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26 मार्च 2015

युद्ध-क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियाँ : बीजापुर के गावों में सुरक्षा कैंप के बीच असुरक्षित जीवन

26 से 31 दिसंबर 2014 के बीच पी.यू.डी.आर. का एक जांच दल छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के 9 गावों में गया | जांच दल ने इन क्षेत्रों में माओवादियों से लड़ने के लिए तैनात सुरक्षा बलों के द्वारा की जा रही गिरफ्तारियों, धमकियों, एवं उत्पीड़न के साथ-साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं को दर्ज़ किया | मुख्यतः आदिवासी, इन गावों (सार्केगुड़ा, राजपेटा, कोट्टागुड़ा, पुसबाका, तीमापुर, लिंगागिरी, कोरसागुड़ा, बासागुड़ा, कोट्टागुडेम) के निवासियों ने सुरक्षा कैम्पों में रह रहे सशस्त्र बलों द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले अपराधों तथा हिंसक गतिविधियों के तथ्य बयान किये | सुरक्षा बलों द्वारा लगातार इन 'क्षेत्रों में प्रभुत्व' स्थापित करने के प्रयास के दस्तावेज़ीकरण के अलावा, यह रिपोर्ट निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान आकर्षित करती है -
1. आबादी की एक बड़ी संख्या के खिलाफ 'स्थाई वारंट' जारी किये गए हैं और इनमें से एक बड़ी संख्या को 'फरार' घोषित कर दिया गया है | एक मोटा आंकलन यह दिखाता है की केवल बीजापुर में ही कम से कम 15 से 35 हज़ार लोग 'स्थाई वारंट' के आतंक और भय के साये में जी रहे हैं |
2. सशस्त्र बल और स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एस.पी.ओ.) बेलगाम तरीके से अवैध बर्ताव करते हैं जैसे की नियमतः आदिवासी ग्रामीणों के घरों पर छापा मारना, पिटाई करना, लूट-पात, हवालात में बंद करना तथा उनको सुरक्षा कैम्पों में 'बेगार' (मुफ्त श्रम) करने के लिए बाध्य करना | यौन-उत्पीड़न के मामले भी सामने आये |
3. एक ओर सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज़ करने की असंभवता और दूसरी ओर जेलों में बंद ग्रामीणों की गिरफ्तारियों की बढ़ती संख्या |
4. कैम्पों में आपूर्ति-प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु सेना द्वारा बढ़ते स्तर पर सड़क-निर्माण कार्यों की वजह से सशस्त्र बलों की उपस्थिति में अधिक्यता | सड़कों को खोलने का काम सशस्त्र बलों द्वारा सड़क उदघाटन अभ्यास के बाद ही किया जाता है और तत्पश्चात सड़क-अवरोधकों तथा चेक पोस्टों पर बार-बार यात्रियों को रोका जाता है | यह रोज़ाना का सिलसिला है |
5. बीजापुर और बासागुड़ा के बीच चलने वाली सार्वजनिक बसों में सशस्त्र बलों के जवानों के होने के कारण ग्रामीणों को यात्रा के दौरान उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है | अंतर्राष्ट्रीय नियमों की घोर अवहेलना करते हुए, सुरक्षा बल जान-बूझकर संभाव्य मुठभेड़ों के खिलाफ यात्रियों को 'मानवीय कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं |
6. आदिवासी ग्रामीणों की जीवन-स्थिति पर कैम्पों ने बहुत बुरा प्रभाव डाला है | कृषि-कार्यों में कमी और परिणामस्वरुप पारिवारिक आय और वेतनों में गिरावट इस उत्पीड़न का निश्चित परिणाम है | ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही वर्तमान स्कूल व्यवस्था (जिसके तेहत स्थानीय ग्रामीण सहायकों की सेवाएं ली जा रही थी) को अब इरादतन 'आश्रम स्कूलों' में बदला जा रहा है और इसका मकसद आदिवासी बच्चों को उनके घरों और ग्रामीण परिवेश से खींच लेना है |
7. वर्तमान परिस्थिति की प्रबलता सलवा जुडूम की गतिविधियों (2005 से 2009 के बीच ग्रामीणों के बेदखली और सामूहिक विस्थापन) से तुलनीय है और उसको आगे बढ़ाती है | वर्तमान परिस्थिति केवल विस्थापन और यतित पुनर्वास की दुर्गति को रेखांकित करती है जिसके तेहत पहले भी ग्रामीणों को गुज़रने के लिए बाध्य किया गया था |
8. माओवादियों द्वारा बारम्बार किये जा रहे बम विस्फोटों तथा सड़कों को निशाना बनाये जाने के बावजूद, ग्रामीण सुरक्षा कैम्पों से डरते हैं क्योंकि वे सशस्त्र बल ही है जो उन्हें प्रताड़ित करते हैं और उनके खिलाफ नृशंस व्यवहार करते हैं |
9. क्रमबद्ध आवधिक जनसंहारों के साथ-साथ इस क्षेत्र में दैनिक उत्पीड़न राज्य द्वारा चलाए जा रहे युद्ध की दोहरी रणनीति का हिस्सा है |
10. वर्तमान सैन्य उपक्रम के पीछे यही मंसूबा है की खनन गतिविधियों को और अधिक बढ़ाने के लिए क्षेत्र को साफ कर दिया जाए | उद्देश्य यह भी है की आदिवासियों की राज्य का विरोध करने की इच्छशक्ति को ख़त्म कर दिया जाये और उन्हें आधिकारिक प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाये|

04 मई 2012

ए प्रजेंटेशन विदाउट हेडिंग.


एक सेमिनार में पढ़े गए प्रपत्र का अंश.
 चन्द्रिका
रात के बारह बजे आप किसी महिला को एक पहाड़ी से दूसरी पहड़ी पर बेखौफ जाते हुए देख सकते हैं, दिल्ली में ८ बजे के बाद महिलाएं बसों में चढ़ते हुए डरती हैं. अरूंधती रॉय.
 यह दण्डकारण्य है, माओवादियों की जनताना सरकार. मनमोहन सिंह के लिये देश का सबसे बड़ा खतरा और एक महिला के लिये खतरे की सबसे बेखौफ जगह. मैं रुकमिणी, रूपा, हेमा अक्का, सरोज, नर्मदा जैसी महिलाओं के विस्थापन से अपनी बात शुरु करना चाहूंगा. मैं चाहूंगा कि जो नाम मुझसे छूट गये हैं उन्हें जोड़ लिया जा. जबकि यहाँ मैं अपनी प्रस्तुति दे रहा हूं, शायद वे अपना नाम बदल रही होंगी, शायद उन्हें पकड़ लिया गया हो, शायद वे किसी मुठभेड़ में मारी गयी हों. या बगैर मुठभेड़ के मुठभेड़ में मारी गयी हों. या शायद............... कल भी यह शायद शायद ही बना रहेगा, हर बार की तरह. क्योंकि उनके मौत की खबरें अखबारों तक नहीं आयेंगी, कोई टीवी. उनकी तस्वीरें नहीं दिखायेगा.
क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, (के.ए.एम.एस.) आज देश का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत महिला संगठन. जिनके कंधों पर बंदूकें हैं, और जेहेन में वर्तमान संरचना का खारिजनामा. उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में बस वह जमीन चाहिए जहाँ उनकी पीढ़ीयां ६०० सा पूर्व से रहती आयी हैं. जिसे अब टाटा एस्सार और जिंदल को दिया जा रहा है. ६०० इसापूर्व से लेकर १३२४ तक दण्डकारण्य में गणतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी. यह आदिवासियों की अपने लिये अपनी संस्कृति के अनुरूप बनाई गयी प्रणाली थी. जिसके बाद यहां राजतंत्र का प्रभाव रहा पर वह प्रभाव ज्यादातर इस रूप में रहा कि दण्डकारण्य के जंगलों से राजाओं को हाथियों की जरूरत होती थी और इन जंगलों से वे इसकी पूर्ति करते थे. आदिवासी समाज में राजशाही गैर-आदिवासी समाजों जैसी कभी नहीं रही बल्कि यह संक्रमण था कि राजशाही जैसी व्यवस्थाएं आदिवासी समाजों में पहुंची. बावजूद इसके राजा की सेना वहां की पूरी जनता होती थी और राजा बाहरी संबंध बनाने का एक माध्यम. यह १९६५ तक (राजा भंजदेव) दंडकारण्य के इलाके में होता आया. आदिवासियों के समाज में बाहरी शासकों ने कोई सांस्कृतिक हस्तक्षेप नहीं किया. अंग्रेजी शासन काल में जब भी दण्डकारण्य में दखल का प्रयास किया गया, आदिवासियों ने उसका विरोध किया, जब मैं आदिवासियों कह रहा हूं तो इसमे महिला-पुरुष दोनों जुड़े हुए हैं और १७७४–१९१० तक १० विद्रोह हुए. १९१० महान भूमकाल के नाम से जाना जाता है.  
१९१० ई. के भूमकाल के पश्चात दण्डकारण्य के आदिवासियों के मन घायल थे और अब ये हिंसा के बजाय अहिंसा के मार्ग से जुड़ने लगे. ऐसी स्थिति में ताना भगत के आंदोलन ने इन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया था. ओरावों के भगत-सम्प्रदाय में सबसे प्रसिद्ध तानाभगत सम्प्रदाय रहा है. यह जबरा भगत के द्वारा १९१४ ई. में गुमगा जिले (बिहार) में प्रवर्त्तित किया गया था. इसने शौच, मितव्यवहार, तथा शराबबंदी के मुहाबरे को विकसित किया. कालांतर में कांग्रेस आंदोलन के प्रभाव से तानाभगतों का झुकाव स्वराज्य की ओर हुआ. जिससे  ऐसा लगा कि दण्डकारण्य में गाँधीराज आ गया है और वन भूमि उनकी अपनी पैतृक सम्पत्ति बन गयी. असहयोग आंदोलन के दौरान इन आदिवासियों ने जेल की यंत्रणायें सहीं. ये भारी तादात में कांग्रेस के अधिवेशनों में शामिल होने लगे. इन्होंने चरखा तथा तिरंगे का संदेश गाँव-गाँव तक फैलाया. इन्हें लगा कि जैसे ही आज़ादी मिलेगी, उन्हें अपनी जमीन का मालिकाना हक वापस मिल जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ.
वर्तमान में चल रहा माओवादी आंदोलन, व माओवादियों के नेतृत्व में आदिवासियों का यह आंदोलन, जो भारतीय लोकतंत्र की संरचना, जिसे उनके ऊपर थोपा जा रहा है वह आदिवासी इतिहास में किसी भी विद्रोह से ज्यादा लंबा और बृहद फैलाव के साथ मौजूद है. जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है.
अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण १९४७ के बाद ६० के दशक में राजा भंजदेव के नेतृत्व में फिर से विद्रोह प्रारम्भ हुए. बीच का समय भारतीय राज्य को आदिवासियों द्वारा दी गयी मोहलत के तौर पर देखा जा सकता है. भंजदेव के नेतृत्व में चले इस विद्रोह में. सितम्बर १९६३ को दो पुलिस के सिपाही हिड़मा (एक आदिवासी योद्धा जो राजा प्रवीर के नेतृत्व में चल रही मुक्ति की लड़ाई को लड़ रहा था) को गिरफ्तार करने के लिये भेजरीपदर गये. हिड़मा पर आरोप था कि उसने ६ मई से ११ मई के बीच राजमहल में विद्रोह को उकसाया था. भेजरी पदर जाने वाले दोनों पुलिस कर्मियों का गाँव वालों ने सिर काट डाला. भेजरीपदर से संलग्न जंगल में उनके मृत शरीर को फेंक दिया. उन दोनों के सिर कुछ दूर पर पंडरीपानी गाँव के शिलाखण्डों में दबे हुए मिले. दूसरे दिन हिड़मा और उसके साथी राजमहल में थे तथा यह अफवाह फैला रहे थे कि सिर ट्राफी के रूप में जगदलपुर लाये जा रहे हैं. दण्डकारण्य में हुए इस गोली कांड में बड़ी तादात में महिलाएं और बच्चे भी मारे गये थे.
अस्वीकृति के इस लम्बे इतिहास पर पूर्ववर्ती शासन ने कभी ध्यान नहीं दिया और आदिवासी विद्रोह को शांत करने के लिये बार-बार बंदूक का सहारा लिया. दण्डकारण्य को सभ्य बनाने के चक्कर में पारम्परिक मूल्य जिस प्रकार बार-बार विखण्डित हुए, उससे भ्रांत तथा निराश आदिवासियों ने अपनी अस्वीकृति को नक्सलियों के विद्रोही तथा उन्मूलनवादी तरीकों में ढाल लिया और अब इतिहास में पहली बार वे अपनी अस्वीकृति को संवैधानिक तरीकों से हटकर व्यक्त कर रहे हैं. दण्डकारण्य में सी.पी.आई. (एम.एल.) के पीपुल्स वार ग्रुप’ द्वारा नक्सली गतिविधियाँ १९७० में परिलक्षित हुई तथा १९७४ से ये गतिविधियाँ धीरे-धीरे राज्य दमन के कारण प्रतिहिंसात्मक होती गयीं.
यह समय की जरूरत थी और आदिवासी महिलाएं माओवादियों के नेतृत्व में बने संगठन के. ए. एम. एस. , व ग्राम रक्षा कमेटी व अन्य सांस्कृतिक और सशस्त्र संगठनों के साथ जुड़ने लगी. १९९७ में तेंदूपत्ता को लेकर सुकुमा में हुए आंदोलन में ८००० आदिवासी महिलाओं ने भाग लिया. बाद के दिनों में यह संख्या और बढ़ती गयी और तीन वर्ष पश्चात दक्षिणी दण्डकारण्य में हुई बौठकों में २०,००० महिलाओं ने भाग लिया. एक तरफ ये भारतीय राज्य से लड़ रही थी तो दूसरी तरफ आदिवासी समाज में विद्यमान पित्रसत्ता के लिये आंदोलन के अंदर एक संघर्ष चल रहा था. जिसके मुद्दे थे एक पुरुष की दो पत्नियां न होना, शराब बंदी,  इसके अलावा अन्य कई मुद्दों को उन्होंने शामिल किया जो समय और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक बदलते रहे. समान भागीदारी और समानता के प्रश्न को आदिवासियों में के.ए.एम.एस. ने उठाया. यह वर्ग संघर्ष के अंदर पितृसत्ता की लड़ाई थी. पित्रसत्त एक सांस्कृतिक फेनामिना है इसलिये यह लड़ाई निश्चित तौर पर पुरुषवादी मानसिकता को बदलने के लिये सांस्कृतिक आधार पर ही लड़ी जा सकती है जो मनोदशा को परिवर्तित करने में सक्षम हो पाती है. लिहाजा दण्डकारण्य में सांस्कतिक संगठनों द्वारा इसे लड़ा गया और लड़ा जा रहा है. यदि इसके बरक्स आप भारतीय राज्य को देखें तो उसके द्वारा सांस्कृतिक तौर पर कोई सक्रिय प्रयास अब तक पित्रसत्ता, जाति धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं के लिये नहीं किया गया.
१९९९ तक दण्डकारण्य में माओवादी संगठनों में महिलाओं का प्रतिशत ४५ था. यह सलवा-जुडुम के कुछ साल पहले की बात है. सलवा-जुडुम से आप सब लोग परिचित होंगे अगर परिचित नहीं हैं तो परिचित होना चाहिये था. सलवा-जुडुम को लेकर आयी तमाम रिपोर्टों और फैक्ट-फाइंडिंग्स के अलग अलग आंकड़े हैं. तकरीबन ६०० गाँवों का विस्थापन या बेघर होना. इन बेघर लोगों में पुरुषों के साथ एक विकल्प था कि वे किसी शहर जा कर रोजगार कर सकते थे और उनमे से कुछ ने यह किया भी आप रायपुर के नजदीक सिलतरा में उन्हें पा सकते हैं. पर महिलाओं के साथ स्थितियां भिन्न थी उनके पास विकल्प बचा था माओवादियों के साथ जुड़ना और अपने गाँवों को वापस पाने के लिये लड़ना. हिमांशु कुमार दांतेवाड़ा की यदि माने तो सलवा-जुडुम ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को सश्स्त्र होने को मजबूर किया. आज इसका कोई ठीक आंकड़ा मौजूद नहीं है कि कितनी महिलाएं माओवादी सशस्त्र हैं पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य दमन की प्रक्रियाओं ने उनके सशस्त्र होने के प्रतिशत में बृद्धि कर दी है.

16 सितंबर 2011

एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा.

चन्द्रिका
शायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं, वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी. ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे. ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है. आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदा. विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं. वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैं, कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैं. विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता है. रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ पर, ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है. यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियां, तने और आकार मिलते-जुलते लगते हैं. किसी एक घटना की कई-कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती है. आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी है. ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है. दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैं. पर आंच है, आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.

सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं. जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्या? शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होती. क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आती. अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता है, उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़ना, उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त है, जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी हैं. सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैं, जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधन. शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना है, पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना है. लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता. वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और..... और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले. जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं. वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं. यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं. इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते.

इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी है, इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सका, जो अब बस जेहन में बचा है. उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं. इसे पलायन नही कहा जा सकता, इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे. बंजामी ४० साल पहले गदरा, सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं. अब वे यहां से नहीं जाना चाहती, दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है. वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी (माओवादी) वालों के साथ रहता था और सलवा-जुडुम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में. यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना. सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी. ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है. यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है, यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है.
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है. पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया था. आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गया.....विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी......आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थी. ये अब मौखिक कहानी बन गये हैं, इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी है. जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैं, उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा है, उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैं. वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैं. अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाए. यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहे. विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकर. जिसमे उस संस्कृति का विनास, उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित था, जहां वे अब तक जीते आ रहे थे. १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया है. जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगी, पर गोलियां पानी में नहीं बदली. वे चली और कुछ चीखें उठी, कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे. भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगी. भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं. अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे-धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास किया, उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थी, वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैं. वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना-सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं...........जारी

09 जुलाई 2011

माओवादी पार्टी लेगी एस.पी.ओ. के पुनर्वास का जिम्मा.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को माओवादियों और नक्सलियों के ख़िलाफ़ एसपीओ यानि विशेष पुलिस अधिकारियों के इस्तेमाल को रोकने का आदेश देते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया. न्यायालय का कहना था कि कम पढ़े-लिखे, बिना सही प्रशिक्षण और हथियार के माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान में लगाए गए जनजातीय युवकों के इस्तेमाल को रोका जाना चाहिए क्योंकि ये संविधान के प्रावधानों के ख़िलाफ़ है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों से सभी हथियार और गोलाबारूद तुरंत वापस लेने का भी निर्देश दिया है. अदालत का कहना था कि अगर ये सशस्त्र जनजातीय युवक राज्य के ख़िलाफ़ खड़े हो गए तो ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है. इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों के चयन के लिए राज्यों को दिए जानेवाले पैसे को रोकने का भी आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि कोया कमांडो और सलवा जुडूम का गठन भी संविधान के ख़िलाफ़ है. - bbchindi

अदालत के इस फैसले के बाद माओवादी पार्टी ने विषेश पुलिस अधिकारियों से अपील की है जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.


भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
प्रेस विज्ञप्ति
7 जुलाई 2011

विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) से माओवादियों की अपील
अपनी ही उंगली से अपनी आंख फोड़वाने की सरकारी साजिशों को हरा दें!
शोषक-लुटेरों के लिए लड़ना बंद कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं!!

सामाजिक कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ई.ए.एस. शर्मा की याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च अदालत ने 4 जुलाई 2011 को छत्तीसगढ़ सरकार को यह आदेश दिया है कि वह माओवादियों से लड़ने के नाम पर आदिवासियों को एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारियों) के रूप में नियुक्त करना और उन्हें हथियारों से लैस करना बंद करे। सर्वोच्च अदालत की खण्डपीठ ने एसपीओ की नियुक्ति को असंवैधानिक माना है। इसके पहले भी सलवा जुडूम, एसपीओ और कोया कमाण्डो के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार इस तरह की टिप्पणियां की थीं।
दरअसल, 2005 में जब केन्द्र व राज्य सरकारों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत सलवा जुडूम के नाम से एक फासीवादी दमन अभियान शुरू किया था, उसी समय से आदिवासी नौजवानों को एसपीओ के रूप में नियुक्त करना शुरू किया गया। तबसे लेकर पहले सलवा जुडूम और बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से लगातार जारी दमन अभियानों में करीब 700 गांवों को तबाह किया गया। एक-एक गांव को अनेक बार किश्तों में जलाया गया। 1200 से ज्यादा लोगों की हत्या की गई। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जिनमें से कइयों को बाद में मार डाला गया। अनाज जलाया गया। सम्पत्ति लूटी गई। मुरगा, सुअर, बकरे जैसे पालतू जानवरों को लूटकर खा डाला गया। इन सभी आतंकी कार्रवाइयों में आदिवासियों में से भर्ती किए गए एसपीओ को ही सामने रखा जाता रहा। पुलिस व अर्धसैनिक बलों को रास्ते दिखाने और गांवों में हमलों के दौरान लोगों और घरों की पहचान करने में भी इन्हीं लोगों को आगे किया जाता रहा। बाद में एसपीओ को बड़े पैमाने पर भर्ती करने का फैसला लिया गया जिससे उनकी संख्या अब करीब पांच हजार की हो गई। एसपीओ में से कुछ लोगों को चुनकर ग्रेहाउण्ड्स और सेना की राष्ट्रीय रायफल्स से प्रशिक्षण दिलवाकर कोया कमाण्डो के रूप में एक दूसरी फोर्स भी तैयार की गई। चूंकि इन सभी सशस्त्र बलों की तमाम दमनकारी कार्रवाइयों के बावजूद भी माओवादी आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसका विकास और विस्तार की प्रक्रिया लगातार जारी है, इसलिए शोषक सरकारों ने अपने आखिरी दांव के रूप में सेना को उतार दिया है। भले ही फिलहाल ‘प्रशिक्षण’’ के बहाने सेना की तैनाती हो रही हो, लेकिन सच यह है कि ‘जनता पर युद्ध’ में सेना का सीधे तौर प्रयोग शुरू हो चुका है।
दण्डकारण्य में छिपी हुई असीम प्राकृतिक सम्पदाओं को बहुराष्ट्रीय व बड़े पूंजीपतियों के कॉर्पोरेट घरानों के हवाले कर इस पूरे क्षेत्र को उनकी लूटखसोट के चारागाह में तब्दील करने के मंसूबों के साथ ही शोषक सरकारों ने जनता के खिलाफ एक अन्यायपूर्ण युद्ध शुरू किया। इसी मंशा से जनता को बड़े पैमाने पर गांवों और जंगलों से खाली करवाने की नीति अपनाई गई। स्थानीय आदिवासियों में से कुछ नौजवानों को एसपीओ और कोया कमाण्डो के रूप में नियुक्त कर उनके हाथों से अनगिनत अत्याचारों को अंजाम दिलवाया गया।
हमारी पार्टी का मानना है कि एसपीओं में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो जानबूझकर नहीं, बल्कि तरह-तरह के दबावों और मजबूरियों के चलते ही एसपीओ बन गए। कई लोगों को गिरफ्तार कर या बलपूर्वक ‘राहत’ शिविरों में ले जाकर मारपीटकर और जान से मार डालने की धमकियां देकर एसपीओ बनने पर मजबूर किया गया। पहले सरकारी आतंक से डरकर एसपीओ बनने वाले भी बाद में धीरे-धीरे उसका हिस्सा बनकर जनता के खिलाफ किए गए जघन्य अपराधों में भागीदार हो गए। हमें पता है कि कई एसपीओ ऐसे हैं जो न चाहते हुए भी जनता पर किए गए घोर अत्याचारों में शामिल हो गए जिस पर वे खुद भी पछता रहे हैं। कई एसपीओं को यह मालूम नहीं था कि महेन्द्र कर्मा, रमन सिंह, विश्वरंजन, ननकीराम जैसे सफेदपोश और खाकीवर्दीधारी दलालों ने ‘शांति’ अभियान के नाम पर दसियों हजार की संख्या में पुलिस, अर्धसैनिक बलों और नागा-मिज़ो बलों को उतारकर आतंक और हिंसा का जो तांडव मचाया उसमें उन्हें प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के आलोक में केन्द्रीय गृहमंत्री चिदम्बरम, जो जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट का सीईओ है, माओवाद-प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई है ताकि ऐसी कोई तरकीब निकाली जा सके कि कैसे इन एसपीओ और कोया कमाण्डो की व्यवस्था बरकरार रखी जा सके। दिल्ली से लेकर रायपुर तक सभी राजनेता, पुलिस के आला अधिकारी और नौकरशाह जुगत भिड़ा रहे हैं ताकि जैसे-तैसे एसपीओं को जनता के खिलाफ जारी इस अन्यायपूर्ण युद्ध में बनाया रखा जा सके।
हम सभी एसपीओ और कोया कमाण्डों को अवगत करवाना चाहते हैं कि दरअसल यह लड़ाई आप और हमारे बीच की नहीं है। यह लड़ाई देश के समूचे मेहनतकश अवाम और मुठ्ठी भर शोषक-लुटेरों के बीच है। एक तरफ 95 प्रतिशत उत्पीड़ित जनता है, जिसमें मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग, दलित, आदिवासी और निम्न और राष्ट्रीय पूंजीपति आते हैं, तो दूसरी तरफ बड़े सामंत और दलाल नौकरशाह पूंजीपति हैं जिनकी संख्या आबादी का महज 5 प्रतिशत है और जिन्हें साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त है। इस लड़ाई में शोषक शासक वर्ग आप लोगों को अपनी राज मशीनरी में शामिल कर आपको मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बलि का बकरा बना रहे हैं। वे अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत जनता के बीच से एक तबके को आगे कर इसे जनता के बीच ‘गुहयुद्ध’ के रूप में भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। आपको ठीक उन लोगों के खिलाफ खड़ा किया गया है जिनके बीच से आप पैदा हुए हैं। जायज मांगों से जारी जन आंदोलनों के खिलाफ आपको उकसाने के लिए शासक वर्ग ‘देशभक्ति’, ‘देश की रक्षा’ आदि झूठी बातों को गढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने आपको इस लड़ाई में घसीट दिया, दरअसल वे ही देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हजारों, लाखों करोड़ के घोटाले करने वाले; दलाली के एवज में देश की सम्पदाओं को क्या, देश की सम्प्रभुता तक को गिरवी रखने वाले; देश की मेहनतकश जनता को दो-दो हाथों से लूटकर स्विस बैंकों में कालाधन छुपाने वाले सब वही लोग हैं जिनके कारण देश की 77 प्रतिशत जनता को दो जून की रोटी तक नसीब न हो पा रही है और गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी, भुखमरी, कुपोषण आदि समस्याएं हमारे हिस्से में आ गईं। इसलिए आप अपने असल दुश्मनों को पहचानें। आप यह मत भूलें कि अपनी बंदूक जिनके सीने पर तान रहे हैं वो सब आपके अपने लोग हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी तमाम एसपीओ और कोया कमाण्डों का यह आह्वान करती है कि वे अपनी नौकरियां छोड़कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं। जो अपने गांवों में आकर अपने द्वारा किए गए अपराधों को स्वीकारकर जनता से माफी मांगने को तैयार होंगे और सरकारी तंत्र से पुरी तरह नाता तोड़ लेंगे, उनके पुनर्वास का जिम्मा हम, यानी पार्टी और जनता ले लेंगी। जनता की अपनी सरकार जनताना सरकार उन्हें खेती के लिए जमीन और अन्य साधन उपलब्ध करवाएगी। उनकी रोजी-रोटी की गारंटी रहेगी। अतः हम तमाम एसपीओं से अपील करते हैं कि वे शोषक सरकारों के झूठे प्रचार और षड़यंत्रकारी दुष्चक्र से बाहर निकल आएं। उनके जूठन के टुकड़ों के लालच में न फंसें और अपने पैरों पर खड़े होकर अपने गांव में और अपनों के बीच सिर उठाकर जीने के लिए आगे आएं। असुरक्षा और अशांति के माहौल में घुट-घुटकर मत जिएं। जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के लिए तथा अपनी अनमोल प्राकृतिक सम्पदाओं की कार्पोरेट लूटखसोट के खिलाफ जारी दण्डकारण्य जनता के न्यायपूर्ण संघर्षों का समर्थन करें।


(गुड्सा उसेण्डी)
प्रवक्ता,
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

25 जून 2011

राष्ट्रपति के बयान पर माओवादी पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति.

कल छत्तीसगढ़ की विधान सभा को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा जिसके जबाब में माओवादी पार्टी द्वारा यह प्रेस विज्ञप्ति मेल से प्राप्त हुई है जिस हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

अपने रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि ‘माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्य धारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें’। राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें। वे ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।
देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है। दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीज़िल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!
भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।
और श्रीमति प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।
60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ ं को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।
इसलिए, देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।
आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।
आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।
(अभय)
प्रवक्ता
केन्द्रीय कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

29 मई 2011

बंद करो, बंद करो, बंद करो, यह विकास !

बस्तरिया मैना कंठ में उग आये कांटें
मस्त मगन अरना भैंसा थक कर के चूर हुआ
मैनपाट में ज़ल समाधि ले ली नदी ने
गहरी और छोटी वन मेखलाएँ जिनका अभी नाम भी नहीं पड़ा
पहली बार लादी गयीं नंगी कर रेलों में
सूर्य को देखे बिना बीत गयी जिनकी उमर
उन वन-वृक्षों की छालें उतारकर
रखी गयी गिरवी
घोटल समुदाय गृहों पर हुई नालिश
कैसी है आयी ऋतु अबकी बसंत में

अबकी वसंत में टेसू के लाल फूल
सुर्ख-सुर्ख रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे
खून की होली जो खेली सरकार बेकरार ने

वृक्षों के पुरखों ने प्राणों की आहुति दी
प्रस्तर चट्टानों से शीश पटक धरती में दब गए
सब कुछ कुर्बान किया
मान दिया
निर्धन संततियों को दीं अपनी अस्थियां
लाखों बरस की इस संपदा की नीलामी होने को है अब

चतुर-चटुल पूंजीपति, पुरातत्ववेत्ता संग
दुनिया के नौवें धनी-मानी-अंबानी
वेदों के अंत के ठेकेदार, सब आये
छत्तिस सरदारों की बलिवेदी
आज तीर्थाटन की
बनी हुई पुण्यभूमि-पितृभूमि
आये सब कुशल-क्रूर, कर्मीं, कर्ता-धर्ता मुल्क के
अबकी वसंत में

लोकतंत्र की गाय के तोड़ दिए चारों पैर
नाक में नकेल डाल
उलट दिया
पथरीली धरती पर
कुहनियों से कोंचते हैं मंत्रीगण बार बार
बारी अब दुहने की आयी है
खौफ से भरी मां
कातर आवाज में बिन बछड़ा रंभाती रही
बां बां बां
सोचते हैं दूर तलक नज़र गाड़
चिदम्बरम, मनमोहन, मोंटेक, रमन सिंह
टेकेंगे कब घुटने वन-जंगल वासी ये
जैसे हो, जल्दी हो !

अबकी वसंत में
अपने ही शस्त्रों से अस्त्रों से
हत्या की इतनी पुरानी इबारत
जंगल की छाती पर कुरेद रही पुलिस-फौज
मीठी मुस्कान पगे पुलिस पति
मंत्री संग फोटो उतरवाने लगे

वृक्षों के चरणों को सीने से भींचकर
नदियों के बालू से अंतरतम सींचकर
कबीर वहीं बैठा है
तलवों में बिंधा है बहेलिये का आधा बाण
पीर की कोई आवाज ही नहीं आती
सहमा बारहसिंहा
बड़ी बड़ी आँखों में कातर अवरोह लिए ताक रहा.

नाश से डरे हुए जंगल ने उनके भीतर
रोप दीं अपनी सारी वनस्पतियां
आग न लग जाए कहीं, वन्ध्या न हो जाए धरती की कोख
सो, अकुलाई धरती ने शर्मो-हया का लिबास फेंक
जिस्म पर उकेरा खजाने का नक्शा
आँखों में लिख दिया पहाड़ों ने
अपनी हर परत के नीचे गड़ा गुप्त ज्ञान
कुबेर के कभी न भरने वाले रथ पर सवार हो
आये वे उन्मत्त आये
अबकी वसंत में
उतार रहे गर्दन.

अबकी वसंत में
हड़पी गयी ज़मीनों की मृत आत्माएं
छत्तिस सरदारों के कंधे पर हैं सवार
दम-साध
गोल बाँध
कदमताल करते अभुवाते हैं
छत्तिस सरदार
अपने जल जंगल जमीन बीच
नाचते बवंडर से
दिल्ली से रायपुर राजधानी एक्स प्रेस
के चक्कों को कंधा भिड़ा रोक रोक देते हैं
नोक गाड़ देते हैं, सर्वग्रासी विकास की छाती में

पर जीने की यही कला
दूर तलक काम नहीं आती है
सहम-सहम जाती है
रक्त सनी लाल लाल मट्टी
अबकी वसंत में
गोली के छर्रे संग बिखर गयी आत्मा
छत्तिस सरदारों की

छत्तिस कबीलों के छत्तिस हज़ार
महिलायें और पुरुष सब
एक दूसरे से टिकाये पीठ, भिडाये कंधा
हाथों में धनुष धार एकलव्य के वंशज
फंदा बनाते हैं पगलाए नागर-पशु-समुदाय की खातिर
मरना और मरना ही धंधा है इस नगरी
ठठरी की प्रत्यंचा देह पर चढाते हैं
बदले की आंच में हवा को सिंझाते हैं
दिल्ली तक

बंद करो !
बंद करो !
बंद करो !
यह विकास.

मृत्युंजय से mrityubodh@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

18 अप्रैल 2011

ये जो जल रहा है दण्डकारन्य के जंगलों में

चन्द्रिका, दण्डकारण्य के गाँवों से लौटकर (तहलका के अप्रैल अंक में प्रकाशित रिपोर्ट)

उन दिनों मिस्र के लोगों के चेहरों पर गुलाबी खुशियां थी और लीबिया से बारूद की महक दुनिया के हर देश तक पहुंच रही थी. हमारा पूरा देश बैट और बल्लों के खेल में अपना स्वाभिमान जगा रहा था. देश भक्ति के मायने थे कि हर जीत के बाद जश्न मनाओ और उस हुजूम में शामिल हो जाओ. देश के अधिकांश बुद्धिजीवी लोकतंत्र की दुहाई देते हुए भारत में तहरीर चौक बनने की किसी भी संभावना से इनकार कर रहे थे और कर रहे हैं. जब उनके घरों में आग लगाई गई और उन्हें तबाह कर दिया गया. जब उन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश में आग की लपटों के बीच अपने घरों के जलाये जाने का बस कारण पूछ रही थी. उस ६ साल की बच्ची को पीटा गया जो इतने सारे घरों को पहली बार एक साथ जलता हुआ देख कर रोने की जुर्रत कर रही थी. शायद यह रुदन की भाषा में घरों को जलाए जाने का प्रतिकार रहा होगा या फिर कोई सवाल. शायद बच्चों को यह तजुर्बा नहीं होता कि उन्हें कहाँ नहीं रोना चाहिए, उन्हें सैन्य बलों के साथ सुलूक का तजुर्बा भी नहीं होता. एक बच्चे की आखों में २०७ घरों को जलाए जाने की दहशत शायद ही समा पाए. छत्तीसगढ़ के दान्तेवाड़ा जिले की दहशतगर्दी में बच्चों को रोने के लिये सैन्य बलों और सलवा-जुडुम की इजाजत चाहिए. समय के साथ वे सबकुछ सीख रहे हैं. लड़ना और पीड़ाओं से उबरना, जलना और राख की ढेर पर फिर से निर्मित हो जाना. आदिवासियों के ये गाँव पिछले कुछ सालों से सैन्य बलों के लिए बरसात के कुकुरमुत्ते हो गये हैं जो राख की ढेर पर उग आते हैं और सलवा-जुडुम के बूटों तले कुचल दिए जाते हैं. २००५ से एक अंतहीन सा सिलसिला जिसमे तकरीबन ६०० गाँव अब तक उजड़ चुके हैं. इनकी जिंदगियां इतनी मामूली हो चुकी हैं कि इक्का-दुक्का हत्यायें और मौतें रोज-बरोज के जिंदगी का हिस्सा सी बन गयी हैं. इन पर कोई नहीं रोता, इनके लिए आंसू चुक से गये हैं..

दान्तेवाड़ा जिले में कोया कमांडो (सलवा-जुडुम के कार्यकर्ताओं) द्वारा जलाये गये ३ गाँव जंगलों से उठकर अखबारों के पन्नों के मोटे शब्द बन गये, ये गाँव छत्तीसगढ़ की विधानसभा में विपक्ष का मुद्दा बन गये और विधान सभा कई दिनों तक ठप्प पड़ गयी. मोरपल्ली, तीपापुरम और ताड़मेटला कोया कमांडो और सैन्य बलों के संयुक्त आगजनी के अभियान में ११ मार्च १४ मार्च और १६ मार्च को तबाह कर दिए गए. इस दौरान और इसके बाद भी इन इलाकों की नाकेबंदी कर दी गयी. सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तक के जाने पर रोक लगा दी गयी. लगातार माओवादियों के साथ मुठभेढ़ की भ्रामक खबर फैलाई जाती रही ताकि इस तबाही को अंजाम दिया जा सके और आग बुझने व राख उड़ने के साथ वह सब कुछ दफ्न हो जाए जो उत्पात के तौर पर यहाँ किया गया.

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कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हम किसी तरह इन गाँवों तक पहुंचने में सफल हुए. तब स्वामी अग्निवेश के रोके जाने और उन पर हमले किए जाने की खबरे लगातार आ रही थी, हमारे मोबाइल के मैसेज बाक्स में. बाद में उन्हें दलील दी गयी कि जंगल में भारी मुठभेड़ चल रही है लिहाजा किसी के भी जाने पर मनाही है. जंगल के रास्तों से पूरे एक दिन चलते हुए दूसरी सुबह हम उस गाँव तक पहुंच पाए थे जहाँ सबसे ज्यादा घरों को जलाया गया था, यह था तारमेटला. इस पूरे एक दिन और एक रात हमारे पास कोई खबर नहीं पहुंची. अलबत्ता जंगलों के बीच एक गाँव में जहाँ हम रुके वहाँ रेडियो के जरिये हमे पता चला कि स्वामी अग्निवेश और कई पत्रकारों के ऊपर अंडे फेंके गए और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया गया. जंगल के इन इलाकों में रेडियो के अलावा संचार का कोई स्रोत नहीं था. एकतरफा संचार, जो आपको खबरें दे सकता है आपकी खबर नहीं ले सकता, जो अपने रोमांटिक गीतों के बीच उनके रुदन के स्वरों को दबा देता है. दिल्ली से लेकर दुनिया भर की तमाम खबरों से ये आदिवासी इसी रेडियो के जरिये भिज्ञ थे और दिल्ली से लेकर दुनिया भर के तमाम लोग अपनी तमाम तकनीकों के साथ इनकी खबरों से अनभिज्ञ. इन इलाकों में सब कुछ एकतरफा ही था, सुरक्षा भी जो सरकार ने भारी सैन्य बलों की तैनाती के साथ दे रखी थी. अब हम उन असुरक्षित गाँवों से होकर गुजर रहे थे जिसे प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े खतरे के रूप में इंगित करते हैं. ये माओवादियों की जनताना सरकार के गाँव थे. जिसे गाँव के लोग इस रूप में सुरक्षित मान रहे थे कि दुश्मन यानि कि सैन्य बल यहाँ कभी नहीं आ सकते. माओवादी यहाँ १९८० में पहली बार आये थे, शायद १९४७ से १९८० का लम्बा समय यहाँ के आदिवासियों ने भारतीय राज्य के आश और इंतज़ार में गुज़ारे थे.


जंगल की अंधेरी रातों के बीच गाँव होने का मतलब था, किसी सोलर लाइट की रोशनी, किसी बकरी की मिमियाहट, किसी मुर्गे के पंखों की फड़फड़ाहट. हम अपने रास्ते के दौरान कई गाँवों में रुके जो गोंडी आदिवासियों के मुरिया, कोया, राऊत समुदाय के गाँव होते थे. गाँव के किसी कोने पर खड़े होकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता कि गाँव में कितने घर हैं. वे खूबसूरत ऊची तिकोनी झोपडियों के बने होते और उनकी दीवालें लकड़ियों से बनाई हुई होती. घर काफी दूर-दूर तक बिखरे हुए होते और हर गाँव के अंत में प्रायः किसी माओवादी नेता या माओवादी सदस्य की शहादत के स्तूपम बने होते. लाल रंगों के स्तूपम, जिनमे शहीद होने वाले व्यक्तियों के नाम और उनके लिये सलाम के नारे होते. एक गाँव से गुजरते हुए हमने देखा कि माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो चेराकुरी राजकुमार आज़ाद का एक बड़ा स्तूपम बनाया गया था जिसे गाँव वालों ने मिलकर अभी हाल में ही तैयार किया था और उसके आसपास निर्माण प्रक्रिया के दौरान प्रयोग की गयी लकड़ियां अभी भी बिखरी हुई थी. उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में सम्बोधित करते हुए लाल सलाम के नारे लिखे गये थे. आदिवासियों के इन गाँवों में यह एक परम्परा सी बन गयी है जिसमे गाँव के लोग शहादत के स्तूपम बनाते हैं और उसे संरक्षित भी करते है.

इन रास्तों से गुजरते हुए हमने कई कहानियां सुनी, वे कहानियाँ जो वर्षों पहले बीत चुकी हैं, कुछ अफसोसों के साथ. वो कहानियां जिनमे गांव लुटने के बाद फिर संवर चुके हैं, कहानियां जिनमे हत्याओं की दहशत और पीड़ा लोगों के चेहरे से उतर चुकी है और वे कहानिया भी जो कुछ बुजुर्गों की आंखों में अब भी बची हुई हैं, किसी पुरानी शिकार यात्रा की याद की तरह. कुंजाम बुधरी के पास बीते पैसठ सालों के किस्से हैं पर हमारे पास वक्त ही नहीं. देवा अपने २५ साल के नौजवान बेटे की हत्या को आधा ही बता पाते हैं....बाकी में खामोशी है. सोड़ी दीपक को अपनी उम्र का पता नहीं वे खुद को आपके सामने पेश करते हैं और कहते हैं आप खुद ही देख लो. गाँव के बच्चे आपको अचकचाई नजरों से देख रहे होते हैं और आपके तौर तरीकों पर हस रहे होते हैं.

उस सुबह हम ताड़मेटला गाँव में थे जहाँ बस घरों के दीवालों की मौजूदगी थी और आगजनी के कारण उन पर कालिख लिपट गयी थी. यह गोंडी आदिवासियों के मुरिया समुदाय का गाँव है. सोड़ी भीमा अपने जले हुए घर की लकड़ियां इकट्ठा कर रहे थे. हमे देखकर वे थोड़ी देर ठिठक गये, चुप रहे और फिर से अपने काम में जुट गये. हमने उनसे बात करने का प्रयास किया और वे अपने जले हुए घर की तरफ इशार करते हुए गोंडी मे देर तक कुछ बोलते रहे. उन्होंने हमे इशारा करते हुए घर के अंदर बुलाया, अंदर का मतलब उन जली हुई लकड़ियों और राख के ढेरों से था जिनके चारो तरफ दीवालों के महज निशान ही बचे हुए थे. जहाँ कुछ जले हुए बर्तन थे जो आधे पिघल से गये थे. एक टूटी हुई सायकिल उतनी ही बची थी जितना उसमे जलने के बाद बच जाना चाहिए. सोड़ी भीमा की आवाज कभी तेज तो कभी धीमी हो जाती जैसे उनकी आंखों की त्योरियों में कुछ उबल सा रहा हो. कोई आदमी पाकृतिक आपदाओं से मानसिक तौर पर शायद जल्दी उबर जाता हो पर मानवीय उपद्रव, सरकार की संरक्षण में किया गया उपद्रव, शायद उसमे बदले की भावना ही पैदा करता है. वे गुस्से में लगातार बोलते रहे. पास में खड़े एक व्यक्ति ने हमे हिन्दी में बताने का प्रयास किया भीमा कह रहे थे कि उनका पूरा साल भर का अनाज यहाँ रखा था जो जल गया. वे बता रहे थे कि १६ तारीख की सुबह जब लोग अपने घरों को बुहार रहे थे, जब लोग महुआ बीनने की तैयारी में थे और कुछ तो अभी सोकर उठे भी नहीं थे, ३०० की संख्या में सी.आर.पी.एफ. और कोया कमांडो आये. पहले उन्होंने हवा में फायरिंग की लोग डर के मारे अपने घरों से भागे और वे एक-एक कर गाँव के घरों को जलाते रहे. उन्होंने मेरा भी घर जला दिया आखिर हमारे गाँव वालों ने कोया कमांडो का क्या बिगाड़ा था.


माड़वी जोगी की आंखों में आंसू थे और कुछ भी बोलते हुए उनके होठ कंप रहे थे जैसे वो कोई इल्जाम कुबूल कर रही हो. शायद घरों को जलाने का कारण पूछना ही उनका इल्जाम था. उनके चेहरे पर घाव के निशान कुछ दिन पुराने और बासी से हो गये थे और पूरा चेहरा दर्द से फूल गया था. उनसे बात करते हुए ऐसा लगा जैसे हम फिर से उनके घावों को कुरेद रहे हो और हम ना को जानने के लिये शायद ऐसा कर भी रहे थे. यह उनके घर जलाने और पैसे लूटे जाने के मनाही का अंजाम था. जब घरों को जलाया जाने लगा तो वे जंगल में भागने के बजाय आगजनी का प्रतिकार करने लगी. पहले उन्हें बंदूक के बाटम से पीटा गया, उन्हें धक्के देकर जमीन पर गिरा दिया गया और फिर.....फिर वे चुप हो गई. वह बताने में माड़वी जोगी अक्षम हो गयी जो उनके साथ हुआ था. बाकी की कहानी किसी और को ही बतानी पड़ी कि कैसे उन्हें बगल के झाड़ी में ऊपर की तरफ ले जाया गया और बलात्कार किया गया. कुछ घटनाओं के एहसास एक शब्द में अपनी अहमियत नहीं दे पाते. बीतते दिनों के साथ वे चेहरे पर भी कमजोर से पड़ जाते हैं. एक शब्द को कहते हुए साहस चुक सा जाता है, यह भाषा की नाइंसाफी होती है जो तमाम पीड़ाओं की बयानगी को एक साथ तो रख देती है पर उन तकलीफों को कहीं कमजोर सा बनाती हुई. कई घंटों तक वे वहाँ बेसुध पड़ी रही. पूरे गाँव का हर सख्श अपने ही घर की तबाही से बदहवास और हैरान था बाद में लक्के जो माड़वी जोगी की बहन थी उसने उसे कपड़ा पहनाया और वहाँ से लेकर आयी. अभी तक माड़वी जोगी को न तो कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध हो पायी है और न ही किसी तरह की रिपोर्ट दर्ज की गयी.

इस गाँव से माड़वी आयता और माड़वी अंदा दो लोगों को सैन्य बल साथ लेकर गये तब से अब तक उनका कोई पता नहीं चला है. ९०० की आबादी वाले इस गाँव में कुल १५० के आसपास ही लोग हमे दिख रहे थे बाकी जंगलों में इधर-उधर चले गये हैं. शायद वे अब तक लौट आये हों या शायद न लौटने का इरादा बना लिया हो. ताड़मेटला गाँव में सरकारी राहत के तौर पर कुछ चावल भेज दिया गया है. इस चावल के सहारे इन आदिवासियों को अपनी भूख मिटानी है, अपना क्रोध मिटाना है और भुलाना है अपना पूरा का पूरा दर्द भी. ६ साल की बच्ची मड़वी भीमे तक को पीटा गया हम गाँव में उसकी तलाश कर रहे थे पर वह नहीं मिल सकी. लोगों ने बताया कि उसे सिर्फ इसलिए पीटा गया कि वह अकेली घर के बाहर खड़ी होकर रो रही थी. इसके पहले भी सलवा-जुडुम द्वारा २००९ में ताड़मेटला के कुछ घरों में आग लगाई जा चुकी है. कुछ लोग फिर से अपने घरों को बनाने के बारे में सोच रहे हैं और कुछ जिंदा रहने के लिए भूख की जरूरतों के बारे में. गाँव के बीचोबीच गाँव वालों के सहयोग से माओवादियों ने एक तालाब बनवाया है और सरकार ने इनकी झोपड़ियों के लिये आग, आखिर इन्हें किधर कूदना चाहिये. सोड़ी भीमा, गोंचे भीमा, मिड़ियम आयता, ताती अड़मा, एलमा देवा, लेकम उंगा ये सब इमली के एक पेड़ के नीचे इकट्ठा होकर शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे थे. एस.डी.एम. आकर जा चुके हैं उन्होंने लिस्ट बनाने को कहा है और यह भी कि वे नुकसान की पूरी भरपाई करेंगे. भरपाई पीड़ाओं की, दुखों की, त्रासदी की तरह बीत रहे समय की और उसकी भी जो माड़वी जोगी के साथ हुआ.

मोरपल्ली गाँव के ३३ घरों को ११ मार्च को ही जला दिया गया. इन तीन गाँवों को जलाने की शुरुआत इसी गाँव से हुई. गाँवों

में लगाई गयी आग और जले हुए घरों की शक्ल के अलावा भी इसकी कुछ अलग कहानी है. ११ मार्च की सुबह पहले इस गाँव को लूटा गया. आदिवासी समाज में लुटने के लिये बत्तखे होती हैं, बकरियाँ होती हैं और मुर्गे इसके अलावा थोड़े बहुत पैसे जिसे वे अपने साथ ही लेकर चलते हैं. यह लूट कर जब सलवा-जुडुम (कोया कमांडो) के लोग जा रहे थे तो गाँव से १ किमी. की दूरी पर माओवादियों ने इस लूट के विरुद्ध उन पर हमला कर दिया. गाँव के लोगों ने बताया कि इस कुछ घंटे की कार्यवाही के दौरान ३ कोया कमांडो मारे गये और ९ धायल हुए. इस घटना में सुदर्शन नाम से एक माओवादी की भी मौत हुई और दो माओवादी जिसमे एक महिला भी शामिल है घायल हुए. तेरह मार्च के अखबारों में ३२ माओवादियों के मारे जाने की यही खबर थी. एक माओवादी के मारे जाने को ३२ की संख्या बताई गयी. गाँव के लोगों का कहना था कि मारे गये कोया कमांडो में एक महत्वपूर्ण लीडर भी मारा गया, इसके बाद लगातार इन गाँवों पर हमले किए गये. ३२ माओवादियों के मारे जाने की खबर और लगातार चल रही मुठभेढ़ की भ्रामकता ने इस इलाके की नाकेबंदी करने में मदद की ताकि गाँवों में आगजनी और तबाही को अंजाम दिया जा सके. चिंतलनार के निकट पोलमपल्ली गाँव में लगातार हवाई फायरिंग की जाती रही ताकि यह दर्शाया जा सके कि मुठभेड़ चल रही है और पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस बिना पर रोक दिया गया यहाँ तक कि स्थानीय प्रशासन को भी. किसी भी तरह की राहत सामाग्री नहीं पहुंचाई जा सकी. यह बताया गया कि माओवादियों ने आगे के रास्तों पर बम बिछा रखा है. मोरपल्ली में एमला गुडे और माडवी गुडे के साथ बलात्कार किया गया. माड़वी सुले जो आगजनी के भय से भागकर एक इमली के पेड़ पर चढ़ गये थे उन्हें पेड़ पर ही गोली मार दी गयी. अंदाजा लगाया जा सकता है एक चिड़िया के शिकार की तरह रहा होगा यह वाकिया. इसके पहले २००७ में मोरपल्ली के ५० से अधिक घरों को सलवा-जुडुम द्वारा जलाया गया था और अब जबकि गाँव के लोग फिर से जीने की मूलभूत जरूरतों को जुटा चुके थे और जुटा रहे थे इन्हें सलवा-जुडुम की तबाही का एक और मंजर देखना पड़ा. एलमा गुडे की उम्र तीस साल है. जब उनको पकड़ कर उनके साथ बलात्कार किया गया तो वे महुवा बीन कर लौट रही थी. माड़वी लके को उनके पिता माड़वी जोगा और भाई माड़वी भीमा के साथ चिंतलनार स्टेशन ले जाया गया. इसका महज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब लके के साथ बलात्कार किया जा रहा था तो बगल की कोठरी में भाई और पिता उसकी चीखने की आवाजें सुन रहे थे, बेबस और निःशब्द होकर या शायद भय और विभत्सता में उन्होंने इन चीखती आवाजों को मंजूर कर लिया हो. दूसरी सुबह लके को निरवस्त्र अवस्था में ही पिता और भाई के हाथ सौप दिया गया. जहाँ से गांव तक वह उसी स्थिति में आने को मजबूर थी. गाँव के लोग हमे आगजनी करने वाले लोगों के नाम गिना रहे थे और उनके गाँव भी. दण्डकारन्य के इस इलाके में दूर-दूर तक फैले आदिवासी गाँवों में सब एक दूसरे को जानते हैं. इन गाँवों तक पहुंचने का कोई एक रास्ता नहीं होता, दिशाएं होती हैं और सूखी हुई पत्तियों के नीचे एक लकीर जिनके सहारे जंगल की झाड़ियां और छोटे पहाड़ों को पार करते हुए दूसरे गाँव तक पहुंचा जा सकता है. यह एक कठिन डगर है किसी बाहरी व्यक्ति के पहुंचने पर ग्राम कमेटी के लोग उसकी तफ्सीस करते हैं और लगातार संदिग्ध निगाहों से उसे परखते हैं. रात के वक्त कुछ टार्चें आपके नजदीक आती हैं, अपने कंधों पर रेडियो टांगे एक बच्चे को गोंद में उठाये और वे आपसे वाकिफ होते हैं. दरअसल यह माओवादियों की इंटेलीजेंसिया है जो बच्चे के रूप में, किसी बूढ़े के रूप में या फिर किसी नवजवान के रूप में आपसे मुलाकात करती है. गाँवों में घूमते हुए हमने माओवादियों के वे पर्चे भी प्राप्त किये जिसमे इस घटना की निंदा की गयी थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से इसे उजागर करने की अपील की गयी थी. तीन गाँवों का जिक्र करते हुए वह चौथा गाँव छूट जाता है जहाँ से बाड़से भीमा को लाकर तीमापुरम में १३ मार्च को काट दिया गया था. उन्हें पुल्लमपाड़ से लाया गया था. मोरपल्ली में आगजनी के वे चश्मदीद गवाह थे और सलवा-जुडुम के पूरी तरह से खिलाफ. लिहाजा उन्हें सिर्फ जिंदगी से ही हाथ नहीं धोना पड़ा बल्कि उनके अंगों को विभत्स तरीके से काटा गया. बाड़से भीमा की हत्या के पहले ही गाँव के लोग घर छोड़कर भाग गये और ३३ घरों को कोया कमांडो ने आग के हवाले कर दिया. मिसमा गाँव के करतम दुला, चरकाम गाँव के वंजम देवा, जगन्ना गुड़ा गाँव से रमेश और न जाने कितने नामों को गाँव वाले बता रहे थे, ये उनके नाम थे जो आगजनी करने में शामिल थे. तारमेटला के अलावा मोरपल्ली और तीमापुरम में अभी तक कोई राहत सामाग्री सरकार द्वारा नहीं पहुंचाई जा सकी. गाँव के लोगों ने बताया कि माओवादियों की जनताना सरकार की तरफ से हर घर को १००० रूपए और कुछ अनाज तेल दिया गया है जिसके सहारे वे पेड़ों के नीचे अपना पेट भरते हुए, अपने जले हुए घरों को फिर से ठीक करने को सोच रहे हैं.

जब राज्य अपनी बनायी हुई संस्थाओं यहाँ तक कि सर्वोच्च संस्थाओं से मुंह मोड़ ले, उसके आदेशों की अवहेलना करे तो शायद लोगों के बीच उसकी वैधता खो ही जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों सलवा-जुडुम को बंद
करने का आदेश दिया पर वह जारी है. सर्वोच्च न्यायालय ने सैन्य बलों के कैम्प के रूप में प्रयुक्त किए जा रहे स्कूलों को खाली करने का आदेश दिया उसे अभी तक लागू नही किया गया. माओवादियों के उन्मूलन के लिए ९० के दशक से अब तक कई प्रयोग किए जा चुके हैं जो विफल रहे हैं. जन जागरण के नाम पर, शांति अभियानों के नाम पर. पुलिस यहाँ स्कूल अध्यापक बन कर आती, माओवादी दलम की शक्ल में वह घूमती और आदिवासियों के साथ जमीन पर बैठकर माओवादियों जैसा व्यवहार करती. पर यह सब, कुछ दिन ही चल सका बाद में गाँव वालों द्वारा उन्हें पहचान लिया गया और पुलिस को वहाँ से भागना पड़ा. दण्डकारन्य एक नाटक के मंच सा हो गया जहाँ सबकुछ वास्तविक रूप में खेला जा रहा है. हत्या के बाद वहाँ कोई पात्र उठकर अपने कपड़े नहीं बदलता, घटनाओं की जगह और शक्ल बदल जाती है हर बार वे और बढ़ जाती हैं. एक कहानी जो लंबे समय से किसी खेल की तरह आदिवासियों के साथ खेली जा रही है. साल, दिन और मौसम बदल रहे हैं, जिंदगियां यहाँ ठहर सी गयी हैं, पुरानी दहशतों को याद करती हुई और नये दहशतों के इंतजार में.
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