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05 मई 2015

सोन का पानी लाल है...भाग-3

अकलू चेरो की गवाही
(आंबेडकर जयन्‍ती पर कनहर में हुए गोलीकांड का अविकल विवरण)


अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

''... उस दिन हम लोग तीन साढ़े तीन सौ रहा होगा... महिला और पुरुष। पहले धरना में जुट के न हम लोग यहां आए थे। उसके बाद जब वहां आए तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया। अब नाम नहीं बता पाएंगे... सब लगे हैं जासूसी में... उनको कमीशन मिल रहा है न भाई। तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया उनको। अब गाड़ी आ के खड़ा हो गयी तुरंत पुलिस की... जहां बाउंड्री किया है। हम कहे देखो अब नहीं सपोर्ट कर पाओगे... गाड़ी आ गयी। पहिला गाड़ी आया, दूसरा आया, फिर तीसरा आया। तीन गाड़ी आया। इतना कहते हुए सारे लोग चले गए धरनास्‍थल से। जब आए हैं तो हम जो हैं मोर्चा पर रहे। हम सोचा कि मोर्चा पर नहीं रहेंगे तो कोई संभाल नहीं पाएगा। मोर्चा पर रहने के वजह से यह घटना मेरे साथ घटी। वहां से जब चले हैं, यहां आते तक पुलिस वगैरह भी, पीएसी के लोग भी भाई, कोई अभी लाइट्रिन-बाथरूम नहीं नाश्‍ता पानी नहीं... छह बजे क बाते रहा। तब तक से वहां रोकना शुरू... हम कहे कोई मत मानना, एकदम चलते रहना, हम हैं न! भाई बात होगा तो बात हम करेंगे... आप लोग सुनना, पास करना- हां, ठीक कह रहे हैं... ऐसे करना। तब से वहां से रोकने का समय ही नहीं मिला उन लोगों को। तब फिर पूछते हुए गाड़ी से उतर गए। फिर कुछ लोग गाड़ी स्‍टार्ट किए, बीच में आ गए। हम कहे अगर बीच में गाड़ी अगर हॉर्न मारेगा तो तुम लोग चक्‍का जाम करे रहना, रुकना नहीं, जाने नहीं देना। ऐसा ही किया लोग। आगे-आगे हम और महिला-पुरुष चलते रहे।

अब जो है डीएम साहब उधर से चले। हमको मौका नहीं दिए। उतर के चले हैं डंडा पटकते से चले हैं। इसके बाद गाली-गलौज देने लगे, एकाध महिलाओं पर डंडा चला दिए। डीएम रहे, कोतवाल रहे, इंस्‍पेक्‍टर साहब रहे... मोर्चे पर। मौके से रहे डीएम साहब, दरोगा रहे कपिल यादव, कोतवाल रहे। इसके बाद में जो है... जब उन लोग गोली चलाया हमारे ऊपर... अचानक से... ऊ लोग जान रहे थे कि रस्‍ता हम लोग देबे नहीं करेंगे। माइक'वाइक का कहां समय था उन लोग के पास... वो लोग बोले, जाना नहीं है, चलो... लाउडस्‍पीकर पर कोई चेतावनी नहीं दिए। ओरिजिनल गोली मार दिया... ऐसा हमको मालूम होता न कि गोली मारेंगे तो ऐसा घटना होबे नहीं करता... हमको मारकर के अपने हाथे में गोली मार लिए हैं और कह दिए कि ये मारे हैं... बताइए... ई कपिलदेव। इन लोग का जो पीएसी गाड़ी है... जो बस वाली, बीचे में रोक दिया। ऊ लोग सोचे कि बीच में बसवे लगा दो त कइसे जनता क्रास करेगा। त जनता जब पहिले से सतर्क है न... कुछ उधर से पत्‍थरबाजी पीएसी की ओर से तो कुछ इधरो से चलने लगा। गडि़यो पर मार दिया, सिसवा सब फूट फाट गया। उन लोग कहे कि ये प्राइवेट बस पर क्‍यों मार दिया। हम कहे आपे लोग क गडि़या है... अंदाजा है... बात कर रहे हैं। उस समय लगभग पचास-पचपन के आसपास पुलिस रहे होंगे। कोई आदेश नहीं था ऊपर से... कुच्‍छ नहीं, सब अपना मनमानी किया।

वो तो हमको निगाह चढ़ाया था 23 मार्च को भगत सिंह के दिवस पर... हम लोग हर साल मनाते हैं। उसी दिन हमको निगाह चढ़ाया था। हम भी समझ गए थे। त हम लोग कहे कि हम लोग का जलूस उठेगा... पूरा मार्केट बाजार होते हुए जलूस उठेगा और धरने स्‍थल पर भगत सिंह क चित्र टांग टूंग के हम लोग अगरबत्‍ती जलाएंगे, फिर जनता घर जाएगी। 

करीब 250 जनता त एकदम चलते रहा... 100 जनता करीब पीछे रहा, त फुटने लगा। देखा पीछे जब त एतना जलता फुटने लगा। गोली लगने के बावजूद हम कहा कि ठीक कर रहा है तुम लोग न, भाग जाओ। फिर कोई कहा कि भगो मत, जो हुआ होना था, हो गया। फिर सब वापस आ गया। वो जो अपने को गोली लगाए हैं न... तो हम लोग त पीछे हैं, वो लोग क रस्‍ता अइसे है। हम लोग के आने से पहले ऊ लोग यहां आकर के हास्पिटल में दुद्धी दवा-इलाज कराना शुरू कर दिए। ये त हम लोग फोन किए, तब मीडिया वाला अखबार लत्‍ता पहुंचे। दो साथी हमको ले जाने को तैयार हो गए- एक लक्ष्‍मण और अशर्फी।*** ऊ लोग चल दिए। गाड़ी आया। उसमें हमको बैठाए हैं। उसके बाद दुद्धी आए। उसके बाद महेशानंद क लड़का गौरव... उनको पता चल गया। ऊ दौड़कर आए हैं। फिर तुरंत कराए... फिर लिखने-पढ़ने का काम, दवा करने का काम कराए। कहा कि पानी बोतल सब कर देते हैं लेकिन इनको हम यहां इनको भर्ती नहीं कर पाएंगे क्‍योंकि गोली लगा है... सरकारी अस्‍पताल में। त वहां से रेफर होके आ गए रॉबर्ट्सगंज। तो अशर्फी और लक्ष्‍मण जो बोले हैं, ऊ लोग भी साथ आए। मीडिया वाला को पता चल गया होगा, तो वहां ऊ लोग भी आए। बातचीत किए। फिर इहों से रेफर हुआ... बोला यहां भी नहीं होगा। लास्‍ट में यहां बीएचयू पहुंचे हैं बनारस में।

जब यहां बस खड़ा हुई है तो ये हुआ कि हम लोग चलेंगे घर इनको भर्ती करा के... त कौन कौन रहेगा- अशर्फी और लक्ष्‍मण। अब देखिए इनकी धोखा। हमारा आदमी जो रेगुलर रहने वाला, उनको चाय के नाम पर लेकर ऊ चले गए। ऊ लोग दूनो लापता हैं। हमको भी नहीं पता कहां हैं। वहां से आदेश है इन लोग को दिक्‍कत नहीं होना चाहिए। बताइए, जो हमारा दवाई, इलाज, पानी करता, उसको उठा ले गया। दूनों गायब हैं। कोई हमको कहा कि होटल में हैं। गांव नहीं पहुंचे। उसी दिन से गायब हैं... मंगलवार को।

इंस्‍पेक्‍टर साहब आएंगे अभी। कल से यहां पुलिस भी दो आ रहे हैं। इंस्‍पेक्‍टर साहब आए थे, पूछे कि दवा ठीक हो रहा है। वो अनाप-शनाप नहीं बोलते। कोई धमकी नहीं दिए हैं। सुन्‍दरी के हाल बहुत गंभीर है अभी... हमको बहुत अखर रहा है। अभी हम होते वहां तो... उस दिन 20 या 15 लोग घायल हुए थे। तुरंते दुद्धिए में उन लोग का दवाई हुआ। महिला लोग थे। डॉक्‍टर साहब हमसे पूछे कि ठीक हैं तो हम बोले कि थोड़ा प्रॉब्‍लम है। वो बोले कि जब कहोगे तब छोड़ देंगे।

कल से जैसे पुलिस आ रहा है, तो हमारे दिमाग में आ रहा है कि शायद पुलिस सोचता होगा कि हमको जइसे छोड़ेंगे तो वो पकड़ लेंगे। ऐसा हमको लग रहा है। हमको डरने की बात नहीं है।'' 

(19 अप्रैल, सुबह साढ़े आठ बजे)



***(सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव ने 20 अप्रैल को बताया कि लक्ष्‍मण और अशर्फी को गिरफ्तार कर के मिर्जापुर की जेल में रखा गया है और उनके ऊपर सरकारी काम में बाधा डालने, बलवा करने और पुलिस पर हमला करने के आरोप हैं। उन्‍हें कहां से और कब उठाया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गयी।) 




सोन का पानी लाल है...भाग-2

अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

कनहर बांध के मामले में कुछ तो है जो छुपाया जा रहा है। कुछ है जो उजागर तो हो गया है लेकिन शीशे की तरह साफ़ नहीं है। एक सच उनका है जिनके घर डूब जाएंगे। इन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस पर सवाल है। यह सवाल हमेशा से रहा है। भाखड़ा-नंगल से लेकर रिहंद तक एक से ज्‍यादा बार विस्‍थापित होने वाले परिवारों को साठ साल में कायदे से उचित मुआवज़ा नहीं मिला। नर्मदा की लड़ाई तीस साल से हमारे सामने है। बहरहाल, दूसरा सच उनका है जिनके घर नहीं डूबेंगे। जिनके घर डूब रहे हैं, वह आदिवासी ग्रामीण है। जिनके नहीं डूब रहे, वह मोटे तौर पर गैर-आदिवासी और शहरी है। चूंकि इस तबके को बांध बनने से कोई नुकसान नहीं है, लिहाज़ा इस तबके को बांध बनने तक कुछ न कुछ फायदा ज़रूर है। जब 2800 करोड़ का एक बांध बनता है तो उसमें बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है। किसी का डम्‍पर चलता है। कोई ट्रक चलवाता है। कोई रोड़ी देता है। कोई बालू और कंक्रीट देता है। कोई मजदूर सप्‍लाई करता है। किसी का गेस्‍ट हाउस चमक जाता है। एक बांध के इर्द-गिर्द एक समूची परजीवी अर्थव्‍यवस्‍था खड़ी हो सकती है। इसका मतलब कि बांध से नुकसान झेलने वाले और उससे लाभ उठाने वाले वर्ग वास्‍तव में परस्‍पर शत्रुवत स्थिति में होते हैं। इन दोनों से इतर एक तीसरा पक्ष भी है। इसका अपना सच है। यह सच उन लोगों से जुड़ा है जो कनहर बांध के खिलाफ़ आंदोलन का नेतृत्‍व कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनका बांध बनने से कोई निजी नुकसान तो नहीं हो रहा, लेकिन फिर भी वे बांध के खिलाफ और आदिवासी ग्रामीणों के साथ खड़े माने जाते हैं। रोमा इसी पक्ष की नुमाइंदगी करती हैं, लेकिन कनहर बांध के संबंध में उनकी सक्रियता बहुत पुरानी नहीं मानी जाती है।

बताते हैं कि कनहर नदी को बचाने के लिए बांध के विरोध में आंदोलन का आरंभ गांधीवादी कार्यकर्ता महेशानंद ने आज से पंद्रह साल पहले किया था। उनके लोग आज भी गांवों में आदिवासियों के बीच सक्रिय हैं लेकिन महेशानंद समूचे परिदृश्‍य से नदारद हैं। दिलचस्‍प बात यह है कि बांध-विरोधी ग्रामीणों से लेकर बांधप्रेमी प्रशासन तक महेशानंद के बारे में एक ही राय रखते हैं जो अकसर एक ही जैसे वाक्‍य में भी ज़ाहिर होती है, ''वो तो भाग गया।'' 18 अप्रैल की सुबह जब सोते हुए ग्रामीणों पर लाठियां बरसायी गयीं, उसके कुछ देर बाद सुन्‍दरी गांव में आंदोलन का महिला नेतृत्‍व मानी जाने वाली सुकालो ने फोन पर बताया था, ''यहां कोई लीडर मौजूद नहीं था। महेशानंद तो भाग गया है। कहीं छुपा हुआ है।'' भीसुर गांव के नौजवान शिक्षक उमेश प्रसाद कहते हैं, ''सब लीडर फ़रार हैं। गम्‍भीरा, शिवप्रसाद, फणीश्‍वर, चंद्रमणि, विश्‍वनाथ- सब फ़रार हैं। इसीलिए जनता परेशान है। पहले ये लोग महेशानंद के ग्रुप के थे, बाद में इसमें रोमा घुस गयीं।'' य‍ह पूछने पर कि यहां के लोग अपने आंदोलन का नेता किसे मानते हैं, उन्‍होंने कहा, ''यहां के लोग तो गम्‍भीराजी को ही अपना नेता मानते हैं, लेकिन उनको फरार मानकर ही चलिए। जब से आंदोलन बदरंग हुआ, रामप्रताप यादव जैसे कुछ लोग बीच में आकर समझौता कर लिए। महेशानंद भी समझौते में चले गए हैं। रोमाजी तो यहां हइये नहीं हैं, बाकी आंदोलन तो उन्‍हीं का है। उन्‍हीं के लोग यहां लाठी खा रहे हैं।''

आंदोलन के नेतृत्‍व के बारे में सवाल पूछने पर पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं, ''महेशानंद आंदोलन छोड़कर भाग गए हैं। उन्‍होंने मान लिया है कि उनके हाथ में अब कुछ भी नहीं है। उनका कहना है कि बस उनके खिलाफ मुकदमा नहीं होना चाहिए। उनके जाने के बाद रोमाजी ने कब्‍ज़ा कर लिया है।'' आंदोलन पर ''कब्‍ज़े'' वाली बात इसलिए नहीं जमती क्‍योंकि लोग अब भी इसे रोमा का आंदोलन मानते हैं। ऐसा लगता है कि प्रशासन को दिक्‍कत दूसरी वजहों से है। यादव कहते हैं, ''महेशानंद बांध क्षेत्र से बाहर के इलाके में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाते थे। इससे हमें कोई दिक्‍कत नहीं थी।'' प्रशासन को दिक्‍कत रोमा के आने से हुई। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''रोमाजी बहुत अडि़यल हैं।'' वे इसके लिए ''पिग-हेडेड'' शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। वे कहते हैं, ''वे कहती हैं कि हमें बात करनी ही नहीं है... आप हमें गोली मार दीजिए, हम बांध नहीं बनने देंगे। उन्‍होंने संवाद की कोई जगह छोड़ी ही नहीं है। आखिर हम कहां जाएं?''

माना जाता है कि रोमा का यह समझौता नहीं करने वाला रवैया ही जनता को और महेशानंद के पुराने लोगों को उनके पाले में खींच लाया है। इसके अलावा महेशानंद के आंदोलन से हट जाने का लाभ कुछ दूसरे किस्‍म के समूहों ने भी उठाया है। मसलन, पीयूसीएल की राज्‍य इकाई से लेकर भाकपा(माले)-लिबरेशन और आज़ादी बचाओ आंदोलन के लोग भी अचानक इस आंदोलन में सक्रिय हो गए हैं। पड़ोस के सिंगरौली में महान के जंगल और नदी को बचाने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था ग्रीनपीस के सहयोग से जिस महान संघर्ष समिति का गठन हुआ था, वह भी अब सोनभद्र के आंदोलन में जुड़ गयी है। ये सभी धड़े रोमा को आंदोलन का असली नेता मानते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि 14 और 18 अप्रैल को जब कनहर के आदिवासियों पर पुलिस का कहर टूटा, तब और उसके बाद भी रोमा वहां नहीं मौजूद रहीं क्‍योंकि उनके आते ही उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया जाता। लोग इस बात को भी समझते हैं।

बांध के विरोध में अलग-अलग संगठनों का इतना बड़ा गठजोड़ बनने के जवाब में बांध समर्थक लोगों ने भी आंदोलन खड़ा कर दिया है। इस आंदोलन का नाम है ''बांध बनाओ, हरियाली लाओ''। दिलचस्‍प है कि इस आंदोलन में भाकपा(माले) के कुछ पुराने लोग शामिल हैं जिनमें अधिवक्‍ता प्रभु सिंह प्रमुख हैं। भीसुर गांव के रामप्रकाश कहते हैं, ''माले वाले भी हक के लिए ही लगे हुए हैं, लेकिन इनमें से कुछ लोग हैं जो बिचौलिये का काम कर रहे हैं। वे इधर भी हैं और उधर भी हैं।'' माले के एक स्‍थानीय नेता कहते हैं, ''हम लोग यहां स्थिति को ब‍हुत संभालने की कोशिश किए। रोमा तो हम लोगों के बाद आयीं और बने-बनाए आंदोलन में घुस गयीं।''

इस मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू यहां की विधायक रूबी प्रसाद से जुड़ा है। स्थानीय प्रशासन ने विधायक रूबी प्रसाद की अध्यक्षता में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के मसले पर 16 जून 2014 को ग्रामीणों की एक सभा बुलायी। तहलका में प्रकाशित ''कनहर कथा'' में अंशु मालवीय लिखते हैं, ''इस सभा में हजारों लोग मौजूद थे। मंच पर आकर सभी ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध के विरोध में बात रखी। यहां वक्ताओं में वे ग्राम प्रधान भी मौजूद थे जिन्होंने बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रखा है। अंत में मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासन को सौंपा गया, लेकिन जब इस सभा की कार्यवाही की रपट प्रधानों के पास पहुंची तो वे चकित रह गए। इसमें सिर्फ सरकारी अधिकारी एवं विधायक के वक्तव्य थे। जनता के विरोध को उसमें जगह ही नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि प्रशासन एवं सरकार एक कृत्रिम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।''

रूबी प्रसाद की सभा में उठी ग्रामीणों की बांध के विरोध में आवाज़ों के चलते कई लोगों को यह भ्रम हुआ था कि विधायक खुद बांध के विरोध में हैं। पुलिस अधीक्षक यादव इसे साफ़ करते हुए कहते हैं कि रूबी प्रसाद तो बांध के समर्थन में हैं। लोगों को भ्रम है। विधायक ने खुद यादव से कहा था कि ''अगर आप खाली नहीं करवा पा रहे (बांध स्‍थल को प्रदर्शनकारियों से) तो कहिए हम करवा दें।'' यादव दावा करते हैं, ''सभी पार्टियों के लोग बांध के समर्थन में हैं। एक सौ एक परसेंट लोग चाहते हैं कि बांध बने।''

एक सौ एक परसेंट लोगों से यादव का आशय उन लोगों से है जिन्‍हें बांध के बनने से कोई नुकसान नहीं हो रहा। इसमें सरकार, प्रशासन, गैर-आदिवासी शहरी वर्ग और हर राजनीतिक दल शामिल है। ये सब बांध के समर्थन में एकजुट हैं, लिहाजा आदिवासी ग्रामीण बिलकुल अकेले पड़ गए हैं। कुल 22000 के आसपास इन आदिवासियों को कोई भी मनुष्‍यों के बीच नहीं गिन रहा। यह संख्‍या सिर्फ उनकी है जो उत्‍तर प्रदेश की सीमा में रहते हैं। कनहर की डूब में आने वाले छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के गांवों को भी गिन लिया जाए तो 101 परसेंट का बर्बर चेहरा और साफ हो जाएगा। गोलीकांड के बाद कनहर के आदिवासियों की आखिरी उम्‍मीद रोमा, स्‍थानीय नेता गम्‍भीरा और शिवप्रसाद पर टिकी थी। रोमा मौके पर पहुंच पाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि उन्‍हें जिला बदर कर दिया गया है जबकि गम्‍भीरा को 20 अप्रैल की रात इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया जब वे पीयूसीएल के वकील रविकिरण जैन के घर गए हुए थे। गम्‍भीरा को वहां से सोनभद्र लाकर पूछताछ की गई और बाद में जेल भेज दिया गया।

बांध विरोधी आंदोलन में सक्रिय भीसुर के एक नौजवान दुखी मन से कहते हैं, ''आंदोलन की दिशा टूटने के कगार पर जा चुकी है। जनता बहुत चोटिल हो चुकी है। आधे लोग धरने से उठकर चले गए थे। उन्‍हें किसी तरह वापस लाया गया है। पूरा इलाका धारा 144 लगाकर सील कर दिया गया है। जैसे ही लोग जमा होते हैं, कोई न कोई पुलिस की मुखबिरी कर देता है।''

इस शहर में मुखबिरों की कमी नहीं है। हर आदमी एक संभावित मुखबिर है। सोनभद्र का शहरी समाज बिलकुल सिंगरौली की तर्ज पर विकसित हो रहा है जहां हर आदमी हर दूसरे आदमी को मुखबिर मानता है, हर कोई हर किसी पर अविश्‍वास करता है और छोटी-छोटी टुच्‍ची आकांक्षाओं व हितों का नतीजा अंतत: पुलिस की लाठी और गोली के रूप में दिखायी देता है जिसे ''लॉ ऑफ दि लैंड'' कह कर जायज़ ठहराया जाता है। ऐसा समाज बनाने में स्‍थानीय मीडिया की भूमिका सबसे ज्‍यादा नज़र आती है। सोनभद्र के प्रमुख अख़बारों में खबरों का प्रमुख स्रोत पुलिस और प्रशासन हैं। पत्रकार सच्‍चाई को सामने नहीं लाने के लिए कटिबद्ध हैं क्‍योंकि उनके अपने हित झूठ के कारोबार के साथ जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के बाद आदिवासी ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफी की ख़बर को इस कदर दबाया गया कि उसे सामने लाने के लिए दिल्‍ली से एक तथ्‍यान्‍वेषी दल को यहां आना पड़ा, जिसमें यह लेखक भी शामिल था।

इस तथ्‍यान्‍वेषी दल में कुल छह लोग थे- भाकपा(माले)-लिबरेशन की कविता कृष्‍णन, ग्रीनपीस की प्रिया पिल्‍लई, स्‍वतंत्र स्‍त्री अध्रिकार कार्यकर्ता पूर्णिमा गुप्‍ता, स्‍वतंत्र पत्रकार रजनीश, विंध्‍य बचाओ अभियान से देबोदित्‍य सिन्‍हा और यह लेखक। साथ में बनारस से पत्रकार सिद्धांत मोहन भी जुड़ गए थे। गोलकांड की सच्‍चाई को दबाने के लिए स्‍थानीय प्रशासन किस हद तक जा सकता है, उसका पता इस दल के सामने खड़ी की गयी मुश्किलों और इसके उत्‍पीड़न से लगता है। इस दल ने 19 अप्रैल की सुबह बनारस में भर्ती अकलू चेरो से मुलाकात कर के उसका बयान दर्ज किया, जिसके सीने में 14 को गोली लगी थी। इसके बाद शुरू हुआ पुलिसिया निगरानी का सिलसिला, जो अगले दिन वापसी तक लगातार जारी रहा।

बनारस से रॉबर्ट्सगंज के बीच 19 अप्रैल को कड़ा पहरा था। हमारी गाड़ी को रास्‍ते में तीन बार रोकर जांचा गया। किसी तरह सूरज ढलते-ढलते दुद्धी के गांवों में जब दल ने प्रवेश किया, तो उसे बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्‍या होने वाला है। कोरची से कुछ दूरी पर बघाड़ू नाम का एक गांव है। यह गांव आधा डूब में आता है। यहीं पर शाम सात बजे के आसपास दल के सदस्‍य एक चाय की दुकान के बाहर बैठकर सुस्‍ता रहे थे कि जंगल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक पुलिस की कुछ गाडि़यां आकर रुकीं। अचानक कुछ पुलिसवाले एक सादे कपड़े वाले अफसर के नेतृत्‍व में नीचे उतरे और उन्‍होंने पूछताछ शुरू कर दी। सादे कपड़े वाले अफसर ने अपना परिचय नहीं बताया, अलबत्‍ता उसकी गाड़ी पर उपजिला मजिस्‍ट्रेट अवश्‍य लिखा हुआ था। पहले पूछा गया कि आप यहां क्‍या कर रहे हैं। फिर कहा गया कि यह नक्‍सली इलाका है और वे हमारी सुरक्षा करने आए हैं। उसके बाद कविता कृष्‍णन पर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने का आरोप लगाते हुए सादे कपड़े वाले अफसर ने कहा, ''ज्‍यादा होशियारी मत दिखाइए वरना बेइज्‍जत हो जाएंगी।'' ऐसा कहते हुए उसने कविता औश्र दल की महिला सदस्‍यों के साथ बदतमीज़ी की और मोबाइल छीनने की कोशिश की। दल के सदस्‍य देबोदित्‍य सिन्‍हा ने जब इस कार्रवाई पर आपत्ति जतायी तो अफसर ने कहा, ''यही नक्‍सली है। इसे अंदर करो।'' कुछ हस्‍तक्षेप के बाद जब यह मामला ठंडा हुआ तो पुलिस ने दल के ड्राइवर को पकड़कर उसे धमकाना शुरू किया। बड़ी मुश्किल से उसे छुड़ाया गया तो कथित मजिस्‍ट्रेट ने सामान की तलाशी के आदेश दे डाले। एसडीएम की मौजूदगी में पुलिसवालों ने एक-एक कर के सबका सामान जांचना शुरू किया। जब दल की महिलाओं ने पुरुषों द्वारा महिलाओं के सामान की जांच पर आपत्ति जतायी, तब महिला सिपाहियों को बुलाने के लिए वायरलेस करने की बात कही गयी लेकिन अंत तक कोई नहीं आया।

छत्तीसगढ़ की सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर अंधेरे जंगल में पुलिस का व्‍यवहार ऐसा था जैसे आतंकवादियों के साथ किया जाता है। तकरीबन एक घंटे तक पुलिस ने दल को हिरासत में रखा। कथित मजिस्‍ट्रेट का आग्रह था कि दल को दुद्धी थाने ले जाकर पूछताछ की जाए। जब दल ने जिलाधिकारी को भेजे पत्र की प्रति दिखायी, तब अचानक खुद को मजिस्‍ट्रेट कह रहा सादे कपड़ों वाला शख्‍स कहीं गायब हो गया और एक सभ्‍य पुलिस इंस्‍पेक्‍टर जाने कहां से आ गया। इस दौरान घटना की सूचना बड़े पैमाने पर फोन और एसएमएस से फैलायी जा चुकी थी। कुछ पत्रकारों ने सोनभद्र के डीएम को फोन भी कर दिया था। इस दबाव में इंस्‍पेक्‍टर ने माना कि प्रशासनिक स्‍तर पर दल के आने की सूचना को निचले अधिकारियों तक नहीं भेजा गया था और यह एक चूक है। इसके बावजूद दल को गांव में रुकने से मना किया गया और नक्‍सलियों सुरक्षा के नाम पर खदेड़ कर दुद्धी तहसील तक ले आया गया।

बाज़ार में पुलिस की गाडि़यां नदारद हो गयीं और अचानक खुद को एसडीएम बताने वाले एक और अधेड़ शख्‍स सादे कपड़ों में अवतरित हुए। आखिर जंगल में मिला खुद को मजिस्‍ट्रेट कहने वाला वह शख्‍स कौन था? इसका पता अब तक नहीं चल सका है। बार-बार कहने पर जिलाधिकारी ने भी उसकी पहचान उजागर नहीं की। बहरहाल, रात में दुद्धी के जिस डीआर पैलेस नामक होटल में कमरा देखा गया, उसने भोजन के बाद कमरा देने से इनकार कर दिया। उसके ऊपर संभवत: कोई दबाव था, जिसका उद्घाटन सवेरे हुआ। रात में खुद को होटल का मालिक बताने वाले मनोज जायसवाल नाम के व्‍यक्ति से बातचीत कर के रुकने का इंतज़ाम हुआ लेकिन रात भर होटल की गश्‍त लगने की आवाज़ें आती रहीं। सवेरे पता चला कि रात में होटल में मौजूद कर्मचारी के पास थाने से दो बार फोन आए थे और पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे।

अगले दिन सुबह होटल से बाहर निकलते ही दल को पुलिस ने घेर लिया। डीएस यादव नाम के पुलिसकर्मी ने दल के ऊपर लौट जाने का भारी दबाव बनाया। यह दल जब घायलों से मिलने अस्‍पताल पहुंचा तो वहां पुलिस ने भीतर जाने से रोकते हुए धारा 144 का हवाला दिया। डीएम से फोन पर बातचीत के बाद भीतर जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन असली दृश्‍य अभी बाकी था। थोड़ी देर बाद एक दो सितारा पुलिसकर्मी देवेश मौर्य एक उत्‍तेजित भीड़ को लेकर विजयी भाव में अस्‍पताल पहुंचे। यह भीड़ भड़काऊ नारे लगा रही थी और किसी तरह दल को बाहर निकालने पर आमादा थी। ''एनजीओ वापस जाओ'', ''विकास विरोधी मुर्दाबाद'', ''आइएसआइ एजेंट वापस जाओ'', ''मारो जुत्‍ता तान के'', आदि नारे लगाने वाले करीब डेढ़ सौ लोग थे जिन्‍होंने अस्‍पताल को घेर लिया था। पुलिस वालों में इस भीड़ में दोगुनप उत्‍साह आ गया था। संदीप कुमार राय नाम के एक पुलिसकर्मी ने पत्रकार सिद्धांत मोहन से चुटकी लेते हुए कहा, ''सबका समय आता है। कल तक आपका था, आज हमारा समय है।'' यह भीड़ पूरी तरह पुलिस की ओर से प्रायोजित थी जिसमें बाज़ार के लोग, व्‍यापारी, वकील और ठेकेदार शामिल थे जो बांध समर्थक हैं।

एक बार फिर डीएम के हस्‍तक्षेप के बाद पुलिस ने उग्र भीड़ को पीछे धकेला और तकरीबन दो घंटे तक दल को अस्‍पताल में बंधक बनाए रखने के बाद उसकी गाड़ी तक पुलिस संरक्षा में छोड़ा गया। इसके बावजूद एसडीएम की जिस गाड़ी में दल के सदस्‍यों को उनके होटल तक ले जाया गया, उस पर पीछे से जूते और चप्‍पल फेंके गए। दो बजे रॉबर्ट्सगंज में डीएम से बैठक थी। वहां जाते वक्‍त हाथीनाला पर एक बार फिर दल को पुलिस ने रोका और सबके नाम लिखवाए। डीएम से इन घटनाओं की बाबत पूछे जाने पर संक्षिप्‍त-सा जवाब मिला, ''अगर अभद्रता हुई है तो आइ फील सॉरी फॉर इट।''

पुलिस अधीक्षक का कहना था कि ''आपको इलाके में चुपके-चुपके नहीं जाना चाहिए था।'' जब ईमेल से भेजे गए पत्र का हवाला दिया गया तो यादव बोले, ''ईमेल की क्‍या विश्‍वसनीयता है?'' जांच दल की महिलाओं के साथ हुए दुर्व्‍यवहार पर यादव ने कहा, ''अगर आपने बता दिया होता कि पत्रकार हैं तो कोई दिक्‍कत नहीं होती।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या इसका मतलब यह माना जाए कि आपको सामाजिक कार्यकर्ताओं से दिक्‍कत है, तो यादव ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति खुले तौर पर अपना विद्वेष जाहिर किया। बाद में निजी बातचीत में यादव ने कहा, ''हमें गुप्‍तचर विभाग से सूचना मिली थी कि दिल्‍ली से जो टीम आ रही है, वह गांवों में जाकर लोगों को संगठित करने का काम करेगी।''
जांच दल से मुलाकात के बाद 20 अप्रैल की देर शाम जिलाधिकारी संजय कुमार ने एक प्रेस नोट जारी किया। उसमें लिखा है:
''वाकई 'कनहर सिंचाई परियोजना' के विस्थापितों को सभी अनुमन्य सुविधाएं दी जाएंगी। किसी विस्थापित को विस्थापन राशि के लिए भटकना नहीं होगा। डूब क्षेत्र के सुन्दरी, भीसुर, कोरकी, कुदरी, बड़खोरा आदि गांवों में कैम्प लगाकर दस दिनों के अन्दर चेक वितरण का कार्य किया जाएगा।'' उक्त बातें जिलाधिकारी श्री संजय कुमार ने कनहर सिंचाई परियोजना के डूब के गांव सुन्दरी के प्राथमिक विद्यालय प्रांगण में वरिष्‍ठ सपा नेता इस्तयाक अहमद की पहल पर कनहर विस्थापितों के साथ खुली बातचीत/बैठक में कहीं।
''जिलाधिकारी श्री कुमार ने मौके पर मौजूद राबर्ट्सगंजजिलाध्यक्ष समाजवादी पार्टी अविनाश कुशवाहा, जिला महासचिव विजय यादव, विधानसभा अध्यक्ष दुद्धी श्री अवध नारायण यादव, जुबैर आलम, डा. लवकुश प्रजापति, तकरार अहमद, नूरूल हक सदर, चन्द्रमणि, ग्राम प्रधान कुदरी इस्लाउद्दीन, ग्राम प्रधान सुन्दरी राम प्रसाद, प्रधान कोरची रमेश कुमार, प्रधान भीसुर परमेश्‍वर यादव के सार्थक प्रयासों की तारीफ करते हुए सारा श्रेय ग्रामीणों/विस्थापितों को दिया।''

अगले दिन इस प्रेस नोट को सारे स्‍थानीय अखबारों ने प्रमुखता से छापा, लेकिन किसी ने भी यह सवाल पूछने की ज़हमत नहीं उठायी कि जिलाधिकारी की इस बैठक में समाजवादी पार्टी के वे तमाम नेता क्‍यों मौजूद थे जो उसी सुबह दुद्धी अस्‍पताल के बाहर जांच दल के खिलाफ नारा लगाते और गाली देते पाए गए थे। 22 अप्रैल के अखबारों में यह ख़बर तो छपी कि सुन्‍दरी गांव में सर्वे का काम शुरू हो गया है, लेकिन किसी ने भी यह सूचना मिलने के बावजूद छापने की ज़हमत नहीं उठायी कि अकलू के साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी जिन्‍हें 14 के बाद से लापता बताया जा रहा था, वे मिर्जापुर जेल में हैं। अलबत्‍ता जो खबरें छापी गयीं उनका शीर्षक कुछ ऐसे था:

1. कनहर बांध के निर्माण ने अब पकड़ी रफ्तार (हिन्‍दुस्‍तान)
2. कनहर परियोजना मार्च 2018 तक होगी पूरी (हिन्‍दुस्‍तान)
3. पुलिस पर हमले का मुख्‍य आरोपी गिरफ्तार (दैनिक जागरण, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)
4. सुंदरी गांव में शुरू हुआ सर्वे (दैनिक जागरण)
5. एसडीएम, कोतवाल का हमलावर बंदी (अमर उजाला, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)

इनके अलावा एक अप्रत्‍याशित खबर सभी अखबारों के सोनभद्र संस्‍करण में 22 अप्रैल को प्रकाशित हुई:
 ''खनन हादसे में दो खान अफसरों समेत आठ फंसे''
 यह खबर 27 फरवरी 2012 को बिल्‍ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में हुए एक हादसे की मजिस्‍ट्रेटी जांच से जुड़ी है जिसमें 11 मजदूर मारे गए थे। लंबे समय से इाकी जांच चल रही थी लेकिन अचानक इस जांच को पूरा कर के जिलाधिकारी संजय कुमार ने रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें दो खन अधिकारी, एक डीएफओ और आठ लोगों को दोषी बना दिया गया है। स्‍थानीय अखबार ''वनांचल एक्‍सप्रेस'' के संपादक शिवदास का कहना है, ''यह रिपोर्ट इसलिए लायी गयी है ताकि कनहर में हुए गोलीकांड पर परदा डाला जा सके और प्रशासन की साफ-सुथरी छवि को सामने लाकर आदिवासियों के दमन पर उठी ताज़ा बहस को कमजोर किया जा सके।''

कनहर की जटिल कहानी यहीं रुकने वाली नहीं है। बांध पर लगातार काम जारी है। इलाके में पुलिस बल बढ़ा दिया गया है। जांच दल के आने से जो खबरें और तस्‍वीरें बाहर निकल पायी हैं, उनसे प्रशासन बहुत चिंतित है क्‍योंकि मामला सिर्फ एक अवैधानिक बांध बनाने का नहीं बल्कि पैसों की भारी लूट और बंटवारे का भी है जिसके सामने आने का डर अब पैदा हो गया है। इसके अलावा जांच दल की वापसी के बाद कनहर की ओर राष्‍ट्रीय मीडिया ने भी अपना रुख़ कर लिया है। एनडीटीवी ने छोटी ही सही लेकिन एक अहम खबर आदिवासियों के दमन पर 21 अप्रैल को प्रसारित की है। जांच दल से दुर्व्‍यवहार की खबरें अंग्रेज़ी के अखबारों में आने के बाद उम्‍मीद बंधी है कि कि शायद यह मामला आने वाले दिनों में राष्‍ट्रीय फ़लक पर उठ सकेगा।

इस दौरान कनहर के आदिवासियों के लिए सोशल मीडिया पर अच्‍छा-खासा समर्थन जुटा है। वरिष्‍ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्‍तव ने कनहर गोलीकांड पर फेसबुक पर जो लिखा है, सोन नदी के ऊपर फैले अभद्रता के राज पर उससे बेहतर लिखना मुमकिन नहीं:
''यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बर्लिन से ट्वीट कर चिंता ज़ाहिर की है हेम्बोल्ट विश्वविदयालय के अभिलेखागार से लोहिया जी की वह थीसिस ग़ायब है जिस पर उन्हें डॉक्टरेट दी गयी थी। ख़बर सुनते ही तमाम समाजवादी पत्रकार और लोहियावादी सोशल मीडिया पर रोना-पीटना मचाने लगे हैं। उन सबके लिए सूचना है कि डॉक्टर लोहिया की थीसिस अधबने कनहर बाँध में ख़ून से लिथड़ी पड़ी है। कुछ पन्ने सोनभद्र पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं। दम हो तो बचा लें समाजवादी थीसिस को!''

सोन का पानी लाल है...भाग-१

यूपी पुलिस की संगीनों पर चिपके हैं लोहिया की गुम थीसिस के पन्‍ने
अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

इस साल अक्षय तृतीया पर जब देश भर में लगन चढ़ा हुआ था, बारातें निकल रही थीं और हिंदी अखबारों के स्‍थानीय संस्‍करण हीरे-जवाहरात के विज्ञापनों से पटे पड़े थे, तबपश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के कुछ घरों में पहले से तय शादियां अचानक टाल दी गई थीं। कई अनब्‍याही लड़कियों के अभागे बाप बेमौसम बरसात और ओले से बरबाद फसल की भेंट गए, तो कई के भाई लेटी हुई गेहूं की बालियों और सड़े हुए आलू देखकर सदमे आ गए थे। खबरों की मानें तो बुलंदशहर, इटावा, बुंदेलखण्‍ड और मैनपुरी के किसान आगरा के पागलखाने के चक्‍कर लगा रहे थे। तबाही पूरब में भी हुई थी, लेकिन बनारस से सटे सोनभद्र में कहर कुदरत ने नहीं बल्कि पुलिस की लाठियों ने बरपाया था। इस इलाके में कम से कम दो शादियां ऐसी थीं जो अगर टली नहीं, तो उनमें रोका और कन्‍यादान करने के लिए लड़की का बाप नहीं आ सका।

फौजदार (पुत्र केशवराम, निवासी भीसुर) के बेटे का 22 अप्रैल को तिलक था। अगले हफ्ते उनके बेटे की शादी होनी थी। पड़ोस के गांव में 24 अप्रैल को देवकलिया और शनीचर (पुत्र रामदास, निवासी सुन्‍दरी) की बेटी की शादी थी। फौजदार समेत देवकलिया और शनीचर सभी 20 अप्रैल तक दुद्धी तहसील के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में भर्ती थे। देवकलिया की बेटी घर पर अकेली थी। 20 की शाम को अचानक फौजदार और शनीचर को गंभीर घायल घोषित कर के पांच अन्‍य मरीज़ों के साथ जिला चिकित्‍सालय में भेज दिया गया जबकि देवकलिया को दस मरीज़ों के साथ छुट्टी दे दी गयी। देवकलिया जानती थी कि चार दिन में अगर वह शादी की तैयारी कर भी लेगी तो उसके पति शनीचर को अस्‍पताल से नहीं छोड़ा जाएगा क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के समाजवादी राज में अस्‍पताल का दूसरा नाम जेल है। समाजवाद की इस नयी परिभाषा को आए यहां बहुत दिन नहीं बीते हैं।

सोनभद्र उत्‍तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जि़ला है। यहां की आधे से ज्‍यादा ज़मीन जंगल की है और दुनिया के सबसे पुराने जीवाश्‍म भी यहीं की विंध्‍य श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं। आदिवासी बहुल यह जि़ला अपने आप में इकलौता है जिसकी सीमा चार राज्‍यों से एक साथ लगती है- छत्‍तीसगढ़, बिहार, झारखण्‍ड और मध्‍यप्रदेश। पिछले पांच महीने से अचानक इस जि़ले को 'विकास' नाम का रोग लग गया है। इसके पीछे पांगन नदी पर प्रस्‍तावित कनहर नाम का एक बांध है जिसे कोई चालीस साल पहले सिंचाई परियोजना के तहत मंजूरी दी गयी थी। झारखण्‍ड (तत्‍कालीन बिहार), छत्‍तीसगढ़ (तत्‍कालीन मध्‍यप्रदेश) और उत्‍तर प्रदेश के बीच आपसी मतभेदों के चलते लंबे समय तक इस पर काम रुका रहा और बीच में दो बार इसका लोकार्पण भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी लागत भी आरंभिक 23 करोड़ रुपये से बढ़कर 2800 करोड़ रुपये हो गयी। चूंकि 2014 के लोकसभा चुनाव ने तय कर दिया था कि इस देश पर वही राज करेगा जो 'विकास' का जुमला रटेगा, लिहाजा खुद को समाजवादी कहने वाले भी इस लोभ से अछूते न रह सके। पिछले साल जिस वक्‍त अखिलेश यादव की सरकार ने नयी-नयी विकास परियोजनाओं का एलान करना शुरू किया, ठीक तभी उनकी सरकार को इस भूले हुए बांध की भी याद हो आयी। कहते हैं कि उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने इसमें खास दिलचस्‍पी दिखायी और सोनभद्र को हरा-भरा बनाने के नाम पर इसका काम शुरू करवा दिया। खुली निविदा के माध्‍यम से हैदराबाद की कंपनी हिन्‍दुस्‍तान इंजीनियर्स सिंडीकेट (एचईएस) इन्‍फ्रा प्राइवेट लिमिटेड को बांध निर्माण का सौ फीसदी ठेका दे दिया गया। दिसंबर में काम शुरू हुआ तो ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू किया। प्रशासन से उनकी पहली झड़प 23 दिसंबर 2014 को हुई। इसके बाद 14 अप्रैल, 2015 को आंबेडकर जयन्‍ती के दिन पुलिस ने धरना दे रहे ग्रामीणों पर लाठियां बरसायीं और गोली चलायी। एक आदिवासी अकलू चेरो को छाती के पास गोली लगकर आर-पार हो गयी। वह बनारस के सर सुंदरलाल चिकित्‍सालय में भर्ती है। इस घटना के बाद भी ग्रामीण नहीं हारे। तब ठीक चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह सोते हुए ग्रामीणों को मार कर खदेड़ दिया गया, उनके धरनास्‍थल को साफ कर दिया गया और पूरे जिले में धारा 144 लगा दी गयी।

फौजदार, शनीचर और देवकलिया उन पंद्रह घायलों में शामिल सिर्फ तीन नाम हैं जिन्‍हें 20 अप्रैल तक दुद्धी के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में बिना पानी, दातुन और खून से लथपथ कपड़ों में अंधेरे वार्डों में कैद रखा गया था। प्रशासन की सूची के मुताबिक 14 अप्रैल की घटना में 12 पुलिस अधिकारी/कर्मचारी घायल हुए थे जबकि सिर्फ चार प्रदर्शनकारी घायल थे। इसके चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह पांच बजे जो हमला हुआ, उसमें चार पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया है जबकि 19 प्रदर्शनकारी घायल हैं। दोनों दिनों की संख्‍या की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि 18 अप्रैल की कार्रवाई हिसाब चुकाने के लिए की गयी थी। इस सूची में कुछ गड़बडि़यां भी हैं। मसलन, दुद्धी के सरकारी चिकित्‍सालय में भर्ती सत्‍तर पार के जोगी साव और तकरीबन इतनी ही उम्र के रुकसार का नाम सरकारी सूची में नहीं है। इसी तरह सुन्‍दरी गांव से दो महिलाएं 18 अप्रैल की घटना के बाद से ही लापता बतायी जा रही हैं जिनके बारे में तीन तरह की बातें सुनने में आयी हैं। एक स्‍थानीय पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर दावे से कहते हैं कि इनकी मौत हो गयी है और इन्‍हें पुलिस ने मौके पर ही दफना दिया है। कुछ दूसरे पत्रकारों का मानना है कि वे दोनों 14 अप्रैल की घटना में नामजद थीं और अभी जेल में हैं। जिले के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं कि कोई भी लापता नहीं है, यह सब अफ़वाह है। पुलिस अधीक्षक की बात पर इसलिए आशंका होती है क्‍योंकि 14 अप्रैल की घटना में गोली से घायल अकलू चेरो के दो साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी, जो अकलू के साथ बनारस तक गए थे, वे भी 20 अप्रैल तक लापता ही माने जा रहे थे जब तक कि खुद यादव ने इस संवाददाता के पूछने पर यह स्‍वीकार नहीं कर लिया कि वे दोनों मिर्जापुर की जेल में बंद हैं। इसका मतलब है कि जो लापता बताये जा रहे हैं वे जेल में भी हो सकते हैं। इसके अलावा 14 के हमले में घायल तीन और 18 के हमले में घायल छह ग्रामीणों (सरकारी सूची के मुताबिक) का कोई पता नहीं लग पाया है। इनमें से कुछ रॉबर्ट्सगंज के जिला चिकित्‍सालय में भर्ती हो सकते हैं। सूची में एक नाम 18 अप्रैल को घायल मनोज खरवार का है जो छत्‍तीसगढ़ के बलरामपुर का बताया गया है। अफ़वाह तो 18 अप्रैल को कुछ लोगों के मरने की भी थी, लेकिन यहां जिंदा लोगों की पहचान को लेकर ही इतना संशय है कि छत्‍तीसगढ़ के एक अखबार ने सोनभद्र जिले के सुन्‍दरी गांव के अकलू को भी छत्‍तीसगढ़ का बता दिया था।

अगर आपको लगता है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के संबंध में दी गयी उपर्युक्‍त सूचनाएं अधूरी हैं, तो आप बिलकुल ठीक सोच रहे हैं। जान जोखिम में डालकर भी अगर इतने ही तथ्‍य निकल पाएं, तो हम समझ सकते हैं कि सच्‍चाई को छुपाने के लिए प्रशासन की ओर से कितना ज़ोर लगाया जा रहा होगा। हम वास्‍तव में नहीं जान सकते कि बांध की डूब से सीधे प्रभावित होने वाले गांवों सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के कितने घरों में इस लगन बारात आने वाली थी, कितने घरों में वाकई आयी और कितनों में शादियां टल गयीं। कितने घर बसने से पहले उजड़ गए और कितने बसे-बसाये घर बांध के कारण उजड़ेंगे, दोनों की संख्‍या जानने का कोई भी तरीका हमारे पास नहीं है। दरअसल, यहां कुछ भी जानने का कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि आप सरकारी बयानों पर जस का तस भरोसा कर लें। वजह इतनी सी है कि यहां एक बांध बन रहा है और बांध का मतलब विकास है। इसका विरोध करने वाला कोई भी व्‍यक्ति विकास-विरोधी और राष्‍ट्र-विरोधी है।

सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव इस बात को बड़े सहज तरीके से समझाते हैं, ''पूरी पब्लिक साथ में है कि बांध बनना चाहिए। सरकार साथ में है। तीनों राज्‍य सरकारों का एग्रीमेंट हुआ है बांध बनाने के लिए... हम लोगों ने जितना एहतियात बरता है, उसकी पूरी पब्लिक तारीफ़ कर रही है।'' यादव का यह बयान एक मान्‍यता है। इस मान्‍यता के पीछे काम कर रही तर्क-प्रणाली को आप सोनभद्र के युवा जिलाधिकारी संजय कुमार के इस बयान से समझ सकते हैं, ''हमने जो भी बल का प्रयोग किया, वह इसलिए ताकि लोगों को मैसेज दिया जा सके कि लॉ ऑफ दि लैंड इज़ देयर...। आप समझ रहे हैं? ऐसे तो लोगों में प्रशासन और पुलिस का डर ही खत्‍म हो जाएगा। कल को लोग कट्टा लेकर गोली मार देंगे... आखिर हमारे दो गज़ेटेड अफसर घायल हुए हैं...! बेचारे एसडीएम ने अपनी जेब से दस लाख अपने इलाज पर खर्च किया है!''

यह बात अपने आप में चौंकाने वाली है कि एक एसडीएम ने अपने इलाज पर अपनी जेब से दस लाख रुपये कैसे खर्च कर दिए। ज़ाहिर है, होगा तभी खर्च किए होंगे। सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के आदिवासियों के पास अपने ऊपर खर्च करने को सिर्फ आंसू हैं। समय के साथ वे भी अब कम पड़ते जा रहे हैं। दुद्धी के अस्‍पताल में भर्ती जोगी साव (जिनका नाम घायलों की सरकारी सूची में दर्ज नहीं है) हमें देखते ही फफक कर रो पड़ते हैं। गला भर्रा जाता है। इशारे से दिखाते हैं कि कहां-कहां पुलिस की मार पड़ी है। पैर के ज़ख्‍म दिखाने के लिए हलका सा झुकते हैं तो कमर पकड़कर ऐंठ जाते हैं। इनकी उम्र सत्‍तर बरस के पार है। 18 अप्रैल की सुबह धरनास्‍थल पर ये सो रहे थे। जब पुलिस बल आया, तो नौजवानों की फुर्ती से ये भाग नहीं पाए। वहीं गिर गए। वे रोते हुए बताते हैं, ''ओ दिन हमहन रह गइली ओही जगह... एके बेर में पहुंच गइलन सब... धर-धर के लगावे लगलन डंटा। मेहरारू के झोंटा धर के लेसाड़ के मारे लगलन... लइकनवो के नाहीं छोड़लन...।'' जोगी साव के शरीर पर डंडों के निशान हैं। उनके आंसू नहीं रुकते जब वे हाथ दिखाते हुए कहते हैं, ''एक डंटा मरले हउवन... दू डंटा गोड़े में... तब जीप में ले आके इहां गिरउलन।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है उनके खिलाफ़, वे बोले, ''मुकदमा त दर्ज नाहीं कइलन, बाकी कहलन कि अस्‍पताल में चलिए, जेल नहीं जाना पड़ेगा।''

जब हम 20 अप्रैल को दुद्धी अस्‍पताल के इस वार्ड में पहुंचे, तो कुल आठ पुरुष यहां भर्ती थे। महिला वार्ड में पांच महिलाएं थीं और अस्‍पताल के गलियारे में दो घायलों को अलग से लेटाया गया था। कुल दस पुरुषों में बस एक नौजवान था जिसका नाम था मोइन। बाकी नौ पुरुषों की औसत उम्र साठ के पार रही होगी। गलियारे में पहले बिस्‍तर पर जो बुजुर्ग लेटे थे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। नाम- बूटन साव, गांव कोरची। इन्‍हें भी डंडे की मार पड़ी थी। चोट दिखाते हुए बोले, ''आप जनते के तरफ से हैं न?'' हां में जवाब देने पर बोले, ''हम लोगों को छोड़वा दीजिए घर तक''। और इतना कह कर वे अचानक रोने लगे। यह पूछने पर कि कब यहां से छोड़ने को कहा गया है, बूटन बोले, ''छोड़ेंगे नहीं... किसी को मिलने भी नहीं आने दे रहे हैं। बोले हैं यहीं रहना है, नहीं तो जेल जाओ।''

सुन्‍दरी में 18 अप्रैल की सुबह साठ-सत्‍तर साल के बूढ़ों के सिर पर डंडा मारा गया है। औरतों के कूल्‍हों में डंडा मारा गया है। जहूर को पुलिस ने इतनी तेज़ हाथ पर मारा कि तीन उंगलियां ही फट गयी हैं। पुलिस अधीक्षक यादव कहते हैं, ''सिर पर इरादतन नहीं मारा गया, ये ''इन्सिडेन्‍टल'' (संयोगवश) है।'' ''क्‍या तीनों बुजुर्गों के सिर पर किया गया वार ''इन्सिडेन्‍टल'' है?'' इस सवाल के जवाब में वे बोले, ''बल प्रयोग किया गया था, ''इन्सिडेन्‍टल'' हो सकता है। हम कोई दुश्‍मन नहीं हैं, इसकी मंशा नहीं थी।'' ''और 14 अप्रैल को अकलू के सीने को पार कर गयी गोली?'' यादव विस्‍तार से बताते हैं, ''पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलायी। थानेदार (कपिलदेव यादव) को लगा कि मौत सामने है। वैसे भी हमारे यहां पहले एसडीएम पर हमला हो चुका है। सबसे पहले अकलू ने बांस की पटिया से थानेदार को मारा। फिर उसके भाई रमेश ने थानेदार के हाथ पर कुल्‍हाड़ी से हमला किया। पुलिस अफसर नीचे गिर गया। उसे लगा कि वह नहीं बच पाएगा, तो उसने रक्षा के लिए हवा में दो राउंड फायर किया।'' यह पूछे जाने पर कि हवा में फायर करने से अकलू की छाती के पास गोली कैसे लगी, यादव कहते हैं,''थानेदार ''लेड डाउन'' (पीछे की ओर झुका हुआ) था, ऐसी आपात स्थिति में ज्‍योमेट्री नहीं नापी जाती है। उसने खुद कहा कि उसे पता ही नहीं चला कि गोली कहां लगी है।''

यादव के मुताबिक आपात स्थिति में ''ज्‍योमेट्री'' नहीं नापी जाती है। उनके हिसाब से एकबारगी अगर मान भी लें कि पुलिस ने गोली ''आत्‍मरक्षा'' में चलायी और सिर पर डंडा ''संयोगवश'' चल गया, तो सवाल उठता है कि गांवों में घुसकर लोगों को पहाड़ तक खदेड़ देना, औरतों के साथ बदतमीज़ी करना, घरों पर हमला करना, उनके मुर्गे-मुर्गियां पकाकर खा जाना कौन सी गणित कहलाता है? यादव पूछते हैं, ''आप ही बताइए कौन सा घर तोड़ा गया। पुलिस आज तक गांव में नहीं घुसी है।'' डीएम भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। ''और पीएसी?'' इससे भी वे इनकार करते हैं। यादव पलटकर कहते हैं, ''तब तो आपने यह भी सुना होगा कि छह लोगों को मारकर पुलिस ने दफना दिया है?'' हमारे इनकार करने पर वे दोबारा इस बात पर ज़ोर देते हैं। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''हज़ारों मैसेज सर्कुलेट किए गए हैं कि छह लोगों को मारकर दफनाया गया है। इंटरनेशनल मीडिया भी फोन कर रहा है। एमनेस्‍टी वाले यही कह रहे हैं। हम लोग पागल हो गए हैं जवाब देते-देते। इतनी ज्‍यादा अफ़वाह फैलायी गयी है। चार दिन तक हम लोग सोये नहीं। ''  


कौन फैला रहा है यह अफ़वाह? जवाब में जिलाधिकारी हमें एक एसएमएस दिखाते हैं जिसमें 18 तारीख के हमले में पुलिस द्वारा छह लोगों को मार कर दफनाए जाने की बात कही गयी है। भेजने वाले का नाम रोमा है। रोमा सोनभद्र के इलाके में लंबे समय से आदिवासियों के लिए काम करती रही हैं। 14 अप्रैल की घटना के बाद जिन लोगों पर नामजद एफआइआर की गयी उनमें रोमा भी हैं। पुलिस को उनकी तलाश है। डीएम कहते हैं कि कनहर बांध विरोधी आंदोलन को रोमाजी ने अपना निजी एजेंडा बना लिया है। ''तो क्‍या सारे बवाल के केंद्र में अकेले रोमा हैं?'' यह सवाल पूछने पर वे मुस्‍करा कर कहते हैं, ''लीजिए, सारी रामायण खत्‍म हो गयी। आप पूछ रहे हैं सीता कौन है।'' डीएम और एसपी दोनों अबकी हंस देते हैं। 

11 जून 2014

खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े


गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं. 

लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.

दलितों की नामुराद मांगें

भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.

जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर प्रदर्शनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने प्रदर्शनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.

इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽ

पहला विकेट गिरा

ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.

शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस पर भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिरा है). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार का, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.

ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.

30 जुलाई 2012

घर के आगे कार चाहिए हड़ताल नहीं!


-दिलीप ख़ान

बंबई में 1918 में जब आम हड़ताल हुई थी तो उसमें 1,20,000 से ज़्यादा मज़दूरों ने हिस्सा लिया था और हड़ताल को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने लगभग 200 मज़दूरों को पुलिसिया गोली से उड़ा दिया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी नेता ने उस समय तक मज़दूरों के मामले पर गंभीरता से काम करना शुरू नहीं किया था। मज़दूरों की गोलबंदी स्थानीय स्तर पर स्थानीय नेताओं द्वारा शुरू हुई और देश में लगातार फैलती गई। बंबई से लेकर असम के चाय बगान तक और मद्रास से लेकर कानपुर के चमड़ा उद्योग तक। अप्रैल-जून 1921 तक अकेले बंबई 33 हड़तालों का गवाह बना और इसमें लगभग ढाई लाख मज़दूरों ने हिस्सा लिया। इसी आस-पास कानपुर में चमड़ा और सूती वस्त्र उद्योग के मज़दूरों ने हड़ताल की और प्रबंधन से मज़दूरी दर बढ़ाने, काम के तौर-तरीकों को बेहतर बनाने तथा मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग की। कानपुर में आज से लगभग 90 साल पहले, जब मज़दूर आंदोलन और औद्योगिक समाज के भीतर भारत में मज़दूर चेतना आकार ही ले रही थी, उत्पादन में हिस्सेदारी की मांग के साथ मज़दूर सड़क पर उतर गए थे। कांग्रेस सहित कई अन्य पार्टियों ने उस वक्त इस मांग को ठीक बताया था। आज अगर मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग मज़दूरों की तरफ़ से उठे तो कॉरपोरेट घरानों के अलावा समूचा भारतीय मध्यवर्ग और सरकारी मशीनरी मज़दूरों पर पिल पड़ेंगे। मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें ‘विकास-विरोधी नज़रिया’ दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।
मानेसर का मारुति-सुज़ुकी प्लांट

बीते साल तीन बार हड़ताल हुई, काम से निकाले गए कई मज़दूरों को वापस लेने के वायदे से प्रबंधन मुकर गया और हड़ताल की अगुवाई करने वाले दोनों नेता खुद को कंपनी से अलग कर लिए। लेकिन, लंबी मशक्कत के बाद मारुति सुज़की इंपल्वाइज यूनियन को मान्यता मिल गई। प्लांट के भीतर उन्हीं सवालों पर संघर्ष अब भी जारी था जो बीते साल उठ रहे थे। इस पूरे वाकये को दौरान मारुति सुज़ुकी कंपनी को गुजरात सरकार लगातार यह प्रलोभन देती रही कि वो उसे हरियाणा से ज़्यादा ‘फ्रेंडली’ माहौल दे सकती है। नरेंद्र मोदी और सुज़ुकी की बातचीत जारी थी और सुज़ुकी महोदय भी बीच-बीच में मीडिया के जरिए यह बात उछाल रहे थे कि वो प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे। मानेसर के मज़दूरों में उस समय एक जुमला प्रचलित था कि प्लांट कोई लोटा-थाली नहीं है कि जब मन करे कहीं भी उठा ले चलेंगे! सुज़ुकी के इसी फैसले को टालने के लिए भूपेंदर हुड्डा जापान गए थे ताकि सरकार की तरफ़ से कंपनियों को अब तक मिले प्रोत्साहन में बट्टा न लगे। इस तरह मारुति-सुज़ुकी के पास दो अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्री मनुहार लगा रहे थे। कंपनी प्रबंधन के पास मज़दूरों की मांग नहीं मानने के लिए ज़रूरी आत्मविश्वास बरास्ते सरकार जमा हो रहा था। इसके बाद हड़ताल, प्रदर्शन और किसी भी तरह के जमावड़े को रोकने के लिए प्रबंधन ने बड़ी संख्या में बाउंसरों की भर्ती की। मतलब खाए-पिए-अघाए लोग ‘फ्रेश’ होने के लिए जब डांस क्लब में जाते हैं, तो छेड़खानी या फिर हंगामा वगैरह को नियंत्रित करने के लिए जिन बाउंसरों का इस्तेमाल होता है उन्हीं बाउंसरों को बुनियादी मांग उठा रहे मज़दूरों के सामने खड़ा कर दिया गया। कंपनी में काम-काज बाउंसरों की पृष्ठभूमि में होने लगा। अगजनी या फिर प्रबंधक की मौत निश्चित तौर पर एक दुखद चित्र हमारे सामने पेश करता है लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा इसके कारणों का पता लगाना। जातिसूचक गाली देने वाले व्यक्ति की पिटाई एक तरह से जातिगत वर्चस्व की संरचना को तोड़ता है और इस वजह से मैं इसे सकारात्मक ही मानूंगा। मध्यवर्गीय समाज हिंसा-अहिंसा की बहस को सुविधानुसार समय में उठाता है। किसान-मज़दूरों का प्रदर्शन जब कभी उग्र हो जाए तो सरकार से लेकर मीडिया तक के दिमाग में औचक विचार आता है कि ये तो हिंसा का रास्ता है और इसलिए ग़ैर-संवैधानिक है! पिछले साल हुड्डा के जापान से लौटने के बाद जब मज़दूरों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठी भांजी तो उस समय संवैधानिक और ग़ैर-संवैधानिक वाली बहस नहीं उठी। संविधान के दायरे में मिले अधिकारों को तो कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद सरकार मटियामेट कर रही है। नौकरी की ठेका प्रथा पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और देश के संविधान में जो बातें कही गई हैं क्या उसे भारत के किसी भी कोने में सरकार लागू करवा रही है?  
मानेसर में मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट लगभग 3000 एकड़ में फैला है। 2002 में चौटाला सरकार ने 2.25 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से स्थानीय लोगों से ज़मीन ली थी। उस वक्त राज्य सरकार ने वादा किया था था कि ज़मीन देने वाले हरेक घर से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी। काम शुरू होने के बाद कंपनी ने नौकरी देने से इनकार कर दिया। जो लोग नौकरी की आस लगाए बैठे थे उन लोगों ने चाय की भट्टी और छोले-भटूरे की दुकान खोल ली। कुछ लोग रिक्शा और टैम्पो चलाने लगे। उनकी कमाई का जरिया मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट ही है। यहां काम करने वाले लोग ही उनके ग्राहक हैं। इसलिए उनका संकट ये है कि अगर प्लांट मानेसर से कहीं और शिफ्ट होता है तो उनमें से ज़्यादातर लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। प्रबंधन, सरकार और मीडिया से जिस तरह की बातें छन कर उन लोगों तक पहुंची उसका अर्थ यही था कि प्लांट के मज़दूर नहीं चाहते कि प्लांट चले! इस भाव को अगल-बगल के गांव के सरपंचों (हरियाणा के सरपंच को आप किस रूप में जानते हैं? संदर्भ- खाप) ने और स्थाई बना दिया। सरपंचों ने मिलकर ‘महापंचायत’ बैठाई और फैसला किया कि ‘लाल झंडे’ वालों को सबक सिखाने में वो दूसरे पक्ष का साथ देंगे। समाज का जिस तरह से (अ)राजनीतिकरण हो रहा है उसमें तत्कालिक आवेश ज़्यादा अहम हो चला है। दुनिया के किसी भी कारखाने में काम करने वाला कोई भी मज़दूर यह कभी नहीं चाहेगा कि वह कारखाना ठप्प हो जाए और यह बेहद सामान्य-सी बात है। हां, अपने अधिकार के लिए वो लड़ेगा ज़रूर। अगर प्लांट के चारों तरफ के गांव वाले इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं तो जाहिर है कंपनी के प्रोपेगैंडा के बीच यह पक्ष उन तक नहीं पहुंच रहा है। जिस बेरोज़गारी के डर से गांव वाले पंचायत बैठा रहे हैं उस आधार पर तो वो मज़दूरों के ज़्यादा करीब है। प्लांट बंद होने पर उनकी तरह मज़दूर भी बेरोजगार हो जाएंगे। अधिकारों के लिए लड़ रहे मज़दूरों को कंपनी धोखा दे रही है और गांव वालों को नौकरी नहीं देकर वो पहले ही धोखा दे चुकी है। सवाल ये है कि बीते साल हड़ताल को अंदरुनी मामला बताने वाला ‘तटस्थ समाज’ आखिरकार कंपनी के पक्ष में अचानक कैसे चला जाता है? क्या तटस्थता का पूरा मामला अंतत: शक्तिशाली के पांत में ही खड़ा होना है? दिल्ली से लेकर बंबई तक के कॉलेज में पढ़ रहे फंकी युवाओं की हमदर्दी कंपनी के साथ क्यों रहती है? ‘उदारीकृत’ आर्थिक व्यवस्था में समाज में निरपेक्ष दिखने वाले तबके का राजनीतिकरण किस दिशा में हो रहा है। यह व्यवस्था की चौहद्दी में हुई मानसिक बुनावट है या फिर पक्षधरता तय कर ली है समाज ने?
बाइक पर अन्ना समर्थक युवा-शहरी-मध्यवर्ग

25 जुलाई 2005 को होंडा मोटरसाइकिल के कामगारों पर लाठी चार्ज हुआ था। उस वक्त लगभग 800 मज़दूर होंडा सिटी के कारखाने में जमा होकर यूनियन बनाने और निकाले गए मज़दूरों की पुनर्बहाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रबंधन उनकी यूनियन को मान्यता नहीं दे रहा था और मज़दूरों को बहाल करने में आना-कानी बरत रहा था। 2005 में होंडा कंपनी से लेकर 2011-12 में मारुति-सुज़ुकी तक जो लकीर खिंची है उसमें बहुत फ़र्क़ कहां है? मारुति में भी शुरुआती आंदोलन इन्हीं दो सवालों से पैदा हुआ था। यह संयोग है कि 25 जुलाई को उस घटना की सालगिरह थी और इसी दिन प्रणब मुखर्जी ने देश के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और अन्ना हज़ारे एंड कंपनी ने जंतर-मंतर पर मोर्चा खोला। 2005 के बाद से हर साल मानेसर और गुड़गांव की ऑटोमोबाइल कंपनियों के मज़दूर इस दिन लाठी चार्ज के विरोध में प्रदर्शन करते हैं। इनमें मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकॉर्प, रिको, सोना कोया, एफसीसी रिको, सुज़ुकी पावरट्रेन, सुज़ुकी मोटरसाइकिल और मार्क एक्झॉस्ट के मज़दूर अमूमन हर साल शामिल होते रहे हैं, लेकिन इस बार 24 जुलाई को गुड़गांव पुलिस ने यह घोषणा की कि 25 तारीख़ को मानेसर में धारा 144 लागू कर दी गई है और पांच से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ इकट्ठा नहीं हो सकते। मज़दूरों के मार्च को रोक दिया गया। फिर भी कंपनी के भीतर लगभग 8,000 मज़दूर जमा हुए। जो मीडिया सौ लोगों की महापंचायत को दिखा रहा था उसने आठ हज़ार मज़दूरों के प्रदर्शन को नहीं दिखाया।
इस बीच मीडिया में इस तरह की ख़बरें लगातार आती रही कि मानेसर बंद होने से कौन सी कार बाज़ार में आउट-ऑफ-स्टॉक हो जाएगी, डीज़ल कार की क़ीमत पर इससे क्या असर होगा और मारुति-सुज़ुकी को इस तालाबंदी से कितना घाटा होने वाला है! वगैरह, वगैरह। मारुति सुज़ुकी के सीओओ मयंक पारीख ने 25 जुलाई को ही घोषणा की कि उनका दो सबसे ज़्यादा बिकने वाला मॉडल स्विफ्ट और डिज़ायर आउट ऑफ स्टॉक हो गया है। अगले दिन इस मुद्दे पर कुछ चैनलों ने लोगों की रायशुमारी ली जिसमें मध्यवर्ग छाती कूटता दिख रहा था। यह चर्चा लगातार ज़ोर पकड़ने लगी कि मारुति-सुज़ुकी में हुई हिंसा से ‘भारत की छवि’ धूमिल हुई है। सार्क चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष विक्रमजीत सिंह साहनी ने देश की छवि पर पड़ने वाले असर पर भारी चिंता जताई। बंगाल चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष हर्ष झा ने कहा कि मानेसर के दोषियों पर आपराधिक क़ानून के तहत मुकदमा चलना चाहिए और इसे औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत नहीं देखा जाना चाहिए। झा ने दावा किया कि पूरा मामला पूर्वनियोजित मालूम पड़ता है! औद्योगिक घराना उस वक़्त आपराधिक क़ानून का जुमला नहीं उछालता जब सेज़ के लिए ज़मीन अधिग्रहण के वास्ते फ़ौजी बंदूक का सहारा लेकर गांव वालों को वो खदेड़ता है। उस समय उन्हें निजी कंपनियों की सुरक्षाकर्मी की तरह चाक-चौबंद होकर गांव खाली कराने वाली सरकार चाहिए।
कंपनी के अध्यक्ष आर सी भार्गव ने यह बार-बार जताया है कि कंपनी मानेसर में ही रहेगी लेकिन तालाबंदी के बाद मौका ताड़कर इस बार सुज़ुकी से मिलने के लिए नरेंद्र मोदी ने जापान का रास्ता नापा। वे अपनी तईं पूरा ज़ोर लगा रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले मारुति-सुज़ुकी को अपने राज्य में खींचकर ले जाने में वो सफल हो पाएं। आख़िरकार वो कौन-सी शर्तें होंगी जिनके बिना पर मारुति-सुज़ुकी गुजरात जाने का फैसला करेगी। मज़दूरों की हड़ताल के अलावा मारुति-सुज़ुकी को अब तक मानेसर में कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। तो क्या हड़ताल को क्रश करने का भरोसा दिलाने मोदी जापान पहुंचे? ‘विकसित राज्य’ तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं वायदों से होकर गुजरता है। मध्यवर्ग को सिर्फ़ इससे मतलब है कि उनके घर के सामने स्विफ्ट और डिज़ायर पहुंचने में देर नहीं होनी चाहिए। उनके लिए कंपनी कार की जननी है और मज़दूर अड़ंगा डालने वाला प्राणी। यही मध्यवर्ग गाल पर तिरंगा छापकर अन्ना हज़ारे के साथ भ्रष्टाचार पर आवाज़ बुलंद करने पहुंचता है। इनका मुद्दा सिर्फ़ वहीं तक सीमित है जो सीधे-सीधे इनसे टकराता हो। मज़दूरों के मामले से इनको कोई लेना-देना नहीं है, अल्पसंख्यक-दलित-आदिवासियों का मामला इनको आउटसाइडर जैसा मालूम पड़ता है। सरकार इनको साफ़ सुथरी चाहिए, कोई भ्रष्टाचार नहीं चाहिए और सुज़ुकी के साथ गलबहियां डालने वाले नेता को उनके जनसंहार के लिए क्लीन चिट देते हुए यह पूरा वर्ग उसमें विकास के अक्स ढूंढता है।