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08 मार्च 2014

हिंदुत्व के नए सेवक

अनिल चमड़िया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और संस्थाओं और उनकी बनाई पार्टी भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में जनसंघ) के इतिहास की जो थोड़ी भी जानकारी रखते हैं, वे जानते हैं कि उनकी दलितों समेत पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उन्मादी कार्रवाइयां हर मौके पर देखी गई हैं। अस्सी के दशक में गुजरात में दो बार आरक्षण-विरोधी उग्र आंदोलन हुए और मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार को दो बार आसानी से पराजित किया गया।

बिहार में कर्पूरी ठाकुर के शासनकाल में 1978 में मुंगेरीलाल आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण का जबर्दस्त विरोध जनता पार्टी के घटक के रूप में जनसंघ ने किया और सरकार गिरा दी। उत्तर प्रदेश में भी इसे दोहराया गया। कर्पूरी ठाकुर को हटा कर एक दलित जाति के रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बना कर आरक्षण-विरोधी सरकार बनाई गई। संसदीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पिछड़ों के बीच जातिवाद और पिछड़ा बनाम दलित की एक रेखा खींचने में मुख्यत: सवर्ण आधार वाली पार्टियों को महारत हासिल रही है।

पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाली पिछड़ी जातियों को विशेष अवसर देने का जब कभी प्रयास किया गया तो उसके विरोध के लिए हिंदुत्व का ही सहारा लिया गया और मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववाद के हमले तेज हुए। अस्सी के दशक में गुजरात से लेकर बिहार के जमशेदपुर दंगे को इस सिलसिले में याद किया जा सकता है। पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसलों और अल्पसंख्यक-विरोधीहमलों का एक सीधा संबंध है। 1990 के दशक में भी केंद्रीय सेवाओं में वीपी मंडल आयोग की अनुंशसाओं के अनुसार पिछड़ी जातियों को सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला हुआ तो लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली और विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

आरक्षण-विरोध के दौरान जो उग्रता पैदा हुई उसे 1980 के दशक में राम मंदिर अभियान की तरफ मोड़ा गया और उसे संचालित करने के लिए संघ ने कई नए संगठन बनाए। 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में हिंसक आरक्षण-विरोध और रथयात्रा के उन्मादी माहौल में मुसलमानों के खिलाफ देश भर में हमले हुए। संघ के निर्माण के इतिहास पर नजर डालें तो वह दलितों के राजनीतिक उभार की प्रतिक्रिया में ही बना था। महाराष्ट्र में डॉ भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हुए दलित आंदोलन की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र के कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।

1990 के बाद पिछड़ी जातियों के लिए विशेष अवसर के खिलाफ हिंदुत्ववादी विरोध से एक स्थिति यह पैदा हुई कि पिछड़ी और दलित जातियों में विशेष अवसर का समर्थन करते हुए सत्ता का नेतृत्व करने का एक तरह का भरोसा विकसित हुआ। तब भाजपा ने अपनी रणनीति बदल ली, जो बाद में संघ के विचारक गोविंदाचार्य के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के रूप में लोकप्रिय हुई। संघ की यह स्पष्ट राय बन रही थी कि पिछड़ी जातियों के भीतर ही एक उग्र हिंदुत्ववाद को विकसित किया जाए और दूसरी तरफ उनके भीतर सत्ता का नेतृत्व करने की जिस महत्त्वाकांक्षा को सामाजिक न्याय के नेताओं द्वारा लगातार विकसित किया जा रहा है उसे एक पड़ाव पर हिंदुत्व से मिलाने की रणनीति अख्यितार की जाए।

अगर नब्बे के दशक के बाद की प्रमुख घटनाओं को याद करें तो एक पिछड़ी जाति से आए कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार के वायदे के बावजूद अयोध्या में बाबरी मस्जिद को सुरक्षा नहीं मिल सकी।
इसी कड़ी में पिछड़ी जातियों के नेताओं में विनय कटियार से लेकर उमा भारती की गतिविधियों और बयानों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि वे कैसे उग्र हिंदुत्ववाद के सबसे बड़े प्रतिनिधि के तौर पर सामने आए। इस उग्रता का सिरा गुजरात में मिलता है जब नरेंद्र मोदी की सरपरस्ती में 2002 में मुसलिम विरोधी हमले हुए। उग्र हिंदुत्ववाद का एक नया खूंखार चेहरा सामने आया।

यहां इन तथ्यों को भी देख लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व-काल में जिन हमलों की शुरुआत हुई उनमें मारे गए और गिरफ्तार हुए लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि क्या रही है? एक शोध से ये तथ्य सामने आए हैं कि गुजरात में 1 मार्च 2002 से 4 जून 2002 के दौरान हुई गिरफ्तारियों में 2,945 लोग अमदाबाद के तैंतीस थाना क्षेत्रों से थे। इनमें जिन 1577 हिंदुओं को गिरफ्तार बताया गया उनमें 747 केवल अनुसूचित जाति के थे और पिछड़ों की तादाद 797 थी। ब्राह्मण और बनिया केवल दो-दो और पटेल जाति के उन्नीस लोग थे।

गुजरात प्रयोग के बाद संघ को लगा कि कल्याण सिंह, उमा भारती, लालकृष्ण आडवाणी से भी ज्यादा उग्र एक पिछड़ी जाति का नेतृत्व उसके सपनों को साकार करने के लिए उसके हाथों में आ गया है। इसीलिए यह हैरानी नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने वैचारिक संगठन होने का जो परदा डाल रखा था, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए उसे उठा दिया।

संघ अपने वैचारिक धरालत पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की सत्ता और संसद को दोयम दर्जे का समझता है। उसके सांगठनिक ढांचे में भी लोकतांत्रिक चुनाव की कोई परंपरा नहीं रही है। कोई भी राजनीतिक संगठन अपने ढांचागत चरित्र के अनुरूप ही शासन व्यवस्था का ढांचा विकसित करना चाहता है और संघ भी एक राजनीतिक संगठन है। भले वह खुद के सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन होने के दावे को तकनीकी स्तर पर सही ठहरा लेता है क्योंकि संघ के नाम से चुनाव नहीं लड़ा जाता है।

संसदीय राजनीति में किसी वर्ग, धर्म या जाति के प्रतिनिधित्व का विश्लेषण संख्या के आधार पर तो किया जा सकता है लेकिन संख्या को आधार बना कर विचारधारात्मक विकास के विश्लेषण का तरीका सही नहीं हो सकता। 1984 में हुए सिख-विरोधी हमलों के बाद भाजपा को लोकसभा की महज दो सीटों पर जीत मिलीं। लेकिन संसदीय इतिहास में हिंदुत्ववादी राजनीति का वह चरम रूप था जब कांग्रेस को दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर कामयाबी मिली। हिंदुत्ववादी राजनीति का प्रतिनिधित्व पार्टी के रूप में बदलता रहा है और संघ उसके साथ रहा है। 1984 का विश्लेषण यह होना चाहिए कि उसने संसदीय राजनीति में हमले और उग्र हिंदुत्ववाद का एक रिश्ता विकसित कर लिया। मंडल आयोग की सिफारिशों से आए राजनीतिक उभार ने यह चेतना जगाई कि देश की सत्ता की बागडोर पिछड़ों को मिलनी चाहिए। यह राजनीति तो चलाई पिछड़ी और दलित जातियों के खंडों में बंटे नेतृत्व ने, लेकिन उसे भुनाने की योजना संघ ने तैयार की।

जो एजेंडा संसदीय राजनीति में तात्कालिक फायदे के लिए तैयार किया जाता है उसका दूरगामी इस्तेमाल बराबर विचारधारात्मक संगठन ही कर सकते हैं। मंडल और कमंडल का नरेंद्र मोदी के रूप में मिश्रण संघ के हाथों में देखा जा रहा है। एक महत्त्वपूर्ण बात समझने की है कि मंडल आयोग के बाद संघ की सोशल इंजीनियरिंग में यह नीति समाहित है कि पूरे विचारधारात्मक ढांचे में बिना किसी छेड़छाड़ के प्रतिनिधित्व की गुंजाइश बनाना क्योंकि उसे विचारधारा के विस्तार के लिए जरूरी माना गया। प्रतिनिधित्व महज प्रतिनिधित्व होता है और वह उस जमात के काम तभी आ सकता है जब विचारधारात्मक ढांचे में उसकी पर्याप्त जगह हो।

नरेंद्र मोदी भाजपा में बतौर पिछड़े वर्ग सत्ता-शीर्ष पर भी जा सकते हैं लेकिन वे विचारधारा के स्तर पर हिंदुत्ववादी हैं। गुजरात में मोदी के शासनकाल का अध्ययन क्या बताता है? गुजरात में दंगों के लिए दलितों-पिछड़ों की गिरफ्तारी तो इसका एक उदाहरण है। दूसरा उदाहरण यह भी है कि देश में सबसे कम न्यूनतम मजदूरी गुजरात में ही दी जाती है।

दलित और पिछड़ी जातियों में जाति आधारित राजनीति करने वाले नेताओं के भाजपा की तरफ जाने के कई उदाहरण मिल रहे हैं। मंडल आयोग के बहाने पूरे उभार को समानता के विचार विकसित करने के लिए नहीं बल्कि एक दूसरे के मुकाबले जातियों के भीतर वर्चस्व स्थापित करने की होड़ दिखाई देती है। जिन जातियों ने मंडल उभार में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताकत हासिल की, उन्हें हिंदुत्व के रूप में वर्चस्व में हिस्सा चाहिए। जिन जातियों की सत्ता-शीर्ष पर पहुंच नहीं हो पाई है उन जातियों के प्रतिनिधियों द्वारा भी यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि हिंदुत्व के रास्ते सत्ता पर वर्चस्व में हिस्सेदारी हासिल की जा सकती है।

सन 1990 के बाद वर्चस्ववादियों की राजनीति ही मुख्यधारा के रूप में उपस्थित होती चली गई। इसका एक कारण सोवियत संघ का विघटन भी है। उसे समाजवाद की विचारधारा का मनोबल समझा जाता था। विचारधाराएं ही मुख्य होती हैं। समाजवादी और वामपंथी विचारों से प्रभावित पार्टियां और आंदोलन कमजोर पड़ते चले गए। ऐसे ही समय में भूमंडलीकरण की परियोजना के जरिए समाज पर वर्चस्व रखने वाली ताकतों का एक आक्रामक अभियान शुरू हुआ। देशों, सामाजिक समूहों, लोकतांत्रिक संस्थाओं आदि पर बेफ्रिक होकर हमलों के अभियान चले।

भारत में भी यह दौर चला। उस दौर में संघ को वर्चस्ववादियों को आक्रामक रूप में संगठित करने का अनुकूल समय मिला। भूमंडलीकरण की पूरी परियोजना सामाजिक स्तर पर भी वर्चस्ववाद को विस्तार देने में सहायक हुई। दुर्घटना यह हुई कि समाजवादी और वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में सक्रिय पार्टियों और संगठनों ने भी उस परियोजना को अपरिहार्य मान लिया। संसदीय राजनीति का मुख्य स्वर वर्चस्ववाद और उसकी विचारधारा की तरफ मुड़ गया। इसीलिए कल की दमित और पिछड़ी जातियों के बीच का महत्त्वाकांक्षी नेतृत्व अपने सामने किसी किस्म की चुनौती और खतरा महसूस नहीं कर रहा है और धड़ल्ले से वर्चस्ववादी विचारधारा पर आधारित पार्टियों के नेतृत्व को स्वीकार कर रहा है।

अगर विश्लेषण करें तो तमाम स्तरों पर जो वंचित थे, गैर-बराबरी के शिकार थे और समानता की बात करते थे उनके बीच में वर्चस्ववादी विचारधारा के प्रभाव के कारण आक्रामकता दिखती है। यह राजनीति वंचितों को अधिकार देने के बजाय राहत और लालच देने को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है।
                                                                    (मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित)

05 फ़रवरी 2014

नया दल बनने का आधार



अनिल चमड़िया
नौवें दशक यानी 1990 से पहले के साल पुरानी राजनीति के बिखराव और नई राजनीति के बनने के थे। इतिहास में एक लम्हा ऐसा आता है जब राजनीतिक बिखराव और निर्माण का नया स्वरूप तैयार होता है। सोवियत संघ के टूटने का दुनिया भर में कम्युनिस्ट विचारधारा और उसके संगठनों पर सीधा असर तो हुआ ही, तमाम बने-बनाए राजनीतिक स्वरूप भी उससे प्रभावित हुए। भारत की पूरी राजनीतिक प्रक्रिया इससे प्रभावित हुई। इसे दो तरह की स्थितियों के रूप में भी देख सकते हैं। एक तो भ्रष्टाचार के खिलाफ संसदीय पार्टियों में बिखराव और निर्माण की प्रक्रिया थी। रक्षा मंत्रालय के बोफर्स तोप सौदे में दलाली के मुद्दे को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उठाया और भारत के संसदीय इतिहास में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाले राजीव गांधी की कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। जनता दल संसद में ही अल्पमत में नहीं था, बल्कि जनता दल के भीतर विश्वनाथ प्रताप सिंह भी देवीलाल के मुकाबले अल्पमत में थे, लेकिन ऐसी स्थिति में भी भाजपा और वामपंथी पार्टियों पर उन्हें समर्थन देने का एक जन-दबाव था। उनकी सरकार तब तक भ्रष्टाचार-विरोधी भावना के साथ केंद्र में बनी रही जब तक कि उन्होंने कुछ बुनियादी राजनीतिक मुद््दों को नहीं उठाया। इनमें मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना भी शामिल है।
देश के बड़े हिस्से में प्रभाव रखने वाला नक्सलवादी संगठन संसदीय राजनीति में प्रवेश कर रहा था। उसके नेतृत्व में देश भर में विभिन्न तरह के समूहों और समुदायों में आंदोलन चलाने वाले संगठनों का मोर्चा बिखर रहा था। तब उस संगठन के एक बड़े नेता ने हैरान कर देने वाला यह सुझाव दिया कि उक्त संगठन को भंग कर देना चाहिए और विभिन्न तरह के समूहों और समुदायों के आंदोलनों के साथ जुड़ जाना चाहिए। एक नई राजनीति के निर्माण के लिए विभिन्न स्तरों पर होने वाले आंदोलनों के साथ ही उक्त संगठन के नेता और कार्यकर्ता अपना रिश्ता जोड़ लें। यह इस देश और संगठन की सीमाओं के संदर्भ में एक राजनीतिक दूरदृष्टि थी। यह बिखराव नहीं, एक नए निर्माण की प्रक्रिया से जुड़ा कार्यकलाप था, जो कि बेहद जटिल था और जिसके पूरा होने की संभावनाओं को देख पाना लगभग असंभव था।
दोनों ही प्रक्रियाओं के आगे नहीं बढ़ पाने के बाद की स्थितियां हमारे सामने हैं। पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस की अल्पमत सरकार ने भूमंडलीकरण की परियोजना को स्वीकार किया। लेकिन उसके साथ उनकी यह घोषणा महत्त्वपूर्ण थी कि भूमंडलीकरण का विरोध संसदीय राजनीति करने वाली कोई पार्टी सत्ता में आकर नहीं कर सकती। जैसे विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख ने कहा कि भूमंडलीकरण दुनिया भर में लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप के साथ नहीं चल सकता है। संसदीय व्यवस्था की बुनियादी शर्त विपक्ष का मौजूदा होना है। लेकिन राव की विपक्ष के खत्म होने की घोषणा यह भी स्पष्ट कर रही थी कि संसदीय राजनीति में जो विपक्ष की भूमिका दिखेगी, वे केवल दृश्य होंगे जो कैमरे के काम सकते हैं। मसलन सड़कों पर जुलूस, प्रदर्शन, सदनों में हो-हल्ला आदि विपक्ष के कार्यक्रमों का एक ढर्रा दिखेगा। वे नीतियों के स्तर पर प्रभावित करने से दूर होंगे। बाद के दौर में तो यह सामने आया कि मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी वास्तव में भूमंडलीकरण की नीतियों की विरोधी होने के बजाय नई आर्थिक नीतियों को और हमलावर तरीके से लागू करने के लिए सत्ताधारी पार्टी को कोसती रही है। एक तरह से सभी राजनीतिक दलों के दो चेहरे हो गए। आखिरकार दो मुख्य पार्टियों के रूप में भूमंडलीकरण समर्थक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही सामने नजर आती हैं। जो सत्ता में होता है उसे लोकतांत्रिक और आम आदमी के पक्ष में दिखने वाले कुछेक कार्यक्रमों का सहारा लेना पड़ता है और जो विपक्ष में होता है उसे नीतियों के बजाय भावनाओं का उत्पाद थमा कर भीड़ जुटाने और विपक्ष में होने का दृश्य बनाना होता है। मजे की बात यह भी है कि यह राजनीतिक प्रक्रिया यहां तक पहुंची कि भाजपा और कांग्रेस के एकीकरण का भी सुझाव दिया जाने लगा। राजनीतिक प्रक्रिया खंडों में नहीं बंटी होती है। वह एक लंबी कड़ी होती है। नीतियों का संबंध राजनीतिक मूल्यों के उत्पाद या विरासत पर प्रहार और परंपराओं को मजबूत करने और खत्म करने के परिणाम से होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि विपरीत नीतियों से अपने राजनीतिक मूल्यों और राजनीतिक प्रक्रिया को बचाए रखा जा सकता है। विपरीत नीतियों ने बेहद सूक्ष्म स्तर पर संसदीय संस्थाओं और उनके आचार-व्यवहार को बुरी तरह प्रभावित किया। मानवीय मूल्यों का राजनीति से लगभग निष्कासन हुआ।
एक उदाहरण इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता रह चुके हेमेंद्र नारायण ने दिया। उन्होंने मिजोरम के पांचवीं बार मुख्यमंत्री का एक पुराना बयान सुनाया। मिजोरम में लगभग बीस हजार की आबादी वाली ब्रु जाति को उस राज्य से बेदखल कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने उनके बारे में कहा कि उनकी तो भगवान भी मदद नहीं कर सकता है। यानी संसदीय राजनीति में जो समूह अपने संख्याबल से संसदीय पार्टियों की सत्ता में भागीदारी को प्रभावित नहीं कर सकता हो वह राजनीतिक सरोकार के दायरे से ही बाहर हो गया। दूसरा उदाहरण हाल के दिनों में देखने को मिला, जब लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड में किसी को सजा नहीं होने की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए तीस लाख लोगों के हस्ताक्षर के साथ हजारों लोग देश के राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे। राष्ट्रपति से मिलने का उन्हें मौका नहीं मिला। राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है, उनके पद की गरिमा का बखान संसदीय व्यवस्था में किया जाता रहा है। लेकिन राजनीति में मानवीय मूल्यों के क्षरण को समझने के लिए इस उदाहरण को देखा जा सकता है।

आमतौर पर यह देखने को मिलेगा कि लोगों के पत्रों के जवाब सत्ता संस्थानों से मिलने बंद होते चले गए। जनप्रतिनिधि तक के पत्रों और संसद में पूछे गए सवालों के साथ भी यही सलूक होता रहा है। शिकायतों की सुनवाई लगभग बंद हो गई है। यानी संसदीय व्यवस्था को तर्कसंगत बनाए रखने के जो छोटे-छोटे औजार थे वे सभी भोथरे हो गए। लोगों के साथ राजनीतिक पार्टियों के व्यवहार का आकलन करें। पार्टियों की सक्रियता का दायरा सिमटता गया है। संसदीय राजनीति में अपने वजूद को बनाए रखने के लिए समाज के एक हिस्से या कुछेक हिस्सों की भीड़ का किसी हद तक समर्थन हासिल करने का मकसद पार्टियों के भीतर विचार के रूप में जम गया। दूसरी तरफ गैरसरकारी संगठनों का एक ऐसा ढांचा विकसित हुआ, जो सीमित दायरों में रही अपनी सक्रियता से आगे बढ़ कर फैल गया। वे संगठन राजनीतिक प्रक्रियाओं से निकले कार्यकर्ताओं को वेतनभोगी सेवक के रूप में दिखने लगे। उन्हें नई आर्थिक नीतियों के लाभ के दायरे में ला दिया गया। राजनीतिक पार्टियों का लोगों के साथ इस स्तर का कटाव हुआ कि उनके बरक्स गैरसरकारी संगठनों की वैधता स्थापित हुई। पार्टियों में भी उन संगठनों के साथ जुड़ने और उनके साथ दिख कर अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने की एक प्रतिस्पर्धा पैदा हो गई। यहां तक कि सत्ताधारी कांग्रेस को अपना आम आदमी का हितैषी चेहरा दिखाने के लिए ऐसे ही संगठनों की सलाहकार परिषद बनानी पड़ी। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि राजनीतिक प्रक्रिया के बिखरने की स्थिति में पार्टियों की अपनी नेतृत्व-क्षमता चुकती गई। वे सभी पिछलग्गू बनने की होड़ में खड़ी हो गर्इं। इस संकुचन को लगातार उनके अप्रासंगिक होने के तौर पर देखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर आम आदमी भले राजनीतिक मुहावरे में रहा, लेकिन उसके साथ संवाद के तमाम रास्ते बंद हो गए। अस्सी के दशक में एक नए राजनीतिक निर्माण की जो संभावनाएं दिख रही थीं वे विचारों के स्तर पर घुमड़ती रही हैं। विचार एक अनौपचारिक संगठन के रूप में निर्मित होते रहते हैं। उनकी पहचान करना और उन्हें एक दिशा में निर्देशित करना ही राजनीतिक कौशल होता है। राजनीतिक कुशलता किसी प्रबंधन संस्थान की डिग्री से नहीं आती। उस पर स्थापित संगठनों का एकाधिकार नहीं होता। जैसे कि दिल्ली में बिल्कुल नए राजनीतिकर्मियों ने नई पार्टी बना कर सत्ता हासिल कर ली।
यह सही है कि राजनीतिक कुशलता दो स्तरों पर दिख सकती है। यानी एक स्तर पर राजनीतिक कौशल यह हो सकता है कि समय की पहचान करके एक विपक्ष का आभास दिया जाए और सत्ता द्वारा पैदा की गई ऊब को दूर करने की कोशिश की जाए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बत्तीस वर्षों से ज्यादा समय से सत्ता पर काबिज वाममोर्चे को सत्ता से बाहर कर दिया। उन्होंने हवाई चप्पल पहन कर वाम के मुकाबले अपने आम आदमी के चेहरे को स्थापित कर लिया। लंबे समय से पश्चिम बंगाल में जो स्थितियां बन रही थीं उन्हें ममता बनर्जी ने विपक्ष की तरफ ले जाने में सफलता हासिल की। आम आदमी पार्टी भी उभरी है और गौर करें कि एक नई पार्टी के बनने की जो अनुकूल स्थितियां विकसित हो रही थीं उन्हें उसने एक संसदीय राह दी। आम आदमी पार्टी के बनने से पहले उसके नेतागण दावा करते रहे कि वे राजनीतिक दल का गठन नहीं करेंगे। स्थितियां और परिस्थितियां ही वास्तविक विपक्ष हैं। इसीलिए आम आदमी पार्टी बनने की पूरी प्रक्रिया पर नजर डालें तो आंदोलन के संस्थापक नेता बाहर निकलते गए, फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा। तकनीकी तौर पर यह गैरसरकारी संगठनों के राजनीतिक एकीकरण का रूप दिख रहा है, लेकिन वह यहीं तक सीमित नहीं है। संसदीय राजनीतिक प्रक्रिया से तमाम स्तरों पर जो ऊब और घुटन पैदा हुई है वह अपने लिए वैचारिक रास्ते की तलाश में है और फिलहाल इस मायने में आम आदमी पार्टी ही अकेली सामने है। उसके साथ प्रतिस्पर्द्धा में कोई नहीं है। नई राजनीति के निर्माण की स्थितियां बनी हैं। ईमानदार शासन की जरूरत, सत्ता की चमक-दमक को ठुकराने, सादगी की संस्कृति को राजनीति में वापस लाने की आम आदमी पार्टी की अपील लोगों को प्रभावित करने में कामयाब हुई है। पिछले पच्चीस सालों में नई पार्टी की जरूरत का अहसास कराने वाली स्थितियां तो बनी हैं, पर इसकी परिवर्तनकारी संभावनाओं को आगे ले जाने के साहस की कमी दिखती है।