
उन्हें किशन जी के नाम से ही जाना गया, भारत की माओवादी पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक. उनके जिंदगी का लंबा राजनैतिक सफर रहा, पर सफर के रास्ते शहर से नहीं जंगल ज्यादा गुजरे. छात्र जीवन में ही वे नक्सलवाड़ी की राजनीति में आए और पीपुल्स वार ग्रुप के सदस्य के रूप में वारंगल से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. हत्या के बाद ही उनकी तस्वीरें लोग अखबारों में देख पाए. किशन जी ने तेलगू में कुछ आलेख और कविताएं लिखी हैं. ये कविताएं उनके जीवन के आस-पास घटित हो रहे समय का आख्यान भी हैं. जिनकी पहली किस्त यहां प्रकाशित की जा रही है. तेलगू से अनुवाद आनंद ने किया है.
एक अपील
कॉमरेड!
याद करता हूं वह समय
जब हम साथ-साथ थे
साथ-साथ काम करते हुए
साथ-साथ घूमते हुए
रूखा-सूखा खाते हुए
लोगों के बीच
उनके दुखों के बीच
उनके दुखों को बांटते हुए
एक धरातल पर खड़े हो
हमने साथ-साथ किया था
आंदोलनों का आवाह्न
लड़ाईयों के उतार-चढ़ाव में
हम जनता के बीच
खड़े रहे साथ-साथ
याद है, वह दिन?
जब लड़ाईयां अपने चरम पर हैं
आंदोलन है तेज
तुमने भ्रमित होकर
धैर्य खोकर
चुन लिया एक अलग जीवन
सिर झुकाकर जा मिले
दुश्मनों के साथ
आज नहीं पूछना चाहता
तुम्हारी शपथ के बारे में
नहीं पूछना चाहता
कहां गयी तुम्हारी उम्मीदें?
उम्मीद अब भी है
कि बिताओगे अपना पूरा जीवन
जनता के पक्ष में
खड़े होकर.
लेकिन साथी
लोग पूछंगे तुम्हारे बारे में
कहां हो आज तुम?
मैं भी पूछना चाहता हूं
तुमसे यही?
साथी!
भरसक प्रयास करता हूं
तुम्हें भाई, सर, कॉमरेड- कहते हुए पुकारूं
तुम, उसी जनता के विरुद्ध हुए…..
जहां से तुमने हासिल की यह मुकाम
तुमने बेच दिया पार्टी का मान
गिरवी रख दिए
जनता के गौरव
अब
जबकि खड़े हो
जनता के कातिलों के बगल
जूठन जैसी किसी चीज को
पाने के आशा में
लोग तुम्हें साथी नहीं कह पा रहे
मैं तुम्हें कॉमरेड नहीं कह पा रहा.
फिर भी!
मेरे भाई, कुछ तो सोचो
जूठन की उम्मीदें मत करो-
पार्टी की प्रतिष्ठा को-
आग में मत झोंको
संभव हो तो
आखिर तक, खड़े रहो
जनता के पक्ष में.
(एक कॉमरेड की याद में, जो जनयुद्ध में एक समय तक जनता के साथ रहा. उसके बदलते हुए चरित्र और आचरण पर ये पंक्तियां…..)
वर्तमान ही साक्षी है
गोदावरी….मेरी मां
तेरा पूरा शरीर
घायल है
बंदूकों की गोलियों से
तेरी आंखों के तारे
सब के सब, तेरे लाल
उन्हें धराशायी होते देख
तू तड़प रही है
गोदावरी…… मेरी मां!
वे जो कतारबद्ध हो निकले थे
जुलूसों में
विद्रोही जन समूहों
अंधेरी रातों में….
टिमटिमाते जुगुनुओं के बीच
आसमान का लिहाफ ओढ़
जिन्होंने पत्थरों पर मिटाई अपनी थकावट
चांदनी रातों में…..
वे, शहीद हो रहें हैं
आंखें बंद किए,
चिर निद्रा में सो रहे.
पर
तुम्हारी धार बढ़ रही है
जैसे बढ़ रही हो
कातिलों के अंत को
गोदावरी……मेरी मां!
***
काकसान पर्वतों के मैदानों में
स्टालिन ग्रेड के ऊंचे भवनों के शिखर पर
फासिज्म का अंत करके
नाजी हिटलर को
कोई व्यूह रचना कर
हराना एक दिन
वैसे…….
जैसे सहसा उफान भरती है
प्रशांत प्रवाहित लहरें
डान नदी की……..
आज तुम
प्रवाहित हो रही हो
एक और विप्लव प्लवन के लिए
गोदावरी!........ मेरी मां
-संध्या, विन्ध्या. जुलाई-सितम्बर १९८६.




