06 मार्च 2009

अंजन गाँव में हुई साम्प्रदायिक झड़प पर तथ्य संकलन के आधार पर तैयार की गयी एक रिपोर्ट:-


घटनायें जब घट चुकी होती हैं हमारे पास बताने के लिये ढेर सारे तथ्य होते हैं, हमारी मुट्ठीयों में संकलित आंकड़े की एक पोटली होती हैं और चेहरे पर विवशता की छाया। जब चीख-चीख कर हम गोधरा की नृशंसता का बयान कर रहे होते हैं ठीक उसी समय हमारे आस-पास पसरी होती है एक भयावह चुप्पी, एक लम्बी चीख को समेटती हुई। महाराष्ट्र राज्य के अमरावती जिले में एक छोटी सी तालुका है अंजन गाँव जिसकी आबादी तकरीबन ५१००० है. ५१००० कम तो नहीं होते प्रेम करने के लिये या नफ़रत करने के लिये. २३ फरवरी को हुई हिन्दू मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच एक झड़प के बाद यहाँ के बयान पेश करने के कई अंदाज़ हो सकते हैं, मसलन पुलिस की दख़लंदाजी ने एक और गोधरा होने से बचाया अंजन गाँव को, या मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना. पर सच्चाई कभी एक नहीं होती, दरअसल जरूरी यह होता है कि आप अपनी आँख के किस कोने से कौन सा चश्मा लगाकर घटनाओं को देख रहे हैं. ५१००० की आबादी वाले इस तालुका में मुसलमानों की आबादी १७००० के आस-पास है, २६००० की संख्या में हिन्दू व तकरीबन ६००० बुद्धिस्ट हैं. ये तीनों समुदाय आपस में घनी बस्तियाँ बनाकर इस तरह से रहते हैं कि लोगों में मनमुटाव हो, एक संप्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बातचीत करना बंद कर दे पर घरों की दीवारें हैं कि धूप में अपनी छाया एक दूसरे पर लुढ़का ही देती हैं इस बात का फ़िक्र किये बगैर कि जिस दीवार के कंधे पर वे झुक रही हैं उसके घेरे में किसी अन्य सम्प्रदाय के लोग रहते हैं. इस घनी बस्ती में लोगॊं के घर भले ही छोटे हों, लोगों को रहने के लिये ज़मीन भले ही कम हो पर मंदिरों और मस्ज़िदों को विस्तृत इलाके में बनाया गया है शायद इसलिये कि इश्वर-अल्लाह इतने बड़े होते है कि ज़ाहिराना तौर पर उन्हें बडी़ और विस्तृत जगह की जरूरत है. इस तीन कि.मी. के इलाके में ८ मस्जिदें हैं और मंदिरों की संख्या तो गिनी ही नहीं जा सकती क्योंकि मस्ज़िदों का एक ढांचा होता है पर मंदिर कई बार पेड़ होते हैं, पुलिया होती है या इस पठारी क्षेत्र में कोई भी पत्थर जिसे सिंधूर से रंगा गया है वह मंदिर ही है, उसे हनुमान कह दो या काला पत्थर हो तो शिव जी पर यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आयी कि अपना लिंग छूकर जब लोग इतनी गंदगी महसूस करते हैं कि पानी से हाथ तक धोते हैं तो फिर पत्थर के लिंग पर दूध क्यों बहाते हैं? खैर इलाके की राजनीतिक स्थिति यह है कि कभी यहाँ के सांसद शिवसेना के सदस्य प्रकाश भार साकडे़ जी हुआ करते थे. विधायक के रूप में अब भी वही हैं पर पार्टी बदल दी है और अब कांग्रेस में आ गये हैं पता नहीं विचारधारा बदली की नहीं, अगर कांग्रेस की कोई विचारधारा है तो. पर हां इतना जरूर है कि विचार कपडे़ नहीं हैं जिन्हें तुरंत बदला जा सके. इस मामले पर हमने वहाँ के लोगों, पत्रकारों, शिक्षकों आदि से बात-चीत कर वास्तविक स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया. २३ फरवरी को जब यह घटना हुई उस दिन हिन्दुओं का त्योहार "शिवरात्रि" था. गाँव के एक २५ वर्षीय युवा गजानन विट्ठलराव कराडे़ (एस.सी.) जो कि पेशे से कारपेंटर हैं व शिव सेना के सदस्य भी, शाम के वक्त गाँव के एस.टी. बस स्टैंड की एक दुकान पर अपनी बाइक से आये और सामने की एक पान गुमटी से जब थोडी़ देर बाद लौटे तो उन्हें वहाँ बाइक दिखायी नहीं दी. थोडी़ देर बाद बाइक स्टैंड पर ही एक दुकान के पीछे खडी़ मिली ऎसी स्थिति में गजानन ने मुस्लिम समुदाय को टारगेट करते हुए कुछ गालियाँ देनी शुरू की जिससे वहाँ खडे़ दो मुस्लिम लड़कों जावेद खाँ और यूनुस से झड़प हो गयी पर आस-पास के लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को सम्हाल लिया. ठीक इसी रात जहाँ पर यह घटना हुई थी वहाँ पर स्थित एक मंदिर में पथराव हुआ. पथराव के कारण मस्ज़िद के सामानों को क्षति पहुची कारणवस अब पूरा मामला सुबह तक काफी संगीन हो गया. अब यह मामला दो व्यक्तियों का न होकर दो सम्प्रदायों का हो गया और इस स्थिति में दोनों सम्प्रदायों के बीच २४ तारीख की सुबह १० बजे के करीब झड़प हो गयी जिसमे लोगों की तरफ से पत्थरबाजी हुई और तलवारें व इस तरह के आपत्ति जनक सामान भी निकाले गये पर वहाँ के तत्कालीन एस.पी. स्टालिन की सक्रियता के कारण किसी के आहत होने की कोई घटना रोकी जा सकी. पत्थरबाजी के कारण कुछ लोग घायल जरूर हुए और कुछ को चॊटें भी आयी. लोगों के मुताबिक कुछ दुकानों में तोड़ फोड़ भी हुई जिसकी थाने में २६००० रूपये के हानि की रपट दर्ज करवायी गयी. स्थिति के भयावह होने के आसार को देखते हुए एस.पी. स्टालिन द्वारा पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू घोषित कर दिया गया और वहाँ के थाना प्रभारी ए.यू. कुरैसी का तबादला कर दिया गया. इसके बावजूद भी ८ दिनों तक पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी रहा जिससे वहाँ के व्यापारी से लेकर आमजन काफी परेशान रहे. इस पूरी घटना के दौरान २ मार्च तक तकरीबन २१२ मुस्लिम व २० हिन्दुओं को धारा १४३, ५०४, ५०६,३२३, ४२६,४३५,२७५,२३६, १४७,१४८, १४९, ३२४, ३०६ व १३५ बाम्बे पुलिस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया. जिनमे से अभी भी अधिकांश लोग अमरावती जेल में बंद हैं जबकि मुख्य आरोपी गजानन विट्ठलराव कराडे़ को शिवसेना के सदस्यों द्वारा जमानत लेने पर रिहा कर दिया गया. परन्तु स्थिति की गम्भीरता का आंकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ के मुस्लिम वर्ग के लोग घटना के बारे में कोई भी जानकारी देने से मुकर रहे है. यहाँ तक कि तथ्य संकलन करने गयी टीम के सदस्यों पर कई मुस्लिमों द्वारा यह भी कहा गया कि आप आई.बी. के हो सकते हैं या किसी अन्य संगठन से भी अतः हम आपको जानकारी नहीं दे सकते. जिससे साफ तौर पर पता चलता है कि सरकार से किस तरह का दहसत उनके अंदर है. इसकी एक वज़ह यह भी है कि मुस्लिमों की आबादी आनुपातिक दृष्टि से कम होने के बावजूद भी उनकी गिरफ्तारी भारी संख्या में की गयी है यहाँ तक कि उन मुसलमानों को भी गिरफ्तार किया गया है जो दिशा मैदान के लिये बाहर निकले हुए थे. इस वज़ह से मुस्लिम वर्ग में एक दहसत व खौफ का माहौल बना हुआ है. दूसरी तरफ वहाँ शिव सेना व हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों का भी खौफ बना हुआ है. बात-चीत के दौरान श्री राजेन्द्र बंगले ने हमे बताया कि किसी मुसलमान की यह हिम्मत नहीं है कि वह हमारी गली से सिर ऊपर करके निकल जाय, सब चूहे की तरह जाते हैं. पूरे इलाके का ज़ायज़ा लेने के बाद यह तथ्य सामने आया कि यहाँ पर हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों ने अपने को उस सामान्य अर्थ में नहीं स्थापित किया है जिन अर्थों में आम तौर पर वे कई जगह अपने को स्थापित करती हैं बल्कि यहाँ कई नये तरीके अपनाये गये हैं. मसलन उच्च शिक्षा का संस्थान सारडा कालेज जो उस क्षेत्र का एक नामचीन कालेज है, शिव सेना के द्वारा स्थापित है जिससे वहाँ के युवाओं की नब्ज़ को बेहतर ढंग से पकडा़ जा सके. इस रूप में पूरे हिन्दू समाज में जिस तरह की कट्टर हिन्दू मानसिकता तैयार की गयी है वह अपने में एक भयावह स्थिति है. साथ में हिन्दू संगठनों द्वारा व्यायामशालायें व साखायें भी चलायी जाती हैं. क्षेत्र के अधिकांसतः युवा बेरोजगार हैं और इन संगठनों से जुड़कर किसी तरह की सक्रियता में अपने को व्यस्त रखना चाहते हैं. गौरतलब बात यह भी है कि इन हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों में काम करने वाले अधिकांस युवा ओ.बी.सी. और दलित हैं. पिछले कुछ माह से राजठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) जो कि शिव सेना का ही एक नया रूप है, आसपास के क्षेत्रों में अपना विस्तार किया है. बल्कि यहाँ तक कि पूरे महाराष्ट्र में कुछ संकीर्ण सवालों को उठाकर एक नया हिन्दूवादी संगठन तैयार किया जा रहा है. ऎसी स्थिति में कई मुस्लिमों से बात करते हुए उनके अंदर एक असहाय युक्त रोष जरूर देखने को मिला. तथ्य संकलन के दौरान यह पता चला कि तकरीबन ५० कि. मी. के क्षेत्र में जिसमे अचलपुर, दरियापुर, निज़ामपुर में साम्प्रदायिक बहुलता के आधार पर छोटे बडे़ कट्टरपंथी संगठन खडे़ हो रहे हैं या साम्प्रदायिक मानसिकता का निर्माण हो रहा है. जिसमे बडे़ स्तर पर युवाओं की भागीदारी है इसके पीछे साफ तौर पर जो कारण दिखायी पडा़ वह यह कि बेरोजगार होने की वज़ह से युवाओं की जो उर्जा है उसे साम्प्रदायिक ताकतें आगे आकर अपने तरीके से इश्तेमाल कर रही हैं. आस-पास के जिलों में भी सड़कों के किनारे लगे पोस्टरों व होर्डिंग्स से पता चलता है कि जनमानस में अपने सम्प्रदाय के प्रति आस्था व सर्वोच्चता का पहला पाठ पढा़या किस तरह से पढा़या जा रहा है. रोज-ब-रोज़ बाबाओं की यात्रायें क्षेत्रों में करायी जा रही हैं ताकि लोग सम्प्रदायों में बंटे रहें और जब तक लोग सम्प्रदायों में बंटे रहेंगे साम्प्रदायिकता फैलाने वाली ताकतें किसी न किसी तरीके से इनका इश्तेमाल आसानी से कर ही लेंगी. पूरे तथ्य संकलन के दौरान एक बात साफ तौर पर निकल कर आयी कि अगर इन साम्प्रदायिक ताकतों के चरित्र को लोगों के बीच जल्द से जल्द नहीं खोला गया, भविष्य में इसकी भयावहता से उन्हें नही मुखातिब कराया गया तो यह असम्भव नहीं कि स्थितियाँ बहुत ही विकट होंगी. दूसरे रूप में एक बडे़ तौर पर यह भी कार्य करने की जरूरत है कि लोगों को धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं से उभारा जाये. चूकि धर्म अपने को जितना सहिष्णु कहता है असलियत में वह उतना होता नहीं जिसे अष्टभुजा शुक्ल ने अपने शब्दों में लिखा है. किसी धर्म स्थल के विवाद में तीन हजार लोग बम से दो हजार गोली से एक हजार चाकू से और सौ जलाकर मार डाले जाते हैं चार सौ महिलाओं की इज्जत लूटी जाती है और तीन सौ शिशुओं को बलि का बकरा बनाया जाता है धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ग्यात कीजिये॥

तथ्य संकलन में सहयोगी सदस्य -चन्द्रिका, रजनेश, अनीस, आशीष

03 फ़रवरी 2009

बीते बरस के हाथ एक पत्र:-

हर बरस कुछ इसी तरह बीतता है कि अपने साथ लेकर चला जाता है न जाने कितनी उन चीजों को जिन्हें अभी बचा रहना था दुनिया में और वे बच ही जाती हैं जिन्हें दुनिया से मिटना था. कि पिछला बरस जाते-जाते कितना कुछ तो लेता गया अपने साथ. नये साल की उम्मीदें जार-जार होती दिखती हैं. फिलिस्तीन को होना ही था आबाद पर ऎसा नहीं हो सका. बचे रहना था महमूद दरवेश को कि किया जा सके पानी और बहते लहू में फर्क, पैदा होते ही बच्चों की सांसो में नहीं जाना था बारूद की गंध पर बीते वर्ष की पीठ पर महमूद दरवेश लद कर चले गये और माओं के गर्भ से पैदा होने के पहले बच्चों ने सुने धमाके. क्या बीते बरस से यह शिकायत करूं कि वे जिन्हें तुम लेकर चले गये, दुनिया बदलने के उनके सपने अभी भी आबाद हैं. लोगों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि दुनिया के सबसे बडे़ तानाशाह पर एक अदना सा पत्रकार जूते मार रहा है. वे लोग जिन्हें रोटी नहीं मिल रही है अपने हाँथ का इश्तेमाल बंदूक के लिये करना सीख रहे हैं. गाँधी के नाम पर जो लोग विश्व अहिंसा दिवस मना रहे हैं उनके हाँथों में इराक का कितना खून सना है इसका जिक्र होना ही चाहिये. जेल की सलाखों से बिनायक सेन को निकलना था पर वर्तमान लोकतंत्र का यही तकाज़ा है. वह सब कुछ जिसे धीरे-धीरे दूर होना था वह लोगों के और करीब हो रहा है चाहे वह भूख हो बेरोजगारी या असमानता. मुम्बई में आतंकी हमले हुए जिनमे सैकडो़ लोग मारे गये क्या यह चंद युवावों का जुनून था कि वे आये और कुछ लोगों को मार कर मर गये या दुनिया की तमाम परिस्थितियों से उभरी हुई घटनाओं में यह भी एक घटना थी जिसके कार्य कारण संबंधों पर बात नहीं की जा सकी और करकरे की मौत के बाद अचानक अखबारों से हिन्दूवादी आतंक का एक चेहरा "साध्वी" गायब हो जाता है. हमे यह नहीं पता कि कब पड़ोसी देश से युद्ध शुरू हो जाये पर यह जरूर पता है कि अन्ततः दो देशों के सत्ता की लडा़ई में हम ही मारे जायेंगे. जब दुनिया आर्थिक मंदी की मार झेल रही है इसलिये कि दुनिया का आका अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था में ढह रहा है. उस समय बाराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के जस्न पर ३७० करोण रूपये खर्च किये जा रहे हैं. ऎसे समय में एक बरस का बीत जाना हासिये पर पडी़ सदी के कलेण्डर की उम्र कम होने से ज्यादा और क्या है? हमे सोचने की जरूरत है कि हम एक रास्ता चुने जहाँ से उम्मीदों का नया साल शुरू हो सके.

कविता

पंचटीला और लड़की:-

१।

वह आयेगी

और धर देगीअपनी उदासी

तुम्हारे भीतर

रात गये तुम गाओगे

उसके प्रेम और विछोह के गीत

कैसे जानेगा कोई कि

तुम्हारी कठोरता में

धर दी गयी

हैएक पूरी की पूरी लड़की॥

२-

लड़की तुम नहीं रहोगी

इसके पास

इसकी देह में उतरेगा

हर हमेश

हर दिन

पूरा सप्ताह

उदास होगा पंचटीला

अपने दुख में

थोडा़ सा टूटेगा रोज

दिनों को पूरा करता हुआ॥

३-

वह तुम्हें

उतना भर करेगी प्रेम

जितना भर बचा है उसके पास

उमर ढलने के पहले

लड़की छोड़ देगी तुम्हें

तब किससे पूछोगे तुम

कि कब लौटेगी लड़की॥


गौहर रज़ा पिछले दिनों हमारे वि.वि. में आये और एक काव्य गोष्ठी के दौरान उनके द्वारा सुनायी गयी नज़्म का आज़ाद अंसारी द्वारा रिकार्डिंग हमें उपलब्ध हुआ जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं॥
ये साल भी यारॊं बीत गया

कुछ खून बहा कुछ घर उजडे़

कुछ कटरे जल कर खाक हुए

इक मस्जिद की ईटों की तरह

हर मसला दब कर दफ्न हुआ

जो खा़क उडी़ वो ज़हनों पर

यूं छायी जैसे कुछ भी नहीं

अब कुछ भी नही है करने को

घर बैठो डर के अब के बरस

या जान गवां दो सड़कों पर

घर बैठ के भी क्या हासिल है

न मीर रहा न गा़लिब है

न प्रेम के जिंदा अफसाने

बेदी भी नही मंटो भी नहीं

जो आज की दहसत लिख डालें

मंसूर कहाँ जो ज़हर पिये

गलियों में बहती नफरत का

वो भी तो नही जो तकली से

फिर प्यार के ताने बुन डाले

क्यों दोष धरो पुरखों पर तुम

ख़ुद मीर हो तुम गा़लिब भी हो तुम

तुम प्रेम का जिंदा अफसाना

बेदी भी तुम्ही तुम मंटो हो

तुम आज की दहसत लिख डालो

नानक की नवा चिस्ती की सदा

मंसूर तुम्ही तुम बुल्ले शाह

कह दो कि अनल-हक जिंदा है

कह दो कि अनल-हक कर देगा

इस नुक्ते पर ग़ल नुक्ती है

हर बात यहीं से निकलेगी॥


महाश्वेता देवी भारत की एक मात्र लेखिका है जिन्होंने अपने लेखन कर्म व जीवन कर्म को एक साथ जनवादी तरीके से साधा है हाल में जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में आयी उस दौरान हमारे साथी देवाषीश प्रसून और प्रत्युष प्रशांत ने उनसे बात-चीत की जिसके अंश का हम प्रकाशन यहाँ कर रहे हैं॥


किसी रचनाकार की रचनाशीलता में उसका जीवन संघर्ष कितना मायने रखता है?

आदमी जो देखगा वही लिखेगा उसकी रचना का निर्माण उसके आस-पास के परिवेश से ही आता है इस रूप में किसी रचना कार की रचना शीलता उसके जीवन कर्म पर ही निर्भर करती है । जहाँ वह जीवन जीता है उसके परिवेश पर निर्भर करती है

१०८४ की मां की जो विषय वस्तु है या उस राजनीति को आज किस तौर पर देखती है?

वह जो राजनीति थी उसका समय अभी नहीं रहा उसका समय बीत चुका है । नक्सलवाडी़ की राजनीति को जिन्होंने समर्थन दिया आज वे उसे प्रांत-प्रांत तक बिखेर चुके हैंऔर वह कई प्रांतों में फैल गया है. कोई अच्छा आंदोलन खत्म हो जाय ऎसा नहीं होता उसमे उतार चढा़व आता है पश्चिम बंगाल में जैसे आज उसका प्रभाव कम है पर पूरे देश में एक बडा़ आंदोलन है वह और चल रहा है उसका चलना ही जरूरी है. यह समय की जरूरत है

देश में पनपती ढेर सारी समस्याओं के बीच जब जगह-जगह छोटेछोटे आंदोलन पनप रहे हैं (सेज, मानवाधिकार, बांध) युवाओं की को कहां देखती हैं?

अभी जब हाल में मैं कलकत्ता में थी ठीक आने के पहले उधर जो हुआ था जिसको लेकर केन्द्र सरकार ने एक एक्ट बनाया है जिसके खिलाफ प्रदर्सन भी हुए हैंजिसमे हमने जो बयान दिया है उसमे बोला है ज्यादा से ज्यादा जो मानवाधिकार की लडा़ई लड़ रहे हैं जैसे ए।पी.डी.आर. के आंदोलन ये एक्ट उसके खिलाफ जाता है अतः इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिये इसमे युवा भी हैं कोई आंदोलन खत्म होने की बात नहीं होती है वह अगले आंदोलन को इंस्पायर करता है.

नंदी ग्राम के आंदोलन ने संसदवादी कम्युनिस्ट पार्टी के चरित्र को पूरे देश में उजागर किया आप किस रूप में देखती हैं?

जिस समय तक वह मार्क्स वादी पार्टी थी उसको जो करने को था किया लेकिन उसका दिन खत्म हो गया इसलिये देखो यही पश्चिम बंगाल में जब पंचायती चुनाव हुआ था पंचायत में वोट देने वाला आदमी बहुत पढा़ लिखा तो नहीं है कामन मैन है पर वह सब कुछ समझता है। ये मजदूर किसान हैं ये सब उस पार्टी के खिलाफ हो गये और पार्टी हार गयी ३० साल से सत्ता में रहते हुए उसने न तो रास्ता बनाया न तो पानी दिया न बिजली कुछ नहीं दिया. जब पश्चिम बंगाल में भुखमरी पडी़ सरकार के पास कितना गेहूँ चावल सब था पर लोगों को मरना पडा़

वर्तमान लोकतंत्र में आप सुधार की कितनी गुंजाइश देखती हैं या फिर किसी विकल्प के बारे में सोचती हैं?

ज्यादा सोचना नहीं है न तो सोचने का समय है इसमे सोचने का क्या है आंदोलनों से जुडी़ हुई हूँ और यही है कि लडा़ई करने का है तो करने का है और कुछ नहीं.


युवावों के लिये कोई रास्ता सुझायें या कोई संदेस?

कोई संदेस नहीं देखो समझो और करो मैं कोई रास्ता क्यों बताऊ अपना रास्ता खुद चुनों लोगों की समस्याओं को देखो और उन्हें बिजली पानी सड़क उपलब्ध करवाओ।


श्रद्धांजलि:-

लवलीन

कथाकार लवलीन नहीं रही। इन निर्मम शब्दों के अलावा और क्या युक्ति है कि बयां हो जाय उनका न रहना. तुम्हें कैसे बताया जाय कि तुम्हारे पाठकों, दोस्तों और चाहने वालों ने किस तरह स्वीकार किया होगा तुम्हारा न रहना.कौन तुमसे बताये कि तुम्हारे चले जाने के बाद भी यह दुनियां उसी तरह आबाद है. कई शाम बीत चुकी है और और लोगों की यादों से हर रोज तुम खिसकती जा रही हो.


हेराल्ड पिंटर

काश! हेराल्ड पिंटर के नाटकों की तरह यह भी एक नाटक ही होता कि दुनिया के रगमंच पर हुई एक मौत, मौत न होती और बत्तियँ जलने के साथ वह पात्र उठ खडा़ होता और हम सब तालियाँ बजाते हुए उसका अभिवादन करते। अपने आंसुओं को पोछते हुए दर्शक दीर्घा से बाहर निकलते और कहते कि हेराल्ड पिंटर अभी जिंदा हैं.


नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होने चाहिये:-

कुछ दिन पहले ही हमारे देश के दो बडे़ पूजीपतियों अंबानी और मित्तल के द्वारा देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया गया। जिसे देश के लगभग समाचार पत्रों ने अपने पहले पन्ने पर छापा. यह चुनाव के पूर्व की तैयारी है जिसमे देश की मजदूर जनता के दो बडे़ शोषकों द्वारा एक बडे़ ह्त्यारे को चुना जा रहा है.जिसने २००२ के गुजरात दंगे में जाने कितने मुस्लिमों का नर संहार करवाया और जबकि आज भी गुजरात में उसके शासन काल में मुश्लिम वर्ग दहसत में जी रहा है. ऎसे में चुनाव के पूर्व अम्बानी मित्तल के इस प्रधानमंत्री पद के चुनाव का निहितार्थ क्या हो सकता है? एक तो यह कि आर्थिक मंदी से जूझ रही इस दुनिया में जब रोजगार दिनों दिन कम होते जा रहे है और बेरोजगारी के शिकार युवावों के लिये इस व्यवस्था ने कोई रास्ता नहीं छोडा़ है. वर्तमान मीडिया देश का सबसे बडा़ आदर्श उन्हें खडा़ कर रही है जिनके हाथ में देश की पूजी लूटने का सबसे बडा़ तंत्र है. ऎसे में इनके द्वारा किसी का भी चुना जाना युवाओं में आदर्शों का चुनाव होगा और यह चुनाव नरेन्द्र मोदी के लिये एक पक्षधरता तय करेगा. इसका दूसरा और अहम पक्ष यह भी है कि पूजीपतियों और हिन्दूवादी ताकतों की गठजोड़ को और मजबूत किया जा सके जिसके लिये नरेन्द्र मोदी वाकई में देश के सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं जिसने जन प्रतिरोध के चलते सिंगूर से हारकर भागी टाटा कम्पनी को अपने यहाँ संरक्षण दिया. टाटा की यह हार जनता की एक बडी़ जीत थी जिसे जन संघर्षों के इतिहास में दर्ज किया जायेगा.


आर्थिक मंदी से निपटने का कोई रास्ता नहीं है:-

अचानक से अमरीकी बैंकों का ध्वस्त होना और सरकारी सहायता से उसे संरक्षित करने का प्रयास बिफल ही होता दिख रहा है चूंकि पूजी के इस साम्राज्य में अमेरीका के ढहने से दुनिया के सभी राष्ट्रों पर इसका साफ तौर पर प्रभाव दिख रहा है. एक आंकलन के मुताबिक दुनिया के तकरीबन साढे़ छः करोड़ युवा बेरोजगार हुए हैं. ऎसी स्थिति में भारत के वे क्षेत्र जो निर्यात से जुडे़ हुए हैं उन पर गहरा असर पडा़ है खास तौर से मेडिकल आई.टी. आदि . क्योकि निर्यात के लिये जो डालर आते थे अमरीकी आर्थिक मंदी के कारण वे आना बंद हो गये और उन पैसो को वापस ले लिया गया और अचानक यहाँ के शेयर बाज़ार गिर गये. जिससे हुजेरी जो कि तिरुवंतपुरम में स्थित है टाटा जमशेदपुर जैसी फैक्ट्रीयाँ बंद हो गयी. जिन लोगों ने शेयर बाज़ार में पैसे लगाये थे वे धीरे धीरे वापस लेना शुरू कर दिये और शेयर बाज़ार का हाल बिगड़ता चला गया. अभी हाल में यह फैक्ट सामने निकल कर आया है कि पिछले तीन महीने में ४४ मिलियन डालर का प्रोडक्सन कम कर दिया गया है. ऎसी स्थिति में इस बाज़ार व्यवस्था को ढहता हुआ देखकर कम्पनियों ने अपनी प्लानिंग पर भी रोक लगा दी है जिससे नये रोजगार की संभावना तो खत्म ही दिखती है पर जहाँ से नये रोजगार की सम्भावना खत्म होती दिखती है वहीं से एक नये व्यस्था की सम्भावना खुलती है. क्योंकि आदमी सोचता है इसलिये वह अपने हाथ का बेहतर इश्तेमाल करना जानता है.








18 दिसंबर 2008

धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक तत्व

-स्वामी नित्यानंद


किसी का भी धर्म परिवर्तन अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर करना या कराना निंदनीय है। धर्म परिवर्तन का मुद्दा कंधमाल और बंगलुरू में जारी हिंसा के मद्देनजर फिर विचारणीय हो उठा है। दूसरों के धर्म को दोयम दर्जे का या अपने धर्म से हीन मानना ओछी मानसिकता है। वर्तमान में धर्म परिवर्तन मोक्ष या प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं वरन संख्या बल बढ़ाने के उद्देश्य से किया जाता है। संख्या बल बढ़ाने के राजनीतिक निहितार्थ होते हैं और इसका लाभ भी संबंिधत पक्षों को मिलता है। गांधी इन बातों को अच्छी तरह समझते थे इसलिए उन्होंने धर्म-परिवर्तन और पुन: परिवर्तन जैसे प्रयासों की निंदा की थी। सच तो ये है कि धर्म किसी को भी सही मायने में इंसान नहीं बना सका। जिन्हें धार्मिक लोग कहा जाता है वो दरअसल असहिष्णुओं की फौज हैं। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों में इनकी भरमार देखी जा सकती है। इन संगठनों का मुख्य कार्य है तथ्यों को तोड़-मरोड़कर या गोलमाल भाषा में पेश करना। तथ्य कुछ भी हो संदर्भ से काटकर विद्रूप रूप से परोसना। इसमें इन्हें महारत हासिल है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि वह विकास के मुद्दे पर असफल हो चुकी है। इसका मोदी मॉडल विकास को लेकर कितना प्रासंगिक है यह समय बताएगा। सत्ता के लिए भाजपा के पास ले-देकर एक ही अस्त्रा है और वो है सांप्रदायिक धु्रवीकरण। क्रिश्चियनों और मुस्लिमों पर हमले इसी खेल का हिस्सा हैं।धर्म परिवर्तन बहुआयामी मुद्दा है। ये व्यापक चर्चा का विषय होना चाहिए। जहां भी धर्म परिवर्तन होता है एकांगी नहीं होता। दोनों तरफ से पहल होती है। कुछ लोग एक धर्म से निकलते हैं तो कुछ नए भी उसमें शामिल होते हैं। हिंदुओं में से कुछ लोग धर्म छोड़कर ईसाई या मुस्लिम बन जाते हैं तो उनमें से भी कुछ लोग हिंदू धर्म में शामिल हो जाते हैं। ये सतत प्रक्रिया है जो चलती रहती है। विशेष रूप से हिंदू धर्म की बात की जाए तो ज्यादातर धर्म परिवर्तन निम्न निधZन तबके में होता है। ये वे लोग हैं जो हिंदू धर्म समाज की परििध पर हैं। पहचान के संकट और न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में कष्टकर जीवन जीने को मजबूर हैं। इन परिस्थितियों में ये लोग अन्य धर्म प्रचारकों के लपेटे में आ जाते हैं। यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि बलात् धर्म-परिवर्तन संभव नहीं है। धर्म परिवर्तन का प्रत्याशी जब तक स्वयं न चाहे कोई भी जोर जबर्दस्ती से उसका धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता। मगर संघ परिवार इन्हीं स्वाभाविक प्रवृत्तियों को तूल देकर बहुसंख्यक हिंदुओं में भय उत्पन्न कर धु्रवीकरण करके उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। यहां विशेष ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि 1947 से पूर्व और पश्चात भी रा.स्व.सं, हिंदू महासभा द्वारा निरंतर कहा जाता रहा है कि पचास वर्ष बाद भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। साठ वर्ष बीत गए। इतिहास और आंकड़े गवाह हैं कि हिंदू भारत में 80 प्रतिशत हैं। जहां तक धर्म परिवर्तन का सवाल है सांप्रदायिक संगठन ये कभी नहीं बतलाते कि इन साठ वषो± में अन्य धमो± से कितने लोग हिंदू धर्म में आए। यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि हिंदू धर्म की सतत बड़ाई हांकने वाले मठाधीश हिंदू धर्म में किसी भी प्रकार का सामाजिक विमर्श पेश करने में असफल हैं। सभी संप्रदायों के मठाधीश जातिवादी मानसिकता के प्रेरक और पोषक हैं। चाहे वह ब्रह्म कुमारी मिशन हो, इस्कॉन हो, स्वामी नारायण हो या राधास्वामी या अन्य संप्रदाय। इनके पास अकूत संपत्ति है, विलासितापूर्ण जीवनशैली है। आडंबर और पाखंड है। जिसे धर्म मीमांसा प्रचारित किया जाता है वह दरअसल मिथ्या मीमांसा है। इन मठों और मठाधीशों को हिंदू समाज के वंचित, शोषित तबके से कुछ भी लेना-देना नहीं है, हां इनकी भयंकर उपेक्षा से अलग-थलग पड़े लोग जब अन्य धमो± की ओर रूख करते हैं तो धर्म परिवर्तन का हल्ला मचाने के लिए मठों की थैलियां खुल जाती हैं। जिनका धर्म परिवर्तन हो जाता है उनका हाल-चाल पूछने उक्त संगठनों के गुगेZ कभी उनके पास नहीं जाते। उन कारणों और विपत्तियों को समझने की कभी कोशिश नहीं करते जिसके चलते धर्म परिवर्तन हुआ। उन्हें सांप्रदायिक राजनीति करनी है इसलिए चचो± और मिस्जदों पर हमले कर अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करते रहते हैं। समझदार हिंदू इनके झांसे में नहीं आते पर मूढ़ इनकी मिथ्या अवधारणाओं और प्रचार में उलझ जाते हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या अपनी जाति को सुरक्षित कर लेने से धर्म सुरक्षित हो जाता है। सांप्रदायिक संगठन कभी क्यों चाहेंगे कि धर्म परिवर्तन जैसी विकृतियां बंद हो जाएं। इसलिए धर्म परिवर्तन पर वैज्ञानिक विचार जरूरी है। खुले दिल, साफ नीयत और धर्म निरपेक्षता की दृष्टि से सार्वजनिक विचार हो तो समस्या का समाधान आसानी से निकल सकता है। साभार -समयांतर

26 नवंबर 2008

तुम्हारी कहानी कही जानी चाहिये:-

अनुराधा गांधी ने इस दुनिया को विदा कह दिया, उनके दोस्तों के कुछ पत्र जो एक किताब के रूप में अनुराधा को याद करते हुए आये हैं उसका हिन्दी में अनुवाद यहाँ प्रकाशित है


प्रिय अनु,
जेल की सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं........ जिसमे सूर्य की किरणे हर सुबह थिरकते हुए आती हैं. और अभी गर्मी है.....वे तीखी मजबूत ....जोशीली हैं. ठीक उन्हीं दिनों की तरह जब हम विश्वविद्यालय बिल के खिलाफ चल रहे थे. तुम्हें याद है? सूरज की मारक गर्मी थी, और तुम मोर्चे की पूरी लम्बाई में उदित और अस्त होती दिखती थी. यह मेरा पहला मोर्चा था, मुझ पर तुम्हारी पहली छाप- उर्जा की एक पाँच फुट ऊची बंडल, एक छोटी सी कूद के साथ सूर्य पर प्रत्येक नारे से मुट्ठी का प्रहार करती हुई. जब आप आसमान पर प्रहार करने का निश्चय कर लेते हैं तो ऊचाई की बाधा बमुश्किल मायने रखती है.पहली छाप आवश्यक नहीं की स्थायी रहे. किन्तु साल और दशक इस पहली छवि को बहुत धुधले नहीं कर पाते. कुछ सालों बाद मैने तुम्हें एक मीटींग में तथ्यों, आंकडों और विचारों को मशीनगन की गति से रखते हुए सुना. मैने तुम्हारे विचारों को जाना और सीखा कि तुम चिंतन की जानी मानी विजेता हो. मगर मैं तुम्हारी छवि को चिंतकों के दायरे में बिठा नहीं पाता हूँ. संभवतः वह बहुत पानी कम था. कम-अज-कम जब तुमने न केवल दुनिया को व्याख्यायित बल्कि उसे बदलने का निश्चय किया. तब न केवल विचारों को व्याख्यायित और स्पष्ट करना था, उसे विविध और विस्तृत भूमि में लडा़ जाना था. और उस संघर्ष शील बर्ताव का क्या माने जब तुम नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित अपने कमरे में फरवरी की एक शाम मेरे साथ आयी थी. मैं मुंबई की ताजगी के साथ उस कड़कडा़ती ठण्ड से बचने के लिये खिड़कियों को बन्द करना चाह रहा था.......और तुम्हारे पास उस खोजी की वह कथा थी जिसने दक्षिणी ध्रुव के आक्रमण के लिये खुद को अनुकूलित कर लिया था.वर्षों बाद भी क्या इस स्थिति से मदद मिली थी जब अपने कंधे पर रायफल रखे, बस्तर के आडे़ तिरछे जंगलों से गुजरी थी? जरूर मिली होगी, या उस घुटन के दर्द ने तुम्हें उस पहाडी़ को जीतने की इजाजत नहीं दी.लेकिन इन भौतिक अनुकूलन, सांस्कृतिक, जाति विरोधी, महिला, ट्रेड यूनियन, नागरिक स्वतंत्रता, झुग्गियों, विद्यार्थियों तथा अन्य विविध मोर्चे के सतत युद्ध जैसी स्थितियों की दशा कहीं ज्यादा रही होगी.वैसे दिल जीतने में तुम्हें बमुश्किल ही परेशानी होती थी. लड़ते हुए लोग सभी जगहों पर एक जैसे ही होते हैं और तुम उनके संघर्ष के आम मुहाबरों से आसानी से जुड़ गयी होगी. और जहाँ भाषायी बाधा रही होगी वहाँ तुम इसे आसानी से लांघते हुए एक नई भाषायी बोली को अपना लेती होगी. जबकि हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी के अलावे तुम गुजराती गोंदी और यहाँ तक कि तेलगू की अल्पग्य भी थी.और उस दिन इ.पी.डब्ल्यू. में कृष्णा बंदोपाद्यायाय के आख्यान से गुजरते हुए मैं अपने को आश्चर्य चकित होने से नहीं रोक सका कि तुम्हारे आख्यान को कैसे पढा़ जायेगा.तुम्हारे सभी अनुभवों को जो हम सभी पुरूष कामरेडों के बरताव से हुए. लीडर, आर्गनायजर, गुरिल्ला, कमेटी मेम्बर, नीति निर्धारक, एक्टविस्ट बनने के वो सभी अनुभव, खासकर वो सारी परीक्षायें और ट्रायल जो महिला क्रंतिकारी बनने के चयन करने वाली को देना होता है.वस्तुतः मैं केवल बहुत ही परावर्तित और अपरावर्तित रूपों में उन अनुभवों को जान सकता हूँ. जैसे मैं जानता कि श्रेष्ठ कामरेडों की मानक छडी़ से तुम्हारे किसी कार्य की मानक तुलना का मानसिक जोड़ करना हम पुरूष मस्तिस्क के लिये कितना और किसी पुरूष के विवेकी सलाह को फटकार नहीं समझना कितना कठिन है. यह भी कि एक पुरूष का क्रोध महिमा मंडित हो सकता है और स्त्री का क्रोध महज चिड़चिडा़पन, पुरूष के आँसु इतने गम्भीर जबकि स्त्री के ब्लैक मेलिंग से मिलते जुलते. और कैसे किसी महिला को उस पौरूषीय आकांछी रूढ़ धारणा में संभवतः केवल संघर्ष रत होना होता है नकि किसी सांचागत सामर्थ्य में.अनु मैं जानता हूँ कि तुम्हारा हस्तक्षेप पहला होगा जिससे चीजें बदलने लगी. पितृ सत्ता के विरूद्ध सुधारवादी मुहिम पुरुषवादी वर्चस्व के स्तम्भ को अगर धराशायी नहीं कर रहा था (आन्दोलन के अन्दर और बाहर) तो भी नेतृत्व कट के गिर रहे थे. महिला सदस्यों की संख्या में बृद्धि हो रही थी. लेकिन यह भी तुम बेहतर जानोगी कि जब चीजें बदलती हैं तो कुछ ऎसी भी चीजें होती हैं जो यथास्थिति को बरकरार रखना चाहती हैं.और सतत सुधार्वादी लहरों की मांग रखती हैं. वो तुम और तुम्हारी बहनों के उत्कर्ष बिन्दु से कहानी कहने की मांग करती हैं.तुमने चीजों को न केवक अपने अनुभवों से देखा किन्तु उन हजारों कार्यकर्ताओं की दृष्टि से भी देखा, जिनमे तुम्हारा सामना देश के प्रत्येक कोने में हुआ था. तुमने महिलाओं के लिये नीति प्रतिपादन करने में हिस्सेदारी की और उसके कार्यान्वयन के लिये आगे बढी़. तब तुम्हारी कहानी अलग होगी ये वो कहानी है जिसे सुनाया जाना बाकी है.और यही वो था जो मैं तुम्हारे बारे में उस हप्ते लिखना चाहता था. जब अप्रैल के उस हप्ते ई.पी.डब्लू. में कृष्णा अपनी कहानी को सुना रही थी. तुमसे कहने के लिये कि तुम उस कहानी को सुनाने का प्रयास करो जो कृष्णा की कहानी के दशकों पार संवाद कर सकें. एक कहानी जिसे दसियों हजार कहानी कहनी है. आने वाले कल के उन असंख्य लड़के, लड़कियों से कई कृष्णाओं से और कई अनुओं से.लेकिन अनु इससे पहले कि मैं यह आंक पाता कि तुम तक पहुंच संभव है भी या नहीं कि ठीक उसी हप्ते के अखबार से हमे पता चला कि सेरीब्रल मलेरिया तुम्हें शहीद कर चुका है.स्मृतियों के बाढ़ से लहरें उतरती और यकायक आंसुओं को धक्का दे जाती और लगता है कि आँसु का प्रत्येक टुकडा़ कहानी कहने के लिये चीखना चाहता है-जो कहानी तुम्हारी है, उसकी है, हमारी है. एक कहानी जो बगैर नैतिकतावादी हुए सैकडो़ आदर्श/आचार गढे़गी, जो बगैर दाहक हुए लाखों मनों को जला सकती है. उस अनु की कहानी जो किसी दिन कही जायेगी किसी अनु के द्वारा.और अनु, सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं. लेकिन वे अरबों आत्माओं, करोडो़ं मन के लौ के साथ खडे़ रहने के लिये नहीं बने हैं. जैसे हजारों और अब लाखों कार्यकर्ता दृढ़ता से तुम्हारे रास्ते पर चलेंगे, आगे बढे़ंगे और नये क्षितिज मांपेंगे. उनके सामने से सलाखें व अन्य बाधायें उनको बनाये रखने वाले बिखर कर भागेंगे. पूरी दुनिया में और पूरे भारत में भी पुराने तरीके से शासित होने के अस्वीकार घोषणा कर रही गुस्से से उठी जनता की मुट्ठीयों के सामने साम्राज्यवाद और उनके शासक एजेन्ट का संकट निवर्तमान हो जाने को होगा इस प्रकार कि जैसा कि हो सकता है हमने कल्पना भी न की हो. जिस कल का हमने स्वप्न देखा है उसे वे जन्म दे रहे होंगे और हम वहाँ होंगे. तुम्हारा- छोटू, जेल से, मई २००८

24 नवंबर 2008

अनुराधा गांधी को याद करते हुए :-रमालू
स्नेह का एक प्रतीक याद करते हुए आँखें नमनाक हैं. तुम्हारे साथ गुजारे हुए दोस्ती के स्नेही पल अभी भी मेरी मुट्ठी में शेष बचे हैं. ११ अप्रेल को ५४ वर्ष की ही उम्र में दुनिया को तुमने विदा कह दिया.अनुराधा गांधी एक मानवतावादी थी. उनके पिता कुर्ग कर्नाटक से थे जो कम्युनिष्ट पार्टी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे.बाद में वकालत के पेशे के साथ वे बाम्बे आ गये.और अनुराधा की पढा़ई लिखाई बाम्बे में हुई.महाराष्ट्र में नागरिक स्वतंत्रता अधिकार के लिये उसने एक अहम भूमिका अदा की उसने क्रांतिकारी आंदोलन में छ्त्रों के नवजवान भारत सभा में आवाह्ननाट्य मंडल को खडा़ करने में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई. १९७० में आज़ादी के बाद एक नयी पीढी़ नये विचारों के साथ उदित हुई. जिसने इस समाज को पूरी तरह समता पर आधारित बनाना चाहा, अनुराधा उस नौजवान शिक्षित पीढी़ की अगली पंक्ति में थी जो अपने समय के विभिन्न आंदोलनों के साथ खडे़ थे. वह उनमे से एक थी जिन्होंने आराम की जिन्दगी छोड़कर समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना.मेरा परिचय उनसे तब हुआ जब बाम्बे में अपनी उच्च शिक्षा को समाप्त कर वे क्रान्तिकारी आंदोलन का एक हिस्सा बन लेक्चरर के रूप में नागपुर आयी.आंदोलन में सांस्कृतिक गतिविधियों की अहमियत को समझते हुए १९८३ में उन्होंने ए.आई.एल.आर.सी. (आल इंडिया लीग फार रिवोल्यूसनरी कल्चर) को बनाने में एक सक्रिय योगदान दिया.१९९६ तक वे इसकी सेन्ट्रल कमेटी की मेम्बर रही और इस दौरान उन्होंने कई सफल कार्यक्रम का आयोजन करवाया अपनी गतिविधियों को पूरा करने के लिये वह एक सायकिल से चला करती थी. जल्द ही नागपुर छोड़कर वे आदिवासी क्षेत्र में एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में चली गयी.मुझे याद आ रहा है १९८३ में जब ए.आई.एल.आर.सी. द्वारा दिल्ली में पहला कार्यक्रम लिया गया विरसम के कुछ वरिष्ठ सदस्यों (आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी लेखक संघ) ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की तरफदारी की थी यह अनुराधा ही थी जिसने बडी़ स्पष्टता के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास को ऎतिहासिक परिप्रेक्ष में समझाया और बताया कि मातृभाषा किस तरह से मानवसमुदाय के लिये सहज ग्राह्य होती है व उसकी क्या प्रक्रिया होती है. सारे प्रश्नों के जबाब को व्याख्यायित करते हुए उसने सबको संतुस्ट कर दिया.जुलाई १९८५ की बात है जब ७ क्रंतिकारी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में मैं, वरवर राव, गदर, संजीव, और डोला किस्ट राजू हैदराबाद से पूरे भारत भ्रमण पर निकले थे.हमारा पहला ठहराव नागपुर था. यह अनुराधा गांधी थी जो नागपुर की एक दलित बस्ती में किराये के मकान में रहती थी और बडी़ गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया था.उसके बाद उन्होंने आंध्रप्रदेश में क्रान्तिकारी आंदोलन पर हो रहे दमन के खिलाफ सीता बर्डी के एक हाल में एक सभा आयोजित करवायी थी. जाने माने समाज सुधारक बाबा आम्टे इसमे मुख्य अतिथि के रूप में सम्मलित हुए थे.महाराष्ट्र के क्रांतिकारी आंदोलन को उभारने में अनुराधा गांधी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उन्होंने कई लेखकों संस्कृति कर्मियों छात्रों और युवाओं को संगठित किया इस मायने में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. क्रंतिकारी आंदोलन के अखिल भारतीय स्तर पर सेमिनार आयोजित करने में मुख्यतः उनके सुझाव और चर्चाओं में वे बडे़ स्तर की अवधारणा को पेश करती थी. क्रांतिकारी आंदोलन में राष्ट्रीयता, जातिप्रथा, महिला के सवालों को लेकर व आंदोलन में छात्रों और कामगार वर्ग के संगठन में नयी उर्जा की सहायक भूमिका आदि विषय पर. उनके प्रयास व कार्य क्रांतिकारी महिला आंदोलन के लिये मार्ग दर्शक होते थे.क्रांतिकारी आंदोलन के ढांचे को व्यापक बनाने में भी उनके सुझाव मदद करते थे. उन्होंने अंबेडकर के विचारों पर जाति के मसले को हल करने को लेकर एक नयी अंतर्दृष्टि दी. महाराष्ट्र में उन्होंने एक ऎसी व्यवस्था विकसित की जहाँ महिलायें महिलाओं के लिये एक विशिष्ट सत्र आयोजित करें. समस्याओं को चिन्हित कर खास समस्याओं के लिये रिजोल्यूसन बनायें और व्यवहारिकता के लिये एक मार्ग दर्शक सूत्र बनायें. उन्होंने जीवन साथी के रूप में कोबड गांधी को चुना और खुद को व्यवहारिक रूप से वर्गच्युत किया. वह आदिवासियॊं के साथ जंगलों में घूमती थी. जंगलों में घूमते हुए उन्हें मलेरिया हुआ और ब्रेन तक पहुचने के कारण उनकी मौत हो गयी. वह आपने कार्यों को बडी़ दिल्लगी के साथ करती थी. एक एक बेहतर कल के लिये वह लोगों को संगठित करती थी और यह सब करते हुए उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

14 नवंबर 2008

फिलिस्तीनी जन-संघर्षों के कवि महमूद दरवीस की कविता:-

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
मेरा कार्ड न. ५०,००० है
मेरे आठ बच्चे हैं
नौवा अगली गर्मी में होने जा रहा है
नाराज तो नहीं हो?

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
अपने साथियों के साथ पत्थर तोड़ता हूँ
पत्थर को निचोड़ देता हूँ
रोटी के एक टुकडे़ के लिये
एक किताब के लिये
अपने आठ बच्चों के खातिर
पर मैं भीख नहीं माँगता
और नाक नहीं रगड़ता
तुम्हारी ताबेदारी में
नाराज तो नहीं हो?

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
सिर्फ एक नाम, बगैर किसी अधिकार के
इस उन्माद धरती पर अटल
मेरी जडें गहरी गई हैं
युगों तक
समयातीत हैं वे
मैं हल चलाने वाले
किसान का बेटा हूँ
घास-फूस की झोपडी़ में रहता हूँ
मेरे बाल गहरे काले हैं
आँखें भूरी
माथे पर अरबी पगडी़ पहनता हूँ
हथेकियाँ फटी-फटी है
तेल और अजवाइन से नहाना पसंद करता हूँ

मेहरबानी कर के
सबसे ऊपर लिखो कि
मुझे किसी से नफरत नहीं है
मैं किसी को लूटता नहीं हूँ
लेकिन जब भूखा होता हूँ
अपने लूटने वालों को
नोचकर खा जाता हूँ

खबरदार
मेरी भूख से खबरदार
मेरे क्रोध से खबरदार॥

12 नवंबर 2008

संसद में मैकाले हंस रहा था :-

एक लम्बे अर्से बाद छः से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवर्य रूप से शिक्षा मुहैया करवाने वाले शिक्षा के अधिकार विधेयक को केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने कानूनी रूप से स्वीकृति दे दी है.संविधान के नीतिनिर्देशक तत्व में अनुच्छेद ४५ के तहत यह यह अनिवार्यता दी गयी है नीतिनिर्देशक तत्व की यह एक मात्र धारा थी जिसमे १० वर्ष के समय की बचन बद्धता थी. बचन बद्धता के पचास साल बाद शिक्षा के अधिकार की मंजूरी को कुछ विफल एतिहासिक दावों और भविष्य में प्राथमिक शिक्षा से निर्मित होने वाले समाज के आलोक में देखने की जरूरत है. १९५५ मेम जब प्रायमरी स्कूलों को आरम्भ करने का निर्णय लिया गया था तब से एक सुधारवादी अवधारणा के साथ यह बात सामने आनी शुरू हुई कि प्राथमिक शिक्षा का उत्तरोत्तर विकास होगा. जिसको लेकर समय समय पर कई समितियां बनायी गयी, और कुछ नये तरह के बदलाव भी किये गये. पर इन ५० वर्ष के दौरान प्राथमिक शिक्षा की जो स्थिति रही और वर्तमान में जो है वह एक निराशाजनक ही कही जा सकती है.. प्राथमिक स्कूलों की स्थिति, पाठ्यपुस्तकें, और शिक्षण की प्रक्रिया के साथ ५७.६१ प्रतिशत छात्र आज भी प्राथमिक शिक्षा को बीच में ही छोड़ देते हैं. ऎसे में इस अधिकार को मंजूरी मिलना आम जन जो अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल या महगे शिक्षण संस्थानों की शिक्षा को नहीं खरीद पा रहा है व असमानता की इस खाई में उसका आक्रोश वर्गीय आधार पर बढ़ता जा रहा है कही यह विधेयक उनके सब्र का झुनजुना तो नहीं है. १९८६ मेम नई शिक्षा नीति लागू होने के साथ तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत ने शिक्षा स्थायी समिति के सामने यह बयान दिया था कि १९९० तक सभी को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो जायेगी पर २२ वर्ष बाद आज जो आंकडे़ हमारे सामने हैं वो इन दावों को खोखला ही साबित करते हैं. प्राथमिक शिक्षा को लेकर १९६४ में डा. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में गठित आयोग ने शिक्षा दिये जाने की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शिक्षा प्रणाली बच्चों को मूल्य युक्त शिक्षा देने के बजाय उसे एक छोटे से अल्प मत के लिये उपलब्ध करा पाती है जो योग्यता से नहीं बल्कि फीस देने की क्षमता से बनता है. समतावादी आदर्श समाज के विपरीत यह एक अलोकतांत्रिक स्थिति है जिससे आम जन के बच्चे निम्न स्तर की शिक्षा पाने या न पाने को मजबूर हैं. जबकि सम्पन्न वर्ग अच्छी शिक्षा खरीदने में समर्थ है. ऎसी स्थिति में शिक्षा की समता के लिये जन शिक्षा को सर्वमान्य प्रणालि की ओर बढ़्ना होगा. बावजूद इसके कि इसका कार्यान्वयन इमानदारी से किया जाता यह पूरी तरह से रद्दी की टोकरी में पडी़ रही.और १९८६ में नई शिक्षा नीति की समीक्षा के लिये राममूर्ति कमेटी गठित की गयी जिसने मूल्य आधारित शिक्षा के नाम पर धर्म और अवैग्यानिक शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. जब इस पर सवाल उठा तो कोर्ट ने धर्म को उदारवादी अवधारणा के रूप में देखने की बात कही. इस लिहाज से पुस्तकों के लेखकों और सत्ता में आसीन विभिन्न विचारधारा की पार्टीयों को अपने मुताबिक इसे व्याख्यायित करने का मौका मिला. और जब भाजपा केन्द्र में आयी या जिन राज्यों में सत्ता सीन हुई अपने विचारों के अनुरूप किताबों का धार्मिकीकरण और साम्प्रदायिकी करण किया. अब बच्चों को ग से गमला की जगह ग से गणेश हो गया. सवाल यह उठता है कि जब प्राथमिक शिक्षा के अधिकार का विधेयक पास हो चुका है तो उसका आम जन को और सम्पूर्णता मेम समाज को क्या लाभ होने जा रहा है. लोग अंगूठा लगाने के बजाय हस्ताक्षर करना सीख जायेंगे और और साक्षरता का प्रतिशत थोडा़ बढ़ जायेगा जिसे सरकारें विकसित होने की प्रक्रिया में एक उपलब्धि के तौर पर गिनायेंगी पर अगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने के बीच कोई खास फर्क नहीं दिखता. और सरकारे उस समझ तक आम जन को नहीं जानें देना चाहती जहा वे अपने हक अधिकार को समझ सकें अपने शोषण के विरुद्ध लड़ सकें. अन्ततः यह शिक्षा अधिकार का कानून किनके हितों की पूर्ति करेगा इस बात को समझने की जरूरत है. शिक्षा की अवधारणा मानवीय विकास के पीढी़ गत हस्तांतरण को लेकर होनी चाहिये थी. अपने देश के लोगों सहित विश्व की संचित संस्कृतियों के सर्वोत्तम त्त्वों से बच्चों का परिचय सीखने की उत्सुकता व चाहत जगाना अप्ने ग्यान को वे खुद बढा़यें बच्चों में इस तरह की क्षमता पैदा करना होना चाहिये . पर वर्गीय आधार पर स्कूलों का विभाजन जहाँ जिस वर्ग के पास पब्लिक स्कूल में अपने ब्च्चों को भेजने और महंगी शिक्षा को खरीदने की क्षमता है वह अपने मनमाफिक पाठ्यपुस्तकों को खरीदने के लिये आजाद है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वर्ग के बच्चों को एक ही तरह की पाठ्यपुस्तकें थोप दी गयी हैं. पाठ्यपुस्तकों के सातह जो सबसे बडी़ समस्या दिखती है वह यह कि घटनाओं, व समाज के विकास, इतिहास, को एक कहानी के रूप में चित्रित कर दिया गया है जहाँ बच्चे को यह नही बताया जाता कि यह इतिहास कैसे निकाला गया इसके सही होने के क्या प्रमाण हैं पुस्तकें विवरणों का ढेर बनकर रह गयी हैं जो जिग्यासा को ग्यान की प्रक्रिया नहीं मानती . अतः बच्चों के मनोविग्यान मेम आस्थावादी भावना को विकसित किया जाता है . दूसरी तरफ पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को एक ऎसी संस्कृति में ढाला जाता है जहाँ वे टाइ जूते के साथ साफ सफाई युक्त एक खास तरह की संस्कृति में पलत्व हैं और समाज के यथार्थ से दूर रहते हुए समाज की गरीबी भूख बेरोजगारी अन्याय के संघर्षों को जानने से महरूम रह जाते हैं यह मध्यम वर्ग की मानसिकता को विकसित करने का पहला चरण होता है ऎसे में समान शिक्षा की अवधारणा को लागू करना ही समता की तरफ बढ़ना हो सकता है. शिक्षा का पतन राजनैतिक व सांस्कृतिक पतन है प्राथमिक शिक्षा को सभी के लिये जरूरी है पर यह न तो वर्गीय विभाजन के आधार पर होनी चाहिये न ही थोपी गयी हो बल्कि एक ऎसी व्यवस्था को इजाद करना होगा जहाँ बच्चे ग्यान को खुद से बढा़ने कि क्षमता पैदा कर सकें और आम जन के संघर्षों से जुड़ सकें.

31 अक्टूबर 2008

लडते हैं मरते नहीं हैं दख़ल - भित्ति पत्रिका से

महत्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा २०० के आस-पास लोग एक पहाडी़ पर रहते खाते पीते हैं कभी-कभी लडते भी हैं पर मरते नहीं हैं मरना यानि संख्या का कम होना जो आया कभी नहीं गया पचटीला की एक पहाडी़ है . जिसके पाँच टीले है जिस वजह से श्हर से मुंह भी चुपा सा हुआ है यहाँ लोग लिखते हैं यहाँ कि हर रात हर सुबह किसी न किसी राष्ट्रीय पत्रिका की कहानी बन ही जाती है .फिदेल ने कल क्या किया देश को पता हो या न हो कैन्टीन में शाम की चाय के वक्त पता चल ही जाता है . हा दुनियाँ में जो घटित हुआ सो तो हो गया . पर होना क्या चाहिये यह यहाँ के लोग तय करते हैं पर मुश्किल कि वह होता नहीं . भला सोचो हिटलर और मार्क्स आपस में मिले तो गले लगें और फ़िर बात करें ..............खैर मौका मिले तो आइये कभी , बिता के जाइये लेकिन ये झूठ है कि आने के बाद आप जायेंगे . दीवाल पर एक पत्रिका निकलती है सो उसके अंश यहाँ लगा रहा हूँ देखिये.....
रागदरबारी :-

कुछ नया घटित होने वाला था कि बस होने ही वाला था कोई आसमान से तारा टूटने वाला था सब उसकी तर्फ निगाह लगाये बैठे थे जैसे युगों की रोसनि आने वालि थि विश्वविद्यालय कि गाडी़ दाहिने ट्रैक पर मनमाने ढंग से चल रही थी जो आज सही था वह कल गलत हो रहा था परसों फिर सहि हो रहा था सब गड्डम गड्ड कितने बार धक्के लगे गिरि पडी़ पर ट्रैक नहीं बदला मानों ड्राइवर ने दाहिने से चलने की जिद थाम लि हो पर यह जिद भी ऎसि नहीं कि मदिरा पान के नसे मेम यह सब कुछ खलासी के इसारे पर चल रहा था कई बार तो गाडी़ बीच से चलती लगता सही रास्ता अख्तियार कर लेगी पर तब तक खलासी का इसारा होता और फिर ड्राइवर दाहिने पर मोड़ देता ऎसे वक्त में कैटीन ही एक जगह थी जहाँ बैठ लोग ड्राइवएर के पागलपन के किस्से सुना सुनाया करते थे कहाँ कहाँ के किस्से निकल जाते जितने मुहं उतनी बातें नही बल्कि जितने दांत उतनी बातें होयी थी किस्सागोई के इस चर्चे में नयी बात निकल कर आयी जो पीएच. डी . के एडमिसन हुए बिना ही शांतिकुटी से राग भाई खोज लाये थे यह पूरी तरह से ओरल हिस्ट्री थी जिस पर आस्था के साथ विश्वास किया जा सकता था पर तर्क नहीं विश्वविद्यालय तर्कों पर नहीं चलता राग भाई ने जेब से एक पुर्ची निकाली और पढ़ना शुरुउ किया ये उनके सिनाप्सिस का विषय था जिसका शोध अभी बाकी था .कहा जाता है कि विश्वविद्यालय की अवधारणा कुछ भले मानुस द्वारा १९७५ में हुए नागपुर के विश्वहिन्दी सम्मेलन में रखी गयी थी पर शोध इस बात किओ खन्डित करते हुए इसके इतिहास को द्वापर युग से प्रतिस्थापित करता है कुछ लोगों के मुंह से ब्रेड पकौडा़ गिर गया दरबारी भाई चाय की एक और चुस्की मार लिये और अपनी मूँछ विहीन होठ को पोछकर ध्यान से सुनने लगे खैर उनके लिये कुछ भी अब अद्भुत लगना बंद हो गया था क्योकि उन्हें पंचटीला में डायनाशोरॊम का निवास नामक शीर्षक से किया गया शोढ याद था शायद उससे आगे का यह शोध था राग भाई ने कहना जारी रखा था यह द्वापर युग की बात है जब नारद जी धरती पर उतरे थे विष्णु की बातों का खयाल रखते हुए उन्हों ने एक सुनसान जगह ढूढ़ ली थी रात के तकरीबन १० बज रहे थे उनके पास न तो अम्बेजडर थी न ही पुस्पक विमान बस हवा में उतर गये थे उन्हें सरस्वती ने धरती पर शिक्षा की स्थिति का जायजा लेने के लिये भेजा था कहा जाता है कि तब यू. जी. सी. नही थी सरस्वती डायरेक्ट उपर से ही सब कुछ डील करती थी बाद में जब जनसंख्या बढी़ फेलोसिप का मामला आया विश्वविद्यालयों में घोटाले होने लगे तो यू.जी.सी की अवधारणा रखी गयी.एकांत ढूंढ़ते हुए जब नारद पंचटीला की पहाडी़ पर उतरे जिस जगह उनके चरण पहली बार पडे़ थे कहा जाता है अभी रजिस्ट्रार आफिस के रूप में वहाँ का भवन बनाया ग्या है . कहा तो यह भी जाता है कि नारद की आत्मा अभी भी रात में १०-११ बजे के बीच यहाँ भटका करती है और एक्वागार्ड तक जाते-जाते गायब हो जाती है दरबारी भाई पूछ पडे़ कि एक्वागार्ड तक ही क्यों ? राग भाई ने अपने मुंह पर उंगली रखते हुए चुप रहने का इशारा किया दरबारी भाई चुप ....नारद जब अवतरित हुए तो कोई भवन नहीं था सब कुछ वीसी आवास की तरह शंत था उन्हें प्यास लगी थी और नारद देर तक प्यास से व्याकुल यहाँ खडे़ रहे फिर यही वह जगह हैं जहाँ खडे़ होकर उन्होंने सरस्वती को फोन मिलाया था पर एयरटेल की सिम सो नेटवर्क का भारी प्राबलम सारे दुनियाँ के शिक्षा विदों का फोन मिलाया सब स्विच आफ उन्हें पता नहीं था कि दिन का टीचर रात में विश्वविद्यालय में का एक अधिकारी होता है और अधिकारी अपना फोन चालू नहीं करते फौरन उन्होंने सरस्वती को फोन लगाया बोला माते बडी़ बिडम्बना है ऎसी जगह उतरा हूँ जहाँ सब कुछ वीरान है, चारो तरफ शांति छायी हुई है सामने पहाडि़यों के नाम पर कुछ टीले है(तब पंचटीला की पहाडि़याँ बहुत छोटी थी और उनकी लम्बाई में बृद्धि हो रही थी) नेटवर्क से पता चल पा रहा है कि यह एशिया का जम्बूदीपे भारत खण्डे नामक कोई प्रान्त है. पूरा आसमान यहाँ से साफ दिखाई पड़ रहा है आप किधर बैठी हो मै .....आवाज कट रही है माते. नारद मुनि थोडा़ खिसक जाते हैं और वहाँ खडे़ हो जाते है जहाँ अभी इंटरनेट का टावर लगा हुआ है अब आवाज साफ आने लगी थी नारद मुनि अपना बोलना जारी रखे ....माते पूरा आसमान साफ है बस पहाडी़ के उस पार से बादल की एक लकीर बनी हुई है लगता है शुक्राचार्य इधर से गुजरा है जरूर हमारे फिराक में आया होगा. पर माते प्यास के मारे उदर में त्राहि त्राहि मची हुई है .सरस्वती ने सुझव दिया नारद यह धरती है यहाँ अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है पर भारत खंडे क्षेत्र में जहाँ के नेटवर्क से तुम बात कर रहे हो वहाँ तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी जनेऊ बाहर निकाल लो और अपनी चुटिया में कंघी करके लहराते चले जाओ पूरा ब्रहमणॊं का ही राज है रही बात पानी की तो तुम तत्काल शक्ति का प्र्योग करो और पहाडी़ के उस पार आते बादल को पानी में बदल कर ......इतने में फोन कट गया नारद को पता नहीं था रोमिंग का चार्ज . पर उन्हें बात समझ में आ गयी थी और वे टहलते हुए वहाँ पहुचे जहा व्र्तमान में वी.सी. आफिस बनी है यहीं पर खडे़ होकर अपनी शक्ति का प्रयोग किया था नारद ने पर बादल पानी में नहीं बदला फ़िर से प्रयास किया नाकाम रहे और छलांग लगाकर बादल तक पहुंच गये देखा तो सब कुछ धोखा था यह बादल नहीं धुंवा था जिसमें से गंध आ रही थी श्रोत को पकड़ धुएं के सहारे नाराद पहाडी़ के उस पार पहुंचे जहाँ से धुँवा उठ रहा था देखा तो अद्भुत दृष्य था देवों के देव महादेव शिव पहाडी़ के इस पार बैठकर सिगरेट पी रहे थे.तब धूम्रपान पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं था और खुलेआम नाशा किया जा सकता था पर शिव की इस आदत के खिलाफ विश्णु ने याचिका दायर की थी जिसका जिक्र ऋगवेद के पंचवें अध्याय में मिलता है. इतिहास्कारों का मानना है कि पृथवी लोक पर डाली गयी यह पहली याचिका थी इतिहासकारों का यह भी मानना है कि सभी देवों में शिव ही थे जो सभी तरह के नशीले द्रव्यों का पान किया करते थे पर बडे़ बुजुर्ग होने के नाते कोई देवता उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटाता था यह भी माना जाता है कि वर्धा को ड्राई सिटि बनाने का काम विष्णु की उस याचिका ने किया था. शिव के मुह से बदब्म्म आने के कारण अक्सर विष्णु नजदीक से बात नही किया करते थे जिस बात को लेकर पार्वती और लक्षमी में तू-तू मै-मै हो गयी थी. इन सब बातिओं से परेशान होकर विष्णु क्षीर सागर चले गये थे कहा जाता है कि विष्णु पुरुषवादी मानसिकता के थे और दिन भर लक्षमी से पाँव दबवाते थे तब कहीं भी स्त्री अध्ययन जैसा कोई कोर्स नहीं खुला था पर नारी चेतना को लेकर सरस्वती काफी सजग थी और लक्ष्मी की ये हालत देख ही स्त्री अध्ययन की अवधारणा उनके विचार में आयी थी .वर्धा के ड्राई सिटि बनने के बाद शिव कैलास पर्वत चले गये माना जाता है कि वे आज भी वहीं कहीं निवास करते हैं पर उन पर अभी हाल मेम आरोप लगाया गया है कि हिमालय के ग्लेशियर उन्हीं की धूम्रपान की वजह से पिगल रहे है. अगले अंक में जारी.........



बढ़ता महिला यौन शोषण:- चरणजीत म. गा. अं. हि. वि. वि. से

हम इक्कीसवीं शदी के आधुनिक युग में जी रहे हैं एक महाश्क्ति के रूप में भारत अपने को साबित कर रहा है. यह युग सूचना की क्रांति और लोकतंत्र के मूल्यों का देश है जहाँ स्वतंत्रता और स्वेक्षा पूर्वक जीवन जीने का हक सबको हासिल है स्त्रीयों के शोषण अन्याय दुर्व्यवहार को ऎतिहासिक रूप से ही देखा जाता है और आज के समाज में इन्से मुक्त हो जाने की बात कही जाती है कि आज महिलाये स्वतंत्र हैं पर वास्तविकतायें कुछ और ही कहती हैं आज के समय में म्हिला यौन शोषण में गाँवों से लेकर शहरों तक बृद्धि हुई है. स्थिति ये है कि मैट्रों शहरों मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास जैसे शहरों में दिनों में भी महिलायेणं अपने आपको असुरक्षित महसूस करती हैं स्त्रियाँ अपने कामों के लिये जब घर से निकलती हैं तो सड़क, बस स्टैन्ड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल पुलिस स्टेशन, बस रेलगाडी़ में तो असुरक्षित महसूस ही करती हैं पर इससे कम असुरक्षा उन्हें घरों में नहीं होती है.कम मामले सामने आने के बावजूद हर रोज अखबारों में ५-१० मामले खबरों में दिख ही जाते हैं. जिस तरह से फूलन देवी का मामला सामने अया और उन पर फिल्म बनने के बाद लोगों ने उन्हें जाना, भवरी बायी जो उच्च जातीयों कीजातीय हिंसा और यौन उत्पीणन का शिकार बनी उस तरह के कितने ऎसे मामले है जो घरों गाँवों में दबा दिये जाते हैं या महिला खुद ही झेल लेती है. महानगरों में टी.वी. रिपोर्टर वकील डाक्टर जैसी सशक्त महिलायें भी जो समाज में अग्रणी भूमिका निभाती हैं अपने आपको असुरक्षित महसूस करती हैं.महानगरों में भाग्दौड़ की जिंदगी ने जो असंवेदन शीलता भर दी है उसकी एक बानगी देखी जा सकती है कि बंगलौर में आयशा नम की एक पत्रकार बताती हैं कि बंगलौर एक हाइटेक सिटि के रूप में देखा जाता है आधुनिकता का पर्याय भी माना जाता है पर स्थिति ये है कि केवल रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी सड़क चकती महिलाओं के साथ अभद्रपूर्ण व्यवाहार किया जाता है २९ अक्टूबर ०७ को याद करते हुए वह बताती हैं कि इस दिन वे ट्रैफिक में फंसने के कारण आटॊ से उतर कर पैदल चलने लगी तभी मोटर्सायकिल से सवार कुछ लड़के आये और गाडी़ उनके सामने खडी़ कर दी एक ने मुझे धक्का दिया फ़िर जब उन्होंने बाइक को धका देने का प्रयास किया तो एक लड़के ने भद्दी गाली दी पर लोग खडे़ होकर अगल-बगकल देखते रहे कोई सामने नहीं आया जब मैने एफ. आइ. आर. की बात कही तो तो वे लड़के हंसने लगे क्योंकि उन्हें पता था कि पुलिस क्या करती है. फिर मैने पीछे बैठे लड़के को मारा तो वह भी मुझे मारा और ये सारी घटनाये लोग तमासाबीन होकर देखते रहे कोई सामने नहीं आया स्थितियाँ इतनी विपरीत हैं कि महिला सड़कों पर अकेले नहीं चल सकती अतः उसे अपने भाई माँ बाप के साये में ही चलना पड़ता है जहाँ वह गुलामी का एक सुकूं महसूस करती है. चन्डीगढ़ जैसे शहरों की स्थिति ये है कि वहाँ कुंवारी लड़कियाँ जब अपने घरों से निकलती हैं तो अपने गले में मंगलसूत्र डालकर निकलती हैं क्योंकि शादीशुदा होने का भ्रम बनाना चाहती है यह है आजादी का मतलब है आज के समाज में महिलाओं की.दुनियाँ मेम यौनशोषण का ग्राफ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है.नाबालिग लड़कियों से लेकर उम्रदराज महिलायें तक इस शोषण में आती जा रही हैं युनिसेफ के एक सर्वेक्षन से पता चलता है कि सिर्फ एशिया में हर साल दस लाख युवतियाँ यौनशोषण की दलदल मेम धकेली जा रही हैं. जिसमे थाईलैन्ड जैसे देश का नाम अग्रणी रूप से सामने है जहाँ हर साल दस हजार लड़कियाँ यौनव्यापार में ढकेली जाती है. इसमे सिर्फ आर्थिक कार्ण ही नही है बल्कि कुछ अन्य सामाजिक कारण भी है जिनके कारण इतनी बडी़ संख्या में महिलायें यौन शोषण मेम ढकेलि जाती हैं यह घटनायेम तथाकथित विकसित देशों मेम भी इससे कम गति की नही है और वहाँ का ग्राफ एक गंभीर रूप लेता जा रहा है. यह एक बडे़ उद्योग के रूप में पनप चुका है और पूंजीवादी समाज की जरूरत बन चुका है.विश्व भर मे महिला शोषण का बढ़ता ग्राफ चिता का विषय है इसके साथ-साथ यौनशोषण से अन्य समस्यायें भी उभर रही हैं और यह व्यापकता मेम आ रहीं है दिशियों को दन्डित करने के लिये कानून भी बनाये गये है ढेर सारे महिला संगठन भी काम कर रहे हैं पर यह समस्या न तो कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है न्याय व्यवस्था खोखली साबित हो रही है ऎसी स्थितुइ मेम समाज को अन्य सम्स्याओं से हटकर इस समस्या पर गंभीरता से बात करने और सोचने की जरूरत है.साधारणतया समाज इसी दृष्टिकोण से इन समस्याओं का वर्णन करता है कि स्त्रियों द्वारा इस तरह के पहनावे प्र्योग में लाये जाते हैं जिससे मानसिक रूप से यह पुरूषों को आकर्षित करता है या यह कहा जाता है कि महिलायें अकेले न घूमेम कार्यालयो मेम अकेले नौकरी करना या अन्य इस तरह के आम बातेम है जो पुरुष मानसिकता से ग्रसित होकर कही जाती हैं अब सवाल यह उठता है कि क्या उपरोक्त कारण पुरुषों को ये वैद्यता देते हैं कि वे महिलाओं के साथ छेड़खानी करें या उपरोक्त कारणों मेम स्त्री क्या कोई अपराध कर रही है . यहाँ साफ पता चलता है कि समस्या महिलाओं की नही है बल्कि पुरुष के पित्रसत्तात्मक मानसिकता का है . अतः ऎसी स्थिति में पुरुषों को इस मानसिकता से बाहर आकर महिला की समाज मेम बराबर की हिस्सेदारी और भागीदारी की लडा़ई में सामिल होना चाहिये जहाँ एक बेहतर समाज की संकल्पना की जा सके और महिलाओं के संघर्षों मे साथ रहते हुए हमे उनके लडा़ई के पक्ष मेम खडा़ होना चाहिये.


लोकतंत्र का एक कुरुप चेहरा:- कमला थोकचोम म. गा. अं. हि. वि. वि.

मणिपुर एक राजकीय देश था.२१ सितम्बर सन १९४९ को मणिपुर को उस समय के राजा बुद्धचन्द्र को इम्फाल में बुलाकर भारत ने एक समझौता किया . और इस समझौते के बाद १५ अक्टूबर १९४९ को मणिपुअर को भारत के संघ में सामिल कर लिया गया इसके साथ ही मणिपुर भारत का एक राज्य बना लिया गया. आज भी हर साल १५ अक्टूबर को मणिपुअर का काला दिवस के रूप में वहाँ की जनता के द्वारा मनाया जाता है यह वह दिन था जब कहा जाय कि मणिपुर प्र भारत ने कब्जा कर लिया.और कई लोग पूरे महीने काली पट्टी बांधकर चलते हैंआखिर ऎसा क्यों है कि लोग इस दिन को काले दिवस के रूप मेम याद करते हैं कई सालों तक हम इसका मतलब नहीं समझते थे.पर हर दिन घटनें वाली घटनायें देखकर ऎसा लगा कि इतिहास में यह वह मोड़ था जब लोकतंत्र की आड़ मेम मणिपुर को कब्जे में लिया गया. तब से अब तक मणिपुर की जनता दिनों दिन अत्याचारों को सहते हुए आ रही है. और यह कम होने के बजाय दिनों दिन बढ़ रहा है. भारत में अग्रेजों के सत्ता छोड़ने के बाद १९५८ में ही राज्य पर आफ़्सपा नामक एक गैरलोकतांत्रिक कानून लगादिया ग्या है जिसके आड़ में वहाँ के लोगों को मारा जा रहा है वहाँ की महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनायें आम हो गयी हैं . और न जाने कितनी औरते विधवा हो गयी हैं कितने बच्चे अनाथ हो गये कितने माँ बाप बेसहारा हो गये हैं मणिपुर में जिंदगी की अहमियत को आफ़्सपा ने खत्म कर दिया है. स्थिति ये है कि किसी भी व्यक्ति को पकड़ कर इन्काउंटर कर दिया जाता है और उसके हाँथ में बंदूक थमा कर उसे आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है यह एक आम बात हो गयी है जिसे वहाँ का हर इंसान जानता है और सहमा हुआ सा जीता है कि कब उसकी बारी आ जाय राष्ट्रीय मीडिया चंद खबरों को ही अब तक अहमियत दिया है उसमे से एक है मनोरमा हत्या कांड कुमारी थांजम मनोरमा चनु जो कि ३२ वर्षीय महिला थी ११ जुलाई २००४ को बामोन कंपू इम्फाल इस्ट से रात दस बजे १७ असम राइफल्स के जवानों ने उन्हें उठा लिया गलत तरीके से अरेस्ट मेमो दिखाया गया और बिना किसी महिला पुलिस या बिना किसी नजदीकी थाने की सहयाता के वे उसे पकड़ कर ले गये उसे घर मे घर वालों के सामने देर तक पीटा गया और दूसरे दिन घर से तीन किमी की दूरी पर उसकी लास राजमार्ग पर पायी गयी घर वालों ने लास लेने से इनकार कर दिया और न्याय न मिलने तक लास को अपने घर लाने से मना कर दिया. ऎसी स्थिति में उसकी लास कुछ दिन के बाद म्युनिसपल्टी के लोगों द्वारा जला दी गयी. मनोरमा के मरने के ठीक ४ दिन बाद महिलाओं ने निरवस्त्र होकर असम राइफल्स के गेट पर प्रदर्शन किया और नारा दिया इंडियन आर्मी रेप अस गो बैक इंडियन आर्मी यह उनका एक प्रतिरोध था कि अपनी बेटियों पर हो रहे अत्याचार को वे सह नही सकती. पवित्रता का ढोंग रचने वाले देश को एक चेहरा दिखाया. इस साल की २२ जुलाई को भी हजारॊं विरोधियों ने इसका विरोध किया और कई नारे दिये काला कानून हटाओ, उत्तर भारत से आफ्सपा को भगाओ, कांगला को आर्मी से मुक्त करो कांगला एक ऎतिहासिक जगह है मनोरमा केस की जाँच रिपोर्ट को प्रकाशित करो, २४ जुलाई को पांच कारयकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के गेट पर खुद को जलाने की कोशिश की इसके पश्चात २६ जुलाई को मणिपुर छात्र संघ के छात्र छात्राओं को राज भवन के गेट पर आफ्सपा के जवानों ने पीता, कितनी ऎसी घटनायें बीत चुकी हैं जिनका जिक्र चंद हर्फों में नही किया जा सकता एक दिन वह भी याद करना जरूरी अगता है जब देश का प्रधान मंत्री लाल किले पर तिरंगा फहरा रहा था और बिसन पुर मणिपुर मेम पेबम चितरंजन नाम का ३२ वर्षीय एक युवक १५ अगस्त को अपने को यह कहते हुए जला लिया कि इस कानून में मरने से अच्छा है मसाल जी तरह जलकर मरना तकि भारतीय लोकतंत्र पने लोकतांत्रिक चेहरे को देख सके इसी साल २१ जुलाई को मनोरमा काश्राद्ध कर्म मनाया गया पर इसके बावजूद पूरा देश शान्त हैं हमे नहीं पता हम कब नहीं रहेंगे कब अपने घर से निकलेंगे और माँ इंतजार में खडी़ खडी़ बूढी हो जायेगी और हम नहीं लौटेंगे.

23 अक्टूबर 2008

मनसे की राजनीति वर्तमान संसदवादी गलियारे की एक खिड़की है:-


दिनों दिन विस्फोटों की संख्या बढ़ती जा रही है आतंकवादियों के नाम पर मुस्लिमों को पकडा़ जा रहा है सिमी के कार्यकर्ताओं को पकडा़ जा रहा है जिस पर पिछले छः साल से प्रतिबंध लगा है जब्कि अब तक सिमि पर एक भी जुर्म साबित नहीं हो पाया है उडी़सा में हिन्दूओं द्वारा इसाईयों पर हमले केरल की सबसे पुरानी चर्च में तोड़-फोड़ पिछले दो माह से महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रांतवाद और भाषावाद के आधार पर उत्तर भारतीयों की पिटाई, राज ठाकरे की गिरफ्तारी और उसके फलस्वरूप महाराष्ट्र में उग्र प्रदर्शन ये महज कुछ घटनायें नहीं है जो मनमाने तरीके से पूरे देश में घट रही हैं बल्कि यह चुनाव के नजदीकी के संकेत हैं दरासल यह संसदीय पार्टियों की राजनीति का एक हिस्सा है जिसका चुनाव के पूर्व घटित होना जरूरी है ताकि हाल में आयी आर्थिक मंदी बढ़्ती महंगायी न्युक्लियर डील के पेंच पर से जनता का ध्यान हटाया जा सके इस तरह के मसले में जन भावनाओं को भड़काकर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां उसे वोट बैंक में बदलने में कामयाब हो सकती है इसके अलावा उनके पास अब वोट लेने का और कोई चारा नहीं बचा है क्योंकि किसानों की कर्ज माफी जैसे दिखावे छठे वेतन आयोग के लागू होने का सच इस कमर तोड़ मंहगाई में खो चुका है और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में किसान आत्महत्यायें और बढी़ हैं
पिछले दो महीने से लगातार उत्तर भारतीयों पर जारी हमले जिसे राज ठाकरे के उग्र भाषणों के जरिरे पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूम कर भड़काने का प्रयास किया गया उसी का यह परिणाम था कि रेलवे विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में मुंबई आये उत्तर भारतीयों पर मनसे के कार्यकर्ताऒं द्वारा उत्तर भारतीयों की पीटा गया और इसके पश्चात राज ठाकरे की नाटकीयता पूर्वक देर रात कुछ मअमूली धाराऒं के तहत गिरफ्तारी हुई जिसके बाद उन्हें जमानत भी मिल गयी और दो महीने तक उनके भाषण और मीडिया से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया सवाल उठता है कि क्या यह मामला उतना ही सरल है जितना दिख रहा है पिछले दो महीने से जब राज ठाकरे इस तरह के भड़काऊ भाषण दे रहे थे और उनके कार्यकर्ता मुंबई में जगह-जगह उपद्रव कर रहे थे तब सरकार ने क्यों नहीं चेता क्या वह किसी बडी़ घटना घटित होने के फिराक में थी राज्ठाकरे की यह बयान बाजी कि सरकार की हिम्मत हो तो पकड़ कर दिखाये इस बात का संकेत करती कि प्रांतवाद और भाषावाद की राजनीति करने वाले राज ठाकरे को राज्य सरकार की कमजोर ताकत का पता था या फिर राज्य सरकार की मिली भगत से सब कुछ चल रहा था चुनाव की नजदीकी के बढ़ते इसके पीछे कुछ और ही पेंच हैं जिसके कारण राज्य सरकार ने झारखण्ड कोर्ट के आदेश के बाद देर रात राज ठाकरे को कुछ मामूली धाराओं के तहत गिरफ्तार ्करने को मजबूर हुई और चंद बयान बाजियाँ देना भी उसकी मजबूरी थी इस आपसी राजनीतिक मसले को समझना जरूरी है कि आगामी चुनाव में शिवसेना का कमजोर होता जनाधार फिर से शिवसेना के रूप में पाया जाना मुश्किल था अतः मनसे शिवसेना के एक नये रूप में आयी जहाँ बाला साहेब ठाकरे का चेहरा बदल कर एक युवा व्यक्ति राज ठाकरे का हो गया है जो कि पहले शिवसेना में ही थे शिव सेना के प्रभाव में आया जन मान्स अब धीरे-धीरे विमुख हो रहा था क्योंकि शिव सेना के पास कोई ठोस आधार नहीं था जिस पर वह खडी़ होकर राजनीति कर सके और अपना जन मत जुटा सके अब जबकि राज ठाकरे ने मनसे के रूप में प्रांतवाद और भाषावाद को आधार बनाकर चुनाव के पहले जल्द से जल्द अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिये जुटे हैं ऎसे में घट रही ये घटनायें अंततः कांग्रेस को ही मजबूत करेगी क्योंकि प्रान्तवाद के जरिये जन मान्स को ज्यादा दिन तक नहीं बांधा जा सकता इसका एक पक्ष और है जिसका फायदा यूपी बिहार की क्षेत्रीय पार्टियाँ हिंसा हुए लोगों के साथ हमदर्दी जताकर उठायेंगी उनके लिये भी यह एक मसाला ही है जो नजदीकी चुनाव में मुद्दों के अकाल मेम मिल जा रहा है साथ में जिस रोजगार के सवाल को लेकर राजठाकरे जनता को गुमराह कर रहे हैं वह सवाल वर्तमान सत्ता व्यवस्था की समस्या है जिसका किसी भी पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं है वह जनसंख्या बढोत्तरी और रोजगार की कमी व रोजगार गारंटी जैसी असफल योजनायें चलाकर सिर्फ गुमराह कर सकती है वर्तमान सत्ता व्यवस्था के सामने सबको रोजगार सबको शिक्षा दे पाना संभव नहीं रह ग्या है पर वह प्रांतवाद भाषावाद क्षेत्रवाद को आधार बनाकर विट की राजनीति कर सकती है महाराष्ट्र मेम ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र में एक बडा़ युवा वर्ग जिसे न शिक्षा मिल पा रही है न ही रोजगार ऎसे में उसकी उर्जा को आस्था भावना क्षेत्रवाद भाषावाद प्रान्त्वाद के आधार पर विभाजित करके ही संसदीय पार्टीयां इस शक्ति को काबू में रख सकती हैं या अपने साथ ले सकती हैं वर्ना इन पार्टीयों को सबसे बडा़ भय यह है कि ये युवा वैकल्पिक व्यवस्था की लडा़ई लड़ रहे आंदोलनों के साथ न चले जायें जो कि उन सबके लिये सबसे बडा़ खतरा हैं इन पार्टियों को पता है कि आस्था अमूर्त विकास आतंकवाद जैसे कुछ ऎसे टूल हैं चुनाव के पहले जिनका इश्तेमाल कर जनता को गुमराह किया जा सकता है और संसदीय राजनीति से मोह भंग होने की स्थिति को रोकने का प्रयास किया जा सकता है जिसे आमजन को समझने की जरूरत है और क्षेत्र भाषा व आस्था से हटकर समानता मानवता और वर्ग विहीन समाज के लिये संघर्ष करने की जरूरत है.

23 सितंबर 2008

समाज नहीं जुडेगा तो शिक्षा किसी काम की नहीं

सबके लिए शिक्षा कार्यक्रम के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति, जनजाति के बालक, बालिकाओं की शिक्षा के साथ-साथ अन्य उपेक्षित व वंचित तथा अल्पसंख्यक बालक-बालिकाओं की शिक्षा के लिए अनेक किस्म के शैक्षिक कार्यक्रम चल रहे हैं. इसके लाभ कुछ चिह्नित लोगों को मिले भी हैं. इस कारण आम जन में भ्रम पैदा हो गया है. वे शैक्षिक कार्यक्रमों के भुलावे में फंस गये हैं. शिक्षा अब सिर्फ जीविकोपार्जन का माध्यम बनी हुई है और बाजारू मूल्य के अनुरूप शैक्षिक कार्य हो रहे हैं.
इन स्थितियों में शिक्षा व्यवस्था के ऊपर सरकार का पूर्ण अधिकार कायम हो गया है. इसने शिक्षा व्यवस्था का केंद्रीकरण किया है. हालांकि सरकारी, गैर सरकारी, सामाजिक एवं धार्मिक शैक्षिक संस्थाएं एक साथ चल रही हैं. इससे लगता है कि शिक्षा का विकेंद्रीकरण हुआ है, लेकिन वास्तविकता इससे उलट है. इन सबके बावजूद केंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था बनी हुई है.
इधर बिहार के गैर सरकारी स्कूलों में पाठ्य-पुस्तकों एवं पाठ्यचर्या के माध्यम से हिंदू व मुसलिम इतिहास की बातें खुलेआम चल रही हैं. इसलिए लोगों में संप्रदायों के बारे में तुलनात्मक भाव पैदा हो रहे हैं. इससे समाज में एक किस्म का धार्मिक अलगाव भी पैदा हो रहा है. आम जन को विभाजित किया जा रहा है. संप्रदायों के बारे में गलतफहमियां पैदा हो रही हैं.
इन सबके बावजूद राज्य सरकार द्वारा इस संदर्भ में किसी तरह के हस्तक्षेप नहीं हुए हैं, जबकि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार समिति ने बिहार की स्कूली पुस्तकों के इस प्रसंग को काफी गंभीरता से लिया है. इसकी खबरें राज्य के सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी हैं. फिर भी राज्य द्वारा गठित समान स्कूल प्रणाली आयोग एवं बिहार पाठ्यचर्या रूपरेखा, २००८ में इसकी पूर्ण अनदेखी हुई है. इस तरह की शैक्षिक गतिविधियों से सांप्रदायिक मानस के निर्मित होने की आशंका है. फिर भी इस तरह के शिक्षण संस्थानों को राज्य द्वारा विभिन्न तरह से प्रोत्साहन मिल रहा है. दूसरी ओर शैक्षिक प्रक्रिया में विवेचनात्मक पहल बंद हो गयी है.
मनुष्य के अंदर कल्पना के पालन एवं संरक्षण में विचार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन अवधारणात्मक भटकाव होने से सोचने-समझने की शक्ति का ह्रास हुआ है. इस कारण शैक्षिक कार्यक्रम की वर्तमान प्रकृति से विवेचन की शक्ति लगातार कमजोर हो रही है, क्योंकि इसमें स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने का अवसर नहीं मिलता है.
शैक्षिक कार्यक्रमों की प्रकृति के कारण समाज में नयी संस्कृति एवं परंपरा का जन्म हुआ है. इससे सोच एवं समझ के स्तर में गहराई आने के बजाय इसमें विभ्रम की स्थिति पैदा हुई है. पढे-लिखे लोगों और अनपढ लोगों के बीच स्थायी दीवार खडी हो गयी है. वर्तमान प्रणाली के कारण ज्ञान सृजन में अनुभव का औचित्य खत्म हो गया है. इससे ज्ञान और काम के बीच का रिश्ता टूट गया है. गांव-शहर, शिक्षक-छात्र, शिक्षक-समुदाय, शिक्षक-शिक्षाशास्त्री, प्राथमिक-माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के स्तर पर अलग-अलग स्वतंत्र संकाय कार्य कर रहे हैं. इन वजहों से शिक्षा के लिए पूंजी का महत्व बढ गया है. शैक्षिक कार्यक्रम पूंजीपरस्त हो गये हैं. शिक्षा की योजनाएं भी लाभ-हानि की संभावनाओं के अनुरूप तय हो रही हैं. जाहिर है कि इससे शिक्षा के मूल्य में ह्रास होगा, जो शुरू हो भी चुका है.
मनुष्य में सोचने एवं विचार करने की शक्ति नैसर्गिक रूप से विद्यमान रहती है. इसलिए अनपढ व्यक्ति भी तर्क-वितर्क करते हैं और पढने-लिखने के बाद परीक्षण तथा अनुसंधान करते हैं. लेकिन वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में यह अवसर नहीं है.
शिक्षा के खर्च की आड में अब राज्य अपने दायित्व से मुंह मोडने लगा है. जबकि जन शिक्षा के कारण आमजन की जन्म एवं मृत्यु दर में सकारात्मक बदलाव आये हैं. जीवनस्तर भी समृद्ध हुआ है. राष्ट्रीय आय के उपार्जन एवं वितरण की प्रक्रिया में संतुलन आया है, फिर भी जन शिक्षा द्वारा अर्जित इस लाभ के अंशों को उपार्जन के रूप में नहीं देखा जा रहा है, क्योंकि शिक्षा के सामाजिक सरोकार को खत्म कर दिया गया है. इस कारण मानवीय मूल्य की बातें सामाजिक मूल्य से अलग की जा रही हैं. शैक्षिक कार्यक्रम में सामाजिक मूल्य अप्रसांगिक हो गये हैं.
शैक्षिक प्रक्रिया में व्यक्ति केंद्रित पहल चल रही है. शैक्षिक कार्यक्रम के निर्माण एवं संचालन में सामाजिक दृष्टिकोण की जगह व्यक्तिवाद स्थापित हो रहा है. इस कारण शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक मूल्य का औचित्य खत्म हो गया है. शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक हस्तक्षेप में ठहराव आ गया है.
सामाजिक मूल्यों के अप्रासंगिक होने के कारण शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक प्रक्रिया बंद हो गयी है. पहले से सामुदायिक सहयोग के भाव सीमित हुए हैं. कुल मिला कर शैक्षिक प्रक्रिया कमजोर हुई है. इस कमजोरी को ठीक करने के लिए व्यक्ति केंद्रित अवधारणा (प्रधान शिक्षक, मुखिया, समिति के सचिव, अध्यक्ष) के तहत सघन काम चल रहे हैं, जिसने सामाजिक प्रक्रिया का आधार ध्वस्त हो कर दिया है. सामाजिक हस्तक्षेप भी कम हुआ है. यह कमी स्वतःस्फूर्त नहीं है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में जारी सामाजिक प्रक्रिया के सिद्धांतों की अवहेलना होने के कारण आया है. इसलिए सामाजिक हस्तक्षेप में ठहराव एक महत्वपूर्ण शिक्षाशास्त्रीय मसला है. लेकिन इसके पहलुओं की चर्चा पाठ्यचर्या के निर्माण एवं संचालन के स्तर पर नहीं की जाती. परिणामस्वरूप शिक्षा व्यवस्था में यथास्थिति बनाये रखनेवाले शिक्षाशास्त्र का वर्चस्व कायम है.
शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति/संस्था/संगठन के स्तर पर हुए अंकेक्षण से उजागर हुआ है कि शैक्षिक कार्यक्रम नियम विरुद्ध कार्य चल रहे हैं, क्योंकि बेकायदा कार्यपद्धति अपनायी जा रही है. इस संबंध में अधिकारी, मंत्री, मुख्यमंत्री को जानकारी देना भी उपयोगी नहीं रह गया है. उदाहरणस्वरूप एनसीइआरटी, नयी दिल्ली के अखिल भारतीय सातवें शिक्षा सर्वेक्षण के प्रतिवेदन को देखा जा सकता है, जिसमें बिहार के अरवल जिले के करपी प्रखंड के अस्तित्वहीन बदरीगढ गांव के स्कूल को सात शिक्षकों के साथ पक्के भवन के रूप में प्रदर्शित किया गया है. इस तरह की अनियमितता प्रखंड स्तर पर और भी है. इससे जिला और राज्य की शिक्षण संस्थाओं की स्थिति की विश्र्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खडा होता है.
हमलोगों ने इस संबंध में २९ मार्च, २००६ को सचिव, मानव संसाधन विकास विभाग, भारत सरकार को पत्र लिखा. लेकिन इस संबंध में अभी तक युक्तिसंगत जवाब नहीं मिला है, जबकि इस सर्वेक्षण के प्रतिवेदन के आधार पर अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय शैक्षिक कार्यक्रम के मानक बनते हैं और उसके आधार पर शैक्षिक कार्यक्रम चलते हैं. इस संदर्भ में राज्यस्तरीय कार्यों की स्थिति को समझने के लिए अरवल जिला का ही एक उदाहरण लिया जा सकता है. करपी प्रखंड में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा पूर्ण मान्यता प्राप्त उच्च विद्यालय, आनंदपुर के पास अपनी जमीन तथा प्रारंभिक भवन हैं, परंतु राज्य सरकार की अनदेखी के कारण इस विद्यालय की स्थिति काफी दयनीय बनी हुई है. इस कारण यह आनंदपुर गांव का यह विद्यालय खेदरू विगहा में चल रहा है. इस संबंध में ग्राम चौहर, मानपुर, बालागढ, पकरी आदि गांवों के १३४ ग्रामीणों के हस्ताक्षर से राकेश कुमार द्वारा १२ अप्रैल, ०६ को दिया गया आवेदन एक प्रमाण है. इससे यह उजागर होता है कि बिहार में मान्यता प्राप्त चलंत विद्यालय (एक गांव से दूसरे गांव) की भी परंपरा बनी हुई है.
२००७ में महालेखाकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान के प्रस्तुत अंकेक्षण प्रतिवेदन से व्यवस्था के अभाव, नियम रहित कार्यों के संचालन से अवहित कर्म (ङ्क्षङ्क्षङ्क्षङ्क्षङ्क्षङ्क्षङ्क्ष) उजागर हुए हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की अनियमितताओं की चिंता सामाजिक, राजनीतिक, अकादमिक एवं प्रशासनिक स्तर पर नहीं किये जाने के कारण भ्रष्टाचार के आधार का संवर्धन जारी है.
शिक्षा के क्षेत्र में जारी अनियमित पहल से संबद्ध लोगों का आचरण बिगड रहा है. इस कारण कुछ पाने या गलतियों से बचने या बचाने की प्रवृत्ति का विकास हुआ है. उदाहरणस्वरूप बिहार में गठित समान स्कूल प्रणाली आयोग की प्रक्रिया को देखा जा सकता है. इसमें अवधारणात्मक कमियों के कारण आयोग की संरचना में नौकरशाही का प्रभुत्व है. इसलिए अन्य शिक्षाकर्मियों को औपचारिक एवं अनौपचारिक रूप से संपर्क करने के बावजूद विमर्श का अवसर नहीं मिला. १८ नवंबर, २००६ को एक जनपक्षी मसौदा सभी सदस्यों को कार्यालय में पत्र के साथ समर्पित किया गया, लेकिन इसकी अनदेखी की गयी. १८ नवंबर, २००६ को पुनः उसी तरह बिहार की शैक्षिक पारिस्थितिकीय दस्तावेज सभी सदस्यों को प्रस्तुत किया गया था. लेकिन उसकी भी अनदेखी की गयी.
कहा गया कि समान स्कूल प्रणाली की व्यवस्था के लिए काफी धन की जरूरत है. यह बिहार जैसे पिछडे और गरीब राज्य के लिए संभव नहीं है. इसलिए आयोग की अनुशंसा में स्थानीय निकाय के साथ निर्धारित समन्वयन की प्रकृति से जनतांत्रिक प्रक्रिया नहीं उभरती है. इसमें स्कूल के पोषक क्षेत्र के निर्धारण में भी स्थानीय निकाय की भूमिका को महत्वपूर्ण नहीं माना गया है. इस संबंध में सवाल उठाने पर आयोग के एक सदस्य द्वारा कहा गया कि बिहार की पंचायती राज्य प्रणाली बहुत पिछडी हुई है. ऐसे में उसे शिक्षा की व्यवस्था में पूरी तरह शामिल नहीं कर सकते. जब इसमें सुधार होगा, तभी इसे लिया जायेगा.
आयोग की अनुशंसा में कहा गया है कि विद्यालयों के अधिग्रहण से शिक्षकों के चरित्र में रातों-रात बदलाव आये हैं. शिक्षक अब सरकारी नौकर हो गये हैं और उनमें लापरवाही के भाव पैदा हुए हैं. स्कूल व्यवस्था की दुर्दशा के लिए मुख्य रूप से शिक्षक को दोषी बताया गया है, जबकि राज्य की नीति संहिता में शिक्षकों के सृजन एवं नियंत्रण का प्रावधान है. फिर भी शिक्षकों की गरिमापूर्ण श्रृंखला को पंचायत शिक्षक, प्रखंड शिक्षक, नगर शिक्षक, व्यावसायिक शिक्षक आदि के नाम से अलग-अलग श्रेणियों में बांट दिया गया है.
इसी तरह प्राइवेट स्कूल के पक्ष में आयोग के सदस्यों द्वारा कहा गया कि आयोग की रिपोर्ट में निजी स्कूलों को नजरअंदाज नहीं किया गया है और न ही उन्हें बंद करने का निर्णय लिया गया है. सरकार के सिद्धांतों के अनुसार जो निजी स्कूल कार्य करेंगे, उन्हें सरकार की ओर से अनुदान भी दिया जायेगा. इसमें अपने दायित्व से बचने के लिए सदस्यों द्वारा यह गुहार लगायी गयी कि राज्य में प्राइवेट स्कूल की लॉबी बहुत मजबूत है. अंततः इस तरह की बातें शिक्षा को खरीद-फरोख्त की वस्तु बना देती हैं.
१९९९ में विश्र्व बैंक के सहयोग से ज्योमतियन में सबके लिए शिक्षा सम्मेलन हुआ. इसके बाद १९९५ में प्रायरिटीज एंड स्ट्रैटेजीज फॉर एजुकेशन नाम्व से विश्र्व बैंक द्वारा समीक्षा प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ. इसमें शिक्षा के सामाजिक कामों के लाभ को उजागर नहीं किया गया, लेकिन वर्ष १९९८-९९ में विश्र्व बैंक की वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट में विकास के लिए ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा की संस्तुति को महत्वपूर्ण सवाल बनाया गया है और २००० में विश्र्व बैंक द्वारा डकार में पुनः सबके लिए शिक्षा सम्मेलन हुआ. इससे शिक्षा सेवा एक महत्वपूर्ण धंधे के रूप में उभरी है. उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए विदेश में जाकर पढने की प्रक्रिया तेज हो गयी है. २००५-०८ के विश्र्व बैंक के रिपोर्ट के अनुरूप यहां शिक्षा की नियमावली में संशोधन हुए और नये-नये कानून बनाये जा रहे हैं. विश्र्व बैंक के नॉलेज बैंक की अवधारणा के अनुरूप विद्यालय से लेकर विश्र्वविद्यालय तक शैक्षिक कार्यक्रम शुरू हैं. इससे शिक्षा के सामाजिक मूल्य की जगह उपयोग एवं इस्तेमाल का पक्ष महत्वपूर्ण बन गया. इस कारण शिक्षा में बाजारू मूल्य का विस्तार हुआ है. प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक खरीद-फरोख्त का काम शुरू हो गयी है. शिक्षा की निजी दुकानों की होड मची हुई है. इसमें डोनेशन की अवधारणा को सेवा शुल्क के तर्ज पर प्रस्तुत किया जा रहा है.
शैक्षिक संस्थाओं के कार्यक्रमों के उपयोग के लिए वसूल किये जानेवाले कर को सेवा शुल्क के रूप में लिया गया है, लेकिन लाभ की दृष्टि से निर्धारित सेवा शुल्क के कारण सामान्य बच्चे छूट जा सकते हैं. इस कारण पूर्व में लाभकारी सेवा शुल्क वसूल करने के लिए शिक्षण संस्थान अधिकृत नहीं थे. इसलिए शिक्षा की नियमावली को इसके अनुकूल बनाया जा रहा है. इससे शिक्षण संस्थानों के डोनेशन की कार्यपद्धति का वैधानिकीकरण हो रहा है. उपभोक्तावादी संस्कृति को संरक्षण मिल रहा है. शिक्षा व्यवस्था में उपभोक्तावादी संस्कृति कायम हो गयी है. इससे शैक्षिक कार्यक्रम जनविरोधी हो गये हैं. इन्हें जनपक्षी बनाने के लिए अब शिक्षा व्यवस्था का सामाजिकीकरण एकमात्र रास्ता है.
उपभोक्तावादी संस्कृति से उबरने के लिए शिक्षा के बाजारू चरित्र में बदलाव जरूरी है. इसलिए शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त अनियमितता एवं भ्रष्टाचार को खत्म करना है. इसके लिए सामाजिक हस्तक्षेप जरूरी है. किंतु यह काम सामाजिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है. इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना है. वर्तमान शैक्षिक विमर्श को बदलना है. परंतु यह जटिल कार्य है. इसलिए शैक्षिक कार्यक्रमों में अवधारणात्मक बदलाव के लिए आलोचनात्मक चेतना का विकास करना है. इसलिए सभी स्तर पर आमजन की सृजनात्मक भागीदारी के अवसर पर सृजन करना जरूरी है. इससे पूंजीपरस्त सरकारीकरण की कार्यपद्धति में सामाजिक शक्ति को पुनर्स्थापित किया जा सकता है. इसलिए शिक्षा की रूपरेखा को जनपक्षी बनाने का यह एकमात्र रास्ता है.
लेखक जानेमाने शिक्षाविद हैं और ग्रामीण स्तर पर शिक्षा व्यवस्था के लंबे अध्ययन के दौरान उन्होंने यह लेख लिखा है.

17 सितंबर 2008

समाज नहीं जुडेगा तो शिक्षा किसी काम की नहीं

शिक्षा की वर्तमान दशा दिशा व खासतौर से विदर्भ में पुलिस प्रशासन द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में की जा रही दख़लंदाजी को ध्यान में रखते हुए दखल भित्ति पत्रिका का अंक शिक्षा पर केन्द्रित था जिसकी सामाग्री को विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व इंटरनेट से चुना गया था. पत्रिका के इस अंक को सुविधा के लिये हम एक-एक आलेख के रूप में प्रकाशित कर रहे है.
शिक्षा सेवा एक महत्वपूर्ण धंधे के रूप में उभरी है. उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए विदेश में जाकर पढने की प्रक्रिया तेज हो गयी है. २००५-०८ के विश्र्व बैंक के रिपोर्ट के अनुरूप यहां शिक्षा की नियमावली में संशोधन हुए और नये-नये कानून बनाये जा रहे हैं. विश्र्व बैंक के नॉलेज बैंक की अवधारणा के अनुरूप विद्यालय से लेकर विश्र्वविद्यालय तक शैक्षिक कार्यक्रम शुरू हैं. इससे शिक्षा के सामाजिक मूल्य की जगह उपयोग एवं इस्तेमाल का पक्ष महत्वपूर्ण बन गया. इस कारण शिक्षा में बाजारू मूल्य का विस्तार हुआ है. प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक खरीद-फरोख्त का काम शुरू हो गयी है. शिक्षा की निजी दुकानों की होड मची हुई है. इसमें डोनेशन की अवधारणा को सेवा शुल्क के तर्ज पर प्रस्तुत किया जा रहा है. अक्षय कुमारशिक्षा महज अक्षर एवं अंक ज्ञान या तकनीकी शिक्षण, प्रशिक्षण या सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं, बल्कि मानव का निर्माण करनेवाली एक सामाजिक प्रक्रिया है. इसलिए शिक्षा व्यवस्था की बंदोबस्त के लिए सामाजिक सरोकार अनिवार्य हैं, परंतु स्कूली पाठ्य पुस्तकों एवं शिक्षण व्यवस्था को जन सरोकार से अलग भुलावे में रखने की कोशिश हो रही है. व्यवस्थित शैक्षिक कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षा के बुनियादी मूल्यों को हर स्तर पर बदलने का काम एकतरफा चल रहा है. इससे शिक्षा के लिए समान अवसर का परिप्रेक्ष्य धूमिल हो गया है. इसलिए समान शिक्षा प्रणाली के कामों को अलग-अलग कर लागू किया जा रहा है, जबकि समान शिक्षा प्रणाली का काम टुकडों में नहीं किया जा सकता है. सबके लिए शिक्षा अभियान के जारी कार्यक्रमों से हर क्षेत्र में द्वंद्व पैदा हुए हैं, क्योंकि इसमें शैक्षिक कार्यक्रमों और समान शिक्षा की व्यवस्था के बीच अन्योन्याश्रय संबंध के छद्म का बोध हो रहा है, लेकिन इसकी रूपरेखा रहस्यपूर्ण बनी हुई है. इसलिए शिक्षा व्यवस्था के गोपनीय विषय को हम नहीं समझ पा रहे हैं. इस कारण शैक्षिक कार्यक्रम के प्रयोजन और परिणाम के संदर्भ में व्यवधान पैदा हो गया है.शिक्षा के लिए समान अवसर का प्रयोजन समानता, सद्भाव एवं सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प की स्थापना करना है. इसलिए समाज में मानवीय मूल्य का विकास करना इस अवधारणा का मूलभूत परिणाम है. लेकिन शिक्षा की बात करनेवाले अर्थवादी हो गये हैं. इस कारण निर्धारित प्रयोजन को वे नजरअंदाज कर रहे हैं. इससे सोचने एवं काम करने की कार्यपद्धति यांत्रिक हो गयी है और प्रयोजन के अनुरूप परिणाम नहीं निकल रहे हैं. सबके लिए शिक्षा कार्यक्रम का प्रयोजन सबको साक्षर बनाना है और जीविकोपार्जन के लिए अक्षर एवं अंक की पहचान करना है. इसलिए सबके लिए शिक्षा के कार्यक्रमों में सामाजिक-आर्थिक अवस्था एवं हैसियत के अनुरूप शिक्षा से जुडने का प्रयोजन तय है. इसलिए साक्षरता के औसत में वृद्धि इसका परिणाम है. व्यावसायिक प्रशिक्षण के आधार पर व्यक्तिगत जीवन को संवारना है. सबके लिए शिक्षा का प्रयोजन अब बाजार के लिए मानव संसाधन तैयार करना है. इसके परिणामस्वरूप तर्कहीन, आज्ञाकारी, अनुशासित सेवक बनाने की शैक्षिक कार्रवाई अनेक रूपों में निरंतर चल रही है. इसमें रोजगार के अवसर की बातें आदर्शवादी ढंग से की जाती हैं. शिक्षा व्यवस्था के ये अलग-अलग रास्ते हैं. दोनों के प्रयोजन और परिणाम के पहलू भिन्न-भिन्न हैं. फिर भी इन दोनों के बीच घालमेल की स्थिति बन गयी है. इसलिए नामांकन आदि के मिथ्या वर्णन द्वारा व्यवस्था के पक्ष में तार्किक आधार गढा जा रहा है. इससे अवधारणात्मक भटकाव की स्थिति पैदा हो गयी है. जारी...........



15 सितंबर 2008

हिन्दी दिवसः

संग्रहालय में गांधी प्रतिमा के नीचे दीमक लगी हुई लकडी़ की एक प्लेट टंगी हुई है.जिस पर ११ माह २९ दिन की गर्द जमी हुई है.पिछले १४ सितम्बर को साफ हुई थी आज फिर से साफ हो रही है. सफेद पेंट से लिखे हुए हर्फ़ मिट चुके हैं पर चश्मा लगाकर पढा़ जा सकता है कि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है-महात्मा गांधी. हिन्दी दिवस हिन्दी के लिये रोने का दिवस है,हिन्दी का गुणगान करने का दिवस है और दिवस है ढेर सारे सवाल खडे़ करने का,हिन्दी के अशुद्धता का सवाल, हिन्दी और तकनीक का सवाल,हिन्दी प्रचार का सवाल आदि-आदि. पर इन सबके बीच एक और महत्वपूर्ण सवाल है १० राज्यों की राज्य भाषा का,या वहाँ के आधिकांश जन की भाषा का, और एक अरब से अधिक लोगों की राजभाषा का सवाल.हिन्दी को आज इस रूप में ज्यादा समझने की जरूरत है कि हिन्दी का भाषा से ही नहीं बल्कि मानवीय उत्पीड़न के भाषा की उस शैली में निहित है जिसके भीतर हम और दूसरे लोग भाषायी रूप से परिभाषित करते हैं. इस रूप में यह भाषा का वर्ग विभाजन है जहाँ भाषायी आधार पर समाज का स्तरीकरण हुआ है और वह एक स्तर पर नहीं बल्कि कई स्तर पर विखण्डित हो चुका है.अंग्रेजी के बढ़्ते प्रभाव के कारण हिन्दी के लिये खतरे देखने की जरूरत नहीं है जबकि इसका आधार भाषा की वर्गीय सवर्णता जिसे भारत जैसे बहुभाषी देश में अन्य भाषाओं व बोलियों में भी देखा जा सकता है और वे अपनी अस्मिता के लिये जूझ रही हैं. दरअसल हिन्दी के बहाने भाषा की उस प्रक्रिया को समझने की जरूरत है जो नवौदारवादी नीति लागू होने के बाद और तेजी से शुरू हुई. नव उदारवादी नीति लागू होने के बाद समाज के सभी तत्वों का केन्द्रीकरण शुरू हुआ और यहाँ से एकाधिकार की प्रक्रिया और तेज हुई जिससे भाषा को अछूता नहीं रखा जा सकता था बल्कि भाषा का संप्रेषणियता से सीधा संबन्ध है इसलिये राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक भाषा का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी अन्य भाषा का एकाधिकार होना लाजमी था.अतः हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा तो नहीं बन सकी बल्कि राजभाषा के रूप में भी इसे लागू किया जाना कठिन काम बन गयाक्योंकि अब राष्ट्र के द्वारा किये गये काम काज को सिर्फ राष्ट्र के अंदर तक सीमित नहीं रखा जा सकता था, इसका लेखा जोखा वर्ल्ड बैंक को देना है,डब्लू.टी.ओ. को देना है, व दुनिया के उन आकाओं को जो हमारे खाने तक पर नजर रखते हैं, आर्थिक व अपरिक्ष रूप से जो देश दुनिया पर शासन कर रहे हैं उनको आप हिन्दी में लेखा जोखा नहीम दे सकते, अतः अंतर्राष्ट्रीय रूप से भाषा का भी साम्राज्यीकरण हुआ है. भारत के प्रतिनिधि व वर्चस्वशाली वर्ग को अपने अस्तित्व को बचाने व पूजी की व्यवस्था को मजबूत करने के लिये अंग्रेजी सीखना जानना जरूरी है.पिछले वर्ष हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर न्युयार्क के हिन्दी सम्मेलन में जोरदार आवाज उठी यह मांग १९७५ नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से उठ रही है.देर सबेर यह मांग पूरी भी कर दी जायेगी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में वर्चस्व शाली देशों को भारतीय व अन्य हिन्दी भाषी देशों में बाजार की संभावना पता है.जिसकोलेकर अमेरिका व अन्य कई देश अपने यहाँ हिन्दी के पठन-पाठन की तरफ तत्पर हैं. ताकि वे बेहतर ढंग से न सिर्फ भारत बल्कि मारिसस,शूरीनाम, फ़िजी,गयाना आदि में प्रवेश कर सकें. आज यदि कुछ वर्चस्व शाली देश अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन की संस्कृति को विकसित कर रहे हैं तो उनका मकसद दो सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित करना नहीं है बल्कि इस दूसरे या तीसरे स्थान पर सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के जरिये उन लोगों तक पहुंचना है जहाँ हिन्दी बोलकर वे सहजता से अपना माल बेंच सकें. हिन्दी भाषा एक बडे़ समाज,संस्कृति, इतिहास, राष्ट्र, की अस्मिता और उसके भाषायी लक्ष्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है. किसी भाषा का विकास दिवस मनाने, प्रचार समिति गठित करने,विश्वविद्यालय खोलने व शिक्षण संस्थान चलाने से नहीं होती है. उसके लिये जरूरत है मौलिक शोध की और यह शोध समाज, विज्ञान, तकनीक व उन सभी क्षेत्रों में होनी चाहिये जो वर्तमान दौर में समाज में कायम हैं या होते जा रहे हैं.इस रूप में हिन्दी में मौलिक शोध व चिंतन की प्रक्रिया उतनी नहीं हुई जितनी की यह लोगों के बीच में बोली जाती है.यदि यह तीसरी या दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है तो यह दुनिया का एक बडा़ समुदाय होगा,होना यह चाहिये था कि तकनीक,चिकित्सा, विज्ञान के क्षेत्रों में इसी अनुपात में या कमोबेस मौलिक शोध व अनुसंधान होते पर इस बडे़ वर्ग ने कोई खास मौलिक शोध नहीं किया यदि किया भी तो वह हिन्दी के माध्यम से न होकर अंग्रेजी के माध्यम में हुआ. एक और मामला हिन्दी के साथ जुडा़ हुआ लगता है कि वह क्षेत्र जहाँ हिन्दी पढी़, बोली समझी जाती रही है उस क्षेत्र में चिंतन का आधार भौतिकवादी नहीं था और आज भी नहीं है.वह समाज आध्यात्मवादी चिंतन का समाज है जहाँ समस्याओं की खोज आध्यात्म में की जाती रही है.इसलिये यहाँ मौलिक शोध का विकास नहीं हि सका. पर भाषायी आधार पर जब अन्य भाषायी समाज की निर्मित चीजों का अनुवाद तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा किया गया तो उसे जनस्वीकृति उस तरह से नहीं मिल सकी भले ही वे कम्प्यूटर को संगणक व माउस को चूहा कहते रहें पर वह अपने प्रचलित शब्दावली में ही सहज ग्राह्य हो चुका था.इस रूप में यह आवश्यकता है कि हिन्दी में वैज्ञानिक चिंतन के जरिये मौलिक शोध व विमर्श को स्थापित किया जाय. १९७५ में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में जो कि नागपुर में हुआ था इस बात को लेकर एक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की अवधारणा रखी गयी थी जहाँ पर नये मानवकी विषय व तकनीक के जरिये हिन्दी में शोध व विकास की बात सोची गयी थी. १९९७ में जो वर्धा में स्थापित हुआ और २००२ से अध्ययन-अद्यापन का कार्य भी चालू किया गया, पर वर्तमान में स्थिति ये है कि वह ५ सालों में ही मौलिक शोध और विमर्श को छोड़ चुका है भाषा प्रौद्योगिकी व मीडिया जैसे विभाग शोध व विमर्श के बजाय यहाँ के छात्रों को चैनल व अन्य संबन्धित संस्थानों का नौकर बना रहें है.

11 सितंबर 2008

मणिपुर में ५० वर्षों का अघोषित आपातकाल:

मणिपुर में ११ सितम्बर २००८ को एक गैर लोकतांत्रिक कानून (आर्मड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट) आफ़्सपा को लगे हुए ५० साल पूरे हो रहे हैं. आजादी के ११ वर्ष बाद १९५८ में यह कानून कुछ क्षेत्रों में नागा बिद्रोह से निपटने के लिये लगाया गया था. धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया और १९८० में पूरे मणिपुर को अशांत घोषित कर दिया गया. आफ्सपा को आर्मड फोर्स स्पेसल पावर आर्डिनेंस के तौर पर बनाया गया जिसे अंग्रेजों द्वारा १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन से निपटने के लिये भारतीय आंदोलन कारियों के दमन के लिये बनाया गया था. तब से पूरे राज्य में आपातकाल की स्थिति बनी हुई है. यह गैर लोकतांत्रिक कानून राज्य के गवर्नर/या केन्द्र को यह अधिकार देता है कि वे किसी भी क्षेत्र को अशांत घोषित कर सकते हैं. किसी भी आयुक्त अधिकारी या एन.सी.ओ. तक को यह अधिकार देता है कि यदि उसे लगता है कि कोई व्यक्ति कानून व्यवस्था तोड़ सकता है व यदि कोई व्यक्ति हथियार या कोई भी चीज जिसका इश्तेमाल हथियार के रूप में किया जा सकता है के साथ पाया जाय तो शक के आधार पर वह किसी भी व्यक्ति को गोली मार सकता है या इतने बल का प्रयोग कर सकता है जिससे उसकी मौत हो जाय. इस रूप में यदि इसकी व्याख्या करें तो वह किसान भी आता है जो अपने औजार के साथ खेत जा रहा हो.कानून लागू होने के बाद दिनों-दिन अमानवीयता बढ़ती गयी और रोज बरोज सेना के बढ़ते दमन को देख मानवाधिकार संगठन ने आफ्सपा के खिलाफ ८०-८२ में याचिकायें दर्ज की जिसमे जीवन, आजादी, बराबरी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताको चुनौती दी गयी, परन्तु १५ वर्षों बाद १९९७ में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सही ठहराते हुए कुछ निर्देश दिये उन निर्देशों के तहत आर्मी को बताया गया कि वह क्या करे और क्या न करे, जिसमें यह कहा गया कि गोली चलाने के पहले व्यक्ति को चेतावनी दी जानी चाहिये, और किसी भी कार्यवाही के समय नागरिक प्रशासन को शामिल किया जाना चाहिये इन बातों का सैन्य बल द्वारा कडा़इ से पालन किया जाय. परन्तु उसके बाद भी किसी निर्देश का पालन नहीं होता अलबत्ता डी.जी.पी. का यह बयान आया कि निर्देशों की भावना का पालन होता है इसके शब्दों का नहीं. इस रूप में स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है कि आर्मी किस तरह के भावना का पालन करती होगी.सेना को यह भी निर्देश दिया गया था कि कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद वह जल्द से जल्द व्यक्ति को नजदीकी पुलिस थाने को सौंप दे और आर्मी को पूछताछ का कोई अधिकार नही बनता इसके बावजूद आर्मी थर्ड डिग्री का इश्तेमाल कर अभियुक्तों से पूछ-ताछ करती है और अक्सर पूछ ताछ के बाद गोली मार देती है. इस रूप में सेना वहाँ नागरिक प्रसासन की मदद करने के बजाय एक स्वतंत्र इकाई के रूप में कार्य कर रही है. इस कानून को लागू होने के बाद से अब तक मणिपुर के अनगिनत लोग मारे जा चुके हैं और गायब हैं. लोगों को यह नहीं पता कि किस दिन उनके घर में आर्मी आयेगी और उनके किसी भी सदस्य को उठा ले जायेगी. दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र में ऎसी अमानवीय स्थिति बनी हुई है जहाँ पूरी तरह से सेना का शासन चल रहा है. परन्तु भारत के अधिकांश हिस्सों के लोगों को इन स्थितियों की भनक तक नहीं है. और कुछ मुद्दॊं को छोड़ कर भारतीय मीडिया ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया है. ११ जुलाई २००४ को इम्फाल के पूर्व जिला बामोन की एक ३२ वर्षीय महिला थंगजम मनोरमा को असम राइफल्स द्वारा रात को उनके घर से उठा लिया गया और तमाम तरह की यातनाओं के बाद उनकी लाश को घर से ५-६ कि.मी. की दूर स्थित राजमार्ग पर फ़ेक दिया गया था, जिसको लेकर मणिपुर में एक बढा़ विरोध प्रदर्स्गन हुआ था और महिलाओं ने निरवस्त्र होकर यह नारा दिया था कि "इडियन आर्मी रेप अस" जिसे राष्ट्रीय मीडिया ने पहली बार गम्भीरता से लिया था पर उसके बाद रोज दिनों दिन घटनायें घटती जा रही हैं पर राष्ट्रीय मीडिया में उसकी खबरें कहीं नहीं दिखती. २००२ में जब भारत के प्रधानमंत्री १५ अगस्त देश के लोकतंत्र को और मजबूत बनाने की बात करते हुए तिरंगा फ़हरा रहे थे. उसी समय मणिपुर का एक छात्र नेता पेबम चितरंजन बिसनपुर चौराहे पर खुद को यह कहते हुए जला लिया कि इस अप्रजातांत्रिक कानून में में मरने के बजाय मै मशाल की तरह जलकर मरना पंसंद करूंगा. राज्य में हर वर्ष इसी तरह से सैकड़ों लोग आर्मी की गोलियों से मारे जा रहें हैं तिस पर गृह मंत्री मणिपुर में जाकर यह बयान देते हैं कि मरनें वालों की संख्या इतनी नहीं है कि इस पर परेशान हुआ जाय.क्या किसी लोकतंत्र में मनोरमा जैसी एक भी महिला का आर्मी द्वारा बलात्कार, और महिलाओं का निरवस्त्र प्रदर्शन उन्हें कम लगता है? देश के स्वतंत्रता दिवस पर किसी व्यक्ति का देश के किसी कानून से क्षुब्ध होकर मरना कम है.जबकि वास्तविक स्थितियाँ इतनी ही नहीं है राज्य मानवाधिकार की रिपोर्ट के मुताबिक ३०-५० मानवाधिकार हनन की घटनाएं सामने आती है या दर्ज होती हैं. परन्तु इतनी घटनाएं दर्ज होने के बावजूद भी राष्ट्रीय मानवाधिकार ने इस राज्य को अनदेखा करने का प्रयास किया है और अभी तक कोई भी बैठक इस राज्य में नहीं की. राज्य मानवाधिकार को एक सीमित धन ही उपलब्ध कराया जाता है.जबकि वहीं दूसरी तरफ सेना के खर्चे में हर वर्ष बढो़त्तरी की जा रही है. इस अमानवीय कानून को लेकर अब तक न जाने कितने विरोध प्रदर्सन हो चुके हैं, मणिपुर के लोग कितनी बार सड़कों पर उतर चुके हैं. इरोम शर्मीला द्वारा २ न. २००४ से लगातार ४ वर्षों की भूख हड़ताल जारी है. पर सरकार ने अभी तक चन्द जाच कमेटियाँ बनाने के सिवा कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. मनोरमा मामले को लेकर गठित की गयी सी. उपेन्द्र आयोग की १०२ पृष्ठ की रिपोर्ट २२ दिसम्बर २००४ को आयी पर अभी तक उसको गुप्त रखा गया है उसका प्रकाशन तक नही किया गया. यद्यपि आफ्सपा को इंफाल के ७ मुनिस्पल क्षेत्रों यानि ३२ वर्ग कि.मी. से हटाया गया है परन्तु हत्या का शिलसिला यहाँ भी कम नहीं हुआ है आर्मी यहाँ से लोगों को पकड़ती है और उस क्षेत्र से बाहर लेजाकर उनको गोली मार्ती है. इन स्थितियों के बीच वहाँ के स्कूलों की स्थिति ये है कि ३६५ दिन में औसतन १०० दिन या उससे कम भी चल पाते हैं कारण वश वहाँ के छात्रों का लगातार पलायन जारी है और २०,००० से अधिक छात्र राज्य से बाहर जाकर पढ़ रहे हैं. स्कूली बच्चों ने राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली किताबों को राज्यपाल को वापस कर दिया है. इन स्थितियों के बीच सरकार को चाहिये कि वह कोइ उचित कदम उठाये और गैर लोकतांत्रिक कानून को वापस ले.

10 सितंबर 2008

समझदारॊं के लिये गीत


हवा का रुख कैसा है
हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों देते हैं
हम समझते हैं
हम समझते हैं खून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है
हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं
चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आज़ादी का मतलब समझते हैं
टटपुजिया नौकरीयों के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोजगारी अन्याय के तेज दर से बढ़ रही हो
हम आज़ादी और बेरोजगारी
दोनों के खतरे समझते हैं
हम खतरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं
यह भी हम समझते हैं
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं
अगर वो सिर्फ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़िया धसान होती है
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं
यह भी हम समझते हैं
विरोध ही वाजिब कदम है
हम समझते हैं
हम कदम-कदम पर समझौता करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क को गोलमटोल भाषा में पेश करते हैं
हम समझते हैं
हम इस गोलमटोल भाषा का
तर्क भी समझते हैं
वैसे हम अपने को किसी से कम नहीं समझते
हम स्याह को सफेद
सफेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफान खडा़ कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमजोर
और जनता समझदार हो
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नही कर सकते हैं
हम कुछ क्यों नहीं कर सकते हैं
ये भी हम समझते हैं. गोरख पाण्डेय

09 सितंबर 2008

पुलिस के हाथ में शिक्षा:-

पुलिस के द्वारा महाविद्यालयों के प्राचार्य को दिया गया पत्र:-
गोपनीय प्रति,

माननीय आचार्य,

विषय:-छात्रॊं संबधी जानकारी पहुचाने हेतु

देखने में आया है कि नक्सल वादी संगठन(cpi माओवादी)युवा छात्र तथा बीच में पढा़ई छोड़ने वाले और आर्थिक द्रिष्टिकोण से कमजोर अपने भावी जीवन में बडी़ अपेक्षा रखने वाले युवाओं को ढूढ़्कर अपना हस्तक बनाते हैं उनके परिवार की थोडी़ सी आर्थिक जरूरत को पूर्री करके उनको दूसरों की झूठी और दूसरों कि लिविंग सर्टिफ़िकेट देकर तथा उनको आर्थिक मदद करके महाविद्यालयों में गैप सर्टिफ़िकेट के आधार पर प्रवेश लेने के लिये कहते हैं ऎसे छात्रॊ द्वारा महविद्यालयों में छात्र संगठनात्मक बनकर नक्सलवादी ध्यय धोरण उद्देश्य तथा इसके लिये पुरक विचार का छात्रों में प्रचार प्रसार करते हैं.यह छात्र जनजागरण ,नुक्कण नाटक,व बौमादद्धिक चर्चाओं के जरिये माध्यम से नक्सल वादी ध्यय तथा उनके उद्देश्यों का प्रसार एवं प्रचार करते हैं.छात्रों के अंदर सुप्त गुणों को जाग्रित कर देशविघात करने के लिये उन्हें मानसिक द्रिश्टि से तैयार करके माओवादी आंदोलन में प्रवेश करने हेहु उन्हें बाध्य करके हैं,आपके विद्यालय में अभी जून २००८ से नये सत्र की प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो रही है इस दौरान सभी प्रकार के छात्र प्रवेश लेंगे.आपके अधीनस्थ सभी प्रवेश प्रक्रिया संबंधी प्रोफ़ेसर तथा अन्य कर्म चारी वर्ग को उपर दिये गये मुद्दों से परिचित करवाकर तथा गैप सर्टिफ़िकेट के आधार पर प्रवेश लेने वाले छात्रों की एक लिस्ट बनाकर इस कार्यालय को हर सोमवार को देने की क्रिपा करें.गैप सर्टिफ़िकेट के आधार पर प्रवेश करने वाले छात्रो के नाम गाँव पतातथा उसकी लिविंग सर्टिफ़िकेट की पूरी जाँच करने के बाद तथा उसकी पूर्व सूचना हमारे कार्यालय को देने के बाद ही उसका प्रवेश शुनिश्चित किया जाय तब तक उनको अस्थायी प्रवेश ही दिये जायें.प्रवेश के लिये आने वाले छात्रों को उनके अध्यावत फ़ोटो मांगे जायें तथा दो ऎसे प्रतिष्ठित व्यक्तिओं के नाम भी मांगे जाय जो उनको पहचानते हों.नक्सल वादी आंदोलन को रोकने के लिये और उनका प्रसार व प्रचार तथा नये नक्सलवादी समर्थक तैयार न होंइसके लिये आपका सहयोग अपेक्षित है.
पोलिस उपायुकत-विषेश शाखा नागपुर शहर

आज पाश जैसा कोई कवि नहीं जो यह लिखे कि हम नहीं चाहते पुलिस की लाठियों पर टंगी किताबों को पढ़ना.सत्ता हस्तांतरण के बाद देश ने शिक्षा को लेकर अपने प्रोफ़ाइल को जरूर सुधारा है. पर इस सुधार का जो स्वरूप रहा है वह बेहद चिंतनीय है.साझी विरासत के रूप में शिक्षा को देखने के बजाय, जो कदम उठाये गये हैं उनका संबंध वर्तमान समाज से काटकर एक ऎसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना रहा है जिसने मानवीय मूल्यों को ताक पर रखते हुए वर्तमान शोषण युकत समाज को पुख्ता बनाये रखने का प्रयास किया है.मूल्य आधारित शिक्षा पर दिनों दिन सिकंजे कसे गये हैं और व्यवसायिक शिक्षा को बढा़वा दिया गया है. इस कडी़ में उच्च शिक्षण संस्थानों में गैर राजनीतिकरण करके शिक्षा को समाज से काटने व साझी विरासत के रूप में देखने के बजाय एक खास समुदाय तक ही शिक्षा को सीमित करने का प्रयास भी जारी रहा है.जिसका परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा प्राप्ति का एकमात्र उद्देश्य टटपुजिया नौकरीयों को प्राप्त करना ही रह गया है जिसके सहरे अगली पीढी़ को भी नौकर बनाया जा सके.यह एक प्रवृत्ति है जो कि शिक्षण संस्थानों में पनप चुकी है.
इसके बावजूद युवावों में देश समाज के लिये कुछ करने के जज्बे को देखते हुए देश के बडे़-बडे़ संस्थानों में एन.जी.ओ. का प्रवेश कराया गया जहाँ से अंततः वे इस व्यवस्था को पोशित कर सकें.बी.एच.यू. जैसे एशिया के सबसे बडे़ आवासीय परिसर के रूप में जाने-जाने वाले विश्वविद्यालय में वर्तमान में ३० से अधिक एन.जी.ओ. कार्य कर रहे हैं.इस रूप में देश के कई महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थानों में एन.जी.ओ. ने अपनी पकड़ मजबूत की है.और शिक्षण संस्थानों से देश की दशा दिशा तय करने वाला वर्ग खत्म होता जा रहा है.कई महत्वपूर्ण संस्थानों से छात्रसंघ के चुनाव की प्रक्रिया को खत्म करना व किसी भी तरह की राजनीति से छात्रों को दूर करना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शिक्षित युवा वर्ग को देश समाज की समस्याओं पर सोचने विचारने से दूर करने का प्रयास है. शिक्षण संस्थानों में बार-बार एक राजनीति के तहत इस बात को भरा गया कि शिक्षा का राजनीति से कोई संबंध नहीं है और एक बेहतर शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र के लिये जरूरी है कि वह राजनीति से दूर रहे.दिनों दिन बदलते इस स्वरूप में आज स्थिति यह है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये पुलिस के अनुमति की जरूरत पड़ रही है. यह सत्ताहस्तांतरण के बाद सिकंजे जाने का एक क्रम है जो यहाँ तक आ चुका है कि इस बात का निर्धारण अब पुलिस करेगी कि किसको शिक्षा दी जाय.
२००८ सत्र की शुरूआत में ही विदर्भ क्षेत्र की पुलिस ने सभी विद्यालयों कालेजों में एक गोपनीय पत्र भेजा जिसके तहत यह कहा गया कि वे क्षात्र जो किसी विषय में दुबारा प्रवेश ले रहे हैं उनकी सूचना पुलिस को दे और उनका एक फोटो भी पुलिस को उपलब्ध कराया जाय.पुलिस द्वारा यह भी सुझाव दिया गया कि प्रवेश लेते समय शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति का नाम भी मांगा जाय जो उन्हें पहचानते हों. इन सारी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही उनका प्रवेश सुनिश्चित किया जाय. ऎसा इसलिये क्योंकि इस रूप में प्रवेश लेकर नक्सलवादी राजनीति से प्रेरित युवा विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेकर छात्रों के अंदर अपनी राजनीति का प्रचार प्रसार करते हैं.जिनके द्वारा चर्चा, नाटक, गोष्ठी आदि की जाती है.मौखिक रूप से हिदायत दी गयी कि वे छात्र जो भंडारा, गड़विरौली, चन्द्रपुर से आते हैं उन पर विशेष ध्यान दिया जाय. इस रूप में शिक्षा के क्षेत्र में पुलिस की यह दखल कई सवाल उठाती है कि नक्सलवाद के नाम पर शिक्षण संस्थानों में पुलिस का यह दख़ल कितना वाजिब है. एक तो इस बहाने वे सभी तरह की चर्चा गोष्ठियों को बंद कर शिक्षण संस्थानों में सोचने समझने की परंपरा को खत्म कर रहे हैं.साथ में यह कि वे छात्र जो किसी कारण से (जिनमें आर्थिक मजबूरी अधिकांसतः होती है) पिछले वर्षों में प्रवेश से वंचित रहे हैं उन्हें शिक्षा से वंचित करने का प्रयास है या उनकी शिक्षा पर यह सीधा प्रतिबंध है.जिन जिलों को लेकर हिदायत दी गयी है वे जिले आदिवासी बहुल्य जिले हैं साथ में यहाँ पर शिक्षण संस्थानों की भी कमी है. ऎसे में इस तरह के प्रतिबंध शिक्षा व्यवस्था को पुलिस के हवाले ही करना कहा जा सकता है. जहाँ आदिवासी, अनुसूचितजाति के लोगों को शिक्षा से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है.एक तरफ़ सरकार आरक्षण के जरिये व विषेश सुविधायें मुहैया करा कर शिक्षा के इस गैरबराबरी को दूर करनें का प्रयास कर रही है, तो दूसरी तरफ़ सरकार के पुलिसिया अंग की यह कार्यवाही उन्हें शिक्षा से वंचित करने के प्रयास के अलावा और कुछ नहीं है भारतीय लोकतंत्र में समाज को मानवाधिकार, शिक्षा, व अन्य मूलभूत अधिकारों को प्रतिबंधित करने का यह प्रयास इसलिये किया जा रहा है ताकि नक्सलवादी समर्थकों को तैयार होने से रोका जा सके. तो क्या सरकार के पास दिनों दिन बढ़ रहे नक्सलवादी आंदोलन को रोकने के लिये मानवाधिकारों से वंचना ही बची है?