24 फ़रवरी 2012

माओवादी नेता किशन जी की कविताएं.

उन्हें किशन जी के नाम से ही जाना गया, भारत की माओवादी पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक. उनके जिंदगी का लंबा राजनैतिक सफर रहा, पर सफर के रास्ते शहर से नहीं जंगल ज्यादा गुजरे. छात्र जीवन में ही वे नक्सलवाड़ी की राजनीति में आए और पीपुल्स वार ग्रुप के सदस्य के रूप में वारंगल से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. हत्या के बाद ही उनकी तस्वीरें लोग अखबारों में देख पाए. किशन जी ने तेलगू में कुछ आलेख और कविताएं लिखी हैं. ये कविताएं उनके जीवन के आस-पास घटित हो रहे समय का आख्यान भी हैं. जिनकी पहली किस्त यहां प्रकाशित की जा रही है. तेलगू से अनुवाद आनंद ने किया है.


एक अपील

कॉमरेड!

याद करता हूं वह समय

जब हम साथ-साथ थे

साथ-साथ काम करते हुए

साथ-साथ घूमते हुए

रूखा-सूखा खाते हुए

लोगों के बीच

उनके दुखों के बीच

उनके दुखों को बांटते हुए

एक धरातल पर खड़े हो

हमने साथ-साथ किया था

आंदोलनों का आवाह्न

लड़ाईयों के उतार-चढ़ाव में

हम जनता के बीच

खड़े रहे साथ-साथ

याद है, वह दिन?

जब लड़ाईयां अपने चरम पर हैं

आंदोलन है तेज

तुमने भ्रमित होकर

धैर्य खोकर

चुन लिया एक अलग जीवन

सिर झुकाकर जा मिले

दुश्मनों के साथ

आज नहीं पूछना चाहता

तुम्हारी शपथ के बारे में

नहीं पूछना चाहता

कहां गयी तुम्हारी उम्मीदें?

उम्मीद अब भी है

कि बिताओगे अपना पूरा जीवन

जनता के पक्ष में

खड़े होकर.

लेकिन साथी

लोग पूछंगे तुम्हारे बारे में

कहां हो आज तुम?

मैं भी पूछना चाहता हूं

तुमसे यही?

साथी!

भरसक प्रयास करता हूं

तुम्हें भाई, सर, कॉमरेड- कहते हुए पुकारूं

तुम, उसी जनता के विरुद्ध हुए…..

जहां से तुमने हासिल की यह मुकाम

तुमने बेच दिया पार्टी का मान

गिरवी रख दिए

जनता के गौरव

अब

जबकि खड़े हो

जनता के कातिलों के बगल

जूठन जैसी किसी चीज को

पाने के आशा में

लोग तुम्हें साथी नहीं कह पा रहे

मैं तुम्हें कॉमरेड नहीं कह पा रहा.

फिर भी!

मेरे भाई, कुछ तो सोचो

जूठन की उम्मीदें मत करो-

पार्टी की प्रतिष्ठा को-

आग में मत झोंको

संभव हो तो

आखिर तक, खड़े रहो

जनता के पक्ष में.

(एक कॉमरेड की याद में, जो जनयुद्ध में एक समय तक जनता के साथ रहा. उसके बदलते हुए चरित्र और आचरण पर ये पंक्तियां…..) अरुणातारा में प्रकाशित १९८३.


वर्तमान ही साक्षी है

गोदावरी….मेरी मां

तेरा पूरा शरीर

घायल है

बंदूकों की गोलियों से

तेरी आंखों के तारे

सब के सब, तेरे लाल

उन्हें धराशायी होते देख

तू तड़प रही है

गोदावरी…… मेरी मां!

वे जो कतारबद्ध हो निकले थे

जुलूसों में

विद्रोही जन समूहों

अंधेरी रातों में….

टिमटिमाते जुगुनुओं के बीच

आसमान का लिहाफ ओढ़

जिन्होंने पत्थरों पर मिटाई अपनी थकावट

चांदनी रातों में…..

वे, शहीद हो रहें हैं

आंखें बंद किए,

चिर निद्रा में सो रहे.

पर

तुम्हारी धार बढ़ रही है

जैसे बढ़ रही हो

कातिलों के अंत को

गोदावरी……मेरी मां!

***

काकसान पर्वतों के मैदानों में

स्टालिन ग्रेड के ऊंचे भवनों के शिखर पर

फासिज्म का अंत करके

नाजी हिटलर को

कोई व्यूह रचना कर

हराना एक दिन

वैसे…….

जैसे सहसा उफान भरती है

प्रशांत प्रवाहित लहरें

डान नदी की……..

आज तुम

प्रवाहित हो रही हो

एक और विप्लव प्लवन के लिए

गोदावरी!........ मेरी मां

-संध्या, विन्ध्या. जुलाई-सितम्बर १९८६.

21 फ़रवरी 2012

आदिवासी समाज अस्तित्व, अस्मिता.

रामशरण जोशी

आज करीब चालीस बरस बाद पीछे छूटे बस्तर केा याद करता हूं तो स्वयं को कई प्रकार की विसंगतियों विरोधाभासों और अंतर्विरोधों से घिरा पाता हूँ सच पीछे मुड कर विगत का पुनरावलोकन करना कभी सुखद भी होता है लेकिन दांतेवाडा जैसे आदिवासी अंचल के सन्दर्भ में दुखद अधिक लगता है. आज मैं सुविधा और विकास के महासागर में सुरक्षित आवासित हूं लेकिन जब दांतेवाडा झारखंड गडचिरौली तेलंगाना जैसे अंचलों में जीवनधर्म के रूप में व्याप्त प्रतिरोध को कुचलने के लिए गोली के आवाज मेरे कानों से टकराती है तब मैं स्वयं को किसी कटघरे में खडा सा महसूस करता हूं. आखिर ऐसा क्यों है कारण यही है न कि विकास और सुविधाओं के जिस पायदान पर मैं हूं वहां दांतेवाडा नकुलनार गीदम बछेली भोपालपट्टनम सुकमा में बसी बेजुबान मानवता वहां तक नहीं पहुंच सकी है. वह आज भी कोख से चिता तक एक ही पायदान पर रुकी हुई है और यह पायदान वंचन उपेक्षा अविश्वास उत्पीडन शोषण अन्याय और कमतर मानव की स्थितियों का एहसास कराता है. यदि ऐसा एहसास नहीं होता तो क्या भारतीय राज्य और आदिवासी भारत के बीच शत्रुता पूर्ण अंतर्विरोध हिंसक रूप में मौजूद रहते क्या तथाकथित लाल गलियारा अस्तित्व में आता यह एक सामाजिक आर्थिक राजनीतिक यथार्थ है. वास्तव में इस यथार्थ ने शिखर से तलहटी तक एक स्तरीयवादी नागरिकता की धारा को हर मोड पर अवरुद्ध किया है. यह धारा बहुश्रेणियों और बहु द्वीपों में विभाजित है इस विभाजन के कारण ही विकास समतावादी व समरूपी नहीं हो सका. पीछे मुडकर देखने पर मैं अपने अनुभवजन्य यथार्थ को कैसे विस्मृत कर सकता हूं बात उठी है विकास की इस संदर्भ में कुछ घटनाओं का यहां उल्लेख प्रासंगिक रहेगा. किस्सा आपातकाल के दौर का है... विकास का नारा शाल वनों के द्वीप में गूंज रहा था गीदम में पौष्टिक आहार का शिविर लगा हुआ था हैदराबाद से पौष्टिक विशेषज्ञ आदिवासी प्रतिभागियों को आमलेट मसाला डोसा उत्तपम जैसे गैर आदिवासी आहार बनाने की प्रक्रिया समझा रहे थे लेकिन इन विशेषज्ञों को ये मालूम नहीं था कि आदिवासी खानपान क्या होता है महुआ कोदा कुटकी सलफी जैसी स्थानीय वस्तुओं से किस प्रकार के पौष्टिक आहार बनाए जा सकते हैं. दूसरा अनुभव- आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में एक भी आदिवासी नायक नायिका या कोई ऐसतिहासिक पात्र नहीं थे जिनके साथ आदिवासी विद्यार्थी स्वयं को जुडा महसूस कर सकें इतना ही नही आदिवासी छात्रावासों में हनुमान चालीसा दुर्गापूजा सरस्वती पूजन जैसी बातें सामान्य दिनचर्या बन गयी थी. कोई भी आदिवासी देवी देवता मौजूद नहीं था. अनुभव तीन- सरकार की विभिन्न आवास योजनाओं के अंतर्गत सीमेंट कंकरीट के मकान बनाए गए जिन्हें आदिवासियों ने बसाहट के लिए कभी स्वीकार नहीं किया. क्योंकि वे आदिवासी समाज की परंपरागत जीवनशैली से नितांत भिन्न थे.

अनुभव चार- सरकारी अधिकारी और कर्मचारी विकास के नाम पर आदिवासियों से मुर्गा धान शद गोंद महुआ बांस ईमारती लकडी आदि वसूली किया करते. जरूरत पडने पर लकडी के साथ-साथ लडकी भी वसूलते. दांतेवाडा के औद्योगीकृत बैलाडीला क्षेत्र में तो यह जीवन का यथार्थ ही बन चुका था.

अनुभव पांच- ऋणग्रस्तता भूमिहीनता पलायन और खुदकुशी दक्षिण बस्तर के जीवन का अविभाज्य हिस्सा रहे हैं विशेषरूप से तब से जब से वे तथाकथित आधुनिक बहुआयामी विकास संस्कृति से संप्रित हुए. वास्तव में आदिवासी विकास को एक स्वतंत्र व स्वायत्त घटना के रूप में देखता नहीं है वह जीवन को सम्पूर्णता के रूप में देखता है जब कोई प्रक्रिया या हस्तक्षेप उसके अस्तित्व व अस्मिता के विपरीत होता है तब वह भयभीत हो उठता है. वह कई प्रकार की आशंकाओं में घिर जाता है और उसकी यही मनोदशा उसके और राज्य के बीच में अविश्वास की जमीन तैयार कर देती है. विगत कई दशकों में सबसे बडा परिवर्तन तो मुझे आज ये दिखाई देता है कि उनमे शुप्त अस्तित्व अस्मिता के भाव अब मुखरित होने लगे हैं. वे विकास को ही नहीं बल्कि भारतीय राज्य की सम्पूर्ण उपस्थिति को एक प्रकार से अपनी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी के परिप्रेक्ष में देखने-समझने की कोशिश करने लगे हैं और इसी प्रक्रिया में वे अपनी जडता से भी अनायास ही मुक्त हो रहे हैं जिससे कि वे ऐसे विकल्पों की खोज कर सकें जो कि परिवर्तित समय में भी उनके सम्पूर्ण ईथास को सुरक्षित व गतिशील बना सके. सारांश यह है कि आज का सबसे बडा विमर्श यह है कि क्या दांतेवाडा की मानवता स्वयं को कमोडिटी बनने दे और किस सीमा तक व किस कीमत पर अपनी इस नई पहचान को स्वीकार करे

भारत में विगत दो दशकों मंे जल जंगल और ज़मीन इन तीनों की भूख बेतहासा बढ़ी है। एक प्रकार से भूख का विस्फोट हुआ है। इस विस्फोट में देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की भूमिका क्या रही है यह आज मुख्य रूप से विचारणीय प्रश्न है। जाहिर है किसी भी देश की राजसत्ता ही राजनीतिक अर्थव्यवस्था ;च्वसपजपबंस म्बवदवउलद्ध का रूप व दिशा निर्धारण करती है। यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा है। भारतीय राज्य ने अपने चरित्र के अनुसार राजनीतिक अर्थव्यवस्था का निर्माण किया दिशा निर्धारण और अन्ततः इसका क्रियान्वयन किया। यह सिलसिला औपनिवेशिक भारत से लेकर स्वतंत्र भारत तक निर्बाध रूप से चलता आ रहा है। अलबत्ता आवश्यकतानुसार इसके आकार-प्रकार और क्रियान्वयन-नीतियां बदलते रहे हैं। इसमें नये-नये आयाम जुड़ते रहे हैं; औपनिवेशिक शासकों की लूट-नीतियों से भूख जन्मी थी आज राष्ट्र-विकास की नीतियों ने भूख- विस्फोट किया है। निःसंदेह इस विस्फोट ने भारतीय राज्य और विकास रणनीतिकारों के समक्ष गंभीर चुनौती प्रस्तुत की है। इस चुनौती को विकास-संकट कहना भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा क्योंकि जल जंगल और ज़मीन को लेकर नागरिक तथा राज्य आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। देश के सुदूर भीतरी आदिवासी अंचलों और कतिपय ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों में टकराव स्थितियां बनी हुई हैं। राजसत्ता के साथ सीमांत लोगों की मुठभेड़ेें भी जारी हैं और शांतिपूर्ण आंदोलन भी चल रहे हैं। आखि़र इस तनाव संघर्ष भूख के कारण क्या हैं क्यों पीड़ित व सीमांत नागरिक राज्य को शत्रु के रूप में देखने लगे हैं क्यों इन अंचलों में राज्य-बल (सेना- अर्द्ध सैन्य बल पुलिस आदि) का जाल फैलता रहा है क्यों भूख की तृप्ति और संघर्षों-आंदोलनों के दमन के मामले में भारतीय राजसत्ता का जन-विरोधी चरित्र उजागर हो रहा है ये ऐसे सवाल हैं जिनसे पलायन संभव नहीं है बल्कि इनके कारणों की पड़ताल अपरिहार्य बनती जा रही है।

बूंदी, राजस्थान में पढ़े गए एक पत्र का अंश.

12 फ़रवरी 2012

एसपी अंकित गर्ग ने मुझे नंगा किया..मेरे गुप्तांग में पत्थर भरे।


नक्सली बताकर गिरफ़्तार की गई सोनी सोरी
के मामले में भाजपा और कांग्रेस एक है।

प सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि
(1) मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।
(2) जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।
(3) पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंडइस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।
[ आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं। ]
(4) संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए
मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।
ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा हैऔर लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?
हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।
जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।
नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?
छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी
(मोहल्ला लाइव से कट पेस्ट)

09 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी को उत्पीडित करने वाले पुलिस को राष्ट्रपति द्वारा वीरता सम्मान देने के विरोध में नागरिक अपील


महामहिम राष्ट्रपति जी,

''अमर रहे गणतंत्र हमारा ''

दुःखभरे ह्रदय से आप को यह पत्र लिखते हुए हमें ध्यान है कि देश और दुनिया के अनेक चिंतित नागरिक समूहों, स्त्री अधिकार संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने दंतेवाडा के पुलिस सुपरिटेन्डेंट अंकित गर्ग को वीरता पदक दिए जाने के फैसले से जुडी हुयी चिंताओं की ओर आप का ध्यान आकर्षित किया है . हमें यकीन है कि आप इन चिंताओं पर गहराई से विचार करने की प्रक्रिया में हैं . हमें विश्वास है कि इस प्रसंग में आप के द्वारा लिया गया निर्णय राष्ट्र के गौरव , नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और उन की मानवीय गरिमा को मज़बूत बनाने वाला सिद्ध होगा.

इस प्रसंग में राष्ट्र के जिम्मेदार और सरोकार -सजग नागरिकों के बतौर हम खास तौर पर जिन विन्दुओं को आप के ध्यान में लाना चाहते हैं , वे इस प्रकार हैं -

१- आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी ने सर्वोच्च न्यायालय को लिखे अनेक पत्रों में यह बात दुहराई है कि दंतेवाडा पुलिस स्टेशन में ०८ अक्टूबर २०११ को अंकित गर्ग की उपस्थिति में उन की आज्ञा से उन्हे शारीरिक यातनाये दी गयीं .इन यातनाओं में अमानवीय यौन हिंसा भी शामिल थी. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर कलकता के एन आर एस सरकारी अस्पताल द्वारा की गयी मेडिकल जांच में इन आरोंपों को सही पाया गया है . अस्पताल द्वारा जारी जांच- रपट में पीडिता के गोपन अंगों में पत्थर के टुकड़ों की मौजूदगी को दर्ज किया गया है . इस रपट का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पीडिता को दंतेवाडा पुलिस की अभिरक्षा में सुरक्षित न मान कर उन्हे रायपुर केन्द्रीय कारागार में स्थानांतरित करने के आदेश जारी किये हैं . इस से स्पस्ट है कि आरोपित किन्तु पुरस्कृत एस पी के खिलाफ मानवाधिकारों , संवैधानिक दायित्वों , राष्ट्रीय गरिमा और सरकारी सेवा नियमों के गंभीर उल्लंघन का मामला ठोस प्रमाणों पर आधारित है .इस प्रसंग में यह तथ्य भी आप के ध्यान में होगा कि मीडिया द्वारा एक स्थानीय पुलिस अधिकारी का वह टेप भी जारी किया गया है , जिस में उस ने स्वीकार किया है कि शिक्षिका के खिलाफ सक्रिय माओवादी कार्यकर्ता होने के आरोप निराधार और मनगढंत हैं . शिक्षिका और उस का परिवार अतीत में स्वयं माओवादी हिंसा का शिकार रहा है.लेकिन इस सिलसिले में सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी महिला के साथ किसी भी परिस्थिति में इस तरह का दुर्व्यवहार हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों का घनघोर अवमूल्यन है.

२- ऐसी परिस्थिति में आरोपित पुलिस सुपरिटेन्डेंट को राजकीय सम्मान देने का निर्णय राष्ट्र की गरिमा और सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत हानिकारक है , क्योंकि इस घटना के निहितार्थीं को निम्नलिखित रूपों में पढ़ा जा सकता है --

क) भारतीय राज्य एक आदिवासी नागरिक की मानवीय गरिमा , उस के संवैधानिक अधिकारों और न्याय की उस की आकांक्षा के अवमूल्यन को वह महत्व देने के लिए राजी नहीं है , जिस की अपेक्षा किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य से की जाती है . यह एक ऐसा अवांछित सन्देश है , जो भारतीय राज्य - राष्ट्र और उस के वंचित नागरिकों के बीच एक शत्रुतापूर्ण रिश्ते का संकेत देता है.
ख) भारतीय राज्य राजकीय निकायों से सम्बंधित दमन , उत्पीडन , असंविधानिक आचरण और भ्रष्ट व्यवहार के आरोपों पर आवश्यक गंभीरता के साथ ध्यान देने के लिए राजी नहीं है .
ग )भारतीय राज्य सरकारी अफसरों द्वारा एक स्त्री के स्त्रीत्व को क्रूरतापूर्वक अपमानित करने के खालिस पितृसत्ताक आचरण के विषय में सम्यक रूप से चिंतित नहीं है .
घ) इस देश के श्रेष्ठतम सांस्कृतिक मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक मान्यताओं की हिफाजत की अपनी जिम्मेदारी के प्रति भारतीय राज्य की गंभीरता संदेह के परे नहीं है.

३- ऐसी स्थिति हमें जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश हाउस आव लॉर्ड्स द्वारा जनरल डायर को सम्मानित करने की उस घटना की याद दिलाती है , जिस की स्मृति भारतीय जन साधारण के लिए उस ह्त्या कांड से भी कहीं अधिक दुखदायी रही है . उसे एक औपनिवेशि सत्ता द्वारा एक जीवित राष्ट्र की आत्मिक ह्त्या के रूप में देखा गया , जिस का उद्देश्य निकृष्टतम नस्ली वर्चस्व को स्थापित करना था. राष्ट्रीय अपमान की इसे चेतना ने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को वह क्रांतिकारी आवेग प्रदान किया , जिस ने हमें आज़ादी की मंजिल तक पहुंचाया. आज़ाद भारत में एक स्त्री नागरिकके अपमान और यौन उत्पीडन के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे पुलिस अफसर को व्यापक जनविरोध के बावजूद राजकीय सम्मान देना हमारी आज़ादी और हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति -दोनों के विषय में गंभीर चिंताएं और बेचैनियाँ उत्पन्न करता है.
अतएव हमारी प्रार्थना है कि आप एस पी अंकित गर्ग को वीरता पदक प्रदान करेने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए इसे निरस्त करने की कृपा करें .
(आशुतोष कुमार की फेसबुक वाल से)

06 फ़रवरी 2012

“कुकी’ के तख्ते पर सभ्यता का इतिहास

चन्द्रिका.

इतिहास से हमे कुछ सीखना हो तो ’कुकी’ बन जाना चाहिए. पिछले 20 सालों में ओम प्रकाश शर्मा नाम तो उनके पड़ोसी भी भूल चुके हैं और अब उन्हें कुकी के ही नाम से जानते हैं. जिन्होंने एक सभ्यता के इतिहास को अपने आस-पास की पहाड़ियों और जंगलों में खोजा और यह जाना कि इतिहास की ओर लौटना धर्म और जातियों के विलुप्त हो जाने या विलुप्त कर देने की कार्यवाही जैसा है. वे मानते हैं कि पुरातत्वों की खोज में ही कहीं वह मानवता छुपी थी जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. उन्होंने अपने भगवा कपड़ों को उतार दिया और ज़ेहन से धर्म भी धीरे-धीरे तिरोहित होता गया. जो बची वह आदिम इतिहास खोजने की ललक थी.

उनके पिता शिवनाथ भारत पाकिस्तान बंटवारे के समय पंजाब से भागकर राजस्थान के बूंदी जिले में आ बसे थे. 1955 में जब कुकी पैदा हुए तो घर में विस्थापन की गरीबी बरकरार थी. जब घर में गरीबी हो तो बच्चों का स्कूल जाना रस्म अदायगी जैसा ही होता है और कुकी आठवीं तक ही पढ़ पाए. उनके घर का जो दरवाजा गली की तरफ खुलता था वही उनके रोजगार का भी दरवाजा बन गया. कम उम्र में यह एक गरम काम था चाय बनाने से लेकर मिठाईयां बनाने तक का. कुकी ने अपनी पढ़ाइ की उम्र में चाय, मिठाइयां और हल्दी, मिर्च बेंची. जब फुर्शत मिलती या फिर पिता की नजरों से कन्नी काटकर वे घूमने निकल जाते. आसपास की पहाड़ियों और झाड़ियों में घूमते हुए पहली बार उन्हें वे दो गोल चीजें मिली थी जिसने उनकी जिंदगी को उल्टा घुमा दिया. ये पुराने सिक्के थे जिसे इतिहास में जाने कौन छोड़ गया था और वर्तमान में जाने क्यों छठी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे ने उठा लिया था. घर पर जब पिता ने इन सिक्कों को देखा तो वे खुश हुए. अपने बच्चे के किए हुए पर पिताओं की खुशियां ही उसके उत्साह का सर्टिफिकेट बन जाती हैं. अब कुकी अक्सर पहाड़ों में जाते और वहां पुराने सिक्के खोजा करते. शदियोँ पुराने सिक्कों को वे वर्षों तक इकट्ठा करते रहे, सिक्कों की संख्या बढ़ने के साथ उनका शौक भी बढ़ता रहा. अपनी रोजगार और कमाई को छोड़कर पहाड़ों पत्थरों में उनका इस तरह घूमना मुहल्ले वालों को बेवजह लगना लाजमी था कि आदमी बगैर पैसे और स्वार्थ के भला ऐसे क्योंकर घूमता है, पर खोज हमेशा स्वार्थ और पूजी से इतर भी होती रही है.. उन्हें एक कमसिन पागल मान लिया गया. उनके पड़ोसी सुभाष शर्मा पहाड़ों में पन्ना पत्थर ढूढ़ा करते और जयपुर शहर लाकर महंगी कीमतों में बेचा करते. पर कूकी को कभी कोई पन्ना पत्थर न मिला उन्हें जो पत्थर मिले उसकी कीमत आदमी बनने के प्रक्रिया के कीमत जैसी कुछ हो सकती थी पर हर चीज को कीमतों में नहीं आंका जा सकता.

अपनी शादी के वर्षों बाद जब 1988 में कुकी दिल्ली गए तब तक उनके पास 250 से ज्यादा सिक्के इकट्ठा हो गए थे, नेशनल म्यूजियम में उन्होंने सिक्के का परीक्षण करवाया तो वे 400 ई.पू. मौर्य काल तक सिक्के थे. कुकी ने पहली बार कोई संग्रहालय देखा और देर तक वे उसे निहारते रहे थे आठवीं के बाद वे फिर से पढ़ रहे थे. संग्रहालय के पत्थर, सिक्के, धातुएं और उनकी संरचनाएं उन्हें पढ़ा रही थी. संग्रहालय में रखी वस्तुओं जैसी कितनी चीजों को कुकी पहाड़ों पर घूमते हुए पीछे छोड़ आए थे. उन्हें आदि जीवन की अन्य चीजों के बारे में भी पता चला. उनकी निगाहों में पूरी की पूरी एक पुरानी सभ्यता ही बस गयी. बाद के दिनोँ में जब वे पहाड़ों में घूमते तो सिक्के ही नहीं खोजते वे ऐसी सभी चीजों को खोजते जिनकी तस्वीर वे संग्रहालय से अपनी आंखों में लेकर लौटे थे. कुछ ही वर्षों में अपने छोटे से घर में उन्होंने पूरा एक संग्रहालय बना लिया. लकड़ी के एक पुराने जर्जर तख्ते पर पुरानी सभ्यताओँ के अवशेष को उन्होंने कपड़े से ढक कर रख छोड़ा, जिसमे लाखोँ बरस पुरानी पत्थर की कुल्हाड़ियां हैं, गुलेग जैसी चीजों के लिए प्रयोग की जाने वाले हल्के पत्थर हैं और कुछ सौ साल पहले बंदूकों में प्रयोग की जाने वाली लेड की छोटी और भारी गोलियां हैं. दस लाख वर्ष पुराने मानवीय अवशेषों से लेकर कुछ सौ वर्ष पुराने अवशेषों का यह संग्रहालय हर आगंतुक के लिए खुला रहता है बगैर किसी टिकट के और साथ में उनके घर की चाय भी.

1995 के बाद कुकी ने आदिम मानवों द्वारा पत्थरोँ पर बनाए गए भित्तिचित्रों को खोजना शुरु किया. अभी तक देश में सबसे ज्यादा 81 भित्तिचित्र स्थान कुकी के द्वारा खोजे जा चुके हैं. उन्होने उन पत्थरों को भी खोजा जिनकी सहायता से आदिम मानव रंग तैयार करते थे उस जर्जर तख्ते के समृद्ध संग्रहालय से वे अचानक एक पत्थर उठाते हैं और थोड़ा सा पानी डालकर अपने आंगन की फर्स पर धिसते हैं और वह रंग तैयार हो जाता है जो हजारों साल पहले चित्र बनाने के लिए आदिम मानव तैयार करता था. हम अपने जीवन में जाने ऐसी कितने ही ज्ञान को दुहराते हैं जो हमने आदिम सभ्यता में सीखा था कि आग जलाने के ज्ञान को ज्ञान की परिभाषा से ही अस्वीकृत कर दिया गया.

भीलवाड़ा जिले में डूंगरीनाला नदी के किनारे उनके द्वारा अब तक की सबसे लंबी 35 किमी. की भित्तिचित्र श्रृंखला खोजी जा चुकी है. कुकी ने विदेशी पुरात्त्ववेत्ताओं से इन चित्रों की व्याख्याएं सीखी जो उन इलाकों में कभी किसी खोज के सिलसिले में आया जाया करते थे. कुकी मानते हैं कि ये भित्तिचित्र मानव की प्रथम पाठशाला हैं जहां आदिम लोग अपने बच्चों को चित्रों की सहायता से शिकार करने व जीवन जीने की शिक्षा दिया करते थे. उन्होने कई ऐसे स्थानों को ढूढ़ निकाला जहाँ आदिवासी अपने औजार बनाया करते थे. अब उनके पास छठी ई.पू. से लेकर मुगल काल तक के 1200 से अधिक सिक्के हैं और आदिम समाज के जीवन से जुड़ी ऐसी अनगिनत वस्तुएं जिनकी कभी उन्होने शायद गिनती ही नहीं की, बस उन्हें इकट्ठा करते रहे. इतिहासकारों की सूची में बूंदी जैसी छोटी जगह में रहने वाले कुकी एक ऐसा ही सिक्का हैं जिसे न खोजा गया न पाया गया. जो अपनी युगीन जरूरतों को पूरी कर पड़ा हुआ है घिरी पहाड़ियों के बीच एक बेहद मामूली से घर में बगैर किसी लोभ के. हमारी सभ्यता का एक डर है जो सहज और मामूली लोगों की खोजों से हर वक्त डरता रहता है कि खोज हमेशा सत्ताएं ही करेंगी कि नामावर कोई नामवर ही बनेगा.

03 फ़रवरी 2012

हमे विरासत में उम्मीद भी मिली है-

१ फरवरी को दुनिया की श्रेष्ठतम कवित्री विस्साव शिंबोर्स्का नहीं रही. वह संवेदना का एक व्योम तैयार करती थी, दुनिया के भूगोल की व्यथाएं उनके काव्य शब्दों में मौजूद है और रहेगी. उनका जाना……. मेरे पास शब्द कम हैं दुनियां के दरवाजों पर और रास्तों पर फुसफुसाए गए तमाम वाक्यों के साथ उन्हें याद कर रहा हूं, बस. और उनकी ये पंक्तियां आपके साथ पढ़ रहा हूं जो संवाद प्रकाशन से साभार है.

1-

मेरा यकीन है इंकार करने की ताकत में

मेरा यकीन है कामयाबी का रास्ता छोड़ने वालों में,

मेरा यकीन है बरसों की बर्बाद मेहनत में,

मेरा यकीन है उस राज में

जो उसके साथ कब्र में चला जाएगा

मेरे लिए इतिहास की तमाम रूढ़ियों और नियमों से बड़े हैं ये शब्द

इन्हें किसी दलील, किसी मिसाल की जरूरत नहीं

मेरा यकीन मजबूत अंधा और बेबुनियाद है.


2-

मेरे लिए दुखांत नाटक का सबसे मार्मिक हिस्सा

इसका छठा अंक है

जब मंच के रणक्षेत्र में मुर्दे उठ खड़े होते हैं

अपने बालों का टोपा सम्भालते हुए

लबादों को ठीक करते हुए

जब जानवरों के पेट में घोंपे हुए छूरे निकाले जाते हैं

और फांसी पर लटके हुए शहीद

अपनी गर्दनों से फंदे उतारकर

एक बार फिर

जिंदा लोगों की कतार में खड़े हो जाते हैं

दर्शकों का अभिवादन करने.

वे सभी दर्शकों का अभिवादन करते हैं.

अकेले और साथ-साथ

पीला हाथ उठता है जख्मी दिल की तरफ

चला आ रहा है वह जिसने अभी-अभी खुदकुशी की थी

सम्मान में झुक जाता है

एक कटा हुआ सिर.

वे सभी झुकते हैं

जोड़ियों में..

ज़ालिम मज़लूम की बाहों में बाहें डाले,

बुझदिल बहादुर को थामें हुए

नायक खलनायक के साथ मुस्कराते हुए.

एक स्वर्ण पादुका के अंगूठे तले शाश्वतता कुचल दी जाती है.

मानवीय मूल्यों का संघर्ष छिप जाता है एक चौड़े हैट के नीचे.

कल फिर शुरू करने की पश्‍चातापहीन लालसा!

और अब चला आ रहा है वह मेहमान.

जो तीसरे या चौथे अंक या बदलते हुए दृश्यों के बीच

कहीं मर गया था,

लौट आये हैं

बिना नाम-ओ-निशान छोड़े खो जानेवाले पात्र

नाटक के सभी संवादों से ज्यादा दर्दनाक है यह सोचना

कि ये बेचारे

बिना अपना मेकअप या चमकीली वेशभूषा उतारे

कब से मंच के पीछे खड़े इंतजार कर रहे थे.

सचमुच नाटक को सबसे ज्यादा नाटक बनाता है

पर्दे का गिरना

वे बातें जो गिरते हुए पर्दे के पीछे होती हैं

कोई हाथ किसी फूल की तरफ बढ़ता है

कोई उठाता है टूटी हुई तलवार

उस समय..सिर्फ उस समय

मैं अपनी गर्दन पर महसूस करती हूं

एक अदृश्य हाथ

एक ठंडा स्पर्ष.

02 फ़रवरी 2012

शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान 11 फ़रवरी को


                                                    
मुंबई: 11 फ़रवरी को मुंबई मराठी पत्रकार संघ में शाम 5 बजे से अहमदाबाद के मशहूर वकील और एक्टिविस्ट मुकुल सिन्हा पहले शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान में लोगों को संबोधित करेंगे। गोधरा जनसंहार से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों और गोधरा की घटना के बाद मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुई बर्बर कार्रवाई को उजागर करने के अलावा गुजरात के भीतर हुई कई फ़र्जी मुठभेड़ों को प्रकाश में लाने वाले मुकुल सिन्हा 'विभ्रम जिसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं" (The illusion called Secularism) के  विषय पर बोलेंगे।

मुंबई में रहने वाले 32 वर्षीय युवा वकील शाहिद आज़मी की उनके दफ़्तर में  11 फरवरी 2010 को कुछ 'अनजान" लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी। शाहिद के एक क़रीबी मित्र के मुताबिक, शाहिद बाकी वकीलों की तरह नहीं थे जो महज पैसा कमाने के लिए वकालत करते हैं। वो न्याय के लिए निडरता से लड़ते थे। उन्होंने मालेगांव विस्फोट मामले के फ़र्जी आरोपितों सहित आंतकवाद से संबंधित कई मुकदमें लड़े।

व्याख्यान की अध्यक्षता जाने-माने स्कॉलर प्रोफ़ेसर जैरस बैनेजी करेंगे जो लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ में पढ़ाते हैं। इस अवसर पर अन्य वक्ता हैं - वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही, मुंबई हाई कोर्ट के अधिवक्ता मिहिर देसाई, जमीअत लीगल सेल, महाराष्ट्र के सचिव मौलाना गुलज़ार आज़मी और शाहिद आज़मी के बड़े भाई आरिफ़ आज़मी।

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