13 मई 2014

'राष्ट्रद्रोह' 'राष्ट्रभक्त' का विलोम नही होता

वे जो देशद्रोही हो गए. जिन्हें आने वाले दिनों में और भी देशद्रोही हो जाना है. जिनके लिए राष्ट्र का हर प्रतीक विलोम की शब्दावलियों में लिखा जा रहा है. राजधानी में जिनका हर व्याकरण उल्टा सा पढ़ा जा रहा है. वे सब अपने घरों के भीतर बुदबुदा रहे हैं. जैसे बच्चों को आने वाले दिनों का किस्सा सुना रहे हैं. उन्हें जब-जब सुरक्षा मुहैया कराई जाती है तो अपने बच्चों की कुछ और लाशें वे अपने कंधों पर ढोकर दफना आते हैं. गांव और पड़ोस उन्हें शहीद कहते हैं और अखबार उन्हें कहता है ‘माओवादी’ या ‘देशद्रोही’. अखबार और सरकार पिछले कई सालों से उनके लिए एक जैसे हो चुके हैं. राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर जिनके लिए कुछ और सैनिक कुछ और बंदूकें उनके गावों-कस्बों की तरफ कूच कर रही हैं लगातार. ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर जाने कितनी गोलियां उनके सीने में दब चुकी हैं और कितने जख़्म उभर आए हैं. गड़चिरौली में ११ मई २०१४ को माओवादियों के द्वारा भारतीय सी- ६० सैन्यबलों पर की गई कार्यवाही से जब सभी अखबार, समाचार और सरकार बड़े हमले के रूप में दिखा रहे हैं ऐसे में सी- ६० के द्वारा ७ जुलाई २०१३ को मेड्री गांव गड़चिरौली में हुई झूठी मुठभेड़ और नृशंसता को दिखाता यह विडियो देखना जरूरी है. कि देशभक्ति के मायने उलट जाते हैं. सवाल फिर से वहीं ठहर जाते हैं कि देश के वे कौन लोग हैं जो बंदूक उठाते हैं और वे बंदूक क्यों उठाते हैं? 



09 मई 2014

बुरे दिन आने वाले हैं

आनंद तेलतुंबड़े


पार्टी में जिस तरह की फूट है उसको देखते हुए, भाजपा ने हैरान कर देने वाले एक अनुशासन के साथ अपना चुनावी अभियान चलाया है. हाल के हफ्तों तक इसने महज विकास और संप्रग के दूसरे शासनकाल में कुशासन को ही मुख्य मुद्दा बनाए रखा. यह बड़ी कुशलता से हालात और माहौल का भी इस्तेमाल करने में कामयाब रही: अहम रूप से इसने कांग्रेस के खिलाफ जनता के गुस्से को, अगले कांग्रेसी नेता के सीधे वारिस राहुल गांधी के व्यक्तित्व की कमजोरियों को, और बदलाव के लिए कॉरपोरेट भारत के समर्थन का इस्तेमाल किया है. यह सारा कुछ उसने सटीक प्रबंधन रणनीति के साथ किया है. पार्टी के भीतर मतभेदों को एक तरफ करते हुए इसने बड़े पूंजीपतियों के दुलारे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया है. इसके लिए यह गुजरात में मोदी के शासन को उसकी काबिलियत के सबूत के रूप में पेश कर रही है. अपने गुजरात मॉडल के झूठ के लगातार उजागर होने की रत्ती भर परवाह किए बगैर मोदी ने गोएबलीय आवेश में तूफानी अभियान चलाया और चुनावों में यह मॉडल उसके लिए कारगर होता दिख रहा है. लेकिन अब जब चुनाव खत्म होने को आए हैं, अचानक भाजपा का असली इरादा सतह पर दिखने लगा है.
सांप्रदायिकता के धारदार पंजे
इस चुनाव में भाजपा का विकास का मुद्दा महज दिखावे की रणनीति है. विकास को मुद्दा बनाने का मतलब यह नहीं है कि भाजपा हिंदुत्व के अपने एजेंडे से ऊपर उठ गई है. भाजपा ने दिल्ली में सत्ता पर फिर से काबिज होने के मौके को साफ साफ देखा और उसने यह महसूस किया कि हिंदुत्व को जरूरत से ज्यादा जोर देने पर मतदाताओं से वैसा फायदा नहीं मिल सकेगा, जो इसकी पिछली सफलता के बाद से भारी बदलाव देख चुके हैं. लेकिन, विकास को केंद्रीय मुद्दे के रूप में पेश करने के बावजूद हिंदुत्व हमेशा इसकी पीठ पर सवार रहा है. वैसे भी, विकास और हिंदुत्व का आपस में कोई अनिवार्य रूप से विरोध नहीं है. सकल घरेलू उत्पाद या ऐसे ही पैमानों पर मापे जाने वाले विकास की जो समझदारी सब जगह पर हावी है, वो राष्ट्रीय पहचान के साथ साथ बखूबी चल सकती है, जिसे भाजपा अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ पूरी ताकत से पेश करती है. तेजी से बढ़ता हुआ मध्य वर्ग और पेशेवर शिक्षित युवा वर्ग अपनी कामयाबी और संभावनाओं को पूरे देश पर लागू करके सोचता है कि भारत एक महाशक्ति बन सकता है. इस हिंदुत्व पहचान के साथ अकेली दिक्कत धार्मिक अल्पसंख्यक और निचली जातियों को होती है, हालांकि इसकी तादाद भी तेजी से घटती जा रही है, क्योंकि वे खुद को इसके प्रभावी अवतार का सीधे सीधे शिकार होते देखती हैं.

इसलिए अपने आधार को बढ़ाने के लिए भाजपा स्वाभाविक रूप से हिंदुत्व के बहुत अधिक प्रचार से परहेज कर रही है. पिछले बरसों में इसने अपना एक जनाधार बनाया है, जो वैसे भी जानता है कि असल में भाजपा क्या है. लेकिन भाजपा अगर प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने का सपना देख रही है तो वह दूसरों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती. इसके अलावा, गठबंधन के दौर में, उसे उन संभावित सहयोगियों का भी खयाल रखना पड़ता है, जो इसकी विचारधारा के साथ खुले तौर पर जुड़ना पसंद नहीं करेंगे. इसलिए हिंदुत्व को पिछली सीट पर बिठा दिया गया है, जिसे भीतर ही भीतर और पूरी किफायत से इस्तेमाल किया जाना है जैसा कि उन्होंने मुजफ्फरनगर में किया या जैसे इसके छुटभैए अभी कर रहे हैं. हिंदुत्व का व्यावहारिक उपयोग हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ मजबूती से एकजुट करना है. जहां भी उसे इसकी जरूरत दिखेगी, भाजपा इसका इस्तेमाल करेगी. उत्तर प्रदेश में, भाजपा अरसे से कमजोर रही है. वहां सपा और बसपा ने क्रमश: मुसलमानों और दलितों को अपने मुख्य जनाधार के रूप में अपने साथ रखते हुए जमीनी कब्जा बनाए रखा है. इसमें उन्हें भाजपा के बंटे हुए जनाधार से भी मदद मिली है. ऐसे हालात में भाजपा हिंदुत्व के हथियार का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगी. लेकिन इसी के साथ वो ऐसा खुल्लमखुल्ला नहीं करेगी.
वही बदनुमा चेहरा
तभी अचानक मध्य अप्रैल से हिंदुत्व के अनेक छुटभैए इसका उल्लंघन करते हुए अपने धारदार पंजों के साथ सामने आने लगे. 5 अप्रैल को नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी और भाजपा के महासचिव अमित शाह ने आशंका के मुताबिक हमलों की शुरुआत करते हुए कहा कि चुनाव, राज्य में सरकार की हिमायत पाने वाले मुट्ठी भर लोगों द्वारा किए गए जनता के अपमान का बदला लेने का मौका हैं. ‘ये महज एक और चुनाव भर नहीं है. यह हमारे समुदाय के अपमान का बदला लेने का मौका है. यह चुनाव उन लोगों को एक जवाब होगा जो हमारी मांओं और बहनों के साथ दुर्व्यवहार करते आए हैं,’ उसने कहा. 19 अप्रैल को ठीक मोदी के अहमदाबाद में उसके दोस्त और विहिप के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने खबरों के मुताबिक हिंदू इलाकों में संपत्तियां खरीदनेवाले मुसलमानों को निशाना बनाते हुए अपने समर्थकों से उनको जबर्दस्ती निकाल बाहर करने को कहा. उसी दिन नीतीश सरकार में मंत्री रह चुके गिरिराज सिंह ने झारखंड के देवघर में एक चुनावी सभा में कहा कि जो मोदी का विराध कर रहे हैं उनके लिए भारत में जगह नहीं है और उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए. मोदी के नजदीकी सहकर्मियों की तरफ से आ रहे इन भयावह और घिनौने बयानों ने अनेक जानकारों को स्तब्ध कर दिया है, वे नहीं समझ पा रहे हैं कि ये लोग मोदी की संभावनाओं पर क्यों गैर जरूरी तौर पर पानी फेर रहे हैं, जबकि सारा कुछ मोदी के लिए अनुकूल ही चल रहा है.

असल में, अनगिनत मुंहों वाले संघ परिवार की कपटता से भरी दलीलों की थाह ले पाना आमतौर पर मुश्किल होता है, भाजपा जिसका एक हिस्सा भर है. ज्यादातर तो यह हालात को परखने के लिए भी बयान जारी करती है ताकि यह जान सके कि उस पर कैसी प्रतिक्रियाएं आएंगी. तब यह दिखाने के लिए कि इसने सीमा नहीं तोड़ी है, यह भीतर से ही एक दूसरा बयान जारी करती है. जैसी की उम्मीद की जा सकती है, मोदी ने तोगड़िया के बयान को ‘नफरत से भरा बयान’ बताते हुए कहा कि ‘इस तरह के संकीर्ण बयान देकर खुद को भाजपा का शुभचिंतक साबित करने वाले लोग वास्तव में अभियान को विकास और अच्छे प्रशासन के मुद्दे से भटकाना चाहते हैं.’ आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ‘मैंने प्रवीण तोगड़िया से बात की है, उन्होंने ऐसे किसी बयान से इन्कार किया है. यह मनगढ़ंत है. कोई स्वयंसेवक ऐसी विभाजनकारी बातें नहीं सोच सकता. वे सभी लोगों को एक मानते हैं: एक जनता, एक राष्ट्र.’ भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर माधव के बयान को मजबूती देते हुए इससे भी आगे बढ़ गए और कहा कि तोगड़िया इस मामले में कानूनी कदम उठाने जा रहे हैं. जबकि बयान ने अपना मकसद पूरा कर लिया था, उसने अपने जनाधार को यह यकीन दिला दिया था कि भाजपा ने हिंदुत्व के मकसद को पीछे नहीं छोड़ा है. तब धर्मनिरपेक्षों और मुसलमानों ने यह सोच कर अपने मन को मना लिया कि ये या तो एक अतिउत्साही ‘भाजपा समर्थक’ की गलतबयानी थे जिसस पार्टी सहमत नहीं है, या फिर वे पूरी तरह ही गलत थे.

हालांकि अमित शाह के मामले में, भाजपा ने यह कहते हुए उसका बचाव किया कि जो हुआ था उसके लिए धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले ही जिम्मेदार थे. ‘जो लोग सेकुलर टूरिज्म करने गए थे उन्होंने अपमान किया है, चाहे हिंदू हो या मुसलमान.’ भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने एएनआई को बताया. तोगड़िया और शाह दोनों की टिप्पणियां रणनीतिक थीं: तोगड़िया हिंदुओं को बताना चाहते थे कि कुछ भी नहीं बदला है, और शाह की भड़काऊ लफ्फाजी उत्तर प्रदेश के गैर मुस्लिम और गैर दलित मतदाताओं को पूरे उत्साह से वोट डालने के लिए उकसाने की खातिर थी. सीएसडीएस लोकनीति-आईबीएन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक यह रणनीति कारगर हो गई लगती है, जिसके मुताबिक भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साफ तौर से आगे है. सर्वेक्षण दिखाता है कि असल में मुजफ्फरनगर दंगे और उनके असर को इस साल प्रमुखता मिलती गई है. 78 फीसदी जवाबदाताओं ने मार्च में कहा कि वे 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बारे में जानते थे, जबकि जनवरी में यही बात 64 फीसदी लोगों कही थी. इसके साथ साथ 40 फीसदी लोगों ने कहा कि वे मानते थे कि दंगों के लिए समाजवादी पार्टी ‘सबसे ज्यादा जिम्मेदार’ थी. जाहिर है कि यह एक जोखिम भरा जुआ था, लेकिन भाजपा ऐसा जुआ खेलने में माहिर है.
ठेंगे पर गठबंधन
भाजपा सबसे जोखिम भरा जुआ यह खेल रही है कि वो अपने संभावित सहयोगियों के साथ दुश्मनी बढ़ाती जा रही है. शायद उसने यह गलतफहमी पाल रखी है, जैसा कि उसने 2004 में ‘भारत उदय’ अभियान को लेकर पाली थी, कि वो 272 सीटों के जादुई आंकड़े को हासिल कर लेगी और इसीलिए वो अपनी अकड़ दिखाती फिर रही है. शायद यह सीधे सीधे उन दलों के खिलाफ हमलावर रुख अपना रही है जिन्होंने अभी उसे समर्थन नहीं दिया है. खुद मोदी अपने संभावित सहयोगियों ममता बनर्जी, फारूक अब्दुल्ला, जयललिता और नवीन पटनायक के खिलाफ हमले तेज करते हुए यह जुआ खेल रहा है. 8 फरवरी को, बातें बढ़ा चढ़ कर कहने के अपने अंदाज में मोदी ने कहा कि ‘तीसरा मोर्चा’, जिसके जयललिता और नवीन पटनायक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, भारत को ‘तीसरे दर्जे’ के देश में बदल देगा. इसने दोनों को नाराज कर दिया. इसी तरह ‘गुजरात’ को लेकर हांकी जा रही डींग दूसरे सहयोगियों को नहीं भा रही है क्योंकि यह उनके कामकाज को कमतर करके बताती है.

इन छिपे हुए अपमानों के साथ साथ, मोदी ने एआईएडीएमके और डीएमके दोनों की सीधी आलोचना की कि इन्होंने तमिल लोगों के विकास की अनदेखी की है और इन्हें आपस में ही लड़ने से फुरसत नहीं मिली. जयललिता ने यह कहते हुए पलटवार किया कि गुजरात का विकास एक ‘मिथक’ है और तमिलनाडू का विकास गुजरात से कहीं अधिक प्रभावशाली है. अपने राज्य की कावेरी पट्टी के करुर में एक हालिया रैली में जयललिता ने भाजपा पर ‘विश्वासघात’ करने का आरोप लगाते हुए कहा कि तमिलनाडू तथा कर्नाटक के बीच चल रहे पानी बंटवारे के विवादास्पद मुद्दे पर उसमें और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है. उन्होंने लोगों से इसे यकीनी बनाने की मांग की कि डीएमके, कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो जाएं. मोदी ने नवीन पटनायक पर साजिश करके तीसरे मोर्चे के जरिए कांग्रेस को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया. अपने पूर्व प्रशसंक फारूक अब्दुल्ला के साथ एक वाक्युद्ध में मोदी ने कहा कि फारूक और उनके परिवार ने कश्मीर का सांप्रदायीकरण कर दिया है. हाल में कोलकाता में एक चुनावी रैली में, पश्चिम बंगाल में हुए एक कई करोड़ों के कुख्यात चिट फंड घोटाले के मामले में ममता को लेकर किए गए संकेतों के जवाब में उन्हें तृणमूल कांग्रेस की तरफ से ’शैतान’ और ’गुजरात के कसाई’ जैसी तीखी उपाधियां मिली. साथ ही पार्टी ने मानहानि के मुकदमे की धमकी भी दी.

मोदी सत्ता तक ले जाने वाले पुलों को खुद ही क्यों जला रहा है? यह तब है जब जनमत सर्वेक्षणों का सबसे अनुकूल अनुमान भी बहुमत के आंकड़े से दूर ही बना हुआ है. बेशक इन अनुमानों में बढ़ोतरी के रुझान हैं लेकिन कोई भी भली चंगी बुद्धि वाला इंसान इन अनुमानों से बड़े नतीजे नहीं निकालेगा और अपने बहुमत को इतना पक्का नहीं मानेगा. लेकिन किसी न तरह से, भाजपा 272 के निशान को पार करने को लेकर आश्वस्त दिख रही है. इसका एजेंडा जो भी हो, इसने सबके खिलाफ उद्दंडता का प्रदर्शन करके अनजाने ही अपने अलोकतांत्रिक चरित्र की कड़वी सच्चाई उजागर कर दिया है. अगर यह सत्ता में आती है, तो यह अपने मकसद को पूरा करने की राह में आने वाली किसी भी राय के साथ सख्ती से पेश आएगी.

23 अप्रैल 2014

चुनावों की चालबाजियां: आनंद तेलतुंबड़े


मौजूदा चुनावी प्रक्रिया, इसके जातीय पहलू और जनता के हितों के अनुकूल एक मुनासिब चुनावी प्रणाली के विकल्पों पर आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. द हिंदू में  प्रकाशित, अनुवाद: रेयाज उल हक

कुछ ही दिनों में सोलहवें आम चुनावों की भारी भरकम कसरत पूरी हो जाएगी. और इसी के साथ भारत के सिर पर लगे दुनिया के सबसे महान कार्यरत लोकतंत्र के ताज में एक और हीरा जड़ जाएगा, जबकि यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेचारगी और छीन ली गई आवाजों के साथ अपने वजूद के संघर्ष में फिर से जुट जाएंगे. लोकतंत्र के कुछ महीने लंबे नाच के आखिर में चुने हुए प्रतिनिधि बच जाएंगे जो अपने करोड़ों के निवेश पर पैसे बनाने के धंधे में लग जाएंगे. इस गरीब देश को चुनावों की इस प्रक्रिया की जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसकी तुलना सिर्फ अमेरिका से ही हो सकती है (ऐसा कहा गया है कि भारतीय राजनेता 2012 के पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में खर्च की गई 7 बिलियन डॉलर की राशि के बरअक्स 5 बिलियन डॉलर खर्च करने वाले हैं) और इस पूरी प्रक्रिया में वे सब साजिशें और छल-कपट किए जाते हैं, जिनकी कल्पना कोई इन्सान कर सकता है. जाहिर है कि तब इन सबकुछ को सिर्फ मुट्ठी भर अमीरों के निजाम और अपराधों के जरिए ही कायम रखा जा सकता है. चूंकि हकीकत में ऐसा ही होता रहा है, इसलिए इस पर गौर करना होगा कि भारत की खामियों को तलाशते हुए चुनावों की इस प्रक्रिया की पड़ताल जरूरी है.

जनता के साथ धोखा

उदारवादी ढांचे में प्रत्यक्ष लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. चुनावों का मकसद लोकतंत्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों को चुनना है. हालांकि लोगों की पसंद राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों और कुछ निर्दलियों तक सीमित होती है, जिनमें से ज्यादातर तो मुख्य राजनीतिक दलों के चुनावी गुना-भाग में मदद करने के लिए कठपुतली उम्मीदवार के रूप में खड़े होते हैं. यही वजह है कि बिना किसी काम का सबूत दिए, चुनाव दर चुनाव समान लोगों का समूह चुना जाता रहा है. यह पूरी प्रक्रिया [बाकियों के] भीतर दाखिल होने की रुकावट के रूप में काम करती है. मिसाल के लिए, लोक सभा के उम्मीदवार को अधिकतम 75 लाख रुपए खर्च करने की इजाजत है, यह खर्च सिर्फ मुख्यधारा के राजनीतिक दल ही उठा सकते हैं. लेकिन असली खर्च तो इससे कई गुना ज्यादा होता है. अगर चुनावों में कोई भारी पूंजी लगाने का जोखिम उठाता है, तो सैद्धांतिक रूप से इस निवेश पर उसे फायदा भी होना चाहिए. चूंकि इसका [कानूनन] कोई फायदा नहीं है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है. इसने राजनीति को टिकटों के बड़े कारोबार में बदल दिया है, जिसमें बेजोड़ मुनाफा है और यह सब लोगों की नजरों से छुपा हुआ होता है. नेता सामंत बन जाते हैं और निर्वाचन क्षेत्र उनकी जागीर, जिसकी किलेबंदी बाहुबल और धनबल से होती है.

एक एनजीओ एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के सौजन्य से चुनावों में हिस्सा लेने वाले नेताओं के बारे में जानकारी अब सरेआम है. नेता चुनाव आयोग को जो हलफनामे जमा करते हैं, एडीआर ने उनमें से जानकारियां जुटा कर उन्हें इस तरह पेश किया है कि लोग समझ सकें. हालांकि ये आंकड़े नेताओं द्वारा खुद कबूल किए जाते हैं और इसकी गुंजाइश ज्यादा है कि उन्हें बहुत घटा कर बताया जाता होगा लेकिन इसके बावजूद इन आंकड़ों से यह उजागर होता है प्रतिनिधियों में करोड़पतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. पंद्रहवीं लोकसभा चुनावों में 1205 करोड़पति उम्मीदवार थे, जिनमें से 300 से ज्यादा संसद में पहुंचे. अपराधों के आंकड़े भी उनकी बढ़ती हुई दौलत के साथ बढ़ते जाते हैं और ये सभी दलों में मौजूद हैं. दो मुख्य दलों कांग्रेस और भाजपा से जुड़े करोड़पति सांसदों की संख्या 2004 में क्रमश: 29 और 26 थी, जो 2009 में बढ़ कर 42 और 41 हो गई. ये उस जनता, उस व्यापक बहुसंख्या के प्रतिनिधि थे जो 20 रुपए रोज पर गुजर करती है! हरेक चुनाव में उनकी बेपनाह दौलत के बढ़ने की दर इससे भी अधिक दिलचस्प है. एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच (एनइडब्ल्यू) ने अपने विश्लेषण में पाया कि फिर से चुनाव लड़ रहे 317 उम्मीदवारों की दौलत 1000 प्रतिशत बढ़ गई थी. ये दरें तो कॉरपोरेट दुनिया में भी नहीं सुनी जाती हैं. एक औसत क्षमता का इंसान, जो ऊपर से गरीबों की सेवा में लगा हो, यहां बेहतरीन फंड प्रबंधकों को मात दे देता है! आम मामलों में ऐसे सबूत आयकर और भ्रष्टाचार-निरोधक अधिकारियों के कान खड़े कर देते हैं, लेकिन इन दौलतमंदों के राजनीतिक रिश्ते उन्हें ऐसे दुनियावी खतरों से बचाए रखते हैं. यहां इस दौलत के स्रोतों के बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा रहा है, जबकि यह जानी हुई बात है कि पूरी मशीनरी जनता के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और दूसरे धन्ना सेठों के लिए काम करती है.

चुनावों की पद्धति

जब भारत आजाद हुआ, तो नए शासकों के सामने सबड़े बड़ी चुनौती जनता की वे उम्मीदें थीं, जो आजादी के संघर्ष के दौरान पैदा हुई थीं. ये उम्मीदें क्रांति के बाद के रूस (सोवियत संघ) द्वारा हासिल की गई शानदार तरक्की, दूसरे विश्व युद्ध के बाद की कल्याणकारी तौर-तरीकों और पड़ोसी चीन में क्रांति जैसी घटनाओं से कई गुना बढ़ गई थीं. सत्ता हस्तांतरण के दौरान भड़की सांप्रदायिक उथल पुथल, रियासतों के रूप में मौजूद 600 राजनीतिक इकाइयों का भारत के भीतर एकीकरण, देश के कुछ इलाकों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हथियारबंद संघर्षों और निचली जातियों के उभार ने एक साथ मिल कर नए शासकों के सामने एक भारी चुनौती पेश की थी. उन्होंने जो गणतांत्रिक संविधान बनाया था, उसमें इन उम्मीदों की झलक थी. हालांकि वास्तविक अर्थों में, सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी, बुर्जुआ हितों की प्रतिनिधित्व करती थी और उसे बड़ी कारीगरी से उसे बढ़ावा भी देना था. एक तरफ जनता की उम्मीदों को पूरा करने का दिखावा करने की जरूरत और दूसरी तरफ वास्तव में पूंजी के हितों को बढ़ावा देने से एक तनाव पैदा हुआ. यह तनाव इसकी एक के बाद एक बेईमानी भरी कार्रवाइयों की श्रृंखला में भी दिखा. समाजवादी दिखावे के लिए पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की गई लेकिन भीतर ही भीतर बंबई योजना को अपनाया गया था-जिसे तब के देश के आठ शीर्ष पूंजीपतियों ने बनाया था. या फिर भूमि सुधारों की शुरुआत की गई, लेकिन इसमें सुनिश्चित किया गया कि उन पर इस तरह अंकुश बना रहे कि व्यापक देहातों में सहयोगी के रूप में धनी किसानों का एक वर्ग बनाया जा सके. या फिर भूख खत्म करने के नाम पर देहातों में पूंजीवादी संबंधों के प्रसार के लिए हरित क्रांति को आगे बढ़ाया गया. ये महज कुछेक मिसालें हैं. लोकतंत्र को चलाने के लिए राजनीतिक रूप से एक ऐसी पद्धति जरूरी थी, जिससे उन्हें सत्ता पर पूरा नियंत्रण हासिल होता.

सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित करने वाली चुनावी [एफपीटीपी-फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम] व्यवस्था शासक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने वाली ऐसी ही पद्धति थी. यों यह व्यवस्था औपनिवेशिक शासन से विरासत में अपनाई गई थी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश रह चुके दूसरे सभी देशों में हुआ था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जो भारत को अपने हालात के मुताबिक एक बेहतर पद्धति को अपनाने के लिए इसे छोड़ने से रोकता. आज हम खुद को जिन बुराइयों से घिरा हुआ पाते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी एफपीटीपी व्यवस्था से पैदा हुई हैं. असाधारण रूप से ऐसी विविधता भरे राज्यतंत्र में होने वाले चुनावों में एक अकेले विजेता का होना बहुसंख्यक तबके के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था. इसका नतीजा यह हुआ कि समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को बहुसंख्यक तबके के हितों के साथ समझौता करना पड़ा, जिसने इन समूहों को मिला लिए जाने [को-ऑप्शन] और दूसरी धांधलियों का रास्ता खोल दिया. देश में हितों की विविधता अभी भी अनेक दलों को आगे ले आ सकती है, जो बुनियादी रूप से प्रतिस्पर्धी एफपीटीपी चुनावों को और भी बदतर बना देगी, जिसके साथ साथ बढ़ी हुई दर के साथ भारी खर्चे बढ़ते जाएंगे जिन्हें बड़े कारोबार पूरा करेंगे. इसी में जातियों, समुदायों, धर्म वगैरह जैसी मौजूदा खामियों और बेशक बाहुबल का बेरोकटोक इस्तेमाल भी बढ़ेगा. दलगत सीमाओं से ऊपर उठ कर, अनिवार्य रूप से यह सभी शासक वर्गों के मुट्ठीभर लोगों की शक्ति संरचना में रूप में विकसित हो गया है, जिसकी अनेक तरीकों से हिफाजत की जाती है और जिसकी सर्वोच्च ताकत पुलिस और फौज है.

एक वैकल्पिक मॉडल

क्या चुनावों की इस पद्धति का कोई विकल्प नहीं था? देश में शक्ल ले रहा विविधतापूर्ण राज्यतंत्र चुनावों के एक अलग मॉडल की तरफ इशारा करेगा. इसे हम आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कह सकते हैं. यह वो व्यवस्था है जो ज्यादातर यूरोपीय लोकतंत्रों और उन अनेक दूसरे देशों में अपनाई जाती है जिनका लोकतांत्रिक रेकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हालांकि व्यावहारिक रूप में आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था की अनेक किस्में हैं. लेकिन बुनियादी रूप से ये दलों या सामाजिक समूहों के लिए मतदान की व्यवस्था देती हैं (न कि किसी व्यक्ति को वोट देने के), जो अपने मतों के हिस्से के अनुपात में प्रतिनिधित्व पाते हैं. मिसाल के लिए दलित भारत में 17 फीसदी हैं लेकिन हरेक निर्वाचन क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के कारण वे एफपीटीपी व्यवस्था में कभी भी स्वतंत्र रूप से नहीं चुने जाते, आरक्षित सीटों पर भी नहीं. आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था संसद और विधान सभाओं में उनकी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करेगी और यह उन्हें अपने जनाधार का विस्तार करने वाली शक्ति भी मुहैया करा सकती है. आज जिसे थोड़े नरम शब्दों में बहुजन कहा जाता है, उसका निर्माण इसी प्रक्रिया के जरिए मुमकिन था. सामाजिक पहचान की जगह वर्गीय चेतना लेगी और पूरी राजनीति को वर्गीय धुरी पर केंद्रित करेगी. इस व्यवस्था में कोई गलाकाट मुकाबला भी नहीं होगा, क्योंकि हरेक समूह को तर्कसंगत रूप से उनके हिस्से का प्रतिनिधित्व मिलेगा. इसके बजाए मुकाबला संसद के भीतर होने लगेगा, जिसे बहुसंख्यक जनता के हितों में नीतियां बनानी होंगी. एफपीटीपी व्यवस्था में, एक बार चुनाव हो जाने के बाद, नीतिगत मामलों पर संसद में बहस के लिए प्रेरणा देने वाली कोई ताकत नहीं होती. जनता पर असर डालने वाली सरकार की ज्यादातर भौतिक नीतियां (जैसे कि आपातकाल लागू किया जाना और नवउदारवादी आर्थिक सुधार) पर संसद में कभी बहस ही नहीं हुई.

एफपीटीपी चुनावों में सैद्धांतिक खामी यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को आधे मतदाताओं का वोट भी मुश्किल से ही मिला होता है. यह खामी आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में इस तरह दूर हो जाती है कि यह समान हितों के आधार पर बने ज्यादातर समूहों को उनकी उचित हिस्सेदारी देता है. एफपीटीपी चुनावों में गहन मुकाबले के नतीजे में भारी खर्चे होते हैं और उसके बाद भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होती है, जिन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में दूर किया जा सकता है. सबसे अहम बात यह कि भारत के संदर्भ में, यह शासक वर्गों द्वारा जनता को जातियों और समुदायों में बांटने के बुरे मंसूबों पर लगाम लगाती है. मिसाल के लिए, दलितों के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत नहीं रह जाएगी और इस तरह दलित होने के ठप्पे की भी जरूरत नहीं रहेगी. इस तरह राजनीति में से जातियों का बोलबाला भी खत्म हो जाएगा. हालांकि कोई भी व्यवस्था किसी को अपने समुदाय से अलग होकर उसे समुदाय हितों के खिलाफ काम करने से नहीं रोक सकती, लेकिन आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था समुदाय को उसकी उचित हिस्सेदारी देकर इसकी ढांचागत गुंजाइश को खत्म कर सकती है. दलित पूना समझौते के जरिए गांधीवादी ब्लैकमेल पर बरसों से अफसोस जताते आए हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि यह समझौता एफपीटीपी व्यवस्था पर टिका था. पूना समझौता आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता खो देगा. इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि जातियों की पहचान को बनाए रखने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी और इसी तरह खत्म हो जाएंगी वे सारी तकलीफदेह मुश्किलें भी, जो इस जरूरत से पैदा हुई हैं.

सचमुच, भारत को इससे भारी फायदा होगा, लेकिन क्या शासक वर्ग को इसकी परवाह होगी?

22 अप्रैल 2014

सामाजिक कार्यकर्ता प्रशान्त राही की रिहाई के लिये आई.आई.टी. बी.एच.यू. से उठी आवाज

 शैलेश कुमार
                जो समाज औरों के इन्साफ की जंग लड़ने वालों के साथ हो रहे अन्याय पर भी चुप्पी साधे रहे, समझो की उस समाज में इंसाफ मर रहा है। वो समाज कायरता व बेपरवाही की नपुंसकता से ग्रस्त है, उस समाज में आज़ाद मनुष्य नहीं, गुलाम प्राणी रह रहे हैं। ऐसी ही एक दास्तान है मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे प्रशान्त राही की। जिनकी रिहाई के लिये गत् 8 अपै्रल को आई.आई.टी. बी.एच.यू. के छात्रों व भगत सिंह छात्र मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने आई.आई.टी. बी.एच.यू. में ही गेस्ट प्रोफेसर के रूप मंे कार्यरत मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय के नेतृत्व में एक कैण्डिल मार्च निकाला। यह कैण्डिल मार्च आई.आई.टी. बी.एच.यू. से होते हुए मुख्य द्वार बी.एच.यू. तक पहुंच कर सभा में बदल गया। प्रशान्त राही ने 90 के दशक में एक मेधावी छात्र के रूप में प्रौद्योगिकीय संस्थान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में बीटेक तथा एमटेक किया। पेशे से वह एक पत्रकार थें। समाज सेवा करते हुए उन्होने कई नामी अखबारों में सामाजिक विषयों पर अंग्रेजी व हिन्दी लेख लिखे। उत्तराखण्ड राज्य निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले प्रशान्त राही ने तहरी बांध निर्माण के समय विस्थापित हुए ग्रामीण एवं आदिवासी लोगों के अधिकारों की मांग के आन्दोलन का नेतृत्व किया। फलस्वरूप सरकार को उन्हंे उनका हक देना पड़ा। प्रशान्त की यह सक्रियता भारतीय राज्य को बर्दाश्त नहीं हो रही थी, इसलिये दिसम्बर 2007 में उन्हें अवैधानिक और अमानवीय तरीके से गिरफ्तार कर टार्चर किया गया और करीब 4 साल उन्हें जेल में गुजारना पड़ा। बाद में उन्हें 21 अगस्त 2011 को जमानत पर छोड़ा गया। जेल में उन्होंने राजनैतिक कैदियों के भीषण दुर्दशा को महसूस किया और यह तय किया कि रिहा होने के बाद वो राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिये काम करेंगे। और वो ऐसा कर भी रहे थे। उनके इन प्रयासों से कुछ लोग रिहा भी हुए और कईयों के केसों में भारी प्रगति हुई। भारतीय राज्य को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और एक बार फिर सितम्बर 2013 में जब उनके 2007 वाले मुकदमें की अन्तिम सुनवाई होनी थी एवं न्यायालय द्वारा उनके दोषमुक्त होने की पूरी संभावना थी तभी 1 सितम्बर 2013 को उन्हें रायपूर से दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया तथा गिरफ्तारी को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में दिखाया गया। सभा में अपनी बात रखते हुए संदीप पाण्डेय ने कहा कि ’’प्रशान्त राही जैसे हजारों लोग जो समाज के लिये कार्य कर रहे हैं उन्हे नक्सलवाद के नाम पर यूएपीए के अन्तर्गत फर्जी मुकदमों में फसाकर जेलांे में डाल दिया जा रहा है और उनके मुकदमों की बहुत ही धीमी गति से सुनवाई हो रही है। बल्कि विडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये एवं केवल पुलिस के बयान पर केस की सुनवाई की जा रही है।’’ इस कड़ी में प्रशान्त के वकील शिव प्रसाद,  भगत सिंह छात्र मोर्चा के सचिव रितेश विद्यार्थी, आई.आई.टी. के छात्र माॅनिश बब्बर ने भी अपनी बात रखी। वक्ताओं ने एक स्वर में यूएपीए सरीखे काले कानूनों को रद्द करने व प्रशान्त राही को तत्काल रिहा करने की मांग की। जुलुस एवं सभा का संचालन आई.आई.टी के छात्र माॅनिश बब्बर व निखिल जैन ने किया।  
प्रशांत राही रिहाई समिति की ओर से जारी पर्चा.
द्वारा: संदीप पाण्डेय

शायर और शहज़ादी: शकीरा के बारे में मार्केस




वे दोनों महानतम कोलम्बियनों में शुमार हैं: शकीरा और गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़. नैसर्गिक था कि वे कहीं न कहीं मिलते.


एक फ़रवरी को शकीरा मायामी से बूएनोस आइरेस पहुंची, एक रेडियो प्रोग्राम के लिए उससे फ़क़त एक सवाल पूछने का इच्छुक एक पत्रकार उन का पीछा करता आ रहा था. कई वजूहात से वह ऐसा नहीं कर सका तो उसने अपनी रपट का शीर्षक रखा: "शकीरा तब क्या कर रही होती है जब उनसे कोई ढूंढ ही नहीं सकता?" हंसी से दोहरी होती हुई शकीरा हाथ में डायरी थामे समझाती है. "मैं ज़िन्दगी जी रही हूं."

वह एक फ़रवरी की शाम को बुएनोस आइरेस पहुंची थी, और अगले दिन वह दोपहर से लेकर आधी रात तलक काम करती रही; उस दिन उसका जन्मदिन था, लेकिन उसे मनाने को उसके पास समय ही नहीं था. बुधवार को वह वापस मायामी चल दी, जहां उसने एक लम्बे पब्लिसिटी शूट में हिस्सा लिया और कई घन्टे अपने ताज़ा अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण के लिए रेकॉर्डिंग की. शुक्रवार की दोपहर दो बजे से शनिवार की सुबह तक उसने दो गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग पूरी की. उसके बाद वह तीन घन्टे सोई और दोबारा स्टूडियो पहुंची जहां उसने दोपहर तीन बजे तक काम किया. उस रात वह थोड़ा सोई और इतवार की भोर लीमा जाने वाले हवाई जहाज़ पर सवार हुई. सोमवार की पूर्वान्ह वह एक लाइव टीवी शो में उपस्थित थी; चार बजे उसका एक टीवी विज्ञापन शूट हुआ; शाम को वह अपने पब्लिसिस्ट द्वारा दी गई एक पार्टी में मौजूद थी जहां वह भोर तक जगी रही. अगले दिन यानी नौ फ़रवरी सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक को उसने रेडियो, टीवी और अख़बार के लिए आधे आधे घन्टे के ग्यारह इन्टरव्यू दिए. बीच में एक घन्टा लंच के लिए निकाला गया. उसे वापस मायामी पहुंचना था मगर अन्तिम क्षणों में उसने बोगोटा में ठहरना तय किया, जहां वह भूकम्प के शिकार लोगों तक अपनि सहानुभूति जताने पहुंची.

उसी रात वह किसी तरह मायामी जाने वालि आख़िरी फ़्लाइट पकड़ पाने में कामयाब हुई जहां अगले चार दिनों तक वह स्पेन और पेरिस में होने वाली अपनी कन्सर्ट्स के लिए रिहर्सल में व्यस्त रही. अपने अल्बमों के अंग्रे़ज़ी संस्करणों के लिए उसने शनिवार लंचटाइम से लेकर सुबह साढ़े चार बजे तक ग्लोरिया एस्टेफ़ान के साथ काम किया. दिन फटने पर वह वह अपने घर पहुंची जहां उसने एक कॉफ़ी पी, डबलरोटी का एक टुकड़ा खाया और पूरे कपड़ों में सो गई. मंगलवार सोलह तारीख़ को वह कोस्टा रिका में एक लाइव टीवी शो में मौजूद थी. बृहस्पतिवार को वह वापस मायामी पहुंची जहां उसने 'सेन्सेशनल सैटरडे' नाम के एक टीवी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था.

वह बमुश्किल सो पाई - 21 को उसने वेनेज़ुएला से लॉस एन्जेलीस पहुंचकर ग्रैमी समारोह अटैन्ड करना था. उसे विजेताओं की सूची में होने की उम्मीद थी पर अमरीकियों ने तमाम मुख्य पुरुस्कार जीत लिए. लेकिन इस से उसकी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई: 25 को वह स्पेन में थी जहां उसने 27 और 28 फ़रवरी को काम किया. एक मार्च तक आखीरकार वह मैड्रिड के एक होटल में पूरी रात सो पाने का समय निकाल सकी. उस समय तक वह एक महीने में एक पेशेवर फ़्लाइट अटैन्डेन्ट के बराबर यानी चालीस हज़ार किलोमीटर की यात्राएं कर चुकी थी.

ठोस धरती पर भी शकीरा का काम कोई कम मुश्किल न था. उसके साथ चलने वाली संगीतकारों, लाइट टैक्नीशियनों और साउन्ड इंजीनियरों इत्यादि की टीम किसी लड़ाकू दस्ते जैसी नज़र आती है. वह हर चीज़ पर ख़ुद निगाह रखती है. उसे संगीत पढ़ना नहीं आता पर उसकी विशुद्ध आवाज़ और पूरा फ़ोकस इस बात की गारन्टी करते हैं कि उसके संगीतकार एक-एक नोट को सही सही लगा सकें. अपनी टीम के हर सदस्य के साथ उसके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं. वह अपनी थकान को जाहिर नहीं होने देती पर इस से आपको छलावे में नहीं पड़ना चाहिये. अर्जेन्टीना के चालीस कन्सर्ट्स वाले दौरे के आख़िरी दिनों में उसके एक सहायक को उसे बस में चढ़ने में मदद करनी पड़ी थी. कभी कभी उसकी धड़कनें बढ़ जाती हैं और उसे त्वचा की एलर्जी जैसी शिकायतें भी हो जाया करती हैं.

'दोन्दे एस्तान लोस लाद्रोनेस?' (सारे चोर कहां हैं?) अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण की तैयारी में एमीलियो एस्टेफ़ान और उसकी पत्नी ग्लोरिया के साथ की गई उसकी कड़ी मेहनत ने स्थिति को और भी मुश्किल बना दिया था. इस समय शकीरा को अपने जीवन के सबसे दबावभरे समय से जूझना पड़ा था: वह ठीकठाक अंग्रेज़ी बोल लेती है पर अपने उच्चारण को ठीक बनाने के लिए उसने इस कदर ऑब्सेशन की हद तक काम किया था कि वह सपने में भी कभी कभी अंग्रेज़ी बोला करती थी.

कोलम्बिया के बारान्कीया के एक जौहरी विलियम मेबारेक और उसकी पत्नी नाइदिया रिपोल के अरबी मूल के कलाप्रेमी परिवार में जन्मी थी शकीरा. उसकी कड़ी मेहनत और असाधारण बुद्धिमत्ता का परिणाम था कि अपने शुरुआती सालों में उसने इतना सारा सीख लिया जिसे सीखने में सामान्य लोग दसियों साल लगा देते हैं. सत्रह माह की आयु में वह अक्षरमाला सीखना शुरू कर चुकी थी और तीन साल की उम्र में गिनती करना. चार साल की आयु में बारान्कीया के अपने स्कूल में वह बैली-डान्सिंग सीख रही थी. सात साल की आयु में उसने अपना पहला गीत कम्पोज़ किया. आठ की आयु में कविता लिखनी शुरू की और दस की होते होते बाकायदा अपने ओरिजिनल गीत लिख और कम्पोज़ कर लिए थे. इसी दरम्यान उसने अटलांटिक के तट पर मौजूद 'एल कोर्रेहोन' कोयला खदानों के कामगारों के मनोरंजन हेतु अपने पहले कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त कर लिए थे. उसने अभी सेकेन्डरी स्कूल में दाख़िला लेना बाकी था जब एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ने उसे पहला पेशेवर प्रस्ताव दिया.

"मुझे अपनी अपार रचनात्मकता के बारे में हमेशा मालूम था," वह कहती है. "मैं प्रेम कविताओं का पाठ किया करती थी, कहानियां लिखती थी और गणित को छोड़कर सारे विषयों में सबसे अच्छे नम्बर लाती थी." उसे बहुत खीझ होती थी जब घर पर आए मेहमान उस से गाने की फ़रमाइश किया करते थे. "मैं तीस हज़ार लोगों के सामने गाना पसन्द करती बजाय पांच गधों के आगे गाने और गिटार बजाने के." वह थोड़ा कमज़ोर दिखती है मगर उसे पक्का यकीन था कि एक दिन सारी दुनिया उसे जानेगी. किस बात के लिए और कैसे, यह उसे पता नहीं था पर उसका भरोसा मजबूत था. यही उसकी नियति भी होनी थी.

आज उसके सपने पूरे होने से कहीं ज़्यादा पूरे हो चुके हैं. शकीरा का संगीत किसी और के जैसा नहीं सुनाई पड़ता और उसने मासूम सेन्सुअलिटी का अपना एक ब्रान्ड भी बना लिया है. "अगर मैं गाऊंगी नहीं तो मर जाऊंगी!" यह बात अक्सर हल्के फ़ुल्के तरीके से कही जाती है लेकिन शकीरा के मामले में यह एक सच्चाई है: जब वह गा नहीं रही होती वह बमुश्किल ज़िन्दा रहती है. भीड़ के बीच रहने में ही उसके भीतर शान्ति उभरती है. स्टेज का डर उसे कभी महसूस नहीं हुआ. उसे स्टेज पर न होने से डर लगता है: "मुझे लगता है" वह कहती है "जैसे वहां मैं जंगल में किसी शेर जैसी हो जाती हूं." स्टेज पर ही वह शकीरा बन पाती है जो कि वह असल में है.

कई गायक स्टेज से परे तेज़ रोशनियों पर निगाहें गड़ा लेते हैं ताकि श्रोताओं की भीड़ की निगाहों का सामना न करना पड़े. शकीरा इसका ठीक उल्टा करती है; वह अपने टैक्नीशियनों से कहती है कि दर्शकों श्रोताओं पर सबसे तेज़ रोशनियां डालें ताकि वह उन्हें देख सके. "तब जा कर संवाद सम्पूर्ण बनता है" वह कहती है. वह एक अजानी अनाम भीड़ को अपनी सनक और प्रेरणा के हिसाब से जैसा चाहे वैसा ढाल लेती है. "गाते हुए मुझे लोगों की आंखों में देखना अच्छा लगता है." कभी कभी वह भीड़ में ऐसे चेहरे देखती है जिन्हें उसने कभी नहीं देखा होता लेकिन वह उन्हें पुराने दोस्तों की तरह याद करती है. एक बार तो उसने एक ऐसे आदमी को पहचान लिया जो कब का मर चुका था. एक बार उसे ऐसा महसुस हुआ जैसे कोई उसे किसी दूसरे जन्म के भीतर से देख रहा हो. "मैंने पूरी रात उस के लिए गाया." वह बताती है. इस तरह के चमत्कार कई महान कलाकारो के लिए महान प्रेरणा के और अक्सर महान विनाशों के कारण बनते रहे हैं

शकीरा के मिथक का सबसे बड़ा आयाम है बच्चों के भीतर उसकी इस कदर गहरी पैठ. जब उसका अल्बम 'पीएस देस्काल्ज़ोस' 1996 में रिलीज़ हुआ तो उसके पब्लिसिस्ट्स ने तय किया कि उसे कैरिबियन लोकसमारोहों के इन्टरवलों में प्रमोट किया जाएगा. उन्हें यह नीति बदलनी पड़ी जब तमाम बच्चे "शकीरा! शकीरा!" के नारे लगाते हुए सारी शाम उस के गीतों को बजाने की मांग करने लगे. आज यह करिश्मा डॉक्टरेट के किसी महत्वपूर्ण विषय में तब्दील हो चुका है. हर सामाजिक तबके के प्राइमरी स्कूल की बच्चियां पहनावे, बोलने और गाने के अन्दाज़ में शकीरा की नकल करती हैं. छः साला बच्चियां उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिकाएं हैं.

इन्टरवल के दौरान उसके अल्बमों की सस्ती पाइरेटेड प्रतियों की अदलाबदली हुआ करती है. दुकानों में पहुंचते ही उसके आभूषणों की नकलें हाथोंहाथ निकल जाती हैं. बाजारों में हेयरडाईज़ की होलसेल बिक्री होती है ताकि लड़कियां शकीरा के हेयरस्टाइल की नकल कर सकें उसके नए अल्बम की पहली स्वामिनी स्कूल की सबसे लोकप्रिय लड़की बन जाती है. सबसे ज़्यादा पॉपुलर स्टडी-ग्रुप स्कूल के बाद किसी लड़की के घर में जमते हैं जहां पहले थोड़ा सा होमवर्क होता है और उस के बाद धमाल. जन्मदिन की दावतें नन्हीं शकीराओं का जमावड़ा हुआ करता है. बिल्कुल विशुद्धतावादी समूहों में - जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा है - लड़कों को नहीं बुलाया जाता.

अपनी असाधारण संगीत प्रतिभा और मार्केटिंग के बावजूद शकीरा अपनी परिपक्वता के बगैर वहां हो ही नहीं सकती थी जहां वह अब है. यह यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि इस लड़की के भीतर इतनी ताकत आती कहां से है जो हर दिन अपने बालों का रंग बदल देती है - कल काला, आज लाल, कल हरा. कई उम्रदराज़ महिला गायकों से कहीं ज़्यादा ईनामात वह हासिल कर चुकी है. आप देख कर बता सकते हैं कि वह कहां पहुंचना चाहती है: बुद्धिमान, असुरक्षित, शालीन, मधुर, आक्रामक और सघन! अपने पेशे के चरम पर पहुंच चुकने के बाद भी वह बारान्कीया की एक लड़की भर है - जहां भी होती है उसे घर की मुलेट मछली और मैनियोक ब्रैड की याद आती है. अभी वह अपने सपनों का घर नहीं ले सकी है - समुद्र किनारे ऊंची छतों वाला एक शान्त मकान और दो घोड़े. उसे किताबें अच्छी लगती हैं - वह उन्हें खरीदती है उन्हें प्यार करती है अलबत्ता पढ़ने के लिए उसके पास उतना वांछित समय नहीं होता. एयरपोर्टों पर जल्दबाज़ी में विदा लेने के बाद उसे अपने दोस्तों की बहुत याद आती है मगर उसे मालूम होता है कि अगली मुलाकात होने में कितना वक़्त लग सकता है.

उसने कितना पैसा कमाया है, इस बाबत वह कहती है "जितना मैं बताती हूं उस से ज़्यादा मगर जितना लोग बताते हैं उस से कम." संगीत सुनने का उसका प्रिय स्थान होता है गाड़ी के भीतर पूरे वॉल्यूम में बजता प्लेयर - वह शीशे चढ़ा लिया करती है ताकि दूसरों को दिक्कत न हो. "ईश्वर से बात करने, अपने से बात करने और समझने का यह आदर्श स्थान होता है." उसे टीवी से नफ़रत है. उसके हिसाब से उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है अनन्त जीवन पर उसका विश्वास और मृत्यु का असह्य खौफ़.

वह एक दिन में चालीस इन्टरव्यू तक दे चुकी है और उसने किसी भी बात को दोहराया नहीं. कला, जीवन. अगले जन्म, ईश्वर प्रेम और मत्यु को लेकर उसके अपने विचार हैं. लेकिन उसके इन्टरव्यू लेने वालों ने इन विषयों पर खुल कर बताने को उस से इतनी दफ़ा पूछ लिया है कि अब वह उन से बचकर निकलना सीख गई है. उसके उत्तर जितना बताते हैं उस से कम ही छिपाते हैं और यह सबसे उल्लेखनीय बात है. वह इस बात को सीधे सीधे खारिज कर देती है कि उसकी प्रसिद्धि अस्थाई है और यह कि ज़्यादा गाने से उसकी आवाज़ पर असर पड़ेगा. "भरी धूप के बीच में सूर्यास्त के बारे में नहीं सोचना चाहती." जो भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं चूंकि उसकी आवाज़ की प्राकृतिक रेन्ज उसकी तमाम ज़्यादतियों के बावजूद बची रहेगी. बह बुखार और थकान से गा कर उबरी है. "गायक के लिए सबसे बड़ी कुंठा यह हो सकती है," हमारे इन्टरव्यू के आखीर में तनिक हड़बड़ी में वह कहती है "कि वह गाने को अपना कैरियर बना चुकने के बावजूद गा न सके."

उसके लिए सबसे रपटीला विषय होता है प्यार. वह उसका गुणगान करती है, वही उसके संगीत की प्रेरणा होता है पर बातचीत में वह उस पर अपने ह्यूमर की परत चढ़ा लेती है. "सच तो यह है कि मुझे मौत से ज़्यादा शादी से डर लगता है." यह आम जानकारी है कि उसके चार बॉयफ़्रैन्ड्स रह चुके हैं हालांकि वह शरारत के साथ बताती है कि तीन और थे जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं. वे सब तकरीबन उसी की उम्र के थे पर उनमें से कोई भी उस जैसा परिपक्व नहीं था. शकीरा उन्हें बहुत अपनेपन और दर्द के साथ याद करती है. ऐसा लगता है वह उन्हें नश्वर प्रेतों की तरह देखा करती है जिन्हें उसने अपनी अल्मारी में टांग दिया है. भाग्यवश यह कोई बहुत हताशा की बात भी नहीं है: अगली दो फ़रवरी को वह फ़क़त छब्बीस साल की हो जाने वाली है.


(हिंदी अनुवाद के लिए कबाड़खाना का आभार)