03 अगस्त 2009

यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है

आशुतोष कुमार
अशोक वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार' 19 जुलाई, 2009, 'जनसत्ता') कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है।

यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ।
बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर समर्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सहयोगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस-अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.

क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है ?

अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम ' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था: 'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है। आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.' विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन. क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम 'जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?

'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों'(एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे. 'सलवा-जुडूम' क्या है?
countercurrents.org पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं-----अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.
'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था। इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा-हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों'(एसपीओज़) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं. स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है-----महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W. ) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है. 'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.

छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं। वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीस, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त-----अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं. राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है. नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (सपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है .

सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है। अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार ' लिख गये। नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि 'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े। इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़ 'में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर. " घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर! अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा!

यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो. गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है ? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग"?

('जनसत्ता', दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार)



02 अगस्त 2009

हरियाणा: दलित उत्पीड़न का क्रूर चेहरा॥

सदी के चेहरे पर क्रूर प्रताड़ना का लेप इतना गहरा है और उसके रंग इतने ज्यादा कि प्रिज़्म के रंगों में उन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. क्रूरता और अपमान ने कभी अपने चेहरे को एक आकार में नहीं ढाला. वह जब भी बुना गया उसके रूप बदले हुए दिखे. शब्दों के प्रतिरोध के मायने इतने कम होते गये कि बडे निहितार्थों वाले शब्दों को दीमक की जुबान चाट गयी. एक पूरा का पूरा तंत्र समानता, समता का ढोंग करता रहा और उत्पीड़न पूर्ववत जारी रहे. समानता और समता को तंत्र के मूल में रखकर एक मोटी पोथी तैयार हुई जो आज थोथी दिख रही है.
पूरे देश में दलित उत्पीड़न की अनगिनत घटनायें घटती हैं पर कितनी कम घटनायें हैं जिनकी ख़्बर हम तक पहुंच पाती है. पिछले कुछ वर्षों में हरियाना राज्य में दलितों पर हुए अत्याचारों को देखें तो पता चलता है कि मानवाधिकारों का कितने बेखौफ तरीके से मज़ाक उडाया गया है. राज्य में २० प्रतिशत जनसंख्या दलितों की है. पूरी राज्य मशीनरी पर अधिकांशतः सवर्णों का कब्जा है.यह कब्जेदारी महज़ नौकरियों और पदों तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि देखा जाय तो एक सांस्कृतिक संरचना का व्यक्ति जब सत्ता के किसी मशीनरी में में आता है तो वह अपने पारंपरिक रीतियों के साथ संस्थान में जीता है.
धर्म निरपेक्षता का ढोंग भले ही किया जाय पर देश की कोई ऎसी सरकारी ऑफिस नहीं है जो हिन्दू प्रतीकों, मूर्तियों कलेंडरों व देवी देवताओं से मुक्त हो. क्या देश की कानून व्यवस्था व संविधान की देख रेख करने वाली न्यायालयों की निगाह कभी इस बात पर गयी कि एक सार्वजनिक संस्थान में, धार्मिक कर्मकान्डों को बद किया जाना चाहिये व प्रतीकों को हटाया जाना चाहिये. इस रूप में पूरी मशीनरी यहाँ तक कि न्यायालय भी हिन्दूवादी मानसिकता से ग्रसित होकर काम कर रहे हैं. हिन्दू मानसिकता अपने मूल से जातीय वर्चस्व व विभेदीकरण के आधार पर काम करती रही है. हरियाणा राज्य में घट रही घटनायें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कि सत्ता मशीनरी व वर्चस्वशाली वर्ग किस तरह से एक होकर दलितों पर अत्याचार कर रहे हैं.
पिछले कुछ वर्षों में देखा जाय तो जमीदारों ने दलितों का खेतों में प्रवेश बंद कर दिया. झूठे मामले के तहत उन्हें जेलों में डाला जा रहा है. पानीपत के जुलना गाँव में गुर्जरों व जाटों द्वारा दलितों की पिटायी की गयी, कजरकरा गाँव में दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे कितने मामले हैं जो घट रहे हैं. आखिर यह प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ना वहाँ की सत्ता के मदद के बगैर कैसे संभव है. जबकि इस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है.
झज्जर में २००२ में जब पाँच दलितों को पीट-पीट कर पुलिस चौकी के सामने ही जला दिया गया तो क्या यह वहाँ की पुलिस की मदद के बगैर संभव था. सरकारी संस्थाओं के ढांचे में जब किसी सवर्ण को लाया जाता है तो उसकी मानसिकता में बदलाव के लिये सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास नहीं किया जाता. वे अपने सवर्णवादी समाज के ढांचे से आते हैं और ऊंच-नीच की भावना के साथ तंत्र में कार्य करते हैं. दलितों को जब जलाया गया तो राज्य एजेंसियों ने उसे यह कहते हुए सही ठहराया कि दलितों ने बहुसंख्यक की भावना को ठेस पहुंचाया है. जबकि मामला यह था कि दलितों ने मरी हुई गाय की खाल निकाली थी.
१० फरवरी २००३ को कैथल जिले में उच्च जाति के लोगों ने २७५ दलित परिवारों को गाँव से पीट-पीटकर इसलिये बाहर खदेड़ दिया क्योंकि ये दलित ११ फरवरी को गुरू रविदास की जयंती मनाना चाह रहे थे. सवर्ण इस जयंती मनाये जाने के खिलाफ थे. कुछ दिनों बाद जब वे लौटकर आये तो फिर से सवर्णों द्वारा जुलूस निकाल तांडव किया गया और दलितों को दुबारा गाँव छोड़ना पडा. कई महीने तक उन्हें बेघर होकर कैंपों में दिन गुजारने पडे. इसके बावजूद आरोपियों को गिरफ्तारी के बाद जल्द ही छोड़ दिया गया. इतने बडे जुल्म का यदि यही अंजाम हो तो जाहिराना तौर पर सवर्णों के हौसले बुलंद ही होंगे.
राज्य में दलित बडे पैमाने पर बंधुआ मजदूर बनने के लिये आज भी मजबूर हैं जबकि बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. पर राज्य में यह सब बेमानी हो चुका है. कुछ वर्ष पहले ही एक बाल्मीक मजदूर को हुकुम सिंह नामक जमीदार ने ट्रैक्टर से कुचलकर इसलिये मार डाला क्योंकि वह बंधुआ मजदूरी की खिलाफत कर रहा था.
अब इस दमन चक्र को नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है जिसे कानूनी तौर पर जायज ठहराया जा सके. बीते दिनों २५ दलितों को माओवादी बताकर गिरफ्तार किया गया जिनमें तीन महिलायें भी शामिल हैं. इन्हें जेल में डाल दिया गया. आरोपी के रूप में करनाल जेल में बंद मुकेश कुमार नामक व्यक्ति के साथ जेल में जो बर्ताव किया गया वह अमानवीय है. मुकेश को जब जज अश्वनी मेहता के कोर्ट में लाया गया तो वह फफक पडा उसने अपने वकील के हवाले से एक पत्र लिखा जिसमे उसने बताया है कि दलित होने के कारण जेल प्रशासन के दो व्यक्तियों “ जोगिंदर सिंह, व “डांगी, द्वारा २२ जुलाई को पीटा गया, उससे शौचालय धुलवाये गये वदलित सूचक गालियाँ दी गयी. जब उसने इसका प्रतिरिध किया तो उसका सिर मुड़वा दिया गया और मूंछें काट दी गयी. प्रशासन द्वारा उसे इनकाउंटर में मारने की धमकी भी दी गयी. पर अभी तक न तो राष्ट्रीय मानवाधिकार और न ही दलित रक्षा करने वाली किसी संस्था ने इसकी खबर लेने का प्रयास किया.
राज्य में एक तरफ सामाजिक ढांचे से बहिस्कृत व प्रताडित किये जाने के बाद जब सत्ता तंत्र भी इस भेद-भाव को प्रश्रय देने लगे तो आखिर उनके सामने रास्ता क्या बचता है. इसकी क्या वज़ह है कि देश में आदिवासी और दलित ही माओवाद के नाम पर पकडे जा रहे हैं. प्रतिरोध की ताकत आज आदिवासियों और दलितों के बीच ही बची है क्योंकि वे झारखंड में आदिवासियों के नेतृत्व का शासन, उत्तर प्रदेश में मायावती का शासन भी देख चुके हैं. अब वे इस असमान ढांचे को तोड़, नया ढांचा बनाने के पक्ष में हैं.

31 जुलाई 2009

क्या ये साहित्यकार इतने नासमझ हैं

आप का कहने का निहितार्थ क्या है. यह समझ में नहीं आया. एक तरफ आप उदय प्रकाश का विरोध करने का समर्थन करते हैं. साथ ही यह कहकर -- "कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो?" आप इस मामले में उदय प्रकाश के स्टैंड कि उनके साथ साजिश कि जा रही है. का समर्थन कर रहें हैं. यदि लेखकों ने छत्तीसगढ़ में हुए कार्यक्रम का विरोध नहीं किया तो क्या इसका आशय यह है कि उन्होंने एक फासीवादी गुंडे से उदय के सम्मानित होने का विरोध कर ठीक नहीं किया.और आपके 'इस बहाने' का क्या मतलब है? क्या आपको यह सिर्फ बहाना लगता है.दूसरी बात आप उदय प्रकाश कि माफ़ी से लगता है पूरी तरह सहमत है. ऐसा क्यों है?आपका कहना है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यदि ऐसा है तो खौपनाक सच्चाईओं के प्रति सचेत इस लेखक को यह पता नहीं था कि योगी आदित्यनाथ कौन है. क्या उदय कि इस बात पर विशवास किया जा सकता है कि वे "राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।"और ध्यान से देखा जाये तो उन्होंने यह भी नहीं कहा है.उन्होंने व्यावहारिक राजनीतिक निहितार्थों की बात की हैमतलब उनके लिए अब भी यह "व्यावहारिक राजनीति" का सवाल है.
दूसरी बात, आपने लिखा है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यह दावा तो स्वयं उदयप्रकाश भी नहीं करेंगे।आखिर उनकी किस कहानी में ऐसे तत्वों के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का आह्वान है. जवाब है किसी में भी नहीं. यहाँ मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उदय प्रकाश की कहानियों में कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है. मेरा विनम्र आग्रह इतना ही है कि मनगढ़ंत तरीके से उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध दिखा देना कोरा भाववाद है. आप उदय प्रकाश कि कहानियों में दरअसल वह बात डाल देना चाहते है जो आपको लगता है कि किसी अच्छे कहानीकार कि कहानियों में होनी चाहिए. और उदय प्रकाश के प्रति आप इतने मोहासक्त है कि जबरन उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध घुसेड रहें है.

तीसरी बात, यह बात एकदम सही है कि छत्तीसगढ़ के कार्यक्रम में शिरकत के प्रश्न पर चर्चा होनी चाहिए. सत्ता और बुद्धिजीविओं के बीच के सम्बन्ध के बारे में बातचीत होनी चाहिए.कृष्णमोहन जी जो वहां गए थे. यह तर्क दे रहे हैं कि कार्यक्रम में रमण सिंह के आ जाने से ही वह प्रतिक्रियावादी नहीं हो जाता है. शायद सलवा जुडूम जैसे दमन अभियान कि गंभीरता को भूल रहे हैं. वे भूल रहे हैं कि यह अपने ही नागरिकों पर वियतनाम युद्ध की शैली में छेडा गया एक बर्बर युद्ध है. वे भूल रहें हैं कि इस युद्ध का नायक और निर्माता वही 'कवि' विश्वरंजन है. जो उस कार्यक्रम का कर्ता धर्ता था.लेकिन अनिल जी, बहुत से लोग इन कृष्णमोहन जी के प्रति भी मोहासक्त हैं. और इसकी तो वजहें भी है. मुक्तिबोध जैसे कवि के सरोकारों को समझ कर उन्होंने उनके रचना कर्म पर एक अच्छी पुस्तक भी लिखी है. लेकिन क्या मुक्तिबोध के काव्य व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता पर लिख कर ही कोई आलोचक आज जनपक्षधर हो सकता है. मुक्तिबोध जिन षड्यंत्रों कि पड़ताल कर रहे थे -- "किसी जन क्रांति के दमन निमित्त यह मार्शल ला है". क्या मुक्तिबोध इस तरह के कार्यक्रम में संम्मिलित होते ?कहा जाता है कि साहित्य जीवन और समाज की आलोचना है. इस तरह साहित्य की आलोचना तो उस आलोचना की भी आलोचना हुई. जीवन और समाज अपने गहनतम और संश्लिष्टतम रूप में आलोचना में आलोचना में मौजूद होते हैं.लेकिन क्या किया जाय जब हिंदी के उभरते हुए और स्थापित आलोचकों को अपनी जनता के जीवन और अपने समाज में चल रहे युद्धों की बुनियादी जानकारी भी नहीं है. अकेले कृष्णमोहन ही नहीं है. विश्वरंजन को भेजे अपने पात्र में कवि- आलोचक पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि सलवा जुडूम और उसमें विश्वरंजन कि भूमिका का पता उन्हें एक दिन पहले ही 'द पब्लिक एजेंडा' नामक पत्रिका से हुई. हद है!३ साल हो गए हैं सलवा जुडूम को शुरू हुए. २ साल तो बिनायक सेन ने जेल में गुजारे और हिंदी के एक संभावनाशील आलोचक को उसका पता एक दिन पहले चला है।
विजय गौड़-
अनिल जी इस बिना पर कि कोई लेखक बहुत पढा जाता है या कि लेखक ने बहुत जनपक्षधर रचनाएं लिखी हैं तो वह यदि अमानवीय अत्याचारियों के साथ खडा हो तो बहुत ही भोलेपन के साथ उसके पक्ष में हम भी खडे हों,कोई ठीक बात नहीं। और न ही इसे किसी दूसरे सवाल के साथ जोड कर ही कोई बचाव किया जा सकता है। रही बात छतीसगढ वाले मामले की (जिसके बारे में मेरी जानकारी मात्र उन दो-तीन आलेखों तक ही है जो इस ब्लाग में भी पहले प्रकाशित हुए हैं- जिसमें एक पंकज जी का पत्र और दूसरा कृष्णमोहन जी का खत) तो उसमें जो सवाल आपने उठाएं हैं निश्चित ही वे जरूरी सवाल हैं। उन पर बात होनी चाहिए। लेकिन छायी हुई चुप्पी से यह समझ में आता है कि हिन्दी का रचनाजगत किस तरह से आत्ममुग्ध है जो सिर्फ़ पुरस्कार प्रकरण पर तो, वो भी आधे-अधूरे तरह से (आधे-अधूरे : क्योंकि उदय प्रकाश का नाम तो उठा, जो उठना जरूरी था, पर वहीं एक आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव के नाम पर चुप्पी है) खूब उत्तेजित होता है, पर सत्ता के चरित्र के सवालों पर वहां वैसी बेचैनी नहीं होती।
हम पढ़े लिखे सेकुलरों का एक ही काम रह गया है और वो है हन्दू विरोध तसलीमा नसरीन को जब धकियाया गया तब हिंदी से सेकुलर रहनुमा कहाँ थे ? कुछ मुस्लिम संगठनों ने गोदरेज को धमकी दी की यदि गोदरेज सलमान रुश्दी को भोज पे आमंत्रित करेंगे तो मुस्लिम समुदाय गोदरेज products का इस्तेमाल बंद कर देंगे हिंदी सेकुलर्स को सहाबुद्दीन, लालू या मुलायम से कोई दिक्कत नहीं है ये लोग सिर्फ अपनी राजनितिक रोटी सकने मैं लगे हैं मेरा ये पोस्ट देखिये शायद कुछ लोगों की आँखें खुले :
http://raksingh।blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html

30 जुलाई 2009

उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार - अनिल

गोरखपुर के भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों हिंदी के सर्वाधिक पढे़ जाने वाले लेखक उदय प्रकाश द्वारा एक ’स्मृति सम्मान’ लेने की ख़बर के साथ ही समूची हिंदी पट्टी के लेखकों, कवियों, आलोचकों और उदय प्रकाश के आत्मीय शुभचिंतकों में गहरी निराशा, क्षोभ, आक्रोश और असहमति की लहर फैल गई। हिंदी भाषा में अभी परिपक्वता की दहलीज की ओर अग्रसर नये-नवेले माध्यम ब्लॉग पर इस पूरी परिघटना के पक्ष-विपक्ष में व्यापक बहस हुई। उदय प्रकाश के अनुसार यह आयोजन नियाहत पारिवारिक था, जिसके राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।
बहरहाल, उदय प्रकाश ने अपने पाठकों, शुभचिंतकों को विचलित और दुखी कर देने की लापरवाही के कारण सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांग ली है। आख़िर उदय हिंदी के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं। उदय प्रकाश की रचनाएं चाहे वह पद्य हो या गद्य, हिंदी जगत में एक ऊर्जावान हलचल के साथ आदर पाती हैं। उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं। और उनकी रचनाओं में इस ताक़त को चीन्हकर अभी कुछ दिनों पहले महाराष्‍ट्र के अमरावती जिले में, खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या के विरोध में हो रहे जनांदोलनों का दमन करने वाली राज सत्ता के ख़िलाफ़ वास्तविक, जुझारू लड़ाई लड़ने वाले दलित संगठनों ने उदय प्रकाश के सम्मान में सर झुकाते हुए उन्हें ’भीम सेना’ का प्रतीकात्मक सेनाध्यक्ष बनाकर रथ में घुमाया था। इसका जीवंत विवरण पाठक ख़ुद उदय प्रकाश के हिंदी ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।

यह कोई कहने की बात नहीं है कि हिंदी भाषा के एक ऐसे जनपक्षधर, लोकप्रिय तथा मूर्धन्य समकालीन लेखक द्वारा बर्बर हिंदुत्व की आतंकी राजनीति करने वाले बाहुबली सांसद के हाथों सम्मान लेना हिंदी जगत के लिए अपमानजनक ही नहीं, बल्कि घोर आपत्तिजनक है। हिंदी के सुधी रचनाकारों से इस मामले में उदय से असहमति ज़ाहिर करना, उनका विरोध करना बहुत स्वाभाविक और जायज़ है।

लेकिन सवाल कुछ और भी गहरे, जटिल तथा एक-दूसरे से गहरे संबद्ध हैं, जो समूचे हिंदी परिदृश्य के दोहरे मापदंडों और छद्‍म को उजागर करते हैं। जिन दिनों उदय प्रकाश के मामले पर समूचा हिंदी जगत अपना सिर खपा रहा था, उन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ’प्रमोद वर्मा’ स्मृति न्यास की ओर से पहले प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान के तत्वावधान में दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन का प्रबंध था। न्यास के अध्यक्ष छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया अर्थात डीजीपी विश्‍वरंजन इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजक थे। कार्यक्रम के दौरान छत्तीसगढ में सत्तारूढ़ भाजपा विधायक दल के नेता अर्थात मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित कई अन्य मंत्रीगण भी बिना किसी पूर्वघोषणा के पहुंचे। कार्यक्रम में चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, नंदकिशोर आचार्य जैसे हिंदी के कई ’चर्चित’, ’बड़े’ प्रगतिशील और जनवादी लेखक, कवि और आलोचक उपस्थित थे।
आज दुनिया को यह बताने की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है कि छत्तीसगढ़ सरकार और उसके नुमाइंदों का वास्तविक चरित्र क्या है? देशी शासकों द्वारा देश के जल, जंगल, ज़मीन को बड़ी कार्पोरेट कंपनियों को सौंपे जाने के विरोध में जिन आदिवासी, मज़दूर, दलित या महिला संगठनों ने आवाज़ उठाई, उन पर सरकार के फौज़ी ’विजय अभियान’ का ’वीरता चक्र’ पूरे देश में चल रहा है। छत्तीसगढ़ इस दमन के नंगे रूप का प्रत्यक्ष बयान है, जहां ’सलवा जुडुम’ जैसे बर्बर, हत्यारे अभियान सरकारी एजेंडे में सर्वोपरि हैं, जहां अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासन की तर्ज़ पर आधारित ’विशेष जन (विशिष्ट जन) सुरक्षा अधिनियम’ जैसे अपराधी कानून ’लोकतंत्र’ की दुहाई दे देकर असहमति रखने वाले ’विरोधियों’ को सबक़ सिखाने के लिए हैं।

इन सारी स्थितियों का भंडाफोड़ पूरी दुनिया में हो चुका है। इसके कई ठोस उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। और इन परिघटनाओं से अब अधिकांश लोग परिचित हैं। बावजूद इसके, सत्ता तथा सरकारों के ऐसे नुमाइंदों के बीच हमारे ’बड़े’, ’चर्चित’ प्रगतिशील तथा जनवादी रचनाकारों ने क्यूं शिरकत की? यह सवाल मन को कचोटता है। कार्यक्रम की एक रपट के अनुसार मुख्यमंत्री रमन सिंह ने साहित्यकारों को विचारधारा से ’मुक्‍त’ होकर रचना करने की सलाह दी। इस बात पर यक़ीन करने का कोई मज़बूत आधार नहीं है कि रमन सिंह के राजनीतिक (कु) कृत्य और साहित्यिक क़द के बारे में वहां मौजूद हमारे प्रिय रचनाकारों को कोई जानकारी नहीं रही होगी। और इस कारण उन्होंने किसी तरह के प्रतिवाद की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की होगी। एक अन्य महत्त्वपूर्ण सवाल यह है, कि जिन लोगों ने फ़ासीवादी सांसद के हाथों सम्मान लेने वाले लेखक का प्रतिकार किया, उन लोगों ने छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ फ़ासीवादी पार्टी के मुखिया के साथ मंच शेयर करने वाले कई हिंदी लेखकों का प्रतिकार क्यों नहीं किया? पूर्वी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की धमकी देने वाले योगी आदित्यनाथ और सल्वा जुडुम के कारण कई हज़ार लोगों को मार डालने तथा साठ हज़ार आदिवासियों को जड़ से उखाड़ देने के लिए ज़िम्मेदार रमन सिंह में क्या अंतर है?

एक ऐसे समय की धार में जब कुछ दिनों पहले ही पश्‍चिम बंगाल के बुद्धिजीवी और रचनाकार लालगढ़ में भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के सुनियोजित संहार के ख़िलाफ़ सड़कों पर खुल कर आ रहे थे, पत्र पत्रिकाओं में विरोध के स्वर को तेज़ कर रहे थे, हिंदी के लेखकों और बुद्धिजीवियों के छत्तीसगढ़ में सरकारी साहित्यिक जलसे में शामिल होने के निर्णय पर हिंदी के अन्य रचनाकारों की चुप्पी भविष्‍य के लिए भयावह संकेत हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के दुखते रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

(लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोध छात्र हैं।)

28 जुलाई 2009

जनसंस्कृति मंच की बयानबाज़ी पर टिप्पणी - कृष्णमोहन (आलोचक)

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान कार्यक्रम (रायपुर, 10-11 जुलाई, 09) के बारे में जनसंस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (दिल्ली, 11-12 जुलाई) द्वारा पारित प्रस्ताव तथ्यहीन लफ़्फ़ाजी का नमूना भर है। यह इस बात का उदाहरण है कि कोई सांस्कृतिक संगठन रचनात्मकता से कटकर जब नौकरशाही प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाता है तो उसका रवैया कैसा गरिमाहीन, अलोकतांत्रिक और ग़ैरज़िम्मेदार हो जाता है। दिनोदिन स्मृतिहीन होते जा रहे हमारे समाज में एक लगभग भुलाए जा चुके लेखक की स्मृति को संरक्षित करने के कार्यक्रम को यह ‘साज़िश’ करार देता है, क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने भी शिरकत की। छत्तीसगढ़ और देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी को भी इसी तर्ज पर यह उनका ‘शर्मनाक पतन’ मानता है। यही नहीं, इस आरोप से बचने का एक ‘पापमोचक’ नुस्खा भी यह सुझाता है कि ये संस्कृतिकर्मी इसे अपनी ‘नादानी’ मान लें। इस उद्यण्ड प्रस्ताव के मुताबिक शिवकुमार मिश्र, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर, अशोक वाजपेई, प्रभाकर श्रोत्रिय, नन्दकिशोर आचार्य, चन्द्रकांत देवताले, प्रभात त्रिपाठी जैसे तमाम वरिष्ठ लेखक अपने पतन अथवा नादानी के कारण ही उस कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। इसकी कोई जायज वजह उनके पास नहीं हो सकती। वैसे भी, इन बौने तानाशाहों का गुट जिसे नहीं मानता वह कोई वैध वजह कैसे हो सकती है।
बहरहाल, यह रवैया एक ऐसे संगठन के सर्वथा अनुरूप है, जो खुद तो कहीं जवाबदेह नहीं लेकिन पूरी दुनिया को अपने सामने जवाबदेह मानता है। किसी कार्यक्रम से सैकड़ों मील दूर लगभग उन्हीं तिथियों पर बैठे इसके कर्ता-धर्ता उसके ‘स्वरूप की कल्पना’ कर लेते हैं, जो वैसे भी कुछ मुश्किल नहीं, और फिर उसे अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि उस ‘खास समय’ की राजनीतिक ज़रूरत के मुताबिक़ यह कार्यक्रम सरकार की मदद के लिए कर लिया गया होगा। उन्हें इससे क़तई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस अवसर की तैयारी वर्षों से चल रही थी। ‘प्रमोद वर्मा समग्र’ की लगभग ढाई हजार पृष्ठों की सामग्री के संकलन, संपादन और प्रकाशन के अलावा ‘स्मृति-सम्मान’ के निर्णय की प्रक्रिया, जिससे केदारनाथ सिंह, विजय बहादुर सिंह, धनंजय वर्मा और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे वरिष्ठ लेखक जुड़े हुए थे, से गुज़रकर यह आयोजन संभव हुआ। ‘समग्र’ के संपादक विश्वरंजन को प्रस्ताव में हर जगह ‘पुलिस महानिदेशक’ के रूप में याद करने की वजह भी यही है कि शब्दों की सत्ता से इस संगठन पर हाॅवी गुट का नाता टूट चुका है। इसीलिए गोरख पाण्डेय से लेकर चन्द्रशेखर तक, अपने लेखकों की विरासत को सहेजने की इसके अंदर न तो इच्छा बची है, न दूसरों के श्रम का सम्मान करने की तमीज।
जहाँ तक पुलिस महानिदेशक होने का सवाल है तो इस पद अथवा अन्य प्रशासनिक पदों से जनसंस्कृति मंच को कभी कोई समस्या नहीं रही। राज्यसत्ता का चरित्र समूचे देश में एक जैसा है और शासन-तंत्र उसकी नीतियों को लागू करने का औजार है। न इससे कम, न इससे ज़्यादा। इसलिए इस मामले में भी, अन्य मामलों की तरह, दुहरे मानदंड नहीं चल सकते। पुलिस महानिदेशक होने से किसी के व्यक्तिगत अथवा लेखकीय अधिकार कम नहीं हो जाते। दूसरों की ही तरह सत्ता से जुड़े लोगों की भी अन्य सामाजिक भूमिकाओं का वस्तुगत मूल्यांकन किए बिना उन भूमिकाओं के बारे में कही गई कोई बात निरर्थक बकवास से अधिक महत्व नहीं रखती।
इस अहंकारग्रस्त प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘वहाँ जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था।’ नैतिकता के ऊँचे पायदान पर खड़े इन महानुभावों को अगर रत्ती भर भी ज़िम्मेदारी का एहसास होता तो उन लेखकों के वक्तव्यों का भी पता करते, जिनके प्रतिनिधित्व का वे दम भरते हैं। चन्द्रकांत देवताले, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर और शिवकुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ लेखकों के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने भी अपने वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में मुख्यमंत्री की बात का खण्डन करते हुए विचारधाराओं के संघर्ष की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। इस प्रतिवाद को सभा ने कई बार उत्साहपूर्ण समर्थन भी दिया था। जसम के इन अधिकारियों से यही कहना है कि मुख्यमंत्री की बात सुनने में कोई ज़िल्लत नहीं थी, क्योंकि हम उनके विरोधी हैं और उनको जवाब दे सकते हैं। लेकिन आपके श्रीमुख से इन उपदेशों को सुनना सचमुच ज़िल्लत भरा है, क्योंकि आपसे हम किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। वसीम बरेलवी की पंक्तियाँ याद आती हैं -

तुम्हारे हाथ गरेबाँ तक आ गए बढ़कर
कोई बताए कि ये वार टाल दें कैसे
जो होता पाँव में काँटा निकाल सकते थे
तुम्हारी अक्ल का काँटा निकाल दें कैसे।

सच तो यह है कि देश की जनता और राज्यसत्ता में युद्ध छिड़ा हुआ है जो आगे और तीखा होने वाला है। लेखकों और बुद्धिजीवियों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्वजनिक मंचों पर कई बार उन्हें सत्ता के नुमाइंदों की मौजूदगी के बावजूद उपस्थित होना पड़ता है। हम ऐसे मौक़ों पर अपनी जनता के सम्मान की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी के साथ जाते हैं, और किसी को ये हक़ नहीं देते कि वो हमारी इस भूमिका पर अनर्गल टिप्पणी करे। हाँ, अगर किसी को सचमुच कोई सार्थक राजनीतिक बहस चलानी हो तो वो ऐसा कर सकता है। दूसरों को नसीहत देने वाले अगर अपने गिरेबान में झाँकने को तैयार हों तो उनका स्वागत है।

15 जुलाई 2009

संस्कृतिकर्मियों की शिरकत शर्मनाक:


प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

११-१२ जुलाई को नई दिल्ली मे सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की शिरकत को शर्मनाक बताते हुए खेद व्यक्त किया गया। स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसला उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। यह संभव है कि इस कार्यक्रम में शरीक कई लोग ऎसे भी हों जिन्हें इस कार्यक्रम के स्वरूप के बारे में ठीक जानकारी न रही हो। लेकिन जिस राज्य में तमाम लोकतांत्रिक आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, बिनायक सेन जैसे मानवाधिकारवादी चिकित्सक, अजय टी.जी. जैसे फ़िल्मकार, हिमांशु जैसे गांधीवादी को माओवादी बताकर राज्य दमन का शिकार बनाया जाता हो, जहां 'सलवा जुडुम' जैसी सरकार प्रायोजित हथियारबंद सेनाएं आदिवासियों की हत्या, लूट, बलात्कार के लिए कुख्यात हों और ३ लाख से ज़्यादा आदिवासियों को उनके घर-गांव से खदेड़ चुकी हों, जहां 'छ्त्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिट ऎक्ट' जैसे काले कानून मीडिया से लेकर तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोंटने के काम आते हों, वहां के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन (जिनके नेतृत्व में यह दमन अभियान चल रहा हो), के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के स्वरूप की कल्पना मुश्किल नहीं थी। वहां जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था। बहरहाल, यह घटना वामपंथी, प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए चिंताजनक और शर्मसार होने वाली घटना ज़रूर है। हम यह उम्मीद ज़रूर करते हैं कि जो साथी वहां नाजानकारी या नादानी में शरीक हुए, वे सत्ता द्वारा धोखे से अपना उपयोग किए जाने की सार्वजनिक निंदा करेंगे और जो जानबूझकर शरीक हुए थे, वे आत्मालोचन कर खुद को पतित होने से भविष्य में बचाने की कोशिश करेंगे और किसी भी जनविरोधी, फ़ासिस्ट सत्ता को वैधता प्रदान करने का औजार नहीं बनेंगे। हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुऒं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है।

13 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ : डीजीपी विश्वरंजन के नाम एक खुला ख़त

महोदय,
सादर अभिवादन !
आशा है, आप अच्छी तरह हैं।
जैसा कि आपको मालूम ही है, आपके द्वारा रायपुर में 10-11 जुलाई, 2009 को आयोजित की जा रही दो--दिवसीय 'राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी ' के एक सत्र 'आलोचना का प्रजातंत्र ' में अपना वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया था। इस सम्बन्ध में आपका पत्र ---दिनांक 15 मई , 2009 मुझे ई-मेल की मार्फ़त 18 जून, 2009 को भेजा गया और उसी दिन मिला था। उपर्युक्त संगोष्ठी में अपनी शिरकत की स्वीकृति मैंने आपको ई-मेल के ज़रिए दिनांक 19 जून, 2009 को भेज दी थी और उस पत्र में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि आप सार्थक तथा उदात्त चिन्ताओं से प्रेरित होकर यह अहम संगोष्ठी करा रहे हैं और अपनी इस कृतज्ञता को भी व्यक्त किया था कि आपने मुझ जैसे अदना लेखक को इसमें आमंत्रित करने लायक़ समझा। यों रायपुर आने के लिए मैंने रेलवे रेज़र्वेशन्स करा लिए थे. मगर कल , यानी 6 जुलाई, 2009 को सहसा मेरी नज़र हिन्दी पाक्षिक ' द पब्लिक एजेंडा' के 8 जुलाई, 2009 के पृ . सं. 13 पर छतीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक के तौर पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार पर गयी और इसे पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि मुझे उपर्युक्त संगोष्ठी में हिस्सेदारी करने का अपना फ़ैसला रद्द करना पड़ा और रायपुर आने के अपने रेलवे रेज़र्वेशन्स भी. कृपया इस असहयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे और मेरी वैचारिक असहमति को हरगिज़ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ग्रहण करेंगे ! दरअसल आप अपने साक्षात्कार में 'सलवा जुडूम ' सरीखी सरकार द्वारा संरक्षित ,पोषित और संचालित -----साधनहीन, विपन्न और अत्यंत सामान्य मानवाधिकारों से भी महरूम आदिवासियों का दमन करनेवाली-----संस्था का बेझिझक और सम्पूर्ण समर्थन करते हैं, जो मेरे जैसे लोगों के लिए एक बहुत तकलीफ़देह मामला है. आपने कहा है-----"इस समय बस्तर में हम पूरे ज़ोर-शोर से माओवादियों से लड़ रहे हैं. " सवाल है कि ये 'माओवादी ' कौन हैं ? क्या ये वही आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें माओवादी बताकर हाल ही में पश्चिम बंगाल पुलिस ने लालगढ़ में न सिर्फ़ उन पर अत्याचार किये हैं ; बल्कि बकौल मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, " उनकी हत्याएँ भी की हैं. " बहरहाल. आपने अपने इस साक्षात्कार में यह आत्मविश्वास भी व्यक्त किया है कि "उनके खिलाफ़ पुलिस ही लड़ेगी और अंत में जीतेगी. " तो महोदय, पुलिस के आखिरकार जीत जाने में भला किसको संशय हो सकता है ? कुछ ही समय पहले दिवंगत हुए महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कभी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हमारे देश का सबसे शक्तिशाली आदमी पुलिस कांस्टेबल होता है. " फिर जहाँ पूरे देश की पुलिस लालगढ़ से छत्तीसगढ़ तक आदिवासियों के बेरहम दमन में शामिल हो ; वहाँ उसके अकूत पराक्रम की तो केवल कल्पना की जा सकती है ! इस अद्भुत बल-विक्रम का एक सुबूत पेश करते हुए आपने कहा है -----"उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया है ." गौरतलब है कि आपने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को खदेड़कर पहुँचाया कहाँ गया है ! दूसरे शब्दों में, उनके पुनर्वास का क्या इंतिज़ाम सरकार ने किया है ? ' सलवा जुडूम ' का साथ देते हुए आप कहते हैं कि "इसके खिलाफ़ जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है , उसके लिए माओवादियों को दाद देनी चाहिए ." दिलचस्प है कि फिर आप यह भी जोड़ते हैं-----' सलवा जुडूम ' माओवादियों के खिलाफ़ जनता की बगावत है.' सवाल है कि अगर यह सच है, तो उनकी विचारधारा और उनको उसी "जनता" की सहानुभूति और समर्थन कैसे प्राप्त होता है ? हम हिंसा के रास्ते के हामी नहीं हैं , लेकिन जिनसे उनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वुजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है. दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी-----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी-----नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें , कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इस समूचे अंतर्विरोध, विडम्बना और त्रासदी की भौतिक परिणति आसन्न अतीत में लालगढ़ में दिखायी पड़ी ; जहाँ पूरी दुनिया ने देखा है-----सरकारें चाहे जो कहती रहें-----कि हथियार कथित माओवादियों ने नहीं, बल्कि निरीह आदिवासियों ने उठाये हुए थे, भले उस सबका अंत उनके निर्मम और अप्रत्याशित पुलिस दमन में ही हुआ है. यह सब तब हो रहा है और लगातार हो रहा है, जब दुनिया भर के सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और प्रतिबद्ध राजनीतिग्य एक आवाज़ में यह माँग कर रहे हैं कि इन सभी समस्याओं को राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है और यह कि इस सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया को अपनाने का कोई भी मानवीय विकल्प न है, न हो सकता है. इसके विपरीत, आप कहते हैं कि पहले उन्हें "हथियार शासन को सौंपने होंगे, तभी कोई बातचीत संभव है. " सवाल है कि जब उनके पास ये हथियार नहीं थे , तब उनकी समस्याओं का कौन-सा राजनीतिक हल तलाशा गया और जहाँ-जहाँ इन हथियारों और हथियार उठानेवालों को-----आपके ही शब्दों में कहूँ , तो "खदेड़" दिया गया है-----वहाँ वर्तमान में तमाम प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों द्वारा समाधान के लिए कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी जा रही है ? आपके राज्य छत्तीसगढ़ में तो आलम यह है कि बक़ौल गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, " सरकार और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासी मारे जा रहे हैं और विस्थापित हो रहे हैं . हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत के ज़रिए ही कोई हल निकाला जाना चाहिए , जिसकी पहल न राज्य कर रहा है , न माओवादी. " 'द पब्लिक एजेंडा ' के कार्यालय संवाददाता ( दिल्ली ) अजय प्रकाश के अनुसार-----"हिमांशु कुमार की यही साफ़गोई उनके लिए घातक साबित हुई है और दंतेवाड़ा प्रशासन ने 17 मई , 2009 को उनका आश्रम ढहा दिया . दंतेवाड़ा से लौटकर सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय बताते हैं ,'हिमांशु के बारे में पूरा क्षेत्र जानता है कि ' सलवा जुडूम ' अभियान से विस्थापित और उजड़े आदिवासियों के पुनर्वास जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार हिमांशु को माओवादियों का शुभचिन्तक बताकर दंतेवाड़ा से खदेड़ने की फिराक में है. " लगता है कि " खदेड़ना " छत्तीसगढ़ पुलिस-प्रशासन का तकियाकलाम बन गया है , उसकी केन्द्रीय रणनीति . हिटलर के ' फ़ाइनल सॉल्यूशन ' की तरह . उसका कहना था कि 'जो लोग तुम्हें पसंद न हों , उन्हें ख़त्म कर दो .' यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो लोग तुम्हारे आड़े आते हों , उन्हें " खदेड़ " दो ! हालत यह है कि अगर कोई गाँधीवादी भी आपसे असहमत है , तो आपके मुताबिक़ वह "माओवादी " है ! छत्तीसगढ़ में जो सरकार के बताये रास्ते पर बिना कुछ सोचे-समझे नहीं चल रहा है ; वह इन दिनों माओवादी या नक्सली के तौर पर ' ब्रांडेड ' किये जाने , पुलिस उत्पीड़न झेलने , वहाँ से बेदख़ल किये जाने या " खदेड़ " दिये जाने और सज़ा भुगतने को अभिशप्त है. इस ट्रेजेडी का सबसे ज्वलंत उदाहरण डॉ. बिनायक सेन हैं , जो एक डॉक्टर के नाते छत्तीसगढ़ की आम जनता , ख़ास तौर पर वहाँ के आदिवासियों की चिकित्सा-सेवा में संलग्न थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने उन पर नक्सलियों और माओवादियों का साथ देने का इल्ज़ाम मढ़ते हुए उन्हें जेल पहुँचा दिया. क़रीब तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए रिहा किया कि उनके खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं पाये गये . मगर यह फ़ैसला आने तक एक निर्दोष और जन-सेवी डॉक्टर 3 साल जेल की सज़ा काट चुका था. इससे पुलिस-प्रशासन की अपरिमित दमनकारी ताक़त की कल्पना ही की जा सकती है. मुझे यह पता चला है कि आप कविता भी लिखते हैं . इसलिए मेरी यह जिग्यासा है कि अपने इस क़िस्म के सरकारी काम और कवि -कर्म के बीच क्या आपको कोई यातनाप्रद द्वंद्व महसूस नहीं होता या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अंतर्विरोध या द्वंद्व हो ही नहीं ? श्री प्रमोद वर्मा , जिनके नाम पर यह आयोजन हो रहा है और पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं -----------पहला सवाल तो यह है कि अगर वे कहीं हैं , तो उन्हें कैसा लग रहा होगा ? दूसरी बात यह कि उपर्युक्त सरकारी कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए ही क्या यह आयोजन नहीं किया जा रहा है ? कैसी विडम्बना है कि आपने इस संगोष्ठी में " आलोचना का प्रजातंत्र " शीर्षक एक पूरा सत्र ही रखा हुआ है ; जबकि आपके निज़ाम में न आलोचना की कोई वास्तविक गुंजाइश है और न निरीह प्रजा की ही कोई सुनवाई ! यह भी कोई महज़ संयोग नहीं कि पुरस्कृत और उपकृत करने के लिए आपने आलोचकों को ही निशाना बनाया ; जिससे 'आलोचना ' का रहा-सहा साहस , संवेदनशीलता, मूल्य्निष्ठता , प्रश्नाकुलता और विवेक का भी अपहरण किया जा सके और उसे निष्प्रभ एवं निस्तेज बनाया जा सके ! इस सन्दर्भ में मुझे रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता याद आ रही है ; जिसमें उन्होंने लिखा है----- "
आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से
जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा ?
हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए
जो कविता हम सबको लाचार बनाती है ?
" जहाँ तक मुझे मालूम है , श्री प्रमोद वर्मा , मुक्तिबोध के काफ़ी निकट थे. इसलिए इसे एक काव्य-न्याय ही मानता हूँ कि मुक्तिबोध की इन काव्य-पंक्तियों की स्मृति ने मुझे उपर्युक्त कार्यक्रम में शामिल होने से आखिरकार रोक लिया-----
" भीतर तनाव हो
विचारों का घाव हो
कि दिल में एक चोट हो आये
-दिन ठंडी इन रगों को गर्मी की खोज है
वैसे यह ज़िन्दगी भोजन है , मौज है । "
आदर और शुभकामनाओं के साथ ;
आपका ,
पंकज चतुर्वेदी कानपुर

06 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के बंधुआ/विस्थापित मजदूरों के अध्ययन की एक संक्षिप्त रपट

समय के साथ चीजों को बदलना था, गुलामी खत्म होनी थी, समाज में व्याप्त जड. प्रवृत्तियां बदलनी थी. अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद देश के एक बडे़ मनोजगत का यही सोचना था. पर अफसोस कि अंग्रेजों से मुक्ति जिसे आज़्ाादी कहा गया, महज़्ा सत्ता बदलाव तक ही सीमित रही यानि सामाजिक संरचना में कोई खास बदलाव नहीं आया छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कुछ जिलों में बंधुआ मजदूरों पर किये गये अध्ययन के दौरान निकलकर आये तथ्य तो यही कहते हैं.
अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद जनता को स्वतंत्र्ाता, समता व अन्य कई मौलिक अधिकार दिये गये, जिनका मिलना अपने को लोकतांत्र्ािक कहे जाने वाले देश में लाज़्ामी था. इन कानूनों के होने के बाद भी स्थिति ये रही कि देश के कई इलाकों में बंधुआ मजदूरी की प्रथा जारी रही अतः 19 फरवरी 1976 को बंधुआ मजदूर जो कि दुर्बल वर्ग के होते थे या आज भी हैं के शारीरिक व आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु ’बंधित श्रम प्रथा उन्मूलन नियम 1976’ सत्ता हस्तांतरण के 27 वर्ष बाद बनाया गया. इसके पश्चात अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 1989 अधिनियम भी बनाया गया, जिसका सम्बंध बंधुआ मजदूरों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि देश में चल रही बंधुआ प्रथा में एक अंकडे के मुताबिक 98 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग प्रताड़ित होते हैं.
कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरों को लेकर कुछ अन्य नियम भी बनाये गये जैसे बंधुआ मजदूर व प्रवासी बंधुआ मजदूर जो किसी अन्य राज्य में जाकर बंधुआ के रूप में कार्य करते हैं उनके लिये जिले में सतर्कता समिति के गठन का भी सुझाव दिया गया और समिति निर्माण का कार्य जिला अधिकारी को दिया गया. साथ में बंधुआ मजदूरी कराने वाले व्यक्ति नियोक्ता ठेकेदार आदि को दंडित करने का नियम भी बनाया गया जो 3 वर्ष तक कारावास व 2000 रूपये जुर्माने के रूप में थी. सरकार द्वारा बंधुआ मजदूरों के सम्बंध में राहत राशि की व्यवस्था भी की गयी जो 25,000 रूपये उनके पुनर्वास हेतु व पानी भूमि आदि के रूप में की गयी.जिसे छत्तीसगढ के कुछ जिलों में जिनमे महासमुंद, रायपुर व उड़ीसा के बरगड़ नवापाड़ा आदि में गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा बंधुआ मजदूरों को इंगित कर उनमे से कुछ को यह सुविधा प्रदान कराई गयी पर कई बंधुआ मजदूरों को यह अभी तक नही मिली.
प्रस्तुत रिपोर्ट प्रथम व द्वितीय श्रोतों के अध्ययन का एक संक्षिप्तीकरण है. जिसमे यह बात गौर करने की है कि कानूनों के दबाव व नियमों को ध्यान में रखते हुए राज्यों में बंधुआ मजदूरों का स्वरूप बदल गया है. अध्ययन के दौरान इस बात का पता लगा कि बंधुआ मजदूरों को लेकर स्वामी अग्निवेश के अंदोलन के प्रभाव से बंधुआ मजदूरों की स्थिति में बदलाव आया या कहा जाय कि उनका स्वरूप बदल गया क्योंकि उनके प्रभाव में आकर राज्य के कई संस्थाओं व कार्यकर्ताओं ने बंधुआ मुक्ति अंदोलन चलाया जिनमें छत्तीसगढ़ बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने महती भूमिका निभाई है.कारणवस जो पारंपरिक स्वरूप था वह बहुत कम दिखता है परंतु यह बदले हुए स्वरूप में बड़ी मात्र्ाा में मौजूद है. मसलन छत्तीसगढ़ में विस्थापन एक बड़ी समस्या के रूप में रहा है और अधिकांसतः यह बधुआ मजदूरों के रूप में ही होता है. 1981 में मध्यप्रदेश के एक कमिश्नर (तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नही आया था ) लोहानी ने आब्रजन कानून बनाया ताकि यहां से बंधुआ बनकर जाने वाले मजदूरों को रोका जा सके जबकि उनके कारणों की खोज कर निदान करने का प्रयास नहीं किया गया.
अध्ययन के दौरान बंधुआ बनकर विस्थापित होने वाले मजदूरों के संदर्भ में जो कारण निकल कर आये वे कई आयामों के साथ हैं.
एक तो छत्तीसगढ़ के किसान जो भूमि युक्त हैं या जो छोटे किसान हैं बारिस के बाद यानि धान की फसल लगाने के पश्चात उनके पास अन्य फसल लगाने के अवसर नहीं होते हैं. अत बारिस के बाद वे खाली हो जाते हैं, उनके पास संग्रहित धान इतने नहीं होते कि वे वर्ष भर इससे अपनी आजीविका चला सकें. न ही राज्य में मजदूरी की इतनी उप्लब्धता जिस वज़्ाह से वे अपनी आजीविका हेतु किसी अन्य राज्य मसलन उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, जम्मू-काष्मीर, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक आदि राज्यों में पलायन कर जाते हैं जिस वर्ष छत्तीसगढ़ मे सूखा पड़ता है यह पलायन की दर और बढ़ जाती है. एक अंकडे़ के मुताबिक 2001 में पडे़ सूखे की वज़्ाह से 20,000 गांव से 6 लाख से अधिक मजदूरों का पलायन हुआ था.
वहीं 18 लाख के आस-पास यहां भूमिहीन मजदूर भी हैं खासतौर से पलायन जिन जिलों से अधिक होता है उनमें बिलासपुर, जांजी-चाम्पा, महासमुंद आदि हैं यहां जमीन प्रति एकड़ से भी कम है ऐसी स्थिति में ठेकेदार इन्हें एडवांस देकर लेजाते हैं और दिन-रात काम के बदले अपने मन मुवाफ़िक रकम ही देते हैं. कई बार दिया हुआ एडवांस चुकता नही होने पर इन्हें फिर से उसी रकम पर वहीं जाना पड़ता है या फिर नियोक्ता इन्हे आने की अनुमति ही नहीं देता. ऐसी स्थिति में महिलाओं के साथ दुवर््यवहार भी होता है. कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमे मजदूर बंधक बनकर गये और उन्हें छोड़ने के लिये परिजनों से पैसा भी मांगा गया.
बंधक बनकर जाने वाले मजदूरों के दवा पानी राशन आदि की सुविधा कई नियोक्ता करते भी हैं तो अंत मे उनकी मजदूरी जो प्रायः अनुबंधित मजदूरी से कम होती है उसमें से काट लिया जाता है. मजदूर अनपढ़ होते हैं अतः उन्हें सही-सही पता नहीं चल पाता कि उन्हें कितना मिलना चाहिये कितना नहीं. नियोक्ता लौटते वक्त जितना देता है उतना ही लेने के लिये वे मजबूर रहते हैं. विस्थापित होने वाले ज्यादातर बंधुआ मजदूर ईंट भट्ठों पर काम के लिये अपने परिवार के साथ जाते हैं जिन्हें 1000 ईंट बनाने का 120-130 रूपये दिया जाता है पर यह दर सभी के लिये समान रूप से लागू नहीं होती यह उनके द्वारा लिये गये दादेन ( एडवांस) पर निर्भर करती है कई बार वे मुफ्त में भी काम करते हैं .
कई मामले ऐसे भी हैं जहां उनके मजदूरी का पैसा एक वर्ष के लिये रोक लिया जाता है यानि इस वर्ष का अगले बरस. इससे होता यह है कि मजदूर अगली बार नियोक्ता तक खुद पहुंच जाता है और उससे बंधने के लिये मजबूर होता है. यह पलायन अक्टूबर माह से चालू होता है और मई तक मजदूर लौट कर फिर अपने गांव आते हैं.
छत्तीसगढ़ व अध्ययन के लिये चुने गये उड़ीसा के जिले आधिकांसतः आदिवासी बाहुल्य हैं. सतत क्रम में अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि आदिवासियों का विस्थापन हाल के वर्षों में बढ़ा है, इससे पहले उनका विस्थापन कम होता था. सरकारी तौर पर हाल में काफी सख्ती विस्थापित होने वाले मजदूरों को लेकर बरती गयी. मसलन गांव के स्तर पर समितियां भी बनायी गयी, ग्राम उत्कर्ष योजना के तहत विस्थापन के समय में गांव में कार्य हेतु पैसे आबंटित किये गये, स्टेशन बस स्टैंड पर पुलिस तैनात की गयी. पर पुलिस मजदूरों के साथ ज्यादती नही करती. वह 10 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ठेकेदारों से ले लेती है और मजदूरों को जाने देती है.
बंधुआ मजदूर अक्सर सपरिवार ही पलायित करते हैं. गांव में केवल बूढे़ बचते हैं जो फसल से उपजे धान से अपनी जीविका चलाते हैं. अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि पलायित होने वाले बंधुआ मजदूर अधिकांशतः अनुसूचित जाति या जन जाति के हैं जिनमे बहुतों के पास न तो घर के जमीन का पट्टा है न ही खेत का, वे जंगल की जमीन पर रहते हैं.
वे अपने युवा बेटियों को कम ले जाते हैं क्योकि उनके साथ दुर्वयवहार होने की आशंका रहती है अतः एडवांस या दादेन लेकर उनकी शादी जल्दी कर देते हैं. ईट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर अक्सर जोड़ों के रूप में ही काम करते हैं. इन्हें किसी तरह की छुट्टी नही दी जाती जिस दिन नियोक्ता इन्हें पैसा देता है उस दिन सामान खरीदने जाने की छूट होती है. न तो नियोक्ता द्वारा इनके लिये किसी शौचालय की व्यवस्था होती है, न ही इन्हें बेतन कार्ड दिया जाता है, बच्चों के लिये पालना घर जैसी कोई सुविधा नहीं होती काम करते वक्त ये अपने बच्चों को साथ लिये होते हैं. इनके घर इनके द्वारा बनाये गये कच्चे ईंट पर घास लगाकर तैयार किये जाते हैं. और अधिकांश मजदूरों को सरकार के द्वारा तय की गयी मजदूरी का पता भी नहीं होता. अतः पलायित मजदूर असुरक्षा के बीच घोर अमानवीय व्यवस्था में जीते हैं.
अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि राज्य के कुछ जिलों में अभी भी ऐसे बंधुआ मजदूर मौजूद हैं जो पारंपरिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ बने हुए हैं. और ये अपने को बंधुआ मानते भी हैं. ये अपने पूरे परिवार के साथ नियोक्ता यानि मालिक के घर पर काम करते हैं और प्रति दिन 700 ग्राम धान प्राप्त करते हैं. ये पूरी तरह से अपने मालिकों के संरक्षण में रहते हैं साथ ही जब इनकी अगली पीढ़ी बड़ी होती है तो वह भी वही काम करने लगती है प्रायः ये खेती, किसानी व घरेलू काम ही करते हैं व मालिक द्वारा कहीं पर भेज कर भी काम करवाया जाता है. जिसका पैसा मालिक खुद प्राप्त करता है. बीमार होने पर मालिक की तरफ से दवा करवा दी जाती है पर यह बीमारी पर निर्भर करता है. किसी गंभीर बीमारी की वज़्ाह से कई बार इनके सदस्यों की मृत्यु भी हो जाती है.
छत्तीसगढ़ के कई जिले ऐसे हैं जिनका विकास औद्योगिक क्षेत्र्ा के रूप में हुआ है. मसलन सिलतरा, उर्ला, भिलाई, दुर्ग राजनांदगांव आदि इन औद्योगिक ईकाईयों में राज्य व राज्य के बाहर से मजदूर लाखों की संख्या में काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों से यहां नियमित मजदूरों की संख्या घटी है और ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा मिला है. स्वयं भिलाई स्टील प्लांट में 90 के दशक में जहां पहले 96,000 के आस-पास मजदूर थे, उनकी संख्या घटकर महज़्ा 27,000 के आस-पास पहुंच गयी है, और इतने ही के आस्-पास संख्या में मजदूर ठेकेदारों की नियुक्ति पर काम करते हैं. बाकी संख्या के मजदूर मशीनीकरण की वज़्ाह से हटा दिये गये. ठेकेदारों के मातहत काम करने वाले मजदूर एडवांस लेकर उनके बंधुआ बनते हैं जबकि उर्ला व सिलतरा क्षेत्र्ा में जहां स्पंज आयरन व पावर प्लांट की बहुलता है वहां अधिकांस संख्या में ठेकेदारी प्रथा लागू है जो कि एडवांस देकर बधुआ बने मजदूरों पर आधारित है. आने वाले बंधुआ मजदूर बस्तर, व दांतेवाडा जैसे जंगलों के आदिवासी भी हैं जो पहले अपनी आजीविका जंगलों में खोज लिया करते थे पर कम होते व कटते जंगलों से इनके आजीविका की समस्या बढ़ रही है और ये पलायित होने व बंधुआ बनने को मजबूर हो रहे हैं. इन मजदूरों के लिये न ही कोई षौचालय की व्यवस्था की गयी है न ही पीने के साफ पानी की आस-पास के तालाबों में ये स्नान करते हैं, जहां का जल इन कम्पनियों के प्रदूषण से काला हो चुका है. स्थिति ये है कि आधे घंटे सड़क पर रहने के बाद कई कि.मी. के इलाके में फैले प्रदूषण की वज़्ाह से मुंह पर कालिख जम जाती है. यहां की फसलें काली होने की वज़्ाह से बिक्री में भी समस्या होती है कई बार मजबूर होकर सरकार खरीदती है. अन्यथा किसानों के यहां सड़ जाता है. इन काम करने वाले मजदूरों को ठेकेदार 1500 से 2000 रूपये मासिक देता है और 12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है.प्रायः ये अकुशल श्रमिक के रूप में देखे जाते हैं यही हालत अन्य कई क्षेत्र्ा में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा बंधक मजदूरों के साथ भी है जो सड़क निर्माण से लेकर चावल मिल में काम करते हैं दृ अतः ठेकेदारी की बड़ती प्रथा ने बंधुआ मजदूरों के स्वरूप को बदल दिया है. जिससे बंधुआ का जो संवैधानिक विश्लेषण है उसके तहत इन्हें पहचानना मुश्किल है.
चन्द्रिका

30 जून 2009

आतंकित होकर आतंकवाद का ठप्पा

हम देशद्रोही हैं और अब आतंकवादी भी, ऎसा कुछ देशप्रेमियों का कहना है. लालगढ़ पर लिखे पिछले दो टिप्पणियों पर कई लोगों की प्रतिक्रियायें मेल व फोन पर आयी, जिनमे कुछ लोगों ने अभद्र शब्दों के साथ हमे यह सर्टिफिकेट दे डाला। इन देश प्रेमियों के देश प्रेम के बारे में हमे नहीं पता कि इनका देश प्रेम क्या है और देश का ये क्या मायने लगाते हैं, जिससे उन्हें प्रेम है और जिसके हम खिलाफ हैं। मसलन देश का अर्थ क्या देश की वह पुलिस है जो लालगढ़ के गाँवों बेलासोल, कुलदहा, कोरमा, अमचोर, महतोपुर, बिमटोला, जम्बोनी आदि में लूट रही है, वहाँ के बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं पर अत्याचार कर रही है या देश वह जमीन का टुकडा़ है जिसे जिंदल को दिया जा रहा है या देश वहाँ के राज्य सरकार की इच्छा है या देश चिदम्बरम मनमोहन के हाँथ का डंडा है या फिर देश वहाँ के वे आदिवासी लोग जिन्हें बेदख़ल किया जा रहा है. देश के इतने सारे खाँचों में हम उस देश के साथ हैं जो वहाँ के लोगों की इच्छा से निर्मित हो शायद एक लोकतांत्रिक देश के मायने यही होंगे. ऎसे में इनकी स्थितियों को लिखना यदि देशद्रोही होना है तो जनलोकतंत्र की व्यवस्था ही देशद्रोही हो जायेगी. इस आधार पर किसी को देशद्रोही या आतंकी साबित करना महज़ चिदम्बरम व मनमोहन सिंह की जुबान होना भर है. दरअसल मीडिया उद्योग ने हमारी मानसिकता का ऎसा निर्माण कर दिया है कि हम सरकारी सोच के हो गये हैं, मसलन सरकार की सभी क्रियायें हमारे लिये लोकतांत्रिक हो गयी हैं. सरकार जिसे आतंकवादी कहती है वह आतंकवादी है, और जिसे देशद्रोही, वह देशद्रोही. हम लोकतंत्र की अवधारणा में रखकर घटनाओं को देखना भी भूल चुके हैं. क्योंकि लोकतंत्र के चौथे खंभे का ढोल पीटती मीडिया सत्ता का चौथा खम्भा बन चुकी है जिस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है कारण कि देश दुनिया की घटनाओं पर हमारी राय मीडिया से ही निर्मित होती है और हम घटनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर न देख पाने में मजबूर हैं. पर हमें मीडिया को समझने के तरीके इज़ाद करने होंगे.
जय हो के नारे के साथ केन्द्र में आयी सरकार ने २२ जून को भारतीय राज्य में माओवादी संगठन को आतंकवादी घोषित कर उन पर प्रतिबंध लगा दिया और लालगढ़ में पुलिस ने कब्जा कर लिया. इस पुलिस कब्ज़ेदारी के साथ गाँवों की तलाशी जारी है. सुरक्षाबल अपने कैम्प जमाकर देश की सुरक्षा में तैनात हैं, यानि देश के एक छोटे से हिस्से की सुरक्षा. जहाँ के अधिकांश लोग असुरक्षित होकर गाँवों से भाग गये हैं पर सुरक्षा जारी है, जंगलों के उन पेडो़ की जो भाग नहीं सकते, जमीन की जो खिसक नहीं सकती, बाकी जितने लोग बचे हैं उनके लिये उतनी बंदूकें सरकार ने भेज दी हैं, पर वे या तो बूढे़ हैं या बच्चे इनके लिये लात, घूंसे और डंडे ही काफी हैं. अब ऎसे में लोकतंत्र की परिभाषा जिसे हम रटा करते हैं वह बदल चुकी है. जिसे हम सबको वर्तमान लोकतंत्र के लिये सुधार लेना चाहिये. यानि जनता पर, पुलिस द्वारा, बंदूकों का शासन लोकतंत्र है. यह महज़ पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है बल्कि कश्मीर, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड, आंध्र, छत्तीसगढ़......बाकी के नाम आप खुद याद करें. क्या देश में फासीवाद तभी आता है जब मुसोलिनी नाम का कोई व्यक्ति पैदा हो या फिर यह बुद्धदेव, मनमोहन, रमन, चिदम्बरम नाम के साथ भी आ सकता है. २२ जून को लालगढ़ की स्थिति जानने के लिये कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की एक टीम जिसमें अभिनेत्री अपर्णा सेन, सोनाली मित्रा, कौशिक सेन, कवि जय गोस्वामी, बोलन गंगोपाद्याय गये. उन लोगों ने वहाँ की स्थितियों को देखा और वहाँ के लोगों से बातचीत की, लौटने के बाद सरकार द्वारा जारी प्रताड़ना की निंदा करते हुए इसे रोकने की मांग की तो उन पर केस लगा दिये गये. मेल्दा गाँव में संवाद प्रतिदिन पत्र के फोटोग्राफर ने पुलिस द्वारा पीटे जा रहे महिलाओं, बच्चों के फोटो लेने का प्रयास किया तो पुलिस द्वारा उन्हें पीटा गया. २७ जून को 'नेशनल फैक्ट फाइंडिंग' टीम जिसमे फिल्मकार के.एन.पंडित, पद्मा, दामोदर, टिंकू, एम. श्रीनिवास, राजकोशोर व सुसन्तो जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं व लेखकों को जाने से पहले मिदिनापुर पुलिस स्टेशन में गिरफ्तार कर लिया गया. यानि अब खबर वही मिलेगी जो पुलिस बतायेगी. बाकी सब पर प्रतिबंध, इसे हम क्या कहें? महाश्वेता देवी ने कहा है कि यदि ग्राम रक्षा समिति के मुखिया चक्रधर महतो को गिरफ्तार किया गया तो वे मुख्यमंत्री आवास के सामने घरना देंगी. निश्चित तौर पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लालगढ़ के आंदोलन में माओवादी पार्टी भी सम्मलित थी. जिसे माओवादी नेता ''विकास'' ने स्वीकार भी किया, पर वे किस भूमिका में काम कर रहे थे इसे हमे देखने की जरूरत है. जब आदिवासियों से जमीने छीनी जाने लगी, उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा और सालबोनी प्रोजेक्ट को एक नये आधुनिक राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगी. यानि लालगढ़ में एक ऎसा वाशिंगटन उन आदिवासियों की जमीन पर बन रहा था (ये सारी संज्ञायें मीडिया व नेताओं की हैं ) जिन्हें दो जून की रोटी तक नहीं मिलती. ऎसे में देश की एक मात्र पार्टी चाहे उसे आतंकवादी कहा जायें या कुछ और ने वहाँ के लोगों को संगठित करने का कार्य किया. आधुनिक विकास के ढांचे को नकारते हुए लोगों की मूलभूत जरूरतों को मुखरित किया और उन्हें सम्बल पहुचाया. क्या यह उनका देशद्रोह था? माओवादी पार्टी को लेकर तमाम तरह के भ्रामक प्रचार किये गये मसलन विकास विरोधी होना. वे निजीकरण से चल रहे विकास के खिलाफ़ जरूर हैं पर शिक्षा, स्वास्थ, जैसी सुविधाओं के खिलाफ़ नहीं. भले ही शिक्षा प्रणालियां व नीतियाँ अपने आप में समाज विरोधी हों. ऎसा माओवादी नेताओं से रूचिर गर्ग की हुई बातचीत से पता चलता है. माओवादीयों ने आदिवासियों की मूलभूत जरूरतों को लेकर लड़ने में उन्हें सम्बल दिया है व शिक्षा, स्वास्थ को लेकर अपने आधार इलाकों में जमीनी स्तर से विकास का एक ढांचा भी निर्मित किया है. जिससे उनकी पैठ वाकई सागर में मछली की तरह है. ऎसी स्थितियों में महेन्द्र कर्मा के बयान को सभी राज्य अमल करने पर तुले हैं कि वे सागर को ही सोख जायेंगे. ज़ाहिर है सागर को सोखने के बाद मछलियाँ वहाँ नहीं रह सकती तो क्या हम एक ऎसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में जुटे हैं जहाँ आदिवासियों की प्रजाति को खत्म कर दिया जाय. माओवादियों ने अपने कई वक्तव्यों में इस बात को दोहराया है कि आइ.एस.आई., सिमी, जैसे संगठनों के साथ उनके रिश्ते नहीं हैं और वैचारिक आधार पर होना सम्भव भी नहीं है व सरकार का भी कोई बयान इस बात को लेकर नहीं आया है. इसके बावजूद मीडिया समय-समय पर यह प्रोपोगेंडा चलाती रहती है तो क्या सरकार को मीडिया संस्थानों में रा की जिम्मेदारी दे देनी चाहिये? क्योंकि सरकारी इंटेलीजेंस इसे साबित करने में विफल रहा है. दूसरी बात यह कि सरकार की तरफ से माओवाद को एक आर्थिक, सामाजिक समस्या के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है पर आज जब इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है तो इसके क्या मायने लगाये जाने चाहिये? कि आतंकवाद सामाजिक, आर्थिक कारणों की उपज है. फिर देश में उपजे सामाजिक आर्थिक कारणों के आंदोलन यदि आतंकवादी हैं तो असहमति के लिये वह कौन सी जगह है जहाँ हम आप बोल सकते हैं? अब हमें छोड़ना होगामरने के बाद मौन की परम्पराबटोरनी होगी मरने वाले की आख़िरी चीख़इतने सारे लोगों के रोज़ मरने का मौनहमारी उम्र भर की चुप्पी के लिये काफ़ी हैअपने मरने के पहले की आवाज़हमें अभी से ही निकालनी होगी॥ चन्द्रिका

22 जून 2009

लालगढ़: एक छोटे लोकतंत्र का बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा


वे शांति स्थापना के लिये निकले हैं ज़ाहिर है कब्रिस्तान में शोर नहीं होता....
लालगढ़ को अशांत घोषित कर दिया गया है. इस अशांति के मायने क्या हैं? क्या यह कि तकरीबन १८७ गाँवों में संथाली आदिवासी लोगों ने अपनी कमेटियाँ बना ली हैं, वे अपने सुख-दुख का आपस में निपटारा करने का प्रयास कर रहे हैं, गाँव की किसी समस्या का समाधान गाँव में ही कर लेना चाहते हैं. यानि गाँव के लोगों का गाँव के लोगों पर शासन, एक छोटा सा लोकतंत्र आदिवासी समाज का लोकतंत्र. क्योंकि बडा़ लोकतंत्र बडों का हो चुका है इसलिये उन पर नज़र ही नहीं जाती. बडे़ लोकतंत्र का ढांचा बडा़ है, पुलिस है, फौज़ है, कानून की एक मोटी सी किताब भी है जिसमे पूरी अरब भर जनता को नियंत्रित करने के फार्मूले हैं पर फार्मूले वही लगा सकते हैं जो पढे़ लिखे हों. संथाली आदिवासी की स्थिति तो ये है कि रात के थोडे़ से अंधेरे को अपने भूख के साथ सान कर खा जाता है और सो जाता है. ऎसे में एक छोटा लोकतंत्र बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा बन जाता है. क्या मैं इस बडे़ लोकतंत्र को लोकतंत्र कहूँ? दरअसल वहाँ अशांति यही है कि वहाँ पुलिस और सेना नहीं है. और बिना पुलिस और सेना के कहीं शांति कैसे रह सकती है? क्या आप कल्पना करना चाहेंगे उस स्थान की जहाँ पुलिस हो और लोग अपनी समस्यायें खुद हल कर लेते हों. यानि पुलिस के होने का अर्थ है उन सारी चीजों का होना जो पुलिस के होने के साथ मौजूद होती हैं. लालगढ़ में आज की स्थिति पर कुछ भी कहने से पहले हमे उसकी ऎतिहासिकता में उसे देखना होगा, नवम्बर से अब तक दो बातें स्पष्ट रूप से उभर कर आयेंगी एक तो यह कि आदिवासी अपने जंगल की जमीन को किसी भी स्टील प्लांट के लिये देना नहीं चाहते वे नहीं चाहते कि अपनी जमीनों पर बुलोडोजर चलता हुआ वे देखें, पर सरकार ५००० एकड़, सज्जन जिंदल को देने पर तुली है. दूसरी यह कि वे सेना और पुलिस की सुरक्षा भी नहीं चाहते क्योंकि सुरक्षा के मायने अब वे जान चुके हैं और सुरक्षा से उन्हें खतरा है जिसके बाबत उन्होंने सड़कें काट डाली, आने-जाने के रास्ते बंद कर दिये. कई बार अपनी मांगों के साथ धरने पर बैठे जो कुल छोटी-बडी़ मिलाकर १३ मांगे थी, आस-पास के गाँवों को एकता बद्ध कर रैली निकाली. रैली पर गोली चलायी गयी और युवाओं को मार दिया गया जो सभा की या एकता की अगुवाई कर रहे थे. मानों गोलियों से तीन मांगे पूरी की गयी हों. उनकी जायज़ मांगों को देखते हुए सी.पी.एम. के कई कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ गये. यह सब कुछ ऎसा चल रहा था मानों राज्य में एक नया राज्य कायम हो गया हो. फरवरी में आदिवासी--गैरआदिवासी एकता समिति बनायी गयी. इसके बनाये जाने के क्या मायने लगाये जायें? कि अब तक आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच कोई एकता ही नहीं थी. शायद हां, शायद नहीं. यह एक शांति अभियान था ठीक वैसा ही जैसा सलवा-जुडुम. आदिवासी युवकों को जान से मारा जाने लगा और आदिवासियों द्वारा इन्हें भी इन्हीं के छीने हथियार से. यानि यह अपने स्वरूप में एक दूसरे को मारने की एकता की समिति बनी. मुर्दों की एकता, मरने के बाद चुप रहने की एकता, प्रतिरोध में खून की एकता. आदिवासियों के भूख और वंचना से उठे आक्रोश की एकता को तोड़ने के लिये उनके साथ हमेशा इसी तरह की एकता बनायी गयी.
लालगढ़ अब अशांत हो चुका था उसे शांत करने की जरूरत थी जिसका अर्थ था पुलिस और फौज को दुबारा तैनात किया जाना. क्योंकि हमारे देश में अशांत को शांत करने का एक मात्र यही तरीका है. यहाँ तक की भूख की आग भी पुलिस की तैनाती से शांत होती है. बूट की आवाज़ों से लोगों के कान सहम जायें और आवाज़ें चुप हो जायें. देश के २८ राज्यों में से २४ राज्य ऎसे ही हैं. लालगढ़ में फौज बुलायी गयी अर्ध सैनिक बल आये, पर घुसने में नाकामयाब रहे लोगों ने प्रतिरोध किया उन पर आंसू गैस छोडी़ गयी. लाठियां बरसायी गयी. पुलिस अंदर पहुंच कर घरों की तलाशी की, औरतों को नंगा करके उनकी तलाशी ली जा रही है. पर वह नहीं मिल रहा है जिसे पुलिस ढूढ़ रही है और जो मिल रहा है उसे देख भी नहीं रही. यह है उनकी भूख जो उनके नंगे होने के बाद भी उनके बदन पर चिपकी रह जाती है. अपनी ज़मीन के छीने जाने के प्रतिरोध का हल है अस्मत का लूटा जाना या मौत के घाट उतार दिये जाना. एक तथाकथित अति सभ्य समाज अपने निर्माण के लिये एक पिछ्डे़ कहे जाने वाले समाज के साथ यह सलूक उस समय होता देख रहा है जब दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र का चुनाव हुए दो माह भी नहीं बीते हैं. २० जून को लालगढ़ में पुलिस कब्जा जमाने के सिलसिले में और आदिवासियों को मारा गया, यह ठीक उस समय हुआ होगा जब आप चाय पी रहे होंगे, किसी दफ्तर की .सी. में बैठे रहे होंगे या जहाँ भी रह कर खबर सुनी हो. क्या थोडी़ सी भी कम्पन शरीर में नहीं हुई. शायद सभ्य समाज का निर्माण यही है संवेदनाओं का मर जाना.
ठीक उसी दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य जी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलकर यह बताया कि लालगढ़ के लोगों को ममता बनर्जी उनकी पार्टी का सहयोग मिल रहा है जिसमे माओवादी भी शामिल हैं,यह पहली बार नहीं कहा गया था बल्कि नंदीग्राम से सिंगूर तक कई बार कहा गया पर आश्चर्य कि इसी सहयोग करने के या सम्बन्ध होने के आधार पर बिनायक सेन को जेल होती है और तब तक कैद रखे जाते हैं जब तक वे कुछ नहीं करने लायक बचते यानि हृदय रोग की अवस्था में उन्हें छोडा़ जाता है पर ममता बनर्जी को बुद्धदेव जी जेल नहीं भेज सकते क्योंकि ममता बनर्जी बडे़ लोकतंत्र की बडी़ स्तम्भ हैं.
उनके हाथ में बंदूक है, तो यह उनकी वीरता है.
लोगों के हाथ में बंदूक है तो यह उनका जुर्म क्यों?

21 जून 2009

लालगढ़ आरपेशन या आदिवासी आपरेशन

लालगढ़ में संघर्ष चल रहा है बचे रहने का और उजाड़ दिये जाने का. पर लाल गढ़ के संथाली आदिवासियों का उजड़ना महज़ देश के सबसे बडे़ आदिवासी समाज के एक हिस्से का उजड़ना भर नहीं है.बल्कि यह संथाली समाज का अपने उस प्राचीन भूमि से उजाडा़ जाना है जहाँ वह पहली बार आकर बसा था और यहीं से पूरे देश में फैला था. देश में आज भी सबसे बडी़ संख्या संथाली आदिवासियों की है. तथाकथित सभ्य समाज के निर्माण व सालबोनी सेज परियोजना के निर्माण की प्रक्रिया में जुटे लोग जब आज इन्हें इनकी जमीन से विस्थापित करने पर आतुर हैं तो उसके खिलाफ इन आदिवासी महिला पुरूषों का लामबंद होकर विद्रोह करना लाज़मी है.
अपने जंगल और जमीन को छीने जाने के खिलाफ आदिवासियों का यह पहला विद्रोह नहीं है. इसके पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा मुंडा , तेभागा, तेलंगाना आदिवासी विद्रोह की एक लंबी सूची है पर ये विद्रोह आदिवासियों द्वारा राज्य सत्ता हथियाने को लेकर कभी नहीं किये गये बल्कि इनका स्वरूप अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने को लेकर ही रहा. पूरे देश में जंगल का एक लम्बा क्षेत्र है जहाँ आदिवासी समाज बिना किसी स्वास्थ, शिक्षा, बिजली के जी या मर रहा है. बारिस के दिनों में बाढ़ व मलेरिया से कितने आदिवासी मर जाते हैं
हर साल लोग भुखमरी का शिकार होते हैं. ऎसे में वह अपने जरूरत की पूर्ति जंगल से ही बिना नुकसान पहुंचाये करता है. इनके सीधेपन का फायदा उठाकर इन्हे खरीदा बेंचा जाता है पर विकास की इस अंधी दौड़ में सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है बल्कि जंगल इनके लिये उपनिवेश बन चुके हैं जहाँ किसी भी तरह का फरमान जारी करके आदिवासियों को उसे मानने के लिये बाध्य किया जाता है. तथाकथित सभ्य समाज की जरूरतें बढ़ रही हैं और वह जंगलों पर कब्जेदारी कर इन्हें बेदख़ल करना चाहता है. लालगढ़ का सालबोनी प्रोजेक्ट इसी का एक हिस्सा है. जिसमें जंगल की ५००० एकड़ जमीन को लिया जा रहा है जबकि वन प्राधिकरण नियम के तहत भी यह गैर कानूनी है . ५०० एकड़ जमीन जिंदल स्टील कम्पनी के मालिक द्वारा वहाँ के लोगों से औने-पौने दाम पर खरीदी जा चुकी है पर लोगों को इसकी आधी ही कीमत चुकायी जा रही है और आधी कीमत कम्पनी शेयर के रूप में देने की बात कहकर टाल दी गयी है. जबकि ४५०० एकड़ जमीन जिसे सरकार लेने पर तुली है लोग छोड़ना नहीं चाहते जिसको लेकर वहाँ के आदिवासी एक जुट हो गये हैं .अपने जंगल और जमीन को लेकर हुई एक जुटता व प्रतिरोध को ही माओवाद के रूप में या किसी आतंक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. क्योंकि सरकार की दमन नीति व सेना के सशस्त्र कार्यवाहियों से लड़ने के लिये वहाँ के आदिवासी भी हथियार उठा चुके हैं.
दरअसल सरकार द्वारा जंगल के संसाधनों को पूंजीपतियों के हाँथों में सौंपे जाने पर हो रहे किसी भी प्रतिरोध के दमन का यह नायाब तरीका पिछले कई वर्षों से अपनाया जा रहा है कि वह जल, जंगल, जमीन से जुडे़ आदिवासी प्रतिरोध में माओवादियों का हाथ बताकर आदिवासियों या नागरिकों की हत्यायें व प्रताड़ना का लाइसेंस प्राप्त कर लेती है. ऎसी स्थिति में जंगल का एक बडा़ आदिवासी समाज माओवादी बनाया जा रहा है ताकि सरकार जंगल अधिग्रहण के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध का दमन माओवाद के नाम पर आसानी से कर सके. 22 नवम्बर2008को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने २४ परगना में भाषण देते हुए लालगढ़ में माओवादियों के होने की बात इसीलिये ही कही थी ताकि वे केन्द्र से ज्यादा अर्धसैनिक बल व विशेष रकम मांग सकें.
आज जब इस बात का शोर मचाया जा रहा है कि लालगढ़ में माओवादियों का कब्जा हो चुका है तो लालगढ़ में लोगों द्वारा शस्त्र उठाने की पूरी प्रक्रिया पर हमे गौर करना होगा. आदिवासी जंगल की जमीन दिये जाने के खिलाफ थे इसके बावजूद रामविलास पासवान और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 2 नवम्बर 2008 को सालबोनी स्टील प्लांट का उद्घाटन किया जिसके पश्चात इनके काफिले पर हमला हुआ. इस हमले के फलस्वरूप लालगढ़ के आस-पास के तकरीबन ३५ गाँवों में पुलिस द्वारा लोगों को प्रताडि़त किया गया, उन्हें मारा पीटा गया व महिलाओं की आँख तक फोड़ दी गयी,परियोजना के खिलाफ गाँवों को एक जुट करने वाले युवाओं की हत्या तक कर दी गयी और यह सब माओवादियों का ठप्पा लगाकर किया गया. यदि अपने जमीन और जंगल को बचाने के लिये प्रतिरोध करना माओवाद है तो इतिहास का हर आदिवासी विद्रोह ऐसे ही अपने अस्तित्व की सुरक्षा के साथ हुआ है . जिन बिरसा मुंडा और दूसरे लड़ाकों को वर्तमान सरकार नायक के रूप में स्थापित करती है पर फर्क इतना जरूर है कि वह अंग्रेजी व सामंती सत्ता के खिलाफ था और यह वर्तमान लोकतांत्रिक कही जाने वाली व्यवस्था के खिलाफ है .
इतने दमन के बावजूद आदिवासियों ने जो मांग रखी वे बहुत ही सामान्य थी. उनका कहना था कि पुलिस दमन को खत्म किया जाये, लोगों पर जो आरोप लगाये गये हैं वे वापस लिये जायें, जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन्हे रिहा किया जाय. साथ में उन स्कूल, हास्पिटल व पंचायतों को मुक्त किया जाए जिनमे अर्ध सैनिक बलों ने डेरा डाला हुआ है जो कि कलकत्ता हाई कोर्ट का भी आदेश था. जनदबावो के तहत सरकार ने यह बात मंजूर भी कर ली पर यह लोगों के लिये एक छलावा साबित हुआ. सरकार महज़ उनकी लामबंदी को कम करना चाहती थी. अंततः लोगों ने ७ जनवरी 2009 को सरकार के सामाजिक बहिष्कार यानि क्षेत्र में सरकार की किसी भी संस्था के प्रवेश को वर्जित करने का फैसला लिया, लोगों ने किसी भी तरह के कर व मालगुजारी देने से भी मना कर दिया है. यह सरकार के लिये एक भयावहस्थिति थी जिससे निपटने के लिये सरकार ने छ्त्तीसगढ़ में चल रहे सलवा-जुडुम के तर्ज पर जन प्रतिरोध कमेटी व आदिवासी ओ गैर आदिवासी एकता कमेटी का निर्माण किया गया जिसमें सी.पी.एम. व झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के लोगों को शामिल किया गया है. ये सैकडो़ की संख्या में जाकर गाँवों को लूटते है व लोगों को मारते पीटते हैं .कारणवश लोगों का आक्रोश और भी उभर कर सामने आया है.यद्यपि सी.पी.एम. सरकार इस समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बात कहती रही है पर राजनीतिक हल के तौर पर उसने सिर्फ दमन ही किया है ताकि वह लालगढ़ को भेद सके.
लालगढ़ में जारी असंतोष संथाली समाज के वंचना की पीडा़ है जिसमे विकास के नाम पर हर बार उनका उजाडा़ जाना, उनकी जमीनों को पूजीपतियों के हाथ में बेचा जाना, जिसके बाद नदियों का नालों में बदल जाना तय है. क्योंकि जिस स्टील प्लांट को जिंदल यहाँ स्थापित करना चाहते हैं वह एक बडी़ परियोजना है जिसके शुरूआती दौर में ही ३५,००० करोड़ रूपये लगाये जा रहे हैं व २०२० तक एक करॊड़ मैट्रीक टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जिससे आस-पास के तीन जिले व सुवर्ण रेखा नदी जो वहाँ के लोगों की जीवन रेखा भी है का प्रदूषित होना तय है. अतः यहाँके लोगों के पास सिवाय विरोध के कोई रास्ता नहीं बचता क्योकि सरकार इनकी उन मांगों को भी लागू नहीं कर पा रही है जो मूलभूत अधिकारों के तहत मिलनी चाहिये जिसमे रोजगार, संथाली भाषा और संस्कृति को बढा़वा दिया जाना, व बेहतर स्वास्थ, शिक्षा, व कृषि की सुविधा जैसी १३ मांगे शामिल हैं . पर इनकी मांगे लाठियों से पूरी की जा रही हैं. ऎसे में एक बडे़ क्षेत्र में विस्तृत संथाली आदिवासियों का एक जुट होकर प्रतिरोध करना दमित की एकता है.

29 मई 2009

मुंबई के झोपड़ पट्टी से एक कहानी

शिरीष खरे, मुंबई से
23 जनवरी 2009 की रात दुनिया के लिये भले एक सामान्य रात रही होगी लेकिन शांतिनगर, मानपूर खूर्द की नूरजहां शेख के लिए नहीं. आखिर इसी रात तो उनके सपनों का कत्ल हुआ था. अपनी सूनी आंखों से खाली जगह को घुरती हुई नूरजहां अभी जहां बैठी हैं, वहां 23 जनवरी से पहले तक 18 गुणा 24 फीट की झोपड़ी थी, जिसमें एक परदा लगा कर कुल दो परिवारों के तेरह लोग रहते थे.
लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की याद दिलाने वाले गणतंत्र दिवस के ठीक 3 दिन पहले ही सारे नियम कायदे ताक पर रख कर नूरजहां शेख की बरसों की जमा पूंजी माटी में मिला दी गयी. 26 जनवरी के 3 रोज पहले सरकारी बुलडोजर ने उनकी गृहस्थी को कुचल डाला. अपनी जीवन भर की कमाई को झटके में गंवाने वाली नूरजहां अकेली नहीं थीं. उस रात मानपुर खुर्द की करीब 1800 झुग्गियां उजड़ीं और 5000 लोगों की जमा-पूंजी माटी में मिल गई.अंबेडकरनगर, भीमनगर, बंजारवाड़ा, इंदिरानगर और शांतिनगर अब केवल नाम भर हैं, जहां कल तक जिंदगी सांस लेती थी. अब इन इलाकों में केवल अपने-अपने घरों की यादें भर शेष हैं, जिनके सहारे जाने कितने सपने देखे गये थे. आज हज़ारों की संख्या में लोग खुले आकाश के नीचे अपनी रात गुजार रहे हैं. यह बच्चों की परीक्षाओं के दिन हैं लेकिन शासन ने पानी के पाइप और बिजली के खम्बों तक को उखाड़ डाला. इस तरह आने वाले कल के कई सपनों की बत्तियां अभी से बुझा दी गईं. ताक पर कानूनप्रदेश का कानून कहता है कि 1995 से पहले की झुग्गियां नहीं तोड़ी जाए. अनपढ़ नूरजहां शेख के हाथों में अंग्रेजी का लिखा सरकारी सबूत था. उसे पढ़े-लिखे बाबूओं पर पूरा भरोसा भी था. लेकिन शासन ने बिना बताए ही उसके जैसी हजारों झुग्गियां गिरा दी. नूरजहां की पूरी जिदंगी मामूली जरूरतों को पूरा करने में ही गुजरी है. अपनी उम्र के 50 में से 27 साल उसने मुंबई में ही बिताए. वह अपने शौहर युसुफ शेख के साथ कलकत्ता से यहां आई थी. दोनों 9 सालों तक किराए के मकानों को बदल-बदल कर रहते रहे.नूरजहां अपने शौहर पर इस कदर निर्भर थीं कि उन्हें मकान का किराया तक मालूम नहीं रहता था. 1995 में युसुफ शेख को बंग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया. जांच के बाद वह भारतीय निकला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उसके इस बस्ती में रहने का उल्लेख किया. युसुफ शेख जरी कारखाने में काम करते हुए समय के पहले बूढ़ा हुआ और गुजर गया. तब नूरजहां की जिंदगी से किराए का मकान भी छिन गया. कुछ लोग समुद्र की इस दलदली जगह पर बसे थे. 18 साल पहले नूरजहां भी अपने 6 बच्चों के साथ यही आ गईं.
इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. नूरजहां का पहला बेटा शादी करके अलग हुआ मगर दूसरा उसके साथ है. वह जरी का काम करता है और 1500 रूपए महीने में घर चलाने की भारी जिम्मेदारी निभाता है. उससे छोटी 2 बहिनों ने दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया. आर्थिक तंगी से जूझता नूरजहां का परिवार अब बेहतर कल की उम्मीद भूल बैठा है. मुश्किल भरे दिनउस रोज जब 1 बुलडोजर के साथ 10 कर्मचारी और 20 पुलिस वाले मीना विश्वकर्मा की झुग्गी तोड़ने आए तब उसका पति ओमप्रकाश विश्वकर्मा घर पर नहीं था. उस वक्त मीना सहित बस्ती की सारी औरतों को पार्क की तरफ खदेड़ा दिया गया. मीना ने कागज निकालकर बताना चाहा कि उसकी झुग्गी गैरकानूनी नहीं है. 2008 को दादर कोर्ट ने अपने फैसले में उसे 1994 से यहां का निवासी माना है. लेकिन वहां उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.बसंती जैसे ही मां बनी, वैसे ही बस्ती टूटने लगी. उसके यहां बिस्तर, दरवाजा, अनाज के डब्बे और टीवी को तोड़ा गया. पीछे से पति हुकुम सिंह ने सामान निकाला लेकिन गर्म कपड़े और खिलौने यहां-वहां बिखर गए. अब बहुत सारे बच्चे खिलौने और किताबें ढ़ूढ़ रहे हैं. हुकुम सिंह सालों पहले आगरा से सपनों के शहर मुंबई आया था जहां 2005 में उसने बसंती से प्रेम-विवाह किया. अब जब उनके जीवन में सबसे सुंदर दिन आने थे, उसी समय जीवन के सबसे मुश्किल दिनों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी. अब बसंती भी बाकी औरतों की तरह खुले आसमान में सोती हैं. ओस की बूदों से उसके बच्चे की तबीयत नाजुक है. उसे दोपहर की धूप भी सहन नहीं होती. इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. बस्ती के लोग याद करते हैं कि सरकारी तोड़फोड़ से पहले विधायक यूसुफ अब्राहीम ने इंदिरानगर मस्जिद में खड़े होकर कहा था कि आपकी झुग्गियां सलामत रहेंगी. लेकिन अतिक्रमण दस्ते ने इंदिरानगर की मस्जिद को तो तोड़ा ही बस्ती के कई मंदिरों को भी तोड़ा.किस्से सैकड़ों हैंबस्ती तोड़ने का यह अंदाज नया नही है. पहली बार 1993 में शासन ने करीब 500 झुग्गियां तोड़ने की बात मानी थी. मतलब 1995 के पहले यहां कम-से कम 500 परिवार तो थे ही. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 1993 से 2008 तक इस बस्ती को 119 बार तोड़ा गया. लेकिन पिछली कार्यवाहियों के मुकाबले इस कार्यवाही से पूरी बस्ती का वजूद हिला गया है.
समुद्र से लगी भीमनगर की जमीन पर बरसों से बिल्डरों की नजर है. लोग बताते हैं कि 1999 के पहले यह जमीन समुद्र में थी जिसे स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर रहने लायक बनाया. लेकिन 2001 में खालिद नाम के बिल्डर ने दावा किया कि यह जमीन जयसिंह ठक्कर से उसने खरीदी है. वह झुग्गी वालों को यह जमीन बाईज्जत खाली करने की सलाह भी देने लगा. इसी साल उसकी गाड़ी से एक बच्चे की मौत हुई और वह इस केस में उलझ गया. फिर 2008 में बालकृष्ण गावड़े नाम का एक और बिल्डर आया और दावा किया कि जयसिंह ठक्कर के बेटे से उसने यह जमीन खरीदी है. हालांकि मुंबई उपनगर जिला अधिकारी से मिले पत्र में यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की संपत्ति के रुप में दर्ज है. ‘समता’ संस्था की संगीता कांबले बताती हैं- “ 1998 में इस बस्ती का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. लेकिन वर्ष 2000 का सर्वे महज 2 दिनों में निपटा लिया गया. जबकि इस दौरान यहां के मजदूर काम पर गए थे और कई झुग्गियां खार में फंसे होने के कारण छोड़ दी गईं थीं. उपर से 2005 में आई मुंबई की बाढ़ इन झुग्गियों में रहने वालों के सारे कागजात बहा ले गई. फिर भी यहां के 75 फीसदी लोगों ने साल 2000 के पहले से रहने के सबूत इकट्ठा किए हैं. ऐसे परिवारों को उनकी झोपड़ियों का पट्टा मिलना चाहिए.”कब्जे की होड़“ घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन” ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत जो जानकारियां एकत्र की हैं, उसके अनुसार मुंबई में जगह-जगह बिल्डर और ठेकेदारों का कब्जा है. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन शहर में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन 80 साल के लिए लीज पर दी गई. ऐसा ही इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसी तरह मुंबई सेन्ट्रल में बन रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. लेकिन यहां की 12.2 मीटर जमीन डीपी मार्ग के लिए है. यह काम झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के तहत होना है. लेकिन टावर के बहाने गरीबों की करोड़ों रूपए की जमीन घेर ली गई है.
मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, लेकिन शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है.
90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया गया जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन हथियाई गई. आज काम्पलेक्स का कैंपस लाखों वर्ग फिट से अधिक जगह पर फैला हैं. इनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल हैं. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए थी, अब उसे भी छोटे व्यापारियों से छीन लिया गया है.पूरी व्यवस्था कई तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है. मानपुर खुर्द जैसी झुग्गियों में रहने वालों को वोट देने का हक तो है लेकिन आवास में रहने का नहीं. मतलब हर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए इनका वोट तो चाहती है लेकिन उसके बदले जीने का मौका नहीं देना चाहती. लोग मानते हैं कि मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, वह मेहनजकश मजदूरों के बिना पूरा नहीं हो सकता. फिर भी शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है. एक अघोषित एजेंडा यह है कि शहर की झोपड़पट्टियों को तोड़कर भव्य मॉल और कॉम्पलेक्स बनाए जाएं. लेकिन सवाल है कि इन इमारतों को बनाने वाले कहां जाए ?

26 मई 2009

जन संघर्षों की जीतः

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की जेल में बंद नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले डॉ विनायक सेन को सोमवार को ज़मानत दे दी है.
न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू और दीपक वर्मा की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि डॉ सेन को निजी मुचलके पर स्थानीय अदालत से ज़मानत दे दी जाए.
डॉ सेन पिछले दो वर्षों से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद हैं. राज्य सरकार का आरोप है कि उन्होंने राज्य में सक्रिय माओवादियों की मदद की है और उनके समर्थक रहे हैं.
पर डॉक्टर बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.
बिनायक सेन की ज़मानत के बारे में जानकारी देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद को बताया, "बिनायक को ज़मानत की ख़बर मानवाधिकारों के लिए लड़ाई कर रहे लोगों के लिए इस मामले में पहली जीत है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिला है जिसे आज ही एक कार्यकर्ता के हाथों रायपुर भेजा जा रहा है. मंगलवार को इस आदेश के आधार पर बिनायक रिहा किए जा सकते हैं."
उनकी बेटी अपराजिता सेन ने बीबीसी को बताया, "मेरे लिए और पूरे परिवार के लिए आज का दिन एक भावुक दिन है. दो वर्षों से बिना किसी अपराध के मेरे पिताजी हिरासत में रहे. अब मेरे परिवार को एकसाथ मिलने का मौका मिला है. मैं जल्द से जल्द उनसे मिलना चाहूंगी."
बिनायक का व्यक्तित्व
पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि लेते रहे हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ में समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.
इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.
डॉ बिनायक सेन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार करने के लिए बनी छत्तीसगढ़ सरकार की एक सलाहकार समिति के सदस्य रहे और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ सेन के सुझावों के आधार पर सरकार ने ‘मितानिन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया.
इस कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार की जा रहीं हैं.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.
डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं.
इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.
नक्सली आंदोलन और बिनायक
उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.
सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. इस कार्यक्रम को विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी पूरा समर्थन प्राप्त है.
छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 2005 में जब छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम लागू करने का फ़ैसला किया तो उसका मुखर विरोध करने वालों में डॉ बिनायक सेन भी थे.
उन्होंने आशंका जताई थी कि इस क़ानून की आड़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
उनकी आशंका सही साबित हुई और इसी क़ानून के तहत उन्हें 14 मई 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया था .
बीबीसी हिन्दी से साभार

11 मई 2009

भारतीय पुलिस और डॉ विनायक सेन के जीवन पर खतरा

यह पत्र डॉ विनायक सेन की पत्नी इलीना सेन द्वारा 22 अप्रैल, 2009 को भेजा गया है।
प्यारे साथियो,

मैं कुछ बेहद पीडाजनक अनुभवों को यहां आपके साथ बांट रही हूं। हमारे पास इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि छत्तीसगढ पुलिस विनायक सेन की स्वास्थ्य की देखभाल की जरूरतों में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है. मैं तथ्यों को आपके सामने रख रही हूं.कई वर्षों से हाइपरटेंसिव के मरीज रहे विनायक रायपुर में एकमात्र कार्डियोलॉजी में डीएम डॉक्टर आशीष मलहोत्रा, जो निजी तौर पर चिकित्सा कर रहे हैं, के यहां कार्डियाक एसेसमेंट टेस्ट के दौरान एंजाइना से ग्रस्त पाये गये. वे 2007 में और उसके बाद अपने डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाएं ले रहे थे. जेल में 2008 के दिसंबर और इस वर्ष जनवरी-फरवरी में कभी-कभी व्यायाम के बाद उन्हें सीने में और बायें हाथ में झुनझुनी दर्द की शिकायत हुई. उन्होंने जेल अधिकारियों को इसकी सूचना दी और जब इस बारे में कुछ भी ठोस नहीं किया गया (जेल अस्पताल में सुविधाएं नहीं हैं) उन्होंने अदालत को इसकी सूचना दी. उनकी ओर से 17 फरवरी, 2009 को एक आवेदन इस आग्रह के साथ अदालत में दाखिल किया गया कि उन्हें अपनी पसंद की सुविधाओंवाले अस्पताल में-सीएमसी, वेल्लोर को तरजीह देते हुए-इलाज कराने की इजाजत जेल अधिनियम-1894 की धारा 39-ए के तहत दी जाये, जो जेल अधीक्षक को कैदी अथवा उसके परिवार द्वारा बांड भरे जाने और अधीक्षक द्वारा रखी गयी शर्तों की बाध्यता के साथ उन्हें अपनी पसंद के इलाज की अनुमति देने में सक्षम बनाता है. 20 फरवरी, 2009 को जज ( इस मामले को देख रहे 11वें अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश बीएस सलूजा) ने जेल अधिकारियों को विनायक सेन के हृदय की स्थिति के बारे में मेडिकल बोर्ड की राय हासिल करने का आदेश दिया, ताकि विनायक के आवेदन पर सही निर्णय लिया जा सके.विनायक 20 फरवरी, 2009 और 17 मार्च, 2009 के बीच कभी रायपुर जिला अस्पताल ले जाये गये, जहां उन्हें देखनेवाले डॉक्टरों ने इसीजी और इकोकार्डियोग्राफ की सलाह दी.17 मार्च को विनायक ने अदालत से शिकायत की कि उनके इलाज के आग्रह पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है और यह कहते हुए वे थोडे भावुक हो गये कि उन्हें लगता है कि कोर्ट के लिए उनके जीवित रहने या मर जाने का कोई अर्थ नहीं है. जज भी समान रूप से विचलित थे और मैं सबूतों के रखे जाने और आरोपित के वापस जेल ले जाये जाने के बाद उनसे निजी तौर पर मिली ताकि मैं उन्हें समझा सकूं कि जितना रेकार्ड किया गया है, विनायक की स्थिति उससे कहीं अधिक की मांग करती है. जज नरम दिखे और 18 मार्च को विनायक से अदालत में पूछा कि वे रायपुर में किस डॉक्टर से दिखाना चाहेंगे, जो यह तय करेगा कि उन्हें वेल्लोर के लिए भेजे जाने की जरूरत है या नहीं और इस पर विनायक द्वारा डॉ आशीष मलहोत्रा का नाम लिये जाने के बाद उन्होंने जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि वे विनायक को डॉ मलहोत्रा को दिखायें ताकि यह जाना जा सके कि उन्हें आगे के इलाज के लिए रेफर करने की जरूरत है या नहीं.विनायक 25 मार्च को डॉ आशीष मलहोत्रा को दिखाये गये. अदालत के 18 मार्च के आदेश के आधार पर जेल अधीक्षक ने पुलिस से आग्रह किया कि वह विनायक को दिखाने ले जाने के लिए सुरक्षा गार्ड मुहैया कराये. इसके बाद सशस्त्र पुलिस बल से भरी एक बस विनायक को डॉ मलहोत्रा से दिखाने सुबह 10 बजे के करीब ले गयी और मुझे डॉ मलहोत्रा के यहां से पुरानी रिर्पोंटों के लिए 10.30 में फोन आया. मैंने ऐसा किया और अधिकतर कंसल्टेशन के दौरान मौजूद रही. जेल अधीक्षक के आग्रहवाले पत्र कि वे सीएमसी, वेल्लोर रेफर किया जाने, इसीजी, इकोकार्डियोग्राफ और ट्रेडमिल टेस्ट की आवश्यकता पर स्पष्ट राय दें, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विनायक को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) है और उन्हें एंजियोग.्राफी और आगे की जांच के लिए वीएमसी, वेल्लोर रेफर कर दिया ताकि एंजियोप्लास्टी/कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी हो सके. मैंने प्रिस्किप्शन की फोटो प्रति अपने रिकार्ड के लिए रख ली, क्योंकि मुझसे पूरी प्रक्रिया के लिए भुगतान करने को कहा गया.मैं विनायक से 26 मार्च को जेल में मिली और दक्षिण भारत में यात्रा के दौरान सुविधाओं पर बात की. मुझे झटका लगा जब अधीक्षक ने कहा कि विनायक की जांच और इलाज वेल्लोर में नहीं, रायपुर में होगा. किसी गलती को महसूस करते हुए मैंने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन किया कि मुझे जेल और डॉक्टरों के बीच विनायक सेन के इलाज के संदर्भ में हुए पत्राचारों को दिखाय जाये. ये मेरे हाथ में आये अंतिम दस्तावेज हैं.इलाज की कहानी के अंत पर आने से पहले मैं यह बताना चाहूंगी कि जेल ने 31 मार्च को विनायक को रायपुर में एस्कॉटर्स हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की और मेरी पिछली मुलाकात में हुई बातों के अनुसार विनायक ने यह कहते हुए कि, जैसा कि जेल अधीक्षक का भी निर्देश है, वे छत्तीसगढ में कहीं भी इलाज कराने को इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उनका जीवन खतरे में पड जायेगा, लिखित तौर पर वहां जाने से इनकार कर दिया. उनका यह जवाब एक टिप्पणी के साथ 31 मार्च को अदालत में आगे के निर्देश के लिए प्रस्तुत किया गया. अदालत ने लोक अभियोजक को इसे भेजते हुए सात दिनों में जवाब देने को कहा. मेरी जानकारी में अब तक ऐसा कोई जवाब नहीं दाखिल किया गया है. विनायक ने डॉ मलहोत्रा द्वारा लिखी गयी दवा (रींीर्ीिंर ीींरींळ)ि लेना शुरू कर दिया और कुछ लाक्षणिक राहत की सूचना दी.आरटीआइ के नतीजों पर आते हैं. मुझे अब डॉ मलहोत्रा का 25 मार्च का मूल रेफरल लेटर मिला है. लेकिन जेल अधीक्षक के नाम उनके सवाल को उद्धृत करता 26 मार्च का एक दूसरा पत्र भी था, जिसमें उन्होंने राय दी है कि एंजियोग्राफी की सुविधाएं छत्तीसगढ में एस्कॉटर्स, अपोलो, भिलाई मुख्य अस्पताल, रामकृष्णा अस्पताल और दो अन्य जगहों पर है. उन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने डॉ सेन को वेल्लोर इसलिए रेफर किया क्योंकि पत्र उनसे ऐसा करने के लिए कहता था. इससे जुडे सवाल ये हैं : डॉ मलहोत्रा के पास दूसरी बार पत्र क्यों भेजा गया÷ यदि जेल अधीक्षक ने ऐसा पत्र भेजा तो किसने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया÷ यह पूरी तरह अदालत की अवहेलना है. डॉ मलहोत्रा से कोर्ट ने यह जानना चाहा था कि वेल्लोर भेजे जाने की जरूरत है या नहीं, इस पर अपनी राय जाहिर करें. अदालत ने डॉ मलहोत्रा से छत्तीसगढ में मेडिकल सुविधाओं की व्यापकता के बारे में नहीं पूछा था.डॉ मलहोत्रा बेशक दबाव में थे, जब उन्होंने कहा कि उन्होंने विनायक को वेल्लोर रेफर किया था, क्योंकि पत्र उन्हें ऐसा करने को कहता था. किसी मामले में अपने मरीज के साथ हुए या नहीं हुए उनके संवाद विशेषाधिकार प्राप्त सूचना माने जाते हैं.यदि एक डॉक्टर पब्लिक सेक्टर का नहीं है, इस हद तक डराया जा सकता है, जो एस्कॉटर्स, अपोलो आदि के डॉक्टरों को भी कहा जा सकता है, जो कि मेडिकल कॉलेज में स्थापित निजी मेडिकल संस्थान हैं (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बडे उदाहरण, जिनमें सभी मानव संसाधन सार्वजनिक सेक्टर के होते हैं लेकिन ब्रांड नेम और आगे के लिए रेफरल विकल्प निजी होते हैं).इन हालात में विनायक बिल्कुल सही हैं कि उनका जीवन छत्तीसगढ के किसी सरकारी नियंत्रणवाले अस्पताल में खतरे मे पड सकता है.दरअसल मैं अब चिंतित हूं कि पुलिस/अभियोजक का प्लान ए (विनायक को बदनाम करो और दोषी साबित करो) संकेत दे रहा है कि वे अब प्लान बी (छत्तीसगढ में किसी अस्पताल में इलाज के दौरान किसी से कह कर-जैसे कुछ बूंदों के साथ हवा इंजेक्ट कर के- उनकी हत्या कर दो) लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.मैं सभी साथियों से अपील करना चाहूंगी कि विनायक की शारीरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इस सामग्री का प्रकाशन करें, इसके बारे में लिखें, उच्च न्यायालयों और राजनेताओं से अपील करें. यह बहुत जरूरी है.मैं यह कहते हुए अंत करना चाहती हूं कि जिसकी हम मांग कर रहे हैं, पसंद के अस्पताल में इलाज का-वह भारतीय न्यायिक इतिहास के लिए अनजान नहीं है. दरअसल रायपुर सेंट्रल जेल से ही हत्या के आरोप में जेल में बंद शिवसेना नेता धनंजय सिंह परिहार को सरकारी खर्च पर केइएम अस्पताल, मुंबई, शंकर नेत्रालय, चेन्नई और तीन दूसरे अस्पतालों में 2003 में इलाज के लिए ले जाया गया था. पुलिस विनायक सेन को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडे खतरे के रूप में चित्रित कर रही है. क्या हम उसे ऐसा करने देने जा रहे हैं÷
इलीना
अंगरेजी से अनुवाद : रेयाज उल हक मूलतः मंथली रिव्यू की वेबसाइट पर