26 मार्च 2015
युद्ध-क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियाँ : बीजापुर के गावों में सुरक्षा कैंप के बीच असुरक्षित जीवन
04 मई 2012
ए प्रजेंटेशन विदाउट हेडिंग.
16 सितंबर 2011
एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा.
चन्द्रिकाशायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं, वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी. ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे. ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है. आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदा. विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं. वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैं, कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैं. विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता है. रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ पर, ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है. यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियां, तने और आकार मिलते-जुलते लगते हैं. किसी एक घटना की कई-कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती है. आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी है. ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है. दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैं. पर आंच है, आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.
सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं. जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्या? शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होती. क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आती. अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता है, उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़ना, उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त है, जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी हैं. सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैं, जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधन. शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना है, पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना है. लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता. वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और..... और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले. जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं. वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं. यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं. इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते.
इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी है, इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सका, जो अब बस जेहन में बचा है. उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं. इसे पलायन नही कहा जा सकता, इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे. बंजामी ४० साल पहले गदरा, सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं. अब वे यहां से नहीं जाना चाहती, दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है. वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी (माओवादी) वालों के साथ रहता था और सलवा-जुडुम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में. यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना. सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी. ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है. यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है, यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है.
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है. पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया था. आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गया.....विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी......आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थी. ये अब मौखिक कहानी बन गये हैं, इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी है. जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैं, उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा है, उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैं. वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैं. अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाए. यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहे. विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकर. जिसमे उस संस्कृति का विनास, उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित था, जहां वे अब तक जीते आ रहे थे. १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया है. जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगी, पर गोलियां पानी में नहीं बदली. वे चली और कुछ चीखें उठी, कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे. भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगी. भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं. अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे-धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास किया, उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थी, वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैं. वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना-सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं...........जारी
09 जुलाई 2011
माओवादी पार्टी लेगी एस.पी.ओ. के पुनर्वास का जिम्मा.
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को माओवादियों और नक्सलियों के ख़िलाफ़ एसपीओ यानि विशेष पुलिस अधिकारियों के इस्तेमाल को रोकने का आदेश देते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया. न्यायालय का कहना था कि कम पढ़े-लिखे, बिना सही प्रशिक्षण और हथियार के माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान में लगाए गए जनजातीय युवकों के इस्तेमाल को रोका जाना चाहिए क्योंकि ये संविधान के प्रावधानों के ख़िलाफ़ है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों से सभी हथियार और गोलाबारूद तुरंत वापस लेने का भी निर्देश दिया है. अदालत का कहना था कि अगर ये सशस्त्र जनजातीय युवक राज्य के ख़िलाफ़ खड़े हो गए तो ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है. इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों के चयन के लिए राज्यों को दिए जानेवाले पैसे को रोकने का भी आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि कोया कमांडो और सलवा जुडूम का गठन भी संविधान के ख़िलाफ़ है. - bbchindiभारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
प्रेस विज्ञप्ति
7 जुलाई 2011
विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) से माओवादियों की अपील
अपनी ही उंगली से अपनी आंख फोड़वाने की सरकारी साजिशों को हरा दें!
शोषक-लुटेरों के लिए लड़ना बंद कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं!!
सामाजिक कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ई.ए.एस. शर्मा की याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च अदालत ने 4 जुलाई 2011 को छत्तीसगढ़ सरकार को यह आदेश दिया है कि वह माओवादियों से लड़ने के नाम पर आदिवासियों को एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारियों) के रूप में नियुक्त करना और उन्हें हथियारों से लैस करना बंद करे। सर्वोच्च अदालत की खण्डपीठ ने एसपीओ की नियुक्ति को असंवैधानिक माना है। इसके पहले भी सलवा जुडूम, एसपीओ और कोया कमाण्डो के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार इस तरह की टिप्पणियां की थीं।
दरअसल, 2005 में जब केन्द्र व राज्य सरकारों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत सलवा जुडूम के नाम से एक फासीवादी दमन अभियान शुरू किया था, उसी समय से आदिवासी नौजवानों को एसपीओ के रूप में नियुक्त करना शुरू किया गया। तबसे लेकर पहले सलवा जुडूम और बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से लगातार जारी दमन अभियानों में करीब 700 गांवों को तबाह किया गया। एक-एक गांव को अनेक बार किश्तों में जलाया गया। 1200 से ज्यादा लोगों की हत्या की गई। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जिनमें से कइयों को बाद में मार डाला गया। अनाज जलाया गया। सम्पत्ति लूटी गई। मुरगा, सुअर, बकरे जैसे पालतू जानवरों को लूटकर खा डाला गया। इन सभी आतंकी कार्रवाइयों में आदिवासियों में से भर्ती किए गए एसपीओ को ही सामने रखा जाता रहा। पुलिस व अर्धसैनिक बलों को रास्ते दिखाने और गांवों में हमलों के दौरान लोगों और घरों की पहचान करने में भी इन्हीं लोगों को आगे किया जाता रहा। बाद में एसपीओ को बड़े पैमाने पर भर्ती करने का फैसला लिया गया जिससे उनकी संख्या अब करीब पांच हजार की हो गई। एसपीओ में से कुछ लोगों को चुनकर ग्रेहाउण्ड्स और सेना की राष्ट्रीय रायफल्स से प्रशिक्षण दिलवाकर कोया कमाण्डो के रूप में एक दूसरी फोर्स भी तैयार की गई। चूंकि इन सभी सशस्त्र बलों की तमाम दमनकारी कार्रवाइयों के बावजूद भी माओवादी आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसका विकास और विस्तार की प्रक्रिया लगातार जारी है, इसलिए शोषक सरकारों ने अपने आखिरी दांव के रूप में सेना को उतार दिया है। भले ही फिलहाल ‘प्रशिक्षण’’ के बहाने सेना की तैनाती हो रही हो, लेकिन सच यह है कि ‘जनता पर युद्ध’ में सेना का सीधे तौर प्रयोग शुरू हो चुका है।
दण्डकारण्य में छिपी हुई असीम प्राकृतिक सम्पदाओं को बहुराष्ट्रीय व बड़े पूंजीपतियों के कॉर्पोरेट घरानों के हवाले कर इस पूरे क्षेत्र को उनकी लूटखसोट के चारागाह में तब्दील करने के मंसूबों के साथ ही शोषक सरकारों ने जनता के खिलाफ एक अन्यायपूर्ण युद्ध शुरू किया। इसी मंशा से जनता को बड़े पैमाने पर गांवों और जंगलों से खाली करवाने की नीति अपनाई गई। स्थानीय आदिवासियों में से कुछ नौजवानों को एसपीओ और कोया कमाण्डो के रूप में नियुक्त कर उनके हाथों से अनगिनत अत्याचारों को अंजाम दिलवाया गया।
हमारी पार्टी का मानना है कि एसपीओं में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो जानबूझकर नहीं, बल्कि तरह-तरह के दबावों और मजबूरियों के चलते ही एसपीओ बन गए। कई लोगों को गिरफ्तार कर या बलपूर्वक ‘राहत’ शिविरों में ले जाकर मारपीटकर और जान से मार डालने की धमकियां देकर एसपीओ बनने पर मजबूर किया गया। पहले सरकारी आतंक से डरकर एसपीओ बनने वाले भी बाद में धीरे-धीरे उसका हिस्सा बनकर जनता के खिलाफ किए गए जघन्य अपराधों में भागीदार हो गए। हमें पता है कि कई एसपीओ ऐसे हैं जो न चाहते हुए भी जनता पर किए गए घोर अत्याचारों में शामिल हो गए जिस पर वे खुद भी पछता रहे हैं। कई एसपीओं को यह मालूम नहीं था कि महेन्द्र कर्मा, रमन सिंह, विश्वरंजन, ननकीराम जैसे सफेदपोश और खाकीवर्दीधारी दलालों ने ‘शांति’ अभियान के नाम पर दसियों हजार की संख्या में पुलिस, अर्धसैनिक बलों और नागा-मिज़ो बलों को उतारकर आतंक और हिंसा का जो तांडव मचाया उसमें उन्हें प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के आलोक में केन्द्रीय गृहमंत्री चिदम्बरम, जो जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट का सीईओ है, माओवाद-प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई है ताकि ऐसी कोई तरकीब निकाली जा सके कि कैसे इन एसपीओ और कोया कमाण्डो की व्यवस्था बरकरार रखी जा सके। दिल्ली से लेकर रायपुर तक सभी राजनेता, पुलिस के आला अधिकारी और नौकरशाह जुगत भिड़ा रहे हैं ताकि जैसे-तैसे एसपीओं को जनता के खिलाफ जारी इस अन्यायपूर्ण युद्ध में बनाया रखा जा सके।
हम सभी एसपीओ और कोया कमाण्डों को अवगत करवाना चाहते हैं कि दरअसल यह लड़ाई आप और हमारे बीच की नहीं है। यह लड़ाई देश के समूचे मेहनतकश अवाम और मुठ्ठी भर शोषक-लुटेरों के बीच है। एक तरफ 95 प्रतिशत उत्पीड़ित जनता है, जिसमें मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग, दलित, आदिवासी और निम्न और राष्ट्रीय पूंजीपति आते हैं, तो दूसरी तरफ बड़े सामंत और दलाल नौकरशाह पूंजीपति हैं जिनकी संख्या आबादी का महज 5 प्रतिशत है और जिन्हें साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त है। इस लड़ाई में शोषक शासक वर्ग आप लोगों को अपनी राज मशीनरी में शामिल कर आपको मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बलि का बकरा बना रहे हैं। वे अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत जनता के बीच से एक तबके को आगे कर इसे जनता के बीच ‘गुहयुद्ध’ के रूप में भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। आपको ठीक उन लोगों के खिलाफ खड़ा किया गया है जिनके बीच से आप पैदा हुए हैं। जायज मांगों से जारी जन आंदोलनों के खिलाफ आपको उकसाने के लिए शासक वर्ग ‘देशभक्ति’, ‘देश की रक्षा’ आदि झूठी बातों को गढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने आपको इस लड़ाई में घसीट दिया, दरअसल वे ही देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हजारों, लाखों करोड़ के घोटाले करने वाले; दलाली के एवज में देश की सम्पदाओं को क्या, देश की सम्प्रभुता तक को गिरवी रखने वाले; देश की मेहनतकश जनता को दो-दो हाथों से लूटकर स्विस बैंकों में कालाधन छुपाने वाले सब वही लोग हैं जिनके कारण देश की 77 प्रतिशत जनता को दो जून की रोटी तक नसीब न हो पा रही है और गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी, भुखमरी, कुपोषण आदि समस्याएं हमारे हिस्से में आ गईं। इसलिए आप अपने असल दुश्मनों को पहचानें। आप यह मत भूलें कि अपनी बंदूक जिनके सीने पर तान रहे हैं वो सब आपके अपने लोग हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी तमाम एसपीओ और कोया कमाण्डों का यह आह्वान करती है कि वे अपनी नौकरियां छोड़कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं। जो अपने गांवों में आकर अपने द्वारा किए गए अपराधों को स्वीकारकर जनता से माफी मांगने को तैयार होंगे और सरकारी तंत्र से पुरी तरह नाता तोड़ लेंगे, उनके पुनर्वास का जिम्मा हम, यानी पार्टी और जनता ले लेंगी। जनता की अपनी सरकार जनताना सरकार उन्हें खेती के लिए जमीन और अन्य साधन उपलब्ध करवाएगी। उनकी रोजी-रोटी की गारंटी रहेगी। अतः हम तमाम एसपीओं से अपील करते हैं कि वे शोषक सरकारों के झूठे प्रचार और षड़यंत्रकारी दुष्चक्र से बाहर निकल आएं। उनके जूठन के टुकड़ों के लालच में न फंसें और अपने पैरों पर खड़े होकर अपने गांव में और अपनों के बीच सिर उठाकर जीने के लिए आगे आएं। असुरक्षा और अशांति के माहौल में घुट-घुटकर मत जिएं। जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के लिए तथा अपनी अनमोल प्राकृतिक सम्पदाओं की कार्पोरेट लूटखसोट के खिलाफ जारी दण्डकारण्य जनता के न्यायपूर्ण संघर्षों का समर्थन करें।
(गुड्सा उसेण्डी)
प्रवक्ता,
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
25 जून 2011
राष्ट्रपति के बयान पर माओवादी पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति.
29 मई 2011
बंद करो, बंद करो, बंद करो, यह विकास !
बस्तरिया मैना कंठ में उग आये कांटें
मस्त मगन अरना भैंसा थक कर के चूर हुआ
मैनपाट में ज़ल समाधि ले ली नदी ने
गहरी और छोटी वन मेखलाएँ जिनका अभी नाम भी नहीं पड़ा
पहली बार लादी गयीं नंगी कर रेलों में
सूर्य को देखे बिना बीत गयी जिनकी उमर
उन वन-वृक्षों की छालें उतारकर
रखी गयी गिरवी
घोटल समुदाय गृहों पर हुई नालिश
कैसी है आयी ऋतु अबकी बसंत में
अबकी वसंत में टेसू के लाल फूल
सुर्ख-सुर्ख रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे
खून की होली जो खेली सरकार बेकरार ने
वृक्षों के पुरखों ने प्राणों की आहुति दी
प्रस्तर चट्टानों से शीश पटक धरती में दब गए
सब कुछ कुर्बान किया
मान दिया
निर्धन संततियों को दीं अपनी अस्थियां
लाखों बरस की इस संपदा की नीलामी होने को है अब
चतुर-चटुल पूंजीपति, पुरातत्ववेत्ता संग
दुनिया के नौवें धनी-मानी-अंबानी
वेदों के अंत के ठेकेदार, सब आये
छत्तिस सरदारों की बलिवेदी
आज तीर्थाटन की
बनी हुई पुण्यभूमि-पितृभूमि
आये सब कुशल-क्रूर, कर्मीं, कर्ता-धर्ता मुल्क के
अबकी वसंत में
लोकतंत्र की गाय के तोड़ दिए चारों पैर
नाक में नकेल डाल
उलट दिया
पथरीली धरती पर
कुहनियों से कोंचते हैं मंत्रीगण बार बार
बारी अब दुहने की आयी है
खौफ से भरी मां
कातर आवाज में बिन बछड़ा रंभाती रही
बां बां बां
सोचते हैं दूर तलक नज़र गाड़
चिदम्बरम, मनमोहन, मोंटेक, रमन सिंह
टेकेंगे कब घुटने वन-जंगल वासी ये
जैसे हो, जल्दी हो !
अबकी वसंत में
अपने ही शस्त्रों से अस्त्रों से
हत्या की इतनी पुरानी इबारत
जंगल की छाती पर कुरेद रही पुलिस-फौज
मीठी मुस्कान पगे पुलिस पति
मंत्री संग फोटो उतरवाने लगे
वृक्षों के चरणों को सीने से भींचकर
नदियों के बालू से अंतरतम सींचकर
कबीर वहीं बैठा है
तलवों में बिंधा है बहेलिये का आधा बाण
पीर की कोई आवाज ही नहीं आती
सहमा बारहसिंहा
बड़ी बड़ी आँखों में कातर अवरोह लिए ताक रहा.
नाश से डरे हुए जंगल ने उनके भीतर
रोप दीं अपनी सारी वनस्पतियां
आग न लग जाए कहीं, वन्ध्या न हो जाए धरती की कोख
सो, अकुलाई धरती ने शर्मो-हया का लिबास फेंक
जिस्म पर उकेरा खजाने का नक्शा
आँखों में लिख दिया पहाड़ों ने
अपनी हर परत के नीचे गड़ा गुप्त ज्ञान
कुबेर के कभी न भरने वाले रथ पर सवार हो
आये वे उन्मत्त आये
अबकी वसंत में
उतार रहे गर्दन.
अबकी वसंत में
हड़पी गयी ज़मीनों की मृत आत्माएं
छत्तिस सरदारों के कंधे पर हैं सवार
दम-साध
गोल बाँध
कदमताल करते अभुवाते हैं
छत्तिस सरदार
अपने जल जंगल जमीन बीच
नाचते बवंडर से
दिल्ली से रायपुर राजधानी एक्स प्रेस
के चक्कों को कंधा भिड़ा रोक रोक देते हैं
नोक गाड़ देते हैं, सर्वग्रासी विकास की छाती में
पर जीने की यही कला
दूर तलक काम नहीं आती है
सहम-सहम जाती है
रक्त सनी लाल लाल मट्टी
अबकी वसंत में
गोली के छर्रे संग बिखर गयी आत्मा
छत्तिस सरदारों की
छत्तिस कबीलों के छत्तिस हज़ार
महिलायें और पुरुष सब
एक दूसरे से टिकाये पीठ, भिडाये कंधा
हाथों में धनुष धार एकलव्य के वंशज
फंदा बनाते हैं पगलाए नागर-पशु-समुदाय की खातिर
मरना और मरना ही धंधा है इस नगरी
ठठरी की प्रत्यंचा देह पर चढाते हैं
बदले की आंच में हवा को सिंझाते हैं
दिल्ली तक
बंद करो !
बंद करो !
बंद करो !
यह विकास.
मृत्युंजय से mrityubodh@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.
18 अप्रैल 2011
ये जो जल रहा है दण्डकारन्य के जंगलों में
चन्द्रिका, दण्डकारण्य के गाँवों से लौटकर (तहलका के अप्रैल अंक में प्रकाशित रिपोर्ट)
दान्तेवाड़ा जिले में “कोया कमांडो” (सलवा-जुडुम के कार्यकर्ताओं) द्वारा जलाये गये ३ गाँव जंगलों से उठकर अखबारों के पन्नों के मोटे शब्द बन गये, ये गाँव छत्तीसगढ़ की विधानसभा में विपक्ष का मुद्दा बन गये और विधान सभा कई दिनों तक ठप्प पड़ गयी. मोरपल्ली, तीपापुरम और ताड़मेटला कोया कमांडो और सैन्य बलों के संयुक्त आगजनी के अभियान में ११ मार्च १४ मार्च और १६ मार्च को तबाह कर दिए गए. इस दौरान और इसके बाद भी इन इलाकों की नाकेबंदी कर दी गयी. सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तक के जाने पर रोक लगा दी गयी. लगातार माओवादियों के साथ मुठभेढ़ की भ्रामक खबर फैलाई जाती रही ताकि इस तबाही को अंजाम दिया जा सके और आग बुझने व राख उड़ने के साथ वह सब कुछ दफ्न हो जाए जो उत्पात के तौर पर यहाँ किया गया.

कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हम किसी तरह इन गाँवों तक पहुंचने में सफल हुए. तब स्वामी अग्निवेश के रोके जाने और उन पर हमले किए जाने की खबरे लगातार आ रही थी, हमारे मोबाइल के मैसेज बाक्स में. बाद में उन्हें दलील दी गयी कि जंगल में भारी मुठभेड़ चल रही है लिहाजा किसी के भी जाने पर मनाही है. जंगल के रास्तों से पूरे एक दिन चलते हुए दूसरी सुबह हम उस गाँव तक पहुंच पाए थे जहाँ सबसे ज्यादा घरों को जलाया गया था, यह था तारमेटला. इस पूरे एक दिन और एक रात हमारे पास कोई खबर नहीं पहुंची. अलबत्ता जंगलों के बीच एक गाँव में जहाँ हम रुके वहाँ रेडियो के जरिये हमे पता चला कि स्वामी अग्निवेश और कई पत्रकारों के ऊपर अंडे फेंके गए और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया गया. जंगल के इन इलाकों में रेडियो के अलावा संचार का कोई स्रोत नहीं था. एकतरफा संचार, जो आपको खबरें दे सकता है आपकी खबर नहीं ले सकता, जो अपने रोमांटिक गीतों के बीच उनके रुदन के स्वरों को दबा देता है. दिल्ली से लेकर दुनिया भर की तमाम खबरों से ये आदिवासी इसी रेडियो के जरिये भिज्ञ थे और दिल्ली से लेकर दुनिया भर के तमाम लोग अपनी तमाम तकनीकों के साथ इनकी खबरों से अनभिज्ञ. इन इलाकों में सब कुछ एकतरफा ही था, सुरक्षा भी जो सरकार ने भारी सैन्य बलों की तैनाती के साथ दे रखी थी. अब हम उन असुरक्षित गाँवों से होकर गुजर रहे थे जिसे प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े खतरे के रूप में इंगित करते हैं. ये माओवादियों की “जनताना सरकार” के गाँव थे. जिसे गाँव के लोग इस रूप में सुरक्षित मान रहे थे कि “दुश्मन” यानि कि सैन्य बल यहाँ कभी नहीं आ सकते. माओवादी यहाँ १९८० में पहली बार आये थे, शायद १९४७ से १९८० का लम्बा समय यहाँ के आदिवासियों ने भारतीय राज्य के आश और इंतज़ार में गुज़ारे थे.
जंगल की अंधेरी रातों के बीच गाँव होने का मतलब था, किसी सोलर लाइट की रोशनी, किसी बकरी की मिमियाहट, किसी मुर्गे के पंखों की फड़फड़ाहट. हम अपने रास्ते के दौरान कई गाँवों में रुके जो गोंडी आदिवासियों के मुरिया, कोया, राऊत समुदाय के गाँव होते थे. गाँव के किसी कोने पर खड़े होकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता कि गाँव में कितने घर हैं. वे खूबसूरत ऊची तिकोनी झोपडियों के बने होते और उनकी दीवालें लकड़ियों से बनाई हुई होती. घर काफी दूर-दूर तक बिखरे हुए होते और हर गाँव के अंत में प्रायः किसी माओवादी नेता या माओवादी सदस्य की शहादत के स्तूपम बने होते. लाल रंगों के स्तूपम, जिनमे शहीद होने वाले व्यक्तियों के नाम और उनके लिये सलाम के नारे होते. एक गाँव से गुजरते हुए हमने देखा कि माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो चेराकुरी राजकुमार “आज़ाद” का एक बड़ा स्तूपम बनाया गया था जिसे गाँव वालों ने मिलकर अभी हाल में ही तैयार किया था और उसके आसपास निर्माण प्रक्रिया के दौरान प्रयोग की गयी लकड़ियां अभी भी बिखरी हुई थी. उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में सम्बोधित करते हुए लाल सलाम के नारे लिखे गये थे. आदिवासियों के इन गाँवों में यह एक परम्परा सी बन गयी है जिसमे गाँव के लोग शहादत के स्तूपम बनाते हैं और उसे संरक्षित भी करते है.

इन रास्तों से गुजरते हुए हमने कई कहानियां सुनी, वे कहानियाँ जो वर्षों पहले बीत चुकी हैं, कुछ अफसोसों के साथ. वो कहानियां जिनमे गांव लुटने के बाद फिर संवर चुके हैं, कहानियां जिनमे हत्याओं की दहशत और पीड़ा लोगों के चेहरे से उतर चुकी है और वे कहानिया भी जो कुछ बुजुर्गों की आंखों में अब भी बची हुई हैं, किसी पुरानी शिकार यात्रा की याद की तरह. कुंजाम बुधरी के पास बीते पैसठ सालों के किस्से हैं पर हमारे पास वक्त ही नहीं. देवा अपने २५ साल के नौजवान बेटे की हत्या को आधा ही बता पाते हैं....बाकी में खामोशी है. सोड़ी दीपक को अपनी उम्र का पता नहीं वे खुद को आपके सामने पेश करते हैं और कहते हैं आप खुद ही देख लो. गाँव के बच्चे आपको अचकचाई नजरों से देख रहे होते हैं और आपके तौर तरीकों पर हस रहे होते हैं.
उस सुबह हम ताड़मेटला गाँव में थे जहाँ बस घरों के दीवालों की मौजूदगी थी और आगजनी के कारण उन पर कालिख लिपट गयी थी. यह गोंडी आदिवासियों के मुरिया समुदाय का गाँव है. सोड़ी भीमा अपने जले हुए घर की लकड़ियां इकट्ठा कर रहे थे. हमे देखकर वे थोड़ी देर ठिठक गये, चुप रहे और फिर से अपने काम में जुट गये. हमने उनसे बात करने का प्रयास किया और वे अपने जले हुए घर की तरफ इशार करते हुए गोंडी मे देर तक कुछ बोलते रहे. उन्होंने हमे इशारा करते हुए घर के अंदर बुलाया, अंदर का मतलब उन जली हुई लकड़ियों और राख के ढेरों से था जिनके चारो तरफ दीवालों के महज निशान ही बचे हुए थे. जहाँ कुछ जले हुए बर्तन थे जो आधे पिघल से गये थे. एक टूटी हुई सायकिल उतनी ही बची थी जितना उसमे जलने के बाद बच जाना चाहिए. सोड़ी भीमा की आवाज कभी तेज तो कभी धीमी हो जाती जैसे उनकी आंखों की त्योरियों में कुछ उबल सा रहा हो. कोई आदमी पाकृतिक आपदाओं से मानसिक तौर पर शायद जल्दी उबर जाता हो पर मानवीय उपद्रव, सरकार की संरक्षण में किया गया उपद्रव, शायद उसमे बदले की भावना ही पैदा करता है. वे गुस्से में लगातार बोलते रहे. पास में खड़े एक व्यक्ति ने हमे हिन्दी में बताने का प्रयास किया भीमा कह रहे थे कि उनका पूरा साल भर का अनाज यहाँ रखा था जो जल गया. वे बता रहे थे कि १६ तारीख की सुबह जब लोग अपने घरों को बुहार रहे थे, जब लोग महुआ बीनने की तैयारी में थे और कुछ तो अभी सोकर उठे भी नहीं थे, ३०० की संख्या में सी.आर.पी.एफ. और कोया कमांडो आये. पहले उन्होंने हवा में फायरिंग की लोग डर के मारे अपने घरों से भागे और वे एक-एक कर गाँव के घरों को जलाते रहे. उन्होंने मेरा भी घर जला दिया आखिर हमारे गाँव वालों ने कोया कमांडो का क्या बिगाड़ा था.
माड़वी जोगी की आंखों में आंसू थे और कुछ भी बोलते हुए उनके होठ कंप रहे थे जैसे वो कोई इल्जाम कुबूल कर रही हो. शायद घरों को जलाने का कारण पूछना ही उनका इल्जाम था. उनके चेहरे पर घाव के निशान कुछ दिन पुराने और बासी से हो गये थे और पूरा चेहरा दर्द से फूल गया था. उनसे बात करते हुए ऐसा लगा जैसे हम फिर से उनके घावों को कुरेद रहे हो और हम घटना को जानने के लिये शायद ऐसा कर भी रहे थे. यह उनके घर जलाने और पैसे लूटे जाने के मनाही का अंजाम था. जब घरों को जलाया जाने लगा तो वे जंगल में भागने के बजाय आगजनी का प्रतिकार करने लगी. पहले उन्हें बंदूक के बाटम से पीटा गया, उन्हें धक्के देकर जमीन पर गिरा दिया गया और फिर.....फिर वे चुप हो गई. वह बताने में माड़वी जोगी अक्षम हो गयी जो उनके साथ हुआ था. बाकी की कहानी किसी और को ही बतानी पड़ी कि कैसे उन्हें बगल के झाड़ी में ऊपर की तरफ ले जाया गया और बलात्कार किया गया. कुछ घटनाओं के एहसास एक शब्द में अपनी अहमियत नहीं दे पाते. बीतते दिनों के साथ वे चेहरे पर भी कमजोर से पड़ जाते हैं. एक शब्द को कहते हुए साहस चुक सा जाता है, यह भाषा की नाइंसाफी होती है जो तमाम पीड़ाओं की बयानगी को एक साथ तो रख देती है पर उन तकलीफों को कहीं कमजोर सा बनाती हुई. कई घंटों तक वे वहाँ बेसुध पड़ी रही. पूरे गाँव का हर सख्श अपने ही घर की तबाही से बदहवास और हैरान था बाद में लक्के जो माड़वी जोगी की बहन थी उसने उसे कपड़ा पहनाया और वहाँ से लेकर आयी. अभी तक माड़वी जोगी को न तो कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध हो पायी है और न ही किसी तरह की रिपोर्ट दर्ज की गयी.
इस गाँव से माड़वी आयता और माड़वी अंदा दो लोगों को सैन्य बल साथ लेकर गये तब से अब तक उनका कोई पता नहीं चला है. ९०० की आबादी वाले इस गाँव में कुल १५० के आसपास ही लोग हमे दिख रहे थे बाकी जंगलों में इधर-उधर चले गये हैं. शायद वे अब तक लौट आये हों या शायद न लौटने का इरादा बना लिया हो. ताड़मेटला गाँव में सरकारी राहत के तौर पर कुछ चावल भेज दिया गया है. इस चावल के सहारे इन आदिवासियों को अपनी भूख मिटानी है, अपना क्रोध मिटाना है और भुलाना है अपना पूरा का पूरा दर्द भी. ६ साल की बच्ची मड़वी भीमे तक को पीटा गया हम गाँव में उसकी तलाश कर रहे थे पर वह नहीं मिल सकी. लोगों ने बताया कि उसे सिर्फ इसलिए पीटा गया कि वह अकेली घर के बाहर खड़ी होकर रो रही थी. इसके पहले भी सलवा-जुडुम द्वारा २००९ में ताड़मेटला के कुछ घरों में आग लगाई जा चुकी है. कुछ लोग फिर से अपने घरों को बनाने के बारे में सोच रहे हैं और कुछ जिंदा रहने के लिए भूख की जरूरतों के बारे में. गाँव के बीचोबीच गाँव वालों के सहयोग से माओवादियों ने एक तालाब बनवाया है और सरकार ने इनकी झोपड़ियों के लिये आग, आखिर इन्हें किधर कूदना चाहिये. सोड़ी भीमा, गोंचे भीमा, मिड़ियम आयता, ताती अड़मा, एलमा देवा, लेकम उंगा ये सब इमली के एक पेड़ के नीचे इकट्ठा होकर शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे थे. एस.डी.एम. आकर जा चुके हैं उन्होंने लिस्ट बनाने को कहा है और यह भी कि वे नुकसान की पूरी भरपाई करेंगे. भरपाई पीड़ाओं की, दुखों की, त्रासदी की तरह बीत रहे समय की और उसकी भी जो माड़वी जोगी के साथ हुआ.
मोरपल्ली गाँव के ३३ घरों को ११ मार्च को ही जला दिया गया. इन तीन गाँवों को जलाने की शुरुआत इसी गाँव से हुई. गाँवों


