25 मार्च 2008

दख़ल पत्रिका का महिला विशेषांक:-

8 मार्च को महिला दिवस था|आधी आबादी की वर्तमान स्थितियां और उनके संघर्ष को याद करते हुये दख़ल पत्रिका का मुद्रित अंक महिलाओं पर केन्द्रित है जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे है|




अंतर्राश्ट्रीय महिला दिवस क्यों? :-

यदि स्त्री और पुरूश के बीच की असमानता हमारे रोजमर्रा के जीवन का निèाZारक व प्रमुख कारक है और इसलिए इसे खत्म करने का प्रयास भी रोजमर्रा के स्तर पर ही होना चाहिए (ऐसा हो भी रहा है ) तो किसी खास दिवस पर ही इस तरह के आयोजन का क्या औचित्य है? सीधे व साफ लजों में कहें तो अंतर्राश्ट्रीय महिला दिवस क्यों? क्या इसलिए कि 8 मार्च के दिन स्त्रियों ने सड़कों पर उतरकर, विरोध प्रदषZन करके दमनकारी व्यवस्था के स्त्री विरोधी पक्ष पर प्रहार किया ओैर अपने हक हासिल किए? क्या इसलिए कि यह दिन उनकी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों का दिन रहा है? लेकिन ऐसे तो कई दिवस मनाए जाते हेैं। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, इत्यादिण्ण्ण्ण्ण्ण् लंबी सूची है। ये तो रिचुअल मात्र बनकर रह गए हैं। तो क्या हम रिचुअल्स की फेहरिस्त में महिला दिवस के रूप में एक और रिचुअल जोड़ने भर जा रहे हैं?
ऐसी बात नहीं। हम महिला दिवस इसलिए मनाते हैं कि उन असंख्य कुबाZनियों की सार्थकता सिद्ध हो सके, उनका विस्तार हो सके और सबसे बड़ी बात हम आत्मावलोकन कर सकें। आज हम उन लोगों में भी जागृति लाते हैं जो स्त्री, संघशZ की परिधि के बाहर हैं। कि स्त्री की मुक्ति के क्या मायने हैं? इसके साथ ही, जिन लोगों में यह बोध होता है लेकिन जो नििश्क्रय से हो जाते हैं अथवा भटकाव के षिकार हो जाते हैं उनके बोध को जगाने के लिए अथवा उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए भी यह दिवस उचित अवसर प्रदान करता है। तो आईए, आज के दिन हम संकल्प लें कि स्त्री-चेतना के बीज हम जन-जन तक बोएंगे और इस दुनियां से सभी प्रकार के ‘ाोशणों व दमनों का नामोनिषान मिटाकर एक समतावादी समाज बनाएंगे।
हमें प्राय: सुनने को मिला है कि थ्योरी के लिए हम पिष्चम की ओर ताकते हैं। वहा¡ की थ्योरी के माध्यम से हम अपने यहा¡ की सामाजिक संरचनाओं को समझने की कोषिष करते हैं। खासकर मुक्तिकामी परियोजनाओं के आलोचक इन तकोZं के आधार पर पूरे-के-पूरे चिंतन को खारिज करते हैं।
गौरतलब है, विचारों को इस भा¡ति `पिष्चमी´ और `पूरबी´ या `प्राच्य´ के अलग अलग चौखटों में देखने की यह सोच वास्तव में पिष्चमी सोच है। इसे हम प्राच्यवाद या ओरियन्टलिज्म के नाम से जानते हेैं। प्राचीन काल से मानव-समुदायों का एक जगह से दूसरे जगह आना-जाना और इस क्रम में विचारों व संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता रहा है। कुछ भी ‘ाुध्द `पिष्चमी´ या ‘ाुध्द `पुरबी´ नहीं। सब कुछ संकर (भ्लइतपक ) है, जैसा कि भाभा ने कहा हैं।
खासकर, मनुश्य की मुक्ति से ताल्लुक रखने वाली कोई भी परियोजना किसी चौखटे में नही कैद की जा सकती। नारीवाद भी एक मुक्तिकामी परियोजना है। यदि हमारे यहा¡ विद्यमान पितृसत्ता की संरचनाओं को समझने में कोई नारीवादी थ्योरी मददगार साबित होती है तो हम उसे गले लगाने से नहीं हिचकेंगे। हम यह नहीं देखने में लग जाए¡गे कि वह थ्योरी पिष्चमी है या पूरबी। मामला प्रासंगिकता और अर्थसत्ता का है। जो लोग आ¡ख मू¡दकर ऐसा करते हैं दरअसल वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि सामाजिक संरचनाओं की कार्य पद्धति पर से अज्ञान रूपी धुंध छ¡टे।
जहा¡ तक भारत में उसमें भी खासकर हिंदी में नारीवादी िंचंतन की बात है तो हमे साहित्यकारों द्वारा अनुभव किए गए सतही उच्छावासों के ढे़रों गप्प-षप्प देखने को मिलते हैं और नारीवादी चिंतन की इसी प्राक-अवस्था को स्त्री-विमषZ या चिंतन मानकर आत्मतुश्ट नारीवादियों की लंबी फेहरिस्त बनायी जा सकती है। मैनेजर पांडेय जैसे आलोचक महादेवी वर्मा की `श्रृंखला की किड़या¡´ को सिमोन द बोउआर के दि सेकेंड सेक्स के बरअक्स रखकर देखते है। जबकि `श्रृंखला की किड़या¡´ एक संवेदनषील साहित्यकार व्दारा व्यक्त की गई सहज हृदयोद्गार है। कोई लेखन या कार्य चिंतन थ्योरी का स्तर तभी प्राप्त कर पाता है जब उसकी संरचना दाषZनिक हो यानी जिसमें तत्वमीमंासा, ज्ञानमीमांसा और मूल्यमीमांसा का व्यवस्थित उपयोग हुआ है। यही वजह है कि सिमोन का `दि सेकेंड सेक्स´ एक डंहीनउ वचमे हेै और मजबूत थ्योरिरिकल ट्रीटाईज भी।


अंतरराश्ट्रीय महिला दिवस इतिहास :-
अनुवाद : सुधीर अनुवाद विभाग महत्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय

हमें जो चीज आसानी से मिल जाती है उसे हम उतने ही हल्के लेते हैं। जनतंत्र व मताधिकार इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। ब्रिटिष उपनिवेषवाद से मुक्ति के साथ ही हमें जनतंत्र, इससे जुड़े मूल्य और सार्वभौम मताधिकार अपने-आप मिल गए यानी इनके लिए हमें राजषाही या निरंकुष सत्ता से वैसा संघशZ नहीं करना पड़ा जैसा यूरोप या अन्य जगहों पर। इसका मतलब यह नहीं कि हमारा समाज ज्यादा उदार रहा है। दरअसल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ की लड़ाई जिस धरातल पर लड़ी गयी उस धरातल के अवयव ही जनतंत्र व उसके मूल्यों से निर्मित थे। और इन्हें हासिल करने के लिए यूरोप में असंख्य कुबाZनिया¡ दी गयीं। आज भी दुनिया भर में इसके लिए संघशZ जारी है।
इस संघशZ में महिलाओं की भागेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण, बल्कि निर्णायक रही। अंतर्राश्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों का दिवस है। 8 मार्च 1908 के दिन 15000 स्त्रिया¡ न्यूयार्क की सड़को पर उतर पड़ी। उनकी मा¡गे थीं-काम के घंटे कम करो, मजदूरी बढ़ाओ और बोट का अधिकार दो। 28 फरवरी 1909 के दिन संयुक्त राज्य अमेरिका की स्त्री समाजवादियों ने कामगार स्त्रियों के इन्हीं हकों के लिए देष भर में मीटिंग, धरने और प्रदषZन आयोजित किए। यह पहला महिला दिवस था। `महिला दिवस´ मनाया जाता रहा। 1931 तक फरवरी के अंतिम रविवार के दिन 1910 में कोपेनहेगेन (डेनमार्क) में समाजवादियों के सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें जर्मनी की समाजवादी चितंक और क्लारा जेटकिन नें अंतरराश्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। 19 मार्च का दिन यू¡ ही नहीं चुना गया था, दरअसल यही वह दिन था जब जनोन्मुखी घोशाणायें हुइ, उनमें से एक था स्त्रियों के मताधिकार यह बात अलग है कि उसने इन घोशनाओं का खुद पालन नही किया। रूस में स्त्रियों ने प्रथम विष्वयुध्द के खिलाफ ‘ाांन्ति के मोर्चे के रूप में पहला अंतराश्ट्रीय महिला दिवस 1913 के फरवरी महिने के अंतिम रविवार को मनाया।
इसी केे एक साल बाद यूरोप में अन्य जगहों पर भी युध्द के खिलाफ आठ मार्च को महिलायें सड़को पर उतर पड़ी। लगभग दो लाख रूसी सैनियों की बलि के विरोध में अपना विरोध दर्ज कराने के लिए पुन: 1917 में फरवरी के अंतिम रविवार के दिन प्रदषZन किया। दरअसल भूख, ठंड और युध्द की विभीिशका से त्रस्त श्रमिक और कृशक महिलाओं का ध्ौर्य जवाब दे गया और वे `रोटी और ‘ाान्ति´ का नारा लगाती हुई हड़ताल पर उतर आयी। हाला¡कि उस वक्त सक्रिय राजनीतिक नेताओं ने इसे समयोचित नहीं माना लेेकिन स्त्रियों ने अपना पैर पीछे नहीं किया। जूलीयन कैलैंडर के अनुसार वह दिन 28 फरवरी था लेकिन गि्रगोरियन कैलेैंडर के अनुसार अन्य जगहों के लिए 8 मार्च था। 1917 का यह महिला दिवस इतिहास का वह क्षण था, जो पूरी दुनिया को दस दिनों तक हिला देनी वाली क्रांति के लिए निर्णायक साबित हुआ। तब से 8 मार्च का दिन अंतरराश्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा और प्रत्येक 8 मार्च महिलाओं के समाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आधिकारों के संघशZ तथा स्त्री मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दिवस बन गया। कुछ उल्लेखनीय महिला दिवस तिथिया¡ निम्न हैं।
1) आठ मार्च 1935 : स्पेनिष औरतों ने फासिज्म के विरोध में प्रदषZन किया क्योंकि जर्मनी में उस समय हिटलर स्त्रियों को युध्द के लिए अधिक बच्चे पैदा करने के लिए उकसा रहा था। 1936 में स्पेन की महिलाओं ने जनरल फ्रेंको के अत्याचारी दमनकारी ‘ाासन के विरोध में जबरदस्त प्रदषZन किया।
2) आठ मार्च 1943 : इटली में मुसोलिनी के तानाषाही ‘ाासन के खिलाफ महिलाओं ने आवाज उठाई।
3) आठ मार्च 1945 : पेरिस में वीमेंस इंटरनेषनल डेमोक्रेटिक फेडरेषन की स्थापना पर सभी देषों की स्त्रियों व्दारा महिला आंदोलन को विष्व स्तर पर संगठित रूप में चलाने का निष्चय किया गया।
4) आठ मार्च 1974 : वियतनाम में अमेरिकन साम्राज्यवाद के खूनी आक्रमणकारी हमलों के विरोध का औरतों ने जमकर विरोध किया।
5) आठ मार्च 1975 : संयुक्त राश्ट्र महासभा ने अंतरराश्ट्र्रीय महिला वशZ घोिशत किया।
6) इरान में चादोर (गुलामी व्यवस्था की निषानी) के विरोध में महिलाओं ने मोर्चा निकाला।
7) आठ मार्च 1980 : भारत की खेतिहर महिलाओं तक ने 16 वशीZय मथुरा नाम की लड़की के साथ बलत्कार की दोशी पुलिस को माफ करने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तक आवाज उठाई। इसके कारण भारत में पहली बार बलत्कार संबंधी कानून में बदलाव लाना पड़ा।
8) आठ मार्च 1987 : महाराश्ट्र में गर्भजल परीक्षण के विरोध में आंदोलन किया गया। परिणामत: महाराश्ट्रª में इस परिक्षण पर पाबंदी लगा दी।
9) आठ मार्च 1988 : भारत भर की महिला संगठनों ने सती प्रथा के विरोध में जोरदार आंदोलन किया परिणामत: सती प्रथा के लिए नये व कड़े कानून बनाने पड़े।

सीमोन द बुवा :-

दुनिया की आधी आबादी को उनके अधिकरों, उनके हकों के बारे में सजग करने वाली, सेकन्ड सेक्स की रचयिता सीमोन द बुवा की जन्म सदी पर हम उनकी पुस्तक सेकन्ड सेक्स के अनुवाद स्त्री उपेक्षिता के कुछ अंस प्रस्तुत कर रहे हैं।

1:- आत्ममुग्धा स्त्री इतना अधिक अपने को देखती है कि वह दूसरों का कुछ भी देख नहीं सकती। वह दूसरों में केवल उतना ही देखती है जितना कि वह उनमें अपने जैसा पाती है।
2:- स्त्री स्वभावत: आत्ममुग्धा होती है। पुरूशों की दृिश्ट में स्वीकृत होने के लिए वह सुंदर दिखता चाहती है। उसकी मां और बड़ी बहनों ने षुरू से ही उसके मन में एक सुंदर घोंसले की जरूरत पैदा कर दी है। किन्हीं दूसरे रास्तों से स्वतंत्रता मिल जाने पर भी वह अपनी इन इच्छाओं को छोड़ना नहीं चाहती। जिस हद तक वह पुरूश की दुनिया में असुरक्षित महसूस करती है, उसी हद तक वह इन जरूरतों को, जिनका प्रतीकात्मक अर्थ हुआ आंतरिक संरक्षण, अपने आपमें बनाए रखती है।
3:- एक स्त्री, जो जीना चाहती है और जिसने अपनी हर इच्छा तथा कामना को दफन नहीं कर दिया है, नििस्क्रय उदासीनता के बदले जोखिम लेना अधिक पसंद करेगी। उसे एक पुरूश की तुलना में अधिक प्र्रतिकूल और चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ता है। समाज स्त्री की स्वतंत्रता की इच्छा को सहजता से स्वीकार नहीं करता।
4:- स्त्री जब खुले रूप से प्रस्ताव रखती है तो पुरूश खिसक जाता है, क्योंकि वह जीतने की हवस रखता है। स्त्री अपने आपको षिकार बनाकर ही कुछ पा सकती है। उसे नििस्क्रय वस्तु बनना पड़ता है। जैसे वह केवल एक समर्पित प्रत्याषा-भर हो। इसलिए जब पुरूश उसकी पहल को ठुकराता है तो वह बड़ी अपमानित होती है। पुरूश जब हारता है तो वह यही समझता है कि अपनी एक कोषिष में वह नाकामयाब हुआ।
5:- कुछ सुविधाएं ऐसी भी हैं जो औरत को अपनी हीन अवस्था के ही कारण मिल जाती हैं। चूंकि षुरू से ही पुरूश की अपेक्षा उसकी स्थिति कमजोर है, इसलिए वह किसी भी घटना के लिए अपने आपको जिम्मेदार नहीं ठहराती। अपने कृत्यों के सामाजिक औचित्य का प्रतिपादन वह नहीं करती। एक सभ्य पुरूश स्त्री से कोमल और उचित व्यवहार करना अपना फर्ज समझता है और औरत की स्थितिग्रस्तता स्वीकार करता है। वह मूल्य-बोध, दायित्व और करूणा का बंधन अनिवार्यत: स्वीकार कर लेता है। अपनी इस स्वाभाविक कमजोरी के कारण प्राय: पुरूश उन औरतों का षिकार हो जाते हैं जो अपनी षोषक ओैर पराजीवी प्रवृत्ति के कारण उनकी कमजोरियों का पूरा फायदा उठाती हैं।
6:- स्त्रियां पांडित्य के बोझ और अधिकाधिक सत्ता के प्रति सम्मान भाव से प्राय: आक्रांत रहती हैं। उनके विचार केवल किताबी होेने के कारण संकुचित होते हैं, इसीलिए एक ईमानदार छात्रा की भी आलोचनात्मक क्षमता ओैर बुिध्द का-हास होता है। अधिकारियों को प्रसन्न करने की अत्याधिक चाह उसके मनोभावों को तनावग्रस्त बनाए रखती है।
7:- स्त्री-स्वाधीनता का अर्थ हुआ कि स्त्री पुरूश से जिस पारम्परिक सम्बंध को निभा रही है, उससे मुक्त हो । हम स्त्री-पुरूश के बीच घटने वाले सम्बंध को नहीं नकार रहे। उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होगा और वह पुरूष की होकर भी जिएगी। दोनों अपनी-अपनी स्वायत्तता में दूसरे का अनन्न रूप भी देखेंगे। सम्बंधों की पारस्परिकता और अन्योन्याश्रितता से, चाह, अधिकार, प्रेम ओैर आमोद-प्रमोद के अर्थ समाप्त नहीं हो जाएंगे और नहीं समाप्त होंगे दो संवगोZं के बीच के षब्द देना, प्राप्त करना, मिलन होना, बल्कि दासत्व जब समाप्त होगा ओैर वह भी आधी मानवता का, तब व्यवस्था का यह सारा ढोंग समाप्त हो जाएगा। स्त्री-पुरूश के बीच का विभेद वास्तव में एक महत्वपूर्ण नई सार्थकता को अभिव्यक्त करेगा। माक्र्स कहते हैं: ``स्त्री और पुरूश का आपसी सम्बंध सबसे अधिक प्राकृतिक है। विकास के दौरान हमें यह देखना है कि किस हद तक मानव सही मामले में मानव बना, यानी प्राकृतिक अवस्था से बढ़ते हुए मानवीय स्वभाव को उसने पाया?´´

दासी पुन्ना एक जातक कथा :-

( स्त्री और पुरूश के बीच विद्यमान असमानता का तर्क के आधार पर प्रतिकार करते हुए तो हम बुध्द के षिश्य आनंद को भी पाते हैं। जातक कथाओं में जाति-व्यवस्था ओैर स्त्री-पुरूश असमानता की बुनियाद पर ताकिZक प्रहार के कई उदाहरण मौजूद हैं। यहा¡ जातक कथाओं में से एक ऐसी ही कहानी का प्रकाषन किया जा रहा है। )

पुन्ना एक दासी थी। केैसा भी मौसम हो, वह हर सुबह नदी से अपने मालिक के घर के लिए पानी लाने जाती। उसने पाया कि एक बा्रम्हण भी रोज सुबह नदी में स्नान करने आता हैं, भले ही ठंड का मौसम क्यों न हो । ठंड से थरथराते स्नान करने वाले उस ब्राम्हण से उसने कहा:
जाडे़ के मौसम में ठंड के बावजूद
मुझे यहा¡ सुबह-सुबह पानी लाने आना पड़ता है,
मैं तो मालकिन की गाली और उसके ताने की डर से ऐसा करती
हू¡ लेकिन हे ब्राम्हण, तुम्हें किस का डर है? तुम
क्यों इतनी ठंड में का¡पते हुए स्नान के लिए विवष हो?
ब्राम्हण ने पुन्ना को जवाब दिया कि वह ऐसा अपना पाप धोने और पवित्र होने (पुण्य बटोरने) के लिए करता है। इस पर पुन्ना ने जवाब दिया:
तुम्हे किसने कह दिया कि जल से तुम्हारे बुरे कर्म या पाप धुल जाए¡गे? तब तो मछलिया¡, कछुए और जल में रहने, तैरने वाले सभी जीवों को सीधे स्वर्ग ही मिल जाना चाहिए! (लेकिन) यदि धुलना ही होगा तो तुम्हारे पुण्य भी धुल जाएंगे।


गार्गी के प्रष्न :-

याज्ञवल्क्य अपने समय के प्रसिद्ध दाषZनिक थे । उन्होंने एक दिन अन्य विद्वानों को ‘ाास्त्रार्थ के लिए चुनौती दिया। उद्वेष्य यह पता करना था कि उस समय सबसे बड़ा विद्वान कौन है? इसमें ‘ाामिल होने के लिए छह लोग तैयार हुए। इनमें गार्गी को छोड़ सभी पुरूश थे। ‘ाास्त्रार्थ ‘ाुरू होने के बाद धीरे धीरे सब विद्वान चुप होते गए । याज्ञवल्क्य की विद्वता के समक्ष वे सभी झुक गए। अंत में गार्गी की बारी आई। गार्गी एक बड़े दाषZनिक की पुत्री थी वह अच्छी कुषलता का परिचय देते हुए याज्ञवल्क्य से बहस करने लगी। धीरे-धीरे उसके प्रष्न कठिन होते गए ‘ाास्त्रार्थ ने महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया और जब गार्गी ने तीर के सामन दो प्रष्नों से याज्ञवल्क्य पर प्रहार किया तो याज्ञवल्क्य जबाब देने के बजाए ब्रह्माणवादी पुरूश की भूमिका में आ गए। उन्होंने गार्गी को धमकी दी : गार्गी बहस को इतना न खीचों कि तुम्हारा सर फट जाए। इसके बाद गार्गी को चुप हो जाना पड़ा। गौरमतलब है कि सभी पुरूश प्रतिभागी अपने आप चुप हो गए थे, कारण वो याज्ञवल्क्य की विद्वता का सामना नही कर पाए थे। जबकि गार्गी ने याज्ञवल्क्य को निरूत्तर सा कर दिया था। इसलिए उसे चुप करने के लिए याज्ञवल्क्य को धमकी देनी पड़ी। यहॉ यह बात गौर करने लायक है कि निचले दर्जे के पुरूशों के अवाज को दबाने के लिए जहॉ हिंसा के सहारे की जरूरत होती थी, वही स्त्रियों को चुप करने में हिंसा की धमकी काफी थी।
इस कहानी में बाद में जोड़े गए अंष में इस बात का जिक्र है कि गार्गी पहले तो चुप हो गई। लेकिन याज्ञव्ल्क्य की सर्वश्रेश्ठता को स्वीकार करने के लिए गार्गी ने पुन: बातचीत में हिस्सा लिया और वह अब याज्ञवल्क्य के उत्तरों से संतुश्ठ थी। इस तरह गार्गी ने याज्ञवल्क्य को सर्वश्रेश्ठ दाषZनिक मान लिया। कहानी जिस तरह समाप्त होती है वह अत्यंत दिलचस्प है। वर्चस्व प्राप्त विचार धारा को प्रभावी या पुनरोत्पादित होने के लिए स्त्री की सहमति आवष्यक हो जाती है।
दलित नारीवादी लेखिका कुमुद पावड़े का कहना है कि गाार्गी के चुनौतिपूर्ण प्रष्नों की प्रतिक्रिया ने ही सभी स्त्रीयों को ‘ाास्त्रीय ज्ञान के दायरे से बाहर रखा। परिणाम यह हुआ कि उनके अपने प्रष्न उनके पुरूशों की धारणाअों में गुम हो गये।

बहलोन के लिए
शशिभूषण सिंह

जैसे अभी अभी पड़ी हो मार
या किसी ने लगाई हो कड़ी फटकार
सूख कर ऑसुअों की बूंदे गालों पर
जर्द हो आयी हो जैसे
किसी मासूम का षिषु मुख

बहलोन ,
कुछ ऐसा ही लगता रहा है मुझे
जब जब करती हो अपना
हाले दिल बयॉ ।
बदलता है क्रम बातों का
जैसे कोई बाल-सखा
मिल गया हो बरसों बाद
तुम साथ बैठी बतियाने लगती हो
करती हो चर्चा उपलब्धियोंं की
एक मासूम खिल-खिल हंसी
छलक आया हो जैसे
किसी षिषुमुख पर अनायास

बहालोन,
कुछ ऐसा ही लगता रहा है मुझे
जब-जब रखती हो अपने
सपनों के सामने ।
क्या हुआ जो जीती हो
अनाथों से जीवन
कुदाहतु के निपट गंवार माहौल में
झारखंड के वन-ग्राम में
क्या हुआ जो कुछ और नहीं है
तुम्हारे पास
सिवाय चंद किताबों
और सपनोंें के
तुम्हारे होठों की कंपन
कंपा देती है क्षण भर को
किंतु दूसरे ही क्षण
करवट लेते
तुम्हारे सीने में सोये सपने
यकीन दिला जाते हैं -

``सत्य की बेदी बड़ी सख्त है
किंतु सक्षम नहीं
कि तुम्हारा सीना चाक कर सके
जहॉ चलते हैं तुम्हारे सपने
मजबूत इरादों के बीच। ´´

चाईबासा (झारखंड) के समीप एक छोटे से गॉव
(कुदाहत) की ग्यारह वशीZया अनाथ आदिवासी बच्ची।



स्वतंत्रता :-
अज्ञात

तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो ,
तुममे कुछ ऐसा है
जो मेरे मन के गहराइयों को छू लेता है
तुम सृजनषील हो, संवेदनषील हो
तुममें एक सुंदर भविश्य की
जमीन दिखाई पड़ती है,
तुम्हारी कलम तुम्हारी रचनायें
जीवन्त हैं तुम्हारी ऑखों की तरह
तुम जो सोचते हो, रचते हो
जैसे सपने देखा करते हो तुम
वैसे ही मैं भी सोचा, रचा
और देखा करती हूं।

जीवन के प्रति तुम्हारा दृिश्टकोण
मेरे बहुत करीब है
करीब-करीब मेरे भी वही लक्ष्य हैें
जो तुम्हारे हैं
और कुछ अनुचित न होगा
अगर मैं कहूं कि इन तमाम बातों के कारण
मैं तुमसे प्रेम भी करती हूं।
फिर भी मेरे दोस्त
तुमसे भी ज्यादा
एक चीज प्यारी है मुझे
मेरी स्त्रतंत्रता,
मेरा स्वतंत्र चिंतन
जो तुमसे प्रभावित तो है
पर संचालित नहीं
जो तुम्हारा साहचर्य चाहती है
पर प्रभ्ुत्व नहीं।

तुम्हें और अपनी आजादी को
एक साथ चाहती हूं मैं
दोंनों में से किसी एक का भी खोना
असहय है मेरे लिए
लेकिन फिर भी
अगर तुम अड़ ही गए
अपने प्रभुता की खातिर
तो मैं चुन लूंगी
स्वतंत्रता।।

सीलमपुर की लड़कियां
चेतन क्रांति

सीलमपुर की लड़किया `विटी´ हो गयीं
लेकिन इससे पहले वे बूढ़ी हुई थीं
जन्म से लेकर पंद्रह साल की उम्र तक
उन्होंने सारा परिश्रम बूढ़ा होने के लिए किया
पद्रह साला बुढ़ापा
जिसके सामने साठ साला बुढ़ापे की वासना
विनम्र होकर झुक जाती थी
और जुग-जुग जियो का जाप करने लगती थी
खुर्राट बुढ़िया
पचपन साल की उम्र में आकर लेिस्बयन हुई!
यह डाक्टर मनमोहन सिंह और एम टीवी के उदय से पहले की बात है
तब उन लड़कियों के लिए न देष देष था
न काल-काल
ये दोनों
दो कूल्हे थे
दो गाल
और छातियां
बदन और वक्त की हर हरकत
यहां आकर मांस के
एक लोथडे़ में बदल जाती थी
और बंदर के बच्चे की तरह
एक तरफ लटक जाती थी
यह तब की बात है जब हौजखास से दिलषाद
गार्डन जाने वाली
बस का कंडक्टर
सीलमपुर में आकर रेजगारी गिनने लगता था।
फिर वक्त ने करवट बदली
सुिस्मता सेन मिस वल्र्ड बनी
और ऐश्वर्य राय मिस यूनीवर्स
और अंजलि कपूर जो पेषे से वकील थी
किसी पत्रिका में अपने अध्र्दनग्न चित्र छपने को दे आई
और सीलमपुर
‘ाहादरा की बेटियों के गालों
कूल्हों और छातियों पर लटके मांस के लोथडे़
सप्राण हो उठे वे कबूतरों की तरह फड़फड़ाने लगे
पंद्रह साला इन लड़कियों की
हजार साला पोपली आत्माएं
अनजाने कंपनों
अनजानी आवाजों और अनजानी तस्वीरों से भर उठीं
और मेरी ये बेडोैल पीठवाली बहनें
बुजुर्ग वासना की विनम्रता से
घर की दीवारों से और गलियों-चोैबारों से
एक साथ तटस्थ हो गई
जहां उनसे मुस्कुराने की उम्मीद थी
वहां वे स्तब्ध होने लगी
जहां उनसे मेहनत की उम्मीद थी
वहां वे यातना कमाने लगी
जहां उनसे बोलने की उम्मीद थी
वहां से सिर्फ आकुलाने लगी।
उनके मन के भीतर दरअसल
एक कुतुबमीनार निर्माणाधीन थी
उनके और उनके माहौल के बीच
एक सममतल मैदान निकल रहा था
जहां चौबीसो घंटे खटखट हुआ करती थी।
यह उन दिनों की बात है
जब अनिवासी भारतीयों ने
अपनी गोरी प्रेमिकाओं के उपर
हिंदुस्तानी दुलहिनों को तरजीह देना ‘ाुरू किया था।
और बड़े-बड़े नौकरषाहों और नेताओं की बेटियों ने
अंग्रेजी पत्रकारोें को चुपके से बताया था
कि एक दिन वे किसी अनिवासी के साथ उड़ जाएंगी
क्योंकि कैरियर के लिए यह जरूरी था
कैरियर जो आजादी था
उन्हीं दिनोंं यह हुआ कि
सीलमपुर के जो लड़के
प्रिया सिनेमा पर खडे़
युध्द की प्रतिक्षा कर रह थे
वहां की सौन्दर्यातीत उदासीनता से
बिना लड़े ही पस्त हो गए
चौराहों पर लगी मूर्तियों की तरह
समय उन्हें भीतर से चाट गया
और वे वापसी की बसों में चढ़ लिये
उनके चेहरे एक खूंखार तेज से तप रहे थे
वे साकार चाकू थे वे साकार षिष्न थे
सीलमपुर उन्हें जज्ब नहींं कर पाएगा
वे सोचते आ रहे थे।
उन्हें उन मीनारों के बारे में पता नहीं था
जो लड़कियों की टांगों में
तराष दी गयी थी
ओैर उन मैदान के बारे में
जो उन लड़कियों
और उनके समय के बीच
जाने कहां से निकल आया था
इसलिए जब उनका पांव
उस जमीन पर पड़़ा
जिसे उनका स्पशZ पाते ही
धसक जाना चाहिए था
वे ठगे से रह गए
और लड़कियां हंस रही थी
वे जाने कहां की बस का इंतजार कर रही थी
और पता नहीं लगने दे रही थी
कि वे इंतजार कर रही हैं।


वाजपेयी `जी´ की बानगी :-

वाजपेयी की कविता की बानगी देखनी हो तो नसबंदी पर लिखी उनकी कविता ´ आओ मर्दों, नामर्द बनो´, पढ़नी चाहिए। आपातकाल में इिन्दरा गांधी ने नसबंदी का अभियान चलाया। इससे वाजपेयी जी का पुरूषार्थ जाग उठा। मर्दानगी पर इस हमले के विरोध में और चूल्हे-चौके से स्त्रियों को छुटकारा दिलाये जाने की निन्दा करते हुए उन्होंने लिखा -
मर्दों ने काम बिगाड़ा है,
मर्दों को गया पछाड़ा है
झगड़े-फसाद की जड़ सारे
जड़ से ही गया उखाड़ा है
मर्दों की तूती बन्द हुई
औरत का बजा नगाड़ा है
गमीZ छोड़ो अब सर्द बनो।
आओ मर्दों, नामर्द बनों।
नसबंदी से `पौरूश विहीनता´ हो जाती है ? पौरूश की रक्षा में व्यंग्य की छींटाकषी स्त्री समाज पर की गयी नसबंदी पर दी गयी। अत: पुरूश को तो अब चूल्हा-चक्की संभालना पड़ेगा। अटल जी इससे बडे़ आहत होते हैं- `चौकड़ी भूल, चौका देखो, चूल्हा फूकों मोैका देखो´।
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के लेख `संस्कृति के सवाल´ से




नारी मुक्ति आंदोलन में दलित महिलाएं :- अंजली देशपांडे

भारत में यद्यपि लम्बे समय से महिलाओं पर छोटे छोटे आंदोलन और अभियान चलते रहे हैं पर 1980 के दषक में इसमें जो प्रखरता देखने को मिली वह कम ही दिखायी देती है। उस समय अमेरिका और यूरोप में नारीवादी आंदोलन कुछ निढाल हो चुका था मगर भारत में मानवाधिकारों और मजदूर संघों से जुड़ी अनेकानेक महिलाआंें ने बलात्कार से संबंधित कानूनों के खिलाफ साफ साफ और उंची आवाज़ मेें जो विरोध प्रकट किया वह कभी भी पहले देखने को नहीं मिला था। कुछ मायनों में 1980 में हुए इस आंदोलन को हम आधुनिक नारीवादी आंदोलन की षुरूवात कह सकते हैं।
नारीवादी, बलात्कार को राजनैतिक हथियार मानते हैं और मानते हैं कि पुरूष स्त्री पर अपनी सत्ता जताने के लिए स्त्री से, और ताकतवर पुरूश अपने से कमजोर तबके के पुरूश पर अपनी सत्ता जताने के लिए उसके परिवार की स्त्रियों से बलात्कार करते हैं। कुल मिलाकर पुरूश स्त्री को अपनी जायदाद समझते हैं और `दूसरे पुरूश´ की `जायदाद´ छीनने का यह रास्ता वे अिख्तयार करते हैं। भारतीय समाज का सच यह है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों का छुआ तो सवर्ण खा नहीं सकते मगर ``अछूत´´ स्त्रियों के साथ बलात्कार को वे अपना अधिकार समझते हैं। इस सच के बावजूद बलात्कार कानून के खिलाफ विरोध प्रदषZन से षुरू हुए नारी मुक्ति आंदोलन के इस नये दौर में न दलित महिलाओं को और न ही उनकी िंचंताओं को विषेश स्थान मिला। फिर भी उस चर्चा कें कथित निचली जातियों की स्त्रियों से सवणेंा व्दारा बलात्कार की बात उठी तो थी मगर बाद में अन्य किसी भी मुद्दे पर दलितों की चिंताएं और अपेक्षाएं अमूमन नारी मुक्ति आंदोलन के एजेंडा से गा़यब ही रहीं ।
जन मुद्दों पर नारीवादियों ने बडे़-बडे़ अभियान छेड़े उनकी पड़ताल भी जातिवाद की उनकी खोखली समझ, बल्कि उनके पूरे अज्ञान का पर्दा फाष कर देती है। एक था 1980 के दषक के अन्त में सती विरोधी अभियान। नारीवादियेां ने इस परिप्रेक्ष्य में इस सच को पूरी तरह अनदेखा कर दिया कि दलितों में कोई सती नहीं करायी जाती, उनमें विधवा विवाह की छूट और परंपरा है (वह औरत को कितने अधिकार देता है यह बहस अलग है) और सती प्रथा को पूरे भारत की विधवाओं की स्थिति का प्रतीक करार नहीं दिया जा सकता।
फिर भी सती प्रथा का विरोध आवष्यक था। उस समय हिंदुत्व के पुनरूत्थान की कोषिषें जो़रों पर थी। ऐसे में जनवादी महिला समिति ने भी साफ षब्दों में दलित संगठनों को साथ लेने से इंकार कर दिया था। जबकि हिंदुत्व के पुनरूत्थान की कोषिष का सीधा और सबसे गहरा असर दलितों पर ही पड़ना था और इसके विरोध से दलितों के हित जुड़े थे। उल्लेखनीय है कि पार्टी समर्थित महिला संगठनों में माकपा समर्थित जनवादी महिला समिति और भाकपा समर्थित भारतीय महिला महासंघ दोनों ने दलितों को साथ लेने से इन्कार कर दिया था मगर पार्टी के दायरे से बाहर स्वायत्त महिला संगठनों ने दलितों को साथ लेने के प्रस्ताव का समर्थन किया था।
इसके बावजूद गैर-पार्टी स्वायत्त महिला संगठनों में दलित मुद्दों को जगह कभी नहीं मिली । न ही दलित महिला नेताओं को वह स्थान मिला जो उनका हक है। आज संसद में महिला आरक्षण बिल अधर में लटका पड़ा है मगर कोई नारीवादी यह कहती सुनायी नहीं देती कि विधायिका में महिला आरक्षण की मांग 1942 में एक दलित, सुलोचना डोंगरे ने उठायी थी। नारीवादी षायद यह तथ्य जानते ही नहीं। एक और ताज़ा मिसाल है। पिछले साल कलकत्ता में हुआ स्वायत्त महिला संगठनों का राश्ट्रीय सम्मेलन। उस समय मुम्बई में बार में नाचने वाली लड़कियों के पेषे को अवैध घोिशत कर दिया था और मदिरालयों में लड़कियोंं को नाचने दिया जाये या नहीं इस पर मीडिया में भी खूब बहस चल रही थी।
नारी मुक्ति आंदोलन को कई कारणों से इस बहस में भागीदारी करने की ज़रूरत थी। एक, यह सीधे सीधे महिलाओं के एक ऐसे पेषे का सवाल था जिसपर समाज की कथित सभ्य भृकुटियां हमेषा तनी रहती हैं। यह सवाल भी महत्वपूर्ण था कि बार-बलाएं स्वेच्छा से यह काम कर रही थी या नहीं। दलित महिलाओं के लिए यह एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा था। वजह यह थी कि कुछ दलित जातियां और आदिवासी महिलाएं यही काम करती हैं। महाराश्ट्र में सांगली की कोलाटी जाति (दलित) की महिलाएं बड़ी संख्या में बार-बालाएं थी। वे जब उक्त सम्मेलन में अपनी बात कहने पहुंची तो उनकी सुनी ही नहीं गयी। उन्हें मंच पर नचाया गया ओैर कुछ औरतों ने बड़े मर्दाना अन्दाज़ में उन पर पैसे भी फेंके। ऐसी असंवेदनषीलता नारी मुक्ति आंदोलन में देखने को मिले तो उसके बुनियादी फलसफे पर ही सवालिया निषान लग जाता है।
मंडाल आरक्षण के लागू होने के बाद ‘ाुरू हुए दलित-विरोधी अभियान में भी बहुत-सी महिला संगठनों, जिनमें आधुनिक नारीवाद का मार्ग प्रसस्त करने वाली `सहेली´ जैसे संगठन भी हैं, ने कोई स्टैन्ड ही नहीं लिया । यह स्पश्ट ही नहीं किया कि इस लड़ाई में वे किस तरफ हैं।
नारी मुक्ति आंदोलन के यह रूख लम्बी बहस की मांग करते हैं। जिस तरह पुरूश प्रधान समाज में अन्याय के खिलाफ हर तरह के आंदोलनों (मज़दूर, मानवाधिकार, आदि आंदोलनों) के भीतर महिलाओं को अलग से अपनी आवाज़ उठानी पड़ी हेै ‘ाायद उसी तरह दलित महिलाओं को भी अपने सारोकारों पर महिला आंदोलन के भीतर अलग से आवाज़ उठानी होगी। क्योंकि दलित महिला केवल सवर्ण और दलित पुरूषों की ही सतायी हुई नहीं है वे तो सजग और प्रबुध्द महिलाओं की भी सतायी हुई हैं।

सावित्री बाई फुले :-
वेद प्रकाश

उन्नीसवीं सदी विष्व इतिहास के महान लोगोंं, आंदोलनों और परिवर्तनों की जननी है। भारत में भी इसी दोैरान अनेकानेक ऐसे आंदोलनों और महान व्यक्तियों ने जन्म लिया जिन्होंने विदेशी सत्ता, जड़वत आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था को चुनौती दी। ‘ाूद्र समाज से प्रतिक्रियावादी, यथास्थितिवादी ताकतों को चुनोैती देने वालों में क्रांति सूर्य ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले का नाम अग्रणी है, विशेष रूप से स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के कायोZं को ज़मीनी लड़ाई बनाने में इनका योगदान अनुकरणीय है।
3 जनवरी 1831 को जन्मी बालिका सावित्री का ब्याह नौ वशZ की उम्र में 13 वशीZय ज्योतिबा फुले से कर दिया गया। ज्योतिबा फुले ने स्त्री षिक्षा को अमली जामा पहनाने के लिए सावित्री बाई को षिक्षित किया।
1 जनवरी 1848 में बुधवार पेठ, पुणे में दलित स्त्रियों के लिए पहला स्वैच्छिक प्रयास स्कूल खोला गया जिसमें 8 बालिकाएं आईं। इनमें से दो मुस्लिम, दो ब्राम्हण लड़कियां भी थीं। इसी तरह उन्होंने गांव-गांव में युवतियों और अस्पृष्यों के स्कूल खोले।
हम आज उस स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकते जिस स्थिति में उन्होंने ‘ाूद्रों और अछूतों के बीच षिक्षा की मषाल जलाई थी। धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इन्हें जाति बाहर कर दिया। ब्राम्हणों ने इन पर गोबर फेंका, पत्थर बरसाए। पर यह विरोध समाज सुधार का रथचक्र न रोक सका। समाज, विषेश कर ‘ाूद्र और अछूत समाज में जागृति लानेे के लिए इन्होंने अथक प्रयास किया।
तत्कालीन समाज में बाल विधवाओं के साथ परिवार के मदोंZं व्दारा यौन संबंध बनाने के उपरांत गर्भवती हुई युवतियों को लोक लाज से बचने के लिए आत्महत्या करनी पड़ती थी। उन्हें सामाजिक जीवन से निर्वासित करके उनका मुंडन करके समाज से कट कर जीने को विवष किया जाता था।
सावित्री बाई फुले ने अपने घर में तथाकथित अवैध प्रसव के लिए सेन्टर खोल कर विधवा एवं बाल विधवाओें को जीवन जीने की राह दिखाई। वे सत्यषोधक समाज की सक्रिय कार्यकर्ता थी। उन्होंने पहला महिला मंडल बनाया, दलित-गैर दलित स्त्रियों को एक साथ बैठाया। विधवा मुंडन का विरोध किया और धर्म के पाखंड और कर्मकांड का विरोध किया। ज्योतिबा फुले के महापरिनिर्वाण के बाद उन्होंने अपने पति की चिता को मुखाग्नि दी। सावित्री बाई फुले ओजस्वी, तेजस्वी, निभीZंक, बहादुर नेता थीं। वे भारतीय महिला, समाज के महिला आंदोलन की प्रमुख रीढ़ ओैर आदषZ हैं।
आज का स्त्री मुक्ति आंदोलन अंतरराश्ट्रीय सीमाओं को पार करके विष्व बहनापे का दावा कर रहा है। परंतु भारत मेें दलित महिलाओं के साथ जातिगत हिंसा व मजदूर औरतों पर आर्थिक दबाव, आदिवासी, अल्पसंख्यक समुदायों की स्त्रियों के साथ घोर अत्याचार और सामाजिक भेदभाव बदस्तूर जारी है। उनका सामाजिक आर्थिक ‘ाोशण लगातार बढ़ रहा है। औरतों के साथ होने वाले पितृसत्तात्मक अन्याय के साथ-साथ वे जातीय व वर्गीय पूर्वाग्रहों की मार भी झेलती हैं। स्त्री मुक्ति आंदोलन और आम औरतों के बीच समझ, जानकारी, जाति और वर्ग की गहरी खाई है। इस कारण दलित पिछड़ी औरतें 10 मार्च को अपना दिन यानी भारतीय महिला दिवस मानती व मनाती हैं। महाराश्ट्र, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेष, हरियाणा में यह दिन अपना स्थान बना चुका है। 8 मार्च की ही भांति 10 मार्च भी समानांतर भारतीय महिला दिवस के रूप में ख्याति पा चुका है। सावित्री बाई फुले नििष्चत रूप से भारतीय महिला आंदोलन की प्रेरणा स्रोत हेैं।

17 मार्च 2008

कार्टून:-2

कार्टून की समाज में एक भूमिका है| कुछ रेखाचित्र आपको तस्वीर दिखाते है, आपके देश की, आपके समाज कि| बयां करते है सच्चाई की एक छवि, जो भले ही किसी अखबार में कम जगह घेरते हो पर लोगों के दिलो दिमाग में अपनी जगह जरूर बनाते है, उतनी जितनी कोई कविता, जितनी कोई कहानी| महत्मागांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र ओमप्रकाश कुशवाहा के कुछ कार्टून हम प्रकाशित कर रहे हैं|


1:-


2:-


3:-


4:-

10 मार्च 2008

क्रांति की चेतना :-



सभी क्रांतिकारियों को निश्चित तौर पर मार्क्सवादी होना चाहिए, क्योंकि माक्सर्वाद मजदूर वर्ग की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है.

-जॉर्ज हब्बाश



फलस्तीनियों के बेवतन होने के 50 वें साल में उनके हकीम ने उन्हें अलविदा कह दिया. यह पूरी दुनिया के जनसंघर्षों, छापामार योद्धाओं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांतिकारियों के लिए एक उदास कर देनेवाली खबर थी. यह हर तरह के शोषण के खात्मे और बराबरी का सपना देखनेवाले लोगों के लिए आंसुओं से भरी हुई खबर थी-आंसुओं, खून और पसीने से भरी हुई, जो जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम के जीवन का हिस्सा रहे. जॉर्ज हब्बाश नहीं रहे. 82 साल की उम्र में जब उन्होंने अपनी आंखें बंद कीं, उनके वतन के 40 लाख लोग-एक पूरा का पूरा देश-अपनी अनेक पीढियों के शोक, पीडा और अपराजेय लडाइयों के साथ अब भी निर्वासित, बेघरबार और बेजमीन बने हुए हैं. वे एक ऐसे देश के बाशिंदे हैं, जिसकी अपनी कोई जमीन नहीं रही. उनकी जमीन उनसे छीन कर एक दूसरे देश को दे दी गयी और वह दूसरा्व देश लगातार अपनी घेराबंदी उनके चारों ओर कसता जा रहा है.
हब्बाश 2 अगस्त, 1926 को लिड्डा में जन्मे थे. उनका परिवार एक यूनानी ऑर्थोडॉक्स ईसाई परिवार था. उनका परिवार व्यापार करता था और काफी संपन्न था. जब हब्बाश 10 वर्ष के थे, 1936 में विद्रोह और क्रांतिकारी संघर्ष से उनका पहला परिचय हुआ. यह महान फलस्तीनी विद्रोह के फूट पडने का दौर था. बाद में, अभी से लगभग 10 साल पहले एक इंटरव्यू के दौरान हब्बाश ने उन दिनों को याद किया. उन्होंने याद किया कि किस तरह फलस्तीनी राष्ट्रवादी आंदोलनकारी ब्रिटेन के खिलाफ बडे विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया करते थे. उन्होंने उन शिक्षकों को याद किया, जिन्होंने उन सबमें संघर्ष की भावना भरी थी और अपने छात्रों को अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष को प्रोत्साहित किया था. हब्बाश ने उन्हें भी याद किया था, जिन्होंने दुनिया के इस सबसे लंबे युद्ध में अपनी जमीन और अपने लोगों के लिए महान शहादतें दीं.

जॉर्ज हब्बाश उन्हीं शहादतों, उन्हीं संघर्षों, उन्हीं लडाइयों और मुक्ति के उन्हीं सपनों की उपज थे. 1948 में हब्बाश अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी बन गये, जब इस्राइल की स्थापना की गयी और फलस्तीन में जायनिस्ट हमलावर घुस आये. लाखों फलस्तीनी अपने घरों से जबरन खदेड दिये गये. फलस्तीनियों के जेहन में यह घटना अल नकबा के नाम से याद है।

हब्बाश के परिवार को लेबनान में शरण लेनी पडी. वहां रहते हुए हब्बाश का नामांकन बेरूत स्थित अमेरिका विश्वविद्यालय में हो गया, जहां उन्होंने मेडिकल की पढाई की. एक बातचीत में हब्बाश ने तबके लेबनानी राष्ट्रपति डॉ बायर्ड डोडगे की बातों को याद किया है-वे हमसे कहते कि हमें अमेरिका के बारे में बताओ जो कि इंसाफ, आजादी और मानवतावादी उसूलों के लिए खडा है. लेकिन हम उनकी बातों में, जो वे अमेरिका के बारे में कह रहे होते और अमेरिका जो कर रहा होता-इस्राइल और यहूदीवाद का समर्थन-में विरोधाभास देखते.

हब्बाश ने 1951 में मेडिकल की अपनी पढाई पूरी की. उन्होंने कुछ समय तक प्रैक्टिस भी की. उन्होंने उन दिनों अपनी जन्मभूमि लिड्डा की यात्रा की, जब वह एक जायनिस्ट हत्यारे गिरोह के कब्जे में थी. शहर पर इस्राइली सुरक्षा बलों द्वारा चलाये जा रहे हगाना नामक गिरोह की मदद से शासन कर रहे उक्त जायनिस्ट गिरोह ने शहर को लगभग श्मशान में तबदील कर दिया था. शहर के 20 हजार बाशिंदों का सफाया कर दिया गया. अब हम इस घटना को लिड्डा डेथ मार्च्व के नाम से जानते हैं. इस्राइली इतिहासकारों के अनुसार इसमें सिर्फ 335 आदमी, औरतें और बच्चे मारे गये, जबकि अन्य स्रोत इससे कहीं अधिक की संख्या बताते हैं. इस घटना के पहले 426 लोगों की हत्या जायनिस्ट बलों ने कर दी थी. विस्थापित फलस्तीनी जॉर्डन में शरण ले रहे थे. हब्बाश जॉर्डन स्थित इन शरणार्थी शिविरों में डॉक्टर के रूप में काम कर रहे थे. यहां रोज उनका सामना निर्वासन के कठोर जीवन और इस्राइली क्रूरता से होता. धीरे-धीरे वे मिस्र के राष्ट्रपति कमाल अब्दुल नासिर के अखिल अरब राष्ट्रवाद्व के करीब आये.

1957 में उन्हें जॉर्डन छोडने पर मजबूर होना पडा, क्योंकि तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. इसके लगभग एक साल बाद, 1958 में अमेरिका विवि, बेरूत के पूर्व छात्रों को लेकर हब्बाश ने अरब नेशनलिस्ट मूवमेंट शुरू किया. जो कि अम्मान और जॉर्डन में सक्रिय था. उनकी कोशिश थी कि इस्राइल के विरुद्ध सारा अरब जगत एक हो जाये.

1967 में इस्राइल-अरब के बीच छह दिवसीय युद्ध हुआ, जिसने मध्यपूर्व के भावी इतिहास की दिशा तय की. इस युद्ध में अरबों की पराजय हुई और इस्राइल ने पूर्वी येरुशेलम, पश्चिमी तट और गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया.
इलाके में बढते इस्राइली प्रभाव, मध्यपूर्व में अमेरिकी हस्तक्षेप, इस्राइल को खुली अमेरिकी मदद और अरब जगत पर विभिन्न रूपों में जायनिस्ट हमलों ने हब्बाश के लिए यह साफ कर दिया कि शांतिपूर्ण और समझौतावादी संघर्षों से कुछ नहीं होनेवाला. उन्होंने फलस्तीन की मुक्ति के लिए नये तरह के युद्ध की जरूरत समझी और पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ पैलेस्टाइन्व (पीएफएलपी) नामक मशहूर संगठन की बुनियाद रखी।






हब्बाश के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ और घटनाओं के आपसी अंतर्संबंध इतने साफ थे कि वे मध्यपूर्व में साम्राज्यवाद के अस्तित्व, उसके स्वरूपों, उसके उत्पीडन और उसके खिलाफ निर्णायक युद्ध की जरूरत को मध्यपूर्व के किसी भी नेता से अधिक समझ रहे थे. इसलिए उन्होंने सिर्फ फलस्तीन की मुक्ति तक ही अपने को सीमित नहीं रखा. वे यह जानते थे कि उनका देश साम्राज्यवाद के मंसूबों के तहत उत्पीडन का शिकार है और इसके पतन के बगैर फलस्तीन आजाद नहीं हो सकता. इसके लिए पूरे अरब जगत और पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ संघर्षों की जरूरत और उनसे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष की एकता के महत्व को उन्होंने समझा. यही वजह रही कि हब्बाश के पीएफएलपी ने पीएलओ के एक और घटक फतह से बिल्कुल भिन्न रास्ता अपनाया. फतह ने अपने को फलस्तीनी चरित्र दिया और उसने अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही सशस्त्र संघर्ष का सहारा लिया और इसके साथ-साथ कूटनीतिक कार्रवाइयां जारी रखीं. इसके उलट पीएफएलपी ने आरंभ से ही क्रांतिकारी कार्रवाइयों को अपनाया.

हब्बाश ने अपने को वैचारिक तौर पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद से समृद्ध किया. उन्होंने अपने उेश्यों के लिए क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता चुना, जिसके बारे में उन्होंने 1967 में पीएफएलपी के उद्धाटन वक्तव्य में कहा-क्रांतिकारी हिंसा एकमात्र भाषा है, जिसे दुश्मन समझता है. पीएफएलपी ने जायनिस्ट दुश्मन के खिलाफ संघर्ष को ऐतिहासिक कार्यभार घोषित किया और उनके द्वारा कब्जा की हुई भूमि को नरक में बदल देने का आह्वान किया. 1969 में पीएफएलपी ने खुद को एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी आंदोलन घोषित किया और यह एलान किया कि वह साम्राज्यवाद और अरब प्रतिक्रियावाद के खिलाफ लडेगा. पीएफएलपी ने फलस्तीन को मुक्त करने के संघर्ष को व्यापक राजनीतिक-सामाजिक क्रांति के एक हिस्से के तौर पर देखा.

हब्बाश का कहना था कि फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष सिर्फ फलस्तीन को यहूदीवादियों से मुक्त कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उेश्य अरब जगत को पश्चिमी औपनिवेशिक ताकतों से मुक्त कराना भी है. इसके अलावा उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि इस्राइल पर विजय तभी हासिल हो सकती है जब पारंपरिक अरब सरकारें क्रांतिकारी शासन द्वारा हटा दी जायें.

60 का दशक दुनिया की उत्पीडित जनता के लिए सबसे सौभाग्यशाली दशकों में से था. यह वह दौर था जब दुनिया के अनेक देशों में उत्पीडित जनता साम्राज्यवादी, सामंती और उत्पीडक शासकों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्षों के नये-नये रूप तलाश रही थी और नये मोरचों पर अपने दुश्मनों को मात दे रही थी. भारत में नक्सलबाडी के रूप में एक सुव्यवस्थित क्रांतिकारी आंदोलन जन्म ले रहा था, चीन माओ के नेतृत्व में सांस्कृतिक क्रांति के दौर से गुजर रहा था और वियतनाम में उसकी बहादुर जनता के अपराजेय प्रतिरोध के कारण अमेरिका अपने इतिहास के सबसे अपमानजनक पराजय की ओर बढ रहा था. पेरिस में भी छात्रों का आंदोलन उभर रहा था. जॉर्ज हब्बाश के नेतृत्व में पीएफएलपी इन संघर्षों की उत्तेजना और तकनीक से कटा हुआ नहीं था. वह उनसे सीख रहा था और समृद्ध हो रहा था. इसी दौर में पीएफएलपी ने चीन और वियतनाम के गुरिल्ला युद्ध से गुरिल्ला तकनीक अपनायी और फलस्तीन-अरब मुक्ति संघर्ष में एक नये दौर की शुरुआत हुई.

हब्बाश का मानना था कि फलस्तीन की मुक्ति के लिए चीन और वियतनाम के रास्ते उपयुक्त हैं. हालांकि एक समय हब्बाश फिदायीन हमलों के बडे विरोधी रहे थे. लेकिन नयी परिस्थितियों में उन्होंने पाया कि गुरिल्ला युद्ध एक अनिवार्यता हो गया है. इस कारण से हो रही हिंसा के बारे में पूछने पर वे कहते-हमें दोष मत दो, दोष इस्राइलियों को दो जो हमारे युद्ध के स्वरूप को बिगाडने की कोशिश करते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ सहित दुनिया की बडी ताकतों ने इस्राइल की स्थापना करने के बाद फलस्तीनियों को भुला दिया था. उनके लिए मानो फलस्तीनियों की व्यथा और उनका नारकीय-गुलामीभरा जीवन था ही नहीं. उनके संघर्षों की ओर और उनकी पीडा की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता था. 1970 में पीएफएलपी ने दुनिया का ध्यान फलस्तीन संघर्ष की ओर आकर्षित करने के लिए उग्र रणनीति अपनायी. उसके योद्धाओं ने दो वायुयानों को हाइजैक किया और नष्ट कर दिया.

हब्बाश का कहना था कि जब हम एक हवाई जहाज हाइजैक करते हैं तो यह सौ इस्राइलियों को युद्ध में मारने से ज्यादा प्रभावकारी होता है...दशकों से विश्व जनमत न तो फलस्तीन के पक्ष में और न इसके खिलाफ रहा है. उन्होंने सामान्यतः हमें नजरअंदाज किया है. कम से कम अब दुनिया हमारे बारे में बात तो करती है. वे कहते-इस्राइली बिना अमेरिकी समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं. वे उस सबके जिम्मेवार हैं, जो हमारे शिविरों में हो रहा है. फलस्तीनी शरणार्थी शिविर यहूदियों के लिए बने नाजी यातना शिविरों से थोडे बेहतर हैं. हालांकि बाद में पीएफएलपी ने पश्चिमी सरकारों पर हमलों की रणनीति को त्याग दिया लेकिन उसने इस्राइली आक्रमणकारियों पर ऐसे हमले जारी रखे.फलस्तीननियों1980 में हब्बाश को दिल का एक दौरा पडा और उन्हें मजबूरी में कामकाज से अलग होना पडा. 1990 में वे सीरिया और जॉर्डन में रहे. 1993 में जब यासर अराफात ने ओस्लो समझौता किया तो पीएफएलपी ने अराफात पर आरोप लगाया कि वे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष को बेच आये हैं. इस समझौते के तहत पीएलओ ने उन इलाकों में जिन पर इस्राइल ने 1967 के बाद से अधिकार कर लिया था, फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के साथ सीमित शासन को स्वीकार कर लिया. यह फलस्तीनी मुक्E0��ि आंदोलन के पारंपरिक उेश्य-फलस्तीन से एक इस्राइली यहूदी राज्य की जगह एक लोकतांत्रिक, धर्मनरिपेक्ष राज्य के गठन जिसमें सभी धर्मों-मूलों को लोग समानता के साथ रह सकें-से पीछे हटना था. इस समझौते में उन फलस्तीनियों को लिए कोई चिंता नहीं दिखती थी, जो दूसरे देशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे. उनके लौटने का कोई प्रावधान इसमें नहीं था और न ही यह इस्राइल पर किसी भी तरह बाध्यकारी था कि वह फलस्तीनियों को उनके अधिकार सौंपे. वे इस बात को समझते थे कि ओस्लो समझौते के बाद पीएलओ अरबों का समर्थन खो देगा, क्योंकि इस समझौते में अरब-इस्राइल विवाद के केंद्र में नहीं रखा गया है और मामले के केवल फलस्तीन तक सीमति रखा गया है. वे इससे चिंतित थे कि यह समझौता फलस्तीनी एकता को खत्म कर देगा. ओस्लो समझौते के विरोध के लिए पीएफएलपी ने ब्लॉक-10 नामक समूह बनाया, जिसमें इसके अलावा हमास और इस्लामिक जेहाद समेत नौ और संगठन थे. फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के बाद भी हब्बाश ने कभी भी उसे मान्यता नहीं दी और न उसके अधिकार क्षेत्र में आनेवाली भूमि पर कदम रखे.

1998 में एक साक्षात्कार में हब्बाश ने कहा था- इस्राइलियों के साथ काम करने की कूटनीति के लिए कोई जगह नहीं है.हब्बाश यासर अराफात से कभी भी सहमत नहीं रहे. उन्होंने अराफात पर आरोप लगाया कि अराफात ने यहूदीवाद के असली चरित्र को भुला दिया है और ओस्लो समझौते के परिणाम फलस्तीनी लोगों के लिए त्रासद रहेंगे. हब्बाश उन संगठनों के नजदीक थे जो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखते थे. उनका कहना था- हम हमास से जुडे हुए हैं. हरेक फलस्तीनी को अपने घर, अपनी जमीन, अपने परिवार और अपने सम्मान के लिए लडने का अधिकार है-ये उसके अधिकार हैं. अंत-अंत तक उन्होंने इसके कोई संकेत नहीं दिये कि उनका फ्रंट सैन्य कार्रवाइयों को स्थगित करने का इरादा रखता है. वे कहते-सशस्त्र संघर्ष विवाद की प्रकृति पर निर्भर करता है-जो कि दुश्मन की प्रकृति द्वारा तय होता है.

अपने अंतिम दिनों में हब्बाश ने युद्धरत फलस्तीनी धडों की एकता और गाजा की दीवारबंदी के खिलाफ युद्ध के लिए आह्वान किया. हब्बाश कहते थे-अरब राष्ट्रवाद और स्थानीय सक्रियता के बीच जुडाव जरूरी है.

आज हब्बाश अम्मान के एक कब्रिस्तान में गहरी नींद सो रहे हैं. उनके सम्मान में फलस्तीनी राष्ट्रीय झंडा झुका रहा और फलस्तीनियों ने शोक मनाया. वे जीवनपर्यंत फलस्तीन की क्रांति के नायक रहे. यहां तक कि वे लोग भी, जो हब्बाश से असहमत थे, वे हब्बाश को फलस्तीनी क्रांति की चेतना कहते थे. वे एक ईसाई थे और उनका संघर्ष फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को रेखांकित करता है.
जॉर्ज हब्बाश अपने फलस्तीन को कभी मुक्त हुआ नहीं देख सके, लेकिन उन्होंने फलस्तीनी जनता में और उसकी संघर्षचेतना में कभी यकीन भी नहीं खोया. फलस्तीन कासपना, आजादी और बराबरी का सपना, प्रतिरोध और संघर्ष की परंपरा जब तक जिंदा रहेगी, जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम जिंदा रहेंगे...और दुनिया उस तरह मुक्त होगी, जिस तरह उन्होंने चाहा था-मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रास्ते पर, मजदूरों, किसानों और व्यापक जनता के निर्णायक संघर्षों के जरिये।
from hashiya blog
पूरी दुनिया की आधी दुनिया को उनके अधिकार की आवाज को ऊँचा करने वाली सीमोन द बोउवार ः-







यह वर्ष प्रसिद्ध नारीवादी विचारक, लेखक और एक्टिविस्ट सिमोन द बोउवार का जन्मशती वर्ष है।उनका जन्म 9 जनवरी 1908 को पेरिस फ्रांस में हुआ।सिमोन ने दार्शनिक, राजनैतिक और अन्य सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘द सेकेंड सेक्स’ सबसे अधिक चर्चित रही।इस किताब में उन्होने स्त्री शरीर और मन के बारे में पितृसत्ता द्वारा बनाए गए तमाम मिथकों और पारंपरिक विश्वाशों को खुली चुनौती दी। उन्होने सिद्ध किया कि स्त्री पैदा नहीं होती वरन बना दी जाती है।उन्होने बताया की पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के चरित्र व प्रकृति को जान बूझ कर एक रहस्य के आवरण में पेश किया जाता है। जिससे समाज में उसकी हैसियत एक ‘अन्या’ की बना दी जाती है। ‘द सेकेंड सेक्स’ का हिन्दी अनुवाद प्रभा खेतान ने ‘स्त्री उपेक्षिता’ शीर्षक से किया है। सिमोन जीवनपर्यंत स्त्रियों की मुक्ति व मानवजाति कि बेहतरी के लिए संघर्षरत रहीं। हम उनके जन्मशताब्दी वर्ष पर सभी छात्रों से उनकी रचनाओं का अध्ययन करने व उन पर विचार गोष्टियाँ आयोजित करने के अलावा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम लेने का आह्वान करते हैं। हम आने वाली पोस्टों में उनकी इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ रचनाओं का लिंक प्रेषित करेंगे। साभार:- परिसरवर्डप्रेस

26 फ़रवरी 2008


कैद में अधिकार:-

डॉक्टर और असाधारण मानवाधिकारकर्ता डॉ बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले नौ महीनों से अमानवीय कानूनों की आड़ में सलाखों के पीछे रखा हुआ है. उनकी कहानी दरअसल उस दरकती हुई जमीन की कहानी है जिसपर हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की इमारत टिकी है. शोमा चौधरी की रिपोर्ट साभार तहलका.
दिल्ली और मुंबई की भव्यता से परे, चमचमाते मॉल्स और हिचकोले खाते शेयर बाजार की सुर्खियों से कहीं दूर एक भला इंसान जेल में अपनी रिहाई का इंतजार कर रहा है. उसके बारे में थोड़ी-बहुत खबरें आई हैं. कुछ अखबारों में, कुछ टीवी चैनलों पर. फिर भी जादू-टोने, तंत्र-मंत्र, चमत्कार, बाजार, फिल्मस्टार, एसएमएस पोल आदि से अभिभूत मीडिया में अगर डॉ बिनायक सेन का जिक्र हुआ भी होगा तो इस बात के आसार कम ही हैं कि उसने आपका ध्यान खींचा हो.

बिनायक सेन की कहानी दरअसल उस दरकती हुई जमीन की कहानी है जिस पर हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की इमारत खड़ी है. ये कहानी है भारत के लोक और तंत्र, शहर और गांव, विकास और इंसानी जरूरतों, अंधे कानून और प्राकृतिक न्याय के बीच आ चुकी और बढ़ रही दरार की. ये उस भारत की कहानी है जिसे जोड़ने वाली डोरी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है. ये उस अन्याय की दास्तान भी है जो हजारों निर्दोष लोगों के साथ होता है और जिसकी खबर किसी को नहीं लगती. ये उस बेइंसाफी का सच भी है जो कल आपके और मेरे साथ होने का इंतजार कर रही है. और सबसे ज्यादा ये उस डरावनी हकीकत का पर्दाफाश करने वाली दास्तान है कि जब सरकार खुद को ही खतरे में बताने लगे तो साधारण लोगों के साथ क्या हो सकता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद इस प्रतिभाशाली नौजवान के सामने करिअर के शानदार विकल्प थे. वो विदेश जा सकता था या फिर यहीं ऊंची तनख्वाह वाली कोई नौकरी कर बढ़िया जिंदगी गुजार सकता था. मगर उसने एक ऐसी मुश्किल राह चुनी जिस पर चलने की हिम्मत कम ही लोग करते हैं.

मगर सबसे पहले कहानी के तथ्य.

पेशे से बच्चों के डॉक्टर और जाने-माने क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी), वेल्लोर से गोल्ड मेडेलिस्ट, 56 वर्षीय बिनायक सेन वो शख्स हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों के बीच में कुपोषण, टीबी और घातक मलेरिया से लड़ते हुए लगभग तीन दशक बिताए हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद इस प्रतिभाशाली नौजवान के सामने करिअर के शानदार विकल्प थे. वो विदेश जा सकता था या फिर यहीं ऊंची तनख्वाह वाली कोई नौकरी कर बढ़िया जिंदगी गुजार सकता था. मगर उसने एक ऐसी मुश्किल राह चुनी जिस पर चलने की हिम्मत कम ही लोग करते हैं. सेन ने छत्तीसगढ़ के होशंगाबाद में एक ईसाई संस्था द्वारा चलाए जा रहे ग्रामीण चिकित्सा केंद्र में अपनी सेवाएं देने का फैसला किया. यहां वो महात्मा गांधी के जीवनी लेखक मारजोरी साइकस से काफी प्रभावित हुए. उनके दिल में जनस्वास्थ्य, पर्यावरण के अनुकूल विकास और न्यायमूलक समाज का सपना पलने लगा. पढ़ाई के दौरान वेल्लोर की झुग्गियों में भ्रमण करते हुए सेन को ये अहसास हो गया था कि आजीविका, रहन-सहन और स्वास्थ्य में एक अहम संबंध है. इसका और गहराई से अध्ययन करने के लिए उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से सोशल मेडिसिन में डिग्री ली और 1981 में होशंगाबाद में खान मजदूर संघ के मशहूर नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ काम करने चले आए. यहां उन्होंने दालिराजहारा में शहीद अस्पताल की स्थापना में मदद की जिसे मजूदरों ने अपने पैसे से बनाया था. बाद में वो तिल्दा के मिशन हॉस्पिटल से जुड़ गए. 1990 में सेन ने अपनी पत्नी इलिना सेन के साथ रायपुर में रूपांतर नाम के एक एनजीओ की स्थापना की. पिछले 18 सालों से ये संगठन ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने और सुदूर इलाकों में मोबाइल क्लीनिक चलाने का काम कर रहा है. वो पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज(पीयूसीएल) नाम के मानवाधिकार संगठन से भी जुड़े जिसकी स्थापना जयप्रकाश नारायण ने की थी.

बिनायक सेन का काम कितना असाधारण है इसका अंदाजा आपको तब होता है जब आप रायपुर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर धमतरी जिले में जंगलों से घिरे बागरुमाला और साहेलबेरिया इलाकों में जाते हैं. यहां आकर आपको ये अहसास होता है कि एक रिटायर कर्नल के होनहार बेटे को असाधारण जुनून ही ऐसी जगह पर ला सकता था. इस इलाके में बसे छोटे-छोटे गांवों में कमार और दूसरी जनजातियों के वो लोग बसते हैं जिनका शुमार भारत के सबसे उपेक्षित लोगों में किया जा सकता है. यहां सेन अपना मंगलवार क्लीनिक चलाते थे. स्कूल, पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम और अपने जंगल के परंपरागत संसाधनों से लगातार वंचित किए जा रहे इन लोगों की जुबान पर बिनायक सेन की कई कहानियां हैं. उदाहरण के लिए लोग बताते हैं कि कैसे सेन ने लग्नी की जान बचाई जिसका गर्भपात हो गया था और उसका खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था. या किस तरह उन्होंने वन अतिक्रमण के आरोप में सामूहिक रूप से जेल में डाल दिए गए पिपरही भारही गांव के लोगों को बचाया. या फिर कैसे उन्होंने अनाज बैंकों की स्थापना में मदद की. कमार बस्ती में एक वृद्ध हमसे कहते हैं, “कुछ कीजिए. डॉक्टर को बचाइये. अब कोई ऐसा नहीं है जिसके पास हम जा सकें.”

सीएमसी वेल्लोर के निदेशक डॉ. सुरंजन भट्टाचार्य कहते हैं, “बिनायक ने एक अलग राह बनाई. वो डॉक्टरों की कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं. उन्होंने हमारी अंतरात्मा को झिंझोड़ा. उन्होंने हमें याद दिलाया कि एक स्वस्थ समाज बनाने के लिए आजादी, खाद्य सुरक्षा, आश्रय, समानता और न्याय जैसी कई चीजों की जरूरत होती है.” 2004 में सीएमसी वेल्लोर ने सेन को अपने प्रतिष्ठित पॉल हैरीसन अवार्ड से सम्मानित किया. इसमें सेन की प्रशंसा में ये शब्द कहे गए थे, “डॉ. बिनायक सेन सत्य और सेवा के प्रति अपने समर्पण को लड़ाई के अग्रिम मोर्चे तक ले गए हैं. उन्होंने सांचों को तोड़ा है और अपने मकसद को अपनी सुरक्षा से ऊपर रखकर एक बिखरे और अन्यायपूर्ण समाज में एक डॉक्टर की संभावित भूमिका को फिर से परिभाषित किया है. सीएमसी को बिनायक सेन से जुड़े होने पर गर्व है.”

इसके बावजूद, तीन साल बाद 14 मई 2007 को राज्य सरकार ने एक मानवाधिकारकर्ता और डॉक्टर के रूप में किए गए बिनायक सेन के लंबे और समर्पित कार्य को अनदेखा कर दिया. पुलिस ने पहले तो उन्हें नक्सली नेता घोषित कर दिया और बाद में गिरफ्तार कर लिया. उन पर आपराधिक षडयंत्र, राष्ट्रदोह और आतंक के ज़रिए मिले पैसे का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए. सेन की गिरफ्तारी के बाद से तीन अदालतें उन्हें जमानत देने से इनकार कर चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2007 को सेन को जमानत देने से इनकार कर दिया. ये भी विडंबना ही है कि इस दिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस था. अदालत में जिरह के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम और छत्तीसगढ़ सरकार के वकील का तर्क था कि भारत सरकार, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में उग्रवाद की जांच कर रही है और बिनायक सेन इस नेटवर्क का एक अहम हिस्सा हैं. उनका कहना था कि सेन को ज़मानत देने से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. इस दावे के पक्ष में हास्यास्पद सबूत पेश किए गए. लोग बताते हैं कि कैसे सेन ने लग्नी की जान बचाई जिसका गर्भपात हो गया था और उसका खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था. या किस तरह उन्होंने वन अतिक्रमण के आरोप में सामूहिक रूप से जेल में डाल दिए गए पिपरही भारही गांव के लोगों को बचाया. या फिर कैसे उन्होंने अनाज बैंकों की स्थापना में मदद की. कमार बस्ती में एक वृद्ध हमसे कहते हैं, “कुछ कीजिए. डॉक्टर को बचाइये. अब कोई ऐसा नहीं है जिसके पास हम जा सकें.”.

बिनायक सेन के व्यक्तित्व और चरित्र का अंदाजा उनके बारे में लोगों के विचारों से भी लगाया जा सकता है. जब सुप्रीम कोर्ट ने सेन को जमानत देने से इनकार कर दिया तो उनके समर्थन में उमड़ी एक रैली में मौजूद एक वृद्ध का कहना था, “अगर अदालत ने हमारे डॉक्टर को नहीं छोड़ा तो हम जेल तोड़ देंगे. मगर क्या फायदा? सारे कैदी भाग जाएंगे और डॉ बिनायक फिर भी वहीं रहेंगे.”

इसके बावजूद सेन के शुभचिंतकों की तमाम कवायदें भी उन्हें जमानत नहीं दिला सकीं. न एम्स और सीएमसी के उन डॉक्टरों के शपथपत्र जो सेन से प्रेरणा लेकर उनकी राह चल निकले हैं और न ही दुनिया भर के 2000 डॉक्टरों के हस्ताक्षर. ये भी गौरतलब है कि सेन जनस्वास्थ्य पर सरकार द्वारा बनाई गई सलाहकार समिति के भी सदस्य रह चुके हैं. विडंबना देखिये कि सेन के गिरफ्तार होने के सात महीने बाद 31 दिसंबर 2007 को इंडियन अकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज ने उन्हें आर आर खेतान गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया. अकेडमी ने डॉ बिनायक सेन के काम की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा प्रचारित मूल्यों से की.

क्या ऐसे आदमी को जेल में ठूंसना अन्याय नहीं है. छत्तीसगढ़ पुलिस के डीजीपी विश्व रंजन जवाब देते हैं, “तो क्या हुआ? क्या कोई मानवतावादी और आदर्शवादी, माओवादी नहीं हो सकता.” समझा जा सकता है कि राज्य सरकार के काम करने का तरीका क्या है.

सबसे ज्वलंत सवाल ये है कि बिनायक सेन को गिरफ्तार क्यों किया गया? ऐसा क्या हुआ कि सरकार के लिए उनकी पहचान बदल गई और उन्हें सलाखों के पीछे ठूंस दिया गया? एक नजर डालते हैं.

दो साल पहले जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में नारायण सान्याल नाम के एक माओवादी नेता को गिरफ्तार किया गया. 67 साल के सान्याल हाथ में गंभीर दर्द की एक बीमारी से पीड़ित थे जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में पामर्स कांट्रेक्चर कहा जाता है. जब सान्याल को वारंगल जेल से जमानत मिल गई तो जेल अधिकारियों ने उन्हें इस बीमारी का इलाज कराने की इजाजत दे दी. इसके तुरंत बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने उन्हें दंतेवाड़ा में हुए एक कत्ल के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और रायपुर जेल में डाल दिया. मई 2006 में कोलकाता में रह रहे सान्याल के बड़े भाई राधामाधव ने पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के महासचिव बिनायक सेन को एक पत्र लिखा और उनसे सान्याल के लिए वकील और चिकित्सा का इंतजाम करवाने की अपील की. इस पत्र की प्रतियां उन्होंने कई मानवाधिकार संगठनों को भी भेजीं. क्षेत्र के सबसे सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में से एक बिनायक ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. उन्होंने अपने फ्लैट के सामने रह रहे एक वकील भीष्म किंजर को सान्याल का केस लेने को राजी किया. साथ ही उन्होंने सान्याल की शल्यक्रिया के लिए जेल अधिकारियों को पत्र लिखना भी शुरू किया. बूढ़े और खुद भी बीमार राधामाधव का कोलकाता से रायपुर आना और भी कम होता गया. वो निश्चिंत थे कि सेन उनके भाई का ख्याल रखेंगे.

छह मई 2007 को रायपुर पुलिस ने अचानक पीयुष गुहा नामक कोलकाता के एक व्यापारी को गिरफ्तार किया. गुहा राधामाधव का परिचित था जो किंजर की फीस के 49,000 रुपये राधामाधव से लेकर सेन को देने जा रहा था. पुलिस ने दावा किया कि उन्हें गुहा से तीन अहस्ताक्षरित पत्र भी मिले हैं जिन्हें मिस्टर पी, दोस्त वी और दोस्त को संबोधित किया गया था और जिनमें जेल की परिस्थितियों,
उम्र, जोड़ों के दर्द आदि जैसी चीजों की शिकायत की गई थी. पुलिस को यकीन था कि ये पत्र सान्याल के लिखे हुए हैं और इनके मुताबिक इनमें किसानों और शहरी केंद्रों में काम का विस्तार करने की सलाह दी गई थी. साथ ही इसमें नवीं कांग्रेस के सफलतापूर्ण आयोजन पर बधाई भी दी गई थी. हास्यास्पद रूप से पुलिस ने इन पत्रों को विस्फोटक बताया. पुलिस के मुताबिक गुहा ने माना था कि उसे ये पत्र सेन ने दिए थे जो जेल में बंद नक्सलियों के लिए अवैध पत्रवाहक का काम कर रहे हैं. मगर जैसे ही गुहा को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उसने और ही बात कही. उसने खुलासा किया कि असल में उसे एक मई को गिरफ्तार किया गया था और पांच दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखकर और यातनाएं देकर उससे एक खाली दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए गए.

इस तरह के हास्यास्पद सबूतों पर पुलिस ने सेन को भगोड़ा नक्सल नेता घोषित कर दिया. उस समय सेन अपनी बीमार मां को देखने कोलकाता गए हुए थे. स्थानीय मीडिया में ये खबरें छपीं. इसे सुनकर सेन भौचक रह गए. उन्हें विश्वास था कि पुलिस को जरूर कोई गलतफहमी हुई है. उन्हें भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा था. इसलिए शुभचिंतकों की राज्य में न जाने और अग्रिम जमानत लेने की सलाहों को उन्होंने दरकिनार कर दिया. अपने त्रुटिहीन रिकॉर्ड और बेकसूर होने को लेकर निश्चिंत सेन पुलिस की गलतफहमी दूर करने बिलासपुर पहुंचे. यहां पहुंचने पर पुलिस ने उनसे कहा कि उनका बयान लिया जाएगा और वो तारबहार थाने में रुक जाएं. सेन ने ऐसा ही किया और 14 मई 2007 को उन्हें छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून और गैरकानूनी गतिवधि (बचाव) एक्ट के तहत फौरन गिरफ्तार कर लिया गया. ये दोनों देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक हैं जिनमें किसी चीज के लिए सोचना ही आपको जेल पहुंचा सकता है. जैसाकि किंजर कहते हैं, “मुझे पता था कि जज ज़मानत देने से इनकार कर देंगे. अगर आप पर इन कानूनों के तहत मामला दर्ज हुआ है तो समझिए आपका काम-तमाम हो गया. ये कानून जजों के मन में एक तरह का पूर्वाग्रह पैदा करने के लिए बनाए गए हैं.”

सेन के खिलाफ अभियोजन पक्ष के मुख्य आरोपों में एक ये है कि सेन जेल में बंद नक्सल नेता सान्याल से 33 बार मिले हैं. चलिए कुछ पल के लिए इस बात को छोड़ देते हैं कि सान्याल ने ऐसा क्यों किया, सान्याल का स्वास्थ्य, शल्यक्रिया, उनके मामले की जटिलताएं...सब छोड़ देते हैं. एक पल को ये भी मान लेते हैं कि बिनायक नक्सलियों से अप्रत्यक्ष सहानुभूति रखते हैं. मगर यहां तथ्य ये है कि इन सभी मुलाकातों की न सिर्फ कानूनी रूप से अनुमति ली गई थी बल्कि ये पूरी निगरानी में भी हुईं थीं. क्या सिर्फ इससे ही सरकार को किसी व्यक्ति की आजादी छीनने का अधिकार मिल जाता है? अभियोजन पक्ष का ये दावा है कि बिनायक ने खुद को सान्याल का रिश्तेदार बताकर अधिकारियों को धोखे में रखा. लेकिन उनकी पत्नी ने सूचना का अधिकार कानून के तहत वो पत्र निकाले जिनमें सेन ने जेल अधिकारियों से सान्याल से मिलने की अनुमति मांगी थी. पता चला कि वो सभी पीयूसीएल के आधिकारिक लेटरहेड पर लिखे गए थे जिनमें सेन ने महासचिव के रूप में हस्ताक्षर भी किए थे.

बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से ही पुलिस उनके खिलाफ हास्यास्पद सबूत ढूंढकर ला रही है. जैसे कि दो माओवादियों का एक दूसरे को लिखा गया प्रेमपत्र जिसमें बिनायक सेन का नाम है. इसके अलावा गोंदी में कथित रूप से एक मुठभेड़ स्थल पर मिला कागज का एक टुकड़ा जिसकी लिखावट शायद ही कोई पढ़ सके. पर पुलिस ने पाया है कि इसमें पीयूसीएल और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून लिखा है. या फिर नक्सल नेता मदन बरकड़े द्वारा सेन को लिखी गई एक चिट्टी जिसमें जेल के हालात की शिकायत की गई है जिसे सेन ने मानवाधिकार संगठनों के पत्रों में प्रकाशित करवाया. हैरत है कि इन सबूतों में कुछ भी ऐसा नहीं जो साबित करे कि सेन को जमानत देना राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालना होगा.

सवाल है कि फिर क्यों सरकार सेन को सलाखों के पीछे रखने पर तुली है? क्यों एक भले डॉक्टर को भयानक अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है? क्यों सेन के खिलाफ सबूत बनाए जा रहे हैं? उदाहरण के लिए डीजीपी विश्व रंजन दावा करते हैं कि पीयुष गुहा, सेन के खिलाफ उनका मुख्य सबूत हैं. मगर गुहा की गिरफ्तारी के कई हफ्ते बाद पुलिस उसे चार जून 2007 को अचानक पुरुलिया ले गई और थाना बंडवाना में हुए एक पुराने बम धमाके के मामले में उसे आरोपी बना दिया. गौरतलब है कि डेढ़ साल पहले अक्टूबर 2005 में जब इस मामले की मूल एफआईआर दर्ज हुई थी तो उसमें गुहा का नाम तक नहीं था. तो क्या ये गुहा को भी एक अपराधी का जामा पहनाने के लिए किया गया था? आखिरकार सेन का दामन काला करने की ऐसी कोशिशें क्यूं? बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से ही पुलिस उनके खिलाफ हास्यास्पद सबूत ढूंढकर ला रही है. जैसे कि दो माओवादियों का एक दूसरे को लिखा गया प्रेमपत्र जिसमें बिनायक सेन का नाम है. इसके अलावा गोंदी में कथित रूप से एक मुठभेड़ स्थल पर मिला कागज का एक टुकड़ा जिसकी लिखावट शायद ही कोई पढ़ सके.

बिनायक सेन मामले की भयावहता को पूरी तरह से समझने और इस देश के लिए इसके मायने जानने के लिए आपको छत्तीसगढ़ पर गौर से निगाह डालनी होगी. बिनायक सेन की कहानी उनके जैसे सैकड़ों बेनाम लोगों की कहानी का एक उदाहरण मात्र है जो उस लड़ाई में फंस गए हैं जो सरकार ने अपने ही लोगों के खिलाफ छेड़ रखी है. उन तमाम लोगों की तरह ही सेन की व्यथा भी मानवाधिकारों के खुलेआम हनन की कहानी है. कई मामलों में छत्तीसगढ़ अब माओवादी विद्रोह का केंद्र बन गया है जिसकी जड़ें 13 राज्यों में फैली हैं. छत्तीसगढ़ में खुद सरकार का कहना है कि बस्तर और दंतेवाड़ा के ज्यादातर हिस्से उसके नियंत्रण से बाहर हैं. बिना शक ये गंभीर स्थिति है. हर साल पुलिस के सैकड़ों जवान, असहाय आदिवासी और पुल, जेल व टेलीफोन के खंभों जैसे सरकारी प्रतीक उग्रवादियों द्वारा उड़ा दिए जाते हैं. गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2007 में छत्तीसगढ़ में 311 लोगों की जानें गई. देश भर में ये आंकड़ा 571 रहा। माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले आपको बताते हैं कि उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन है- ये समर्थन किस हद तक ऐच्छिक है और किस हद तक दबाव में, इसके बारे में कोई भी साफ-साफ नहीं बोलता। माओवादियों के बारे में जानकारी पाने का सिर्फ एक ही रास्ता है कि वो खुद आपको जंगलों में अपने कैंप तक ले जाएं. ज़ाहिर है ऐसे में वहां से आपको सिर्फ चुनिंदा सूचनाएं ही हासिल होंगी. ये बात भी साफ है कि जो इलाके माओवादियों के प्रभाव वाले हैं उनकी सरकारों ने पूरी तरह से अनदेखी की हुई है. स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा, बिजली, आजीविका जैसी चीजें यहां कहीं नजर नहीं आतीं. कई जगह सरकार ऐसे विकास और औद्योगीकरण की हड़बड़ी में है जो कि स्थानीय लोगों की उम्मीदों और जरूरतों से मेल नहीं खाता.

अदूरदर्शिता के चलते भारत सरकार शिकायतों का इलाज हिंसा से और रोग का इलाज रोगी को मिटाकर कर रही है. कठोर क़ानून, अनगिनत अर्धसैनिक बल, पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए हज़ारों करोड़ के पैकेज और नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए विशेष पैकेज. यानी कि सरकारी जवाब हिंसा की एक प्रतिस्पर्धी ज़मीन तैयार करने जैसा है. इसका उदाहरण है छत्तीसगढ़ में 2005 में ही सरकार प्रायोजित नक्सल विरोधी अभियान, जो अब सल्वा जूडम के नाम से कुख्यात है. इसने एक ग्रामीण को दूसरे ग्रामीण पर गोलियां चलाने के लिए तैयार कर एक अघोषित गृहयुद्ध को बढ़ावा दिया. सरकार ने 644 गांवों को जबरन खाली करवा कर वहां के लोगों को अमानवीय अवस्था में तंबुओं में रहने को मजबूर कर दिया. सरकार का नारा है कि उनके समर्थन को ही खत्म कर दो. मानवाधिकार कार्यकर्ता आपको बताएंगे कि सरकार का असल निशाना माओवादी नहीं बल्कि जमीन के नीचे प्रचुर मात्रा में मौजूद लौह अयस्क है जिसे वे नंदीग्राम की तर्ज पर निजी कंपनियों को सौंपने के लिए तैयार है.

ये अफवाहें भी उड़ रही हैं कि अस्थाई शिविरों को राजस्व गांवों में तब्दील कर दिया जाएगा और आदिवासियों द्वारा छोड़ी ज़मीनों को सरकार अपने कब्ज़े में ले लेगी. ये सब अभी भले ही कयास हों लेकिन सल्वा जुडूम की अति एक हकीकत है.

इसी का विरोध करने के लिए बिनायक सेन राज्य सरकार की आंखों की किरकिरी बन गए. उनके द्वारा उठाए गए मामलों में नारायण सान्याल का मामला शायद सबसे कम विवादित है. संतोषपुर फर्जी मुठभेड़, गोलापल्ली फर्जी मुठभेड़, नारायण खेरवा फर्जी मुठभेड़, रायपुर फर्जी आत्मसमर्पण, राम कुमार ध्रुव की हिरासत में मौत, अंबिकापुर, लाकराकोना, बांदेथाना, कोइलीबेरा—ये सभी नाम भयावह सरकारी अत्याचारों के गवाह हैं. उन अत्याचारों के जिनका सच बिनायक सेन और दूसरे मानवाधिकार कार्यकर्ता सामने लाए जिससे सरकार को खासी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी. दिसंबर 2005 में बिनायक सेन ने 15 लोगों के एक दल के साथ सल्वा जूडम पर करारी चोट करने वाली एक रिपोर्ट प्रकाशित की.

बिनायक सेन ने सरकार को एक बार नहीं बल्कि बार-बार आईना दिखाने का अपराध कर रहे थे और इसके एवज़ में सरकार कुछ भी करके उन्हें एक सबक सिखाना चाहती थी. बिनायक सेन की असल कहानी एक बुद्धिहीन और डरे हुए राज्य की अंधेरगर्दी की कहानी है. सरकार का रवैया जार्ज बुश जैसा ही है. जिसे उस जगह जनसंहार के हथियार नजर आ रहे हैं जहां असल में कुछ है ही नहीं. बिनायक सेन जैसे लोगों की छवि ओसामा बिन लादेन जैसी बनाई जा रही है. और ये सब किया जा रहा है राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में.

एक हल्के-फुल्के क्षण में डीजीपी विश्व रंजन ये स्वीकार करते हैं कि सेन के साथ न्याय नहीं हुआ. वो कहते हैं, "अगर मेरे बस में होता तो मैं बिनायक सेन को निगरानी में रखता उन्हें गिरफ्तार नहीं करता." ये एक बड़ी स्वीकरोक्ति है. तुरंत ही संभलते हुए, उसी सांस में वो ये भी कह जाते हैं कि सेन के खिलाफ उनके पास सबूतों का पहाड़ है. ऐसे सबूत जिसे वे न तो आपको दिखा सकते हैं और न ही अदालत में ही पेश कर सकते हैं. जब तक सबूतों का असल जैसा पहाड़ खड़ा नहीं कर दिया जाता तब तक बिनायक सेन जेल में सड़ते रहेंगे. एक हल्के-फुल्के क्षण में डीजीपी विश्व रंजन ये स्वीकार करते हुए मिलते हैं कि सेन के साथ न्याय नहीं हुआ. वो कहते हैं, "अगर मेरे बस में होता तो मैं बिनायक सेन को निगरानी में रखता उन्हें गिरफ्तार नहीं करता." ये एक बड़ी स्वीकरोक्ति है.

2 फरवरी 2008 की सुबह, गिरफ्तारी के पूरे 9 महीने बाद, सेन के खिलाफ आरोप तय करने के लिए उन्हें रायपुर की सत्र अदालत में पेश किया गया. पुलिसवालों की भीड़ से घिरे शांतचित्त, आकर्षक बिनायक सेन पुलिस वैन से नीचे उतरते हैं. दृढ़ता से हाथ मिलाने के बाद कहते हैं, "यहां आने के लिए धन्यवाद", इसके बाद सारे लोग अदालत में चले जाते हैं. जज सलूजा थोड़ी असहजता के साथ आरोपों को सुनाते हैं. वो कुछ बेकार के आरोपों को खारिज कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं करते. बिनायक विटनेस बॉक्स में चुपचाप खड़े रहते हैं. और अंत में सारे आरोपों को मानने से इनकार कर देते हैं. इसके बाद वे अपनी पत्नी और वकील से मिलने के लिए कुछ समय मांगते हैं जो उन्हें दे दिया जाता है.

वहां हवाओं में एक अजीब सा डर साफ महसूस किया जा सकता है. तमाम डॉक्टर जो उनका साथ देने के लिए आए हैं, बात करने से भी झिझकते हैं. एक दिन पहले ही पूरे रायपुर में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई हैं- दो महिलाएं, एक ट्रैवेल एजेंसी का मालिक, एक पत्रकार...हर आदमी खुद को शिकार महसूस कर रहा है. झूठ और सच में फर्क करना मुश्किल है. यद्यपि बिनायक सेन इस सबसे विरक्त से प्रतीत होते हैं. जब पुलिस उनको वैन में धकेलती है तो वे लोहे की जालियों से मुंह सटाकर कहते हैं, "कुछ लोगों को जानबूझ कर विकास की प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है. आप दो तरह के लोगों का वर्ग तैयार नहीं कर सकते. सबको इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी वरना जल्द ही बहुत देर हो जाएगी." उनकी आवाज़ सलाखों के पीछे से भी सुनायी दे रही है "अगर ये लोग मुझ जैसे आदमी को गिरफ्तार करते हैं तो मानवाधिकार कार्यकर्ता असहाय हो जाएंगे. मैंने कभी भी माओवादी हिंसा का समर्थन नहीं किया. यह एक अवैध आंदोलन है जो ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगा. सल्वा जूडम के साथ मिलकर इसने आदिवासी समुदायों में खतरनाक खाई पैदा कर दी है. लेकिन उनकी व्यथा वास्तविक है. ये इलाका इस समय अकाल से जूझ रहा है. लोगों के शरीर का वजन 18.5 से भी नीचे आ गया है, 40 फीसदी आबादी कुपोषण की शिकार है. दलितों और आदिवासियों में इसका स्तर 50 से 60 फीसदी तक है. हमें और ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने वाले विकास की जरूरत है. आप लोगो की दो श्रेणियां नहीं बना सकते...."

बातचीत कहीं से भी उनके भारत को तोड़ने वाला होने का आभास नहीं देती. ये पूछने पर कि खुद को नक्सली घोषित कर चुके नारायण सान्याल का साथ आप ने क्यों दिया, बिनायक सेन का जवाब दुनिया भर में मानवाधिकारों की जरूरत को स्थापित करता है, "मुझे पता था मैं शेर के मुंह में घुस रहा था लेकिन अगर आप अपने कदम पीछे खींचने लगे तो फिर आप कहां जाकर रुकेंगे? आप भेद-भाव नहीं कर सकते. सबको क़ानूनी सहायता और चिकित्सा सेवा पाने का अधिकार है. ये संविधान में लिखा है. ये मानवाधिकारों का आधार है."

डीजीपी विश्व रंजन गुस्से से पूछते हैं, "वह माओवादियों से ज्यादा सल्वा जूडम की आलोचना क्यों करते हैं?" बिनायक का जवाब होता है कि संविधान और क़ानूनी मर्यादाओं से बंधे होने के कारण भारत सरकार की जिम्मेदारियां उन माओवादियों के बनिस्बत ज्यादा बड़ी हैं जिन्होंने राज्य को ही त्याग दिया है. लेकिन सरकार से ऊंचे मूल्यो वाली ये नैतिकता हज़म नहीं होती. इलिना सेन से ये पूछने पर कि आपको ये लड़ाई लड़ने का जज्बा कहां से मिला, जवाब मिलता है, "मुझे महसूस हुआ कि ये सिर्फ बिनायक और मेरे परिवार का ही मामला नहीं है. हम एक बहुत बड़ी लड़ाई का हिस्सा हैं. हम शांतिपूर्वक अपनी असहमति जताने के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसके प्रति हमारा समर्पण मुझे ताकत देता है." ये एक और ऐसा नैतिक सदाचरण है जो सरकार के गले नहीं उतरता. मेधा पाटकर को ही लीजिए. 20 सालों का शांतिपूर्ण विरोध- नतीजा सिफर. शर्मिला इरोम को लीजिए- सात सालों का उपवास लेकिन कोई फल नहीं। बिनायक सेन को ही लें...

जल्द ही बिनायक सेन की सुनवाई शुरू होगी. इस दौरान उन्हें कैद रखने का मतलब होगा कि भारत में शांतिपूर्ण विरोधों के लिए कोई जगह नहीं. ये जनसंहार के हथियारों को खाद-पानी देने के जैसा है. ये अपनी बात रखने के लिए हिंसक तरीके अपनाने को प्रेरित करने जैसा है. ये पहले से ही ज़िम्मेदार लोगों द्वारा तार-तार किये जा चुके गांधीवाद की धज्जियां उड़ाने जैसा होगा.

12 फ़रवरी 2008

दक्षिण एशिया के देशों में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां ‘शांति खत्म हुई है





आनंद स्वरूप वर्मा दक्षिण एषिया देषों के जानकार हैं और विषेशतर नेपाल और भूटान की घटनाओं पर नजर रखते हैं उनका मानना है कि जबसे भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांगलादेष, भूटान यानि दक्षिण एषिया के देषो में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां ‘शांति खत्म हुई है। सन 1997 में पैट्रिक ºयूज की एक रिर्पोट आयी जिसमें कहा गया की आने वाले समय में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा दुष्मन होगा। यह रिर्पोट काफी चर्चा में रही। रिर्पोट का कहना था कि एषिया के देष अमेरिका की मिलेटरी को कम आंक रहे हैं और अमेरिका के खिलाफ एक आयडिओलॉजी पनप रही हैं। उसी समय डिफेंस मिनिस्टर डोनाल्ड रम्सफील्ड ने कहा कि यूरोप पर उतना ध्यान देने की जरूरत नही है जितना की साऊथ एषिया में।
ये सारी चीजें 1997 में घटित हो रही थी और 13 फरवरी 1996 में माओवादीओं ने नेपाल में पीपुल्सवार की घोशणा की गयी थी। इन सारी बातों को एक साथ देखने की जरूरत है। इसके बाद 2001 में स्टेट फॉर कि रिर्पोट आयी जिसमे दक्षिण एषिया को केंद्र में रखते हुए कहा गया की दक्षिण एषिया में माओवादीओं का उभार अमेरिका के लिये खतरा है। स्टेट फॉर की रिर्पोट मे यह भी कहा गया की यदि नेपाल माओवादीओं के हाथ में चला जाता है जैसा की हो चुका है तो उसका सम्बध चीन से अधिक प्रगाढ़ होगा न कि अमेरिका से जबकि चीन के लोग नेपाली माओवादीओं को न तो समर्थन करते हैं और न ही माओवादी विचार का मानते हैं उसी समय डोनाल्ड कैम ने यह कहा कि नेपाली माओवादीओं से अमेरिका के राश्ट्रहित को खतरा है। इसमें कई चीजें जुड़ी थी एक तो अमेरिका जिस बात का प्रचार कर रहा था इन्ड ऑफ आयडियोलॉजी विचार धारा की समाप्ति, क्लैस ऑफ सिविलाईजेषन यानी सभ्यता का टकराव वह नेपाल में उभता हुआ दिख रहा था। जो उनके लिये खतरा था। अत: आप देखे 2001 मे जब नेपाल में ‘शांतिवार्ता ‘शुरु हुई उसी समय अप्रेल में जसवंत सिंह अमेरिका गये हुए थे और भारत के ऐसे पहले विदेष मंत्री थे जिन्हें गार्ड ऑफ ऑनर से नवाजा गया था और जार्ज बुष ने उन्हें विषेश तव्वज्जो दी थी।
उसी समय हेनरी साल्टन की भारत यात्रा भी हुई। अत: कहीं-न-कहीं से अमेरिका भारत से अच्छे सम्बध बनाने के फिराक मे जुटा था जिसके पीछे की मंषा हम समझ सकते हैं। पंरतु नेपाल में अमेरिका को सेट बैक मिला क्योंकि जिन माओवादीओं को वे आतंकवादी लिस्ट में रखते हैं आज वे मंत्री हैं कल प्रधान मंत्री भी हो सकते हैं। भारत को लेकर 1998 में जब आडवानी गृह मंत्री थे तब हैदराबाद में एक मीटिंग हुई जिसमें भारत के 8 राज्यो को माओवादी प्रभावित क्षेत्र माना गया फिर 2005 में 13 राज्य, उसके बाद 14 राज्यों और अभी हाल की मीटिंग में 16 राज्यों के मुख्यमंत्री को इस बैठक में सम्मलित किया गया। यदि पूर्वोत्तर के राश्ट्रवादी आंदोलन कष्मीर, असम के आंदोलनों को लें तो कुल 16 और 8 मिलाकर 24 राज्यों में देष की सरकार इस तरह के विरोध को झेल रही है। तो क्या मात्र 4 राज्य ही ऐसे हैं जिनमे वह ‘शासन कर पा रही है, क्या यही लोकतंत्र है?
दरसल वजह यह है कि माओवादी आंदोलन या अन्य आंदोलनों से जूझते हुए राज्यों को केन्द्र से विषेश पैकेज मिलता है। जिसका इस्तेमाल वे आंतरिक मिलेट्राइजेषन में करते हैं। और इसी बहाने जनता के किसी भी तरह के प्रतिरोध को कुचलने में सहायता मिलती है। उदाहण के तौर पर प्रषांत राही वरिश्ठ पत्रकार उंतराखंड, विनायक सेन मानवाधिकार कार्यकर्ता छत्तीसगढ़, प्रफुल झा....... आदि गिरतार किये गये। इसी बहाने माकेZट फोर्स, पूंजी घराने की रक्षा की जा सकती है। यह इस लिए भी हो रहा है क्योंकि नयी बाजार की तलाष में कम्पनिंया जब गावं में जायेगी तो गावं में पनपते असंतोश को भी इन आंदोलनों के बहाने कुचला जा सके।
भूटान को देखें तो अभी वहां चुनाव हो रहा है और वहां का राजा मीडिया के व्दारा लोकतांत्रिक होनें का ढोंग रच रहा है। ‘शायद यह नेपाल की स्थितियों को देखते हुये। भूटान में जो लोग रियल डेमोकै्रसी की मांग कर रहे थे उन्हे देष से बाहर रियूजी की तरह घूमना पड़ रहा है। एक लाख 50 हजार से ज्यादा लोग भारत में हैं और जब वे जाने की बात करते हैं तो भारतीय पुलिस उनका दमन कर रही है। अमेरिकन और भारतीय सरकार यह चाहती है कि भूटान मे कुछ ऐसे आंदोलन ‘शुरु हों जिन्हें आतंकवादी, नक्सलवादी, माओवादी जैसा नाम देकर उनका दमन कर सकें और अपनी पैठ बना सकें।

11 फ़रवरी 2008

पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट :-



पाकिसतान में आज चुनाव है ऐसे हालात मे पाक पर एक नजरः-
करामत अली पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार है। पाकिस्तान की बदलती हालाते और बढ़ते सैन्यकरण को पाकिस्तान की जनता के हित में खतरे के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र का तकाजा है कि वह अपनी जनता को सुरक्षित रखे, उसके अधिकारो को सुरक्षित रखे। जनता को इस सुरक्षा का अहसास तभी हो सकता है जब पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंध हों देश की सीमाओं पर युध्द के खतरे कम हों और देश की सम्प्रभुता बरकरार रखी जाये। परंतु हाल के दिनों में पाक की सीमा और देश की आंतरिक शस्त्रीकरण और बढ़ता सैन्यकरण इस बात का संकेत है कि देश की स्थिति, मानवाधिकारों की स्थिति और लोकतंत्र की स्थिति बद से बद्तर हुई है।

पाक की स्थिति भारत से भी ज्यादा खराब है उसका अंदाजा हाल की कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है। इसका कारण यह है कि पाक की सेना देश में प्रत्यक्ष रूप में शासन कर रही है सेना का पूर्णता हस्तक्षेप पिछले कई वर्षों से रहा है, और बढ़ा है। इसका एक उदाहरण आप देखे तो बेनजीर भुट्टो की पीपुल्स पार्टी जब सत्ता मे आयी तो वह बहुमत में नहीं थी। अन्य छोटी पार्टिओं के सहयोग से ऐसा संभव हुआ। ऐसे अवसर पर पाक के आर्मी चीफ ने बेनजीर को डिनर पर बुलाया जिसमे सेना के सभी बडे़ हुक्मरान और उनकी बीबीयॉं भी शामिल थी। डिनर के वक्त आर्मी चीफ ने बेनजीर से कहा की शासन तो आप करिये पर तीन विभाग में कौन रहेगा यह हम तय करेंगें जो भी हो पर बेनजीर से यह बात मनवा ली गई पहला फॉरेंन अफेयर, दूसरा इंडिया पाक रिलेशन तीसरा फाइनेन्स ऑफिसर जाफरी रहेंगे । बेनजीर को खुद नही पता था की यह जाफरी है कौन? दरअसल जाफरी वल्र्ड बैंक के एक अधिकारी थे।
इस तरह पाक आर्मी के कब्जे में वित्त व्यवस्था किसी भी समय थी और है। जिससे वें मिलेट्राईजेशन और न्युिक्लयराइजेशन की बजट बढ़ाने में सफल रहे हैं। और देश की जी.डी.पी. का 6.5 व्यय सेना पर हो रहा है दूसरा अमेरिका को इससे ज्यादा मदद यह मिली की वल्र्ड बैंक का अधिकारी (अमेरिकी प्यादा) पाक का वित्त मंत्री रहा तीसरा अमेरिका को शस्त्र बेचनें में मदद मिली।
पाकिस्तान की सेना का सार्वजनिक उपक्रमों में भी पूरा हस्तक्षेप है देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति रिटायर्ड सेनाधिकारी हैं। समाज के हर सोरमे में सेना का हस्तक्षेप है और सेना-सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों को खत्म किया जाता है। विभाजन के बाद भारत पाक के ट्रेड युनियन एक जैसे थे पर पाकिस्तान के ट्रेड युनियन मे बदलाव आया है। पहले आर्मी में वे लोग यूनियन बना सकते थे जो वदीZधारी नही थे। जिनकी सेना मे एक बड़ी तादाद भी है पर अब वे यूनियन नहीं बना सकते हैं यहां तक कि जो लोग सेना से किसी भी तरह का सम्बध रखते हैं यूनियन नहीं बना सकते। अभी हाल में एक दिलचस्प वाकया घटित हुआ जिसमें कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। मामला यह था कि एक एक्वागार्ड कम्पनी के मजदूरो ने यूनियन बनाई थी जिसको कम्पनी ने कोर्ट में यह कहते हुए मामला दाखिल किया कि वह सेना को एक्वागार्ड सप्लाई करती है और नियमत: सेना से सम्बध्द कोई भी विभाग की यूनियन नही हो सकती। कारण वश फैसला कम्पनी के पक्ष में रहा ।
दुनिया का यह पहला देश होगा जहां रेलवे लाईनों की लम्बाईओं में कमी आयी है कारण पड़ोसी देशों का खौफ रहा है जिसका झूठा प्रचार पाक सरकार हमेशा करती रही है। जिससे देश के लोगों को भी रेलवे सुविधाए ठीक ढंग से मुहैया नही हो पाती। और रेलवे में भी जहां से आमीZ की ट्रेन गुजरती है वहां से सारे ट्रेड यूनियन खत्म किये गये हैं।
भारत और पाक दोनों देश यह कहते रहे हैं कि जंग नही करनी है मसले को शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जाना है इसके बावजूद दोनों देश नए हथियारों से लैस हो रहे हैं सेना की खर्च को बढ़ाया जा रहा है , परमाणु परीक्षण किये जा रहे हैं। भारत यदि 150 परमाणु शस्त्र रखने का दावा कर रहा है तो पाक कम-अज-कम 50 या उससे अधिक रखने का प्रयास में जुटा है। इसके पीछे क्या कारण हैं। यदि परमाणु बम पंजाब मे गिरता है तो ऐसा नही है कि वह केवल पंजाब में ही विध्वसं फैलायेगा उसका असर पाकिस्तान तक जायेगा क्योंकि बम कोई सीमा नहीं देखता और न ही किसी देश की सेना उसके प्रभाव को रोक पायेगी। कुल मिलाकर देश की जनता ही तबाह होगी जब कि ऐसा करने में दो चार बम ही काफी है फिर सौ क्या पचास क्या। और एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका फैसला लेने वाले दोनों देशो में पचास से भी ज्यादा लोग नही है जबकि अंजाम अरबों जनता को भुगतना होगा। यह कैसा लोकतंत्र है और कैसा न्याय है। अत: दोनों देशो को अपने सैन्य शस्त्रों को कम करना चाहिए और परमाणु निशस्त्रिकरण करना चाहिए। दरसल ये देश टेरर और वार के नाम पर यूरोप और अमेरिका की सेवा कर रहे हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा और हसीं भी आएगी की पाकिस्तान मे आज गरीब की परिभाषा इससे तय की जाती है कि किसके पास बंदूक नही है , रॉकेट लांन्चर नही है , बच्चे लेवर कर रहे हैं बिलो पॉवर्टी के नीचे है, इससे नही। गणतंत्र दिवसपर हम अपनी मिलेट्री पावर अस्त्र-शस्त्र का प्रदशZन करते हैं, न कि डेमाके्रसी में सुधार, मानवाधिकार किसानों की बदतर हालातों की चर्चा।
दूसरी बात डिफेन्स पर हो रहे खर्चे पर किसी भी संसद में बहस नही होती जो होनी चाहिए और सेना को कम किया जाना चाहिए। इस बार जब कांग्रेस सत्ता में आयी तो एक मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री का कहना था कि एक दो माह में सियाचीन से आमीZ हटा ली जाऐगी पर हुआ यूं कि एक दो हप्ते बाद आमीZ चीफ का बयान आया कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं कि सेना को हटाया जाये और तब से यथास्थिति बनी हुई है। हमें यह नही सोचना चाहिए कि जब आमीZ माशZल लॉ लगाती है तभी शासन करती है बल्कि जब इनके पावर और ये बढ़ते हैं तब भी शासन करते हैं। और श्रीलंका, बंग्लादेश, पाक, भारत सबके सेना की हालत एक जैसी है।
भारत पाक की स्थिति को देखे हुए ऐसा लगता है कि देश मे एक बडे़ जन आंदोलन की जरूरत है जिसके जरिये मिलेट्राइजेशन को कम किया जा सकता है और उस पैसे से देश की अन्य बदतर स्थितियो को सुधारा जा सकता है। सेना में आयात किये जाने वाले शस्त्रो का दस प्रतिशत कमीशन भी हटाया जाना चाहिए।

07 फ़रवरी 2008

कब लौटेंगे हुसैन अपने घरः-



93 साल के मकबूल फिदा हुसैन अपने-आप में एक चलता-फिरता इतिहास हैं. अपनी पेंटिंग्स पर उठे विवादों और उन पर चल रहे अदालती मामलों के बाद पिछले कुछ समय से उन्हें दुबई में रहना पड़ रहा है. इन विवादों को लेकर वो क्या सोचते हैं? अपने विरोधियों को कहने के लिए उनके पास क्या है? ऐसे कुछ सवालों को टटोलता शोमा चौधरी का लेख .


मकबूल फिदा हुसैन को भारत रत्न दिया जाए या नहीं, खबरिया चैनल एनडीटीवी द्वारा इस सवाल पर एसएमएस पोल चलाने के विरोध में 19 जनवरी को जब कुछ लोग चैनल के अहमदाबाद स्थित दफ्तर में तोड़फोड़ कर रहे थे तो ये फनकार दुबई स्थित अपने घर में उस्ताद अमजद अली खान के बेटे की शादी के निमंत्रण पत्र के लिए दो घोड़ों का स्केच बनाने में तल्लीन था. उनके ब्रश की आवाज कमरे में पसरी शांति को तोड़ने के बजाय और गहरा कर रही थी. हुसैन जब चित्रकारी कर रहे होते हैं तो उनके ध्यान में कोई भी चीज बाधा नहीं डाल सकती. उनकी जिंदगी के पिछले 70 साल चित्रों के भक्त के रूप में गुजरे हैं. इन 70 सालों में उन्होंने हिंदू दर्शन और संस्कृति को आत्मसात किया है. रामायण पर चित्रकारी करते हुए आठ साल बिताए हैं. महाभारत को भी इतना ही वक्त दिया है. हुसैन ने गणेश, शिव, पार्वती, हनुमान, राग, नाट्य और बनारस की सैकड़ों तसवीरें बनाई हैं. भारत के बारे में दुनिया की समझ को समृद्ध करने के लिए उन्होंने सारी दुनिया की यात्रा की है. उन्हीं हुसैन को अब धर्मविरोधी करार दे कर उनके नाम पर तोड़फोड़ की जा रही है.

हुसैन कहते हैं, “ये इतिहास का बस एक लम्हा है, क्या कर सकते हैं.” दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है .

हालांकि हुसैन के लिए निर्वासन कड़वा अनुभव नहीं क्योंकि ऐसा होना उनके विरोधियों की जीत और उनकी हार जैसा होगा. वो ठाठ और मजे के साथ जीने में यकीन रखते हैं. दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है जिसकी भव्यता देखते ही बनती है. इसके तीन कमरे उन्होंने अपनी कला को समर्पित किए हैं—एक कमरे में 1950 के दशक में बनाई गई पेंटिग्स रखी गई हैं. इनमें अपने आप में एक कहानी ‘मारिया कलेक्शन’ भी शामिल है. दूसरे कमरे में पेंटिंग्स की एक श्रंखला, जिसे वो ‘हुसैन डिकोडेड’ कहते हैं, मौजूद है. तीसरे में मुगले-आज़म पर आधारित पेंटिंग्स रखी गई हैं.

इन दो अपार्टमेंट्स के बीच हुसैन अपनी जिंदगी उस ऊर्जा, उत्साह और सक्रियता के साथ जी रहे हैं जो उनसे एक तिहाई उम्र के लोगों को भी शर्मिंदा कर दे. वो सुबह सात बजे उठते हैं और रात को दो बजे तक जागे रहते हैं. उन्हें शानदार कारों का शौक है और उनके बेड़े में फेरारी, बेंटली, जगुआर और सात करोड़ में खरीदी गई बुगाटी शामिल है. हुसैन हंसते हुए कहते हैं, “लोग मूर्तियां खरीदते हैं, मैं कारें खरीदता हूं.”

शरारत उनके खून में है. फिदा की पत्नी साहिबा कहती हैं, “जब चाचा घर पर होते हैं तो सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती.” हुसैन ने उन सबकी जिंदगी का कायाकल्प कर दिया है. फिल्में, पॉपकॉर्न, समारोह, मेहमान, महंगी जगहों पर भोजन, सस्ते रवि ढाबा पर दिन का खाना, एक मालाबारी होटल की चाय जैसी चीजों में ही उनका वक्त बीत रहा है.

पेंटिंग के इतर भी हुसैन सतत चलायमान रहते हैं. उनकी उंगलियां लगातार किसी काल्पनिक तबले पर थिरक रही होती हैं. वो एक दिन आबूधाबी में होते हैं तो दूसरे दिन कतर में. हर साल गर्मियों के महीने वो लंदन जाते हैं. इन दिनों वो अरबी भाषा भी सीख रहे हैं. इसके अलावा वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.

अकूत धनसंपदा का ये मालिक आज भी पहले की ही तरह अपने ड्राइंग रूम में बिछे एक साधारण गद्दे पर सोता है. हुसैन अकेले यात्रा करना पसंद करते हैं. 93 साल की उम्र के इस शख्स की शारीरिक फुर्ती और मानसिक क्षमता देखकर हैरत होती है. लगता है जैसे उन्हें कोई दिव्य वरदान मिला हुआ है.

हुसैन एक तरह से जीता-जागता इतिहास और राष्ट्रीय धरोहर हैं. जिस दिन एनडीटीवी के अहमदाबाद आफिस में बीस लोग तोड़-फोड़ करते हैं उसी शाम हम उस्ताद अमजद अली खान और उनके बेटों के संगीत आयोजन में जाते हैं. लोगों की भीड़ उन्हें ऐसे घेर लेती है जैसे वो एक फिल्म स्टार हों. बार-बार सुनने को मिलता है, “दुबई का सौभाग्य है कि आप यहां हैं.” लोग उन्हें छूने, उनका ऑटोग्राफ लेने और उनके साथ फोटो खिंचवाने की कोशिश करते हैं. उस्ताद के सरोद का संगीत अब भी माहौल में गूंज रहा है. कुछ देर पहले हमने उनकी गणेश वंदना का आनंद लिया है. विविधताओं से बनी भारत की जिस मजबूत संस्कृति पर हम गर्व करते हैं वो ऐसे ही लोगों में बसती है. इस माहौल में भी रह-रहकर भारत में हो रही घटनाओं पर ध्यान चला जाता है. बाद में मालाबार रेस्टोरेंट में चाय पीते हुए हुसैन इस बारे में मानो कुछ सोचते हुए कहते हैं, “गालिब ने एक बार बहुत परेशान होकर कहा था कि या तो मेरे श्रोताओं को समझ दे या फिर मेरी आवाज बदल दे.” वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.


हुसैन की आत्मकथा ‘अपनी जबान में’ में एक घटना है. एक बच्चा मिट्टी से खेलता हुआ कुछ आकृतियां बना रहा है. मक़बूल नाम का एक नौजवान आता है और इन्हें चटख रंगों में रंग देता है. कोई भी इन आकृतियों में दिलचस्पी नहीं लेता. इसके बाद एम एफ हुसैन नाम का एक शख्स आता है और उन पर अपने हस्ताक्षर कर देता है. अचानक ही आकृतियों को खरीदने के लिए भीड़ टूट पड़ती है. हुसैन कहते हैं, “तीनों पात्र मैं ही हूं. कला की कीमत बढ़ाने के लिए मैंने एम एफ हुसैन को सोचसमझकर एक ब्रांड के रूप में तब्दील किया. मैं चाहता था कि कला के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़े. मेरे लिए ये एक मिशन था.”

एम एफ हुसैन ब्रांड को लोगों ने हाथों-हाथ लिया. कला के बाजारीकरण से कई नाराज भी हुए मगर इसने भारतीय कला को विश्व स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई. 90 के दशक में जब हुसैन ने अपनी एक कलाकृति का मूल्य 40 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये किया था तो लोगों ने इसे आत्मघाती कदम बताया. आखिर में जीत हुसैन की ही हुई और ये पांच लाख रुपये में बिकी. अगली बार उन्होंने अपने काम की कीमत पांच लाख लगाई, फिर दस लाख और इसके बाद आया एक करोड़ का मुकाम. इसे कामयाब बनाने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने इस आयोजन को सिटीबैंक से प्रायोजित करवाया और चुनिंदा दर्शकों को ही आमंत्रित किया. फिर उन्होंने एक तमाशा किया. संगीत की धुन और नर्तकों के थिरकते कदमों के बीच उनका कैनवास मखमल के किसी पर्दे की तरह लहराते हुए नीचे आया. इससे पहले वो ऐसा ही तामझाम भरा एक आयोजन वो माधुरी दीक्षित के साथ कर चुके थे. हुसैन कहते हैं, “मैंने माधुरी से पूछा कि क्या वो भारतीय कला को मशहूर बनाने के मिशन में मेरा साथ देंगी. आयोजन में हमने रंगों से पोता हुआ एक सफेद घोड़ा रखा हुआ था. शानदार लिमोजीन में बैठकर हम जानबूझकर आयोजन में देर से आए. लोगों को ये तमाशा खूब पसंद आया.”

हंसते हुए हुसैन कहते हैं, “लेकिन मैंने खुद को बचाए रखा है. मेरे भीतर वो बच्चा और चित्रकार मकबूल अब भी जिंदा है. मकबूल के बिना एम एफ हुसैन का वजूद नहीं होता.”

हुसैन के एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है. बतौर कलाकार मैं अपनी ऊंचाई 1950 के दशक में छू चुका हूं. मेरा बाकी का काम उसी का प्रतिबिंब है. जब मेरी बीवी फाज़िला का भाई बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चला गया तो कई दशक तक मैंने उससे कोई संपर्क नहीं रखा. मैं हमेशा से राष्ट्रवादी रहा हूं. मगर मुझे जगहों से कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता. मां का प्यार आपके दिल में घर का अहसास पैदा करता है...आपको बांधकर रखता है. मैं बस डेढ़ साल का था जब मेरी मां चल बसी इसलिए मैंने इस तरह का लगाव भी कभी महसूस नहीं किया. मेरा पहला बच्चा शब्बीर तीन साल की उम्र में ही चल बसा. मैंने खुद एक गटर से उसकी लाश बाहर निकाली. इसके बाद खोने के लिए बाकी क्या रह जाता है.”

हुसैन के विचारों से आपको एक तरह की बुद्धिमत्ता की झलक मिलती है. इस उम्र में भी उनके भीतर खुद को दूसरी जगह जमाने और जिंदगी को फिर से गढ़ने की हिम्मत है. वो इसे इतना आसान बना देते हैं कि आपको ये बात बहुत हल्की लग सकती है. एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है.

लेकिन अगर सिर्फ एक निगाह भर डालें तो उनके निर्वासन से जुड़ा बेतुकापन खुलकर सामने आ जाता है. यहां एक ऐसा व्यक्ति है जिसने लगभग एक सदी से भारत के हर पक्ष को बहुत नजदीक से देखा है. 1955 तक वह एक स्थापित कलाकार हो चुके थे और पद्मश्री से सम्मानित भी. 1971 तक उन्हें साओ पाओलो में पाब्लो पिकासो के साथ आमंत्रित किया जाने लगा था. 1986 में वह राज्यसभा सांसद भी बने. और ये सब महज ऊपर-ऊपर की बातें हैं—अगर ये सोचा जाए कि उन्होंने भारत के हर छोटे-बड़े रंग को 10,000 से ज्यादा चित्रों में उकेरा है तो ये बेतुकापन बिल्कुल नग्न हो जाता है.

एम एफ हुसैन एक चलता-फिरता इतिहास है. एक राष्ट्रीय धरोहर. और हमने उन्हें क्या दिया? देशनिकाला.

दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा. डॉ. सिंह निहायत ही गर्ममिजाज आदमी हैं. बात शुरू करते ही वो फट पड़े, "मैं आप जैसे लोगों को अच्छी तरह जानता हूं. आप मुझसे सवाल क्यों पूछ रही हैं? आप लोग हमेशा हमें लतियाने की फिराक में रहते हैं." मैंने कहा, "आप किस 'हम' की बात कर रहे हैं डॉ. सिंह? मैं भी एक हिंदू हूं. ठीक है आप हुसैन से सहमति नहीं रखते हैं, लेकिन आप एक पढ़े-लिखे आदमी हैं इसलिए मैं सिर्फ इतना पूछना चाहती हूं क्या आप लोग ऑफिसों में तोड़फोड़, कला दीर्घाओं में आगजनी रोक नहीं सकते हैं. क्या आप तांत्रिक कला की परंपरा के बारे में नहीं जानते और कृष्ण राधा, शिव पार्वती के कामुक प्रेम चित्रण को बताने की जरूरत नहीं है..." आप मुझे पढ़ा लिखा आदमी कह रही हैं? आप लोग हमेशा हमें गालियां देते हैं.. मुझसे सवाल पूछने वाली आप होती कौन हैं? मैं आपसे तंत्र या फिर किसी चीज़ के बारे में बात नहीं करूंगा. आप लोग हमारे साथ सम्मान के साथ क्यों नहीं रहते? आप जैसे लोग इस देश में सिर्फ एक फीसदी हैं, हम आपके साथ भी वही करेंगे...”

डॉ. सिंह की याचिका हुसैन के खिलाफ उन सात याचिकाओं में शामिल है जिनकी जानकारी हुसैन के वकील अखिल सिब्बल को है. सबको एक में ही दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समाहित कर दिया गया है. सिब्बल ने बताया, "इसके अलावा अब मेरी जानकारी में उनके खिलाफ कोई और अदालती कार्रवाई नहीं चल रही है. लेकिन अक्सर हमें इसके बारे में जानकारी मीडिया के जरिए ही मिलती है."

हुसैन ने 2006 में उस वक्त हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया था जब दक्षिणपंथियों के हमलावर रुख के बाद हरिद्वार की कोर्ट ने उनके खिलाफ ग़ैर ज़मानती वारंट जारी कर दिया था और इसमें भारत के भीतर उनकी सभी संपत्तियों की कुर्की का निर्देश भी था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी लेकिन बीते साल में ही हुसैन की पेंटिंग्स का कई हिंसक विरोधों से सामना हो चुका है. 2006 में लंदन के एशिया हाउस में आयोजित एक प्रदर्शनी में एक कट्टरपंथी हिंदू गुट ने जमकर तोड़फोड़ मचाई. यही कहानी अमेरिका के पीबॉडी एसेक्स संग्रहालय में लगी उनकी महाभारत श्रृंखला की पेंटिग्स के साथ भी दोहराई गई. ऐसा ही कुछ पिछले साल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में देखने को मिला जब केरल सरकार को दबाव में राजा रवि वर्मा पुरस्कार स्थगित करना पड़ा. मई 2007 में एबीएन एमरो बैंक को भी दबाव में अपने प्लेटिनम क्रेडिट कार्ड से हुसैन की कृति हटानी पड़ी. एक डरावने और बेतुके घटनाक्रम में लखनऊ में एक स्वघोषित हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड ने हुसैन का सिर लाने वाले को 51 करोड़ रूपये, आंखों के लिए 11 लाख और हाथ के बदले एक किलो सोना इनाम में देने की घोषणा की. एनडीटीवी के ऑफिस पर हमला इसी श्रंखला की ताज़ा कड़ी है. दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा.

अगर डॉ. राम प्रताप सिंह की जबान में ही बोला जाए तो ऐसे लोग भारत की आबादी का दशमलव कुछ फीसदी हिस्सा भी नहीं है. और भावनाओं का अनियंत्रित उफान भी नहीं है. उदाहरण के तौर पर गुजरात मामले को ही लें. बेरोजगार, कुंठित और बजरंग दल द्वारा दुत्कार दिया गया अशोक शर्मा किसी भी तरह से नाम कमाना चाहता था. अहमदाबाद के संयुक्त पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा भी इसका समर्थन करते हुए उसे ‘आवारा’ बताते हैं. इंटरनेट पर भी ये अभियान सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है लेकिन इसके बाद भी इस तरह की खुराफातों में हिस्सा लेने वाले लोग गिनती के ही हैं. तरस खाने वाली बात ये है कि ये गिने चुने, असहिष्णु, किसी तरह की बात में विश्वास न रखने वाले और क़ानूनों की बेशर्मी से धज्जी उड़ाने वाले लोग ही हमारे सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने लगे हैं. और इन मामलों में कोई भी गिरफ्तारी नहीं होती जबकि सिब्बल बताते हैं कि राज्य, कोर्ट और पुलिस के पास सिर्फ शक्तियां ही नहीं है बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी बनती है कि उनकी जानकारी में क़ानूनों का उल्लंघन करने की बात आए तो तो खुद-ब-खुद हस्तक्षेप करें. इस मसले पर हमने बीजेपी के अरुण जेटली से राय जानने की कोशिश की मगर उनका कहना था कि मीडिया से बात करना बंद कर रखा है. कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी से पूछिए आपको रटी रटाई लाइन सुनने को मिलेगी, “हुसैन के महत्व पर किसी को शक नहीं है, लेकिन भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सबको विरोध और असहमति जताने का हक़ है. उनका शोषण नहीं होना चाहिए आदि...“ जहां तक सड़क पर जो हिंसा होती है उसका क्या? “अगर कोई ग़लत काम करते पकड़ा जाता है तो निश्चित रूप से उसे गिरफ्तार करना चाहिए लेकिन क़ानून व्यवस्था का मसला राज्य सरकार के जिम्मे है”

अपनी तरह का विशिष्ट और हाईप्रोफाइल मामला होने की वजह से हुसैन का निर्वासन देश के सामने भी चुनौती बन गया है. तस्लीमा नसरीन, सलमान रश्दी, तैयब मेहता, अकबर पद्मसी, मृदुला गर्ग, हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, दीपा मेहता... हिंदू और मुस्लिम असहिष्णु गुटों द्वारा सताए गए लोगों की गिनती करते करते उंगलियों में दर्द होने लगता है. कलाकारों के ऊपर बातचीत के जरिए नहीं बल्कि मारपीट के जरिए प्रतिबंध थोपा गया. खुद तहलका भी प्रतिष्ठित छायाकार रघु राय की एक नग्न महिला की फोटो प्रकाशित करने के आरोप में मुंबई में इसी तरह के एक मामले का सामना कर रही है. हर बार जब सुनवाई होती है प्रधान संपादक को कोर्ट में हाज़िर होकर फिर से ज़मानत करवानी पड़ती है.

इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए? एम एफ हुसैन 2006 में तब प्रमुखता से ख़बरो में आ गए जब उनकी एक बिना नाम वाली पेंटिंग जिसमें एक नग्न युवती के रूप में देश का चित्रण किया गया था, का प्रदर्शन शैरोन एपारोस सैफ्रोनॉर्ट द्वारा किया गया. एक निष्पक्ष आदमी के लिए ये प्रेरक और सुंदर काम था. कुछ हिंदू गुटों ने इस पर हल्ला मचाना शुरू कर दिया. हुसैन को केरल अवार्ड दिए जाने का विरोध करने वाले रवि वर्मा बताते हैं, "हुसैन ने ये काम देश के 80 करोड़ हिंदुओं और इसके अलावा विदेशों में बसने वाले लाखों हिंदुओं की भावनाओं को जानबूझ कर चोट पहुंचाने की नीयत से किया है." ये पूछना ही बेकार है कि इतनी बड़ी संख्या की भावनाओं के बारे में वो कैसे दावा कर सकते हैं. सिब्बल के शब्दों में, "भारत माता पर किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं है और क़ानूनों के मुताबिक खुद वर्मा के आरोप सांप्रदायिक और विभाजनवादी हैं."

इसके अलावा हुसैन द्वारा 1988 में बनायी गई सरस्वती पेंटिंग पर रूढ़िवादियों ने भौहें तरेरी थी. इसे निजी रूप से ही खरीदा गया था और इसका प्रकाशन भी टाटा स्टील द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के सीमित संस्करणों में ही हुआ था. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जिस हद तक उत्तेजना का पुट होता है इस पेंटिंग में उसका एक चौथाई भी नहीं है. लेकिन अगर आप इस बात को कुछ देर के लिए छोड़ भी दें तो भी अश्लीलता पर जब हम बहस करते हैं तो एक अहम सवाल उठता है कि ये किस सीमा तक सार्वजनिक है? हुसैन का मामला हो, या किसी कलाकार का इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए?
, वो अपना काम आपके ऊपर थोपते नहीं हैं, वो अपने काम का प्रचार बड़ी बड़ी होर्डिंग्स के सहारे नहीं करते जिनसे आपका सामना हर दिन होता है और आपके पास और भी विकल्प होते हैं. छोटी सी बात है, अगर आपको उनका काम पसंद नहीं है तो उसे मत देखिए. गैलरी में मत जाइए, किताबें मत खरीदिए. किसी समान विचारधारा वाले मीडिया में इसके खिलाफ अपने लेख प्रकाशित कीजिए. ये विरोध का एक सभ्य तरीका हो सकता है.

एक कलाकार या लेखक की तमाम जिम्मेदारियों में एक काम ये भी है कि वो समाज के विचारों की सीमा को आगे बढ़ाए. अगर उन्हें इस तरह से दबाया जाएगा तो फिर सारी कलाधर्मिता रुक जाएगी. खुशी की बात ये है कि बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने बारीकी से आम ज़िंदगी में अश्लीलता का निर्धारण करने की कोशिश की है. रंजीत डी उदेशी बनाम महाराष्ट्र सरकार(1965), अजय गोस्वामी बनाम भारत सरकार(2005), समरेश बोस बनाम अमल मित्रा(1985) जैसे तमाम मामलों में अदालत ने ये राय दी है कि कला में सेक्स और नग्नता को अश्लीलता के दायरे में नहीं रखा जा सकता, न ही भद्देपन की समानता अश्लीलता से की जा सकती है. सिर्फ उन स्थितियों को, जिनमें जानबूझकर किसी का चरित्र बिगाड़ने या फिर भ्रष्ट करने की कोशिश की गई हो या कामुकता को भड़काने और दर्शक की यौन भावनाओं को उघाड़ने की कोशिश हो, ही अश्लीलता के दायरे में रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता की सीमा निर्धारित करने में वो अतिसंवेदनशील व्यक्तियों की सोच को इस्तेमाल नहीं कर सकता.

इसके पीछे का आशय काफी मायने रखता है. इन उदाहरणों के आगे हुसैन के खिलाफ मामले कहीं खड़े नहीं हो सकते. 10,000 कैनवास के जखीरे में बमुश्किल तीन पेंटिंग विवाद में हैं. क्या उनका मकसद अपमान करने का है? बजाय इसके उनका संपूर्ण काम ही उनके समर्पण को दर्शाता है. कला इतिहासकार अल्का पाण्डेय कहती हैं, "हुसैन असली मास्टर है. चित्र उकेरने की उनकी विशिष्ट कला, उनका बड़े पैमाने पर किया गया काम, खुद ही सीखने का गुण--ये सब अतुलनीय हैं. जहां तक कामुकता का सवाल है तो ये हमेशा से हमारे दर्शन और सौंदर्यप्रधान संस्कृति का हिस्सा रहे हैं. हुसैन इसी मिट्टी में सांस लेकर बड़े हुए हैं. उनकी कला भी इसी का नमूना है. उनका विरोध लज्जाजनक है.” ऐसा समर्थन उन्हें खूब मिलता है लेकिन इसका तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि कोई उनकी लड़ाई को लड़ने के लिए आगे नहीं आता. हुसैन खुद कुछ नहीं कहेंगे. वो एक उक्ति पर जीते हैं, “न कोई सफाई, न कोई बुराई”

25 जनवरी 2008

संविधान में मौलिक अधिकारों की प्रासंगिकता-


संविधान को लागू हुये 58 वर्ष बीत चुके है तब से तीन थके हुये रंगों को एक पहिया ढो रहा है। हर वर्ष 26 जनवरी को परेडों और जुलुसों के बीच राष्ट्र की संमप्रभुता और संविधान में प्रदत्त नागरिक अधिकारों का गुणगाण किया जाता है। पर इतने वर्षो बाद आम जन को ये अधिकार कितने मिल पायें है इसके विष्लेषण की जरूरत हैं। 1789 में मानवाधिकारों या मौलिक अधिकारों कों अपने नागरिकों के लिए सुनििष्चत करने वाला पहला राज्य फ्रांस था। भारतीय संविधान में नागरिकों के 7 मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12 से 35 तक वणीZत किये गये है। परंतु 1975 के 44 वे संषोधन में संपत्ति का अधिकार समाप्त होने के बाद 6 अधिकार ही बचे। और इन अधिकारों क® लेकर 13 के खंड 2 मेें इस बात का वर्णन किया गया है कि राज्य कोइ भी ऐसा कानून नहीं बनायेगा जो इन अधिकारों को छीनती है या कम करती है और बनायी गयी प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक षून्य होंगी। भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को जो अधिकार प्रदत्त किये गये उनकी कुछ सीमायें थी, सीमायें ही नहीं वरन उनमें इस तरह की व्यवस्था रखी गयी कि राज्य का कोई हस्तक्षेप न होते हुये भी राज्य की इच्छा के अनुरूप ही यह अधिकार मिल सके और नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन होता रहा।

समानता का अधिकार
अनुच्छेद 14 से 18 में नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। जिनमें कई तरह की समानता नागरिकों को देने की बात कहीं गयी है। इनमे कानूनों के समक्ष समानता, अवसर की समानता, सामाजिक समानता, अस्पृष्यता का निषेध, उपाधियों का निषेध आदि षामिल है। पर गौर करने की बात यह है कि संविधान में वणिZत दिखावे की यह समानता है। आज भी समाज में वर्चस्ववादी वर्ग के लोगों का ही बोलबाला है। समाज में अवसर लाभ उसी को मिलता है जिसका समाज में वर्चस्व है। व्यवस्था में षिर्षस्थ स्थान पर वही लोग बैठे है जो पीढी दर पीढी से सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल रखे हुयें है। ऐसी स्थिती में आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी सामाजिक परिस्थितीयों ने दमित व षोषित वर्ग को वंचित ही बनाके रखा है। थोडे बहुत परिवर्तन यदि आये भी तो उन्ही के पास जिन्होने इस वर्चस्ववादी जन से समझौता किया है। पर वे परिवर्तन कहीं से भी अस्पृष्यता निषेध या जातिविहीन समाज बनाने में मददगार साबित नही लगते।

स्वतंत्रता का अधिकार
मूल संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को जो स्वतंत्रतायें प्रदान की गयी। जिनमें विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण संमेलन, संघ तथा समुदाय बनाना, देष में कही भी भ्रमण, देष के किसी भी क्षेत्र मे निवास तथा व्यापार व व्यवसाय की स्वतंत्रता है। परंतु नागरिकों को ये स्वतंत्रता प्रदान करने के बाद कुछ प्रतिबंध भी लगाये गये यदि कोई व्यक्ति राज्य की सुरक्षा, विदेषी राज्यों से मैत्रिपुर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, षिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय अवमानना, मानहानि या अपराध या फिर 1963 के 16 वे संषोधन में एक नया प्रतिबंध जोडा गया कि किसी क्षेत्र को भारत से अलग करने की मांग कोई करता है तो उसपर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इन प्रतिबंधों के बाद अब ऐसा कुछ भी व्यक्त करने को नहीं बचता जिसके लिए आप स्वतंत्र है, और जो बचता है वह है राज्य की इच्छा की अनुरूप अभिव्यक्ति या राज्य की पक्षधरता अन्यथा इनकी व्याख्या करके राज्य किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है यदि वह उसके उनुरूप न हो। अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण सम्मेलनों की व्याख्या राज्य किन रूपों में करेंगी। इसका कोई आधार नहीं है। लाठी या डंडे को अस्त्र माना जा सकता है। परंतु एके 47 लेकर रैलियों में सामूहिक प्रदषZन और गोलीबारी करने पर कोई प्रतिबंध नही लगता जैसा की पिछले दिनों उत्तर प्रदेष मेें मायावती सरकार की जीत के जष्न में उनके एक विधायक ने किया था।

शोषण के विरूद्ध अधिकार
अनुच्छेद 23-24 में वणिZत ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा को सुनिष्चत करने के लिए बनायें गये हैं जिसके पीछे कारण यह था कि भारत में बेगार लेने या मजदूरों को गुलाम बनाने की प्रथा थी। परंतु जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने के लिए रोटी, कपडा और प्रश्रय के अभाव में एक बडी जनसंख्या जी रही है। जो पहले दास के रूप में गुलाम बनकर अपना जिवन यापन करती थी। आज उसका स्वरूप थोडा बदल गया है। औद्योगिकरण के बाद उन दास का केंद्रीकरण हुआ है और वे किसी कंपनी में पूंजी घराने के दास बने हुये हैं और अपने श्रम को सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर हैं। जिसका मुनाफा उस निजी पूंजी घराने को जा रहा है। यही नहीं दूर दराज के गांव में आज भी यह व्यवस्था थोडे बहुत परिवर्तनों के साथ मौजूद है और मजदूर के रूप में सामंतों की जमीनों की जोत के बदले एक बडा तबका दास बनने को अभिसप्त है। यह अधिकार संविधान की किताब में लिखे चंद हफोंZ के अलावे कुछ नहीं दिखते।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 25 से 28 तक दिए गये इन अधिकारों में नागरिकों को किसी भी धर्म को अंगीकार करने तथा उसके प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी। जिसमें यह भी बात कही गयी थी कि उस नागरिक को राज्य कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता जो किसी विषेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विषेष रूप से सुनििष्चत किया हो। जिसका परिणाम यह हुआ की एक बडा व्यवसायी व संपन्न वर्ग इसकी आड में पूंजी का केंद्रीकरण करता रहा तथा आम जनता को धार्मिकता से ओतप्रोत करता रहा। जिसका फायदा आगे उठाकर धार्मिक कट्टरपंथियों ने लोगों की धार्मिक संवेदनाओं को सांप्रदायिकता के हद तक पहुचाया। लोगों को अपने धर्म के प्रति कट्टर बनाया और ताकिZक चिंतन और वैज्ञानिक चिंतन की परंपरा को भी कुंद करने का काम किया। कारणवष धर्म और धर्मगं्रथों में वणिZत व्यवस्थायें जो सामंती समाज आधारित थी उनको भी पुष्टी मिली और समाज में वर्णव्यवस्था वा विषमता को बरकरार रखने को बल मिला। सांप्रदायिक दंगों को भी अपरोक्ष रूप से आधार प्रदान किया गया और अल्पसंख्यकों के हितों का अनदेखा होता रहा।

संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकार
अनुच्छेद 29-30 में संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकारों का मूल उद्देष्य था कि अल्पसंख्यकों को इस बात से आष्वस्त करना कि उनके मामले में किसी भी प्रकार का अनावष्यक एवं अनुचित हस्तक्षेप नही किया जायेगा तथा भारतीय संघ किसी भी आधार पर भेदभाव नही करेगा। परंतु देष की सत्ता में विराजमान अधिकांषत: व सत्ता चरित्र के मुताबिक अपनी संस्कृति का निर्माण किया गया जो व्यवस्था को किसी भी रूप में स्थायित्व प्रदान कर सके। विभिन्न पार्टीयों ने वोट की राजनीति के लिए अपने हित के अनुरूप संस्कृति बनायी और उसे पोषित किया। पूंजी के इस युग में लोककला-संस्कृति को तरजीह देने के बजाय साम्राज्यवादी संस्कृति के रूप में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास किया गया। गुजरात में आज यदि अल्पसंख्यक के रूप में रह रहा मुस्लिम इतना भयभीत है कि वह गाडी, दुकान में हिंदू देवों की मुर्तिया लगा रहा है, अपने वेषभूषा को हिंदुओं के मुताबिक ढाल कर चलने को मजबूर है। तो उसके मौलिक अधिकार कहां है और उनकी रक्षा करने वाला कौन?

संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अनुच्छेद 32 से 35 को अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा जिसके अंतर्गत न्यायपालिका- व्यवस्थापिका व कार्यपालिका की ऐसे सभी काननों और कार्याे को असंवैधानिक घोषित कर देगी जो मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप से प्रतिबंधित करते है। किंतु गौरतलब बात यह है कि न्यायपालिका में बैठा हुआ न्यायाधीष वर्तमान लोकतंत्र के फासीवादी चरित्रपर सिर्फ नकाब पहना रहा है। जबकि इन अधिकारों का हनन करने वाले कितने ऐसे कानूनों- पोटा, आस्पा, छत्तीसगढ जनसुरक्षा अधिनियम आदि बनाये गये है। और हाल के कई फैसलों ने यह सिद्ध किया है कि न्यायपालिका-कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के कायोZं पर परदा डाल कर लोकतंत्र या जनता पर न्यायपूर्ण षासन का ढोंग कर रही है।