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18 सितंबर 2013

नया बाप कमीना और हिंदुस्तान ज़िंदाबाद है!

-दिलीप ख़ान

(बिनलाल उर्फ़ बिलाल से बातचीत यानी शहर ये दिल्ली है!)

वह कोई पौने पांच फुट का था और जब उससे मेरी मुलाक़ात हुई तो रात के साढ़े ग्यारह से ज़्यादा बज रहे थे। हम उसके सोने वाली जगह पर खड़े थे, लेकिन शायद उसके 'बिस्तर' से दस-बीस कदम इधर-उधर! रोड के डिवाइडर पर खड़े होकर देखने से गाड़ियां कुछ ज़्यादा ही डरावनी लग रही थीं। सायं-सायं करती हुई कारें दोनों तरफ़ से गुजर रही थीं। शायद लोग अपने घर पहुंचने की जल्दी में थे। चलती सड़क में बिना जाम के भी गाड़ियों के हॉर्न ये बता रहे थे कि वो शहर पर अपने दिन भर की थकान छोड़कर गाढ़ी नींद लेने की बेताबी में हैं। कभी-कभी देर रात अपने दफ़्तर से मैं इसी रास्ते घर लौटता हूं। इन्हें पहले भी सड़क पर सोते देखा था। एक उचटे से अफ़सोस और सहानुभूति से देखने का ठीक से मौक़ा भी नहीं मिल पाता कि गाड़ी हमेशा आगे बढ़ जाती! लेकिन इस बार स्टोरी पर काम करने के दौरान इनसे मिलना था। हम दिल्ली में प्रवासियों के मुद्दे पर अपने चैनल के लिए रिपोर्ट कर रहे थे और उसी में एक कड़ी के तौर पर बेघर भी शामिल थे।  

यह आईएसबीटी से राजघाट के बीच की जगह है। फ्लाईओवर से ठीक पहले। यहां तीन टुकड़ों में अलग-अलग जगह डिवाइडर को लोगों ने अपना 'बेडस्पेस' बना लिया है। हमने पहले ही यह तय कर लिया था कि अगर शूटिंग से किसी को परेशानी हो तो हम कैमरा वहीं बंद कर देंगे। थोड़ा सचेत भी थे कि नशे की हालत में कोई कैमरे को क्षति न पहुंचा दे। लिहाजा हमारे एक उत्साही सहकर्मी, जोकि सिर्फ़ रात की इस शूटिंग के लिए अपना काम ख़त्म होने के बाद भी रुक गए थे, कैमरापर्सन के आस-पास चिपककर चल रहे थे। तो कुल जमा हम तीन लोग थे। कैमरापर्सन स्म्रुति, सहकर्मी करमवीर और मैं। जायज़ा लेने के बहाने मैं इधर-उधर दो-एक लोगों से ऐसे ही बात करने लगा। ज़्यादातर लोग दिन भर की थकान और नशे के हल्के डोज के तले नींद में समा रहे थे। मैंने देखा करमवीर के साथ वही लड़का खड़ा है। लंबाई लगभग पौने पांच फुट। 

धीरे-धीरे मैं भी वहां पहुंचा और गप्प को लोक लिया। दो-एक मिनट में ही वो सामान्य होकर बात करने लगा। लेकिन, बीच-बीच में वो अपनी लुंगी के एक खूंट को उठाकर मुंह में भर रहा था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि वो 'माल' पी रहा है। उस पूरे इलाके में हर नशेरी को स्मैकिया और चरसी मान लेने का एक नज़रिया है दिल्ली के भीतर। सो, मैंने भी वही समझते हुए पूछा, 'कौन सा माल है?' लड़का बताया-ट्यूबमाल। 

करमवीर वहां से दस कदम आगे बढ़कर स्म्रुति के साथ हो लिए। मैंने उससे 'ट्यूबमाल' देखने की इच्छा जाहिर की। वह पहले हिचकिचाया और मीडियावाला समझकर थोड़ा डरा भी, लेकिन बातचीत के दौरान फिर सामान्य हो गया। उसने लुंगी के नीचे जो जींस पहन रखी थी वह पैरों के पास पांच-छह तह मुड़ी हुई थी और उस मुड़े हुए हिस्से में से एक नया ट्यूब सैंपल की तरह मेरे हाथ में थमा दिया। वहां से सौ मीटर आगे-पीछे की स्ट्रीट लाइट नहीं जल रही थी, लिहाजा मैंने गाड़ियों की आती-जाती रौशनी की बजाय अपने मोबाइल के पास ले जाकर उसे देखा। वह पंक्चर बनाने के दौरान ट्यूब को चिपकाने में इस्तेमाल होने वाला लिक्विड था। ब्रांड का नाम था- ओमनी। क़ीमत 15 रुपए। मैंने पूछा, 'रोज़ पीते हो?'  बांग्ला उच्चारण के साथ वह जो हिंदी बोल रहा था उसमें मुझे उसने बताया कि हर दूसरे दिन वह एक ट्यूब पी जाता है। 

फिर थोड़ी देर बाद उसने मुझे ये भी बताया कि आज चूंकि उसने रात में खाना नहीं खाया इसलिए माल पी लेने से नींद अच्छी आएगी। मुझे एकबारगी ग़ुस्सा आया..लेकिन मैं उसे बेहद संजीदगी से समझाने की कोशिश करने लगा कि 15 रुपए ख़र्च करके अगर वो माल ख़रीद सकता है तो इतने ही पैसे में खाना क्यों नहीं खाता। मैं उसे उसके स्वास्थ्य, बेहतर जीवन के संभावित रास्ते सहित कई मसलों पर समझाता रहा और इस दौरान वो अपने चेहरे पर स्थाई मुस्कुराहट के साथ मेरी बात सुनता रहा। बीच-बीच में सहमति में वो अपना सिर हिला देता था। इस दरम्यांन उसने अपना जो नाम बताया उसे मैंने 'बिनलाल' सुना। 

अब बारी उसकी थी। बिनलाल ने बताया कि मंगलवार को वह ख़रीदकर नहीं खाता और नियम के मुताबिक़ बगल वाले हनुमान मंदिर में ही पेट भर आता है, लेकिन आज वो लेट हो गया और मंदिर का सारा खाना ख़त्म हो गया। लिहाजा रात के इस पहर माल से ही वो काम चलाएगा। फिर बड़ी चमक के साथ मुझसे पूछा कि अगर मुझे पुड़िया (चरस) चाहिए तो आगे से मैं लेफ़्ट ले लूं और 100 मीटर अंदर जाने पर पांच-छह सौ रुपए में मुझे वो मिल जाएगी। मैंने इनकार किया और अपना बैग टटोला, जिसमें कुछ नहीं था, सिवाय आधे डब्बे बिस्कुट के, उसने बड़े प्यार से उसे लुंगी में बांध लिया। 
बिनलाल ने बताया कि वो कलकत्ते का है और काफ़ी कम उम्र में ही दिल्ली आ गया था। उसकी नज़र में कलकत्ता बेहद घटिया शहर है जबकि दिल्ली के भीतर दम है। आगे वह मुंबई जाना चाहता है क्योंकि सारे हीरो-हीरोइन उसी शहर में रहते हैं। बोला, 'मुंबई तो एक बार जाकर रहूंगा....स्स्साला वहां की ज़िंदगी ही कुछ और है।' फिर अचानक अपने शरीर को लेकर सचेत हो गया और सफाई देने लगा कि मैं कहीं ये न समझूं कि आज खाना नहीं खाया तो अपने शरीर के साथ वो रोज़ाना ऐसे ही जुल्म करता है। फिर भी मेरी नज़र में सहमति का भाव नहीं देखते हुए उसने कहा कि वो हर दूसरे दिन नॉन वेज खाता है और वो भी अपने पैसों से। अब चौंकने की बारी मेरी थी क्योंकि थोड़ी देर पहले उसने मुझसे कहा था कि वो कूड़ा बीनने का काम करता है और इससे रोज़ाना उसकी कमाई सौ रुपए तक की हो जाती है। ऐसे में वो दो वक़्त खाना और उसमें भी नियमित अंतराल पर नॉन वेज के साथ-साथ नशे की सामग्रियां और बाकी ज़रूरत की चीज़ें कैसे मैनेज करता है! 
इसके बाद जो उसने मुझे बताया वो सुनकर मैं सन्न रह गया। बिनलाल ने कहा, 'आगे जो आप पुल देख रहे हैं वहां से राइट लेने पर मार्केट है, जहां पर हम बीस रुपए में नॉनवेज थाली खाते है, दमभर।' मैंने क़ीमत पर हैरत जताई। तो बिनलाल ने भेद खोला। उस इलाके में जो मुर्गे-मुर्गियां मर जाते हैं उसी से यह 20 रुपए में दमभर वाली थाली तैयार होती है! लेकिन बिनलाल की ज़्यादा रुचि माछ-भात में रहती है। विकल्प रहने पर वो माछ-भात पर ही हाथ आजमाता है। 
चूंकि मैं स्टोरी प्रवासियों पर कर रहा था, तो बीच-बीच में अपनी ज़रूरत की चीज़ भी उससे पूछने की कोशिश करने लगा। मैंने उसके परिवार के बारे में पूछा और साथ में यह सवाल भी चिपका दिया कि वो घर कितने अंतराल पर जाता है। बिनलाल ने कहा कि तीन साल पहले एक बार गया था जब उसकी उम्र 15 साल थी। घर में मन नहीं लगता और घरवाले उसको प्यार नहीं करते। बिनलाल ने माना कि उसका दिल दिल्ली में इसलिए लगता है क्योंकि घर में बिनलाल के लिए जगह नहीं है। मैं कई बार स्टोरी में घुसता और फिर उस लाइन से बाहर निकल जाता। लड़के से मैंने कहा कि क्यों नहीं वह अपने शहर में मेहनत करता है, कम कमाई के बावजूद अपने समाज में रहने का उसे एहसास होगा। 

वो बोला कि घर जाना उसके लिए आसान नहीं है। थोड़ी चुप्पी के बाद बिनलाल ने मुझसे कहा, 'आपको एक बात मैं सच-सच बताऊं, मेरा घर कलकत्ता नहीं बांग्लादेश है। मेरा बाप मर गया तो मां ने दूसरी शादी कर ली और नया बाप मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं करता...इसलिए मैं ढाका नहीं जाऊंगा।' तो बिनलाल बांग्लादेश से आया है, मेरी दिलचस्पी थोड़ी और बढ़ी। मैंने पूछा कि क्या वहां पर विधवा महिलाओं की शादी इतना आम है...और चूंकि वह नाम से हिंदू साउंड कर रहा था इसलिए मेरे मन में ये भी बात आई कि हो सकता है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक होने के नाते इसके भारत आने की कोई और कहानी हो।  

लेकिन बांग्लादेश वाला राज खोलने के बाद बिनलाल थोड़ा रक्षात्मक हो गया और कहने लगा कि बांग्लादेश से कहीं ज़्यादा प्यार वो हिंदुस्तान को करता है और लगे हाथों इसे दर्शाने के लिए बिना किसी आग्रह के तीन-चार बार 'भारत माता की जय' और 'हिंदुस्तान ज़िंदाबाद' के नारे लगा दिए। उसने आगे मेरी जिज्ञासाओं को विराम देते हुए कहा कि वो हिंदू नहीं मुसलमान है। अगला सवाल मैंने दागा, 'फिर नाम तुम्हारा बिनलाल कैसे है?' उसने इतनी बातचीत के बाद भी अपने नाम के गफ़लत को देखते हुए ज़ोर से ठहाका लगाया, 'अरे भई बिनलाल नहीं बीलाल (बिलाल)।' 

अच्छा! तो कहानी ये है कि बिलाल 8 साल की उम्र में बांग्लादेश से भारत आ गया और फिर कलकत्ते के रास्ते दिल्ली। बिलाल ने बताया कि दिल्ली में सैंकड़ों की तादाद में उनके जैसे लोग हैं जो बांग्लादेशी हैं, मजबूर है, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे वाले हैं और अलग-अलग कारणों से अपने मुल्क़ नहीं लौटना चाहते हैं। सीमा पार करने में ज़्यादा दिक़्क़त अब तक नहीं आई...शायद अब बड़ा होने के बाद उसे परेशानी आए, लेकिन बिलाल मानता है कि अगर कभी बांग्लादेश जाने की उसने कोशिश की भी, और दोनों में से किसी देश की पुलिस या सेना ने उसे धड़ लिया तो जेल में समय गुजारना बहुत पीड़ादायक नहीं होगा! 

मैंने पूछा, 'अब शादी-वादी का इरादा है क्या?' बिलाल थोड़ा शर्माते हुए कहा, 'अरे भाई, नहीं..' फिर थोड़ी सांस लेकर अपनी बात में एक वाक्य और जोरा, 'लेकिन जब चाहूंगा शादी कर लूंगा...चांदनी चौक में मेरी ही तरह कई लड़कियां हैं..जो खुले में सोती है, कूड़ा बीनती है, उनमें से कोई सही बंदी ढूंढ़ लिया तो कर सकता हूं,.लेकिन दिक़्क़त ये है कि वो 'धंधा' करती है।' बिलाल को फिर भी, 'धंधे' से कोई ख़ास परेशानी नहीं है..बस मन मिलने की बात पर लाकर उसने मुझे छोड़ दिया। स्म्रुति और करमवीर ने सामने से आवाज़ मारी..मैं वहीं दस कदम दूर उन दोनों के पास पहुंचा और बमुश्किल तीन-चार मिनट में ही जब वापस लौटा, बिलाल के पास, तो वह कहीं ग़ायब हो गया था। लोगों की कतार में पता नहीं कहां दुबककर सो गया। हमने उसे ढूंढा-हेरा लेकिन वो नहीं दिखा। जाते-जाते जो उसने कहा था वो मेरी कानों में गूंज रहा था, "मां मेरी बहुत अच्छी है, नया बाप ही कमीना है। वो अगर मुझे प्यार करता तो मैं यहां दिल्ली के इस फुटपाथ पर नहीं होता भाई।'

16 सितंबर 2011

एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा.

चन्द्रिका
शायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं, वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी. ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे. ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है. आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदा. विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं. वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैं, कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैं. विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता है. रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ पर, ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है. यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियां, तने और आकार मिलते-जुलते लगते हैं. किसी एक घटना की कई-कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती है. आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी है. ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है. दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैं. पर आंच है, आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.

सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं. जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्या? शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होती. क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आती. अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता है, उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़ना, उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त है, जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी हैं. सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैं, जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधन. शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना है, पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना है. लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता. वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और..... और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले. जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं. वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं. यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं. इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते.

इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी है, इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सका, जो अब बस जेहन में बचा है. उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं. इसे पलायन नही कहा जा सकता, इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे. बंजामी ४० साल पहले गदरा, सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं. अब वे यहां से नहीं जाना चाहती, दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है. वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी (माओवादी) वालों के साथ रहता था और सलवा-जुडुम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में. यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना. सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी. ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है. यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है, यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है.
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है. पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया था. आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गया.....विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी......आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थी. ये अब मौखिक कहानी बन गये हैं, इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी है. जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैं, उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा है, उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैं. वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैं. अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाए. यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहे. विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकर. जिसमे उस संस्कृति का विनास, उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित था, जहां वे अब तक जीते आ रहे थे. १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया है. जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगी, पर गोलियां पानी में नहीं बदली. वे चली और कुछ चीखें उठी, कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे. भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगी. भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं. अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे-धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास किया, उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थी, वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैं. वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना-सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं...........जारी

04 मई 2011

ओसामा बिन लादेन की दूसरी मौत: एक नाटक की गंध

ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबरें अनेक सवालों पर फिर से ध्यान खींचती हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश में अवैध-अनैतिक-अमानवीय फौजी कार्रवाइयों का अधिकार है. ऐसे हमले के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लादेन, कथित तौर पर, उन हमलों के लिए जिम्मेदार था, जिनमें 3 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुईं. इन हमलों और हमलावरों की वास्तविकताओं पर किये जानेवाले मजबूत संदेहों को छोड़ भी दें तब भी अगर बेगुनाह लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार होना ही ऐसे हमलों के लिए वाजिब कारण है तब तो सारे हत्यारे बुशों और ओबामाओं को सैकड़ों बार गोलियों से मारना पड़ेगा. यूनियन कार्बाइड के मुखिया और भोपाल गैस जनसंहार में मारे गये बीसियों हजार लोगों और दो दशकों में इसकी पीड़ा अब भी भुगत रहे लाखों लोगों के अपराधी वारेन एंडरसन को किसने पनाह दी है ? उसे कौन बचा रहा है? 2009 से लेकर अब तक श्रीलंका में लाखों तमिल निवासियों के कत्लेआम के दोषी राजपक्षे की मदद किसने की और अब भी उसकी पीठ पर किसका हाथ है? विदर्भ में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से अधिक किसानों की (आत्म)हत्याओं के लिए जो (निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की) नीतियां जिम्मेदार हैं, उन्हें किसने बनाया और उन्हें कौन लागू कर रहा है? इराक में पिछले दो दशकों में प्रतिबंधों और युद्ध में जो 14 लाख 55 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है? पूरी दुनिया में लगातार युद्ध, प्रतिबंधों और सरकारी नीतियों के जरिए लोगों की जिंदगियों में संस्थागत हिंसा घोल रही साम्राज्यवादी नीतियां आखिर कौन लोग बनाते और थोपते हैं. अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी देश. इनके द्वारा की गयी हत्याएं 11 सितंबर को मारे गए लोगों की संख्या से सैकड़ों गुना अधिक हैं. इन्हें क्यों नहीं सजा मिलती? कब मिलेगी इन्हें सजा? फिर इन्हें क्या अधिकार है दूसरों को आतंकवादी कहने और मारने का?

इन सब सवालों के जवाब दुनिया की जनता खोज भी रही है और दे भी रही है. साम्राज्यवाद का ध्वस्त होना लाजिमी है. अपने इन हताशा में उठाये कदमों के जरिए ही वह अपने अंत के करीब भी आ रहा है. उसकी जीत का एक-एक जश्न, उसकी कामयाबी का एक-एक ऐलान उसकी कमजोरी और भावी अंत की ओर भी संकेत कर रहा है. ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबर को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. अमेरिकी अर्थशास्त्री, वाल स्ट्रीट जर्नल और बिजनेस वीक के पूर्व संपादक-स्तंभकार, अमेरिका की ट्रेजरी फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के सहायक सचिव पॉल क्रेग रॉबर्ट्स बता रहे हैं कि कैसे हत्या की इस खबर का सीधा संबंध विदेशी मुद्रा और व्यापार बाजार में डॉलर की पतली होती हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल होती जा रही स्थिति से है. इन्फॉर्मेशन क्लियरिंग हाउस की पोस्ट. हाशिया का अनुवाद.


 अगर आज 2 मई के बजाय 1 अप्रैल होता तो हम ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और तत्काल समुद्र में बहा दिये जाने को अप्रैल फूल के दिन के मजाक के रूप में खारिज कर सकते थे. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को समझते हुए हमे इसे इस बात के सबूत के रूप में लेना चाहिए कि अमेरिकी सरकार को अमेरिकियों की लापरवाही पर बेहद भरोसा है.

जरा सोचिए. एक आदमी जो कथित रूप से गुरदे की बीमारी से पीड़ित हो और जिसे साथ में डायबिटीज और लो ब्लड प्रेशर भी हो, और उसे डायलिसिस की जरूरत हो, उसकी एक दशक तक खुफिया पहाड़ी इलाकों में छुपे रह सकने की कितनी गुंजाईश है? अगर बिन लादेन अपने लिए जरूरी डायलिसिस के उपकरण और डाक्टरी देख-रेख जुटा लेने में कामयाब भी हो गया था तो क्या इन उपकरणों को जुटाने की कोशिशें इस बात का भंडाफोड़ नहीं कर देतीं कि वह वहां छुपा हुआ है? फिर उसे खोजने में दस साल कैसे लग गए?

बिन लादेन की मौत का जश्न मना रहे अमेरिकी मीडिया के दूसरे दावों के बारे में भी सोचें. उनका दावा है कि बिन लादेन ने अपने दसियों लाख रुपए खर्च करके सूडान, फिलीपीन्स, अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर खड़े किए, ‘पवित्र लड़ाकुओं’ को उत्तरी अफ्रीका, चेचेन्या, ताजिकिस्तान और बोस्निया में कट्टरपंथी मुसलिम बलों के खिलाफ लड़ने और क्रांति भड़काने के लिए भेजा. इतने सारे कारनामे करने के लिए यह रकम तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है (शायद अमेरिका को उसे पेंटागन का प्रभार सौंप देना चाहिए था), लेकिन असली सवाल है कि बिन लादेन अपनी रकम भेजने में सक्षम कैसे हुआ? कौन-सी बैंकिंग व्यवस्था उनकी मदद कर रही थी? अमेरिकी सरकार तो व्यक्तियों और पूरे के पूरे देशों की संपत्तियां जब्त करती रही है. लीबिया इसका सबसे हालिया उदाहरण है. तब बिन लादेन की संपत्ति क्यों जब्त नहीं की गयी? तो क्या वह 100 मिलियन डॉलर की अपनी रकम सोने के सिक्कों के रूप में लेकर चलता था और अपने अभियानों को पूरा करने के लिए दूतों के जरिए रकम भेजता था?

मुझे इस सुबह की सुर्खियों में एक नाटक की गंध आ रही है. यह गंध जीत के जश्न में डूबी अतिशयोक्तियों से भरी खबरों में से रिस रही है, जिनमें जश्न करते लोग झंडे लहरा रहे हैं और ‘अमेरिका-अमेरिका’ का मंत्र पढ़ रहे हैं. क्या ऐसी कोई घटना सचमुच हो रही है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा को जीत की बेतहाशा जरूरत है. उन्होंने अफगानिस्तान में युद्ध को फिर से शुरू करके मूर्खतापूर्ण गलती की और अब एक दशक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका अगर हार नहीं रहा तो अपने आप को गतिरोध में फंसा हुआ जरूर पा रहा है. बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं.

पिछली अनेक सरकारों द्वारा ‘व्यापक संहार के हथियारों’ जैसे तरह-तरह के झूठों और हथकंडों का नतीजा अमेरिका और दुनिया के लिए बहुत भयानक रहा है. लेकिन सभी हथकंडे एक तरह के नहीं थे. याद रखें, अफगानिस्तान पर हमले की अकेली वजह बतायी गयी थी- बिन लादेन को पकड़ना. अब ओबामा ने ऐलान किया है कि बिन लादेन अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एक आजाद देश में की गयी एक कार्रवाई में मारा गया है और उसे समुद्र में दफना दिया गया है, तो अब युद्ध को जारी रखने की कोई वजह नहीं रह गयी है.

शायद दुनिया के विदेश विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट ने कुछ वास्तविक बजट कटौतियों के लिए मजबूर किया है. यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब अंतहीन युद्धों को रोका जाए. ऐसे में जानकारों की राय में बहुत पहले मर चुके ओसामा बिन लादेन को डॉलर के पूरी तरह धूल में लोट जाने से पहले एक उपयोगी हौवे के रूप में अमेरिकी फौजी और सुरक्षा गठजोड़ के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया गया.

18 जनवरी 2010

स्वास्थ्य पर घटे बाजार का प्रभुत्व

डॉ. ए.के. अरुण
 
न दिनों भारत ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया गंभीर रोगों की चुनौतियों से जूझ रही है। प्रचलित पुराने रोगों के अलावा नये उभर रहे रोगों की जानलेवा किस्में बड़े पैमाने पर कहर बरपा रही हैं। इन रोगों के खात्मे के नाम पर चलाए जाने वाले सरकारी कार्यक्रमों की या तो दिशा बदल दी गई है या उनकी मियाद बढ़ा दी गई है। ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ और ‘गरीबों के लिए स्वास्थ्य’ की जगह अब चुनिन्दा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा (एस.पी.एच.सी.) ने ले ली है। पहले स्वास्थ्य का जिम्मा बहुत हद तक सरकार के पास था। अब इसे निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है। निजी बीमा कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके लिए धन उपलब्ध करा रही हैं। भारत में स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे कभी आर्थिक सुधारों के केन्द्र में नहीं रहे हैं, बल्कि इन्हें तो सुधारों के मुख्य लक्ष्य, निवेश और विकास की राह में बाधक माना जाता है। हम देख रहे हैं कि 1991 के आर्थिक सुधारों का जन स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।
भारत में अब भी संक्रामक रोगों से मरने वालों की संख्या बहुत अधिक है। टी.बी. संक्रमण की वार्षिक दर आज भी 1.5 फीसद से ज्यादा है। विश्व औसत से यह दर लगभग दोगुनी है। भारत में प्रत्येक वर्ष करीब 15 करोड़ टी.बी. रोगियों की पहचान होती है। इनमें से सालाना 3 लाख अकाल मनुष्य के शिकार होते हैं। यहां कुष्ट रोगियों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा है। यह दुनिया के कुल कुष्ट रोगियों की संख्या का एक तिहाई है। प्रत्येक वर्ष दस्त से ही मरने वाले बच्चों की संख्या लगभग 5 लाख है। पोलियो के उन्मूलन कार्यक्रम को ही देखें, तो 1995 से चल रहे इस कार्यक्रम पर काफी खर्च करने के बाद भी पोलियो से मुक्ति की घोषणा करने की स्थिति नहीं बनी है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार पोलियो उन्मूलन अभियान पर प्रत्येक वर्ष 1100 करोड़ रूपये खर्च होते हैं, लेकिन नीतिगत खामियों की वजह से पोलियो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
एच.आई.वी./एड्स को लेकर भारत में चर्चित विवाद आंकड़ों, उसके नाम पर हो रहे खर्च और एड्स रोकथाम के सुझावों आदि को लेकर बना ही हुआ है। प्रत्येक वर्ष मलेरिया, डेंगू और कालाजार विकराल रूप धारण करता है। हजारों जानें जाती हैं लेकिन हम अपनी स्वास्थ्य सम्बन्धी सोच को जनपक्षीय नहीं बना पा रहे। मलेरिया 1947 में भारत में भयानक रूप में था। 7.5 करोड़ प्रभावित लोगों में आठ लाख लोग मौत के शिकार हुए थे। सन 1964 तक आते-आते यह नियंत्रित हो चला था, लेकिन अब फिर मलेरिया घातक रूप से फैल रहा है। इतना ही नहीं, मलेरिया की जानलेवा प्रजाति ‘फैल्सिफेरम मलेरिया’ के मामले बढ़ रहे हैं। कालाजार भी 1960 तक खत्म हो चुका था, लेकिन इधर कालाजार के मामले 77 हजार से बढ़ गए हैं और मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा है।
भूमंडलीकरण के दौर में ये स्थितियां और विकट हुई हैं। आज देश में 13 से 20 करोड़ ऐसे लोग हैं, जो अपना इलाज पैसे देकर करा सकने की स्थिति में नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 1995 की वार्षिक रिपोर्ट पर गौर करें। इस रिपोर्ट में अत्यधिक गरीबी के अन्तरराष्ट्रीय वर्गीकरण में एक रोग माना गया है। इसे जेड 59.5 का नाम दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीबी तेजी से बढ़ रही है और इसके कारण विभिन्न देशों और एक ही देश के लोगों के बीच दूरी भी बढ़ती जा रही है। इससे स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हुई हैं। एक आंकड़े के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में प्रत्येक तीन में से दो बच्चे कुपोषित हैं। गिनती में यह संख्या सात करोड़ है। विश्व में 17 प्रतिशत कुपोषित बच्चों में से 40 प्रतिशत बच्चे तो भारतीय हैं। आर्थिक सुधारों का कमजोर वर्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सन 2000 के बाद भी 6 से 24 माह आयु के बच्चों और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण की समस्या बढ़ी ही है। कुछ प्रमुख राज्यों (आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आ॓डीशा, पंजाब, राजस्थान) में नवजात शिशु मृत्यु दर भी बढ़ी है। भारत में मुक्त व्यापार व्यवस्था का लाभ उठा कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तीसरी दुनिया के देशों में असुरक्षित और पुरानी दवाओं, संक्रमित खाघ पदार्थों का अम्बार लगा दिया है। इस खेल में हमारी सरकार इनकी जूनियर पार्टनर बन गई है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को डब्ल्यूएचआ॓ और संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता मिलने से दूसरों के साथ मिलकर ये संस्थाएं न्यूनतम जोखिम उठाकर अपने निवेश का भरपूर लाभ ले रही हैं।
इस पृष्ठभूमि में आम लोगों की सेहत और लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार की जवाबदेही की बात बेमानी लगती है, लेकिन जनहित की बात करने वाले जनसमूह और वैकल्पिक धारा के जिम्मेदार लोगों, लोगों के संगठन के समक्ष स्थिति का ब्योरा रखकर एक व्यापक पहल और प्रक्रिया की उम्मीद करना जरूरी है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के दूसरे क्षेत्रों पर कम्पनियों की बुरी नजर का दुष्परिणाम हर अमीर-गरीब को भुगतना होगा। समाजवाद को अप्रासंगिक मान चुका साम्राज्यवाद अब जब कभी लड़खड़ाने लगता है, तो लोग फिर समाजवाद की तरफ देखने लगते हैं। स्वास्थ्य जैसा जरूरी क्षेत्र सीधे जीवन से जुड़ा है, उस पर बाजार का प्रभुत्व कम हो, ऐसे प्रयास की जरूरत है।

15 जनवरी 2010

इंडिया, भारत और मैनहट्टन

देविन्दर शर्मा

देश ने जब उदारीकरण के रास्ते पर चलना तय किया, उसके ठीक बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने सदन में जो भाषण दिया उसके पहले पैरे में उन्होंने कहा कि कृषि हमारा मुख्य सेक्टर है और इसे जब तक बिल्ड अप नहीं किया जाएगा देश की अर्थव्यवस्था किसी कीमत पर उन्नत नहीं हो सकेगी। लेकिन वे यह कहना भी नहीं भूले कि कृषि राज्य का विषय है और इसे विकसित करने में राज्य की भूमिका अधिक होगी। अगले पैरे में उन्होंने यह कहा कि इंडस्ट्री ग्रोथ की कितनी जरूरत है और इसके लिए क्या-क्या किए जाने चाहिए। लेकिन वे जानबूझकर यह कहने से बचे कि इंडस्ट्री भी राज्य का ही विषय है। उनके उस भाषण का यही निहितार्थ था कि केंद्र के लिए कृषि से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इंडस्ट्री होगी। 18 साल बाद आज हालत यह है कि कृषि के अधिकतम रकबे को कारपोरेट खेती में तब्दील करने की पहल की जा रही है।
देश में कृषि की हालत आज बदतर है। 1997 से लेकर आज तक दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सरकार जानबूझकर ऐसा माहौल रच रही है जिससे किसान खेती छोड़ें और उन्हें मजदूर में तब्दील कर दिया जाए। सरकार की कोशिश है कि चालू पंचवर्षीय योजना के अंत तक 40 फीसद किसान खेती से मुंह मोड़ लें। पिछले बजट में वित्त मंत्री ने देश में 1000 आईटीआई खोलने की बात कही। यह एक सोची समझी साजिश है ताकि आगे किसानों को खेती से निकाल मजदूर बनाने की प्रक्रिया आसान हो सके। लेकिन विश्व बैंक का एक आकलन देखिए। उसका कहना है कि 2015 तक भारत में गांव से शहर पलायन करने वाले लोगों की संख्या जर्मनी, फ्रांस और इंगलैंड की आबादी से दुगुनी यानी करीब 40 करोड़ होगी। अब सरकार यह बताए कि इस आबादी को रोजगार कौन देगा। आईटीआई के बूते क्या यह हो सकेगा? फिर हमारी जो नीतियां है वह शहरों से भी गरीबों को खाली करने की है। ऐसे में इस पूरी आबादी का क्या होगा। दरअसल हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं उसमें इस आबादी के लिए कोई जगह नहीं होगी? वे क्या करेंगे आ॓र उनकी हालत कितनी भयावह होगी यह बताना अभी संभव नहीं जान पड़ता।
उदारीकरण की नीतियों पर चलते हुए सरकार खाघ सुरक्षा आयात पर निर्भर बनाना चाहती है। वह चाहती है कि 2010 के अंत तक हम 30 फीसद फुड आयात करें। आज प्रधानमंत्री कारपोरेट कल्चर की अधिक बात करते हैं। वे जिस रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं वह हमें ऐसे मुकाम पर पहुंचयगा जब खेती इंडस्ट्री पर निर्भर हो जाएगी। उदारीकरण के बाद आर्थिक गिरावट से बड़ी कोई चिंता नहीं रह गई है। शायद कोई दिन प्रधानमंत्री का ऐसा नहीं गुजरता जब वे किसी उघोगपति से बात नहीं कर रहे होते हैं। पानी, बीज, खाद सब चीजों से जुड़ी नीतियां कारपोरेटरों के पक्ष में है और किसानों के खिलाफ। वायदा कारोबार शुरू कर दिये जाने से किसानों को उनका वाजिब हक नहीं मिल पा रहा। किसान अब मंडी में अपने अनाज नहीं बेच पा रहे। कई राज्यों ने मंडी व्यवस्था से किनारा कर लिया है। अब किसानों को सीधे कारपोरेट कंपनियों को अपना उत्पाद बेचना पड़ रहा है। सरकार कमोडिटी एक्सचेंज, कांट्रेक्ट फार्मिंग, फुड रिटेल चेन जैसी व्यवस्था करना चाहती है। 1991 के बाद सारी सरकारों का रूझान यही रहा है कि मार्केट खेती को कंट्रोल करे और ऐसा हो भी रहा है।
स्वामीनाथन जैसे कृषि वैज्ञानिक भी स्पेशल इकानॉमिक जोन की तरह स्पेशल एग्रीकल्चर जोन यानी साज बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन ऐसा करना भी कारपोरेट कृषि को आगे बढ़ाना ही होगा और इससे देश के किसानों का कोई भला नहीं होने वाला। हमारा 10 फीसद फुड प्रोडक्शन ट्रेड में जाता है। दुनिया में कुल अनाज व्यापार में हमारा हिस्सा 0.7 फीसद है। बड़े पैमाने पर साज का गठन हो भी जाए तो भी यह हिस्सेदारी 3 फीसद से अधिक नहीं हो सकती। दरअसल साज का असल फायदा न देश को मिलेगा और न किसानों को। सारा लाभ बस व्यापारी उठाएंगे। आज नक्सलवाद की जो व्यापाक प्रसार हो रहा है उसकी जड़ में सरकार की आर्थिक नीतियां ही हैं। सरकार ने जल, जंगल और जमीन तीनों को इस कदर तबाह किया है कि लोग बंदूकें उठा रहे हैं। 2004 में 161 जिले नक्सल प्रभावित थे आज यह संख्या 230 क्रास कर चुकी है। योजना आयोग का कहना है कि देश में 300 जिले ऐसे हैं जहां किसी न किसी रूप में आतंक राज है। जाहिर है यह सारी स्थिति इस आ॓र इशारा करती है कि हमारे विकास का मॉडल ठीक नहीं है। इसे कृषि आधारित होना चाहिए था। आज देश के अंदर में इंडिया और भारत के साथ मेनहटन की मौजूदगी भी है। यह मेनहटन देश के 100 से अधिक स्पेशाल जोन वाले हिस्से हैं जो रजवाड़े की तरह काम कर रहे हैं।
जहिर है यह स्थिति बदलनी होगी अन्यथा समस्याएं बढ़ेंगी। सबसे जरूरी यह है कि खेती को टिकाउ और इकानॉमिक बनाना होगा। सरकार को कंपनियों के हित में सोचना बंद करना चाहिए। यह बिलकुल संभव है। आंध्र प्रदेश के सीएमएसए यानी कम्युनिटी मैनेज्ड सस्टनेबल एग्रीकल्चर मॉडल से हमें सीख लेनी चाहिए। इसके तहत राज्य के 18 जिले में 3 लाख से अधिक किसान खेती कर रहे हैं। इस खेती के अंतर्गत कंपनियों के खाद, कीटनाशकों आदि का प्रयोग नहीं किया जाता। कुल मिलाकर कोई भी कृत्रिम और व्यवसायिक चीज नहीं अपनाई जाती। ऐसा होने पर भी न तो पैदावार में किसी किस्म की कमी आई है और न ही किसी किस्म के कीड़-मकोड़े का प्रकोप देखा गया है। इस मॉडल के तहत खरीफ में 14 लाख एकड़ और रबी में 20 लाख एकड़ भूमि पर खेती की गई। यह आंकड़ा बताता है कि इसका विस्तार हो रहा है। यहां के किसानों द्वारा स्वास्थय पर किये जाने वले खर्चे में भी 40 फीसद की कमी आई है। यहां के किसी भी गांव में आत्महत्या की कोई खबर नहीं आई है। कुल मिलाकर किसान पर्यावचरण और हेल्थ तीनों के लिहाज से यह कृषि अनुकूल है लेकिन सरकार इस मॉडल की बात नहीं करती, क्योंकि इससे उसकी जीडीपी नहीं बढ़ती। दिलचस्प चीज यह है कि इस मॉडल को लाने में वर्ल्ड बेंक का भी योगदान रहा है, किंतु ऐसा लगता है कि यह गलती से हो गया है, कारण अब वर्ल्ड बैंक भी इसकी बात नहीं करती।
(प्रवीण कुमार से बातचीत पर आधारित, राष्ट्रीय सहारा से साभार.)

14 जनवरी 2010

फेल हो चुका है बाजारीकरण का मॉडल

प्रोफेसर अरुण कुमार
 
वैश्वीकरण की शुरूआत हमारे देश में नब्बे के दशक से नहीं हुई है। यह प्रक्रिया हजारों साल से चल रही है, लेकिन शुरूआती दौर में वैश्वीकरण दोतरफा था। यानी हम दुनिया से लेते भी थे और दुनिया को देते भी थे। 1750 के बाद से यह एकतरफा होता रहा है। हम दूसरे देशों से ज्ञान और विचार तो प्राप्त करते हैं पर वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया में हमारा योगदान नगण्य है। ज्ञान, आविष्कार और तकनीक में हम बुरी तरह से पिछड़ गये हैं। पाश्चात्य देशों की नकल करना ही हमारे यहां विकास का पर्याय बन गया है। जब 1947 में हमें आजादी मिली थी, तो उस वक्त भी समाज के समृद्ध तबके का नजरिया था कि पश्चिम के आधुनिकीकरण की गाड़ी बहुत तेजी से जा रही है, किसी भी तरह हम उसे पकड़ लें। इसके विपरीत, गांधी जी का सपना था कि हम अपना अलग रास्ता चुनें। पंडित नेहरू का रास्ता था- पश्चिम के आधुनिकीकरण की हम अंधाधुध नकल करें और विकास को ऊपर से नीचे की आ॓र पहुंचाएं। यानी बड़े-बड़े बांध, बड़े-बड़े संस्थान। इस एकतरफा विदेशीकरण में उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता चुना जिसके दोनों तत्व विदेशी थे।
पूंजीवादी मॉडल और समाजवादी मॉडल- दोनों ही पश्चिम से आये हैं। गांधी जी ने कहा था कि आत्मनिर्भर होते हुए हमें अपना विकास करना है, उसकी रफ्तार भले ही कम हो, पर करना हमें अपने तरीके से है। मगर देश को चलाने वालों ने अलग रास्ता चुना। उसी के कारण आज वित्तीय संकट से लेकर तमाम दूसरे संकट हमारे देश में हैं। ’60 के दशक में नक्सलवाद की समस्या आयी, तो ’70 के दशक में दूसरे तरह के असंतोष बढ़े। ’90 के दशक तक वह मॉडल पूरी तरह फेल हो गया। चीन जहां अपने आपको पूरी तरह 180 डिग्री मोड़कर बाजारवाद की गोद में जा बैठा, वहीं सोवियत संघ बिखर गया। इस घटनाक्रम के बाद हमने मिली-जुली अर्थव्यवस्था का मॉडल छोड़ दिया और पश्चिम के बाजारीकरण के मार्ग को पूरी तरह से अपना लिया।
अगर हम दो-चार हजार साल पीछे मुड़कर देखें तो बाजार उस वक्त भी था, लेकिन बाजारीकरण एक नयी चीज है। इसे पिछले 50 साल में हमने तेजी से पकड़ा और सन ’91 के बाद तो हम पूरी तरह इसकी जकड़ में आ गये। आज हमारे सारे सामाजिक ढांचों में भी बाजारीकरण की सोच घुस आयी है। जिस प्रकार पश्चिम में हर चीज को दौलत से तौल कर देखा जाता है कि वह फायदेमंद है या नुकसानदायक है, उसी तरह से हमने अपने हर सामाजिक और सामुदायिक संस्थान को बाजार के हिसाब से बदलना शुरू कर दिया। उदाहरणत: शिक्षा और चिकित्सा को हम आदरणीय व्यवसाय मानते थे, जिसका मूल्य नहीं आंका जा सकता। इसलिए हमारे समाज में शिक्षक और चिकित्सक का दर्जा काफी ऊपर था। बाजारीकरण के बाद लोगों की सोच बदल गयी है। चाहे छात्र हो या मरीज वे देखते हैं कि हम इतना खर्च कर रहे हैं तो हमें क्या मिल रहा है। शिक्षक सोचता है कि हमें तनख्वाह कम मिल रही है तो हम क्लास में क्यों पढ़ाएं, अपना ट्यूशन क्यों न पढ़ाएं। यानी हर किसी के दिमाग में बाजार घुस चुका है। आज हमने अपने समाज को बहुत बड़े पैमाने पर बदल दिया है। इसके कारण रंगीन टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर, नयी कारें आ गयीं, लेकिन क्या इसी को हम विकास मानेंगे? समाज के एक छोटे से हिस्से में समृद्धि तो आ गयी, लेकिन दूसरी चीजों में हम परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं। पिछले बीस बरसों में यह असमानता जितनी बढ़ी है, उतनी पहले कभी नहीं थी और खासकर सन 2000 के बाद जब से विश्व बैंक का यह मॉडल लागू हुआ कि विकास किसी भी कीमत पर होना चाहिए, तो हमने विकास दर को तो बढ़ा दिया लेकिन देशवासियों में असमानता उतनी ही तेजी से बढ़ गयी। कॉरपोरेट सेक्टर का योगदान तो जीडीपी में बेतहाशा बढ़ गया, मगर कामगार वर्ग का योगदान दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। इसी वजह से हालिया वित्तीय संकट भी आया है।
पर्यावरण की जो कीमत हम चुका रहे हैं, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। शहर बेहद बुरी तरह प्रदूषित हो गये हैं। बच्चों तक को दमा होने लगा है और ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। हम संसाधनों का जिस तरह निजीकरण कर रहे हैं और निजी हाथों द्वारा जिस प्रकार अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है उसके खतरनाक दुष्परिणाम से हम नजर चुरा रहे हैं। आज भी भारत बहुत गरीब देश है, क्योंकि हमारी प्रति व्यक्ति आय पश्चिम का 50वां हिस्सा है। यदि इतने कम उत्पादन स्तर पर ही हमारी नदियां इतनी प्रदूषित हो गयीं, हमारा वायुमंडल इतना प्रदूषित हो गया, तो हमें इस विकास को इस तरह परिभाषित करना ही पड़ेगा कि कार, मोबाइल, टीवी और शापिंग मॉल के होने से विकास हो गया?
जो नयी आर्थिक नीतियां हैं, उसके कारण जहां एक तरफ पर्यावरण का दम घुट रहा है; वहीं दूसरी तरफ गरीबों की आय पर बहुत बुरा असर हो रहा है। उदाहरणत: आ॓डीशा का नियमगिरि पर्वत जो स्थानीय निवासियों के लिए आजीविका का आधार होने के कारण देवतुल्य है, लेकिन सरकार को वहां का बॉक्साइट चाहिए। इस क्षेत्र की जमीन को सरकार खनन के लिए औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को बेचती है जिसको स्थानीय लोगों के हितों से कोई लेना-देना नहीं और वह अंधाधुंध उत्खनन कर पहाड़ को ही खत्म करने पर तुला हुआ है। इससे यह स्वत:सिद्ध है कि मनुष्य की आस्था से इस बाजारवाद में कोई लेना-देना नहीं है।
इस दौर में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक- सभी तरह के सरोकार गौण हैं। विकास भी चंद समृद्ध तबके तक ही सीमित रह जाता है। बाजारीकरण से समाज की आम धारणा खत्म हो गयी है, क्योंकि बाजार का मतलब है- चीजों का लेन-देन। चाहे वह सिगरेट हो या शराब हो या नशीले पदार्थ। बाजारीकरण के इस दौर में वैध-अवैध तरीकों से सभी हाजिर है। बाजार यह नहीं देखता कि ड्रग खरीदनेवाला छोटा बच्चा है, या बड़ा। उसके लिए पैसा ही महत्वपूर्ण है। यह बाजार एक तरफ जहां हाथ में सिगरेट थमाता है, तो सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है, वहीं बीमार पड़ने पर इलाज करवाने से भी सकल ‘डॉलर वोट’ चलता है। ‘एक मनुष्य-एक वोट’ की नीति बाजार में नहीं चलती। जिसके पास जितना पैसा उसका उतना वोट, बाजार आखिरकार इसी सिद्धांत पर चलता है।’ संसद में सरकार कहती है कि हमने विश्व व्यापार संगठन से करार किया है इसलिए इस पर संसद में बहस नहीं हो सकती। इसमें बदलाव तभी संभव है, जब समाज की धारणा बदलेगी और समाज की धारणा बदलने में बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत बड़ा योगदान होता है। लेकिन हमारे समाज का बुद्धिजीवी तबका अपना ज्ञान और दर्शन- दोनों पश्चिम से ही प्राप्त करता है। तो जब वहां बदलाव आएगा, तभी यहां भी बदलाव आ पाएगा क्योंकि हम अपनी धारणाओं को बहुत पहले ही पीछे छोड़ चुके हैं।
(शशि भूषण से बातचीत पर आधारित, राष्ट्रीय सहारा से साभार)

09 अक्टूबर 2007

खम्माम से रिर्पोट:-



आंध्र प्रदेश के मोदी गोंडा जिले में जुलाई में हुई पुलिस फायरिंग में कई लोगों की जानें गयी। दख़ल पत्रिका मंच के सदस्य के द्वारा की गयी फैक्ट फाइडिंग पर आधारित रिर्पोट-

यह वक्त घबराये हुए लोगों के
शर्म आंकने का नही
और न यह पूंछने का-
कि सन्त और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!


अखबार के पन्ने पर जो खबर 29 जुलाई को छायी हुई थी, उससे बेपरवाह, होटल के नौकर ने टेबल पर गिरी चाय को पोंछकर डस्टविन में फेंक दिया। चौराहे के कचड़े से गाय ने उठाकर अपने जबड़ों में उसे निगल लिया। मूंगफली बेंचने वाले के ठोंगों से होती हुई वह खबर किसी दरवाजे के पास पड़ी थी, जिस पर कुत्ते ने मूत दिया। ट्रेन के डब्बे में वह पढ़नें के बाद बिस्तर बनी, झाडू लगाने वाले ने उसे बुहारकर तेज रतार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों पर गिराया और वह हवा में धूल के साथ देर तक उड़ती रही।
खबर थी मोदी गोंडा में पुलिस की गोलियों से भूने गये उन लोगों की जो शान्तिपूर्वक धरने पर बैठे हुए थे। मसला था 170 एकड़ जमीन का जो सरकारी कब्जे में थी।
दस हजार की आबादी वाले इस मण्डल में कुल 24 गाँव है, यहाँ के लोग मुख्यता कृषि पर निर्भर है। दरअसल बात यहाँ से शुरू की जाय जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राज्य से शांति वार्ता के दौरान इस जमीन को भूमिहीनों में बांटने की मांग की। उनकी यह मांग पूरी न हो सकी। अलबत्ता अन्य पार्टीयों व उनके कार्यकत्ताZओं की नजर इसपर जरूर गड़ गयी। कुछ माह बाद जमीन का 35 एकड़ कांग्रेस समर्थकों व कार्यकर्ताओं द्वारा जोत लिया गया जिस पर कोई आवाज इसलिए नहीं उठी क्योकि सरकार कांग्रेस की थी। तत्पश्चात मोदी गोंड़ा के प्रधान जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के सदस्य है, के कुछ कार्यकर्ताओं व समर्थकों ने भी 16 जुलाई को कुछ जमीन जोतनी शुरू की, मनाही होने पर वे 21 जुलाई को धरनें पर बैठे, धरने को बेअसर देखते हुए 24 जुलाई से उन्होने भूख हड़ताल शुरू की। 27 को हुए लाठी चार्ज के विरोध में 28 जुलाई को बंद का आवाहन किया, बन्द को असरदार बनाने के लिये सड़क पर वाहनों को न चलने देने का फैसला लिया गया। 28 को दोपहर बारह बजे के आसपास पुलिस की एक टुकड़ी ने आकर 1घटें के अंदर प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। धरने पर बैठे लोग अपनी मांगों को लेकर अडिग रहे, फिर पुलिस के द्वारा लाठी चार्ज शुरू किया गया जबाब में लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू किया तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिससे सात लोग मारे गये कई लोग घायल हो हुए। 20 लोगों की सूची घायलों में उपलब्ध हो पायी।
लोगों के द्वारा पुलिस के खिलाफ थाने में एफ0 आई0 आर0 जैसी हास्यास्पद बात की कार्यवाही की गयी पर एफ0 आई0 आर0 नामंजूर कर दिया गया। उल्टा पुलिस ने ही लोगों के खिलाफ एफ0 आई0 आर0 दर्ज किया। कुछ समय बाद ए0 पी0 सी0 एल0 सी0 (आध्रप्रदेश सिविल लिबर्टी कमेटी) ने किसी तरह से एक एफ0 आई0 आर0 दर्ज करवाया। जिस पर सिवाय एक-दो तबादलों के कोई कार्यवाही नहीं हुई।
यह एक संक्षिप्त घटनाक्रम था जिसकी तसीस के लिये हम हैदराबाद से सुबह पा¡च बजे निकले। हम कुल सात लोग थे, 220 कि0मी0 की यात्रा तय कर हमें खम्माम पहुंचना था। जहाँ से 15 कि0मी0 दूरी पर बसा था मोदी गोंडा मण्डल, संड़क के चारो तरफ टीलानुमा पहािड़या थी। सड़क के किनारे खेतों में कपास की फसलें लगी हुई थी। हमारी गाड़ी में कोई तेलगू धुन बज रही थी, जिसमें बीच-2 में अग्रेजी के शब्दों की भी दखलंदाजी थी। झोपड़पट्टी, भूख, गरीबी, असमानता को देखकर भारत की अखण्डता में एकता का एहसास हो रहा था जो कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक सर्व व्याप्त है। तस्वीरों को अपनी आंखों में सजोते हुए तीन घंटे का रास्ता तय करके हम खम्माम के लेनिन नगर कस्बे में पहुंचे, जहाँ से हमारे साथ कुछ िशक्षक, वकील मोदी गोंडा के लिये रवाना हुए। इनको साथ में लेने के पीछे कारण यह था कि हम गाँव वालों की तेलगू समझ सकें।
अब हम उस चौराहे पर थे जहाँ लोगों को कुछ दिन पूर्व गोलीयों से भूना गया था। चौराहे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के झंडे लगे हुए थे, जिसके नीचे सार्ट-कट में cpm.znb. (कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद) लिखा हुआ था, किनारे पर अम्बेडकर की मुर्ति लगी थी जो एक हाथ उठा कर आसमान की तरफ इशारा कर रही थी। जिसे हम नहीं समझ सके। चारो तरफ से लोगों ने हमें घेर लिया। लोग हमें घटनाओं का ब्योरा दे रहे थे।
शर्मीला जी, जिसकी म्युजिक सेंटर की दुकान है जिसके बगल में ही लोग धरनें पर बैठे हुए थे। वे हमें अपने दुकान के नजदीक ले गयी, उन्होने अपनी दुकान की शटर बंद करके गोलियों के छर्रों से सटर में हुए छेद के निशान दिखाये। गोलियों से टूटे पी0 सी0 ओ0 के शीशे दिखायैं हमने आसपास की सभी दुकानों के कांउटर, बाक्स, व अन्य समानों में गोलियों के निशान देखे जगह-2 दीवालों के पलस्तर टूट गये थे।
चौराहे पर, घटना के दौरान मारे गये लोगो की याद में एक 38 फुट ऊचा स्मारक बनाया गया था। जिसकी बीस फुट-लम्बे व बीस फुट चौड़े आधार पर गुम्मदनुमा बनाया गया था। इसमें घटना में मारे गये उन सात लोगों की तस्वीरें मढ़ी गयी थी और नीचे उनके नाम लिखे हुए थे, गाँव के एक व्यक्ति ने तेलगू में लिखे उन नामों को पढ़ कर सुनाया जो इस प्रकार थे (उसकेला गोपया, वनका गोपीया, चिट्दूरीबाबू राव, छगम बाला स्वामी, एलागन तुला वीरन्ना, कट्टूला पेदूदा लक्ष्मी, पुस्थलति कुटुम्बराव) इन सात लोगों में छ: लोग घटना स्थल पर ही मारे गये जबकि छगम बाला स्वामी ने 31 जुलाई को अस्पताल में दर्द से कराहते हुए दम तोड़ा।
स्मारक के बगल में उन सोलह लोगों के भी नाम थे जो इस घटना में घायल हुए थे। लोगों ने हमें बताया की 300 से 400 गोलियां पुलिस के द्वारा चलाई गयी। हम स्मारक में जड़े गये उन सात मृतकों के चित्र देख रहे थे।
रमेश जिसकी उम्र तकरीबन 15 साल होगी, ने हमें बताया कि उसकी मां बट्टू राम बाई के पैर में गोली लगी है जिससे उनके पैर में स्टील का छड़ डाला गया है वे अब चल नहीं सकती। चौरहे पर वे ठेला लगाकर केले बेचती थी। पिता उपेन्द्र जो कि दूध बेंचते है अब घर का काम देखते है। रमेश ने हमसे पूछा कि क्या मैं उसे कोई नौकरी दिला सकता हू! जिसका मेरे पास कोई जबाव न था।
चौराहे से 100 मी0 की दूरी पर कोटेश्वर राव का घर था, जिसके हाथ में गोली लगी थी और स्टील के छड़ से उसे बांधा गया था। कोटेश्वर ने हमें बताया कि पहली गोली उसके सर्ट की जेब पर लगी, जेब में डायरी रखी हुई थी जिससे वे बच गये। उन्होंने वह डायरी दिखाई, जो फट गयी थी। कोटेश्वर कह रहे थे कि डायरी न होती तो उस स्मारक में उनका भी फोटो लगा होता।
हम घटना में मृत वीरन्ना की पत्नी ऊषा से मिले, ऊषा 28 बर्ष की एक दुबली-पतली महिला है, जिनके आंखो के ऑसू सूख चुके थे पर तबाही के मंजर व पति के मृत होने का दर्द अभी-भी किसी कोनें में छुपा था। ऊषा अपने 3 व 4 बर्ष के बच्चों के साथ इस वक्त अपनें बहन के घर में रहती थी। ऊषा ने हमें बताया कि वीरन्ना धरनें में शामिल नही थे हादसे के वक्त वे देखने के लिये घर से गये थे और नाहक ही मारे गये।
चौरहे के बगल में भा0 क0 पा0 (संसदवादी) के आफिस में हम गये। हशिये-हथौड़े का एक बड़ा चिन्ह दीवाल पर लाल रंग से पेंट किया हुआ था। चिन्ह देखकर नंदी ग्राम की याद आ गयी जहाँ हशिया किसानों का गला काटने व हथौड़ा मजदूरों का सिर काटने पर उतारू था। आफिस में हमें घटना के समय कैमरें में कैद की गयी कुछ तस्वीरें दिखायी गयी लोगों की अफरा-तफरी, रोते-कराहते चेहरों के साथ फोटो मौन थे। कोई चीख नहीं थी, कोई आवाज नही थी। कैमरे में कैंद किये गये चित्रों को तारतम्यता से घटनानुसार रखा गया था- खेत जोतते किसानों के चित्र, धरने पर बैठे लोग, भूख हड़ताल पर बैठे लोग, बंदी के दिन शांति पूर्वक बैठे लोग, पुलिस के साथ बातचीत करते लोग, पुलिस की गोलियों से भूनें जाते लोग, एस0 एल0 आर0 और ए0 के0 47 लिये सिविल डेªस में पुलिस, इसके बाद सड़क पर बिखरी लाशें थी। एक फोटो ऐसा था जिसमें छ: लाशों को एक साथ रखा गया था, उन्हे भा0 क0 पा0 (संसदवादी) के झंडे से लपेटा गया था। उसे देखकर यह लगा कि इन पार्टीयों के लिये लाश भी वोट मांगेगी। कल उनके बड़े-2 बैनर बनेंगे, सड़क, चौराहे, मुहल्लें, गलियों में वे चिपकाये जायेंगे। गोपीया, बाबू राव, लक्ष्मी, वीरन्ना सब इनके लिए वोट मांगने का काम करेंगे। मृतकों को पाँच लाख रू0 व घायलों को पचास हजार रू0 की रािश सरकार के द्वारा विभिन्न तरीकों से बांटी गयी लेकिन लोगों के यह सवाल भी थे कि क्या जिंदगी की कीमत पैसे से तौली जा सकती है? क्या गोपीया, वीरन्ना को 6 लाख रू0 में लौटाया जा सकता है? क्या कागज के टुकड़ों से ऊषा के आंसू व दर्द पोछें जा सकते है? क्या दमन व हत्या पुलिस की आदत बन चुकी है? धमाके की अवाज वहाँ नही थी। बीते हुए कल के साथ लोगों ने घटना को अपने घरों में, बच्चों ने अपनी चीखों में, सड़क ने अपनी धूल के नीचे दबा दिया था। तबाही के बाद सब कुछ शांत था। स्मारक पर एक दिया जलते-2 बुछ चुका था जिसकी राख इधर-उधर बिखरी हुई थी।

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एक आदिवासी गांव की यात्रा-








पिछले माह महत्मागांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्व विद्यालय के जनसंचार विभाग के छात्रों द्वारा विदर्भ के कई गांवों का सर्वे किया गया। गांव की स्थिती व आंतरिक, सामाजिक संरचना पर आधारित आदिवासी गांव बानरचूहा से यह रिर्पोट-
सरकार के शब्दकोश में/हम हैं कमजोर वर्ग के आदमी/जैसा कि आकाशवाणी, दूरदर्शन और/ अखबारों में आते हैं/सरकार के बयान/दतर में अपने सहकर्मियों के बीच/हम चपरासी, क्लर्क या अधिकारी/नहीं हैं/हम हैं मंदबुद्धि पियक्कड़/या फिर रिजर्व कोटे के आदमी/स्कूल कॉलेज में पढ़ते/छोटे भाई हमारे/पुलिस की निगाहों में छात्र नहीं/लूटेरे हैं, डकैत हैं/या फिर उग्रवादी/संविधान की भाषा में हम/अनुसूचित जाति या/अनुसूचित जनजाति हैं/मनु की भाषा में शूद्र/ कम्युनिस्टों की भाषा में शोषित/भाजपाईयों की भाषा में/पिछड़े हिन्दू/मैं पूछता हू तुम सबसे/आखिर इस देश में इस प्रजातंत्र में/हम क्या हैं हम क्या हैं।


एक आदिवासी कवि महादेव टोप्पो के कलम से लिखी गयी ये पंक्तियाँ महोगांव ग्रामपंचायत के एक आदिवासी गांव बानरचूहा जाते वक्त वगैर तारतम्यता के मुझे याद आ रही थी। टुटी सड़कों व झाड़ियों के बीच धूल उड़ाते हुए हम गांव के उस मोड़ पर खड़े थे। यहाँ एक बोर्ड पर किसी पेंटर की कूची के बजाय किसी व्यक्ति की उंगुली से तेल और सिंधूर से लिखा था ``बानरचूहा´´। इस गांव को जिला कार्यालय से सूचना के अनुसार एक विकसित गांव के रूप में रखा गया है।

गांव के पहले कदम पर हनुमान जी का एक मंदिर था बाद में पता चला कि गांववालों ने चन्दा कर इसे बनवाया है। सामने पीपल के छायादार पेड़ की जड़ों को लपेटे हुए एक चबूतरा था जिसपर गांव के ढेर सारे लोग बैठे हुए थे। वहाँ पहुंचकर हमने ग्रामसरपंच के बारे में पता लगाने की कोशिश की पर पता चला कि वे यहाँ से पाँच किलोमीटर दूर रहती हैं। हमनें उनसे मिलनें की कोशिशें छोड़ दी और गांववालों से बातचीत करने में मशगूल हो गये। तकरीबन कुल 50 घरों के इस गांव में 3-4 मकान ही पक्के दिखे। हम गांव के कुछ लोगों के साथ बातचीत करते हुए गांव की सड़कों पर घूम रहे थे। एक घर के सामने हम थोड़ी देर के लिए रूके जहाँ लकड़ियाँ चीर कर दरवाजे और खिड़की बनाये जा रहे थे, बातचीत के दौरान पता चला कि ये लकिड़या काफी मंहगे दाम पर वन विभाग से खरीद कर लायी गयी हैं। उन लोगों का यह भी कहना था कि गांववालों के द्वारा लगाये गये पेड़ या खुद-ब-खुद उगे हुए पेड़ों की देखभाल गांव के लोग करते हैं पर बड़ा होने पर वन विभाग के द्वारा उसे हड़प लिया जाता है। एक महिला मक्का की सफाई कर रही थी, यह गांववालों का प्रमुख आहार है। थोड़ी ही देर में गांव के कई लोग इकठ्ठा हो गए, पूछने पर उनका कहना था कि गांव में औसतन खेती कि जमीन दो-तीन एकड़ प्रति परिवार है पर खेती का कोई भरोसा नहीं है, हर साल बाढ़ आती है और पूरी खेती बर्बाद हो जाती है। जब अपने खेत में काम करने से गांव वालों को फुर्सत मिलती है तो बगल के गांव में बड़े कास्तकारों के यहाँ वे मजदूरी के लिए जाते हैं। गांव में खेती के लिए पानी की कोई सुविधा नहीं है, यह पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। गांव में पंचायत द्वारा 5-6 नलों की टोटी लगाई गयी है और एक सामूहिक मोटर से पानी चलाया जाता है। समय-समय पर गांव का एक आदमी पानी चलाता है जिससे पीने के पानी की पूर्ति हो पाती है। गांव में सीमेंट से बनी पक्की सड़क है जो काफी साफ-सुथरी दिख रही थी। पूरा गांव पेड़ों की आड़ में ढका हुआ है, गांव में सरीफे के कई पेड़ है जिसे गांव के लोग सीताफल कहते थे। सन् 1989 के पहले ही गांव में बिजली आ चुकी है, अभी कई लोगों के पास तो टी.वी. भी है पर गांव के लोग सिर्फ सीरियल या फिल्म देखना ही पसंद करते हैं। गांव के नजदीक में एक प्रायमरी स्कूल भी है जिसमें गांव के बच्चें पढ़ने जाते हैं, इससे ऊपर की पढ़ाई करने के लिए उन्हें तीन किलो मीटर दूर जाना पड़ता है। गांव में एक मात्र व्यक्ति नौकरी करता है, जो की सरपंच का चपरासी है। गांव में सबसे ज्यादा शिक्षा पाने वाले एक मात्र व्यक्ति राजू हैं जिन्होंने 12वीं तक शिक्षा पायी है। राजू एक अच्छे कलाकार भी हैं। हम देर तक उनसे बातें करते रहे, उनका कहना था कि जब खाने के लिए घर में कुछ नहीं है तो पढ़ने से क्या फायदा? पढ़ कर ही सबको नौकरी कहाँ मिल जा रही है? बड़ी-बड़ी कक्षाओं तक पढ़कर शहरों में भी लोग बेकार पड़े हुए हैं।
गांव की एक 70 वर्षीय महिला जिसके आधे शरीर में लकवा लग गया था बार-बार बड़ी निरीहता के साथ कह रही थी- बाबू़.......उसकी आंखे बहुत कुछ कह रही थी। पूरे गांव के लोगों में हमसे कुछ पाने की ललक दिख रही थी। गांव के किसी भी वृद्ध को बी.पी.एल. कार्ड नहीं मिला था। फिर इस महिला का क्या? वहाँ से जब हम चल रहे थे तो वह महिला हमारे हाथ पकड़ कर देर तक हमें निहारती रही, पर हम बेबस थे। सिवाय उनकी स्थितियों को जानने के हमारे पास उसे बदलने के लिए कुछ भी न था। गांव के ढेर सारे लोग हमारे साथ हो लिए थे फिर हम सब उस स्थान पर आये जहाँ गणपति की मूर्ति सजायी गयी थी। वहाँ कुछ लड़के बैठ कर ताश के पत्ते खेल रहे थे, मुझे पिछले गांव मंगरूल की याद आयी जहाँ लोग नशे में धुत हो कर कई टोलियों में दिन भर पत्ते खेला करते हैं, पर यहाँ वैसा नहीं था। यह जानकर हमें आश्चर्य भी हुआ कि गांव में किसी भी प्रकार का नशा नहीं मिलता। उन लोगों का कहना था कि जब खाने के लिए ही पैसा नहीं है तो लोग नशे के बारे में कैसे सोचेंगे। बातचीत के दौरान पता चला कि गणपति की जो मूर्ति बनायी गयी है वह गांव के ही एक युवक ने बनाया है। बहरहाल हम मूर्ति देखकर ही समझ गये थे कि यह किसी कारीगर के द्वारा बनी मूर्ति नहीं है क्योंकि मूर्ति के चेहरे में शहरीपन का भाव नहीं था।
धीरे-धीरे गांव के तकरीबन सभी पुरूष और दो-चार महिलायें वहाँ पर जमा हो गयी। उन लोगों का कहना था कि गांव में किसी भी योजना का पता नहीं चल पाता सब लोग वोट मांगने के लिए यहाँ आते हैं वर्ना सरपंच भी नहीं दिखाई पड़ती। रोजगार गारंटी योजना पर बात करते हुए पता चला कि 50 से अधिक लोगों ने फार्म भरा है पर अभी तक किसी को न तो रोजगार मिला न ही बेरोजगारी भत्ता। कुछ लोगों ने हमें फार्म भरने का रीसीविंग भी दिखाया। उनका यह भी कहना था कि काम अगर आयेगा भी तो सरपंच अपने गांव के लोगों को देगें। हमने उनको रोजगार गारंटी योजना, वृद्धा पेंशन आदि के बारे में विस्तार से बताया जिन बातों की उन्हें बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। हमने उन्हें सरपंच से मिलकर इसका लाभ लेने के लिए भी बताया। वे सब सहमत थे।
गांव के कुछ युवाओं ने मिट्टी की कुछ अद्भुत कलाकृतियां बनायी हुई थी जिसने हमें काफी आकर्षित किया। उन मूर्तियों में विशेष तौर पर एक राक्षस की मूर्ति बनायी गयी थी जिसके पेट को डब्बे से बनाया गया था वे उसमें आग सुलगा कर रख देते थे जिसका धुआँ राक्षस के मुंह से निकलता था। लौटते वक्त उन लोगों ने हमें चीनी चूड़े का प्रसाद भी दिया। खाते-खाते मैने सोचा कि क्या गणपति इनकी स्थितियां बदल सकता है? हम गांव से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे थे और मुंह से प्रसाद की मिठास भी।