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08 जून 2011

आतंक, म्लाडीच और मीडिया

अनुज शुक्ला-
मीडिया के लिए आतंक से जुड़ी खबरें हमेशा ही फायदेमंद साबित होती रही हैं। दो दशकों में मीडिया ने आतंक को लेकर ऐसा आभासी संसार गढ़ दिया है जिसमें टीवी के लिए आतंक से जुड़ी हुई खबरें टीआरपी के लिए बेहतर सौदा साबित होती आईं हैं। अगर साल भर की खबरों का एक औसत निकाला जाय तो शायद आतंक से जुड़ी खबरों पर मीडिया ने अपना सबसे ज्यादा वक्त जाया किया है। 2000 के बाद लगभग सभी ‘एक्सक्लूसिव’ या बड़ी ब्रेकिंग खबरे आतंक से जुड़ी रही हैं। ताजा उदाहरण में साल 2011 की सबसे बड़ी ब्रेकिंग खबर ओसामा के ऊपर अमेरिका का निर्णायक ऑपरेशन रहा। लेकिन अजीब इत्तेफाक है कि ये खबरें तथाकथित ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के चेहरे को ही उजागर करती नजर आईं है। यानी पिछले एक दशक की मीडिया रिपोर्टिंग ने आतंकवाद को, इस्लाम के अनिवार्य घटक साबित करने का दुष्चक्र रचता आया।
जबकि इस्लामिक आतंकवाद से ‘फोबियाग्रस्त’ मीडिया के लिए जनरल ‘रात्को म्लाडीच’ जैसों का क्रूरतम अपराध कोई मायने नहीं रखता। भले ही म्लाडीच के ऊपर इतिहास की जघन्यतम हत्याओं में से एक का अभियोग लगा हो। जाहिर है संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया की खबरों के पीछे लगी यहूदी उद्यमियों की पूंजी, जनित ‘नस्ली वर्चस्व’ के सिद्धान्त को कायम करती है। अब अपनी साख के लिए संघर्षरत मीडिया से यह अपेक्षा करना कि ’यह अपनी वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यात्मकता को बरकरार रखेगी ; महज एक कोरी कल्पना है। क्योंकि मीडिया की सोच या वैचारिकी की निर्मिति का बहुतायत स्त्रोत इस्राइल केन्द्रित, पश्चिमी दृष्टिकोण बना हुआ है। हालांकि समय-समय पर ये खुद को ज्यादा लोकतान्त्रिक और सहिष्णु जतलाते आएं हैं। जिसे पिछले दिनों ट्यूनीशिया, मिश्र एवं लीबिया में हालात के मुताबिक तब्दील हुई इनकी रणनीतियों से समझा जा सकता है।
आतंकवाद को लेकर पश्चिमी जगत ने मीडिया के सहारे एक रहस्यमयी ‘फेनोमेना’ की रचना की है। दरअसल जिस एक हादसे के बाद इस्लामिक आतंकवाद का हौवा, अमेरिकी प्रशासन की निगाह में खटका, उसके मूल में वर्ल्ड ट्रेड पर हमले और उसमें मारे गए अमेरिकियों की मौत का प्रतिशोध था। बहरहाल, कौम चाहे जो भी हो; बर्बरता या आतंक को बचाने को लेकर कोई तर्क नहीं गढ़ा जा सकता। वह चाहे ओसामा हो या ‘जनरल म्लाडीच’। ‘म्लाडीच’ जिसके सिर पर ओसामा से ज्यादा हत्याओं का जघन्य अपराध है। जिसे सूचनाओं के प्रति एकपक्षीय नजरिए के कारण दुनिया के अन्य देश ठीक तरह से परिचित नहीं हो पाए। काबिलेगौर है कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी चौधराहट, मानवाधिकारों की रक्षा के संकल्प को दोहराने वाले पश्चिमी जगत का रवैया, क्या हर मामले में न्यायपूर्ण रहता है? वह किस तरीके सूचना-साधनों का इस्तेमाल अपने एजेंडे को स्थापित करने के लिए करता है तर्कसंगत है?
पश्चिमी जगत के लिए आतंक के मुद्दे और परिभाषाएँ क्षेत्रवार कैसे अलग हो जाती हैं इसे मीडिया की उन खबरों से भालिभांति समझा जा सकता है जो इतिहास के क्रूरतम हत्यारे म्लाडीच की गिरफ्तारी के बाद नजर आईं हैं। म्लाडीच ने 1995 में बोस्निया युद्ध के दौरान, ‘स्रेबरेनिका’ के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए 7500 बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम किया, ताकि इस समुदाय से 15 वी शताब्दियों में हुए अत्याचारों का प्रतिशोध ले सके। क्या ‘बेलग्रेड’ में जो भीड़ म्लाडीच को हीरो के तौर पर पेश करती नजर आ रही है, उसे रिहा करवाने के लिए हिंसक झड़पे की जा रही है, वह कैसे कट्टरपंथियों से अलग नहीं है? काबिलेगौर है कि म्लाडीच से जुड़ी वही खबरें मीडिया परोस रही हैं, जो म्लाडीच के पक्ष में हैं। उन्हीं खबरों की फुटेज दिखाई जा रही है जो उसे बचाने से संबंधित हैं। मीडिया, म्लाडीच की बर्बरता के न तो फुटेज दिखा रही है (जैसाकि तालिबान या अलकायदा से जुड़े मामलों में करती आई है) और न ही उस बर्बर समय की कहानी ही नजर आती है। अलबत्ता ओसामा कितना बर्बर था, कितने आतंकी कारनामे किया, आगे के सालों में अलकायदा की क्या रननीतियाँ होंगी; इससे दुनिया का बच्चा –बच्चा परिचित हो चुका है।
सूचना के लिए पश्चिम पर आश्रित मीडिया उसी ‘वायस्ड’ छवि को परोसती है, जो वह आयात करती है। इससे बड़ा अफसोस और क्या हो सकता है कि अधिकांश मीडिया संस्थान परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पश्चिमी पूंजी के पंजे में हैं। जैसे भारत में पूंजी एवं पश्चिमी विचार के रूप प्रत्यक्ष प्रवेश है, जहां बार्ंबार खबरों की प्रस्तुति पर इसका दूरगामी असर दिखता है। सरोकार, प्रतिबद्धता एवं भारतीयता की दुहाई देने वाला देशी मीडिया क्या संवेदनशील खबरों की रिपोर्टिंग को लेकर फिक्रमंद है? अलबत्ता वह दुर्लभ जीवों को बचाने के अभियान, टीवी सिनेमा के प्रमोशन एवं प्रायोजित रेसों के आयोजन को लेकर ज्यादा सक्रिय दिखती है। प्रिंट मीडिया जंगल को तो बचाने का मुहिम चलाती है लेकिन अनुचित तरीके से सबसिडी में मिले कागजों का इस्तेमाल खबरों के साथ घपलेबाज़ी के रूप में करती है। दुख इस बात का है कि धर्म विशेष के आतंक की जुड़ी खबरों की मसालेदार प्रस्तुति करने वाली मीडिया जनरल ‘म्लाडीच’ पर कैसे चूक गई?

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15 फ़रवरी 2011

महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति



अनुज शुक्ला –
सरकारी आयोगों की कार्यप्रणालियां हमेशा शक के दायरे में रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जितने भी आयोग गठित किए गए हैं, उनकी कार्य प्रविधि सत्ताधारी वर्ग के अनुकूल रही है। वह चाहे मानवाधिकार आयोग हो, एससी-एसटी आयोग या अल्पसंख्यक आयोग। राष्ट्रीय महिला आयोग भी इसका अपवाद नहीं। आधी आबादी के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया था। बीते वर्षों की काल अवधि गवाह है कि कैसे एक आयोग कस्बाई राजनीति के सर्कस का विदूसक बन चुका है।
आजादी के बाद से स्त्रीवादी कार्यकर्ता, महिलाओं के अधिकारों के सुरक्षा की व्यापक मांग करते आ रहे थे। 1990 के महिला सरंक्षण अधिनियम के तहत 1992 राष्ट्रीय में महिला आयोग की स्थापना की गई। महिला आयोग ने अपनी स्थापना के वक्त जारी घोषणा पत्र में स्त्री की स्वतंत्रता और सुरक्षा का जिक्र किया है। आयोग का मानना था कि अधिकांशतः स्त्री उत्पीड़न ऐसी जगहों पर फलीभूत होता है जहां स्त्रियॉं के सामाजिक - सांस्कृतिक अधिकारों की मनाही की जाती है। लोकतांत्रिक सिविल स्वतंत्रता कहती है कि स्त्री अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। जाहिर है आयोग की भूमिका जवाबदेह और पारदर्शी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से सिक्के का दूसरा पहलू भी है। पिछले वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब मामलों पर महिला आयोग की भूमिका को देखकर लगा कि अधिनियम में जो बातें कहीं गई हैं उसका अनुशरण खुद आयोग ही नहीं करता। उसकी रिपोर्टे सत्ता – सापेक्ष रही पाई गई।
बहरहाल महिला आयोग की प्रासंगिकता और राजनीति को समझने के लिए दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। खासतौर से उत्तर प्रदेश में घटित महिला उत्पीड़न के मामले यहा की राजनीति के लिए सुरखाब के पर की तरह काम करते आए हैं । 2010 में दिल्ली महिला उत्पीड़न संबंधी 489 मामले दिल्ली पुलिस ने पंजीकृत किया। इसकी संख्या 2009 के 452 के मुक़ाबले ज्यादा थी। जबकि उत्तर प्रदेश में 2009 के साल 429 मामले, जो दिल्ली से कम थे संज्ञान में आए। दूसरी ओर बाल विबाह, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ होने वाली उत्पीड़न की राज्यवार घटनाओं की राष्ट्रीय दर चौकाने वाली है। राष्ट्रीय अपराध व्यूरो के अनुसार यह उत्तर प्रदेश में 26.3 % है, जो कांग्रेस शासित आंध्र प्रदेश में 30.3% और संप्रग शासित तमिलनाडु में 33.6% से कम है। राजस्थान और हरियाणा की भी महिला उत्पीड़न की दर में बड़ी हिस्सेदारी है। सवाल उठता है कि महिला आयोग की कवायद इन राज्यों में क्यों शून्य है ? क्या सिर्फ इसलिए कि इन राज्यों में कांग्रेस की प्रत्यक्ष या परोक्ष सरकार है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आयोग सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं है। संप्रग शासित राज्यों में महिलाओं को लेकर किए जाने वाले उत्पीड़न की दर गैर कांग्रेसी राज्यों के मुक़ाबले कम नहीं रही है । अब जबकि बजट सत्र के कारण लखनऊ की राजनीति गर्म है, लगभग एक महीने बाद दिल्ली में गिरिजा व्यास और महिला आयोग को बांदा के शीलू की फिक्र होती है। क्या महिला आयोग की मौजूदा कवायद राजनीति से अभिप्रेरित नहीं ! सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर महिला आयोग की प्रासंगिकता क्या है?
यह देखने में आया है कि एक लंबे समय से, राष्ट्रीय महिला आयोग का राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है। राजग के काल में गुजरात मामलों पर महिला आयोग की भूमिका संदिग्ध थी। महिला आयोग पहले यह मानने को तैयार ही नहीं थी की बलवाइयों ने बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है। सामाजिक संगठनों के दबाव से ही कुछेक मामले पंजीकृत हुए। गुजरात दंगे के दौरान महिलाओं से हुए बलात्कार पर स्वतंत्र जांच कमेटी का नेतृत्व करने वाले कमल मित्र चिनाय की रिपोर्ट और महिला आयोग की रिपोर्ट में जबरदस्त अंतर व्याप्त है। तीस्ता शीतलवाड़ या अन्य गैर सरकारी रिपोर्टे, सरकारी रिपोर्टों से भिन्न पाई गई। बलात्कार के दोषी बड़े कारकुनों को बचाने की आयोग ने भरसक कोशिश की थी। जाहिराशेख जैसे मामलों में आयोग की नौटंकिया अलग से शोध का विषय हैं। इशरतजहा के मामले पर महिला आयोग ने चुप्पी धारण कर ली। कश्मीर में आयोग की क्या भूमिका है यह शायद ही किसी को पता हो। आयोगों की कथा-महत्ता वाले ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। मतलब बिलकुल साफ है कि सत्ताधारी दल अपने फायदे की राजनीति के लिए आयोगों का बेजा इस्तेमाल करता है। शायद इसीलिए ही पार्टियां, आयोग के उच्च पदों पर अपने लोगों को बैठाती हैं।
अगर वाकई महिला आयोग स्त्रियॉं की सिविल अधिकारों को लेकर आग्रही है तो उसे शीलू जैसे मामलों पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए। यह बिलकुल सही है कि उत्तर प्रदेश में महिला उत्पीड़न या अन्य आपराधिक मामलों में विधायकों और मंत्रियों के द्वारा या अपराध किया गया या अपराध को सरक्षण दिया गया। दरअसल यह तंत्र के विधिक दिवालिएपन का परिणाम है। न सिर्फ महिला आयोग बल्कि ढेर सारे सरकारी आयोगों को लोगो में ‘काहिरामय’ गुस्सा होने से पहले दोषियों को सजा देने एवं न्याय पर सबके अधिकार की व्यवस्था करनी चाहिए।
Anuj4media@gmail.com

10 फ़रवरी 2011

मूल निवास की राजनीति का दूसरा चेहरा

अनुज शुक्ला-
अमेरिका में पिछले हफ्ते इमिग्रेशन अधिकारियों ने वीज़ा क़ानून के उल्लंघन के आरोप में वैली विश्वविद्यालय के 18 भारतीय छात्रों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिए थे ताकि उनकी हरकत पर नज़र रखी जा सके। यह दुर्व्यहार संबंधी एक नया मामला है जो मध्य पूर्व एशिया में जारी गतिरोध के कारण मीडियाई बहसों में नहीं उभर पाया। बहरहाल इसे यूरोप में जारी अमानवीयता की श्रृंखला की नई कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए । एशिया और अफ्रीका जैसे तीसरी दुनिया के नागरिकों के साथ यूरोपीय देशों में ऐसा व्यावहार होता आया है। अमेरिका वैश्वीकरण की प्रक्रिया को स्थापित करने वाला बड़ा संवाहक है जो विश्वग्राम की सोच को तो जरूर स्थापित कर रहा है, बावजूद इसके कि रेसलिज़्म सोच अभी तक परिवर्तित नहीं की जा सकी। दुनिया में किसी दूसरे देश के मुक़ाबिल फ्रांस को ज्यादा प्रगतिशील माना जाता है । फिर भी यह बार- बार देखने में आता है कि फ्रांस में गैर फ्रांसीसी धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतीकों को लेकर हमेशा तनाव का माहौल बना रहता है। अमेरिका, कनाडा, इग्लैंड और आस्ट्रेलिया में दाढ़ी, पगड़ी, और बुर्का जैसे सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्त्व के प्रतीक हमेशा ही संदेहास्पद स्थिति में देखे जाते हैं। जबकि ‘लोकतान्त्रिक पूंजीवादी व्यवस्था में इंडीजेनस से अलगाव को लेकर ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को मौजूद रखने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है’। ऐसा नहीं है कि यह 9\11 के तथाकथित इस्लामिक आतंकी हमले के बाद होता आया है, बल्कि यूरोप में धार्मिक अस्मिता के करिश्माई प्रभाव को लेकर अतीत में कई प्रकार के संघर्ष होते रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका के आधार में तो क्षेत्रीय, नस्लीय और धार्मिक प्रभुसत्ता एक बड़ा कारक साबित हो चुकी है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या वाकई मौजूदा मामला भी इन्हीं कारकों के मूल से जुड़ा हुआ है या इसके तार कहीं और जाकर जुड़ते हैं? मौजूदा मामला अन्य दूसरे पक्षों की पड़ताल की अपेक्षा करता है।
दरअसल वैली विश्वविद्यालय जैसे प्रकरणों के मूल में पहली दुनिया और तीसरी दुनिया को परस्पर देखने, समझने के दृष्टिकोण की है। अपने खुद के हित के टकराव की भी। जाहिर है राजनीति के अलावे आर्थिक हित भी होंगे। उदारीकरण के बाद यूरोप में एशियाईयों के साथ होने वाले दुर्व्यहार को, डायस्पोरा में व्याप्त अंतरसंघर्ष से जोड़कर देखा जाता है। तर्क दिया जाता है कि यूरोप में शिक्षाटन के लिए कौन लोग जाते हैं? जाहिर सी बात है कि इसमें वे अधिकांश लोग महानगरों के उस समाज से होते हैं जो काले शीशे वाली गाड़ियों में महिलाओं के साथ बदसलूकी के लिए चिन्हित हैं। यानी वहाँ जाने वाले लोगों की अंतर्दृष्टि, भौगोलिक अंतर के बावजूद ठस कस्बाई ही रहती है। एक हद तक कुछ मामलों में इसे सही भी माना जा सकता है। लेकिन क्या इसे तार्किक कसौटी पर कसते हुए सही कहा जा सकता है? दुनिया की आर्थिक और सामाजिक रूपरेखा प्रस्तुत करने वाले कार्ल मार्क्स ने पूंजी और श्रम का विभाजन करते हुए ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया। आज की पूंजी की राजनीति कहती है कि श्रमिक को हमेशा बाहरी होना चाहिए। यह इसलिए ताकि श्रमिकों का व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव न पड़े। यानी ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्रवासी श्रमिक लोकल मिल मालिक और राज्य पर दबाव न बना पायें। पूंजी का चरित्र होता है समकेंद्रित करना। यानी लगातार यह कोशिश कि पूंजी परिधि के तरफ नहीं फैले। नेटिव इंडीजीनियस- जो यह नहीं समझते कि हम उनके खिलाफ क्यों हैं? अगर देखा जाये तो विकसित देशों का व्यापार, उत्पादन से लेकर विपणन तक तीसरी दुनिया के देशों पर आश्रित है। ठीक उसी तरह जैसे मुंबई, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों का उत्पादन हिन्दी पट्टी के श्रमिकों पर आधारित है। और इन महानगरों में भी नेटिव इंडीजीनियस द्वारा वैसी ही घटनाएँ देखने को मिलती हैं जैसाकि यूरोपीय देशों में एशियाइयों के साथ होता आया है। विशेषज्ञों ने पूंजी के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण यह आशंका व्यक्त की थी की 2005 से 2020 के बीच में दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव होंगे। इसकी शुरूआत आस्ट्रेलिया की नस्ली वारदातों से मानी जा सकती है। मध्य पूर्व एशिया में मिश्र में राजनीतिक परिवर्तन के मौजूदा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अरब वर्ल्ड में अवश्यंभावी राजनीतिक बदलाव होंगे। ट्यूनीशिया की आग बाहर तक फैल चुकी है। आर्थिक परिवर्तन में 2007 में शुरू हुई मंदी ने तीसरी दुनिया पर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। जबकि आर्थिक विशेषज्ञों का मत था कि भारत इसके प्रभाव से मुक्त रहेगा। भारत पर यह दूसरे तरीके से अपना प्रभाव डाल रहा है। पहले-पहल यूरोपीय राज्यों ने श्रम की आउटसोर्सिंग को बंद किया। और अब यूरोप में रह रहे भारतीयों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मंदी के कारण बर्बाद हुए अय्याश यूरोपीय मध्य वर्गीय समाज ने अपनी चल-अचल संपत्ति को धड़ल्ले से बेचा। जाहिर सी बात है कि खरीददारों में बड़ी संख्या बचत करने वाले भारतीयों की रही। एशियश की उत्तरोतर प्रगति उस समाज की आँखों में चुभ गई। यह अकारण नहीं है बल्कि यूरोप में इमिग्रेशन टैग जैसे मामले मंदी के बाद ही बढ़े हैं। आने वाले समय में सिर्फ यूरोप में ही नहीं, लगभग दुनिया के हर हिस्से में, भारत में भी इस अव्यवस्थित पूंजीवादी व्यवस्था के कारण मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच अंतरसंघर्ष और तेज होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
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