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03 अगस्त 2012

मिस्टर शरद यादव दलित-आदिवासियों के संघर्ष को महदूद मत कीजिए

-    दिलीप खान

कांस्टीट्यूशन क्लब में जब अजीत जोगी अपनी बात लगभग ख़त्म कर चुके थे तो शरद यादव मंच पर पहुंचे। बीजापुर में लगभग महीने भर पहले हुए सैन्य जनसंहार की पृष्ठभूमि में आदिवासी समाज और भारतीय लोकतंत्र पर बात की जा रही थी। मंच पर जोगी के अलावा, डी राजा, बी डी शर्मा, हिमांशु कुमार और स्वामी अग्निवेश मौजूद थे। मेरे पहुंचने से पहले नंदनी सुंदर सहित कई और वक्ता अपनी बात रखने के बाद दर्शक दीर्घा में जगह ले चुके थे। जब मैं हॉल में दाख़िल हुआ तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की हत्या के मामले में पहली बार केंद्रीय सरकार से अलग नज़रिया अख़्तियार करने वाली छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी के अजीत जोगी बीजापुर का विवरण दे रहे थे। छत्तीसगढ़ के किसी कांग्रेसी का राजनीतिक बयान इस मामले में लगभग सबको पहले से मालूम था। अजीत जोगी ने मारे गए 17 लोगों का जीवनवृत्त पेश करते हुए कहा कि वे सारे के सारे ग़ैर-नक्सली थे और इसलिए निर्दोष थे। असल में छत्तीसगढ़ में माओवादियों के प्रति रणनीति में मुख्यमंत्री रमण सिंह और (पूर्व) केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम सहित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के तालमेल के बाद छत्तीसगढ़ में विपक्षी कांग्रेस के पास कोई स्पेस नहीं बचता कि वो माओवाद या फिर आदिवासियों की हत्या पर सत्ताधारी भाजपा को घेर सके।
पहली बार कांग्रेस पार्टी में एक दरार दिखी थी और कोत्तागुड़ा-सारकेगुड़ा में मारे गए आदिवासियों को लेकर केंद्र में पार्टी के कई नेताओं के जश्नी रवैये से अलग राज्य कांग्रेस ने स्टैंड लिया। घटना पर खुशी जाहिर करने में गृहमंत्री पी चिदंबरम सबसे आगे थे, जिन्होंने बाद में राज्य कांग्रेस की फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट के बाद कहा था कि अगर घटना में कोई निर्दोष भी मारा गया है तो, आई एम सॉरी! (चिदंबरम ने गेहूं के साथ घुन पिसने वाले अंदाज़ में ये बात कही थी।) यह घटना छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की यह एक तरह से मजबूरी के तौर पर उभरी कि वो आदिवासियों पर राज्य के दमन के विरोध में बयान देकर राजनीतिक बढ़त हासिल करे। अजीत जोगी ने सभागार में इस मसले की भर्त्सना करते हुए अपनी पार्टी और अपने मुख्यंत्रित्व को आदिवासियों के लिए शानदार करार देते हुए वो सब कहा जो एक संसदीय पार्टी के नेता से कोई अपेक्षा कर सकता है। श्रेय लूटने के लिए ही बनी चीज़ है इसे अजीत जोगी ने अपने भाषण में साबित किया।  
उनके बाद डी राजा को बोलना था, लेकिन शरद यादव ने कहा कि उन्हें जल्दी जाना है, इसलिए पहले उन्हें माइक दे दी गई। मेरे और शायद मेरे अलावा और भी कई लोगों की यही जिज्ञासा थी कि आख़िरकार शरद यादव इस मामले पर क्या राजनीतिक स्टैंड लेते हैं? क्या कमेंट करते हैं? इससे ठीक पहले आयोजक ने एक मांग पत्र भी पढ़कर सुनाया था। लेकिन शरद यादव इतिहास पर बोलने लगे, अच्छा बोल रहे थे, लेकिन विषय से दूर बोल रहे थे, सो जाहिर है श्रोताओं में फुसफुसाहट शुरू हुई कि ये गोल-मोल बात कर जाने के चक्कर में हैं। मुझे लगा भूमिका बांध रहे हैं और अब मुद्दे पर आएंगे, तब मुद्दे पर आएंगे। लेकिन, वो असल में आना ही नहीं चाह रहे थे। अलबत्ता बीच-बीच में यह जुमला ज़रूर उछाल रहे थे कि मेरी बात आप सबको बहुत चुभेगी, बहुत गड़ेगी। दलितों-आदिवासियों की नौकरी में भागीदारी, बेहतर जीवन-स्तर पर वो ऐसी बात कह रहे थे जिनसे मेरे अगल-बगल के लगभग सारे लोग सहमत थे, लेकिन मामला फिर वही था कि मुद्दे पर नहीं आ रहे थे। इस वजह से, बीच से दो-एक लोगों ने अनुरोध किया कि मुद्दे पर बोला जाए, तो शरद यादव ने उनमें से एक से पूछा, ‘तुम्हारी जाति क्या है?’ जिस अंदाज़ में शरद यादव ने पूछा वो चौंकाने वाला था। इसी मंच पर शरद यादव ने यह स्थापना दी कि दलितों पर बात करने का अधिकार सिर्फ़ दलितों को और आदिवासियों पर बात करने का अधिकार सिर्फ़ आदिवासियों को है। यह सब इतने अधिकारभाव के साथ शरद यादव कह रहे थे, गोया वो एक साथ दलित और आदिवासी दोनों हों!

लेकिन यह पहला वाकया नहीं था जब अस्मितावादी राजनीति में यह आग्रह मेरे सामने नमूदार हुआ। इससे पहले भी कई लोग इस स्थापना को दोहरा चुके हैं। हालिया उदाहरण के तौर पर ग्लैडसन डुंगडुंग के अभियान को लिया जा सकता है, जो उन्होंने बिनायक सेन के ख़िलाफ़ चलाया था। अस्मितावादी राजनीति के इस रुझान से किस तरह की तस्वीर उभर रही है? क्या सचमुच दमित अस्मिताओं के उत्थान के लिए ऐसे शुद्धतावादी रास्ते को चुना जाना चाहिए? क्या यह एक तरह का नस्लीय शुद्धतावाद नहीं है? जातीय वर्चस्व तोड़ने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि दमित अस्मिताओं के हाथ में नेतृत्व की बागडोर हो, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वर्चस्वशाली तबके के ख़िलाफ़ लड़ाई में सैद्धांतिक तौर पर जो लोग दलितों-आदिवासियों के साथ हैं उनको सिरे से खारिज कर दिया जाए। जातीय बंधन को तोड़ने वाले (ग़ैर-दलित, ग़ैर-आदिवासी) व्यक्ति को अगर इस आधार पर खारिज किया जाता है कि वो जन्म के आधार पर संघर्षरत जनता से साम्यता नहीं रखता है इसलिए वो दी अदर हैं, तो यह उसी मनुवादी परंपरा की बिसात पर गढ़ा गया तर्क है। शरद यादव के तर्क को विस्तार दें तो अगर सड़क पर कोई पंडा किसी दलित को पीट रहा हो और बगल से कोई ग़ैर-दलित गुजर रहा हो, तो उसे पिट रहे व्यक्ति का साथ नहीं देना चाहिए, बल्कि इंतज़ार करना चाहिए कि कोई दलित नेता आएगा और पंडे के कोप से उस व्यक्ति को बचाएगा! यह एक आदर्श स्थिति होगी जब दलितों और आदिवासियों को उनके समुदाय के बीच के ही लोग नेतृत्व दें, लेकिन संसदीय राजनीति में नेतृत्व के ऐसे जितने उदाहरण दरपेश हुए हैं उनमें से ज़्यादातर अपने समाज से कटकर सिर्फ प्रतीक बनकर रह गए हैं। पी ए संगमा को अपने आदिवासियत की सिर्फ़ तब याद आती है जब राष्ट्रपति पद के लिए उनको समर्थन की दरकार होती है, लेकिन बीजापुर में आदिवासी के मरने पर वो बयान तक नहीं देते।
शरद यादव बार-बार श्रोताओं को यह इत्तला देते रहे कि यह सब ढोंग है, आपको कोई हक़ नहीं है ऐसी सभा करने का। लेकिन, बीच-बीच में यह भी बोलते जा रहे थे कि वो तो स्वामी जी (अग्निवेश) ने बुला लिया, इसलिए चले आए। [वरना नहीं आते।] ऐसा लग रहा था शरद यादव श्रोताओं को अपने और अग्निवेश के ऋण में डूबो देना चाहते हैं। यह सब कहकर यादव जी चल निकले। कविता श्रीवास्तव ने जाते-जाते पूछ मारा कि क्या बीजापुर मामले को वो संसद में उठाएंगे, तो शरद यादव ठसक भरी मसखरी में बोले, हां हां, मैं जानता हूं आप अच्छी लेडी हैं!  
      

19 जुलाई 2012

बासागुड़ा: सैन्य बलों द्वारा जनसंहार की एक कहानी

                                                                                             --कोत्तागुड़ा से लौटकर चन्द्रिका    
                                                         
बासागुड़ा, छत्तीसगढ़ में बीजापुर का एक आदिवासी बहुल इलाका है. सरकार उसे माओवादी बहुल इलाका कहती है. पिछले कुछ वर्षों में आदिवासी बहुलता माओवादी बहुलता में बदल गयी है. बीजापुर, दांतेवाड़ा जिले के एक हिस्से को काटकर बनाया गया जिला है, जहां 28 जून को सैन्य बलों द्वारा 17 माओवादियों को मारे जाने का दावा दिया गया. हालांकि इसके ठीक उलट ग्रामीण और मृतकों के परिजन उनके माओवादी होने से इनकार कर रहे हैं. यहां घने जंगलों और छोटी पहाड़ियों के बीच ये गांव बसे हैं.
सीआरपीएफ की गोली के शिकार हुए इरपम दिनेश
की पत्नी इरपम जानकी
इन इलाकों में रहते हुए कोई भी, दिन और तारीखें भूल सकता है. शायद तारीखें तेज जीवन गति की जरूरत हैं. कुछ बरस बाद बीजापुर के कोत्तागुड़ा गांव में लोग 28 जून के रात की सामूहिक हत्या की कहानियों को ऐसे ही बता पाएंगे. सलवा-जुडुम के हमले, उनका विस्थापन और फिर से गांव में लौटना उन्हें इसी तरह याद है. तारीख घटनाओं को याद रखने का एकमात्र तजुर्बा नहीं है. उनके लिए ये मानवीय आपदाओं के मौसम रहे हैं. सरकारी सुरक्षा बन्दोबस्त से पैदा हुए भय और आतंक से असुरक्षित रहने का समय. 6 बरस पहले गर्मी में उजड़ने का मौसम और तीन बरस पहले धान की खेती के समय लौटने का मौसम. जो तारीखें नहीं याद रख सकते वे इस देश की न्याय व्यवस्था में गवाह भी बनने के काबिल नहीं हैं. एक मां को अपने बेटे के मौत की तारीख याद रखनी होगी. जबकि वोटिंग कार्ड में उनके जन्म की तारीखें दर्ज नहीं हैं. ये बगैर तारीखों के पैदा हुए लोग हैं जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं. लाशों को माओवादी न होने के सुबूत देने होंगे पर माओवादी होना किसी की देह पर दर्ज नहीं होता. शोर तो ऐसा है कि अगर वे माओवादी होते तो मानो इनकी हत्याएं मान्य थी. देश के अपने ही लोगों की सैन्य बलों द्वारा की जा रही हत्याएं देशभक्ति की मिसाल बन रही हैं. आखिर यह कौन और कहां की नस्ल है जो लाल किले पर लोकतंत्र और आज़ादी वाले सम्बोधनों की गिनती के साथ हर बरस बढ़ रही है. पर वे माओवादी नहीं थे यह त्थ्यों से पता चलता है. उनके राशन कार्ड में दर्ज नाम, स्कूलों के हॉस्टल में दर्ज पते और वोटिंग कार्ड इसके गवाह हैं. उनकी पत्नियां तस्वीरें लिए घूम रही हैं जो कहीं किसी स्टूडियो में खिचाए गए हैं. वे हमारे सामने माओवादी न होने के कितने तो सुबूत पेश करते हैं. माओवादी होने की कठिन जीवनशैली को यहां का हर आदिवासी जानता है. सारे सुबूत उस जीवनशैली से अलग हैं. ये राज्य व्यवस्था के साथ जुड़ाव रखने की प्रक्रियाओं के सुबूत हैं. इससे अलग हमारे सामने ही मृतकों के परिजन और गांव के लोग 7 जुलाई को पहुंचे एस.डी.एम. से चीखते हुए कह रहे थे कि गांव के सभी जिंदा बचे लोग माओवादी हैं, ठीक अपने उन्ही बच्चों जैसे, अपने उन्ही लोगों जैसे जिनकी हत्याएं उस रात सैन्य बलों द्वारा की गई. यह सब कहते हुए वे दुखी हैं, क्रोधित हैं और उनमे भय बेहद कम बचा है. सरकार को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे वाले रजिस्टर में एक पन्ना और जोड़ लेना चाहिए कि सामूहिक हत्याओं ने वहां भय को निरस्त कर दिया है. 

यहां पहुचने के दो रास्ते हैं. बासागुड़ा थाने से तीन किमी की दूरी और आंध्र प्रदेश के चेरला तहसील से होते हुए जंगल के 70 किमी. का रास्ता जैसा कुछ. गांव तीन पारों में बंटा हुआ है, कोत्तागुड़ा, राजपेटा और सारकेगुड़ा. ये उजड़े हुए लोग थे जो फिर से बसने का प्रयास कर रहे थे. 2005 में जब सलवा-जुडूम चलाया गया उस बरस पूरा गांव उजड़ गया, 35 घरों को आग के हवाले कर दिया गया था और कुछ लोगों की हत्याएं की गयी थी. सलवा-जुडुम को मुख्य मंत्री रमन सिंह सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके बंद किए जाने का आदेश आने तक 'शांति स्थापना' का आंदोलन कहते रहे. इस शांति अभियान से फैली अशांति के बीच पूरा गांव यहां से 70 किमी दूर आंध्र प्रदेश के चेरला तहसील चला गया, वहां वे 4 बरस तक रहे. लोग दूसरे के खेतों में मिर्च तोड़ने का काम करते थे. यह एक कड़ुआ अनुभव था, जो बीत चुका. 2009 में वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार ने इनमे से कुछ को वापस बसाया और रमन सिंह सरकार ने इस कृत्य को देखते हुए हिमांशु कुमार के आश्रम को ही उजाड़ दिया. चेरला से आदिवासी धीरे-धीरे वापस अपने गांव लौट आए. तकरीबन 10 परिवार अभी भी नहीं लौट पाए. 
काका सरस्वती के पिता काका रामा अब तस्वीरों में
ही सरस्वती को देख पाएंगे
गांव के अलग-अलग लोगों से हुई बातों के आधार पर यह उस घटना की यह एक सामूहिक गवाही सी है कि 28 जून की शाम 8 बजे एक तयशुदा मीटिंग थी. जिसमे तीनों पारों से हर घर का लगभग एक सदस्य शामिल था. बारिस कुछ दिन पहले ही शुरु हुई थी और धान के खेती की यह सामूहिक तैयारी थी. इस पूरे इलाके में आदिवासी सामूहिक श्रम की खेती करते हैं. रास्तों से गुजरते हुए हमने यह भी देखा कि खेत उनके अपने नहीं बल्कि गांव के हैं और कई महिलाएं और बच्चे एक साथ मिलकर उन खेतों में हल चला रहे हैं. बारिस की शुरुआत देर से हुई इसलिए यह मीटिंग भी मौसम की देरी के साथ थी. कारण यह भी था कि गांव के पुजारी जो फसल के पहले पूजा के लिए मीटिंग आयोजित करते थे कुछ दिनों पहले उनकी मौत हो चुकी थी. वह स्थान जहां मीटिंग आयोजित थी तीनों पारों के बीच की जगह है. आसपास महुआ और ताड़ के कुछ पेड़ हैं जिनकी एक दूसरे के बीच की दूरी 20 मीटर से भी अधिक है. यानि यह एक खुला हुआ मैदान है. मिट्टी की हल्की ऊंची एक पट्टी है जो घास से ढंकी हुई है और बगल के महुआ के पेड़ की जड़ें उभरी हुई हैं. गांव की मीटिंग में बैठने के लिए यह एक सहूलियत की जगह है. मड़ियम राकेश बताते हैं कि खाना खाने के बाद लोग इस मैदान में इकट्ठा होने लगे. तीनों पारे के लोगों को आवाज लगाकर इकट्ठा किया गया था. यह कोई छुपी हुई मीटिंग नहीं थी. एक घंटे के बाद बातचीत शुरू हो गयी. जिसमे यह तय होना था कि किसके खेत में कौन काम करेगा, किसके पास क्या बीज है और गांव के लिए पिछले तीन सालों से बड़ी मुश्किल यह है कि बैल बहुत कम हैं. सलवा-जुडूम ने जब इस गांव को उजाड़ा और जलाया था तो बैल और जानवर जंगली बन गए. अब गांव में जितने बैल हैं उन्हीं की जुताई पर पूरे गांव की खेती होनी है. गांव वालों की बैठक रात के दस बजे तक चलती रही और तब तकरीबन 70-80 लोग उस समय मौजूद थे जब सैन्य बलों ने घेर कर गोलियां चलानी शुरु कर दी. गांव वालों को उनके आने का पता तक न चला न ही सैन्य बलों द्वारा कोई चेतावनी दी गयी. चलती गोलियों के बीच लोग घरों की तरफ भागने लगे. किसी भी घर की दूरी यहां से तकरीबन 150 मीटर है. 150 मीटर की दूरी पार करने के लिए 300 कदम तो दौड़ना ही था. इस बैठक में उपस्थित लोगों में से 23 लोगों को गोलियां लगी जिसमे 17 लोगों की मौत हो गई. यह सबकुछ महज आधे घंटे से एक घंटे के भीतर हुआ. गोलीबारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आसपास के ज्यादातर पेड़ों में गोलियों के निशान हैं, गोली लगने से मरी हुई एक सूअर की हड्डिय़ां अभी वहीं बिखरी पड़ी हैं, गोली से मृत दो गायों को गांव वालों ने थोड़ी दूर जंगल में फेंक दिया है, उनमें एक बैल अभी जख्मी और जिंदा है. महुआ के पेड़ की जड़ पर रिसे हुए खून के बस धब्बे बचे हैं, मृतकों की फटी हुई कमीज और बनियान है जो मिट्टी से लिपटी मैदान में पड़ी हैं. गोलीबारी के तुरंत बाद सैन्य बलों ने एक डम्फरनुमा गाड़ी में घायलों और मृतकों को एक दूसरे के ऊपर फेंक दिया. गांव वालों का कहना है कि जब उन्हें लादा जा रहा था तो उनमे से ज्यादातर लोग जख्मी और जिंदा थे. यह कहते हुए गांव के लोग संभावना जता रहे थे कि उनकी मौत अमानवीय तरीके से गाड़ी में लादे जाने और रक्तश्राव से हुई. वे यह भी बता रहे थे कि एक मृतक के कंधे पर कुल्हाड़ी औरीक के सिर पर पत्थर से मारे जाने के निशान भी थे. उन्हें ऐसी आशंका है कि कुछ जख्मी लोगों को थाने ले जाकर प्रताड़ित करके उनकी हत्या की गयी. गोलीबारी के बाद कई घरों की तलाशी ली गई और सैन्य बलों द्वारा लूटपाट भी किया गया. गांव की काका कमला ने बताया कि इरपा ललिता जो अपने घर में सोई हुई थी सैन्य बलों ने उन्हें निर्वस्त्र किया और उनके साथ बुरा किया. इस तलाशी के दौरान कई महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई. इरपा पुष्पा को उनके घर से घसीट कर पीटा गया. मड़कम शांति जिनके पति की सलवा-जुडुम ने 2005 में हत्या कर दी थी उनके साथ भी सैन्य बलों ने बदसलूकी की. कम्मा सरस्वती, इरपा तुलसी, सारिका काका, बारसे मारुति गांव के अलग-अलग लोगों ने इनके नाम भर गिना दिए. वे सबके बारे में नहीं बता पा रहे कि क्या हुआ, गांव की सामूहिक हत्याओं में शायद यह सबकुछ उनके लिए बेहद सहज और मामूली सा हो गया है. शायद न भी हो, जिन घटनाओं पर वे चुप हैं, जिसके बारे में कुछ पूछने पर वे धीरे-धीर वे अपने घरों की तरफ चले जाते हैं, उन्हें कुरेदना वाजिब नहीं. गोलीबारी के ज्यादातर साक्ष्यों को दूसरे दिन सुबह सैन्य बलों द्वारा खुद ही मिटा दिया गया. वे जमीन पर गिरे खून की मिट्टी तक उठा कर ले गए. पेड़ों में गोलियों के सुराख हैं पर उनमे कोई भी गोली नहीं है.
काका रमेश और काका पार्वती अपने जख़्म दिखाते हुए

अब उनकी लाशें गांव के अलग-अलग किनारों पर दफन कर दी गई हैं. गांव का कोई भी युवक उस तालाब तक लेकर जाता है और कहता है कि बताओ ये सब माओवादी थे. जैसे गांव के अपने लोगों के लिए वह आपकी गवाही चाहता हो. मैदान के सबसे नजदीकी झोपड़ी में कुछ महिलाएं रेला के अलाप के साथ विलाप कर रही हैं और झोपड़ी के चौखट पर दो मिट्टी के दिए जल रहे हैं यह उनके मृतक होने के बाद का संस्कार है. जहां इरपा जानकी जो मृतक इरपा दिनेश की पत्नी हैं वे रो रही हैं. दिनेश इरपा की उम्र 30 बरस के आसपास थी. दूसरे दिन जब गांव वालों ने बासागुड़ा थाने को घेर कर शोर मचाया तब शाम 6 बजे मृतकों की लाशें गांव वालों को लौटाई गई. जिसकी कुल संख्या 16 थी. पुलिस द्वारा इरपा दिनेश की लाश तक वापस नहीं की गयी. थोड़ी देर बाद जानकी अपने 2 साल के बच्चे को कंधे पर उठाए आती हैं और तेलगू में कुछ कहती हैं. वे कहती हैं कि माओवादी बीबी-बच्चों के साथ घर बनाकर कहां रहते हैं. काका सरस्वती जो 12 साल की एक बच्ची थी उसके पिता काका रामा चुप हैं. कहने के लिए उनके पास सरस्वती की एक तस्वीर है जिसे लेकर वे मैदान के एक किनारे पर बैठे हैं, उन्हें हिन्दी नहीं आती इसलिए कुछ भी पूछने पर तस्वीर दिखाते हैं. मृतक समैय्या काका की उम्र 31 बरस थी ऐसा उनके वोटिंग कार्ड से आंकलन किया जा सकता है. जिसमे जन्म की तारीख के स्थान को Xxxxxxxxx xxx  से भर दिया गया है और वर्ष की जगह 1979 दर्ज है. इरपा नारायण के जन्म की तारीख और बरस दोनों का पता इनके वोटिंग कार्ड में दर्ज नहीं है. यहां 1 जनवरी 1995 को निर्वाचन आयोग ने इन्हें 35 बरस का माना है. इरपा नारायण 4 बच्चों के पिता थे. उनकी हत्या के बाद जब सैन्य बलों ने घरों की छानबीन की तो उनके घर में रखे 30 हजार रूपए भी उठा ले गए. मड़कम मुत्ता जो नागेश और सुरेश के पिता हैं उन्होंने अपने दोनों बेटों को दफ्न कर दिया है. इसी तरह इरपा राजू ने भी अपने दो बेटे इरपा मुन्ना और इरपा दिनेश को खो दिया है. इन चारो की उम्र 25 से 30 साल के बीच थी. कुल 17 मृतकों की अलग-अलग कहानियां हैं. हर मृतक की मां, पत्नी, पिता अपने साथ सुबूत लिए खड़े हैं. माओवादी न होने के सुबूत. सरकारी द्स्तावेजों में मृतकों के नाम जहां-जहां मौजूद हैं अपनी झोपड़ियों से वे सब उठा लाए हैं. जैसे वे इसे पेश करते हैं कि माओवादी नहीं है इसलिए इन्हें जिंदा कर दो. कैमरे के सामने वे अपने बच्चों की तस्वीरें रखते हैं और फिर उसे गमछे से पोछते हुए उठा लेते हैं.
घटना में जो छः लोग जख्मी हैं उनमे काका पार्वती जिनकी उम्र 13 बरस है और काका रमेश जिनकी उम्र 15 बरस है. काका पार्वती के बांए हांथ में गोली लगी है और रमेश के हाथ व पीठ दो जगह. अपने जख्मों पर पट्टियां बंधवा कर वे जगदलपुर से गांव वापस लौट आए हैं. रमेश को उसी गाड़ी में लादकर ले जाया गया था जिसमे घायल और मृतकों को साथ में लादा गया. अपने शर्ट को उठाए हुए वे कुछ बुदबुदाते हैं और फिर रोने लगते हैं. रमेश के पिता दो बरस पहले पास की ही तालपेरू नदी में अचानक आयी बाढ़ में बह गए. घायलों में एक 12 साल का बच्चा आपका छोटू है जिसके पिता का नाम बुधराम है और इरपा चिनक्का जो इरपा नरसा की पत्नी है दोनों जगदलपुर अस्पताल में हैं. जिसे बड़े माओवादी के रूप में प्रचारित किया जा रहा है वह काका सेंटी और सोमा मड़कम हैं. ये दोनो घायल हैं और रायपुर के किसी अस्पताल में हैं. काका सेंटी की उम्र 18 बरस है और उनके माता-पिता नहीं हैं. बुधराम ने बताया कि घटना के तीन दिन पहले से सेंटी अपने घर में महुआ के फलों से छिलके निकाल रहे थे. हालांकि उन्होंने यह नही पूछा कि एक बड़ा माओवादी ग्रीनहंट जैसे अभियान के समय इतने इत्मिनान से कैसे रहेगा. जबकि लोग कुछ बताने के बजाए किसी भी व्यक्ति से ऐसे ही सवाल पूछ रहे हैं. सोमा मड़कम के पत्नी का नाम कमला है जो अभी गर्भवती हैं. सोमा के कुल तीन बच्चे हैं. वे गांव के कुछ लोगों के साथ रायपुर जाना चाहती थी पर गांव के लोगों ने उन्हें रोक दिया. गांव के लोग पहले इन्हें मृत मान चुके थे पर अखबारों की कतरनों को वे दोनों के जिंदा होने के सबूत के तौर पर रखे हुए हैं.  
7 जुलाई को भोपालपट्टनम के एस.डी.एम. आर.ए. कुरुवंशी दो ट्रक राहत सामाग्री लेकर गांव पहुंचे थे. एक तम्बू लगाकर वे गांव वालों का इंतजार करते रहे. 5 घंटे बाद गांव के लोग एक साथ होकर उनके पास आते हैं. वे अपने सत्रह लोग लेने आए हैं. वे कहते हैं कि हमारे 17 लोगों को हमे वापस करो. मृतकों की पत्नियां और गांव के लोग चीख रहे हैं. वे अपने छोटे बच्चों को उनके सामने घसीटते हुए लाते हैं और गोली चलाने को कहते हैं. वे चिल्ला रहे हैं कि हम सब माओवादी हैं हम पर गोलियां चलवा दो. काका कमला कहती हैं कि सरकार ने माओवादियों के लिए राशन-कपड़े क्यों भेजे हैं. चिल्लाते-चिल्लते कुछ महिलाएं फिर से सुबकना शुरु कर देती हैं. एस.डी.एम. कुरुवंशी तम्बू को उतारने और वापस लौटने का आदेश देते हैं.   
हत्या की घटना को एक हफ्ते से ज्यादा गुजर चुके हैं. हर रोज बाहर से पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आना जारी है और हर रोज उन्हें पूरी कहानी दुहरानी पड़ती है. गांव को सैन्य बलों ने घेर रखा है. जंगल की तरफ से जब हम गांव में घुसने को थे कि सैन्य बल अपने हथियार की नली हमारी तरफ घुमाते हुए मुस्तैद हो गए. गांव के लोगों को रात में कहीं निकलने नहीं दिया जाता. किसी भी बाहरी व्यक्ति के आने पर सैन्य बल देर तक उससे पूछताछ करते हैं. नजदीकी गांव पाकेला, पुसुबाका के लोगों का बासागुड़ा बाजार और स्कूल जाने का यही रास्ता है. उन गांव के लोगों ने इधर से जाने का रास्ता छोड़ दिया है. तीन किमी. जाने के बजाय वे 70 किमी. दूर चेरला जाने लगे हैं. वे किसी सामान को खरीदने पैदल भी चले जाते हैं. जिंदगियां दूरी और समय से ज्यादा कीमती हैं. कई बच्चे भय के कारण पिछले कुछ दिनों से स्कूल नहीं गए हैं. तालपेरू नदी का पानी धीरे-धीरे बारिश के कारण बढ़ रहा है और ऐसे में वे चिंतित हैं. जंगल एकमात्र सहारा है और जंगलों में जाना खतरनाक भी

06 मई 2012

शायद इस देश का हूँ ही नहीं- लिंगा कोडोपी

pg-1
आदरणीय बुद्धिजीवियों, 
मैं इस आशा से यह पत्र लिख रहा हूँ कि मेरे साथ व अन्य आदिवासियों के साथ हुए प्रताडनाओं व अन्याय का आप लोग न्याय करेंगे | मैं देश के तीन स्तंभ से गुजर चुका हूँ ! कार्यपालिका, न्यायपालिका, मिडिया! इन तीनों स्तंभो से मुझे व अन्य आदिवासियों को न्याय मिलेगा ऐसा उम्मीद नहीं करता ! क्योंकि पत्रकारिता की शिक्षा लेकर दिल्ली से वापस आया और प्रशासनिक अधिकारियो से मिला ! नक्सलियों के साथ संबंध न होने की बात बताया, तो उन अधिकारीयों ने दिल्ली न जाने और लिंक तोड़ने की बात कही ! मैंने जिले के कलेक्टर ओ.पी.चौधरी, बस्तर संभाग के कमिश्नर के.श्रीनिवासलू और पुलिस अधिकारी अंशुमन सिसोदिया इन सभी आधिकारियों के कहने पर दिल्ली के तमाम बुद्धिजीवियों से लिंक तोड़ दिया | मुझे नहीं पता था दिल्ली से लिंक तोड़वाकर एस्सार से पैसा लेकर नक्सलियों का समर्थन देने का आरोप लगाया जायेगा ! और जेल भेज दिया जायेगा| मुझे पूछताछ के नाम पर पालनार साप्ताहिक बाजार से बिना वर्दी के पुलिस द्वारा बुलाकर लाया गया ! मुझे तो पता भी नहीं था कि एस्सार नक्सलियों को पैसा भी देता है | दूसरे दिन जब मैंने पेपर में नोट कांड के नाम से समाचार व मेरा नाम और सोनी सोरी का नाम देखा, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई | पेपर पढ़ने के बाद दंतेवाड़ा कोतवाली थाने में मैं अधिकारीयों से रो-रो कर विनती किया कि मेरा इस केस से कोई संबंध नहीं है ! तो पुलिसवालों ने कोरे पन्नों में हस्ताक्षर करवाये | मैंने अपनी सफाई में पैन कार्ड, वोटर कार्ड, स्टेट बैंक का ए.टी.एम. तक देकर देखा ! 'इन सभी परिचय पत्रों को पुलिस दिल्ली के बुद्धिजीवियों द्वारा जाली बनाकर दिया गया है !' ऐसा आरोप लगाया गया | मुझे करेंट शाक देने के लिये एस.पी. के घर लेकर गये थे ! लेकिन एफिडेविट जो २००९ में बना था इसकी वजह से मैं बच गया| और पुलिस द्वारा यह भी कहा गया कि सोनी सोरी तेरी औरत है क्या ? जो तुझे हाई कोर्ट से निकाली है ? और तू उसे दिल्ली भी लेकर गया था ? ऐसा कहने के साथ-साथ पुलिसवालों ने ये भी कहा कि एक बार मिलने तो दे सोनी सोरी को, फिर देखना हम उसके साथ क्या करते हैं ? मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी बुआ के साथ इतना कुछ करेंगे !
    वैसे भी मुझे पकड़ने के लिये व दिल्ली से पत्रकारिता छोडकर वापस बुलवाने के लिये सोनी सोरी को पैसा देकर सौदा करने की कोशिश २००९-१० में ही चल रही थी ! बुआ ने पुलिसवालों का कहना न माना तो उनके साथ इतना कुछ हो गया|
   मैंने एस.पी.ओ. बनने से २००९ में इंकार किया तो मेरी जान लेने के लिये यह सरकार पीछे पड़ गयी | पत्रकारिता कि शिक्षा लेकर अपनी संस्कृति और आदिवासी समाज कि सेवा करूँगा सोचा ! तो नक्सली प्रवक्ता आजाद कि जगह देने की बात पुलिस द्वारा मिडिया में बताया गया ! और बदनाम किया गया | पत्रकारिता में हमेशा निंदा होता है, ये सोचकर गांव आकर साधारण जीवन जीने की सोचा तो नक्सल समर्थक बना दिया गया| और अंतर्राष्ट्रीय उग्रवादी संगठन का सदस्य  व देश द्रोही बताया गया ! सरकार देश के तमाम बुद्धिजिवियो और समाजसेवकों को उग्रवादी कहती है तो हम किस के सहारे जियेंगे ? और हमें न्याय कौन देगा ? आदिवासियों के साथ हो रहे अन्यायों में मिडिया व न्यायपालिका बराबर का साथ दे रही है ! मुझे दंतेवाड़ा जेल में चार महीने तक आधा पेट भोजन दिया जाता था मुझे ही नहीं सभी बंदियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है | अगर कोई इसका विरोध करे तो 'चक्कर' में ले जाकर कपड़े उतारकर मारा जाता है | इस बात की जब मैंने न्यायाधीश को शिकायत की तो न्यायाधीश ने 'हम क्या कर सकते हैं ? ' इस प्रकार से एक न्यायाधीश द्वारा कहा गया | दंतेवाड़ा के न्यायालय में हर चीज, हर अपराध हो तो यहाँ के न्यायाधीश द्वारा केवल शासन व पुलिस का ही पक्ष लिया जाता है | न्यायाधीश के पुलिस के पक्ष लेने से ही तो आदिवासी महिलाओं को नक्सलियों के नाम पर पकडकर तीन महीना तक रखा जाता है, वेश्या की तरह, उसके बाद जेल भेज दिया जाता है और उन महिलाओं का कुछ महीने बाद जेल में ही डिलेवरी होता है | ऐसे में हमें न्याय कौन देगा? जेल में हर कोई दहशत में है | इसी दहशत के कारण महिलाएं खुलकर बता नहीं पाती | 'इंदिरा गाँधी के काल में पंजाबियों को आतंकवादी के नाम पर मारा गया था इसी प्रकार दंतेवाड़ा के आदिवासियों को नक्सलियों के नाम पर मारना चाहिये', इस प्रकार से मुझे शब्दों के वाणों से मारा गया | कुछ-कुछ चीजों का विरोध किया और न्यायाधीश से बहस किया तो जगदलपुर जेल भेज दिया गया | दूसरे दिन जब जेल के छोटे अधिकारियो के समक्ष पेश किया गया तो अधिकारीयों ने कहा कि 'इस लडके को जेल लेकर क्यों आये बीच सड़क में गोली मार देना चाहिये था |' जब जेल के अधिकारी इतना घृणा करते हैं तो जेल से बाहर आने पर आम जन कितना घृणा करते होंगे | न्यायाधीश भी तो घृणा कि ही नजरो से देखते हैं |
   मैं शस्त्र उठाना नहीं चाहता फिर मुझपर दबाव क्यों डाला जा रहा है, युद्ध से बचाव का प्रयत्न करना चाहिये | जब युद्ध को रोकने के लिये देश के बुद्धिजीवी सामने आकर आदिवासियों को प्रेम करना सिखाने की कोशिश करते हैं तो उनके उपर जन सुरक्षा अधिनियम लगता है | छत्तीसगढ़ सरकार मुझसे व आदिवासियों से घृणा करता है | मुझे नक्सली बनाकर मारने का प्रण लिया है, मेरा साथ देने से बुआ के साथ इतना कुछ हो गया| आज मेरी बहन अकेली मिलने के लिये जेल आती है| उसके साथ कब क्या होगा मैं नहीं जानता | मैंने बुआ को खो दिया है उनका और मेरा जीवन तो बर्बाद हो गया है| मेरी वजह से मैं और लोगों को बली चढ़ते हुए नहीं देख सकता शायद ये प्रताड़ना मेरे मरने से खत्म हो जायेगा, मैं अपनी आत्मरक्षा के लिये किसी को मारना नहीं चाहता और शस्त्र लेकर जीने को सरकार विवश कर रही है | पुलिस ने प्रण लिया था बुआ के साथ प्रताड़ना करने के लिये और प्रताड़ित कर साबित कर दिया कि पुलिस क्या कर सकती है| मुझे नक्सली वर्दी पहनाकर मारने का प्रण है तो ये पुलिस जेल से निकलते ही मार सकती है, मैं नक्सली बनकर मरना नहीं चाहता और न ही शस्त्र उठाकर जीना| 
    अतः देश के तमाम बुद्धिजीवियों से हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि जेल में ही मुझे मरवा दे| वैसे भी लोग तो घृणा ही आदिवासियों से करते हैं,  तभी तो एक-एक कर आदिवासियों को मारा जा रहा है उनमे मैं भी एक रहूँगा| मैं इस देश का होता तो यहाँ की पुलिस मेरा परिचय पत्रों को मानती मैं तो शायद इस देश का हूँ ही नहीं | तभी तो आदिवासियों की हत्या होती है| और न ही किसी बुद्धिजीवी से मिल सकता हूँ | अगर किसी से मिला या घर गया तो सभी लोगों के उपर जन सुरक्षा अधिनियम लग जायेगा| पुलिस पकड़ेगी और पता नहीं क्या प्रताड़ना करेगी | मेरे से तो इस देश में जीने का तो अधिकार ही छीन लिया गया| मैं आज खुद को कोसता हूँ कि जब छत्तीसगढ़ पुलिस नक्सली प्रवक्ता के नाम से बदनाम की तो उसी समय आत्महत्या कर लेना था | तो ये दिन देखना न पड़ता |
    न्याय मिलने की उम्मीद भी तो नहीं है क्योंकि जगदलपुर जेल में ७ साल ८ साल से लोग नक्सलियों के नाम से आकर पड़े हैं कोई सुनवाई हुआ ही नहीं है | किसी-किसी को तो कुछ भी नहीं हुआ है| मेरा हर जगह से विश्वास उठ चुका है एक उम्मीद है तो सिर्फ सुप्रीमकोर्ट | लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक पहुचते-पहुचते दो से तीन साल लग जाता है| देर से हुआ न्याय भी तो अन्याय के ही बराबर है | जेल में भी किसी ना किसी प्रकार परेशान किया जाता है | हमारा चलान छह महीने में आ रहा है विना वजह के कोई ठोस वजह भी तो होना चाहिये और आज तक कोई साक्ष्य भी नहीं है| जो पैसा दे रहा था वो तो अपने अर्थ के बल पर निकल गये हम गरीब हैं हमारे पास अर्थ नहीं है इसलिये सहना लिखा है, जिसके पास अर्थ है उसके पास न्याय, अन्याय, विधायिका, कार्यपालिका, मिडिया है | हम आदिवासियों के पास जल, जंगल, जमीन के अलावा और कुछ नहीं है| राष्ट्रीय मिडिया निष्पक्ष रूप से शासन और पीड़ित पक्ष को देखते हुए लिख कर जान बचाती है और छत्तीसगढ़ राज्य की मिडिया शासन का पक्ष लेते हुए लोगों में आदिवासियों के प्रति घृणा पैदा करवाती है| छत्तीसगढ़ राज्य जब बना तो उस समय कहा गया था कि आदिवासियों को सुरक्षित किया जा रहा है, लेकिन ये सच नहीं है| सच तो ये है कि जन सुरक्षा अधिनियम बनाकर दूसरे राज्य के बुद्धिजीवी वर्ग को रोका जाये और आदिवासियों को मारा जाये| आदिवासियों को तो न्याय, कार्यपालिका, विधायिका, मिडिया के बारे में पता ही नहीं है | मुझे थोडा बहुत जानकारी है इसलिये मैं जेल में हूँ | 
    छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस स्वामी अग्निवेश, हिमांशु कुमार, मेधा पाटेकर, अरुंधती राय और तमाम दिल्ली के बुद्धिजीवियों को देश द्रोही कहती है तो इस देश का वासी कौन है| छत्तीसगढ़ सरकार को मेरा कपड़ा पहनना और अपने आप को बदलना पसंद नहीं है मेरा बात करना, पत्रकारिता की शिक्षा लेना पसंद नहीं, मेरे साथ जो व्यक्ति रहेगा या साथ देगा वह सरकार की नजर में दंड का भागीदारी होगा | मैं आदिवासियों कि संस्कृति को कैमरे में कैद करता उससे पहले जेल आ गया और अन्य आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय को देख रहा हूँ | जहाँ राजनीति आम जन के हित में होना चाहिये वहाँ आम आदमी मर रहा है| आदिवासियों का कोई विधायिका भी तो नहीं है जो संविधान सभा में बात उठा सके और जो है वे तो अपने आप को अर्थ के लिये बेच दिये हैं| उससे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती| अगर मेरी इतनी क्षमता होती कि मैं किसी को सम्मान दे सकूं तो सम्मान तौर पर मेरे साथ व मेरी बुआ और अन्य आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय के लिये छत्तीसगढ़ राज्य के सरकार को सम्मान देता | मैं किसी कि निंदा नहीं करना चाहता पर अन्याय करके निंदा करने के लिये विवश किया जाता है| विदेशी फिल्म अवतार छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिला में हो रहे अत्याचारों का फोटोकॉपी है | जैसा फिल्म है बिल्कुल वही दंतेवाड़ा में हो रहा है| इस अन्याय को देखकर लगता है कि देश में मानवता खत्म हो गई और आने वाले कल में मानव समाज का अन्त है| जिन आदिवासियों को आदिकाल से इस देश में जी रहे है बोला जाता है उनका अस्तित्व खतरे में है| वैसे भी केन्द्र के लाल कृष्ण आडवानी ने पहले से कह रखा है कि सरकार छत्तीसगढ़ में भाजपा की है जब चाहूँ तब आर्मी भेजकर नक्सली अर्थात आदिवासियों का सफाया कर सकता हूँ| सरकार तो आदिवासियों को ही नक्सली कहती है | जबकि पूरे देश के कुछ राज्यों में नक्सली हैं, लेकिन ये सरकारे तो जहाँ आदिवासी राज्य है उन्ही राज्यों को नक्सल राज्य कहती है| मैं एक स्वतंत्र पत्रकार हूँ लेकिन मेरी स्वतंत्रता जेल में छीन ली गई है | यह पत्र लिखकर शायद आदिवासियों के साथ अन्याय बढ़ जाये| मुझे पत्र लिखने के जुर्म में कुछ भी हो सकता है | मैं तो चाहता हूँ कि मुझे जितना जल्दी हो सके गोली मार दे या फांसी दे दे ताकि मरकर मानव जाति बनाने वाले ईश्वर से कि हम आदिवासियों को पृथ्वी में प्रकृति के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं दिया| मैंने एक ग्रन्थ में पढ़ा था कि हर शरीर में ईश्वर बसते है! लेकिन मैं लोगों से न्याय मांगकर थक गया | मेरे जीवन में इस सरकार ने घृणा के कांटे इतने बिछा दिये कि उन कांटो पर चलना शायद मेरे बस में नहीं है| मुझे लगता है कि शमशान से अच्छा घर इस दुनिया में और कोई दूसरा मेरे लिये हो ही नहीं सकता |
      हिमांशु सर आपने एकबार कहा था मरना आसान है जीना मुश्किल, लेकिन मेरे लिये तो मरना और जीना दोनों ही मुश्किल है | मेरे पास आंसुओ के अलावा कुछ नहीं है जीने की इच्छा शक्ति भी खत्म होते जा रही है| देश के तमाम बुद्धिजीवियों एवं नागरिकों से मेरी हाथ जोड़कर विनती है कि मुझे जितना जल्दी हो सके मृत्यु दे दे | हमारे साथ हो रहे अन्यायों का जितना निंदा व टिप्पणी करूं कम है, मेरे पास इतने शब्द नहीं कि मैं पूरी बात लिख सकूँ | भय और डर के कारण लिखने में कई गलतियाँ हुई होगी, आपसे क्षमा चाहता हूँ सर | इस पत्र को लोगों के समक्ष बताकर मुझे जल्द से जल्द इस जीवन से मुक्त कर दीजिये | ज्यादा समय तक जेल में रहा तो देश के चार स्तम्भों के बारे में सोच-सोच कर पागल हो जाऊंगा ऐसा होना नहीं चाहता | मैंने सत्य और अहिंसा को अपनाकर बहुत कुछ अपना खो दिया है| जेल में भी हार्डकोर नक्सली के नाम से निगरानी में हूँ | इतना कुछ मेरे साथ क्यों? आखिर मेरे सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने से इस देश की अखण्डता और एकता टूट जाती है क्या? या ये मार्ग गलत है? गांधीजी का हर जगह फोटो और वचन लिखा जाता है, पर मानता कोई नहीं क्यों? देश के बुद्धिजीवियों का आभारी रहूँगा|

                                                            लिंगा राम कोडोपी
                                                            केन्द्रीय जेल जगदलपुर



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 साभार-दांतेवाड़ावाड़ी

12 फ़रवरी 2012

एसपी अंकित गर्ग ने मुझे नंगा किया..मेरे गुप्तांग में पत्थर भरे।


नक्सली बताकर गिरफ़्तार की गई सोनी सोरी
के मामले में भाजपा और कांग्रेस एक है।

प सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि
(1) मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।
(2) जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।
(3) पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंडइस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।
[ आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं। ]
(4) संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए
मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।
ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा हैऔर लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?
हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।
जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।
नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?
छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी
(मोहल्ला लाइव से कट पेस्ट)

09 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी को उत्पीडित करने वाले पुलिस को राष्ट्रपति द्वारा वीरता सम्मान देने के विरोध में नागरिक अपील


महामहिम राष्ट्रपति जी,

''अमर रहे गणतंत्र हमारा ''

दुःखभरे ह्रदय से आप को यह पत्र लिखते हुए हमें ध्यान है कि देश और दुनिया के अनेक चिंतित नागरिक समूहों, स्त्री अधिकार संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने दंतेवाडा के पुलिस सुपरिटेन्डेंट अंकित गर्ग को वीरता पदक दिए जाने के फैसले से जुडी हुयी चिंताओं की ओर आप का ध्यान आकर्षित किया है . हमें यकीन है कि आप इन चिंताओं पर गहराई से विचार करने की प्रक्रिया में हैं . हमें विश्वास है कि इस प्रसंग में आप के द्वारा लिया गया निर्णय राष्ट्र के गौरव , नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और उन की मानवीय गरिमा को मज़बूत बनाने वाला सिद्ध होगा.

इस प्रसंग में राष्ट्र के जिम्मेदार और सरोकार -सजग नागरिकों के बतौर हम खास तौर पर जिन विन्दुओं को आप के ध्यान में लाना चाहते हैं , वे इस प्रकार हैं -

१- आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी ने सर्वोच्च न्यायालय को लिखे अनेक पत्रों में यह बात दुहराई है कि दंतेवाडा पुलिस स्टेशन में ०८ अक्टूबर २०११ को अंकित गर्ग की उपस्थिति में उन की आज्ञा से उन्हे शारीरिक यातनाये दी गयीं .इन यातनाओं में अमानवीय यौन हिंसा भी शामिल थी. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर कलकता के एन आर एस सरकारी अस्पताल द्वारा की गयी मेडिकल जांच में इन आरोंपों को सही पाया गया है . अस्पताल द्वारा जारी जांच- रपट में पीडिता के गोपन अंगों में पत्थर के टुकड़ों की मौजूदगी को दर्ज किया गया है . इस रपट का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पीडिता को दंतेवाडा पुलिस की अभिरक्षा में सुरक्षित न मान कर उन्हे रायपुर केन्द्रीय कारागार में स्थानांतरित करने के आदेश जारी किये हैं . इस से स्पस्ट है कि आरोपित किन्तु पुरस्कृत एस पी के खिलाफ मानवाधिकारों , संवैधानिक दायित्वों , राष्ट्रीय गरिमा और सरकारी सेवा नियमों के गंभीर उल्लंघन का मामला ठोस प्रमाणों पर आधारित है .इस प्रसंग में यह तथ्य भी आप के ध्यान में होगा कि मीडिया द्वारा एक स्थानीय पुलिस अधिकारी का वह टेप भी जारी किया गया है , जिस में उस ने स्वीकार किया है कि शिक्षिका के खिलाफ सक्रिय माओवादी कार्यकर्ता होने के आरोप निराधार और मनगढंत हैं . शिक्षिका और उस का परिवार अतीत में स्वयं माओवादी हिंसा का शिकार रहा है.लेकिन इस सिलसिले में सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी महिला के साथ किसी भी परिस्थिति में इस तरह का दुर्व्यवहार हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों का घनघोर अवमूल्यन है.

२- ऐसी परिस्थिति में आरोपित पुलिस सुपरिटेन्डेंट को राजकीय सम्मान देने का निर्णय राष्ट्र की गरिमा और सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत हानिकारक है , क्योंकि इस घटना के निहितार्थीं को निम्नलिखित रूपों में पढ़ा जा सकता है --

क) भारतीय राज्य एक आदिवासी नागरिक की मानवीय गरिमा , उस के संवैधानिक अधिकारों और न्याय की उस की आकांक्षा के अवमूल्यन को वह महत्व देने के लिए राजी नहीं है , जिस की अपेक्षा किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य से की जाती है . यह एक ऐसा अवांछित सन्देश है , जो भारतीय राज्य - राष्ट्र और उस के वंचित नागरिकों के बीच एक शत्रुतापूर्ण रिश्ते का संकेत देता है.
ख) भारतीय राज्य राजकीय निकायों से सम्बंधित दमन , उत्पीडन , असंविधानिक आचरण और भ्रष्ट व्यवहार के आरोपों पर आवश्यक गंभीरता के साथ ध्यान देने के लिए राजी नहीं है .
ग )भारतीय राज्य सरकारी अफसरों द्वारा एक स्त्री के स्त्रीत्व को क्रूरतापूर्वक अपमानित करने के खालिस पितृसत्ताक आचरण के विषय में सम्यक रूप से चिंतित नहीं है .
घ) इस देश के श्रेष्ठतम सांस्कृतिक मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक मान्यताओं की हिफाजत की अपनी जिम्मेदारी के प्रति भारतीय राज्य की गंभीरता संदेह के परे नहीं है.

३- ऐसी स्थिति हमें जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश हाउस आव लॉर्ड्स द्वारा जनरल डायर को सम्मानित करने की उस घटना की याद दिलाती है , जिस की स्मृति भारतीय जन साधारण के लिए उस ह्त्या कांड से भी कहीं अधिक दुखदायी रही है . उसे एक औपनिवेशि सत्ता द्वारा एक जीवित राष्ट्र की आत्मिक ह्त्या के रूप में देखा गया , जिस का उद्देश्य निकृष्टतम नस्ली वर्चस्व को स्थापित करना था. राष्ट्रीय अपमान की इसे चेतना ने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को वह क्रांतिकारी आवेग प्रदान किया , जिस ने हमें आज़ादी की मंजिल तक पहुंचाया. आज़ाद भारत में एक स्त्री नागरिकके अपमान और यौन उत्पीडन के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे पुलिस अफसर को व्यापक जनविरोध के बावजूद राजकीय सम्मान देना हमारी आज़ादी और हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति -दोनों के विषय में गंभीर चिंताएं और बेचैनियाँ उत्पन्न करता है.
अतएव हमारी प्रार्थना है कि आप एस पी अंकित गर्ग को वीरता पदक प्रदान करेने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए इसे निरस्त करने की कृपा करें .
(आशुतोष कुमार की फेसबुक वाल से)

05 दिसंबर 2011

गुप्तांगों में एसपी ने पत्थर भर डाले थे !


हिमांशु कुमार
माननीय न्यायाधीश महोदय,
सर्वोच्च न्यायालय,
नईदिल्ली
यह पत्र मैं आपको सोनी सोरी नाम की आदिवासी लड़की के सम्बन्ध में लिख रहा हूँ, जिसके गुप्तांगो में दंतेवाडा के एस.पी. ने पत्थर भर दिये थे और जिसका मुकदमा आपकी अदालत में चल रहा हैІ उस लड़की की मेडिकल जाँच आपके आदेश से कराई गई और डाक्टरों ने उस आदिवासी लड़की के आरोपों को सही पाया और डाक्टरी रिपोर्ट के साथ उस लड़की के गुप्तांगो से निकले हुए तीन पत्थर भी आपको भेज दिये І
कल दिनांक 02-12-2011 को अपने वो पत्थर देखने के बाद भी उस आदिवासी लड़की को छत्तीसगढ़ के जेल में ही रखने का आदेश दिया और छत्तीसगढ़ सरकार को डेढ़ महीने का समय जवाब देने के लिए दिया हैІ
जज साहब मेरी दो बेटियाँ हैं अगर किसी ने मेरी बेटियों के साथ ये सब किया होता तो मैं ऐसा करने वाले को डेढ़ महीना तो क्या डेढ़ मिनट की भी मोहलत न देता! और जज साहब अगर यह लड़की आपकी अपनी बेटी होती तो क्या उसके गुप्तांगों में पत्थर डालने वालों को भी आप पैंतालीस दिनों का समय देते? और क्या उससे ये पूछते कि आपने मेरी बेटी के गुप्तांगों में पत्थर क्यों डाले? पैंतालीस दिन के बाद आकर बता देना और तब तक तुम मेरी बेटी को अपने घर में बंद कर के रख सकते हो !
पत्थर डालने वाले उस बदमाश एस. पी. को पता है कि उसकी रक्षा करने के लिये आप यहाँ सुप्रीमकोर्ट में बैठे हुए हैं इसलिए वह बेफिक्र होकर खुलेआम इस तरह की हरकत करता है और आपके कल के आदेश ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है, कि इस तरह से हरकत करने वालों की रक्षा सुप्रीमकोर्ट लगातार उसी तरह करता रहेगा जिस प्रकार वो अंग्रेजों के समय से सरकारी पुलिस की रक्षा के लिए करता रहा हैІ
जज साहब ये अदालत उस आदिवासी लड़की की रक्षा के लिए बनायी गयी थी उस बदमाश एस.पी. के लिए नहीं І ये इस लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च न्यायालय है और इसका पहला काम देश के सबसे कमजोर लोगों की रक्षा सबसे पहले करने का है !आपको याद रखना पड़ेगा कि इस देश के सबसे कमजोर लोग महिलायें, आदिवासी, दलित, भूख से मरते हुए करोडों लोग हैं और इस अदालत को हर फैसला इन लोगों के हालत को बेहतर बनाने के लिए देना पड़ेगाІ लेकिन आजादी के बाद से इन सभी लोगों को आपकी तरफ से उपेक्षा और इनकी दुर्गति के लिए जिम्मेदार लोगों को संरक्षण दिया गया हैІ
मेरे पिताजी इस देश के आजादी के लिए लड़े थेІ उन सभी आजादी के दीवानों के क्या सपने थे? उन लोगों ने कभी कल्पना भी की होगी कि आज़ादी मिलने के बाद एक दिन इस देश की सर्वोच्च न्यायालय एक आदिवासी बच्ची के बजाय उसपर अत्याचार करनेवाले को संरक्षण प्रदान करेगीІ
हमें बचपन से बताया गया इस देश में लोकतंत्र है.इसका मतलब है करोडों आदिवासियों, करोडों दलितों, करोडों भूखों का तंत्र І लेकिन आपके सारे फैसले इन करोडों लोगों को बदहाली में धकेलने वाले लोगों के पक्ष में होते हैं І आपको जगतसिंहपुर उडीसा में अपनी जमीन बचाने के लिए गर्म रेत पर लेटे हुए औरतें व बच्चे दिखाई नहीं देते? उनके लिए आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता अभय साहू को जमीन छीनने वाले कंपनी मालिकों के आदेश पर सरकार द्वारा गिरफ्तारी आपको दिखाई नहीं देती?
आपकी अदालत में गोम्पाड गांव में सरकारी सुरक्षाबलों द्वारा तलवारों से काट डाले गये सोलह आदिवासियों का मुकदमा पिछले दो साल से घिसट रहा हैІ इस अदालत में उन आदिवासियों को लाते समय मुझे एक नक्सलवादी नेता ने चुनौती दी थी और कहा था कि इन आदिवासियों की हत्या करने वाले पुलिसवालों को अगर तुम सजा दिलवा दोगे तो मैं बंदूक छोड़ दूँगाІ
लेकिन मैं हार गयाІ इस अदालत में आने के सजा के तौर पर पुलिस ने उन आदिवासियों के परिवारों का अपहरण कर लिया और वे लोग आज भी पुलिस की अवैध हिरासत में हैं І आपने दोषियों को अब तक सजा न देकर इस देश की सरकार को नहीं जिताया, आपने मुझे चुनौती देने वाले उस नक्सलवादी को जीता दियाІ अब मैं किस मुंह से उस नक्सलवादी के सामने इस देश के महान लोकतंत्र और निष्पक्ष न्यायतंत्र की डींगे हांक सकता हूँ? और उसके बन्दूक उठाने को गलत ठहरा पाऊँगा ?
अगर इस देश में तानाशाही होती तो हमें संतोष होता, हम उस तानाशाही के खिलाफ लड़ रहे होते, परन्तु हमसे कहा गया कि देश में लोकतंत्र है ! परन्तु इस तंत्र की प्रत्येक संस्था, विधायिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका मिलकर करोडों लोगों के विरुद्ध और कुछ धनपशुओं के पक्ष में पूरी बेशर्मी के साथ कार्य कर रहे हैंІ इसे हम लोकतंत्र नहीं लोकतंत्र का ढोंग कहेंगे और अब हम लोकतन्त्र के नाम पर इस ढोंगतंत्र को एक दिन के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं І
आज मैं प्रण करता हूँ कि आज के बाद किसी गरीब का मुकदमा लेकर आपकी अदालत नहीं आऊंगाІ अब मैं जनता के बीच जाऊंगा और जनता को भड़काऊगा कि वह इस ढोंगतंत्र पर हमला करके इसे नष्ट कर दें ताकि सच्चे लोकतन्त्र की ईमारत खड़ी करने के लिए स्थान बनाया जा सकेІ
अगर आप इस लड़की को इसलिए न्याय नहीं दे पा रहे हैं कि उससे सरकार नाराज हो जाएगी और उससे आपकी तरक्की रुक जायेगी І तो ज़रा इतिहास पर नजर डालिए ! इतिहास गलत फैसला देने वाले न्यायाधीशों को कोई स्थान नहीं देता І सुकरात को सत्य बोलने के अपराध की सजा देने वाले न्यायाधीश का नाम कितने लोगों को याद है?
जीसस को चोरों के साथ सूली पर कीलों के साथ ठोक देने वाले जज को आज कौन जानता है? आपके इस अन्याय के बाद सोनी सोरी इतिहास में अमर हो जायेगी और इतिहास आपको अपनी किताब में आपका नाम लिखने के लिए एक छोटा सा कोना भी प्रदान नहीं करेगा І
हाँ अगर आप संविधान की सच्ची भावना के अनुरूप इस कमजोर, अकेली आदिवासी महिला को न्याय देते हैं तो सत्ताधीश भले ही आपको तरक्की न दें लेकिन आप अपनी नजरों में, अपनी परिवार के नजरों में और इस देश के नजरों में बहुत तरक्की पा जायेंगेІ
अगर आप इस पत्र को लिखने के बाद मुझे गिरफ्तार करते हैं तो मुझे गिरफ्तार होने का जरा भी दुःख नहीं होगा क्योंकि उसके बाद मैं कम से कम अपनी दोनों बेटियों से आँख मिलाकर बात तो कर पाउँगा,और कह पाउँगा कि मैं सोनी सोरी दीदी के साथ होनेवाले अत्याचारों के समय डर के कारण चुप नहीं रहा, और मैंने वही किया जो एक पिता को अपनी बेटी के अपमान के बाद करना चाहिए थाІ (जनज्वार से साभार)