुमंजिला इमारत के एक फ्लोर पर बागवानी करते हैं। वो धान नहीं उगाते, ना ही गेहूं। वो शौकिया बागवानी करते हैं। ज़मीन से दर्जनों फुट की ऊंचाई पर। ऐसे खेतीहरों के कई रूप हैं। किसी का नाम अंबानी नामक शब्द पर ख़त्म होता है, किसी का वाड्रा और किसी का अदानी।

राहुल गांधी ने हाल ही में ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए देश के कई इलाक़ों का दौरा किया। रेल के साधारण डब्बे में बैठकर पंजाब गए  और पंजाब में जिन चंद किसानों से मिले और जिन्हें मदद का आश्वासन दिया गया, उनमें से एक बुजुर्ग किसान ने शुरुआती जून में थक-हारकर आत्महत्या कर ली। किसान आत्महत्याओं को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का काम लगातार बढ़ता जा रहा है। सबकुछ आंकड़ों में तब्दील हो गया है। 1995 में डब्लूटीओ सम्मेलन के ठीक सामने एक कोरियाई किसान ने जब किसानविरोधी नीतियों से विरोध जताते हुए आत्मदाह किया था उसके बाद से दुनिया में कुछ नहीं बदला। भारत में तो कतई नहीं। भारत के कई हिस्से आत्महत्या वाले नक्शे में अब एंट्री पा रहे हैं। पंजाब इनमें से एक है। विदर्भ, तेलंगाना, बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ तो पुराने इलाक़े हैं। इन आत्महत्याओं की वजहें क्या हैं? पहली, फ़सल नष्ट होना। दूसरी, तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। तीसरी, संकर नस्ल के बीजों का आगमन और पारंपरिक बीजों का लुप्तप्राय होना। चौथा, सिंचाईं का अभाव और पांचवां, विदर्भ जैसे इलाक़ों में खाद्यान्न के बदले नकदी फ़सलों का उत्पादन। ज़्यादातर मामलों में सीधी वजह इनमें से कोई नहीं होती। सीधा और तात्कालिक कारण क़र्ज होता है, लेकिन क़र्ज के तार इन्हीं कारकों से जुड़े हैं।

कपास उगाने वाले किसान की अगर फ़सल नष्ट हुई तो लागत तो डूबी ही, साथ ही खाद्यान्न उत्पादन करने वाले किसानों की तरह बची-खुची फ़सल वो खा भी नहीं सकता। सरकारी स्तर पर जो मुश्किले हैं वो मुख्यत: तीन हैं। पहली, मुआवज़े के बंटवारे की सही नीति का अभाव। दूसरी, कंटींजेंसी प्लान का सही तरीके से लागू ना हो पाना और तीसरा किसानों की पहचान। आम तौर पर किसानों की पहचान पर भारत के समकालीन कृषि विमर्श में चर्चा नहीं होती, लेकिन इससे बहुत सारी चीज़ें नत्थी हैं। एक मिसाल से समझिए। बुंदेलखंड के एक भूमिहीन किसान ने बड़े किसान से किराए पर साल भर के लिए ज़मीन ली। पैदावार अच्छी थी लेकिन जब कटने पर आई तो बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि के चलते फ़सल बर्बाद हो गई। लागत भी नहीं निलकी। सरकार ने मुआवज़े का ऐलान किया। नियम के मुताबिक़ ज़मीन के मालिक को मुआवज़ा मिला। अब जिस छोटे किसान ने किराए पर ज़मीन ली, जिसने मेहनत की, जिसका पैसा डूबा, जिसकी फ़सल डूबी, सरकार की पूरी नीति में वो कहीं मौजूद ही नहीं है।
खेती में फंसी जान


मुआवज़े के नाम पर कैसे 10 रुपए और 100 रुपए के चेक बांटे गए ये दो-तीन महीने पहले की राष्ट्रीय सुर्खियां थीं। जाहिर है ये कोई पहली बार नहीं हुआ। मुआवज़े की रकम किसानों तक पहुंचने से पहले लूट-खसोट और कमीशनखोरी का समूचा तंत्र बिछा है। फिर सवाल आता है कि मुआवज़ा किस हालात में? पहले आधी फ़सल नष्ट होने पर मुआवज़े का नियम था, मोदी सरकार ने इसे घटाकर 33 फ़ीसदी कर दिया। पहल अच्छी है, लेकिन किसान इसे दूसरे नज़रिए से देख रहा है। किसानों का कहना है कि अगर 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर उन्हें मुआवज़ा नहीं मिलेगा और 33 फ़ीसदी नष्ट होने पर मिलेगा तो 3 फ़ीसदी वो ख़ुद से नष्ट कर देंगे। ज़ाहिर है सरकार को किसानों की स्थिति का अंदाज़ा नहीं है कि प्राकृतिक वजहों से 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर वो कैसी परिस्थिति में फंस जाते हैं!

ये लगातार दूसरा साल है जब मौसम विभाग ने मानसून में 12 फ़ीसदी कमी का आकलन पेश किया है। बीते साल देश के कई इलाक़े सूखे की चपेट में थे और इस बार भी यही अंदेशा है। इससे किसानों की सेहत पर सीधे फर्क तो पड़ता ही है, लेकिन बाद की स्थिति से भी उसे जूझना पड़ता है। एक तो सिंचाईं के साधन नहीं होने के चलते पैदावार गई और दूसरा आमदनी नहीं होने के चलते हाथ में क्रयशक्ति नहीं रह गई जिससे बाज़ार से वो खाद्यान्न ख़रीद सके। देश में इस वक़्त भी 45 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्से पर सिंचाईं का पूरा दारोमदार बारिश के हाथों में है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरामेंट से जुड़ी चर्चित पर्यावरणविद सुनीता नारायण कई वाकयों पर इसी संदर्भ में एक बात दोहराती रहती हैं कि मानसून देश का वित्तमंत्री है। यानी मानसून समय पर नहीं आया या फिर बेमौसम बरसात हुई तो उत्पादन चौपट। सरकार इससे पार पाने के लिए दो तरीके अपना रही है। पहला, फौरी कदम के रूप में कंटींजेंसी प्लान। यानी वित्तीय राहत। दूसरा, भारतीय कृषि एवं अनुसंधान संस्थान इस दिशा में लगातार काम कर रहा है कि बीजों का वो नस्ल तैयार किया जाए जो देर से मानसून आने पर कम समय में उतनी ही पैदावार के लायक हो। यानी सामान्य तौर पर जो फ़सल चार महीने में तैयार होती है, उतनी ही फ़सल दो-ढाई महीने में तैयार हो जाए। लेकिन अभी इस प्रयोग को शहरों में भी ठीक से स्वीकृति नहीं हासिल हुई है और देहातों में तो खेती के योजनाकार पहुंचने में भी हिचकिचाहट दिखाते हैं।

खेती का संबंध सिर्फ़ खेती तक टिका नहीं है, जब तक खेती के अलावा इससे संबंधित क्षेत्रों को मिलाते हुए एक मुकम्मल योजना तैयार नहीं होती, कृषि का संकट बरकरार रहेगा। स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन के सपने देखने वाले गलियारे में लघु-कुटीर उद्योग के जाल को विस्तार देने की योजना प्राथमिकता में बहुत पीछे है। यही वजह है कि खाद्य मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती जाती है और सकल मुद्रास्फीति आंकड़ों में शून्य के स्तर पर दिखती रहती है। यही विडंबना है और यही देश में नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता और लोकेशन भी दर्शाता है। स्मार्ट सिटी को दो बार बेचा जा सकता है। पहले तो निर्माताओं के सामने योजना को बेचकर और फिर अपनी ताक़त दिखाने के लिए तैयार स्मार्ट सिटी को दुनिया के मानचित्र पर। सबकुछ बिकने और बेचने का मामला है। मामला सेल्समैन तक पहुंच गया और बेचने का हुनर बदल गया, लेकिन किसान अभी भी मंडी के चक्कर में ही चप्पलें घिस रहा है। उनके चप्पलों की आवाज़ छोटे मंडी कारोबारियों तक ही सीमित रहती है और बढ़िया सेल्समैन देश स्तर की नीतियां बेचते रहते हैं।  

(सबलोग के जुलाई महीने में प्रकाशित)


25 सितंबर 2013

मैट्रो कर्मचारियों व मजदूरों की हालात

सुनील कुमार
दिल्ली के बस स्टॉपों, चौराहों व सार्वजनिक स्थानों पर दिल्ली सरकार की चमचमाती होर्डिंग दिख जाती है। इनमें दिल्ली मैट्रो को दिल्ली के विकास के साथ जोड़ा गया है जिसमें करीब 22 लाख यात्री प्रतिदिन यात्रा करते हैं। दिल्ली मैट्रो का रजिस्ट्रेशन 3 मई 1995 को कम्पनी अधिनियम 1956 के तहत हुआ था। दिल्ली मैट्रो में हम और आप इसलिए सफर करते हैं कि जल्दी से अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जायें। मेट्रो स्टेशन पर पहुंचते ही हमें चिलचिलाती धूप और कान को चीरती गाड़ियों की सायरन से राहत मिलती है। एक्सलेटर (स्वचालित सीढ़ियां) से हम ऊपर या नीचे जाते हैं। ऐसा महसूस होता है कि हम भारत में नहीं किसी यूरोपीयन देश में आ गये हैं। दिल्ली मेट्रो का भी कहना है कि वो वर्ल्ड श्रेणी की मैट्रो है। मैट्रो परिसर के अन्दर प्रवेश करने से लेकर बाहर निकलते समय तक हमारी हरेक गतिविधियों पर तीसरी आंख (सीसीटीवी) द्वारा नजर रखी जाती है। मैट्रो में जेबतराशी की घटनाएं होती रहती हैं लेकिन आज तक जेबतराशों पर यह तीसरी आंख द्वारा काबू नहीं पाया जा सका। किसी की अश्लील हरकत को ये तीसरी आंख कैद कर लेती है और ये कैद की हुई तस्वीरें मेट्रो अधिकारियों व सेक्स-धंधेबाजों के बीच सांठ-गांठ से सेक्स वीडियो बन कर नेट पर चला जाता है। शासन-प्रशासन कुछ भी नहीं करता; यह केवल एक खबर बन कर रह जाती है। मैट्रो के पास अपना सतर्कता (विजिलंेस) विभाग है लेकिन बहुत सारे केस होने के बावजूद आज तक इसका खुलासा नहीं हो पाया कि मैट्रो द्वारा ली गई तस्वीर बाजार में कैसे पहुंची और उसके लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जन जागरण व सुरक्षा गॉर्ड की जरूरत है जबकि डीएमआरसी ने जन जागरण पर वर्ष 2011-12 में 228.30 लाख रू. की कटौती की। इसी तरह सुरक्षा में भी 156.16 लाख रू. की कटौती की। विज्ञापन पर वर्ष 2011-12 में वर्ष 2010-11 की तुलना में 12.91 लाख रू. ज्यादा खर्च किया है। वर्ष 2011-12 में डीएमआरसी की आय 641.75 करोड़ रू. बढ़कर 2247.77करोड़ रू. हो गया।
मैट्रो को चलाने के लिए कई विभाग होते हैं, जैसे- प्रोजेक्ट, आपरेशन, मेंटीनेंस, प्रॅापर्टी डेवलपमेंट, एचआर, विजिलेंस आदि। मैट्रो में प्रोजेक्ट और आपरेशन विभाग की मुख्य भूमिका होती है, जो मैट्रो लाईनों का निर्माण और मैट्रो के संचालन की जिम्मेदारी संभालते हैं।
प्रोजेक्ट विभाग में बड़े-बड़े डायरेक्टर जुड़े होते हैं जिनकी तनख्वाह लाखों में होती है। उसी प्रोजेक्ट विभाग में निर्माण कार्य में ठेका मजदूर होते हैं। ये मजदूर दैनिक वेतन भोगी होते हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर कभी 80-100 फीट जमीन के अन्दर, तो कभी 25-35 फीट ऊपर चढ़ कर मैट्रो लाईन का निर्माण करते हैं। निर्माण के दौरान बहुत सारे मजूदरों की मौत होती है। सितम्बर 2010 मंे दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल किए गए एक शपथ-पत्र में दिल्ली मैट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने यह स्वीकार किया कि राजधानी के विभिन्न कार्य-स्थलों पर हुई दुर्घटनाओं में कुल 109 मजदूरों की मौत (जबकि वास्तविक संख्या इससे भी अधिक होगी) हुई है। इस आंकड़े को डीएमआरसी ने अपने वेबसाईट पर भी नहीं डाला है। 2010 के बाद और भी रफ्तार से मैट्रो के कार्य हो रहे हैं लेकिन मजदूरों की मौत का कोई आंकड़ा नहीं मालूम है। तीसरे चरण में चल रहे वर्क प्लेस (काम के स्थान) बादली मोड़ के पास मैं गया था जहां मैट्रो स्टेशन का काम चल रहा है। इस काम का ठेका जे. कुमार इण्टरप्राइजेज कम्पनी के पास है। जे. कुमार इण्टरप्राइजेज ने इस काम को पूरा कराने के लिए दूसरे ठेकेदारों को काम बांट रखा है। उन ठेकेदारों ने दूसरे-तीसरे ठेकेदारों को काम दे रखा है। इस तरह ठेकेदारों के कई लेअर (परत) हैं। मजदूरों का कहना है कि उनकी मजदूरी 5 ठेकेदारों के हाथों से गुजर कर आती है। यहां पर विभिन्न कामों में करीब 400 ठेका मजदूर काम करते हैं जिसमें 90 प्रतिशत बिहार से आये हुए प्रवासी मजदूर हैं।
म.प्र. के भिंड जिले के गुड्डेश, जिनकी उम्र 41 वर्ष हैं और बादली में किराये के कमरे में रहते हैं, इस साईट पर स्वीपर का काम करते हैं। 12 घंटे काम करने पर उन्हें 6500 रु. दिया जाता है। उनको किसी तरह का साप्ताहिक अवकाश तक नहीं दिया जाता है। वे किसी तरह गुजर-बसर कर कुछ पैसे घर पर भेजते हैं जिसमें उनकी पत्नी मां-बाप और चार बच्चों का किसी तरह गुजारा हो पाता है। यहां पर चौकीदारों की ड्यूटी 12 घंटे की होती है। 12 घंटे की ड्यूटी (कोई साप्ताहिक अवकाश के बगैर) पर 5000 से 6000 रु. दिया जाता है। गुरूचरण सिंह, जो कि चौकीदारी का काम करते हैं, सिरसपुर में किराये के कमरे में रहते हैं। इनके पास पहले अपना घर भारत नगर (दिल्ली) में था जिसको दिल्ली सरकार ने 335 घरों के साथ तोड़ दिया। उनको 12 घंटे का 6000 रू. मिलता है वो भी समय से नहीं। कभी कभी तो महीने के 30 तारीख तक तनख्वाह मिल पाती है। पहले महीने में तो 50-60 दिन काम करने के बाद ही पैसा मिलता है। उनकी बेटी ने 12वीं कक्षा के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, क्योंकि वे आगे पढ़ा नहीं सकते थे।
यहां पर तीन ठेकेदारों को सरिया का काम दिया गया है। प्रभुदयाल, जो सिद्धार्थनगर, उ.प्र. से हैं और 2 माह से काम करते हैं, को 180 रू. प्रतिदिन के हिसाब से ही भुगतान किया जा रहा है। मैट्रो में दैनिक मजदूरी दिल्ली में आम जगह पर मिलने वाली मजदूरी से कम है। यहां पर कारीगर (मिस्त्री) को 300 रू. दिये जाते हैं जबकि दिल्ली में 400-500 रू. मिस्त्री की मजदूरी है। 12 अगस्त् को रहीबुल, हबुल, राजकुमार, इश्तकार गाटर चढ़ाने का काम कर रहे थे। गाटर फिसल कर गिर गया जिसमें तीन के सिर पर चोट आई व रहीबुल का दाहिना हाथ टूट गया है, जिसमें सरिया लगा हुआ है। उनका ईलाज ठेकेदार इसान अस्पताल, बादली से करा रहा है जो कि बहुत ही छोटा अस्पताल है। इस मजदूर को प्रतिदिन साइट (काम करने के स्थान) पर बुलाया जाता है, जहां वो पूरा दिन बैठा रहता है तब उसकी मजदूरी दी जाती है। अगर वह साइट पर न आये तो उस दिन की उसको मजदूरी नहीं मिलती है। अभी तक उसको कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया है, न ही कोई एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई है। रहीबुल को यह डर है कि हाथ ठीक होने के बाद उसको निकाल दिया जायेगा। टीपीएल, स्क्रोपयन वीकील सर्विस प्राइवेट लिमिटेड इत्यादि कम्पनियों का ठेका है। जे. कुमार इण्टरप्राइजेज द्वारा रोहणी सेक्टर 18 में मेट्रो का काम चल रहा है जहां कि सुरक्षा मानको का ध्यान नहीं रखा जाता है जिसके कारण 16 सितम्बर, 2013 को 14 फीट गड्ढे में तीन मजदूर मिट्टी गिरने से दब गये, इसमें एक मजदूर उमाशंकर की मौत हो गई और दो गंभीर रूप से घायल हो गये। वर्ल्ड श्रेणी की कहे जाने वाली मैट्रो इस मजदूर को गड्ढ़े से निकालने में तीन घंटा का समय लगाया। जुलाई-अगस्त महिने में भी बादली में एक मजदूर की मौत हो गई थी गाटर गिरने से यहा पर भी जे कुमार इण्टरप्रजेज का ही काम चल रहा है।
मेट्रो में अलग-अलग विभाग होता है। मुख्यतः मैट्रो ट्रेनों को संचालित करने का काम आपरेशन विभाग का होता है। इस विभाग में सीआरए (कस्टमर रिलेशनशिप असिस्टेंट) होता है जो कि कस्टमर का कूपन रिचॉर्ज करता है व कस्टमर की शिकायतों को सुनता है। इसकी ड्यूटी 8-8 घंटे की दो शिफ्ट में होती है। एस.सी. (स्टेशन कंट्रोलर) और टी.ओ. (ट्रेन आपॅरेटर) दोनों की ट्रेनिंग एक ही व्यक्ति की होती है जो कि तीन वर्ष पर या जरूरत के अनुसार बदली जाती है। इन्हीं को प्रमोशन करके एस.एम. (स्टेशन मैनेजर) बनाया जाता है। एस.एम. की ड्यूटी 8 घंटे की होती है और इनका शिफ्ट भी एक ही होता है। यानी केवल 8 घंटे ही स्टेशन मैनेजर होता है और इन 8 घंटों में दो स्टेशनों की जिम्मेदारी होती है, जबकि मैट्रो करीब 17 घंटे संचालित होती है। इन तीनों पदों के कर्मचारी स्थायी होते हैं।
इसके अलावा इसमें भारी संख्या में ठेकेदारों के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी हैं। जे.एम.डी., वेदी एण्ड वेदी, ट्रीग, गु्रप 4, आशा इण्टरप्राइजेज जैसी बड़ी कम्पनियों के अलावा करीब डेढ़ दर्जन कम्पनियां कर्मचारी/मजदूर मुहैय्या कराती हैं। ठेका पाने के लिए इन कम्पनियों में होड़ रहती है। ये कम्पनियां डी.एम.आर.सी. के डायरेक्टरों/अधिकारियों को अलग- अलग तरीके से प्रभावित करके ठेका हासिल करती हैं। कम्पनियों द्वारा अधिकारियों पर किये गये खर्च मजदूरों/ कर्मचारियों से वसूले जाते हैं- जैसे कि टाम आपरेटरों को 50-60 हजार रू. लेकर नियुक्ति की जाती है। 25 हजार रू. तो सिक्युरिटी के नाम पर होता है जो कि काम से हटने के बाद वापस मिल जाता है। बाकी के पैसे दलालों द्वारा ठेकेदार व मैट्रो अधिकारियों के जेब में जाता है। वहीं हाऊस कीपर और सिक्युरिटी गार्ड से 5000 रू. वर्दी के नाम पर ले लिया जाता है।
टाम आपरेटर (काउंटर पर टोकन देने वाला), हाउस कीपिंग (सफाई कर्मचारी), सिक्युरिटी गार्ड मैट्रो परिचालन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। टाम आपरेटर 12वीं से अधिक पढे-लिखे होते हैं। उनकी ड्यूटी टाइम में थोड़ा देर होने से मैट्रो यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ये महीने में करीब 8500-9000 रू. वेतन पा जाते हैं।  अधिक यात्रियों की संख्या होने पर इनको लंच करने तक का समय नहीं मिलता है। इनकी ड्यूटी कागज में 8 घंटे की होती है लेकिन इनकी असली ड्यूटी 9 घंटे की हो जाती है। 15 मिनट से अधिक लेट होने पर इन पर 500 रू. की फाईन लग जाती है। अगर इनके हिसाब में 6 रू. से कम या अधिक पाया जाये या गलती से अपना पैसा भी पॉकेट में चला जाये तो इन पर मैट्रो की भाषा में हिडेन (चोरी) का आरोप लग जाता है। इनके ऊपर हमेशा ही नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। कई बार किसी कारण से पहुंचने में देर हो गयी, अगर दो-चार बार हिडेन का आरोप लगा या ठेकेदार बदल जाये तो इनकी नौकरी जाना लाजमी है।
एक महिला नागलोई मेट्रो स्टेशन पर 11 मई 2013 से कार्यरत थी। उनको कोई नोटिस/चेतावनी दिये बिना अचानक 24 अगस्त को निकाल दिया गया। 23 अगस्त को वो अपनी ड्यूटी से वापस आई तो उनके मोबाईल पर उनके सुपरवाईजर का मेसेज (संदेश) आया कि कल उनका ऑफ है और वे लक्ष्मी नगर जे.एम.डी. ऑफिस में चली जायें। जब वह महिला लक्ष्मी नगर जे.एम.डी. ऑफिस गई तो उनको लेटर दे दिया गया कि आपकी सेवा समाप्त की जा रही है। इस का कोई कारण नहीं बताया गया, न ही उनको नोटिस दिया गया और न ही कभी उनको किसी तरह की चेतावनी दी गई थी। 25 हजार सिक्युरिटी के पैसे के लिए बोले कि 10 दिन बाद मिल जायेगा। 10 दिन बाद भी उनका पैसा वापस नहीं आने पर फोन किया तो जवाब मिला कि कुछ दिन और रूकिये, आपको पैसा मिल जायेगा। उनकी जुलाई 2013 की तनख्वाह भी अभी (9 सितम्बर) तक नहीं मिली है। इस महिला का जेएमडी के द्वारा ईएसआई, पीएफ काट लिया जाता था लेकिन न तो इनको ईएसआई कार्ड मिला, न ही पीएफ नम्बर दिया गया था।
स्थायी मजदूरों को वेतन तथा छुट्टियां तो मिल जाती हैं लेकिन उनके ऊपर भी नौकरी जाने का खतरा हर समय मंडराता रहता है। अगस्त् 2013 में 16 सीआरए और एक ट्रेन आपरेटर को निलम्बित कर दिया गया है। ट्रेन आपरेटर की गलती बस ये थी कि उसने डीएमआरसी के बनाये नियम का पालन करना चाहा। डीएमआरसी का नियम है कि मैट्रो कैब (ड्राइबर का स्थान) के अन्दर ट्रेन ऑपरेटर के अलावा कोई नहीं होगा। इलेक्ट्रिकल डीजीएम (जो कि अपना पहचान पत्र भी नहीं दिखा रहे थे) कैब में यात्रा करना चाह रहे थे। ट्रेन आपरेटर ने उन्हें यात्रा करने से मना करा दिया। नियम पालन करने का ईनाम उनको नौकरी से निकाल कर दिया गया,  जिसके विरोध में 30 अगस्त, 2013 को मैट्रो ट्रेन आपरेटरों ने काली पट्टी बांध कर ट्रेन को चलाया। मैट्रो कर्मचारियांे/मजदूरों की कोई यूनियन नहीं है। अगर कोई यूनियन बनाने की कभी कोशिश करता है तो उसको निकाल दिया जाता है। हाउस कीपिंग (सफाई कर्मचारी) व गॉर्ड को न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता है, न ही उनके लिए कोई अवकाश है। डीएमआरसी ने 2011-12 की वार्षिक रिपोर्ट में लिखा है कि 31 मार्च, 2012 तक 6341 कर्मचारी तथा 579 अधिकारी डीएमआरसी में काम करते थे, यानी डीएमआरसी ठेका कर्मचारियों/मजदूरों को अपना नहीं मानता है। यह अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नियमों का खुला उल्लंघन है।
डीएमआरसी का प्रॉपर्टी डेवलपमेंट विभाग पार्किंग, विज्ञापन व मेट्रो स्टेशनों पर टी स्टाल, रेस्टोरेंट से भी कमाई करता है।
दिल्ली सरकार व डीएमआरसी मैट्रो पर अपनी पीठ थप-थपाते हुए फूले नहीं समाती है और शेखी बघारती है कि वे जनता को विश्वस्तरीय सुविधाएं दे रही हैं। उसी के कर्मचारीं/मजदूर किस हालत में काम कर रहे हैं, उनका किस तरह शोषण किया जा रहा है उससे डीएमआरसी आंखे बंद किये हुए है। डीएमआरसी के बनाये नियमों को ठेकेदार व अधिकारी नहीं मानते हैं जो कि डीएमआरसी के अध्यक्ष भी जानते हैं। फिर भी सरकार व डीएमआरसी आंखें मूंदे उन्हें मनमानी करने की पूरी छूट दे रखी है। डीएमआरसी कम्पनी अधिनियम 1956 के तहत पंजीकृत है फिर कम्पनी अधिनियम व अन्तर्राष्टीªय श्रम संगठन का उल्लंघन डीएमआरसी में क्यों हो रहा है?  मैट्रो एसएमएस जिस तरह से बाजार में आया उसके लिए कौन जिम्मेदार है, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जन जागरण व सुरक्षा पर खर्च कम क्यों किये जा रहे हैं? क्या यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी डीएमआरसी को नहीं लेनी चाहिए? इन सभी सवालों का जबाब क्या हम मैट्रो में सफर करने वाले यात्री डीएमआरसी से मांग सकते है? यात्रियों का क्या यह फर्ज नहीं है कि वे अपनी सुरक्षा तथा कर्मचारियों/मजदूरों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठायें? 

06 मई 2008

बुश साहब, आपकी नीतियों पर चलने के बाद खाने को बचा कहां?


पेट काट कर जी रहे हैं भारतीय
मदन जैड़ा की आंकडों के साथ जुटाई गयी यह रिपोर्ट हम प्रकाशित कर रहे है साथ में ढेर सारे फोटो बुश साहब और उनके नुमाइंदों के लिये जो मानते हैं कि भारत के लोग पेटू हैं.....
अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्लू. बुश भले ही भारतीयों को पेटू कहें और तर्क देते रहे हैं कि आय में इजाफे के कारण भारतीय ज्यादा खा रहे हैं लेकिन यह हकीकत नहीं है। वास्तव में भारतीय कम खा रहे हैं। कारण यह है कि गरीब तबके को तो भरपेट भोजन नसीब नहीं है और मध्य वर्ग का खर्च चिकित्सा, ईंधन और शिक्षा पर बढ़ रहा है। संभवत: इसके चलते ही देश में खानपान संबंधी व्यय में कमी हुई है। राष्ट्रीय नमूना सवेüक्षण संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार वर्ष 2005-06 के दौरान देश में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत और प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय में खाने-पीने पर किए जाने वाले खर्च में कमी आई है। दरअसल, 90 के दशक में नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद वैश्वीकरण की जो आंधी चली है, उसमें लोगों की आय का ज्यादातर हिस्सा खाने के बजाय अन्य मदों में खर्च होने लगा है।

कमी का यह दौर आगे भी जारी रहा
एनएसएसओ के 1993, 2004 तथा 2006 के सवेüक्षणों पर नजर डालें तो देश में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत में कमी आई है। 1993-94 में गांवों में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह अनाज की खपत 13.4 किलोग्राम थी और शहर में 12.1 किलोग्राम। लेकिन 2004-05 में यह घटकर क्रमश: 12.1 किलोग्राम तथा 9.9 किलोग्राम रह गई। कमी का यह दौर आगे भी जारी रहा। ताजा सवेüक्षण 2006 में किया गया है जिसके आंकड़े हाल में आए हैं। तब पाया गया कि गांव में अनाज की प्रति व्यक्ति मासिक खपत पुन: घटकर 11.9 तथा शहर में 9.8 किलोग्राम रह गई। यानी पिछले 12-13 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की मासिक खपत में गांवों में 1.5 किलोग्राम और शहरों में 2.3 किलोग्राम की कमी आई है।

आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते
यदि भारतीय अनाज कम इस्तेमाल कर रहे हैं तो क्या इसका मतलब यह है कि वह बिस्कुट या अन्य फास्टफूड खाने लगे हैं ? एनएसएसओ के आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते। कारण यह है कि नागरिकों के कुल उपभोक्ता व्यय में खान-पान के मद में होने वाले खर्च में भी कमी दर्ज की गई है। इस बात को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है। 1972-73 में ग्रामीण नागरिक अपने कुल उपभोक्ता व्यय का 73 फीसदी और शहरी 64 फीसदी खान-पान पर खर्च करता था। लेकिन 1993-94 में यह प्रतिशत घटकर क्रमश: 63 और 54 पर आ गया और अब यह और कम होकर 55 और 42 फीसदी ही रह गया है। ऐसे में यह कहना सरकार अनुचित है कि भारतीय ज्यादा खा रहे हैं।

प्रतिदिन 2047 किलो कैलोरी ही उपलब्ध
यदि कैलोरी के नजरिये से देखें तो 1993-94 में प्रति ग्रामीण रोजाना 2153 किलो कैलोरी भोजन से ग्रहण करता था। लेकिन अब इसमें 106 कैलोरी (4.9 फीसदी) की कमी आई है और उसे प्रतिदिन 2047 किलो कैलोरी ही उपलब्ध है। इसी प्रकार शहरों में इसमें 51 किलो कैलोरी (2.5 फीसदी) की कमी आई है। शहरी 2071 की बजाय 2020 किलो कैलोरी ही ग्रहण कर रहे हैं।

आंकड़े कहते हैं कि बुश साहब गलत फरमा रहे हैं
- 19 फीसदी ग्रामीण आबादी यानी 14 करोड़ लोगों का मासिक उपभोक्ता व्यय 365 रुपये या इससे कम है। इसका मतलब है प्रति व्यक्ति रोजाना 12 रुपये में गुजारा करते हैं।
-22 फीसदी शहरी यानी 17 करोड़ लोग 580 रुपये मासिक यानी 19 रुपये प्रति व्यक्ति रोजाना में गुजारा करता है।
-ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोक्ता व्यय 625 और शहरों में 1171 रुपये ही है।
-कम आय के कारण गांवों में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह भोजन पर 251-400 रुपये ही खर्च कर पाता है जबकि शहरों में यह कुछ ज्यादा 451-500 रुपये है।
-ग्रामीण क्षेत्रों में रोजाना प्रोटीन सेवन 60.2 ग्राम से घटकर 57 ग्राम रह गया है जबकि शहरी आबादी में यह प्रतिशत 57 ग्राम पर स्थिर रहा।
-वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि प्रति व्यक्ति रोजाना 2700 किलो कैलोरी की जरूरत होती है। लेकिन 66 फीसदी ग्रामीण और 70 फीसदी शहरी लोगों को प्रतिदिन 2700 किलो कैलोरी नहीं मिल पाती है।
किस मद में बढ़ रहा है उपभोक्ता व्यय ?
-इंüधन और प्रकाश पर उपभोक्ता व्यय 6 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया है।
-कपड़े बिस्तर और जूतों पर व्यय 5 फीसदी।
-चिकित्सा पर गांवों 7 फीसदी और शहरों में 5 फीसदी।
-शिक्षा पर गांवों में 3 फीसदी और शहरों में 5 फीसदी।
-परिवहन पर गांवों में 4 तथा शहरों में 7 फीसदी व्यय।