नक्सल आंदोलन के कथित कार्यकर्ता अरूण फ़रेरा का नार्को टेस्ट के दौरान आये बयान और उस पर शिवसेना की टिप्पणी ने कई प्रमुख सवाल खड़े कर दिये हैं.जिसमे अरुण फ़रेरा को ए.बी.बी.पी.व बालठाकरे से मदद मिलना और शिवसेना का उसे सिरे से खारिज करना इस बात को इंगित करता है कि दोनों में से एक गलत है.वैचारिक रूप से शिवसेना और वामपंथी नक्सल आंदोलन दो ध्रुव हैं जिस बात को शिव्सेना ने स्वीकार करते हुए किसी तरह कि मदद से इनकार किया है.ऎसे में फरेरा का बयान यह साबित करता है कि या तो फरेरा के संबन्ध नक्सल आंदोलन से नही है जिसके तहत उन्हें बाल्ठाकरे और ए.बी.बी.पी. से मदद मिलती रही है या फिर नार्को परीक्षण सच उगलवाने का सही तरीका नहीं है.हाल में पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट (एक मानवाधिकार संगठन) ने अरुण फरेरा के नार्को प्रीक्षण को लेते हुए एक रिपोर्ट जारी की है जिसमे उसने कहा है कि यह एक प्रताणना के अलावा और कुछ नही है क्योंकि इस तरकीब से सच उगलवाना संभव नहीं है.हाल के वर्षों में देश में बढ़ते नार्को परीक्षण की सच्चाई यह है कि बंग्लूरू में स्थापित टेस्ट सेंटर मे अब तक ३०० से अधिक नार्को परीक्षण हो चुके हैं जिसके कोई खास नतीजे सामने नहीं आये हैं और पुलिस उन सबूतों के बल पर कुछ भी करने में अक्षम रही है. इसके पीछे ठोस कारण ये है कि नार्को परीक्षण के जरिये पुख्ता सबूत निकालने में ५% मदद ही मिल पाती है और वह भी कई बातों पर निर्भर करता है.नार्को परीक्षण के दौरान जिन नशीले पदार्थों का प्रयोग किया जाता है उसमें सोडियम पेंटोथाल,सेकोनाल,सोडियम एमिटोल,स्कीपोलामाइन है.विशेषग्यों का मानना है कि इसके प्रयोग से आरोपी अपने विचारों को बदलने में असमर्थ हो जाता है और वह सब कुछ उगलता है जो कि उसके मस्तिस्क में होता है परन्तु यदि उसने टेस्ट के पहले ही जिद बना ली है कि वह झूठ बोलेगा या कुछ और बोलेगा तो दवा का प्रवाह उसकी इस जिद को बलवती बनाता है.इस टेस्ट का तरीका इतना अमानवीय होता है कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा निर्धारित शारीरिक शोसण के अन्तर्गत आने वाले लगभग सभी तरकीबों का प्रयोग अभियुक्त पर किया जाता है. और प्र्योग किये गये सीरम से व्यक्ति का शारीरिक संतुलन भी गड़बड़ हो जाता है.जिसका सीधा प्रभाव उसकी यादास्त और स्वसन क्रिया पर पड़ता है.इस बात को ध्यान में रखते हुए दुनियाँ के कई राष्ट्रोम ने इस अमानवीय तरीके को अपनाना बंद कर दिया है.१९२२ में जब टेक्सास में पहली बार राबर्ट अर्नेस्ट द्वारा वहाँ के दो बंदियों पर यह तरीका अपनाते हुए कोर्ट में उन्हें पेश कर बयान दिलाया गया तो अभियुक्तों के अपराध स्वीकारने के बावजूद भी न्यायाधीस ने यह कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि नशे की हालत में दिया गया यह बयान अवैधानिक है १९३० तक ही दुनियाँ के कई देश की न्यायालयों ने नार्को टेस्ट से जुटाये गये सबूतों को अमान्य कर दिया और १९५० तक कई देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया.भारतीय कानून में धारा १६४ के अनुसार बिना किसी दबाव के न्यायाधीस के सामने दिये गये ही बयान न्यायालय को मान्य होंगे.इस आधार पर भारतीय न्यायालय परीक्षण के आधार पर जुटाये गये सबूत को मानती भी नही. परन्तु दुनियाँ के सबसे बडे़ लोकतंत्र केहे जाने वाले देश में इस प्रक्रिया का जारी रखना और ड्रग का इश्तेमाल कर शारीरिक यातना देना कितना उचित है?नार्को टेस्ट से संबंधित विशेषग्यों का यह भी मानना है कि सीरम के प्रयोग के बाद अभियुक्त से प्रश्न पूछने की शैली के ऊपर भी उसका जबाब निर्भर करता है. यानि इसके मुताबिक जाँच कर्ता वह सब उगलवा सकता है जो वह उगलवाना चाहे.अरुण फरेरा के मामले में इन सभी पक्षों को समझने की जरूरत है.पर सवाल नार्को टेस्ट की अमानवीयता और मानवाधिकार हनन का है.कुछ मामले ऎसे है जिनमे अभियुक्त को छः-छः बार परीक्षण करवाना पडा़ है. आरुसी हत्या मामले में कम्पाउंडर क्रिष्णा की दि बार नार्को टेस्ट हुई जिसका कोई खास नतीजा सामने नही आया पर यह इस बात का सबूत है कि नार्को परीक्षण सच उगलवाने की सही विधि नही है.परन्तु भारतीय न्यायालय जाँच में इसकी भूमिका को सही ठहराती है क्योंकि इससे पुलिस को कुछ पुख्ता सबूत मिलते हैं. अब तक हुए ३०० से अधिक परीक्षण व इससे भी कहीं अधिक की गयी मांगों में न्यायालय व पुलिस का रवैया साफ तौर पर देखा जा सकता है. तेलगी प्रकरण में किये गये नार्को परीक्षण के दौरान कई बडे़-बडे़ नेता और आला अधिकारियों के नाम लिये गये थे पर अब तक उन सुरागों का पुलिस ने कही इस्तेमाल नही किया है.यहाँ तक कि इन नेताओं और अधिकारियों से पुलिस ने सवाल-जबाब तक नहीं किये.दूसरे मामले में यदि न्यायालय का रुख देखें जिसमें शेख्शोहराबुद्दीन के फर्जी मुठभेड़ और कौसर बी की हत्या पर गुजरात की अदालत ने आई.पी.एस. अधिकारियों जिसमे डी.जी.पी. बजारा समेत अन्य छः पुलिस कर्मी भी सम्मलित थे,के नार्को टेस्ट की याचिका खारिज कर दी थी ये घटनाये यह स्पष्ट करती हैं कि नार्को टेस्ट किसका होता है और सबूत किनके लिये जुटाये जाते हैं ऎसे में इस तरह का परीक्षण मानवाधिकारों का हनन है और एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह की कार्य्वाही एक अभियुक्त के लिये जिसका कि अपराध भी सिद्ध न हुआ हो यातना के एक विकल्प के शिवा कुछ नहीं है.
04 सितंबर 2008
01 सितंबर 2008
बिहार में बाढ़ पर रेयाज-उल-हक की रिपोर्ट
मधेपुरा से सिंहेश्र्वर की ओर जानेवाली सडक पर पथराहा गांव में मिलते हैं जोगेंदर यादव। सडक किनारे एक पान की दुकान के सामने मचान पर बैठे वे पानी को अपनी 'खर छपरी' में घुसते हुए देखते हैं। पानी ने सुबह ही पथराहा में प्रवेश किया है। कोसी का लाल पानी. कल दोपहर में गांववालों ने उसकी रेख देखी थी, गांव के पूरब. आज वह उनके घरों से, आंगन से, बांस-फूस की दीवारों से होता हुआ बह रहा है. कौवे उसकी फेन में जाने क्या ढूंढ रहे हैं. कुत्ते उसे सूंघते हैं और भडक कर भागते हैं. गोरू उसमें खुर रोपने से डरते हैं. एक-एक सीढी डुबोते हुए, एक-एक घर पार करते हुए, एक-एक गली से राह बनाते हुए सडक पर आकर वह अपनी थूथन पटकता है. कहीं-कहीं कमर भर पानी है गांव में. ७० साल के बूढे जोगेंदर ने सामान तो मचान पर चढा दिया है, लेकिन गेहूं-मकई नहीं चढा पाये. अकेले हैं. दोनों बेटे बहुओं-बच्चों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने गये हैं. खैनी ठोंकते हुए वे हंसते हैं- उदास हंसी-यही तेजी रही तो कल तक सडक पार कर जायेगा पानी. ६५-७० साल की जिदंगी में पहली बार देखा है अपने घर में पानी भरते हुए. घर गया. अनाज गया. उनके खेत उन्हें खाने लायक अनाज दे देते हैं- गेहूं, धान, मकई. इस बार सब खत्म. खेत में खडी धान की फसल को बाढ लील गयी, घर में रखा अनाज पानी में डूब गया.
... लोग जुट आये हैं. वे सुनाते हैं- सौ साल पहले यहां कोसी बहती थी. अब लगता है, वह फिर लौट आयी है. बेचन यादव, कारी, तेजनारायण, रामदेव, संजय व शैलेंद्र ... दर्जनों लोग, सबके पास कई-कई कहानियां. किसी के आंगन में पोरसा भर पानी है, तो किसी के घर में सांप घुस आया है. अभी लेकिन सब शांत हैं-चिंता की एक रेख तक नहीं है. कहते हैं अभी सडक तो है ही सोने के लिए. ज्यादा डूबने लगेगा तो प्लान करेंगे निकलने का.
...लेकिन बूढे जोगेंदर को यह भी चिंता नहीं. वे अपनी खैनी होठों के नीचे दाब चुके हैं-'हम अकेले आदमी, मर जायेंगे तो क्या होगा ङ्क्ष सांप भी कांट लेगा, तो क्या होगा ङ्क्ष
१० साल के कुंदन का घर सडक की दूसरी ओर है- सूखे में. वह आधे गांव को डूबते हुए देखता है-अपलक. डर ङ्क्ष 'डरेंगे क्यों ङ्क्ष सब मरेगा कि हमीं मरेंगे ङ्क्ष... सब न मरतय.
लेकिन उससे दो साल छोटा मन्नू जिदंगी को उससे ज्यादा संजीदगी से लेता है-' डरना क्या है ङ्क्ष पानी बढेगा तो जहां सब जायेंगे, वहीं हम भी जायेंगे.'
पानी बढ रहा है. अपने गांव, घर, चूल्हे, खिडकी-दरवाजों को इंच-इंच डूबते हुए देखना-एक त्रासदी है. पानी अपने एक नये रूप में मिल रहा है - इनमें से अनेक पीढियों को. वे अपने तरीकों से इसकी तैयारी में जुटे हैं.
जोगेंदर की निर्लिप्तता, कुंदन की सहजता और मन्नू की जीवटता-सुनने लायक चीजें हैं, लेकिन उन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं... लगभग एक सदी बाढ लौटी कोसी भी नहीं.
... पानी बढ रहा है.
***
सिंहेश्र्वर मंदिर धर्मशाला से निकलती दलित औरतों के मुंह से कुछ अस्फुट से बोल फूटते हैं-सगरे समैया हे कोसी माई, सावन-भादो दहेला... पूजा गीत. औरतों के चेहरों पर उदासी मिश्रित भय है... हर मंगल को दीप जलाने-संझा दिखाने के बाद भी नहीं मानीं कोसी माई.
...परसा, हरिराहा, कवियाही, रामपुर लाही... शंकरपुर व कुमारखंड प्रखंडों के दर्जनों जलमग्न गांवों से उजडे हजारों लोग पिछले चार दिनों से धर्मशाला में डेरा डाले हुए हैं. यहां रहने के लिए पक्के कमरे हैं. मूढी, चूडा, चीनी, खिचडी व बिस्कुट सबका इंतजाम है. बच्चे चूडा-गुुड पाकर खुश हैं...बेवजह शोर मचा रहे हैं. बूढे-बुजुर्ग माथे पर जोर देकर याद करने की कोशिश करते हैं कोई पुरानी बात... बाप-दादों की स्मृतियों को भी खंगाल रहे हैं-'उंहू . ऐसी बाढ मेरे देखे में तो कभी नहीं आयी. बाप-दादे भी कुछ नहीं बता गये. ३० साल पहले पानी भरा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि पाट की पूरी फसल डूब जाये फुनगी तक.'
...ऐसा नहीं हुआ कभी. ६० साल के परमेसरी साह हतप्रभ हैं. जिले में बाढ ने सबसे अधिक कुमारखंड और शंकरपुर प्रखंडों में नुकसान पहुंचाया है. यदुनंदन मेहता कुमारखंड की हरिराहा पंचायत के हैं. २० अगस्त की शाम को वे अपने गांव में चौक पर घूम रहे थे कि एकाएक साइफन में देखा कि पानी बढ गया है. गांववालों को पहले से अंदेशा नहीं था. जैसे-तैसे भागे सब. २३ तारीख तक यदुनंदन लोगों को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर सिंहेश्र्वर लाते रहे. फिर रास्ता बंद हो गया. गांव के तीन हजार से ज्यादा लोग या तो वहीं फंसे हुए हैं या अन्य जगहों पर चले गये हैं. शंकरपुर प्रखंड के परसा गांववालों के लिए भी बाढ अचानक आयी.
२१ अगस्त की सुबह तीन बजे पानी गांव में घुस आया. गांव की पांच हजार आबादी में से अधिक वहीं फंसी हुई है. करीब सौ लोग निकल पाये हैं. गांव में चार फुट से ज्यादा पानी है अभी. रामचंद्र दास उदास हैं. वे अपनी दो बीघे में लगी धान की फसल, एक बीघे पाट और पांच मवेशियों को याद करते हैं-'सब बह गये. धान इस बार अच्छा लगा था. पांच किलो खाद हर कट्ठे में दिया था. सब खत्म.
जयकुमार साह के लिए भी यह कम नुकसानदेह नहीं रही. उनके १०० सदस्योंवाले परिवार की ५० भैंसें पानी में बह गयीं. अभी भी उनके मां-पिताजी गांव (परसा) में फंसे हुए हैं. उनकी चार बीघे में लगी धान की फसल भी डूब गयी.
...गांव में से इक्के-दुक्के लोग किसी तरह सुरक्षित जगहों पर अब भी पहुंच रहे हैं. नये आनेवाले ये लोग गांव की नयी खबरें भी साथ लाते हैं-प्रायः दुखद खबरें. ... हुकुम राम की मां मर गयीं-डूब कर. मचान पर थी, उसी पर से गिर गयीं. पानी का 'अदक' (आतंक) नहीं सह पायी ७० साल की बूढी. उसके घरवाले अभी मचान पर हैं. परसा में कल पानी घटने लगा था... आज फिर बढ गया.
...लोग चुप हो जाते हैं कुछ क्षण. उधर कोने में कोई सिसक उठता है... कारी कोसी जाने क्या लेकर मानेगी.
१८ किलोमीटर है सिंहेश्र्वर से परसा. कल तक सडक चालू थी, आज जिरवा पुल टूट गया-सो रास्ता बंद. लालपुर रोड पर भी भर घुटना भर पानी है. मतलब कि नाव के बिना अब गांववाले निकल नहीं सकते.
सबके घर का कोई -न -कोई गांव में फंसा हुआ है. सब उदास हैं. १२ साल का एक लडका धीरे से आकर बैठ जाता है-मिथुन कुमार दास. कहता है 'लिख लीजिए, मैं अकेले हूं यहां. मम्मी-पापा सहित सारे घरवाले गांव में हैं.' वह दो-तीन दिन पहले किसी काम से कवियाही आया था. इस बीच बाढ आ गयी और वह यहां रह गया. सभी अपना नाम लिखाना चाहते हैैंं. दीनबंधु साह आठ आदमी. रवींद्र कुमार दास-तीन आदमी. सत्यनारायण साह-पांच आदमी. परमेसरी साह-पांच आदमी. संतोष शर्मा-पांच आदमी. बेचन, शिबू, कमलेश्र्वरी ...नामों की अंतहीन सूची है. जो निकल आये हैं, वे चाहते हैं कि फंसे हुए लोग भी निकल आयें. देर हो रही है, तो वे धैर्य खोते जा रहे हैं. चूडा-गुुड मिल रहा है तो क्या, जब परिवार ही साथ नहीं तो...
परिवारों को फिर से साथ आने में समय लगेगा. उजडे घरों को फिर से बसने में भी और पानी को उतरने में भी.
...वह तो अभी बढ ही रहा है.
कटैया बाजार पर पंडा नगर से भैंसे हांक कर ला रहे किसानों ने बताया-वीरपुर बाजार में कमर भर पानी है. भीमनगर बाजार में सरकारी राहत शिविर के सामने आधे घंटे से रोटियों के लिए खडे विकास कुमार राम ने आग्रह करते हुए लिखाया-'वीरपुर के कुमार चौक में ५० आदमी फंसे हुए हैं.' विकास आज ही वीरपुर से निकला है किसी तरह.
कोसी ने लगभग पूरी तरह लील लिया है वीरपुर को. क्या बचा है वहां अब. जो दशा है वहां की ... एक-एक कर नयी सूचनाएं मिल रही हैं वीरपुर से-मानो एक अंधकार से परदा उठ रहा हो.
वीरपुर से कुसहा की दूरी महज छह किलोमीटर है और सोमवार को बांध टूटने के बाद भारत में पहला बडा आघात वीरपुर को झेलना पडा.
सोमवार की सुबह से ही वीरपुर बाजार में अफवाहें थीं कि बांध को खतरा है, लेकिन अधिकारिक तौर पर कोई सूचना नहीं थी. इससे लोगों ने निकलने की तैयारी भी नहीं की. बूढ-पुरनियों ने इन अफवाहों को चुटकी में उडा दिया-पानी तो आता ही रहता है. इस बार भी आया है, तो पहले की तरह ही निकल जायेगा. ...खतरे की गंभीरता का अंदेशा किसी को नहीं था.
लेकिन शाम साढे छह बजे पानी शहर में घुसा और घंटे भर में पूरा शहर तीन से चार फुट पानी से भर गया. किसी को निकलने का मौका नहीं मिला. पूरा हफ्ता निकल जाने पर भी वीरपुर में आधा से अधिक लोग फंसे हुए हैं. राहत अब कुछ जाने भी लगी है, तो वह सिर्फ वीरपुर तक सीमित है. आसपास के गांव अब भी अछूते हैं. भीमनगर में मिले परमानंदपुर के एक निवासी ने बताया कि उधर अब तक कोई पहुंचा ही नहीं. रानीपट्टी से आ रहे रंजीत पासवान ने सूचना दी-सारे आदमी फंसे हुए हैं गांव में. बसमतिया रोड पर ३०-४० फुट जगह बची है. उसी पर डेढ-दो हजार आदमी रह रहे हैं. खाने-पीने का कोई सामान नहीं. दो-तीन आदमी मर भी गये हैं. कटैया से वीरपुर आठ किलोमीटर है और भीमनगर से पांच. अब नावें वीरपुर तक पहुंचने लगी हैं, लेकिन वे बहुत महंगी हैं. एक नाव एक बार वीरपुर जाने के लिए पांच से छह हजार रुपये लेती है. उसमें भी पानी की धार देखते हुए इन छोटी नांवों से वहां जाना जोखिम भरा है.
कटैया में एक चाय दुकान पर मिलते हैं, दिलीप कुमार गुप्ता. उनके पास वीरपुर से आज सुबह तक की सूचनाएं हैं-अब भी हरेक कॉलोनी में सात फुट पानी है. वीरपुर कोसी पुल के हॉस्टल की छत पर तीन सौ आदमी हैं. फतेहपुर स्कूल पर ५०-६० आदमी हैं. कहीं कोई मदद नहीं मिल पायी है .
वे सुनाते हैं-पूरा गांव भंस गया है फतेपुर का. वीरपुर बाजार में अरबों की संपत्ति का नुकसान है. क्वार्टरों में चोरियां बढ गयी हैं. जो नाववाला दिन में वीरपुर से कटैया पहुंचाता है, वही रात में जा कर खाली घरों पर हाथ साफ करता है. तीन महला मकान गिर रहे हैं. दिलीप कटैया में वीरपुरवालों को सूचना देते हैं चिल्ला कर : चानो मिस्त्री, रमेश कुमार, अख्तर बैंड, दुक्खी बैंड, मनोज पाठक के मकान टूट गये हैं.
कुछ दूसरी सूचनाएं भी मिली हैं- वीरपुर जेल में ८७ कैदी थे. असुरक्षित. चार दिनों से उनका खाना बंद था. जेल के कर्मचारी भाग चुके थे. अंत में कैदियों ने धोतियां-चादरें जोडीं और भाग गये. उनमें से कितने बचे-कितने डूब गये, अभी कौन बता सकता हैङ्क्ष सिविल कोर्ट, अनुमंडल ऑफिस के हजारों रेकॉर्ड पानी में खत्म. धान और पाट की खेती डूब गयी. बीसियों हजार लोग बरबाद हो गये.
भीमनगर से कटैया आनेवाली सडक राहगीरों से भरी है. उजडे-बरबाद हुए परिवार छोटे ठेलों पर, कंधे पर सामान लिये जानवर हांकते आ रहे हैं. थके-हारे चेहरे-उदास आंखें. लोग हंसना भूल गये हैं. गलती से कोई बाहरी आदमी हंस दे, तो लोग चौंक उठते हैं. जानवर तक डकरना भूल गये हैं. बूढी, कमर झुकी औरतें भी, बच्चे भी गठरियां उठाये तेजी से चल रहे हैं. कहां पहुुंचना है, पता नहीं. कोसी ने उन्हें कहीं का नहीं छोडा.
... सडक के किनारे बाढ का पानी तेजी से थांप मारता है. कभी-कभी कोई गाडी भीड के बीच से गुजर जाती है सीटी बजाती हुई... एक औरत रास्ते की दूसरी ओर अपने किसी परिचित से कह रही है-वीरपुर तो अब सपना हो गया.
... कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता.
***
हफ्ते भर से वीरपुर में फंसे लोग अब निकलने लगे हैंं-लेकिन उनमें से भी वही लोग निकल पा रहे हैं, जो नाव के लिए दो से छह हजार रुपये खर्च कर पाने में सक्षम हैं.
स्वीटी फ्रांसिस उनमें से एक हैं, जो अपनी मां, दादी और बहनों के साथ मंगलवार को वीरपुर को पीछे छोड आयीं. बाहर निकल आने की आश्वस्ति उनके चेहरे पर है, लेकिन अब भी वीरपुर में उनके दो भाइयों समेत पांच परिजन फंसे हुए हैं. ये सात दिन स्वीटी के लिए किसी यातना से कम नहीं रहे. वह याद करती है-नमक तक कोई नहीं दे रहा है. एयरड्रॉपिंग का कोई खास फायदा नहीं है. पैकेट पानी में गिर जाते हैं.
वीरपुर में राशन और दवाइयों की कुछ दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन राशन दोगुने-तिगुने दाम पर मिल रहा है. इसके अलावा उसे बनाने का संकट भी है. स्वीटी बताती है कि उसके वार्ड नंबर चार के वार्ड मेंबर की गोल चौक पर सरकारी राशन की दुकान है. उन्होंने कुछ भी देने से मना कर दिया. चावल ३० से ४० रुपये किलो तक बिक रहा है. चूडा सौ रुपये तक.
स्वीटी को याद है, सोमवार की सुबह से ही ऐसी अपुष्ट खबरें आने के बाद कि बांध टूटनेवाला है, बाजार में चीजों के दाम बढ गये थे. सोमवार के दिन मूढी ४० रुपये किलो तक बिकी. दिन में दो बजे के करीब कुछ युवकों ने खबर दी कि बांध टूट गया. लेकिन तब भी लोगों को यकीन था कि सरकारी तौर पर कोई सूचना जरूर मिलेगी. उन्होंने अफवाहों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया. उधर मधुबन जंगल में पानी भरने लगा था. शाम को राजमार्ग तोड दिया गया और इसके बाद वीरपुर में पानी भर गया.
फ्रांसिस परिवार ने जैसे-तैसे खाने का कुछ सामान बचाया और छत की शरण ली. लेकिन शहर की सारी आबादी को छतें उपलब्ध नहीं थीं, जहां वह शरण ले सकती. गरीबों के बांस-फूस के झोंपडे थे. वे डूबे भी-बहे भी. कइयों ने दूसरों की छतों पर शरण ली.
पहले तो वीरपुर के निवासियों ने सोचा कि पानी दो-तीन दिनों में निकल जायेगा, जैसा कि पहले भी हो चुका था. लेकिन उनकी उम्मीदें सही साबित नहीं हुईं. वीरपुर और टूटे हुए कुसहा बांध के बीच में पडते हैं नेपाल के गांव-लाही, हरिपुर, शिवगंज और दूधगंज. उन गांवों में तो अब घर भी नहीं दिखते. सिर्फ पेड खडे दिख रहे हैं. वीरपुर के अलावा भवानीपुर, सीतापुर, हृदयनगर और प्रखंड मुख्यालय बसंतपुर भी पूरी तरह तबाह हो चुके हैं.
बाढ से घिरे इलाकों में भूख से मौतें शुरू हो चुकी हैं. फ्रांसिस परिवार ही नहीं, वीरपुर से निकले कई अन्य लोगों ने भी सूचना दी-परमानंदपुर मदरसा में फंसे १२ लडके भूख से मर गये २३ अगस्त को. २५ को बसमतिया में २० लोग डूब गये हैं....आठ साल का एक बच्चा एयरड्रॉपिंग का पैकेट लपकने में छत से गिर कर मर गया. वीरपुर अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर वीरेंद्र प्रसाद की इलाज के अभाव में शनिवार को मौत हो गयी.
...नक्शा फैला कर देखिए-पश्चिम में भीमनगर से पूरब बसमतिया तक का पूरा इलाका कोसी में समा चुका है. लोग जिंदा तो हैं, लेकिन हर पल जीवन उनसे दूर होता जा रहा है.
...मुसलिम टोले में २०० लोग फंसे हुए हैं. सेंट्रल बैंक कॉलोनी (वार्ड चार) में सौ से अधिक लोग फंसे हुए हैं. वीरपुर से दो किमी पूरब पटेरवा में दो हजार लोग फंसे हुए हैं. उनमें बच्चे हैं, महिलाएं हैं, बूढे हैं.
...और ऐसे में वीरपुर लहरी टोल की ज्योति पराया ने २० तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया. चारों ओर से पानी से घिरे एक काठ के घर की छत पर शरण ली हुईं चार बहनों को भाई मिला...लेकिन वह बचेगा कैसेङ्क्ष मकान धंसा तो क्या होगाङ्क्ष कौन जानता है कि मकान धंस नहीं गया होगाङ्क्ष रोज ही शहर (!) में घर गिर रहे हैं. छतें टूट रही हैं. दीवारें धंस रही हैं.
स्वीटी को इन सात दिनों में अपने पापा की बहुत याद आयी. सिंचाई विभाग में इंजीनियर रहे और कुसहा बांध के इंच-इंच से परिचित स्वीटी के पापा कहते थे-कुसहा बांध टूटे तो कभी वीरपुर में मत रहना. कोसी इसे बरबाद कर देगी.
पापा के निधन के कई वर्षों बाद स्वीटी पाती है कि उसके पापा कितने सही थे.
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कटैया जैसे छोटे बाजार के लिए इतनी भीड बहुत अनहोनी बात है. साल में सिर्फ विश्वकर्मा पूजा के मेले में ऐसी भीड जमा होती है. लेकिन वह तो मेला होता है. बिहार स्टेट हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन में कार्यरत राकेश कुमार इसके लिए एक दूसरा नाम सुझाते हैं : आफत मेला.
वास्तव में यह आफत मेला है. कटैया हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट से दक्षिण से लेकर भंटाबाडी (नेपाल) तक चले जाइए-अस्थायी तंबुओं (इन्हें अगर आप तंबू कह सकते हों) में रह रही हजारों की आबादी आफत में फंसी हुई है. कटैया की हर इंच पर उजडे परिवार बसे हुए हैं. हर तरफ, बांस-फूस से बनी दुकानों से बची खाली जगह से लेकर मंदिर परिसर, धर्मशाला और दूसरी सभी जगहों पर विस्थापितों के तंबू गिरे हुए हैं-छोटे से घेरे में घर का बचा-खुचा सामान और बहने से बच गये लोग. वीरपुर, बैजनाथपुर, लालपुर खंटाहा, भवानीपुर, बलुआ, भारदह से आये हुए लोग अपने जानवरों के साथ बोरे और चादरें आदि टांग कर रह रहे हैं. हर समय कुछ नये परिवार आ रहे हैं और खाली जगहों पर कुछ नये तंबूनुमा डेरे खडे हो जाते हैं. राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतीश मिश्रा बलुआ के निवासी हैं. बलुआ से आये लोग बताते हैं कि वहां न कोई नाव है, न राहत. बलुआ हाइ स्कूल पर २०० लोगों ने शरण ली थी. शुक्रवार २२ अगस्त को छत गिर गयी. उनमें से कम ही होंगे, जो बच पाये होंगे.
लेकिन जो जीवित हैं, वे भी हताश हो रहे हैं. एक टेंट में सूखा चूडा फांक रहे उपेंद्र प्रसाद कहते हैं-'और दो चार दिन कुछ नहीं मिला तो लोग भूखे मर जायेंगे. अभी तो जिंदा देख रहे हैं न, चार दिन बाद लाश देखियेगा लोगों की.'
भीमनगर के पुराना बाजार चौराहे पर बाढ राहत शिविर में कुछ लोग जमा हो गये हैं-दवा काउंटर के पास. शिविर में बैठा एक नेतानुमा व्यक्ति स्थानीय लोगों और अधिकारियों को बता रहा है-'मेरा तो एक बयान ऐसा आया है कि उसे हिंदुस्तान टाइम्स तक को छापना पडा है.'...ऐसी आफत में भी इतना हृदयहीन हो सकता है कोईङ्क्ष
हाथ में नोटबुक देख कर पास ही में बैठे पुलिस के एक अधिकारी ने अखबारों पर टिप्पणी की-'कुछ छाप नहीं रहे हो तुमलोग जी. जनता मर रही है यहां.' लेकिन वहीं बैठे बाढ राहत के एक प्रभारी अधिकारी कोई रिस्क लेना नहीं चाहते. उतने बोल्ड नहीं हैं. राहत कार्यों के बारे में पूछने भर से वे खडे हो जाते हैं-'जो पूछना है, डीएम से पूछिए जाकर. हमारी नौकरी मत लीजिए भाई.'
सडक की दूसरी ओर एक चाय दुकान पर चाय 'सर्व' करनेवाला बच्चा पानी का गिलास रखते हुए लगभग इशारे में बताता है-'यहां लोग पांच दिन बिना खाये रहा है. तीन दिन से पूडी बन रहा है, तब जिंदा देख रहे हैं इनको.' वह अपने दोनों हाथों की अंगुलियां फैलाता है-दस हजार लोग मरा है.
शिविर के सामने पंक्तियों में बैठे कुछ बच्चे और महिलाएं भोजन का पौन घंटे तक इंतजार करने के बाद उठने लगे हैं. हालांकि इस पूरी अवधि में तेजी से पूडियां तली जाती रही हैं. वे बंटेंगी, लेकिन कब, पता नहीं.
उन्हीं के बीच से गुजरती हुई, अपने मल्लाह पति को खाना ले जाती हुई और बाढ के प्रकोप से बची हुई एक नेपाली महिला कोसी को गोहारती है, अपनी भाषा में :
कौने नइया डूबेइगो कोसी माई
कौने नइया उगइबो कोसी माई,
मईया गो उतरइबी पार...
पापे नइया डूबेइगो कोसी माई,
धरमे नइया उगइबो कोसी माई,
मईया गो उतरइबी पार...
... लोग जुट आये हैं. वे सुनाते हैं- सौ साल पहले यहां कोसी बहती थी. अब लगता है, वह फिर लौट आयी है. बेचन यादव, कारी, तेजनारायण, रामदेव, संजय व शैलेंद्र ... दर्जनों लोग, सबके पास कई-कई कहानियां. किसी के आंगन में पोरसा भर पानी है, तो किसी के घर में सांप घुस आया है. अभी लेकिन सब शांत हैं-चिंता की एक रेख तक नहीं है. कहते हैं अभी सडक तो है ही सोने के लिए. ज्यादा डूबने लगेगा तो प्लान करेंगे निकलने का.
...लेकिन बूढे जोगेंदर को यह भी चिंता नहीं. वे अपनी खैनी होठों के नीचे दाब चुके हैं-'हम अकेले आदमी, मर जायेंगे तो क्या होगा ङ्क्ष सांप भी कांट लेगा, तो क्या होगा ङ्क्ष
१० साल के कुंदन का घर सडक की दूसरी ओर है- सूखे में. वह आधे गांव को डूबते हुए देखता है-अपलक. डर ङ्क्ष 'डरेंगे क्यों ङ्क्ष सब मरेगा कि हमीं मरेंगे ङ्क्ष... सब न मरतय.
लेकिन उससे दो साल छोटा मन्नू जिदंगी को उससे ज्यादा संजीदगी से लेता है-' डरना क्या है ङ्क्ष पानी बढेगा तो जहां सब जायेंगे, वहीं हम भी जायेंगे.'
पानी बढ रहा है. अपने गांव, घर, चूल्हे, खिडकी-दरवाजों को इंच-इंच डूबते हुए देखना-एक त्रासदी है. पानी अपने एक नये रूप में मिल रहा है - इनमें से अनेक पीढियों को. वे अपने तरीकों से इसकी तैयारी में जुटे हैं.
जोगेंदर की निर्लिप्तता, कुंदन की सहजता और मन्नू की जीवटता-सुनने लायक चीजें हैं, लेकिन उन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं... लगभग एक सदी बाढ लौटी कोसी भी नहीं.
... पानी बढ रहा है.
***
सिंहेश्र्वर मंदिर धर्मशाला से निकलती दलित औरतों के मुंह से कुछ अस्फुट से बोल फूटते हैं-सगरे समैया हे कोसी माई, सावन-भादो दहेला... पूजा गीत. औरतों के चेहरों पर उदासी मिश्रित भय है... हर मंगल को दीप जलाने-संझा दिखाने के बाद भी नहीं मानीं कोसी माई.
...परसा, हरिराहा, कवियाही, रामपुर लाही... शंकरपुर व कुमारखंड प्रखंडों के दर्जनों जलमग्न गांवों से उजडे हजारों लोग पिछले चार दिनों से धर्मशाला में डेरा डाले हुए हैं. यहां रहने के लिए पक्के कमरे हैं. मूढी, चूडा, चीनी, खिचडी व बिस्कुट सबका इंतजाम है. बच्चे चूडा-गुुड पाकर खुश हैं...बेवजह शोर मचा रहे हैं. बूढे-बुजुर्ग माथे पर जोर देकर याद करने की कोशिश करते हैं कोई पुरानी बात... बाप-दादों की स्मृतियों को भी खंगाल रहे हैं-'उंहू . ऐसी बाढ मेरे देखे में तो कभी नहीं आयी. बाप-दादे भी कुछ नहीं बता गये. ३० साल पहले पानी भरा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि पाट की पूरी फसल डूब जाये फुनगी तक.'
...ऐसा नहीं हुआ कभी. ६० साल के परमेसरी साह हतप्रभ हैं. जिले में बाढ ने सबसे अधिक कुमारखंड और शंकरपुर प्रखंडों में नुकसान पहुंचाया है. यदुनंदन मेहता कुमारखंड की हरिराहा पंचायत के हैं. २० अगस्त की शाम को वे अपने गांव में चौक पर घूम रहे थे कि एकाएक साइफन में देखा कि पानी बढ गया है. गांववालों को पहले से अंदेशा नहीं था. जैसे-तैसे भागे सब. २३ तारीख तक यदुनंदन लोगों को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर सिंहेश्र्वर लाते रहे. फिर रास्ता बंद हो गया. गांव के तीन हजार से ज्यादा लोग या तो वहीं फंसे हुए हैं या अन्य जगहों पर चले गये हैं. शंकरपुर प्रखंड के परसा गांववालों के लिए भी बाढ अचानक आयी.
२१ अगस्त की सुबह तीन बजे पानी गांव में घुस आया. गांव की पांच हजार आबादी में से अधिक वहीं फंसी हुई है. करीब सौ लोग निकल पाये हैं. गांव में चार फुट से ज्यादा पानी है अभी. रामचंद्र दास उदास हैं. वे अपनी दो बीघे में लगी धान की फसल, एक बीघे पाट और पांच मवेशियों को याद करते हैं-'सब बह गये. धान इस बार अच्छा लगा था. पांच किलो खाद हर कट्ठे में दिया था. सब खत्म.
जयकुमार साह के लिए भी यह कम नुकसानदेह नहीं रही. उनके १०० सदस्योंवाले परिवार की ५० भैंसें पानी में बह गयीं. अभी भी उनके मां-पिताजी गांव (परसा) में फंसे हुए हैं. उनकी चार बीघे में लगी धान की फसल भी डूब गयी.
...गांव में से इक्के-दुक्के लोग किसी तरह सुरक्षित जगहों पर अब भी पहुंच रहे हैं. नये आनेवाले ये लोग गांव की नयी खबरें भी साथ लाते हैं-प्रायः दुखद खबरें. ... हुकुम राम की मां मर गयीं-डूब कर. मचान पर थी, उसी पर से गिर गयीं. पानी का 'अदक' (आतंक) नहीं सह पायी ७० साल की बूढी. उसके घरवाले अभी मचान पर हैं. परसा में कल पानी घटने लगा था... आज फिर बढ गया.
...लोग चुप हो जाते हैं कुछ क्षण. उधर कोने में कोई सिसक उठता है... कारी कोसी जाने क्या लेकर मानेगी.
१८ किलोमीटर है सिंहेश्र्वर से परसा. कल तक सडक चालू थी, आज जिरवा पुल टूट गया-सो रास्ता बंद. लालपुर रोड पर भी भर घुटना भर पानी है. मतलब कि नाव के बिना अब गांववाले निकल नहीं सकते.
सबके घर का कोई -न -कोई गांव में फंसा हुआ है. सब उदास हैं. १२ साल का एक लडका धीरे से आकर बैठ जाता है-मिथुन कुमार दास. कहता है 'लिख लीजिए, मैं अकेले हूं यहां. मम्मी-पापा सहित सारे घरवाले गांव में हैं.' वह दो-तीन दिन पहले किसी काम से कवियाही आया था. इस बीच बाढ आ गयी और वह यहां रह गया. सभी अपना नाम लिखाना चाहते हैैंं. दीनबंधु साह आठ आदमी. रवींद्र कुमार दास-तीन आदमी. सत्यनारायण साह-पांच आदमी. परमेसरी साह-पांच आदमी. संतोष शर्मा-पांच आदमी. बेचन, शिबू, कमलेश्र्वरी ...नामों की अंतहीन सूची है. जो निकल आये हैं, वे चाहते हैं कि फंसे हुए लोग भी निकल आयें. देर हो रही है, तो वे धैर्य खोते जा रहे हैं. चूडा-गुुड मिल रहा है तो क्या, जब परिवार ही साथ नहीं तो...
परिवारों को फिर से साथ आने में समय लगेगा. उजडे घरों को फिर से बसने में भी और पानी को उतरने में भी.
...वह तो अभी बढ ही रहा है.
कटैया बाजार पर पंडा नगर से भैंसे हांक कर ला रहे किसानों ने बताया-वीरपुर बाजार में कमर भर पानी है. भीमनगर बाजार में सरकारी राहत शिविर के सामने आधे घंटे से रोटियों के लिए खडे विकास कुमार राम ने आग्रह करते हुए लिखाया-'वीरपुर के कुमार चौक में ५० आदमी फंसे हुए हैं.' विकास आज ही वीरपुर से निकला है किसी तरह.
कोसी ने लगभग पूरी तरह लील लिया है वीरपुर को. क्या बचा है वहां अब. जो दशा है वहां की ... एक-एक कर नयी सूचनाएं मिल रही हैं वीरपुर से-मानो एक अंधकार से परदा उठ रहा हो.
वीरपुर से कुसहा की दूरी महज छह किलोमीटर है और सोमवार को बांध टूटने के बाद भारत में पहला बडा आघात वीरपुर को झेलना पडा.
सोमवार की सुबह से ही वीरपुर बाजार में अफवाहें थीं कि बांध को खतरा है, लेकिन अधिकारिक तौर पर कोई सूचना नहीं थी. इससे लोगों ने निकलने की तैयारी भी नहीं की. बूढ-पुरनियों ने इन अफवाहों को चुटकी में उडा दिया-पानी तो आता ही रहता है. इस बार भी आया है, तो पहले की तरह ही निकल जायेगा. ...खतरे की गंभीरता का अंदेशा किसी को नहीं था.
लेकिन शाम साढे छह बजे पानी शहर में घुसा और घंटे भर में पूरा शहर तीन से चार फुट पानी से भर गया. किसी को निकलने का मौका नहीं मिला. पूरा हफ्ता निकल जाने पर भी वीरपुर में आधा से अधिक लोग फंसे हुए हैं. राहत अब कुछ जाने भी लगी है, तो वह सिर्फ वीरपुर तक सीमित है. आसपास के गांव अब भी अछूते हैं. भीमनगर में मिले परमानंदपुर के एक निवासी ने बताया कि उधर अब तक कोई पहुंचा ही नहीं. रानीपट्टी से आ रहे रंजीत पासवान ने सूचना दी-सारे आदमी फंसे हुए हैं गांव में. बसमतिया रोड पर ३०-४० फुट जगह बची है. उसी पर डेढ-दो हजार आदमी रह रहे हैं. खाने-पीने का कोई सामान नहीं. दो-तीन आदमी मर भी गये हैं. कटैया से वीरपुर आठ किलोमीटर है और भीमनगर से पांच. अब नावें वीरपुर तक पहुंचने लगी हैं, लेकिन वे बहुत महंगी हैं. एक नाव एक बार वीरपुर जाने के लिए पांच से छह हजार रुपये लेती है. उसमें भी पानी की धार देखते हुए इन छोटी नांवों से वहां जाना जोखिम भरा है.
कटैया में एक चाय दुकान पर मिलते हैं, दिलीप कुमार गुप्ता. उनके पास वीरपुर से आज सुबह तक की सूचनाएं हैं-अब भी हरेक कॉलोनी में सात फुट पानी है. वीरपुर कोसी पुल के हॉस्टल की छत पर तीन सौ आदमी हैं. फतेहपुर स्कूल पर ५०-६० आदमी हैं. कहीं कोई मदद नहीं मिल पायी है .
वे सुनाते हैं-पूरा गांव भंस गया है फतेपुर का. वीरपुर बाजार में अरबों की संपत्ति का नुकसान है. क्वार्टरों में चोरियां बढ गयी हैं. जो नाववाला दिन में वीरपुर से कटैया पहुंचाता है, वही रात में जा कर खाली घरों पर हाथ साफ करता है. तीन महला मकान गिर रहे हैं. दिलीप कटैया में वीरपुरवालों को सूचना देते हैं चिल्ला कर : चानो मिस्त्री, रमेश कुमार, अख्तर बैंड, दुक्खी बैंड, मनोज पाठक के मकान टूट गये हैं.
कुछ दूसरी सूचनाएं भी मिली हैं- वीरपुर जेल में ८७ कैदी थे. असुरक्षित. चार दिनों से उनका खाना बंद था. जेल के कर्मचारी भाग चुके थे. अंत में कैदियों ने धोतियां-चादरें जोडीं और भाग गये. उनमें से कितने बचे-कितने डूब गये, अभी कौन बता सकता हैङ्क्ष सिविल कोर्ट, अनुमंडल ऑफिस के हजारों रेकॉर्ड पानी में खत्म. धान और पाट की खेती डूब गयी. बीसियों हजार लोग बरबाद हो गये.
भीमनगर से कटैया आनेवाली सडक राहगीरों से भरी है. उजडे-बरबाद हुए परिवार छोटे ठेलों पर, कंधे पर सामान लिये जानवर हांकते आ रहे हैं. थके-हारे चेहरे-उदास आंखें. लोग हंसना भूल गये हैं. गलती से कोई बाहरी आदमी हंस दे, तो लोग चौंक उठते हैं. जानवर तक डकरना भूल गये हैं. बूढी, कमर झुकी औरतें भी, बच्चे भी गठरियां उठाये तेजी से चल रहे हैं. कहां पहुुंचना है, पता नहीं. कोसी ने उन्हें कहीं का नहीं छोडा.
... सडक के किनारे बाढ का पानी तेजी से थांप मारता है. कभी-कभी कोई गाडी भीड के बीच से गुजर जाती है सीटी बजाती हुई... एक औरत रास्ते की दूसरी ओर अपने किसी परिचित से कह रही है-वीरपुर तो अब सपना हो गया.
... कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता.
***
हफ्ते भर से वीरपुर में फंसे लोग अब निकलने लगे हैंं-लेकिन उनमें से भी वही लोग निकल पा रहे हैं, जो नाव के लिए दो से छह हजार रुपये खर्च कर पाने में सक्षम हैं.
स्वीटी फ्रांसिस उनमें से एक हैं, जो अपनी मां, दादी और बहनों के साथ मंगलवार को वीरपुर को पीछे छोड आयीं. बाहर निकल आने की आश्वस्ति उनके चेहरे पर है, लेकिन अब भी वीरपुर में उनके दो भाइयों समेत पांच परिजन फंसे हुए हैं. ये सात दिन स्वीटी के लिए किसी यातना से कम नहीं रहे. वह याद करती है-नमक तक कोई नहीं दे रहा है. एयरड्रॉपिंग का कोई खास फायदा नहीं है. पैकेट पानी में गिर जाते हैं.
वीरपुर में राशन और दवाइयों की कुछ दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन राशन दोगुने-तिगुने दाम पर मिल रहा है. इसके अलावा उसे बनाने का संकट भी है. स्वीटी बताती है कि उसके वार्ड नंबर चार के वार्ड मेंबर की गोल चौक पर सरकारी राशन की दुकान है. उन्होंने कुछ भी देने से मना कर दिया. चावल ३० से ४० रुपये किलो तक बिक रहा है. चूडा सौ रुपये तक.
स्वीटी को याद है, सोमवार की सुबह से ही ऐसी अपुष्ट खबरें आने के बाद कि बांध टूटनेवाला है, बाजार में चीजों के दाम बढ गये थे. सोमवार के दिन मूढी ४० रुपये किलो तक बिकी. दिन में दो बजे के करीब कुछ युवकों ने खबर दी कि बांध टूट गया. लेकिन तब भी लोगों को यकीन था कि सरकारी तौर पर कोई सूचना जरूर मिलेगी. उन्होंने अफवाहों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया. उधर मधुबन जंगल में पानी भरने लगा था. शाम को राजमार्ग तोड दिया गया और इसके बाद वीरपुर में पानी भर गया.
फ्रांसिस परिवार ने जैसे-तैसे खाने का कुछ सामान बचाया और छत की शरण ली. लेकिन शहर की सारी आबादी को छतें उपलब्ध नहीं थीं, जहां वह शरण ले सकती. गरीबों के बांस-फूस के झोंपडे थे. वे डूबे भी-बहे भी. कइयों ने दूसरों की छतों पर शरण ली.
पहले तो वीरपुर के निवासियों ने सोचा कि पानी दो-तीन दिनों में निकल जायेगा, जैसा कि पहले भी हो चुका था. लेकिन उनकी उम्मीदें सही साबित नहीं हुईं. वीरपुर और टूटे हुए कुसहा बांध के बीच में पडते हैं नेपाल के गांव-लाही, हरिपुर, शिवगंज और दूधगंज. उन गांवों में तो अब घर भी नहीं दिखते. सिर्फ पेड खडे दिख रहे हैं. वीरपुर के अलावा भवानीपुर, सीतापुर, हृदयनगर और प्रखंड मुख्यालय बसंतपुर भी पूरी तरह तबाह हो चुके हैं.
बाढ से घिरे इलाकों में भूख से मौतें शुरू हो चुकी हैं. फ्रांसिस परिवार ही नहीं, वीरपुर से निकले कई अन्य लोगों ने भी सूचना दी-परमानंदपुर मदरसा में फंसे १२ लडके भूख से मर गये २३ अगस्त को. २५ को बसमतिया में २० लोग डूब गये हैं....आठ साल का एक बच्चा एयरड्रॉपिंग का पैकेट लपकने में छत से गिर कर मर गया. वीरपुर अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर वीरेंद्र प्रसाद की इलाज के अभाव में शनिवार को मौत हो गयी.
...नक्शा फैला कर देखिए-पश्चिम में भीमनगर से पूरब बसमतिया तक का पूरा इलाका कोसी में समा चुका है. लोग जिंदा तो हैं, लेकिन हर पल जीवन उनसे दूर होता जा रहा है.
...मुसलिम टोले में २०० लोग फंसे हुए हैं. सेंट्रल बैंक कॉलोनी (वार्ड चार) में सौ से अधिक लोग फंसे हुए हैं. वीरपुर से दो किमी पूरब पटेरवा में दो हजार लोग फंसे हुए हैं. उनमें बच्चे हैं, महिलाएं हैं, बूढे हैं.
...और ऐसे में वीरपुर लहरी टोल की ज्योति पराया ने २० तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया. चारों ओर से पानी से घिरे एक काठ के घर की छत पर शरण ली हुईं चार बहनों को भाई मिला...लेकिन वह बचेगा कैसेङ्क्ष मकान धंसा तो क्या होगाङ्क्ष कौन जानता है कि मकान धंस नहीं गया होगाङ्क्ष रोज ही शहर (!) में घर गिर रहे हैं. छतें टूट रही हैं. दीवारें धंस रही हैं.
स्वीटी को इन सात दिनों में अपने पापा की बहुत याद आयी. सिंचाई विभाग में इंजीनियर रहे और कुसहा बांध के इंच-इंच से परिचित स्वीटी के पापा कहते थे-कुसहा बांध टूटे तो कभी वीरपुर में मत रहना. कोसी इसे बरबाद कर देगी.
पापा के निधन के कई वर्षों बाद स्वीटी पाती है कि उसके पापा कितने सही थे.
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कटैया जैसे छोटे बाजार के लिए इतनी भीड बहुत अनहोनी बात है. साल में सिर्फ विश्वकर्मा पूजा के मेले में ऐसी भीड जमा होती है. लेकिन वह तो मेला होता है. बिहार स्टेट हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन में कार्यरत राकेश कुमार इसके लिए एक दूसरा नाम सुझाते हैं : आफत मेला.
वास्तव में यह आफत मेला है. कटैया हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट से दक्षिण से लेकर भंटाबाडी (नेपाल) तक चले जाइए-अस्थायी तंबुओं (इन्हें अगर आप तंबू कह सकते हों) में रह रही हजारों की आबादी आफत में फंसी हुई है. कटैया की हर इंच पर उजडे परिवार बसे हुए हैं. हर तरफ, बांस-फूस से बनी दुकानों से बची खाली जगह से लेकर मंदिर परिसर, धर्मशाला और दूसरी सभी जगहों पर विस्थापितों के तंबू गिरे हुए हैं-छोटे से घेरे में घर का बचा-खुचा सामान और बहने से बच गये लोग. वीरपुर, बैजनाथपुर, लालपुर खंटाहा, भवानीपुर, बलुआ, भारदह से आये हुए लोग अपने जानवरों के साथ बोरे और चादरें आदि टांग कर रह रहे हैं. हर समय कुछ नये परिवार आ रहे हैं और खाली जगहों पर कुछ नये तंबूनुमा डेरे खडे हो जाते हैं. राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतीश मिश्रा बलुआ के निवासी हैं. बलुआ से आये लोग बताते हैं कि वहां न कोई नाव है, न राहत. बलुआ हाइ स्कूल पर २०० लोगों ने शरण ली थी. शुक्रवार २२ अगस्त को छत गिर गयी. उनमें से कम ही होंगे, जो बच पाये होंगे.
लेकिन जो जीवित हैं, वे भी हताश हो रहे हैं. एक टेंट में सूखा चूडा फांक रहे उपेंद्र प्रसाद कहते हैं-'और दो चार दिन कुछ नहीं मिला तो लोग भूखे मर जायेंगे. अभी तो जिंदा देख रहे हैं न, चार दिन बाद लाश देखियेगा लोगों की.'
भीमनगर के पुराना बाजार चौराहे पर बाढ राहत शिविर में कुछ लोग जमा हो गये हैं-दवा काउंटर के पास. शिविर में बैठा एक नेतानुमा व्यक्ति स्थानीय लोगों और अधिकारियों को बता रहा है-'मेरा तो एक बयान ऐसा आया है कि उसे हिंदुस्तान टाइम्स तक को छापना पडा है.'...ऐसी आफत में भी इतना हृदयहीन हो सकता है कोईङ्क्ष
हाथ में नोटबुक देख कर पास ही में बैठे पुलिस के एक अधिकारी ने अखबारों पर टिप्पणी की-'कुछ छाप नहीं रहे हो तुमलोग जी. जनता मर रही है यहां.' लेकिन वहीं बैठे बाढ राहत के एक प्रभारी अधिकारी कोई रिस्क लेना नहीं चाहते. उतने बोल्ड नहीं हैं. राहत कार्यों के बारे में पूछने भर से वे खडे हो जाते हैं-'जो पूछना है, डीएम से पूछिए जाकर. हमारी नौकरी मत लीजिए भाई.'
सडक की दूसरी ओर एक चाय दुकान पर चाय 'सर्व' करनेवाला बच्चा पानी का गिलास रखते हुए लगभग इशारे में बताता है-'यहां लोग पांच दिन बिना खाये रहा है. तीन दिन से पूडी बन रहा है, तब जिंदा देख रहे हैं इनको.' वह अपने दोनों हाथों की अंगुलियां फैलाता है-दस हजार लोग मरा है.
शिविर के सामने पंक्तियों में बैठे कुछ बच्चे और महिलाएं भोजन का पौन घंटे तक इंतजार करने के बाद उठने लगे हैं. हालांकि इस पूरी अवधि में तेजी से पूडियां तली जाती रही हैं. वे बंटेंगी, लेकिन कब, पता नहीं.
उन्हीं के बीच से गुजरती हुई, अपने मल्लाह पति को खाना ले जाती हुई और बाढ के प्रकोप से बची हुई एक नेपाली महिला कोसी को गोहारती है, अपनी भाषा में :
कौने नइया डूबेइगो कोसी माई
कौने नइया उगइबो कोसी माई,
मईया गो उतरइबी पार...
पापे नइया डूबेइगो कोसी माई,
धरमे नइया उगइबो कोसी माई,
मईया गो उतरइबी पार...
26 अगस्त 2008
समाजवाद का भविष्य अन्तिम
वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद- जो मार्क्स का समाजवाद नहीं था और जिसकी संभावनायें अभी खुली हुई हैं- शायद असफल हो गगा है. लेकिन वास्तविक आस्तित्वमान पूंजीवाद- जो पूंजीवाद का मात्र एक ही संभावित प्रकार है- निश्चित तौर पर जिस तरह से बना था उसी तरह से नहीं सफल हो सका है. किसी भी व्यवहारिक निर्णय में पूंजीवाद हमारे समय में सबसे अधिक पतित है. एक और बात कि, पूंजीवाद उपलब्धियों के आकलन के सर्वाधिक वैधानिक कसौटी की सामाजिक व्यवस्था के रूप में; समाज में उपलब्ध वास्तविक तथा क्षमतावान संसाधनों द्वारा 'रोजगार की संपूर्णता' तथा 'रोजगार की अच्छाई' के संदर्भ में एक संभावना के बतौर पूरी तरह असफल हो चुका है. मानव इतिहास में इसके पहले समाज की उत्पादन संभावना तथा समाज की प्रगति/उपलब्धियों के बीच इतना विशाल अंतर कभी नहीं रहा जितना कि आज के पूंजीवाद के विकास की वर्तमान अवस्था में है. इस बात के साक्ष्य हैं कि तीन सफल औद्योगिक क्रांतियों की असाधारण उत्पादन क्षमता ने मनुष्यता का परित्याग कर दिया है तथा गरीबी और अशिक्षा, मैली कुचली झोपड़पट्टियों तथा पूंजीवादी विश्व के सबसे धनी देशों के लाखों से ज्यादा परिवारों तथा तीसरी दुनिया के गरीब देशों की परिधि तथा अर्धपरिधि में सिकुडी़ झोपड़ियों में भूख तथा दुर्दशा नें हज़ारों लाखों लोगों के जीवन को व्यर्थ बनाकर छोड़ दिया है. आज हमारे समय में तीसरी दुनिया निश्चित तौर पर पूंजीवाद के पतन का प्रतीक है........
जैसा कि पहले ही इशारा किया गया है कि इस दो असफलताओं के बीच एक अंतर है जिसे विशेष तौर पर ध्यान देना चहिए. समाजवाद कुछ समय के लिए असफल हुआ है लेकिन फिर भी मानवता को बचाए रखने तथा एक सुरक्षित दुनिया की आशा में तथा मानव जाति के जीवन मूल्य के लिए एक विकल्प के रूप में यह बचा हुआ है. इसे दोहराने की जरूरत है कि पूंजीवाद के अस्वीकार्य आर्थिक, नैतिक तथा पर्यावरणीय परिणाम, अपने यहां तथा विदेशों मे भी बर्बरता की ओर ले जाने वाली बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को रोकने में असफलता, व्यवस्था का भटकाव या विशेष परिस्थितियों अथवा 'गलत' नीतियों द्वारा उत्पन्न 'नकारात्मक' प्रभाव नहीं है. यह सब पूंजीवाद के न सुधरने वाले तथा अनियंत्रित तंत्रजनित अथवा ढांचागत तर्क खुद व्यवस्था में निहीत शोषण तथा ध्रुवीकरण के तर्क के उत्पाद हैं. अतः ये प्रभाव, यद्यपि एक निश्चित दौर में कम होने तथा अन्य में बढ़ने के बावजूद, स्थायी हैं. इसलिए ये जरूरी रूप से ही असाध्य हैं. दुसरे शब्दों में हमारे समय में पूंजीवाद का पतन अपने लिए एक व्यवस्थित या संरचनागत जरूरत अथवा अपरिहार्यता लिए हुए है. बदले में, सोवियत संघ में समाजवाद की असफलता कोई व्यवस्थाजनित य संरचनागत मजबूरी नहीं लिए हुए थी. राजनीति निर्देशित अर्थव्यवस्था के कारण समाजवाद में, साधारणतया बाजार आधारित पूंजीवाद जैसे कोई ढांचागत तर्क अथवा 'कानून' नहीं होते. समाजवाद प्राथमिक रूप से सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच त्रुटियों, सत्ता में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा गलत चुनाव कॆ कारण असफल हुआ. कम्युनिस्ट सत्ताओं (तथा यूरोप में सामजिक जनवादियों) की असफलता के प्रसंग में गैब्रियल कोल्को ने लिखा है कि "ऐसी स्थितियों में होते हुए भी समाज को मुक्त करने तथा उसके महत्वपूर्ण (साथ ही साथ स्थायी) ढंग से रूपांतरण करने में असफलता, उनकी विश्लेषणात्मक अक्षमता तथा ठहराव; उनके नेताओं तथा संगठन की सतत कमजोरी का प्रमाण है. यह वह यथार्थ है जिसने १९१४ के बाद अनगिनत देशों में सामाजिक जनवादी तथा साम्यावाद दोनों का सीमांतीकरण कर दिया जिसने पूंजीपति वर्ग तथा उसके सहयोगियों को, जो समाजवादी सत्ता द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधारों के छोटे हिस्सों के क्रियान्वयन के बगैर कभी भी जीवित नहीं रह सकते थे, सदियों की समस्या से मोहलत प्रदान कर दिया. जबकि इसने दूसरी तरह से लाठी को बहुत दूर झुका दिया लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवाद की असफलता निश्चित तौर पर एक मानवीय असफलता थी जो कि इसके बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं था. अगली बार जब कहीं और जब कभी कोई प्रयास किया जायेगा इस असफलता द्वारा सीखे गए सबक मदद करेंगे. इसलिए समाजवाद पूंजीवाद का न सिर्फ एक मात्र विकल्प है बल्कि मानवता के लिए यह एक वास्तविक पसंद हैं......
सोवियत संघ में जैसा समाजवाद निर्मित किया गया था वह असफल हो गया. अन्य जगहों पर पूंजीवाद भी पतित हो गया है. समाजवाद, जिसको कि हम जानते हैं तथा पूंजीवाद ,जिस तरह आस्तित्वमान है दोनों कि हमारे समय में असफलता स्पष्ट करती है कि पूंजीवाद से समाजवाद/साम्यवाद में संक्रमण के मामले में महायुगीन संक्रमण की समस्या और समाजवाद के भविष्य के सवाल को हम अच्छी तरह समझ सकते हैं. दूसरे शब्दों में, हम ऐसी स्थिति में हैं जहां पुराना अपनी सकारात्मक संभावनाओं को समेटे है तह्ता नए में जन्म से ही कुछ समस्याएं होगीं. एक दूसरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ग्राम्शी ने लिखा है कि 'पुराना अपनी मौत मर रहा है और नवीन जन्म नहीं ले रहा है; इस अराजक काल में बडे़ विकृत किस्म के लक्षण दिखाई दे रहे हैं'. यह विकृत लक्षण हैं, आज के सभी उन्नत तथा कम उन्नत पूंजीवादी देशों में, पूंजीवादी सभ्यता के किसी गहरे संकट से ज्यादा, आज हमारे समय में पूंजीवाद के अनिवार्य पतन के, कम या आधिक मात्रा में, लक्षण दिखाई दे रहे हैं.......
आज हम जो कुछ देख रहे हैं वह एक युग का अंत है, पूंजीवाद से संक्रमण का युग. एक असमान दुनिया के गठन और पुनर्गठन के केंद्र के रूप में पूंजीवाद के विस्तार के इन पांच सौ विषम वर्षों में, आर्थिक मजबूती और लाभ कि परिधि तथा अर्धपरिधि के संदर्भ में पूंजीवाद अपने स्थायी अंतर्विरोधों को दबाने में सक्षम था लेकिन यह सब भविष्य में अपनी जीत के लिए स्थितियों को बदतर बनाए बिना नहीं हो सकता था. अब आगे की विस्तार की संभावना के धीरे धीरे खतम होने के साथ ही इस अंतर्विरोधों को पहले जैसे दबाना कठिन है. लोगों के लिए वास्तविक विध्वंसक परिणामों के साथ अधिक आक्रामक हो कर वे जो घोषणाएं कर रहे हैं वह खुद पूंजीवाद के वर्चस्व के युग को दर्शाती हैं. अपने सबसे अच्छे दिनों में भी पूंजीवाद, शुम्पीटर के प्रसिद्ध मुहावरे का प्रयोग करें तो 'रचनात्मक विध्वंस' की एक प्रक्रिया है.जैए ही पूंजी में बढो़त्तरी होती है, प्रतियोगी शक्तियों को जीवित रहने के लिए प्रतियोगी होना पड़ता है तथा जो रचनात्मक नहीं हो पाते विध्वंस को अंजाम देते हैं. बाजार तथा प्रतियोगिता की दुकान में विजेता, पराजितों से प्रतिद्वंदिता करते हैं तथा रचना तथा विध्वंस एक तथा एक समान हो जाते हैं. पराजित, यद्यपि वैयक्तिक इकाई या निरपेक्षतः अकुशल नहीं होते. वास्तविक दुनिया में पराजित जनता होती है और कई बार पूंजीपति भी हो सकते हैं लेकिन व्यक्तिगत और सामुदायिक तौर पर अक्सर श्रमिक लोग ही होते हैं. 'रचनात्मक विध्वंस' का मतलब है- वास्तविक श्रमिकों की बेरोजगारी,समुदायों की निराश्रयता, पर्यावरण का विनाश तथा जनता की शक्तिहीनता. पूंजीवाद के रचनात्मक विध्वंस का का विनाशकारी पहलू अब ऐसे बिंदु पर पहुंच गया है ऐतिहासिक 'रेजन दि एत्रे' तथा बतौर उत्पादन प्रणाली के पूंजीवाद की न्यायसंगतता एकबारगी खत्म हो गई है तथा अब हम वैधानिक तौर पर यह कह सकते हैं कि पूंजीवाद अपने समय से ज्यादा, अपनी ऐतिहासिक वैधानिकता के काल से ज्यादा समय तक जीवित है.
पूंजीवाद की उपलब्धियां अब पूरी तरह से अतीत की हो चुकी हैं और इसका भविष्य सिर्फ मानवता के विध्वंस का ही वादा करता है. कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा है कि वर्ग संघर्ष 'या तो व्यापक तौर पर सामाजिक क्रांतिकारी पुनर्स्थापना में या फिर संघर्षरत वर्गों की आपसी बर्बादी से समाप्त होता है. बीसवीं सदी के महान वर्ग संघर्ष का परिणाम निश्चित तौर पर 'समाज की क्रांतिकारी पुनर्स्थापना' नहीं है. मार्क्स और एंगेल्स ने जिसे 'संघर्षरत वर्गों की सामान्य बर्बादी' कहा है वह पहले से ही समाज में हो रही है. अर्थव्यवस्थाएं हर जगह कसाईखाना बन गई हैं; लाचारी, गरीबी, धन की कमीं तथा संसाधनों की विलासितापूर्ण बर्बादी; कानून तथा व्यवस्था के व्यापक विध्वंस, मूर्खतापूर्ण क्षेत्रीयता तथा नस्लीय विवाद, देशों के बीच अथवा देशों के भीतर रोजमर्रा के नए युद्ध, जनसंहारक हथियारों के प्रसार तथा वैश्विक पैमाने पर आतंकवाद का खतरा, सब कुछ निगल जाने वाले पर्यावरणीय संकट, निकट भविष्य में ऐतिहासिक तौर पर बहुत वास्तविक संदर्भों में यह सब संघर्षरत वर्गों से ज्यादा 'समान बर्बादी के बिंदु हैं. पूंजीवाद का युग शायद अच्छी तरह से 'मानवता के संपूर्ण उन्मूलन' में ही खत्म हो जैसा कि मार्क्स द्वारा १८४५ में ही संभावना व्यक्त की गई थी. जिस परिप्रेक्ष्य को बाद मे रोजा लुक्जमबर्ग ने 'समाजवाद या बर्बरता' नामक उक्ति में व्यक्त किया. जिस खतरे को हम महसूस कर रहे हैं उसके संदर्भ में रोजा लुक्जमबर्ग के कथन को सुधारकर मेस्ज़रोज़ ने कुछ जोड़ते हुए कहा कि 'समाजवाद या बर्बरता', "अगर हम भाग्यवान हैं तो बर्बरता"--पूंजी के विनाशकारी विकास का अंतिम समायोजन मानवता का उन्मूलन है. ऐसी नियति 'मानवता का उन्मूलन' पूंजीवाद के अनियंत्रित धन बटोरने के तर्क में ही अंर्तनिहीत है. यह बिल्कुल ठीक कहा गया है कि पूंजीवाद के बारे में यह सच नही है कि 'इतिहास का अंत' हो गया है, जैसा कि बुर्जुवा विचारक हमें मानने के लिए कहते हैं, बल्कि इसका निरंतर आस्तित्व 'मनुष्य के इतिहास का' वास्तव में अंत कर देगा.....
पहले जैसा बताया गया है कि, चीजों के विस्तृत दृष्टि को लेकर, वर्तमान समय की पराजय तथा समाजवाद की वापसी उस उतार चढा़व की उपयुक्त दृष्टि है जो पूंजीवाद से समाजवाद में महायुगीन संक्रमण से अपरिहार्य तौर पर जुडी़ है......बीसवीं शताब्दी वैश्विक पूंजीवाद द्वारा दुनिया भर में संपूर्ण वर्चस्व के साथ शुरु हुई थी. तब मार्क्सवादी विश्लेषण के, और खुद मार्क्स के पूर्वानुमान के मुताबिक बीसवीं सदी में - प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत यूरोपीय क्रांति (जिसमें सिर्फ रूस की क्रांति ही कायम रह पाई), द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में और फिर चीन, कोरिया, क्यूबा, वियतनाम, और हर जगह पूंजीवादी व्यवस्था के लगभग एक तिहाई आबादी और परिक्षेत्र में समाजवादी क्रांतियां संपन्न हुईं. पूंजीवाद की परिसीमा में समाजवाद जड़ें नहीं जमा सकता था जैसा कि पूंजीवाद ने सामंतवाद के भीतर किया. पूंजीवाद द्वारा प्रदत्त भौतिक आधारों पर बेहतर ढंग से निर्मित यह समाज की एकदम एक नई शुरुआत है, लेकिन जिन गरीब तथा पिछडे़ देशों में समाजवाद के निर्माण की ये कोशिशें हुई वहां ये आधार मुश्किल से ही मौजूद थे.. जो सबसे कमजोर तैयारी मे थे यह उनका कार्यभार था फिर भी इन देशों ने इस निर्माण के लिए संघर्ष किया तथा अफ्रीका व अन्य जगहों पर भी मार्क्सवाद व समाजवाद के लिए प्रतिबद्ध आंदोलनों तथा क्रांतिकारी सत्ताओं का उदय हुआ. तथा पूंजीवाद तथा क्रांति के बाद समाजवाद की स्थापना के बीच लंबे समय तक जो प्रतिद्वंदिता रही वह अब बंद हो गई तथा उसका अचानक अंत हो गया. पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं के बाद, आने वाला भविष्य पूंजीवाद से संबंधित लगने लगा था लेकिन ऐसे परिप्रेक्ष्य सापेक्षतया नए हैं. कई सदियों से यह धारणा बहुत दूर थी कि पूंजीवाद तीसरी सहस्त्राब्दी तक बना रहेगा. लेकिन क्रांति पश्चात की प्रतिस्थापनाएं दिखाती हैं कि समाजवाड दूसरी सहस्त्राब्दी मे अंतिम दिनों में ही असफल हो गया. यद्यपि यह पहले दृष्टिकोण की समाप्ति नहीं है. समाजवाद का सोवियत प्रयोग असफल हो गया क्यूंकि वस्तुगत तथा आत्मगत दोनों तरह की स्थितियां इसके प्रतिकूल थीं. प्रारंभ में आर्थिक पिछडा़पन, फिर आंतरिक वर्गयुद्ध तथा सशस्त्र और निरस्त्र विदेशी हस्तक्षेप तथा वैश्विक पूंजीवाद के निरंतर प्रयासों ने समाजवाद के निर्माण में हर सफलता को बाधा पहुंचाया. इस राह के निर्धारक तत्व, अपर्याप्त तथा अक्सर ही गलत सिद्धांत थे जिन्होंने इस प्रयोग तथा कमजोर राजनीतिक नेतृत्व को दिशा निर्देश अथवा गलत दिशा निर्देश दिया. लेकिन जो जानना सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि जिस के लिए भी प्रयास हुए और जो भी कुछ असफल हुआ वह समाजवाद नहीं था बल्कि समाजवाद निर्माण के लिए पहला गंभीर प्रयास था. समाजवाद तथा साथ ही साथ क्रांति की उपलब्धियों के उद्देश्यों का जिन कारणों से जन्म हुआ वह अभी भी पहले से ज्यादा मौजूद हैं. इसे मानने का कोई कारण नही है कि प्रभुत्वशाली पूंजीवाद को हमेशा की ही तरह आश्चर्यचकित कर देने वाली नई क्रांतियां लंबे दिनों तक नहीं होंगी तथा समाजवाद के निर्मान के नए प्रयास नहीं किए जायेंगे. और इस बात को मानने के कई कारण हैं कि अनूकूल परिस्थितियों, ज्यादा समृद्ध सिद्धांत तथा बेहतर राजनीतिक नेतृत्व में भी ऐसे प्रयास सफल नही होगें......
यहां पूंजीवाद के उद्भव और विकास पर एक निगाह डालना काफी शिक्षाप्रद होगा. विद्वानों का मत है कि मध्यकाल के दिनों में पूंजीवाद अपनी गलत शुरुआत के बावजूद एक नहीं बल्कि कई घोषणाओं/उम्मीदों को समेटे हुए था. लेकिन विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रहने की ताकत की कमीं के कारण तथा उस दौरान मुख्यतः सामंती वातावरण के कारण कमजोर तथा विभाजित था. सामंती वातावरण से घिरा, आकार लेता पूंजीवाद आगे बढ़ने में असफल रहा. यह तब तक नहीं था जब तक कि बाद की सदियों में एक नया संयोग नहीं आया कि फुटकता पूंजीवाद, जिसने अपने पहले के विफल प्रयासों से लाभान्वित होकर जडे़ जमाया तथा अपने शत्रुओं को धराशायी करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली बनकर उभरे तथा आगे बढ़ सके, और अंततः यह प्रकट हुआ जैसे कि इग्लैंड तथा अन्य अटालांटिक समाजों में हुआ. एक बार उदीयमान होने के बाद सामंतवाद से संघर्ष लगातार जारी था, एक ऐसा संघर्ष जो प्रभुत्व के लिए दो वास्तविक आस्तित्वमान सामाजिक संरचनाओं के बीच था. यह संघर्ष राज्य सत्ता (उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार) तथा अपने हितों तथा विचारों के अनुसार समाज को संगठित करने के अधिकार के लिए था. इससे भी ज्यादा यह एक ऐसी प्रक्रिया का विस्तार था जिसमें एक नए सामाजिक ढांचे ने वैचारिक तथा आर्थिक दोनों तरह के अविवादित प्रभुत्व के लिए खुद को तैयार करने में पर्याप्त समय लिया. इसीलिए पूंजीवा हमारे समय में वैश्विक वर्चस्व के तंत्र के रूप में उपज सका तथा विकसित हुआ. जब तक कि इसमें छेद करने के लिए समाजवाद ने अपना पहला प्रयत्न नहीं किया, एक ऐसा प्रयत्न जो अभी असफल हो गया.....
जैसा कि पहले ही इशारा किया गया है कि इस दो असफलताओं के बीच एक अंतर है जिसे विशेष तौर पर ध्यान देना चहिए. समाजवाद कुछ समय के लिए असफल हुआ है लेकिन फिर भी मानवता को बचाए रखने तथा एक सुरक्षित दुनिया की आशा में तथा मानव जाति के जीवन मूल्य के लिए एक विकल्प के रूप में यह बचा हुआ है. इसे दोहराने की जरूरत है कि पूंजीवाद के अस्वीकार्य आर्थिक, नैतिक तथा पर्यावरणीय परिणाम, अपने यहां तथा विदेशों मे भी बर्बरता की ओर ले जाने वाली बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को रोकने में असफलता, व्यवस्था का भटकाव या विशेष परिस्थितियों अथवा 'गलत' नीतियों द्वारा उत्पन्न 'नकारात्मक' प्रभाव नहीं है. यह सब पूंजीवाद के न सुधरने वाले तथा अनियंत्रित तंत्रजनित अथवा ढांचागत तर्क खुद व्यवस्था में निहीत शोषण तथा ध्रुवीकरण के तर्क के उत्पाद हैं. अतः ये प्रभाव, यद्यपि एक निश्चित दौर में कम होने तथा अन्य में बढ़ने के बावजूद, स्थायी हैं. इसलिए ये जरूरी रूप से ही असाध्य हैं. दुसरे शब्दों में हमारे समय में पूंजीवाद का पतन अपने लिए एक व्यवस्थित या संरचनागत जरूरत अथवा अपरिहार्यता लिए हुए है. बदले में, सोवियत संघ में समाजवाद की असफलता कोई व्यवस्थाजनित य संरचनागत मजबूरी नहीं लिए हुए थी. राजनीति निर्देशित अर्थव्यवस्था के कारण समाजवाद में, साधारणतया बाजार आधारित पूंजीवाद जैसे कोई ढांचागत तर्क अथवा 'कानून' नहीं होते. समाजवाद प्राथमिक रूप से सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच त्रुटियों, सत्ता में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा गलत चुनाव कॆ कारण असफल हुआ. कम्युनिस्ट सत्ताओं (तथा यूरोप में सामजिक जनवादियों) की असफलता के प्रसंग में गैब्रियल कोल्को ने लिखा है कि "ऐसी स्थितियों में होते हुए भी समाज को मुक्त करने तथा उसके महत्वपूर्ण (साथ ही साथ स्थायी) ढंग से रूपांतरण करने में असफलता, उनकी विश्लेषणात्मक अक्षमता तथा ठहराव; उनके नेताओं तथा संगठन की सतत कमजोरी का प्रमाण है. यह वह यथार्थ है जिसने १९१४ के बाद अनगिनत देशों में सामाजिक जनवादी तथा साम्यावाद दोनों का सीमांतीकरण कर दिया जिसने पूंजीपति वर्ग तथा उसके सहयोगियों को, जो समाजवादी सत्ता द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधारों के छोटे हिस्सों के क्रियान्वयन के बगैर कभी भी जीवित नहीं रह सकते थे, सदियों की समस्या से मोहलत प्रदान कर दिया. जबकि इसने दूसरी तरह से लाठी को बहुत दूर झुका दिया लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवाद की असफलता निश्चित तौर पर एक मानवीय असफलता थी जो कि इसके बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं था. अगली बार जब कहीं और जब कभी कोई प्रयास किया जायेगा इस असफलता द्वारा सीखे गए सबक मदद करेंगे. इसलिए समाजवाद पूंजीवाद का न सिर्फ एक मात्र विकल्प है बल्कि मानवता के लिए यह एक वास्तविक पसंद हैं......
सोवियत संघ में जैसा समाजवाद निर्मित किया गया था वह असफल हो गया. अन्य जगहों पर पूंजीवाद भी पतित हो गया है. समाजवाद, जिसको कि हम जानते हैं तथा पूंजीवाद ,जिस तरह आस्तित्वमान है दोनों कि हमारे समय में असफलता स्पष्ट करती है कि पूंजीवाद से समाजवाद/साम्यवाद में संक्रमण के मामले में महायुगीन संक्रमण की समस्या और समाजवाद के भविष्य के सवाल को हम अच्छी तरह समझ सकते हैं. दूसरे शब्दों में, हम ऐसी स्थिति में हैं जहां पुराना अपनी सकारात्मक संभावनाओं को समेटे है तह्ता नए में जन्म से ही कुछ समस्याएं होगीं. एक दूसरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ग्राम्शी ने लिखा है कि 'पुराना अपनी मौत मर रहा है और नवीन जन्म नहीं ले रहा है; इस अराजक काल में बडे़ विकृत किस्म के लक्षण दिखाई दे रहे हैं'. यह विकृत लक्षण हैं, आज के सभी उन्नत तथा कम उन्नत पूंजीवादी देशों में, पूंजीवादी सभ्यता के किसी गहरे संकट से ज्यादा, आज हमारे समय में पूंजीवाद के अनिवार्य पतन के, कम या आधिक मात्रा में, लक्षण दिखाई दे रहे हैं.......
आज हम जो कुछ देख रहे हैं वह एक युग का अंत है, पूंजीवाद से संक्रमण का युग. एक असमान दुनिया के गठन और पुनर्गठन के केंद्र के रूप में पूंजीवाद के विस्तार के इन पांच सौ विषम वर्षों में, आर्थिक मजबूती और लाभ कि परिधि तथा अर्धपरिधि के संदर्भ में पूंजीवाद अपने स्थायी अंतर्विरोधों को दबाने में सक्षम था लेकिन यह सब भविष्य में अपनी जीत के लिए स्थितियों को बदतर बनाए बिना नहीं हो सकता था. अब आगे की विस्तार की संभावना के धीरे धीरे खतम होने के साथ ही इस अंतर्विरोधों को पहले जैसे दबाना कठिन है. लोगों के लिए वास्तविक विध्वंसक परिणामों के साथ अधिक आक्रामक हो कर वे जो घोषणाएं कर रहे हैं वह खुद पूंजीवाद के वर्चस्व के युग को दर्शाती हैं. अपने सबसे अच्छे दिनों में भी पूंजीवाद, शुम्पीटर के प्रसिद्ध मुहावरे का प्रयोग करें तो 'रचनात्मक विध्वंस' की एक प्रक्रिया है.जैए ही पूंजी में बढो़त्तरी होती है, प्रतियोगी शक्तियों को जीवित रहने के लिए प्रतियोगी होना पड़ता है तथा जो रचनात्मक नहीं हो पाते विध्वंस को अंजाम देते हैं. बाजार तथा प्रतियोगिता की दुकान में विजेता, पराजितों से प्रतिद्वंदिता करते हैं तथा रचना तथा विध्वंस एक तथा एक समान हो जाते हैं. पराजित, यद्यपि वैयक्तिक इकाई या निरपेक्षतः अकुशल नहीं होते. वास्तविक दुनिया में पराजित जनता होती है और कई बार पूंजीपति भी हो सकते हैं लेकिन व्यक्तिगत और सामुदायिक तौर पर अक्सर श्रमिक लोग ही होते हैं. 'रचनात्मक विध्वंस' का मतलब है- वास्तविक श्रमिकों की बेरोजगारी,समुदायों की निराश्रयता, पर्यावरण का विनाश तथा जनता की शक्तिहीनता. पूंजीवाद के रचनात्मक विध्वंस का का विनाशकारी पहलू अब ऐसे बिंदु पर पहुंच गया है ऐतिहासिक 'रेजन दि एत्रे' तथा बतौर उत्पादन प्रणाली के पूंजीवाद की न्यायसंगतता एकबारगी खत्म हो गई है तथा अब हम वैधानिक तौर पर यह कह सकते हैं कि पूंजीवाद अपने समय से ज्यादा, अपनी ऐतिहासिक वैधानिकता के काल से ज्यादा समय तक जीवित है.
पूंजीवाद की उपलब्धियां अब पूरी तरह से अतीत की हो चुकी हैं और इसका भविष्य सिर्फ मानवता के विध्वंस का ही वादा करता है. कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा है कि वर्ग संघर्ष 'या तो व्यापक तौर पर सामाजिक क्रांतिकारी पुनर्स्थापना में या फिर संघर्षरत वर्गों की आपसी बर्बादी से समाप्त होता है. बीसवीं सदी के महान वर्ग संघर्ष का परिणाम निश्चित तौर पर 'समाज की क्रांतिकारी पुनर्स्थापना' नहीं है. मार्क्स और एंगेल्स ने जिसे 'संघर्षरत वर्गों की सामान्य बर्बादी' कहा है वह पहले से ही समाज में हो रही है. अर्थव्यवस्थाएं हर जगह कसाईखाना बन गई हैं; लाचारी, गरीबी, धन की कमीं तथा संसाधनों की विलासितापूर्ण बर्बादी; कानून तथा व्यवस्था के व्यापक विध्वंस, मूर्खतापूर्ण क्षेत्रीयता तथा नस्लीय विवाद, देशों के बीच अथवा देशों के भीतर रोजमर्रा के नए युद्ध, जनसंहारक हथियारों के प्रसार तथा वैश्विक पैमाने पर आतंकवाद का खतरा, सब कुछ निगल जाने वाले पर्यावरणीय संकट, निकट भविष्य में ऐतिहासिक तौर पर बहुत वास्तविक संदर्भों में यह सब संघर्षरत वर्गों से ज्यादा 'समान बर्बादी के बिंदु हैं. पूंजीवाद का युग शायद अच्छी तरह से 'मानवता के संपूर्ण उन्मूलन' में ही खत्म हो जैसा कि मार्क्स द्वारा १८४५ में ही संभावना व्यक्त की गई थी. जिस परिप्रेक्ष्य को बाद मे रोजा लुक्जमबर्ग ने 'समाजवाद या बर्बरता' नामक उक्ति में व्यक्त किया. जिस खतरे को हम महसूस कर रहे हैं उसके संदर्भ में रोजा लुक्जमबर्ग के कथन को सुधारकर मेस्ज़रोज़ ने कुछ जोड़ते हुए कहा कि 'समाजवाद या बर्बरता', "अगर हम भाग्यवान हैं तो बर्बरता"--पूंजी के विनाशकारी विकास का अंतिम समायोजन मानवता का उन्मूलन है. ऐसी नियति 'मानवता का उन्मूलन' पूंजीवाद के अनियंत्रित धन बटोरने के तर्क में ही अंर्तनिहीत है. यह बिल्कुल ठीक कहा गया है कि पूंजीवाद के बारे में यह सच नही है कि 'इतिहास का अंत' हो गया है, जैसा कि बुर्जुवा विचारक हमें मानने के लिए कहते हैं, बल्कि इसका निरंतर आस्तित्व 'मनुष्य के इतिहास का' वास्तव में अंत कर देगा.....
पहले जैसा बताया गया है कि, चीजों के विस्तृत दृष्टि को लेकर, वर्तमान समय की पराजय तथा समाजवाद की वापसी उस उतार चढा़व की उपयुक्त दृष्टि है जो पूंजीवाद से समाजवाद में महायुगीन संक्रमण से अपरिहार्य तौर पर जुडी़ है......बीसवीं शताब्दी वैश्विक पूंजीवाद द्वारा दुनिया भर में संपूर्ण वर्चस्व के साथ शुरु हुई थी. तब मार्क्सवादी विश्लेषण के, और खुद मार्क्स के पूर्वानुमान के मुताबिक बीसवीं सदी में - प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत यूरोपीय क्रांति (जिसमें सिर्फ रूस की क्रांति ही कायम रह पाई), द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में और फिर चीन, कोरिया, क्यूबा, वियतनाम, और हर जगह पूंजीवादी व्यवस्था के लगभग एक तिहाई आबादी और परिक्षेत्र में समाजवादी क्रांतियां संपन्न हुईं. पूंजीवाद की परिसीमा में समाजवाद जड़ें नहीं जमा सकता था जैसा कि पूंजीवाद ने सामंतवाद के भीतर किया. पूंजीवाद द्वारा प्रदत्त भौतिक आधारों पर बेहतर ढंग से निर्मित यह समाज की एकदम एक नई शुरुआत है, लेकिन जिन गरीब तथा पिछडे़ देशों में समाजवाद के निर्माण की ये कोशिशें हुई वहां ये आधार मुश्किल से ही मौजूद थे.. जो सबसे कमजोर तैयारी मे थे यह उनका कार्यभार था फिर भी इन देशों ने इस निर्माण के लिए संघर्ष किया तथा अफ्रीका व अन्य जगहों पर भी मार्क्सवाद व समाजवाद के लिए प्रतिबद्ध आंदोलनों तथा क्रांतिकारी सत्ताओं का उदय हुआ. तथा पूंजीवाद तथा क्रांति के बाद समाजवाद की स्थापना के बीच लंबे समय तक जो प्रतिद्वंदिता रही वह अब बंद हो गई तथा उसका अचानक अंत हो गया. पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं के बाद, आने वाला भविष्य पूंजीवाद से संबंधित लगने लगा था लेकिन ऐसे परिप्रेक्ष्य सापेक्षतया नए हैं. कई सदियों से यह धारणा बहुत दूर थी कि पूंजीवाद तीसरी सहस्त्राब्दी तक बना रहेगा. लेकिन क्रांति पश्चात की प्रतिस्थापनाएं दिखाती हैं कि समाजवाड दूसरी सहस्त्राब्दी मे अंतिम दिनों में ही असफल हो गया. यद्यपि यह पहले दृष्टिकोण की समाप्ति नहीं है. समाजवाद का सोवियत प्रयोग असफल हो गया क्यूंकि वस्तुगत तथा आत्मगत दोनों तरह की स्थितियां इसके प्रतिकूल थीं. प्रारंभ में आर्थिक पिछडा़पन, फिर आंतरिक वर्गयुद्ध तथा सशस्त्र और निरस्त्र विदेशी हस्तक्षेप तथा वैश्विक पूंजीवाद के निरंतर प्रयासों ने समाजवाद के निर्माण में हर सफलता को बाधा पहुंचाया. इस राह के निर्धारक तत्व, अपर्याप्त तथा अक्सर ही गलत सिद्धांत थे जिन्होंने इस प्रयोग तथा कमजोर राजनीतिक नेतृत्व को दिशा निर्देश अथवा गलत दिशा निर्देश दिया. लेकिन जो जानना सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि जिस के लिए भी प्रयास हुए और जो भी कुछ असफल हुआ वह समाजवाद नहीं था बल्कि समाजवाद निर्माण के लिए पहला गंभीर प्रयास था. समाजवाद तथा साथ ही साथ क्रांति की उपलब्धियों के उद्देश्यों का जिन कारणों से जन्म हुआ वह अभी भी पहले से ज्यादा मौजूद हैं. इसे मानने का कोई कारण नही है कि प्रभुत्वशाली पूंजीवाद को हमेशा की ही तरह आश्चर्यचकित कर देने वाली नई क्रांतियां लंबे दिनों तक नहीं होंगी तथा समाजवाद के निर्मान के नए प्रयास नहीं किए जायेंगे. और इस बात को मानने के कई कारण हैं कि अनूकूल परिस्थितियों, ज्यादा समृद्ध सिद्धांत तथा बेहतर राजनीतिक नेतृत्व में भी ऐसे प्रयास सफल नही होगें......
यहां पूंजीवाद के उद्भव और विकास पर एक निगाह डालना काफी शिक्षाप्रद होगा. विद्वानों का मत है कि मध्यकाल के दिनों में पूंजीवाद अपनी गलत शुरुआत के बावजूद एक नहीं बल्कि कई घोषणाओं/उम्मीदों को समेटे हुए था. लेकिन विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रहने की ताकत की कमीं के कारण तथा उस दौरान मुख्यतः सामंती वातावरण के कारण कमजोर तथा विभाजित था. सामंती वातावरण से घिरा, आकार लेता पूंजीवाद आगे बढ़ने में असफल रहा. यह तब तक नहीं था जब तक कि बाद की सदियों में एक नया संयोग नहीं आया कि फुटकता पूंजीवाद, जिसने अपने पहले के विफल प्रयासों से लाभान्वित होकर जडे़ जमाया तथा अपने शत्रुओं को धराशायी करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली बनकर उभरे तथा आगे बढ़ सके, और अंततः यह प्रकट हुआ जैसे कि इग्लैंड तथा अन्य अटालांटिक समाजों में हुआ. एक बार उदीयमान होने के बाद सामंतवाद से संघर्ष लगातार जारी था, एक ऐसा संघर्ष जो प्रभुत्व के लिए दो वास्तविक आस्तित्वमान सामाजिक संरचनाओं के बीच था. यह संघर्ष राज्य सत्ता (उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार) तथा अपने हितों तथा विचारों के अनुसार समाज को संगठित करने के अधिकार के लिए था. इससे भी ज्यादा यह एक ऐसी प्रक्रिया का विस्तार था जिसमें एक नए सामाजिक ढांचे ने वैचारिक तथा आर्थिक दोनों तरह के अविवादित प्रभुत्व के लिए खुद को तैयार करने में पर्याप्त समय लिया. इसीलिए पूंजीवा हमारे समय में वैश्विक वर्चस्व के तंत्र के रूप में उपज सका तथा विकसित हुआ. जब तक कि इसमें छेद करने के लिए समाजवाद ने अपना पहला प्रयत्न नहीं किया, एक ऐसा प्रयत्न जो अभी असफल हो गया.....
09 अगस्त 2008
समाजवाद का भविष्य-५वीं पोस्टिंग
क्रांति अभी पूरी नहीं हुई है. वर्गों के बीच, शोषित और शोषकों के बीच, नये और पुराने सामाजिक ढाँचे के बीच मूलभूत तनाव इसलिए नहीं ख़त्म हो जायेंगे कि सोवियत संघ खतम हो गया और फ़ूकोयामा ने उद्घोषणा किया है कि 'इतिहास का अंत' हो गया. बीसवीं सदी की क्रंतियों में गतिशीलता तथा ताकत पैदा करने वाली ताकतें, जिस तरह पहले थीं आज भी हैं. 'ऐतिहासिक कम्युनिज़्म' के अंत से गरीबी अथवा न्याय के लिए लोगों की तड़प का अंत नहीं हुआ है. तीसरी दुनिया के गरीब तथा वंचित लोग अभी भी बेहतर जीवन की उम्मीद रखते हैं. अतीत या भविष्य में क्रांतियों के बारे में किसी अतिउत्साह के बगैर फ़्रेड हालिडे ने अपने हाल ही के अध्ययन में बताया है कि 'सत्ताधारी और धनी लोगों द्वारा अपने खिलाफ नफ़रत तथा इतिहास की क्षमता को पूरी तरह से समझने की लगातार अक्षमता बेहद आश्चर्यजनक है'. उन्होंने लिखा है कि "आधुनिक इतिहास में क्रांति का एजेंडा अभी भी हमारे साथ है क्योंकि जो उद्देश्य रखे गये थे वह अभी भी पहुँच से बहुत दूर हैं, यह अभी भी क्रांति को इतिहास के एजेंडे में रखे हुए है. क्रांति अभी भी ध्रुव सत्य है, हमारे समय की अधूरी कहानी-यह कहानी चाहे जिस आकार अथवा रूप मे हो और चाहे जितना भी लंबा समय लगे, यह कहानी पूरी कही जायेगी......
यह कहानी पहले भी दुनिया की क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में कही गयी है और सोवियत संघ में असफल प्रयोग के फलस्वरूप प्रारंभिक धक्कों के बाद, समाजवाद मनुष्यता की जरूरत तथा संभावित भविष्य के रूप में दुबारा स्थापित हो रहा है. जैसे कि बोलिवियाई अपनी क्रांति की रक्षा के लिए अमरीकन साम्राज्यवादियों तथा इसके स्थानीय सहयोगियों द्वार संसदेतर प्रतिबंधों के षड्यंत्र के खिलाफ संघर्ष में मजबूती से डंटे हैं, वेनेजुलियाई '२१वी सदी में समाजवाद' के निर्माण की बात कर रहे हैं तथा क्युबा से प्रेरित होकर पूरे लैटिन अमरीका में 'गुलाबी' की जगह 'लाल' के आ जाने का खतरा महसूस हो रहा है. नेपाल में जनयुद्ध के लिए लड़ रहे तथा अब लोकतंत्र के युद्ध को जीतने के लिए संघर्षरत माओवादी 'समाजवाद की ओर ले जाने वाले' आत्मनिर्भर विकास की बात कर रहे हैं. पश्चिम में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष और गहरा रहा है जैसा कि 'न्यू यार्कर' ने 'इसे कार्ल मार्क्स की वापसी' लिखा है तथा यूरोप में समाजवाद के नए प्रयोग की बात सुनी जा रही है. कभी भी संकीर्ण वर्गीय प्रोजेक्ट में न रहने वाला समाजवाद आज, जैसा कि पहले कभी नहीं था, कम्युनिस्ट घोषणापत्र में किए गए मार्क्स के दावे के अनुसार 'व्यापक लोगों के हित में व्यापक आंदोलन' के रूप में मजबूती से खडा़ है.
पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ के विघटन ने कई विद्वानों, पत्रकारों, राजनेताओं, तमाम तरह के विचारकों तथा लेखकों को आसान खेल खेलने का खुला मौका दे दिया है। अगर समाजवाद परास्त हो गया तो इसका प्रतिद्वंदी पूंजीवाद जीत गया। योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्थायें अगर टूट बिखर गईं तो उसका धुर विरोधी, मुक्त बाजार आधारित पूंजीवाद जरूर विजयी हुआ है। इस तरह के पूरे अपचयनवादी तथा खतरनाक तथा बिल्कुल ही संदेहपूर्ण तर्क, जो सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसे ही समाजवाद के बराबर मानते हैं तथा इसकी असफलता को पूंजीवाद के विजय से जोड़ते हैं, न सिर्फ़ कमजोर हैं बल्कि व्यवहारिकता के धरातल पर बिल्कुल गलत हैं. किसी वस्तुगत मूल्यांकन से स्पष्ट है कि पांच सदियों के पुराने आस्तित्व के अंत तक वैश्विक पूंजीवाद आज सबसे पतित व्यवस्था है. इस पतन के प्रमाण, समकालीन पूंजीवादी विश्व के प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक पहलू में बिल्कुल आसानी से देखने को मिल रहे हैं. दुनिया में हर जगह बढ़ रही दरिद्रता और दुर्दशा में यह लक्षण देखे जा सकते हैं, बढ़ती बेरोजगारी दर के आधिकारिक आंकड़ों, गरीबी, बेघरपना तथा भूख में, पश्चिमी बुर्जुवा लोकतंत्रों के बडे़ शहरों की नारकीय झोपड़पट्टियों में, भूतपूर्व सोवियत खण्डों की फुदकी राजधनियों में शहरी घेट्टों की विशाल बढ़ोत्तरी में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक तौर पर झोपड़पट्टियों की संकीर्ण गलियों के अचानक ढहाए जाने में; दुनिया की संपूर्ण असमानताओं में, निर्धनों की दरिद्रता में तथा धनी पश्चिमी समाजों और गरीब देशों की व्यापक जनता की बदहाली के बीच बढ़ती खाई में; पूंजीवाद द्वारा हर जगह पैदा की गई नैतिक रुप ने असहनीय तथा सामाजिक रूप से गैरजरूरी पीडा़ में, जिसे बोर्दिये ने- ला मिज़रे द मोंद कहा है......... जारी
यह कहानी पहले भी दुनिया की क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में कही गयी है और सोवियत संघ में असफल प्रयोग के फलस्वरूप प्रारंभिक धक्कों के बाद, समाजवाद मनुष्यता की जरूरत तथा संभावित भविष्य के रूप में दुबारा स्थापित हो रहा है. जैसे कि बोलिवियाई अपनी क्रांति की रक्षा के लिए अमरीकन साम्राज्यवादियों तथा इसके स्थानीय सहयोगियों द्वार संसदेतर प्रतिबंधों के षड्यंत्र के खिलाफ संघर्ष में मजबूती से डंटे हैं, वेनेजुलियाई '२१वी सदी में समाजवाद' के निर्माण की बात कर रहे हैं तथा क्युबा से प्रेरित होकर पूरे लैटिन अमरीका में 'गुलाबी' की जगह 'लाल' के आ जाने का खतरा महसूस हो रहा है. नेपाल में जनयुद्ध के लिए लड़ रहे तथा अब लोकतंत्र के युद्ध को जीतने के लिए संघर्षरत माओवादी 'समाजवाद की ओर ले जाने वाले' आत्मनिर्भर विकास की बात कर रहे हैं. पश्चिम में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष और गहरा रहा है जैसा कि 'न्यू यार्कर' ने 'इसे कार्ल मार्क्स की वापसी' लिखा है तथा यूरोप में समाजवाद के नए प्रयोग की बात सुनी जा रही है. कभी भी संकीर्ण वर्गीय प्रोजेक्ट में न रहने वाला समाजवाद आज, जैसा कि पहले कभी नहीं था, कम्युनिस्ट घोषणापत्र में किए गए मार्क्स के दावे के अनुसार 'व्यापक लोगों के हित में व्यापक आंदोलन' के रूप में मजबूती से खडा़ है.
पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ के विघटन ने कई विद्वानों, पत्रकारों, राजनेताओं, तमाम तरह के विचारकों तथा लेखकों को आसान खेल खेलने का खुला मौका दे दिया है। अगर समाजवाद परास्त हो गया तो इसका प्रतिद्वंदी पूंजीवाद जीत गया। योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्थायें अगर टूट बिखर गईं तो उसका धुर विरोधी, मुक्त बाजार आधारित पूंजीवाद जरूर विजयी हुआ है। इस तरह के पूरे अपचयनवादी तथा खतरनाक तथा बिल्कुल ही संदेहपूर्ण तर्क, जो सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसे ही समाजवाद के बराबर मानते हैं तथा इसकी असफलता को पूंजीवाद के विजय से जोड़ते हैं, न सिर्फ़ कमजोर हैं बल्कि व्यवहारिकता के धरातल पर बिल्कुल गलत हैं. किसी वस्तुगत मूल्यांकन से स्पष्ट है कि पांच सदियों के पुराने आस्तित्व के अंत तक वैश्विक पूंजीवाद आज सबसे पतित व्यवस्था है. इस पतन के प्रमाण, समकालीन पूंजीवादी विश्व के प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक पहलू में बिल्कुल आसानी से देखने को मिल रहे हैं. दुनिया में हर जगह बढ़ रही दरिद्रता और दुर्दशा में यह लक्षण देखे जा सकते हैं, बढ़ती बेरोजगारी दर के आधिकारिक आंकड़ों, गरीबी, बेघरपना तथा भूख में, पश्चिमी बुर्जुवा लोकतंत्रों के बडे़ शहरों की नारकीय झोपड़पट्टियों में, भूतपूर्व सोवियत खण्डों की फुदकी राजधनियों में शहरी घेट्टों की विशाल बढ़ोत्तरी में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक तौर पर झोपड़पट्टियों की संकीर्ण गलियों के अचानक ढहाए जाने में; दुनिया की संपूर्ण असमानताओं में, निर्धनों की दरिद्रता में तथा धनी पश्चिमी समाजों और गरीब देशों की व्यापक जनता की बदहाली के बीच बढ़ती खाई में; पूंजीवाद द्वारा हर जगह पैदा की गई नैतिक रुप ने असहनीय तथा सामाजिक रूप से गैरजरूरी पीडा़ में, जिसे बोर्दिये ने- ला मिज़रे द मोंद कहा है......... जारी
07 अगस्त 2008
समाजवाद का भविष्य:-४
क्रांति अभी पूरी नहीं हुई है. वर्गों के बीच, शोषित और शोषकों के बीच, नये और पुराने सामाजिक ढाँचे के बीच मूलभूत तनाव इसलिए नहीं ख़त्म हो जायेंगे कि सोवियत संघ खतम हो गया और फ़ूकोयामा ने उद्घोषणा किया है कि 'इतिहास का अंत' हो गया. बीसवीं सदी की क्रंतियों में गतिशीलता तथा ताकत पैदा करने वाली ताकतें, जिस तरह पहले थीं आज भी हैं. 'ऐतिहासिक कम्युनिज़्म' के अंत से गरीबी अथवा न्याय के लिए लोगों की तड़प का अंत नहीं हुआ है. तीसरी दुनिया के गरीब तथा वंचित लोग अभी भी बेहतर जीवन की उम्मीद रखते हैं. अतीत या भविष्य में क्रांतियों के बारे में किसी अतिउत्साह के बगैर फ़्रेड हालिडे ने अपने हाल ही के अध्ययन में बताया है कि 'सत्ताधारी और धनी लोगों द्वारा अपने खिलाफ नफ़रत तथा इतिहास की क्षमता को पूरी तरह से समझने की लगातार अक्षमता बेहद आश्चर्यजनक है'. उन्होंने लिखा है कि "आधुनिक इतिहास में क्रांति का एजेंडा अभी भी हमारे साथ है क्योंकि जो उद्देश्य रखे गये थे वह अभी भी पहुँच से बहुत दूर हैं, यह अभी भी क्रांति को इतिहास के एजेंडे में रखे हुए है. क्रांति अभी भी ध्रुव सत्य है, हमारे समय की अधूरी कहानी-यह कहानी चाहे जिस आकार अथवा रूप मे हो और चाहे जितना भी लंबा समय लगे, यह कहानी पूरी कही जायेगी......
यह कहानी पहले भी दुनिया की क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में कही गयी है और सोवियत संघ में असफल प्रयोग के फलस्वरूप प्रारंभिक धक्कों के बाद, समाजवाद मनुष्यता की जरूरत तथा संभावित भविष्य के रूप में दुबारा स्थापित हो रहा है. जैसे कि बोलिवियाई अपनी क्रांति की रक्षा के लिए अमरीकन साम्राज्यवादियों तथा इसके स्थानीय सहयोगियों द्वार संसदेतर प्रतिबंधों के षड्यंत्र के खिलाफ संघर्ष में मजबूती से डंटे हैं, वेनेजुलियाई '२१वी सदी में समाजवाद' के निर्माण की बात कर रहे हैं तथा क्युबा से प्रेरित होकर पूरे लैटिन अमरीका में 'गुलाबी' की जगह 'लाल' के आ जाने का खतरा महसूस हो रहा है. नेपाल में जनयुद्ध के लिए लड़ रहे तथा अब लोकतंत्र के युद्ध को जीतने के लिए संघर्षरत माओवादी 'समाजवाद की ओर ले जाने वाले' आत्मनिर्भर विकास की बात कर रहे हैं. पश्चिम में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष और गहरा रहा है जैसा कि 'न्यू यार्कर' ने 'इसे कार्ल मार्क्स की वापसी' लिखा है तथा यूरोप में समाजवाद के नए प्रयोग की बात सुनी जा रही है. कभी भी संकीर्ण वर्गीय प्रोजेक्ट में न रहने वाला समाजवाद आज, जैसा कि पहले कभी नहीं था, कम्युनिस्ट घोषणापत्र में किए गए मार्क्स के दावे के अनुसार 'व्यापक लोगों के हित में व्यापक आंदोलन' के रूप में मजबूती से खडा़ है.
पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ के विघटन ने कई विद्वानों, पत्रकारों, राजनेताओं, तमाम तरह के विचारकों तथा लेखकों को आसान खेल खेलने का खुला मौका दे दिया है. अगर समाजवाद परास्त हो गया तो इसका प्रतिद्वंदी पूंजीवाद जीत गया. योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्थायें अगर टूट बिखर गईं तो उसका धुर विरोधी, मुक्त बाजार आधारित पूंजीवाद जरूर विजयी हुआ है. इस तरह के पूरे अपचयनवादी तथा खतरनाक तथा बिल्कुल ही संदेहपूर्ण तर्क, जो सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसे ही समाजवाद के बराबर मानते हैं तथा इसकी असफलता को पूंजीवाद के विजय से जोड़ते हैं, न सिर्फ़ कमजोर हैं बल्कि व्यवहारिकता के धरातल पर बिल्कुल गलत हैं. किसी वस्तुगत मूल्यांकन से स्पष्ट है कि पांच सदियों के पुराने आस्तित्व के अंत तक वैश्विक पूंजीवाद आज सबसे पतित व्यवस्था है. इस पतन के प्रमाण, समकालीन पूंजीवादी विश्व के प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक पहलू में बिल्कुल आसानी से देखने को मिल रहे हैं. दुनिया में हर जगह बढ़ रही दरिद्रता और दुर्दशा में यह लक्षण देखे जा सकते हैं, बढ़ती बेरोजगारी दर के आधिकारिक आंकड़ों, गरीबी, बेघरपना तथा भूख में, पश्चिमी बुर्जुवा लोकतंत्रों के बडे़ शहरों की नारकीय झोपड़पट्टियों में, भूतपूर्व सोवियत खण्डों की फुदकी राजधनियों में शहरी घेट्टों की विशाल बढ़ोत्तरी में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक तौर पर झोपड़पट्टियों की संकीर्ण गलियों के अचानक ढहाए जाने में; दुनिया की संपूर्ण असमानताओं में, निर्धनों की दरिद्रता में तथा धनी पश्चिमी समाजों और गरीब देशों की व्यापक जनता की बदहाली के बीच बढ़ती खाई में; पूंजीवाद द्वारा हर जगह पैदा की गई नैतिक रुप ने असहनीय तथा सामाजिक रूप से गैरजरूरी पीडा़ में, जिसे बोर्दिये ने- ला मिज़रे द मोंद कहा है.........
वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद- जो मार्क्स का समाजवाद नहीं था और जिसकी संभावनायें अभी खुली हुई हैं- शायद असफल हो गगा है. लेकिन वास्तविक आस्तित्वमान पूंजीवाद- जो पूंजीवाद का मात्र एक ही संभावित प्रकार है- निश्चित तौर पर जिस तरह से बना था उसी तरह से नहीं सफल हो सका है. किसी भी व्यवहारिक निर्णय में पूंजीवाद हमारे समय में सबसे अधिक पतित है. एक और बात कि, पूंजीवाद उपलब्धियों के आकलन के सर्वाधिक वैधानिक कसौटी की सामाजिक व्यवस्था के रूप में; समाज में उपलब्ध वास्तविक तथा क्षमतावान संसाधनों द्वारा 'रोजगार की संपूर्णता' तथा 'रोजगार की अच्छाई' के संदर्भ में एक संभावना के बतौर पूरी तरह असफल हो चुका है. मानव इतिहास में इसके पहले समाज की उत्पादन संभावना तथा समाज की प्रगति/उपलब्धियों के बीच इतना विशाल अंतर कभी नहीं रहा जितना कि आज के पूंजीवाद के विकास की वर्तमान अवस्था में है. इस बात के साक्ष्य हैं कि तीन सफल औद्योगिक क्रांतियों की असाधारण उत्पादन क्षमता ने मनुष्यता का परित्याग कर दिया है तथा गरीबी और अशिक्षा, मैली कुचली झोपड़पट्टियों तथा पूंजीवादी विश्व के सबसे धनी देशों के लाखों से ज्यादा परिवारों तथा तीसरी दुनिया के गरीब देशों की परिधि तथा अर्धपरिधि में सिकुडी़ झोपड़ियों में भूख तथा दुर्दशा नें हज़ारों लाखों लोगों के जीवन को व्यर्थ बनाकर छोड़ दिया है. आज हमारे समय में तीसरी दुनिया निश्चित तौर पर पूंजीवाद के पतन का प्रतीक है........
जैसा कि पहले ही इशारा किया गया है कि इस दो असफलताओं के बीच एक अंतर है जिसे विशेष तौर पर ध्यान देना चहिए. समाजवाद कुछ समय के लिए असफल हुआ है लेकिन फिर भी मानवता को बचाए रखने तथा एक सुरक्षित दुनिया की आशा में तथा मानव जाति के जीवन मूल्य के लिए एक विकल्प के रूप में यह बचा हुआ है. इसे दोहराने की जरूरत है कि पूंजीवाद के अस्वीकार्य आर्थिक, नैतिक तथा पर्यावरणीय परिणाम, अपने यहां तथा विदेशों मे भी बर्बरता की ओर ले जाने वाली बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को रोकने में असफलता, व्यवस्था का भटकाव या विशेष परिस्थितियों अथवा 'गलत' नीतियों द्वारा उत्पन्न 'नकारात्मक' प्रभाव नहीं है. यह सब पूंजीवाद के न सुधरने वाले तथा अनियंत्रित तंत्रजनित अथवा ढांचागत तर्क खुद व्यवस्था में निहीत शोषण तथा ध्रुवीकरण के तर्क के उत्पाद हैं. अतः ये प्रभाव, यद्यपि एक निश्चित दौर में कम होने तथा अन्य में बढ़ने के बावजूद, स्थायी हैं. इसलिए ये जरूरी रूप से ही असाध्य हैं. दुसरे शब्दों में हमारे समय में पूंजीवाद का पतन अपने लिए एक व्यवस्थित या संरचनागत जरूरत अथवा अपरिहार्यता लिए हुए है. बदले में, सोवियत संघ में समाजवाद की असफलता कोई व्यवस्थाजनित य संरचनागत मजबूरी नहीं लिए हुए थी. राजनीति निर्देशित अर्थव्यवस्था के कारण समाजवाद में, साधारणतया बाजार आधारित पूंजीवाद जैसे कोई ढांचागत तर्क अथवा 'कानून' नहीं होते. समाजवाद प्राथमिक रूप से सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच त्रुटियों, सत्ता में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा गलत चुनाव कॆ कारण असफल हुआ. कम्युनिस्ट सत्ताओं (तथा यूरोप में सामजिक जनवादियों) की असफलता के प्रसंग में गैब्रियल कोल्को ने लिखा है कि "ऐसी स्थितियों में होते हुए भी समाज को मुक्त करने तथा उसके महत्वपूर्ण (साथ ही साथ स्थायी) ढंग से रूपांतरण करने में असफलता, उनकी विश्लेषणात्मक अक्षमता तथा ठहराव; उनके नेताओं तथा संगठन की सतत कमजोरी का प्रमाण है. यह वह यथार्थ है जिसने १९१४ के बाद अनगिनत देशों में सामाजिक जनवादी तथा साम्यावाद दोनों का सीमांतीकरण कर दिया जिसने पूंजीपति वर्ग तथा उसके सहयोगियों को, जो समाजवादी सत्ता द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधारों के छोटे हिस्सों के क्रियान्वयन के बगैर कभी भी जीवित नहीं रह सकते थे, सदियों की समस्या से मोहलत प्रदान कर दिया. जबकि इसने दूसरी तरह से लाठी को बहुत दूर झुका दिया लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवाद की असफलता निश्चित तौर पर एक मानवीय असफलता थी जो कि इसके बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं था. अगली बार जब कहीं और जब कभी कोई प्रयास किया जायेगा इस असफलता द्वारा सीखे गए सबक मदद करेंगे. इसलिए समाजवाद पूंजीवाद का न सिर्फ एक मात्र विकल्प है बल्कि मानवता के लिए यह एक वास्तविक पसंद हैं...... जारी........
यह कहानी पहले भी दुनिया की क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में कही गयी है और सोवियत संघ में असफल प्रयोग के फलस्वरूप प्रारंभिक धक्कों के बाद, समाजवाद मनुष्यता की जरूरत तथा संभावित भविष्य के रूप में दुबारा स्थापित हो रहा है. जैसे कि बोलिवियाई अपनी क्रांति की रक्षा के लिए अमरीकन साम्राज्यवादियों तथा इसके स्थानीय सहयोगियों द्वार संसदेतर प्रतिबंधों के षड्यंत्र के खिलाफ संघर्ष में मजबूती से डंटे हैं, वेनेजुलियाई '२१वी सदी में समाजवाद' के निर्माण की बात कर रहे हैं तथा क्युबा से प्रेरित होकर पूरे लैटिन अमरीका में 'गुलाबी' की जगह 'लाल' के आ जाने का खतरा महसूस हो रहा है. नेपाल में जनयुद्ध के लिए लड़ रहे तथा अब लोकतंत्र के युद्ध को जीतने के लिए संघर्षरत माओवादी 'समाजवाद की ओर ले जाने वाले' आत्मनिर्भर विकास की बात कर रहे हैं. पश्चिम में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष और गहरा रहा है जैसा कि 'न्यू यार्कर' ने 'इसे कार्ल मार्क्स की वापसी' लिखा है तथा यूरोप में समाजवाद के नए प्रयोग की बात सुनी जा रही है. कभी भी संकीर्ण वर्गीय प्रोजेक्ट में न रहने वाला समाजवाद आज, जैसा कि पहले कभी नहीं था, कम्युनिस्ट घोषणापत्र में किए गए मार्क्स के दावे के अनुसार 'व्यापक लोगों के हित में व्यापक आंदोलन' के रूप में मजबूती से खडा़ है.
पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ के विघटन ने कई विद्वानों, पत्रकारों, राजनेताओं, तमाम तरह के विचारकों तथा लेखकों को आसान खेल खेलने का खुला मौका दे दिया है. अगर समाजवाद परास्त हो गया तो इसका प्रतिद्वंदी पूंजीवाद जीत गया. योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्थायें अगर टूट बिखर गईं तो उसका धुर विरोधी, मुक्त बाजार आधारित पूंजीवाद जरूर विजयी हुआ है. इस तरह के पूरे अपचयनवादी तथा खतरनाक तथा बिल्कुल ही संदेहपूर्ण तर्क, जो सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसे ही समाजवाद के बराबर मानते हैं तथा इसकी असफलता को पूंजीवाद के विजय से जोड़ते हैं, न सिर्फ़ कमजोर हैं बल्कि व्यवहारिकता के धरातल पर बिल्कुल गलत हैं. किसी वस्तुगत मूल्यांकन से स्पष्ट है कि पांच सदियों के पुराने आस्तित्व के अंत तक वैश्विक पूंजीवाद आज सबसे पतित व्यवस्था है. इस पतन के प्रमाण, समकालीन पूंजीवादी विश्व के प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक पहलू में बिल्कुल आसानी से देखने को मिल रहे हैं. दुनिया में हर जगह बढ़ रही दरिद्रता और दुर्दशा में यह लक्षण देखे जा सकते हैं, बढ़ती बेरोजगारी दर के आधिकारिक आंकड़ों, गरीबी, बेघरपना तथा भूख में, पश्चिमी बुर्जुवा लोकतंत्रों के बडे़ शहरों की नारकीय झोपड़पट्टियों में, भूतपूर्व सोवियत खण्डों की फुदकी राजधनियों में शहरी घेट्टों की विशाल बढ़ोत्तरी में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक तौर पर झोपड़पट्टियों की संकीर्ण गलियों के अचानक ढहाए जाने में; दुनिया की संपूर्ण असमानताओं में, निर्धनों की दरिद्रता में तथा धनी पश्चिमी समाजों और गरीब देशों की व्यापक जनता की बदहाली के बीच बढ़ती खाई में; पूंजीवाद द्वारा हर जगह पैदा की गई नैतिक रुप ने असहनीय तथा सामाजिक रूप से गैरजरूरी पीडा़ में, जिसे बोर्दिये ने- ला मिज़रे द मोंद कहा है.........
वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद- जो मार्क्स का समाजवाद नहीं था और जिसकी संभावनायें अभी खुली हुई हैं- शायद असफल हो गगा है. लेकिन वास्तविक आस्तित्वमान पूंजीवाद- जो पूंजीवाद का मात्र एक ही संभावित प्रकार है- निश्चित तौर पर जिस तरह से बना था उसी तरह से नहीं सफल हो सका है. किसी भी व्यवहारिक निर्णय में पूंजीवाद हमारे समय में सबसे अधिक पतित है. एक और बात कि, पूंजीवाद उपलब्धियों के आकलन के सर्वाधिक वैधानिक कसौटी की सामाजिक व्यवस्था के रूप में; समाज में उपलब्ध वास्तविक तथा क्षमतावान संसाधनों द्वारा 'रोजगार की संपूर्णता' तथा 'रोजगार की अच्छाई' के संदर्भ में एक संभावना के बतौर पूरी तरह असफल हो चुका है. मानव इतिहास में इसके पहले समाज की उत्पादन संभावना तथा समाज की प्रगति/उपलब्धियों के बीच इतना विशाल अंतर कभी नहीं रहा जितना कि आज के पूंजीवाद के विकास की वर्तमान अवस्था में है. इस बात के साक्ष्य हैं कि तीन सफल औद्योगिक क्रांतियों की असाधारण उत्पादन क्षमता ने मनुष्यता का परित्याग कर दिया है तथा गरीबी और अशिक्षा, मैली कुचली झोपड़पट्टियों तथा पूंजीवादी विश्व के सबसे धनी देशों के लाखों से ज्यादा परिवारों तथा तीसरी दुनिया के गरीब देशों की परिधि तथा अर्धपरिधि में सिकुडी़ झोपड़ियों में भूख तथा दुर्दशा नें हज़ारों लाखों लोगों के जीवन को व्यर्थ बनाकर छोड़ दिया है. आज हमारे समय में तीसरी दुनिया निश्चित तौर पर पूंजीवाद के पतन का प्रतीक है........
जैसा कि पहले ही इशारा किया गया है कि इस दो असफलताओं के बीच एक अंतर है जिसे विशेष तौर पर ध्यान देना चहिए. समाजवाद कुछ समय के लिए असफल हुआ है लेकिन फिर भी मानवता को बचाए रखने तथा एक सुरक्षित दुनिया की आशा में तथा मानव जाति के जीवन मूल्य के लिए एक विकल्प के रूप में यह बचा हुआ है. इसे दोहराने की जरूरत है कि पूंजीवाद के अस्वीकार्य आर्थिक, नैतिक तथा पर्यावरणीय परिणाम, अपने यहां तथा विदेशों मे भी बर्बरता की ओर ले जाने वाली बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को रोकने में असफलता, व्यवस्था का भटकाव या विशेष परिस्थितियों अथवा 'गलत' नीतियों द्वारा उत्पन्न 'नकारात्मक' प्रभाव नहीं है. यह सब पूंजीवाद के न सुधरने वाले तथा अनियंत्रित तंत्रजनित अथवा ढांचागत तर्क खुद व्यवस्था में निहीत शोषण तथा ध्रुवीकरण के तर्क के उत्पाद हैं. अतः ये प्रभाव, यद्यपि एक निश्चित दौर में कम होने तथा अन्य में बढ़ने के बावजूद, स्थायी हैं. इसलिए ये जरूरी रूप से ही असाध्य हैं. दुसरे शब्दों में हमारे समय में पूंजीवाद का पतन अपने लिए एक व्यवस्थित या संरचनागत जरूरत अथवा अपरिहार्यता लिए हुए है. बदले में, सोवियत संघ में समाजवाद की असफलता कोई व्यवस्थाजनित य संरचनागत मजबूरी नहीं लिए हुए थी. राजनीति निर्देशित अर्थव्यवस्था के कारण समाजवाद में, साधारणतया बाजार आधारित पूंजीवाद जैसे कोई ढांचागत तर्क अथवा 'कानून' नहीं होते. समाजवाद प्राथमिक रूप से सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच त्रुटियों, सत्ता में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा गलत चुनाव कॆ कारण असफल हुआ. कम्युनिस्ट सत्ताओं (तथा यूरोप में सामजिक जनवादियों) की असफलता के प्रसंग में गैब्रियल कोल्को ने लिखा है कि "ऐसी स्थितियों में होते हुए भी समाज को मुक्त करने तथा उसके महत्वपूर्ण (साथ ही साथ स्थायी) ढंग से रूपांतरण करने में असफलता, उनकी विश्लेषणात्मक अक्षमता तथा ठहराव; उनके नेताओं तथा संगठन की सतत कमजोरी का प्रमाण है. यह वह यथार्थ है जिसने १९१४ के बाद अनगिनत देशों में सामाजिक जनवादी तथा साम्यावाद दोनों का सीमांतीकरण कर दिया जिसने पूंजीपति वर्ग तथा उसके सहयोगियों को, जो समाजवादी सत्ता द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधारों के छोटे हिस्सों के क्रियान्वयन के बगैर कभी भी जीवित नहीं रह सकते थे, सदियों की समस्या से मोहलत प्रदान कर दिया. जबकि इसने दूसरी तरह से लाठी को बहुत दूर झुका दिया लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवाद की असफलता निश्चित तौर पर एक मानवीय असफलता थी जो कि इसके बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं था. अगली बार जब कहीं और जब कभी कोई प्रयास किया जायेगा इस असफलता द्वारा सीखे गए सबक मदद करेंगे. इसलिए समाजवाद पूंजीवाद का न सिर्फ एक मात्र विकल्प है बल्कि मानवता के लिए यह एक वास्तविक पसंद हैं...... जारी........
06 अगस्त 2008
समाजवाद का भविषष्य-३
यह एक वैधानिक तर्क है कि पाले समाजवाद के लिए आंदोलन बढ़ने के जो कारण थे आज, बल्कि पिछली शताब्दी के प्रारंभ अथवा पहले अन्य किसी समय से ज्यादा, इस सदी के प्रारंभ में और मज़बूत हैं. सामाजिक जीवन के संगठन में पूँजीवाद अभी भी शोषक और पर्यावरणीय विध्वंस का रास्ता है. क्षणिक विजयी पूँजीवाद उन्हीं ढाँचागत दबावों/मजबूरियों के तहत, पहले जैसे ही विध्वंसक परिणामों को उत्पन्न कर संचालित हो रहा है.यह अभी भी संकटों से घिरा हुआ है तथा अपनी अति विशाल/अनोखी उत्पादन क्षमता के बावजूद, मानव समुदाय की ज़रूरतों के लिए, यहाँ तक कि अपने प्रभुत्व की दुनिया में व्यापक आबादी को जीने-खाने तक की सुविधा मुहैया कराने के लिए , अपनी उपलधियों को सौंपने में जन्मजात तौर पर अक्षम है. अपने वर्तमान चरम उत्कर्ष के बावज़ूद, पूँजीवाद शताब्दियों से मौजूद एक भी समस्या का समाधान नहीं कर सका. और उसने समाजवादी इच्छाओं व संघर्षों का आधा-अधूरा ही सही भरण पोषण किया. समाजवाद के विश्वव्यापी संक्रमण का तर्क आज भी पहले से कहीं ज़्यादा उपयुक्त बना हुआ है.
सोवियत संघ के विघटन ने इस तर्क में किसी भी तरह का कोई परिवर्तन नही लाया है, सिवाय इसके कि आर्थिक तौर पर शोषक, नैतिक रुप से घृणास्पद तथा पर्यावरण के लिए गैरटिकाऊ चरित्र का पूँजीवाद अब इतिहास के किसी भी समय से ज़्यादा नंगा हुआ है.......
वर्तमान प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के विरोध मे समाजवादी विपक्ष के पुनर्निर्माण के लिए आत्मगत स्थितियाँ तथा व्यक्तिगत व जनसंगठन के स्तर पर मौजूद भ्रूणावस्था की वस्तुगत स्थितियाँ आज ज़्यादा आस्तित्वमान हैं. पश्चिम में 'कोई विकल्प नहीं' की खुशफ़हमी अब जा चुकी है. अतीत में इसी तरह की कई घोषणाओं सहित 'इतिहास के अंत' की बचकाना घोषणा मजबूती से अस्वीकृत कर दी गयी है. दीर्घ अवधि में जनता सोचती है कि कल्याणकारी पूँजीवाद प्रतिनिधिक नहीं, बल्कि वह जिस कठोर यथार्थ का अनुभव कर रही है वह प्रतिनिधिक है. लोग पूँजीवाद वास्तव में है क्या इसे कटोरता से सीख रहे हैं. वैश्विक पूँजीवाद, वैश्वीकरण तथा अमरीका के नये वर्चस्व के विनाशकारी हृदयस्थल में लोग पूँजीवाद, साम्राज्यवाद तथा अपने ही शासकवर्ग की दलाली के बारे में नया पाठ सीख रहे हैं. विकल्प का सवाल फिर एजेंडे में आ गया है तथा यद्यपि दिग्भ्रमित अथवा छितराये तरीके से ही, पूंजीवाद विरोधी संघर्ष दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न तरीकों तथा आकारों में जारी है. ये संघर्ष पिछली शताब्दी का जस का तस दुहराव नहीं चाहते. हमें बताया गया है कि ''इतिहास अपने आप को नहीं दुहराता'' लेकिन मार्क्स ने कहा है कि 'इतिहास हमसे ज़्यादा कल्पनाशील होता है'. इतिहास निश्चित तौर पर आश्चर्य चकित करता है- और शोषितों तथा दमितों द्वारा क्रांतियां उनमें से एक है......
सशस्त्र संघर्ष अथवा व्यापक विद्रोह का उभार ही क्रांतियां नहीं होते, यद्यपि इनकी जरूरत को इंकार नहीं किया जा सकता। यह क्रांति को इतिहास के एक खास क्षण जैसे विंटर पैलेस पर कब्ज़ा या बास्तील के तूफान जैसे एक निश्चित प्रतिबिंब की तरह देखने में कोई मदद नहीं करते। क्रांति, पूंजीवादी लोकतंत्र के शासनकाल में खुद की विशिष्ट जटिलताओं के साथ, एक जटिल प्रक्रिया के रूप में बेहतर ढंग से समझी जा सकती है। और जहां तक हम इसे समझते हैं वह यह कि भविष्य की क्रांतियों के व्यवहारिक तथा सैद्धांतिक रूपों के बारे में अनुमान नही लगा सकते। और हम यह आश्चर्य जानते हैं कि इतिहास का उतार-चढा़व हमें बीसवीं सदी में ले गया है। और इस बारे में संदेह का कोई आधार नहीं है कि यह और ज़्यादा हमें ले जायेगा। विद्रोह में जनता की आविष्कारिता किसी भी संवेदनशील विद्वान या दार्शनिक की कल्पना के परे रही है और यह जारी रहेगी...... जारी........
सोवियत संघ के विघटन ने इस तर्क में किसी भी तरह का कोई परिवर्तन नही लाया है, सिवाय इसके कि आर्थिक तौर पर शोषक, नैतिक रुप से घृणास्पद तथा पर्यावरण के लिए गैरटिकाऊ चरित्र का पूँजीवाद अब इतिहास के किसी भी समय से ज़्यादा नंगा हुआ है.......
वर्तमान प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के विरोध मे समाजवादी विपक्ष के पुनर्निर्माण के लिए आत्मगत स्थितियाँ तथा व्यक्तिगत व जनसंगठन के स्तर पर मौजूद भ्रूणावस्था की वस्तुगत स्थितियाँ आज ज़्यादा आस्तित्वमान हैं. पश्चिम में 'कोई विकल्प नहीं' की खुशफ़हमी अब जा चुकी है. अतीत में इसी तरह की कई घोषणाओं सहित 'इतिहास के अंत' की बचकाना घोषणा मजबूती से अस्वीकृत कर दी गयी है. दीर्घ अवधि में जनता सोचती है कि कल्याणकारी पूँजीवाद प्रतिनिधिक नहीं, बल्कि वह जिस कठोर यथार्थ का अनुभव कर रही है वह प्रतिनिधिक है. लोग पूँजीवाद वास्तव में है क्या इसे कटोरता से सीख रहे हैं. वैश्विक पूँजीवाद, वैश्वीकरण तथा अमरीका के नये वर्चस्व के विनाशकारी हृदयस्थल में लोग पूँजीवाद, साम्राज्यवाद तथा अपने ही शासकवर्ग की दलाली के बारे में नया पाठ सीख रहे हैं. विकल्प का सवाल फिर एजेंडे में आ गया है तथा यद्यपि दिग्भ्रमित अथवा छितराये तरीके से ही, पूंजीवाद विरोधी संघर्ष दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न तरीकों तथा आकारों में जारी है. ये संघर्ष पिछली शताब्दी का जस का तस दुहराव नहीं चाहते. हमें बताया गया है कि ''इतिहास अपने आप को नहीं दुहराता'' लेकिन मार्क्स ने कहा है कि 'इतिहास हमसे ज़्यादा कल्पनाशील होता है'. इतिहास निश्चित तौर पर आश्चर्य चकित करता है- और शोषितों तथा दमितों द्वारा क्रांतियां उनमें से एक है......
सशस्त्र संघर्ष अथवा व्यापक विद्रोह का उभार ही क्रांतियां नहीं होते, यद्यपि इनकी जरूरत को इंकार नहीं किया जा सकता। यह क्रांति को इतिहास के एक खास क्षण जैसे विंटर पैलेस पर कब्ज़ा या बास्तील के तूफान जैसे एक निश्चित प्रतिबिंब की तरह देखने में कोई मदद नहीं करते। क्रांति, पूंजीवादी लोकतंत्र के शासनकाल में खुद की विशिष्ट जटिलताओं के साथ, एक जटिल प्रक्रिया के रूप में बेहतर ढंग से समझी जा सकती है। और जहां तक हम इसे समझते हैं वह यह कि भविष्य की क्रांतियों के व्यवहारिक तथा सैद्धांतिक रूपों के बारे में अनुमान नही लगा सकते। और हम यह आश्चर्य जानते हैं कि इतिहास का उतार-चढा़व हमें बीसवीं सदी में ले गया है। और इस बारे में संदेह का कोई आधार नहीं है कि यह और ज़्यादा हमें ले जायेगा। विद्रोह में जनता की आविष्कारिता किसी भी संवेदनशील विद्वान या दार्शनिक की कल्पना के परे रही है और यह जारी रहेगी...... जारी........
30 जुलाई 2008
समाजवाद का भविष्य-2
वास्तव में , आज हमें अपने इतिहास का बचाव या उस पर पुनः दावा करना, सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसके मूल्यांकन करना हमारे लिये अपने आप में एक क्रांतिकारी प्रोजेक्ट है.
अपने अतीत से हमें हमेशा ही एक दुःखदायी पाठ सीखना चाहिये. वास्तविकता का सामना करना तथा वाम की जरूरी राजनीति और संस्कृति का पुनर्निर्माण करना अतंत आवश्यक है लेकिन इस बारे में बेहतर संतुलन होना भी बराबर जरूरी है.दूसरे शब्दों में यह जानने की भी जरूरत है यह अतीत पूरी तरह से दुःखभरी विरासत नही है.हमें इस मूल्यांकन या आत्मपरीक्षण में नहाने की कठौती से बच्चे को ही बाहर नहीं फेंक देना चाहिये.
सोवियत संघ के अनुभवों का मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन, इतिहास में समाजवाद तथा इसके साथ जुडे़ हुये संपूर्ण कम्युनिस्ट आंदोलन, भले ही इसके द्वारा नेतृत्व अथवा पथप्रदर्शन किया गया हो, के प्रथम प्रयोग के असफलता की पराकाष्ठा स्वभावतः सभी जगह के समाजवादियों के लिये महत्वपूर्ण है, चाहे वह उत्तर हो या दक्षिण. लेकिन विशेषकर जिन्हें इन अनुभवों के अध्यायों से सीखने की जरूरत है वे हैं नेता तथा इससे भी ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टियों के जुझारू कैडर, जिनके लिये सोवियत संघ संदर्भ तथा पहचान का निर्णायक बिंदु था तथा जहाँ बाद के समय में कई विभेद पैदा हो गये थे.पश्चिम में , मार्क्सवाद में ही सोवियत संघ के विघटन तथा इससे जुडी़ समस्याओं के जवाब तलाशने की अनिच्छुक और अक्षम इन अधिकतर पार्टियों ने साधारणतया समाजवादी प्रोजेक्ट का परित्याग कर सामजिक जनवादी रास्ता पकड़ लिया है. अन्य जगहों, विशेषकर तीसरे देशों में हलाँकि औपचारिक कम्युनिस्ट बचे रहे लेकिन जो कुछ भी घटित हुआ उससे भ्रमित तथा विमुख होकर रह गये, आधिकारिक मार्क्सवाद की रूढि़यों का उन्मूलन करने में अक्षम रहे. इन सब का आरोप ख्रुश्चेवी संशोधनवाद, गोर्बाचोव के विश्वासघात अथवा अमरीकी साम्राज्यवाद तथा सीआईए की गुप्त कार्ययोजनाओं पर मढ़ते रहे. यहां तक कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट संरचनायें, अथवा चीनी प्रतिरूप के पुराने ढर्रों पर चलने वाले लोग भी कमोबेश इसी सरलीकृत तथा छिछली समझ से परे जाने में असफल रहे.
जब तक समाजवाद के विध्वंस तथा इसके संकट को समझा नहीं जाता तथा इस समझ को पूरे सवालों पर पुनर्विचार के लिये नहीं लागू किया जाता, आंदोलन में अतिवामपंथी तथा लंबे समय से मौजूद सुधारवादी ताकतों को वास्तविक रचनात्मक मार्क्सवाद से बदाने का कोई मौका नहीं है. अतीत में मौजूद गतिकी के कारण यह कम्युनिस्ट पार्टियाँ बची रहेंगी लेकिन पुराने नेताओं एवं पहले के संघर्ष व उपलब्धियों से प्राप्त विश्वसनीयता के खत्म होते जाने तथा नयी क्रांतिकारी भर्तियों की असफलता से वह सिर्फ़ अवरुद्ध होकर रह जायेंगी अथवा अर्थवादी अभ्यासों के सहारे चलकर चुनावी सुधार तथा यहाँ तक कि वर्तमान पूँजीवादी वैश्वीकरण के साथ सामंजस्य करके लगातार नीचे गिरती जायेंगी. मार्क्सवादी लेनिनवादी या माओवादी शक्तियाँ अपनी क्रांतिकारी प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करते हुये भी सीमित क्षेत्र में एक दूसरे से लड़ते झगड़ते तथा अलग थलग पड़ते हुये संकुचित आंदोलन के रूप मे रही आयेंगी. कम्युनिस्ट नाम के बावजूद यह पार्टियां तथा संरचनायें पुनः मजबूत होने तथा समाजवाद के लिये एक प्रभावी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने का मौका गँवा रही हैं.
तीसरी दुनिया के समाजवादियों, जो अपने आप को कम्युनिस्ट कहते हैं उन्हें मिलाकर, के लिए सोवियत अनुभव निरपवाद रूप से अतिरिक्त महत्व रखता है. क्लासिकल मार्क्सवाद, उन्नत पूँजीवादी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर समाजवाद के निर्माण के संदर्भ सहित, कुछ सामान्य सिद्धांतों को छोड़कर कम-अधिक रूसी बोल्शेविकों के संपूर्ण बगैर घोषित सीमा क्षेत्रों, अर्थात अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के सबसे उन्नत देशों के निरंतर शत्रुतापूर्ण रुख के बीच किसी पिछडे़ देश में समाजवाद के लिये संघर्ष, में अप्रत्याशित स्थापना यात्रा जैसा ही है.वहाँ कुछ अग्रणी प्रयास हुये. अतः वस्तुगत परिस्थितियों की ताकतें, इस अभूतपूर्व कार्यभार के के लिये सिद्धांत तथा व्यवहार की अपर्याप्तताओं के साथ इसके पतन के कारणों सहित सोवियत अनुभव, रूस तथा अन्य गरीब और पिछडे़ देशों के क्रांतिकारियों को अमूल्य सबक सिखाते हैं. विशेष तौर पर इस नवीन वैश्विक पूँजीवाद के प्रभुत्व के दौर में एक बेहतर, जरूरी समाजवाद के लिये तथा खुद के निर्माण के लिये भी...........
भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ भी हुआ वह, मार्क्स के तर्कों के आधार पर, पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे के समाजवादी नकार की संभाव्यता तथा जरूरत के लिए किसी भी रूप में अवैधानिक नही है। और अब समाजवाद लिये संघर्ष सिर्फ़ पहले से कहीं ज्यादा कठिन और जटिल दिशा की ओर मुड़ गया है. समाजवादी शायद इस भ्रम में कभी नहीं रहे कि समाजवाद के लिये होने वाला संघर्ष सरल अथवा तुरंत सफल हो जाने वाले अभियान की तरह है. पहली असफलता के बाद अब यह पहले से कहीं बहुत अधिक कठिन होगा, अगली बार समाजवाद को लंबा चक्करदार रास्ता तय करना होगा. लेकिन इस संदर्भ में निराशा महसूस करने का कोई कारण नही है. पिछले कुछ वर्षों की तुलना मे भौतिक परिस्थितियाँ आज ज्यादा उपयुक्त तथा आत्मगत ज़रूरत/दबाव अधिक मजबूत हैं. और समाजवादी उद्देश्यों का प्रभाव क्षेत्र तभी बढ़ सकता है जबकि पूँजीवाद की, खुद से उत्पन्न संकटों का समाधान करने की, असमर्थता बढ़ती जायेगी.......!
जारी.....
अपने अतीत से हमें हमेशा ही एक दुःखदायी पाठ सीखना चाहिये. वास्तविकता का सामना करना तथा वाम की जरूरी राजनीति और संस्कृति का पुनर्निर्माण करना अतंत आवश्यक है लेकिन इस बारे में बेहतर संतुलन होना भी बराबर जरूरी है.दूसरे शब्दों में यह जानने की भी जरूरत है यह अतीत पूरी तरह से दुःखभरी विरासत नही है.हमें इस मूल्यांकन या आत्मपरीक्षण में नहाने की कठौती से बच्चे को ही बाहर नहीं फेंक देना चाहिये.
सोवियत संघ के अनुभवों का मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन, इतिहास में समाजवाद तथा इसके साथ जुडे़ हुये संपूर्ण कम्युनिस्ट आंदोलन, भले ही इसके द्वारा नेतृत्व अथवा पथप्रदर्शन किया गया हो, के प्रथम प्रयोग के असफलता की पराकाष्ठा स्वभावतः सभी जगह के समाजवादियों के लिये महत्वपूर्ण है, चाहे वह उत्तर हो या दक्षिण. लेकिन विशेषकर जिन्हें इन अनुभवों के अध्यायों से सीखने की जरूरत है वे हैं नेता तथा इससे भी ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टियों के जुझारू कैडर, जिनके लिये सोवियत संघ संदर्भ तथा पहचान का निर्णायक बिंदु था तथा जहाँ बाद के समय में कई विभेद पैदा हो गये थे.पश्चिम में , मार्क्सवाद में ही सोवियत संघ के विघटन तथा इससे जुडी़ समस्याओं के जवाब तलाशने की अनिच्छुक और अक्षम इन अधिकतर पार्टियों ने साधारणतया समाजवादी प्रोजेक्ट का परित्याग कर सामजिक जनवादी रास्ता पकड़ लिया है. अन्य जगहों, विशेषकर तीसरे देशों में हलाँकि औपचारिक कम्युनिस्ट बचे रहे लेकिन जो कुछ भी घटित हुआ उससे भ्रमित तथा विमुख होकर रह गये, आधिकारिक मार्क्सवाद की रूढि़यों का उन्मूलन करने में अक्षम रहे. इन सब का आरोप ख्रुश्चेवी संशोधनवाद, गोर्बाचोव के विश्वासघात अथवा अमरीकी साम्राज्यवाद तथा सीआईए की गुप्त कार्ययोजनाओं पर मढ़ते रहे. यहां तक कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट संरचनायें, अथवा चीनी प्रतिरूप के पुराने ढर्रों पर चलने वाले लोग भी कमोबेश इसी सरलीकृत तथा छिछली समझ से परे जाने में असफल रहे.
जब तक समाजवाद के विध्वंस तथा इसके संकट को समझा नहीं जाता तथा इस समझ को पूरे सवालों पर पुनर्विचार के लिये नहीं लागू किया जाता, आंदोलन में अतिवामपंथी तथा लंबे समय से मौजूद सुधारवादी ताकतों को वास्तविक रचनात्मक मार्क्सवाद से बदाने का कोई मौका नहीं है. अतीत में मौजूद गतिकी के कारण यह कम्युनिस्ट पार्टियाँ बची रहेंगी लेकिन पुराने नेताओं एवं पहले के संघर्ष व उपलब्धियों से प्राप्त विश्वसनीयता के खत्म होते जाने तथा नयी क्रांतिकारी भर्तियों की असफलता से वह सिर्फ़ अवरुद्ध होकर रह जायेंगी अथवा अर्थवादी अभ्यासों के सहारे चलकर चुनावी सुधार तथा यहाँ तक कि वर्तमान पूँजीवादी वैश्वीकरण के साथ सामंजस्य करके लगातार नीचे गिरती जायेंगी. मार्क्सवादी लेनिनवादी या माओवादी शक्तियाँ अपनी क्रांतिकारी प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करते हुये भी सीमित क्षेत्र में एक दूसरे से लड़ते झगड़ते तथा अलग थलग पड़ते हुये संकुचित आंदोलन के रूप मे रही आयेंगी. कम्युनिस्ट नाम के बावजूद यह पार्टियां तथा संरचनायें पुनः मजबूत होने तथा समाजवाद के लिये एक प्रभावी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने का मौका गँवा रही हैं.
तीसरी दुनिया के समाजवादियों, जो अपने आप को कम्युनिस्ट कहते हैं उन्हें मिलाकर, के लिए सोवियत अनुभव निरपवाद रूप से अतिरिक्त महत्व रखता है. क्लासिकल मार्क्सवाद, उन्नत पूँजीवादी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर समाजवाद के निर्माण के संदर्भ सहित, कुछ सामान्य सिद्धांतों को छोड़कर कम-अधिक रूसी बोल्शेविकों के संपूर्ण बगैर घोषित सीमा क्षेत्रों, अर्थात अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के सबसे उन्नत देशों के निरंतर शत्रुतापूर्ण रुख के बीच किसी पिछडे़ देश में समाजवाद के लिये संघर्ष, में अप्रत्याशित स्थापना यात्रा जैसा ही है.वहाँ कुछ अग्रणी प्रयास हुये. अतः वस्तुगत परिस्थितियों की ताकतें, इस अभूतपूर्व कार्यभार के के लिये सिद्धांत तथा व्यवहार की अपर्याप्तताओं के साथ इसके पतन के कारणों सहित सोवियत अनुभव, रूस तथा अन्य गरीब और पिछडे़ देशों के क्रांतिकारियों को अमूल्य सबक सिखाते हैं. विशेष तौर पर इस नवीन वैश्विक पूँजीवाद के प्रभुत्व के दौर में एक बेहतर, जरूरी समाजवाद के लिये तथा खुद के निर्माण के लिये भी...........
भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ भी हुआ वह, मार्क्स के तर्कों के आधार पर, पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे के समाजवादी नकार की संभाव्यता तथा जरूरत के लिए किसी भी रूप में अवैधानिक नही है। और अब समाजवाद लिये संघर्ष सिर्फ़ पहले से कहीं ज्यादा कठिन और जटिल दिशा की ओर मुड़ गया है. समाजवादी शायद इस भ्रम में कभी नहीं रहे कि समाजवाद के लिये होने वाला संघर्ष सरल अथवा तुरंत सफल हो जाने वाले अभियान की तरह है. पहली असफलता के बाद अब यह पहले से कहीं बहुत अधिक कठिन होगा, अगली बार समाजवाद को लंबा चक्करदार रास्ता तय करना होगा. लेकिन इस संदर्भ में निराशा महसूस करने का कोई कारण नही है. पिछले कुछ वर्षों की तुलना मे भौतिक परिस्थितियाँ आज ज्यादा उपयुक्त तथा आत्मगत ज़रूरत/दबाव अधिक मजबूत हैं. और समाजवादी उद्देश्यों का प्रभाव क्षेत्र तभी बढ़ सकता है जबकि पूँजीवाद की, खुद से उत्पन्न संकटों का समाधान करने की, असमर्थता बढ़ती जायेगी.......!
जारी.....
समाजवाद का भविष्य:-
रणधीर सिंह
आठ मार्च 2007 को इतिहासबोध पत्रिका इलाहाबाद द्वारा आयोजित संगोष्ठी में दिया गया उद्बोधन.
मुझे समाजवाद के भविष्य पर बोलने के लिये कहा गया है. मैं यहाँ जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ वह मेरी हालिया ही प्रकाशित पुस्तक ' क्राइसिस आफ सोशलिज्म - नोट्स आन डिफ़ेंस आफ़ ए कमिट्मेंट' पर आधारित होगा और अपने पक्ष में उन्हें विस्तार से स्पष्ट करने के लिये इस पुस्तक में संकलित उद्धरणों को उद्धृत करूँगा. इस प्रश्न को मैं अपने उद्बोधन के चार अलग लेकिन अंतर्संबंधित खंडों में स्पष्ट करने जा रहा हूँ.
छ्ठवें दशक के अंत के मजबूत व विद्रोही दिनों , में पेरिस के छात्रों ने उस हर व्यक्ति जो उन्हे संबोधित करता था, से सवाल किया और कहा कि पहले वह यह बतायें कि " उनके बोलने का प्रस्थान बिंदु क्या है? (अर्थात् आप बोल कहाँ से रहे हैं?) प्रत्येक वक्ता एक विशिष्ट दार्शनिक राजनीतिक जग़ह के केन्द्र से बोलता था तथा इसके लिये उन्होनें सार्वजनिक तौर पर अपने श्रोताओं का आभार माना. यहाँ यह बताना एकदम उपयुक्त होगा कि मैं मार्क्सवाद के पक्ष में खडे़ होकर बोल रहा हूँ, ऐसा मार्क्सवाद जिसे मैं समझता हूँ. जिस मार्क्सवाद में मुझे खुद के पारंगत होने का कोई मिथ्याभिमान नही है. मैने इसे कई तरीकों से सीखा और न सिर्फ़ मैने इसे अपनि राजनीति अथवा अध्यापक के पेशे के रूप में, बल्कि अपने जीवन और जीने के तरीके में उपयोगी पाया. यह अंतिम बात सिर्फ औपचारिक उद्बोधन नहीं है. मार्क्स को जानना, अपने जीवन में आपने क्या मूल्य बनाया, इसे कैसे समझा, जीने और दुनिया में कैसा व्यवहार कियाआदि के बारे में अंतर पैदा करता है. जार्ज बर्नाड शा ने कैसे एक बार कहा था कि " निश्चित तौर पर मुझे यह स्वीकार करना चाहिये कि कार्ल मार्क्स ने मुझे एक इंसान बनाया." अतः मार्क्स मेरे लिये महत्वपूर्ण हैं और मुझे लगता है कि अन्य किसी नहीं बल्कि इस कारण से कि आज पहले से भी कहीं ज्यादा वह हम सभी के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं, कि आज हम जिस दिनिया में रह रहे हैं वह पूँजीवादी है. सोवियत संघ के विघटन के बाद यह दुनिया पहले से कहीं ज्यादा पूँजीवादी है, तथा मार्क्स नें किसी और मनुष्य से ज्यादा, तब और अब भी, अपना सारा जीवन इस दुनिया के वास्तविकता की व्याख्या करने में समर्पित किया है तथा उनकी उपलब्धियाँ अभी भी अद्वितीय हैं. एक अर्थ में, समाजवाद के बारे में मैं यहाँ जो कुछ भी बोलने जा रहा हूँ, अपनी बेहतर समझ के साथ, वह ऐतिहासिक रूप से ज़रूरी तथा पूँजीवाद का संभाव्य नकार है.
आज समाजवाद के बारे में कोई विचार विमर्श, कम से कम इसके सभी भविष्य सहित, भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ घटित हुआ उसे छोड़कर नहीं हो सकता. हमने यहाँ जो कुछ भी देखा, जैसा कि मैनें अपनी पुस्तक में विस्तार से उल्लेख किया है, वह एक असफ़ल क्रांतिकारी प्रयोग था; जिसका निर्माण किया गया था वह एक शिकायती विकृत समाजवाद था. और एक अंतिम संकट तथा वर्गीय शोषक तंत्र के विरुद्ध वर्गहीन पीढी़ के विध्वंस से उसका पूरी तरह पतन हो गया जो ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा वर्ग विश्लेषण की मार्क्सवादी व्याख्या पद्धति के अनुसार पूरी तरह अनुकूल ही है. दूसरे शब्दों में, सोवियत संघ में जो असफल हुआ वह समाजवाद नहीं बल्कि समाजवाद के नाम पर निर्मित एक तंत्र था. इस विशय पर विमर्श करने के लिये मेरे पास यहाँ समय नहीं है. मैं अभी इस बात पर जोर देना चाहुंगा कि समाजवादियों को यह समझने की जरूरत है कि भूतपूर्व सोवियत संघ में ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसके क्रियान्वयन में क्या कुछ घटित हुआ?
निश्चित तौर पर उन समाजवादियों के लिये जो बगैर पूँजीवाद मे भविष्य की इच्छा रखते हैं, यह समझना बेहद जरूरी है कि सोवियत संघ में समाजवाद के रूप में क्या निर्मित हुआ, क्या घटित हुआ तथा क्या असफल हुआ? उन्हें इस असफलता के मूल्य तथा परिणामों के महत्व को समझना चाहिये, वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद, जैसा कि हमने पहले ही बताया है तथा कुछ लोगों के अनुसार, यह सत्तावादी समाजवाद का विध्वंस था. यद्यपि उन्हें वास्तविक आस्तित्वमान पूँजीवाद या तानाशाही/सत्तावादी पूँजीवाद के मूल्य तथा परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये जिसने टुकड़ों में पलने के लिए विवश कर दिया. समाजवादी तथा पूँजीवादी दुनिया के बीच दुनिया के बीच की प्रतिद्वंदिता के रूप में हमारे समय में होने वाले 'समाजवाद के लिये संघर्ष को निश्चित तौर पर गलत ढंग से देखा गया है, जैसे कि १९१७ के बाद के काल के आधिकारिक मार्क्सवाद के साथ हुआ. यह हमेशा से ही कुछ कम या अधिक कई अन्य मोर्चों के साथ एक अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष था. वास्तविक समाजवाद के आस्तित्व वाले देश अपने अंत तक इस संघर्ष का केवल एक मोर्चा थे, जिन्होंने इस संघर्ष की स्थितियों को, नकारात्मक साथ ही साथ सकारात्मक तौर पर मजबूत या प्रभावित किया. लेकिन इन्होंने इसके परिणामों के प्रश्न को निर्धारित या प्रभावित नहीं किया. इन देशों के वर्तमान विध्वंस ने अथवा पूँजीवादी खेमों मे इनकी वापासी ने किसी भी रूप में समाजवाद के भविष्य के सवाल को निर्धारित नहीं किया है, यह संघर्ष अभी भी जारी है और पूँजीवाद के खात्मे तक जारी रहेगा. तथापि इस देशों ने जो स्थापित किआ था वह कई में अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष का महत्वपूर्ण मोर्चा था तथा उनके विध्वंस की माग है कि समाजवादी इनकी स्थितियों/दशाओं को समझें. यदि वे एक विकृत तथा पतित समाजवाद के बोझ को ढोने तथा इसकी कुरूपता और निर्दयता की जवाबदारी की जरूरत नहीं समझते तो इसके विध्वंस की वास्तविक मार्क्सवादी व्याख्या का भार उनके द्वारा अभी भी उठाना है ताकि हमारी जनता सच जान सके तथा भविष्य के संघर्ष के लिये सही सबक सीख सके.इस व्याख्या की जरूरत हमें सिर्फ़ यह सीखने के लिये नही है कि जो कुछ हुआ उसमें क्या सही और क्या गलत है बल्कि इसलिये और भी ज्यादा है क्योंकि हमारी व्याख्या की अनुपस्थिति में, उनकी, दुश्मनों की व्याख्या का प्रचलन जारी रहेगा और वह यह कि 'समाजवाद का पतन हो गया'. इससे भी ज्यादा हमें उनको अपना इतिहास छीन लेने से रोकने की आवश्यकता है. पूँजीवादी विचारकों ने यद्यपि 'समाजवाद के खात्मे ' की घोषणा कर दिया है और उत्तर आधुनिकतावादी तो यहाँ तक कि इतिहास से सीखने की क्षमता से ही इंकार करते हैं, अक्टूबर का चित्रण करने में व्यस्त हैं. जनता की उपलब्धियों के एक पूरे युग में जो कुछ हुआ वह इतिहास में और कुछ नहीं बल्कि एक मंहगा विचलन था.
जारी
आठ मार्च 2007 को इतिहासबोध पत्रिका इलाहाबाद द्वारा आयोजित संगोष्ठी में दिया गया उद्बोधन.
मुझे समाजवाद के भविष्य पर बोलने के लिये कहा गया है. मैं यहाँ जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ वह मेरी हालिया ही प्रकाशित पुस्तक ' क्राइसिस आफ सोशलिज्म - नोट्स आन डिफ़ेंस आफ़ ए कमिट्मेंट' पर आधारित होगा और अपने पक्ष में उन्हें विस्तार से स्पष्ट करने के लिये इस पुस्तक में संकलित उद्धरणों को उद्धृत करूँगा. इस प्रश्न को मैं अपने उद्बोधन के चार अलग लेकिन अंतर्संबंधित खंडों में स्पष्ट करने जा रहा हूँ.
छ्ठवें दशक के अंत के मजबूत व विद्रोही दिनों , में पेरिस के छात्रों ने उस हर व्यक्ति जो उन्हे संबोधित करता था, से सवाल किया और कहा कि पहले वह यह बतायें कि " उनके बोलने का प्रस्थान बिंदु क्या है? (अर्थात् आप बोल कहाँ से रहे हैं?) प्रत्येक वक्ता एक विशिष्ट दार्शनिक राजनीतिक जग़ह के केन्द्र से बोलता था तथा इसके लिये उन्होनें सार्वजनिक तौर पर अपने श्रोताओं का आभार माना. यहाँ यह बताना एकदम उपयुक्त होगा कि मैं मार्क्सवाद के पक्ष में खडे़ होकर बोल रहा हूँ, ऐसा मार्क्सवाद जिसे मैं समझता हूँ. जिस मार्क्सवाद में मुझे खुद के पारंगत होने का कोई मिथ्याभिमान नही है. मैने इसे कई तरीकों से सीखा और न सिर्फ़ मैने इसे अपनि राजनीति अथवा अध्यापक के पेशे के रूप में, बल्कि अपने जीवन और जीने के तरीके में उपयोगी पाया. यह अंतिम बात सिर्फ औपचारिक उद्बोधन नहीं है. मार्क्स को जानना, अपने जीवन में आपने क्या मूल्य बनाया, इसे कैसे समझा, जीने और दुनिया में कैसा व्यवहार कियाआदि के बारे में अंतर पैदा करता है. जार्ज बर्नाड शा ने कैसे एक बार कहा था कि " निश्चित तौर पर मुझे यह स्वीकार करना चाहिये कि कार्ल मार्क्स ने मुझे एक इंसान बनाया." अतः मार्क्स मेरे लिये महत्वपूर्ण हैं और मुझे लगता है कि अन्य किसी नहीं बल्कि इस कारण से कि आज पहले से भी कहीं ज्यादा वह हम सभी के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं, कि आज हम जिस दिनिया में रह रहे हैं वह पूँजीवादी है. सोवियत संघ के विघटन के बाद यह दुनिया पहले से कहीं ज्यादा पूँजीवादी है, तथा मार्क्स नें किसी और मनुष्य से ज्यादा, तब और अब भी, अपना सारा जीवन इस दुनिया के वास्तविकता की व्याख्या करने में समर्पित किया है तथा उनकी उपलब्धियाँ अभी भी अद्वितीय हैं. एक अर्थ में, समाजवाद के बारे में मैं यहाँ जो कुछ भी बोलने जा रहा हूँ, अपनी बेहतर समझ के साथ, वह ऐतिहासिक रूप से ज़रूरी तथा पूँजीवाद का संभाव्य नकार है.
आज समाजवाद के बारे में कोई विचार विमर्श, कम से कम इसके सभी भविष्य सहित, भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ घटित हुआ उसे छोड़कर नहीं हो सकता. हमने यहाँ जो कुछ भी देखा, जैसा कि मैनें अपनी पुस्तक में विस्तार से उल्लेख किया है, वह एक असफ़ल क्रांतिकारी प्रयोग था; जिसका निर्माण किया गया था वह एक शिकायती विकृत समाजवाद था. और एक अंतिम संकट तथा वर्गीय शोषक तंत्र के विरुद्ध वर्गहीन पीढी़ के विध्वंस से उसका पूरी तरह पतन हो गया जो ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा वर्ग विश्लेषण की मार्क्सवादी व्याख्या पद्धति के अनुसार पूरी तरह अनुकूल ही है. दूसरे शब्दों में, सोवियत संघ में जो असफल हुआ वह समाजवाद नहीं बल्कि समाजवाद के नाम पर निर्मित एक तंत्र था. इस विशय पर विमर्श करने के लिये मेरे पास यहाँ समय नहीं है. मैं अभी इस बात पर जोर देना चाहुंगा कि समाजवादियों को यह समझने की जरूरत है कि भूतपूर्व सोवियत संघ में ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसके क्रियान्वयन में क्या कुछ घटित हुआ?
निश्चित तौर पर उन समाजवादियों के लिये जो बगैर पूँजीवाद मे भविष्य की इच्छा रखते हैं, यह समझना बेहद जरूरी है कि सोवियत संघ में समाजवाद के रूप में क्या निर्मित हुआ, क्या घटित हुआ तथा क्या असफल हुआ? उन्हें इस असफलता के मूल्य तथा परिणामों के महत्व को समझना चाहिये, वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद, जैसा कि हमने पहले ही बताया है तथा कुछ लोगों के अनुसार, यह सत्तावादी समाजवाद का विध्वंस था. यद्यपि उन्हें वास्तविक आस्तित्वमान पूँजीवाद या तानाशाही/सत्तावादी पूँजीवाद के मूल्य तथा परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये जिसने टुकड़ों में पलने के लिए विवश कर दिया. समाजवादी तथा पूँजीवादी दुनिया के बीच दुनिया के बीच की प्रतिद्वंदिता के रूप में हमारे समय में होने वाले 'समाजवाद के लिये संघर्ष को निश्चित तौर पर गलत ढंग से देखा गया है, जैसे कि १९१७ के बाद के काल के आधिकारिक मार्क्सवाद के साथ हुआ. यह हमेशा से ही कुछ कम या अधिक कई अन्य मोर्चों के साथ एक अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष था. वास्तविक समाजवाद के आस्तित्व वाले देश अपने अंत तक इस संघर्ष का केवल एक मोर्चा थे, जिन्होंने इस संघर्ष की स्थितियों को, नकारात्मक साथ ही साथ सकारात्मक तौर पर मजबूत या प्रभावित किया. लेकिन इन्होंने इसके परिणामों के प्रश्न को निर्धारित या प्रभावित नहीं किया. इन देशों के वर्तमान विध्वंस ने अथवा पूँजीवादी खेमों मे इनकी वापासी ने किसी भी रूप में समाजवाद के भविष्य के सवाल को निर्धारित नहीं किया है, यह संघर्ष अभी भी जारी है और पूँजीवाद के खात्मे तक जारी रहेगा. तथापि इस देशों ने जो स्थापित किआ था वह कई में अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष का महत्वपूर्ण मोर्चा था तथा उनके विध्वंस की माग है कि समाजवादी इनकी स्थितियों/दशाओं को समझें. यदि वे एक विकृत तथा पतित समाजवाद के बोझ को ढोने तथा इसकी कुरूपता और निर्दयता की जवाबदारी की जरूरत नहीं समझते तो इसके विध्वंस की वास्तविक मार्क्सवादी व्याख्या का भार उनके द्वारा अभी भी उठाना है ताकि हमारी जनता सच जान सके तथा भविष्य के संघर्ष के लिये सही सबक सीख सके.इस व्याख्या की जरूरत हमें सिर्फ़ यह सीखने के लिये नही है कि जो कुछ हुआ उसमें क्या सही और क्या गलत है बल्कि इसलिये और भी ज्यादा है क्योंकि हमारी व्याख्या की अनुपस्थिति में, उनकी, दुश्मनों की व्याख्या का प्रचलन जारी रहेगा और वह यह कि 'समाजवाद का पतन हो गया'. इससे भी ज्यादा हमें उनको अपना इतिहास छीन लेने से रोकने की आवश्यकता है. पूँजीवादी विचारकों ने यद्यपि 'समाजवाद के खात्मे ' की घोषणा कर दिया है और उत्तर आधुनिकतावादी तो यहाँ तक कि इतिहास से सीखने की क्षमता से ही इंकार करते हैं, अक्टूबर का चित्रण करने में व्यस्त हैं. जनता की उपलब्धियों के एक पूरे युग में जो कुछ हुआ वह इतिहास में और कुछ नहीं बल्कि एक मंहगा विचलन था.
जारी
01 जुलाई 2008
हर बार आसमान में कुछ नया देखने को होता है:-
न रायपुर रायपुर है. न मैं, मैं हूँ. देश में कई रायपुर हैं और कई मैं. मै दूसरा बिनायक सेन है,तीसरा अजय टी.जी.,या कोई और आदमी जो रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए भूल जाता है आदमीयत की तमीज.घर से निकल कर वापस न लौटने का खौफ़ लिये देश की सुरक्षा से असुरक्षित, चलते-चलते अक्सर बदल देता है अपने रास्ते.कई बार सड़क के किनारे खडे़ पेड़ उसे देखते हैं हिकारत की नजर से और वह भर उठता है भय और संदेह से.पूरा शहर मै के लिये वर्जित प्रान्त है जहाँ उसका दमित जन के दमन के लिये दिये जा रहे तर्कों से असहमत होना, झूठे शांति अभियानों की खिलाफ़त करना उसे उग्रवादी बना देता है.सड़क पर आदमी की पहुँच से दूर मुख्यमंत्री का चेहरा उसे चिढा़ता है उसे देख मंत्री मुस्कराते हैं,मै होर्डिंग के नीचे से सिर झुकाकर निकल जाता है.चौराहे के दूसरे छोर पर पहुंच वह पीछे मुड़कर देखता है कि मुख्यमंत्री उसे देख रहा है. उसका चेहरा और चौडा़ हो गया है.बगल लगी होर्डिंग में एक आदिवासी महिला अपने कान से सटाकर मोबाइल से बात कर रही है.मोबाइल से बात करती महिला देश के विकास का बिम्ब है जो हर दूसरे चौराहे पर मौजूद है. सामने गांधी पंक्ति के इस आखिरी आदमी को देख खुश हैं या नाराज नहीं पता. उनकी आँखें नीचे झुकी हैं ठीक जमीन पर टिकी लाठी की नोक पर . इंदिरा का चेहरा खिला हुआ है , २००८ के आपातकाल को अनापातकाल समझती जनता को देख.एक पार्क में बैठकर मै लम्बी साँस खींचता आसमान की तरफ़ देखता हूँ और खारिज कर देता हूँ फ़र्नांदो पेसोवा को कि आसमान में एक बार देख चुकने के बाद देखने को कुछ भी नहीं बचता.एक आभासी दुनिया,शून्य में,आसमान में.जहाँ कुछ भी नहीं होता देखने पर हर बार कुछ नया होता है.एक नयी उम्मीद के साथ.
21 जून 2008
कब के चला सुराज न आवा हमरे टोला.
१.
आँखि मांही धूधूर झोंका कहा कि दोख जमाना के है.
बीच गईल दिन मानैं पोंका कहा कि दोख जमाना के है.
करू-कसायल खातिर, हमसे नीक भला को.
रसगुल्ला तू पाँचै लोका कहा कि दोख जमाना के है.
राम जोहार सलाम पैलगी, जबर बूट का.
सीध-साध का छल-बल धोखा कहा कि दोख जमाना के है.
दंद-फंद धूधूर के जेउरी खूब बरा.
सेतैं फ़ाँसा एखा-ओखा कहा कि दोख जमाना के है.
सेवा,त्याग,समरपन काहीं आन के कांधा.
ताकत बागा रवि तू मोका, कहा कि दोख जमाना के है.
चार चुहेड़्न के चाटे जे गोर एसाइत.
कै दिन रही रंग धौ चोखा कहा कि दोख जमाना के है.
शब्दार्थ:-
धूधूर-धूल, दोख-गलती, गईल-गली, मानै-में पोका-गंदगी, करू-कसायल-कड़्वा-तीखा, जेउरी-रस्सी, बरा-बनाना, चुहेड़न-दुष्ट, एसाइत-इस समय
२.
कुछ तू साधा कुछ हम साधी नातपलागो.
गाँव सुराज घरै म बांधी नातपलागो.
बरिहत्तेन के हाँथे आबा घटइ न पावै.
मिलि-जुलि अस मिलि के नाधी नातपलागो.
सूखा, बाढ़, अकाल, भुखमरी, दइउ के लीला.
जनता मरै पै आपन चाँदी नातपलागो.
जनसेवा कै नही जेब कै राजनीति भै.
अबको इहाँ विनोवा, गाँधी नातपलागो.
पाँच बरिस मा पाँच पुस्त के इन्त्जाम भा.
कुछ जबरन कुछ धोखा धाँधी नातपलागो.
हाँथ मिलावै करै चेरउरी वोट परे मा.
फेर भला को छाबै धाँधी नातपलागो.
शब्दार्थ:-
नातपलागो-रिश्तेदारों का पैर छूना, सुराज-स्वराज, बरिहत्थेन-मुश्किल से, दइउ-ईश्वर, चेरौरी-विनती, छावै-बनाना, धाँधी-छप्पर
३.
केही आपन बिपति सुनाई तुहिन बतावा.
केत्ता मूँदी केत्ता ताई तुहिन बतावा.
सब देखि सुनि, के तानि पिछोरी वाला जुग.
काहें नाहक देह देखाई तुहिन बतावा.
राजा, मंत्री, हाकिम, अफ़्सर एकै घाट के पंडा.
आपुस मा सब साढ़ू भाई तुहिन बतावा.
जब जबरा मनमानी करब राज धरम है.
तब काहें के राम दोहाई तुहिन बतावा.
कुलुक-कुलुक के जै-जै बोलत गिल्लियान भा
सेतैं कब तक सोहर गाई तुहिन बतावा.
जेहिन जउनै मिला सइधै हज़म किहिस.
केखर केखर नाव गिनाई तुहिन बतावा.
कब के चला सुराज न आवा हमरे टोला.
कहाँ फ़िरत हैं चाईं माईं तुहिन बतावा.
शब्दार्थ:-
केही-किसको, बिपति-बिपत्ति-परेशानी, मूदी-ढकना, पिछौरी-चद्दर, आपुस-आपस, जबरा-जबरन, कुलुक-उछलना, गिल्लियाना-तंग आना, सईधै-सीधे, केखर-किसका, चाईं माँई-चक्कर लगाता.
16 जून 2008
क्या तुम जानते हो?

निर्मला पुतुल की कविताओं में एक विलुप्त होते आदिम सभ्यता की धुन है. आदिवासी संथाल परिवार में परिवार में जन्मी पुतुल ने कविता विधा में आदिवासी समाज में महिलाओं और उनके अंतर्नाद को गुंजित किया है.किसी सभ्यता के लुटने के पहले की एक पुकार....एक आखिरी चीख...बचाये जाने के अंतिम स्वर सुनयी पड़ते हैं.ऎसे समाज में महिलाओं को दो स्तर की लडा़ईयाँ लड़नी पड़ रही है.प्रश्न के रूप में हमारे सामने खडी़ निर्मला पुतुल की ये कवितायें हमारी संवेदनाओं को क्या जरा भी नहीं छूती? क्या यह समय संवेदनाओं के मर जाने का है ? क्या दुनियादारी इसी का नाम है कि कहीं नौकरी करते हुए हम अपनी एक और पीढी़ को नौकर बनाने के फ़िराक में जुटे रहें?आज जब आदिवासी समाज को लूटने की पूरी कोशिशें जारी हैं.ऎसी स्थिति में बचाव के पक्ष में आने वाला हर नागरिक उग्रवादी बना दिया जा रहा है.सरकारी चश्में को उतारकर अपनी नंगी आँखों से देखते इस सच को इस लडा़ई को सलाम करते हुए हम निर्मला पुतुल की कविता संग्रह:-नगाड़े की तरह बजते स्वर से साभार ये कविता .....?या यूँ कहें ये प्रश्न प्रकाशित कर रहे हैं.
क्या तुम जानते हो
पुरूष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत?
घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी जमीन
के बारे में बता सकते हो तुम?
बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता?
क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री?
सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे?
रिस्तों के कुरु क्षेत्र में
अपने आपसे लड़ते?
तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठें खोलकर
कभी पढा़ है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास?
पढा़ है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?
उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फ़ैलती जडो़ को अपने भीतर?
क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिस्ते का व्याकरण?
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-द्रिश्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?
अगर नहीं!
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और विस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में?
11 जून 2008
'माओवादी दिखते कैसे हैं? मैं उन्हें देखना चाहती हूं'

तीन दशक से पंश्चिम बंगाल की पंचायत से लेकर विधानसभा तक पर काबिज़ वाममोर्चे की चूलें हिलाने वाली तृणमूल कांग्रेस की तेज़तर्रार नेता ममता बनर्जी ने तहलका संवाददाता आशीष सेनगुप्ता से तमाम मुद्दों पर खुलकर बात की। औद्योगीकरण पर अपनी सोच रखते हुए ममता ने माओवादियों से संबंधों की बात पर सीपीएम को जमकर लताड़ लगाई।
पंचायत चुनाव के नतीज़ों के बाद किस तरह का बदलाव देख रही हैं?
बिल्कुल वैसा ही जैसा मैंने कहा था। ईमानदारी से मतदान होने दीजिए और फिर देखिए जनता क्या चाहती है। मैंने चुनाव आयोग से कह दिया था कि सीपीएम अक्सर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से छेड़छाड़ करती है। जो पहले इसे असंभव मानते थे अब वो भी इससे सहमत हो गए हैं। ये चुनाव ईवीएम की बजाय मतपत्रों के जरिए हुए। ये हमारे लिए मौका था और लोगों ने हमें सही साबित किया। जिस तरह से सीपीएम ने हमें विकास विरोधी साबित करने की कोशिश की थी वो गलत साबित हुआ। ये हमेशा से ही सीपीएम की रणनीति रही है। जब भी वो राजनीतिक तौर-तरीकों से लड़ने में विफल होते हैं तो झूठे आरोपों पर उतर आते हैं।
यानी, आप ये स्वीकार करती है कि इस बार जिस तरह से मतदान हुआ उससे विपक्षी दल संतुष्ट हैं? क्या आप को वास्तव में इसी तरह के नतीज़ों की उम्मीद थी?
हमें पता था कि लोग वाम मोर्चे की सरकार से काफी निराश हैं और उन्हें बदलाव की दरकार थी। 320 में से 100 ब्लॉक्स में हमें चुनाव ही नहीं लड़ने दिया गया। बाकी बचे 220 ब्लॉक में से 50 में बिल्कुल मतदान ही नहीं हो सका। ऐसा सीपीएम के हिंसक हथकंडों की वजह से हुआ। जहां भी लोगों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने की आज़ादी मिली ज्यादातर जगहों पर उन्होंने हमें चुना।
ये संभव कैसे हुआ? क्या सिर्फ भूमि अधिग्रहण का मुद्दा ही था?
भूमि अधिग्रहण का मुद्दा तो था ही लेकिन सिर्फ यही नहीं था। सीपीएम के अत्याचार, 30 सालों से जनता के साथ की जा रही बर्बरता, प्रशासन का राजनीतिकरण, निचले स्तर पर भ्रष्टाचार—इन सभी ने अपनी भूमिका निभाई। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों ने अपनी भूमिका निभाई, इसके अलावा भी तमाम वजहें थी जो लोगों के भीतर सालों से इकट्ठा हो रही थीं।
यानी कि सीपीएम के कुकर्मों ने ही बंगाल के ग्रामीण इलाकों से उसकी पकड़ को खत्म कर दिया?
उन्हें अपने कुकर्मों का खामियाजा भुगतना पड़ा। काफी समय से ये बकाया था। जैसा मैंने कहा कि लोग बुरी तरह से निराश थे। लिहाजा हिंसा के खिलाफ वो दृढ़ता से खड़े हो गए, सक्रियता से उसका विरोध किया और हमें चुना क्योंकि हम हमेशा से जन आंदोलनों के साथ रहे हैं। मुझे यकीन है कि तमाम वामपंथी मतदाताओं ने भी हमारे पक्ष में मतदान किया।
वाममोर्चे की तीस साल पुरानी सरकार का आंकलन आप किस रूप में करती हैं?
भूमि सुधारों और पंचायती राज की सफलता की चर्चा बहुत हो चुकी है। इस बार सीपीएम का जादू क्यों नहीं चल सका? वाममोर्चे ने सिर्फ पहले दो कार्यकाल में अच्छा काम किया इसके बाद स्थितियां बुरी तरह से बदल गईं। भ्रष्टाचार ने प्रशासन में जड़ें जमा ली। उनमें से ज्यादातर भ्रष्ट हो गए। उन्होंने प्रशासन और पुलिस का राजनीतिकरण कर दिया। जिस भूमि सुधार की उन्होंने शुरुआत की थी वो तमाशा बन कर रह गया। उन्होंने अपने भूमि सुधार के एजेंडे को कभी पूरा करने की कोशिश भी नहीं की. बल्कि इसके बजाय उन्होंने इसे वोट खरीदने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इसका सबूत है हर चुनाव से पहले आयोजित होने वाला पट्टा वितरण कार्यक्रम। इसी वजह से ये सरकार इतने लंबे समय तक राज करने में कामयाब हो सकी।
आगामी म्युनिसिपल, लोकसभा या विधानसभा चुनावों को ये नतीजे किस तरह से प्रभावित करेंगे? अगले चुनावों में किस पार्टी से गठजोड़ आपके लिए मुनासिब रहेगा।
आप लोग इस तरह के सवाल मायावती या मुलायम सिंह से कभी क्यों नहीं पूछते? गठबंधन एक गतिशील प्रक्रिया है जो कार्यक्रमों, एजेंडा और तमाम दूसरे मसलों पर निर्भर होता है। इस पर टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगी। निश्चित रूप से हम गठबंधन पर विचार करेंगे लेकिन पहले विधानसभा चुनाव आने तो दीजिए।
अब स्थानीय प्रशासन पर आपका भी कब्जा है वो भी ज़िला स्तर पर- क्या इसका मतलब राज्य में औद्योगीकरण पर पूर्ण विराम है?
पंचायत चुनावों के नतीजे का इतना सरलीकरण नहीं होना चाहिए कि ये औद्योगीकरण के पक्ष या विपक्ष में हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कृषि और उद्योग का साथ-साथ विकास। हमें उद्योग की जरूरत होगी लेकिन सीपीएम के रास्ते पर चलकर नहीं। उद्योग का अर्थ सिर्फ बड़ी मात्रा में पूंजी को नहीं समझा जाना चाहिए। औद्योगीकरण का स्वागत है, लेकिन छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगो की कीमत पर नहीं। सीपीएम कह रही है कि बड़ी पूंजी छोटे और मझले दर्जे के उद्योगों के लिए रास्ता तैयार करेगी, लेकिन ये अपने आप नहीं हो जाएगा इसके लिए आपको कोशिश करनी पड़ेगी। क्या वो औद्योगीकरण के लिए कभी किसी समग्र योजना की बात करते हैं? जवाब है नहीं। हमने कभी नहीं कहा कि हम उद्योगों के खिलाफ हैं, लेकिन हां, हम कृषि के मुकाबले उद्योग को खड़ा करने के प्रबल विरोधी हैं।
तो फिर राज्य में निवेश आकर्षित करने की आपके पास क्या योजना है? सत्ता में आने पर आप ऐसा क्या करना चाहेंगी जो वर्तमान सरकार अभी नहीं कर रही है?
निश्चित रूप से हमें बड़े निवेश की जरूरत होगी लेकिन ये जनता की कीमत पर नहीं होगा। आखिर ऐसा क्यूं है कि बड़े औद्योगिक घराने जो भी शर्ते थोपें आप मान लेते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास जनता के हितों को सुरक्षित रखने और फिर जाकर औद्योगिकरण के लिए जगह तलाशने की नीति ही न हो? ये तभी हो सकता है जब आप चीज़ों को बहुत हल्के में लेते हैं और जनता की राय को दरकिनार कर अपने अहम को सर्वोपरि रखना आपकी आदत बन जाती है। सबसे पहले अपने पास उपलब्ध विकल्प खोजने की दरकार होगी, हम औद्योगिक घरानों को वास्तव में क्या सुविधाएं मुहैया करवा सकते हैं और फिर इसी के हिसाब से उनसे बातचीत करनी होगी। मुझे विश्वास है कि पश्चिम बंगाल में इन चीज़ों पर कभी चर्चा नहीं हुई होगी। बड़े नामों के साथ बातचीत करने से पहले जो विकल्प हो सकते हैं उन पर कभी विचार ही नहीं किया जाता।
नंदीग्राम का भविष्य अब कैसा है?
अब ये बात साबित हो गई है कि ये संघर्ष राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए था। हम स्थानीय प्रशासन में हैं लेकिन प्रशासन-- जिस पर राज्य सरकार का नियंत्रण है— को स्वतंत्र होकर काम करने की जरूरत है। भले ही चुनावी प्रक्रिया पूरी हो गई हो, भले ही लोगों ने अपनी पसंद पर मुहर लगा दी हो, हिंसा फिर भी जारी है। हम चाहते हैं कि वहां शांति स्थापित हो लेकिन प्रशासन को अपनी भूमिका निभानी होगी।
और सिंगूर के बारे में क्या कहेंगी? क्या आप चाहेंगी कि आपको टाटा के बंगाल छोड़ने की वजह के रूप में देखा जाय?
हम अभी भी सरकार से यही सवाल पूछ रहे हैं कि सिंगूर को कार फैक्ट्री के लिए क्यों चुना गया। आप हमें दोषी कैसे ठहरा सकते हैं जब हम वैकल्पिक भूमि मुहैया करवाने की बात कर रहे हैं? अगर आप खुद के लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं तो फिर आपको लोगों के अधिकारों का भी सम्मान करना होगा। क्या आपके पास अब भी इस बात की कोई सफाई है कि सिंगूर में लोगों के संपत्ति के अधिकार का हनन क्यों हुआ? ये तो मूलाधिकार हैं, क्या ऐसा नहीं है? अगर ये राज्य की जनता या फिर सिंगूर की जनता की भलाई के लिए था तो फिर तीन महीनों तक धारा 144 क्यों लागू रही? अभी भी वहां पर 3,000 के करीब पुलिस के जवान तैनात हैं। हम परियोजना के विरोध में नहीं हैं, लेकिन अगर इसकी कीमत जनता और उनकी कृषि योग्य ज़मीन होगी तो निश्चित रूप से इस पर हमारी आपत्ति है।
सीपीएम हमेशा ये आरोप लगाती है कि तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के बीच सांठगांठ है।
अगर माओवादी इतने खतरनाक हैं तो फिर सीताराम येचुरी नेपाल में माओवादियों से बातचीत में क्यों शामिल हुए?
लेकिन उन्होंने ऐसा माओवादियों के चुनाव में हिस्सा लेने के बाद किया।
सिर्फ चुनाव में हिस्सेदारी ने उन्हें लोकतांत्रिक बना दिया? मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूं। अगर ऐसा है तो आप उन्हें प्रतिबंधित क्यों नहीं कर देते? पर हां, माओवादी दिखते कैसे हैं? मैं किसी को देखना चाहती हूं। मुझे तो आशंका है कि उन्हें सीपीएम ने ही बनाया है।
आपका दावा है कि लोग आपके साथ हैं। समाज का कौन सा तबका आपके साथ है?
समाज को इस नज़र से सीपीएम वाले देखते हैं, हम नहीं। समाज का हर तबका हमसे जुड़ा है। हमारी कोशिश जनता की मांगो का समर्थन करना है और हमें उम्मीद है कि इस काम में सभी तबकों का समर्थन हमें मिलेगा।
09 जून 2008
नेपाल में एक राजा रहता था!
कहानियों अर किंवंद्न्तियों का भी अपना एक वर्ग चरित्र होता है.बचपन में उघते-उंघते दादी या मा से कहानियाँ सुनना और कहानियों में किसी राजा के लिये किसी दासी का अपने बच्चे का बलिदान या किसी दास का अपना गलाकाटकर बलिदान देना हमारी मनोव्रित्ति को शासक के लिये समर्पण का बोध ही सिखाती आयी है. और कहानियाँ किसी समय काल का इतिहास होती हैं.समय का बदलाव और लेखक की वर्ग द्रिश्टि किसी पाठक के मनोगत प्रभावों को समाज में उपयुक्त हस्तक्षेप का रास्ता दिखाती है.विजय जी एक लेखक हैं, देहरादून में रहते हैं.हाल में हुए नेपाल कए राजनीतिक बदलाव पर उनकी ये प्रस्तुति जो उनके लिखो यहाँ वहाँ ब्लाग पर पहले प्रकाशित हो चुकी है. नेपाल की मांऐ अपने बच्चों को सुनायेगी लोरिया। बिलख रहे बच्चे डर नहीं रहे होगें, बेशक कहा जा रहा होगा - चुपचाप सो जाओ नहीं तो राजा आ जायेगा।
नेपाल में चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। शासन प्रशासन का नया रूप जल्द ही सामने होगा. खबरों में नेपाल सुर्खियों में है। कौन नहीं होगा जो सदी के शुरुआत में ही जनता के संघर्षों की इस ऐतिहासिक जीत को सलाम न कहे। उससे प्रभावित न हो। जनता के दुश्मन भी, इतिहास के अंत की घोषणा करते हुए जिनके गले की नसें फूलने लगी थी, शायद अब मान ही लेगें कि उनके आंकलन गलत साबित हुए है।
नेपाली जनता 240 वर्ष पुराने राजतंत्र का खात्मा कर नये राष्ट्रीय क्रान्तिकारी जनवाद की ओर बढ़ रही है। 20 वीं सदी की क्रान्तिकारी कार्यवाहियों 1917 एवं 1949 के बाद लगातार बदलते गये परिदृश्य के साथ सदी के अंतिम दशक के मध्य संघर्ष के जनवादी स्वरुप की दिशा का ये प्रयोग नेपाली जनता को व्यापक स्तर पर गोलबंद करने में कामयाब हुआ है। तीसरी दुनिया के मुल्कों की जनता रोशनी के इस स्तम्भ को जगमगाने की अग्रसर हो, यहीं से चुनौतियों भरे रास्ते की शुरुआत होती है।
पूंजीवादी लोकतंत्र के भीतर राजसत्ता का वह स्वरुप जो वर्गीय दमन का एक कठोर यंत्र बनने वाला होता है, उस पर अंकुश लगे और उत्पादन के औजारों पर जनता के हक स्थापित हो, ये चिन्ता नेपाली नेतृत्व के सामने भी मौजूद ही होगी। औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया कायम हो पाये, जो गरीब और तंगहाली की स्थितियों में जीवन बसर कर रही नेपाली जनता को जीवन की संभावनाओं के द्वार खोले, ऐसी कामना ही रोजगार के अभाव में पलायन कर रहे नेपालियों के लिए एक मात्र शुभकामना हो सकती है।
नेपाल और सीमांत में सामंती झगड़ों की चपेट में झुलसती रही जनता के मुक्ति के जश्न को मैं पिता की आंखों से देखूं तो कह सकता हूं कि पिता होते तो सदियों के आतंक से मुक्त हो जाते। नेपाल गणतांत्रिक लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ चला है। सदियों की दासता से नेपाली जनता मुक्त हुई है। लगभग 240 वर्ष पूर्व स्थापित हुआ राजशाही का आतंक समाप्त।
आतंक की परछाईयों से घिरे पूर्वजों की कथाऐं पिता को भी आतंक से घेरे रही। मां भी आतंकित ही रहती थी। मां की कल्पनाओं में ऐसे ही उभरता रहा था गोरख्याणी का दौर। गढ़वाल-कुमाऊ के सीमांत पर रहने वाले, इतिहास के उस आंतक के खात्मे पर अब भय मुक्त महसूस कर रहे होगें अपने को जिसने उन्हें बहुत भीतर तक दबोचे रखा - पीढ़ियों दर पीढ़ी। पिता ता-उम्र ऐसे आतंक के साये से घिरे रहे। गोरख्याणी का आतंक उनको सपनों में भी डराता रहा था। जबकि गोरख्याणी का दौर तो उन्होंने कभी देखा ही नहीं। सिर्फ सुनी गयी कथाये ही जब सैकड़ो लोगों को आंतक में डूबोती रही तो उसको झेलने वाले किस स्थिति में रहे होगें, इसकी कल्पना की जा सकती है क्या ?
खुद को जानवरों की मांनिद बेचे जाने का विरोध तभी तो संभव न रहा होगा। हरिद्वार के पास कनखल मंडी रही जहां गोरख्याणी के उस दौर में मनुष्य बेचे जाते रहे। लद्दू घोड़े की कीमत भी उनसे ज्यादा ही थी। लद्दू घोड़ा 30 रु में और लगान चुकता न कर पाया किसान मय-परिवार सहित 10 रु में भी बेचा जा सकता था। बेचने वाले कौन ? गोरखा फौज।
पिता का गांव ग्वालदम-कर्णप्रयाग मार्ग में मीग गदेरे के विपरीत चढ़ती गयी चढ़ाई पर और मां का बच्चपन इसी पहाड़ के दक्षिण हिस्से, जिधर चौखुटिया-कर्णप्रयाग मार्ग है, उस पर बीता। ये दोनों ही इलाके कुमाऊ के नजदीक रहे। नेपाल पर पूरी तरह से काबिज हो जाने के बाद और 1792 में कुमाऊ पर अधिकार कर लेने के बाद गढ़वाल में प्रवेश करती गोरखा फौजों ने इन्हीं दोनों मार्गों से गढ़वाल में प्रवेश किया। गढ़वाल में प्रवेश करने का एक और मार्ग लंगूर गढ़ी, जो कोटद्वार की ओर जाता है, वह भी उनका मार्ग रहा। आंतक का साया इन सीमांत इलाकों में कुछ ज्यादा ही रहा। संभवत: अपने विस्तारवादी अभियान के शुरुआती इन इलाकों पर ही आतंक का राज कायम कर आग की तरह फैलती खबर के दम पर ही आगे के इलाकों को जीतने के लिए रणनीति तौर पर ऐसा हुआ हो। या फिर प्रतिरोध की आरम्भिक आवाज को ही पूरी तरह से दबा देने के चलते ऐसा करना आक्रांता फौज को जरुरी लगा हो। मात्र दो वर्ष के लिए सैनिक बने गोरखा फौजी, जो दो वर्ष बीत जाने के बाद फिर अपने किसान रुप को प्राप्त कर लेने वाले रहे, सीमित समय के भीतर ही अपने रुआब की आक्रांता का राज कायम करना चाहते रहे। अमानवीयता की हदों को पार करते हुए जीते जा चुके इलाके पर अपनी बर्बर कार्यवाहियों को अंजाम देना जिनके अपने सैनिक होने का एक मात्र सबूत था, सामंती खूंखरी की तेज धार को चमकाते रहे। पुरुषों को बंदी बनाना और स्त्रियों पर मनमानी करना जिनके शाही रंग में रंगे होने का सबूत था। गोरख्याणी का ये ऐसा आक्रमण था कि गांव के गांव खाली होने लगे। गोरख्याणी का राज कायम हुआ।
1815 में अंग्रेजी फौज के चालाक मंसूबों के आगे यूंही नहीं छले गये लोग। 1803 में अपने सगे संबंधियों के साथ जान बचाकर भागा गढ़वाल नरेश बोलांदा बद्री विशाल राजा प्रद्युमन शाह। सुदर्शन शाह, राजा प्रद्युमन शाह का पुत्र था। अंग्रेजों के सहयोग से खलंगा का युद्ध जीत जाने के बाद जिसे अंग्रेजों के समाने अपने राज्य के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा। अंग्रेज व्यापारी थे। मोहलत में जो दिया वह अलकनन्दा के उत्तर में ढंगारो वाला हिस्सा था जहां राजस्व उगाने की वह संभावना उन्हें दिखायी न दी जैसी अलकनन्दा के दक्षिण उभार पर। बल्कि अलकनन्दा के उत्तर से कई योजन दूरी आगे रवाईं भी शुरुआत में इसीलिए राजा को न दिया। वह तो जब वहां का प्रशासन संभालना संभव न हुआ तो राजा को सौंप देना मजबूरी रही। सुदर्शन शाह अपने पूर्वजों के राज्य की ख्वहिश के साथ था। पर उसे उसी ढंगारों वाले प्रदेश पर संतोष करना पड़ा। श्रीनगर राजधानी नहीं रह गयी। राजधानी बनी भिलंगना-भागीरथी का संगम - टिहरी।
खुड़बड़े के मैदान में प्रद्युमन शाह और गोरखा फौज के बीच लड़ा गया युद्ध और राजा प्रद्युमन शाह मारा गया। पुश्तैनी आधार पर राजा बनने का अधिकार अब सुदर्शन शाह के पास था। पर गद्दी कैसे हो नसीब जबकि गोरखा राज कायम है। बस अंग्रेजों के साथ मिल गया भविष्य का राजा। वैसे ही जैसे दूसरे इलाको में हुआ। अपने पड़ोसी राजा को हराने में जैसे कोई एक अंग्रेजों का साथ पकड़ता रहा। तिब्बत के पठारों पर पैदा होती ऊन और चंवर गाय की पूंछ के बालों पर टिकी थी उनकी गिद्ध निगाहें। यूरोप में पश्मिना ऊन और चँवर गाय की पूंछ के बालों की बेहद मांग थी। पर तिब्बत का मार्ग तो उन पहाड़ी दर्रो से ही होकर गुजरता था जिन पर गोरखा नरेश का राज कायम था। दुनिया की छत - तिब्बत पर वह खुद भी तो चढ़ना चाहता था।
पिता तीन तरह के लोगों से डरते रहे। डरते थे और नफ़रत करते थे। कौन थे ये तीन। गोरखे, कम्यूनिस्ट और संघी।
कम्यूनिस्टों के बारे में वैसे तो उनकी राय भली ही रही। ईमानदार होते हैं, उद्यमी भी। पर घोर नास्तिक होते हैं। पिता बेशक उस तरह के पंडिताई बुद्धि नहीं रहे जैसे आस्थाओं पर तनिक भी तर्क वितर्क न सहन करने वाले संघी। पर धार्मिक तो वे थे ही। नास्तिकों को कैसे बरदाश्त कर लें!
जाति से ब्राहमणत्व को प्राप्त किये हुए, घर में मिले संस्कारों के साथ। पुरोहिताई पुश्तैनी धंधा रहा। पर पिता को न भाया। इसलिए ही तो घर से निकल भागे। कितने ही अन्य संगी साथी भी ऐसे ही भागे पहाड छोड़कर। पेट की आग दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, जाने कहाँ-कहाँ तक ले गयी, घर से भागे पहाड़ के छोकरों को।
देखें तो जब अंग्रेजों का राज कायम हुआ, उसके बाद से ही शुरु हुआ घर से भागने का यह सिलसिला। गोरखा राज के बाद जब अंग्रेजों का राज कायम हुआ, गांव के गांव खाली हो चुके थे। खाली पड़े गांवों से राजस्व कहां मिलता। बस, कमीण, सयाणे और थोकदारों के तंत्र ने अपने नये राजाओं के इशारे पर गांव छोड़-छोड़कर भागे हुए पहाड़ियों को ढूंढ कर निकाला। नये आबाद गांव बसाये गये। ये अंग्रेज शासकों की भूमि से राजस्व उगाही की नयी व्यवस्था थी। फिर जब पुणे से थाणे के बीच रेल लाईन चालू हो गयी और एक जगह से दूसरी जगह कच्चे माल की आवाजाही के लिए रेलवे का विस्तार करने की योजना अंग्रेज सरकार की बनी तो पहाड़ों के जंगलों में बसी अकूत धन सम्पदा को लूटने का नया खेल शुरु हुआ। जंगलों पर कब्जा कर लिया गया। जानवरों को नहीं चुगाया जा सकता था। खेती का विस्तार करना संभव नहीं रहा। पारम्परिक उद्योग खेती बाड़ी, पशुपालन कैसे संभव होता! बस इसी के साथ बेरोजगार हो गये युवाओं को बूट, पेटी और दो जोड़ी वर्दी के आकर्षण में लाम के लिए बटोरा जा सका। जंगलों पर कब्जे का ये दोहरा लाभ था। बाद में वन अधिनियम बनाकर जंगलों के अकूत धन-सम्पदा को लूटा गया। पेशावर कांड का विद्राही चंद्र सिंह गढ़वाली भी ऐसे ही भागा था एक दिन घ्ार से बूट, पटटी और सरकारी वर्दी के आकर्षण में। पर यह भागना ऐसा भागना नहीं था कि लिमका बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराना है। पेट की आग को शांत करने के लिए लगायी जा रही दौड़ खाते पीते मोटियाये लोगों के मनोरंजन का पाठ तो हो भी नहीं सकती।
पिता धार्मिक थे और अंत तक धार्मिक ही बने रहे। माँ भी धार्मिक थी। ऐसी धार्मिक कि जिसके पूजा के स्थान पर शालीग्राम पर भी पिठांई लग रही है तो बुद्ध की कांस्य मूर्ति भी गंगाजल के छिड़काव से पवित्र हो रही है। माँ उसी साल गयी, जिस साल को मुझे अपनी एक कविता में लिखना पड़ा - कान पर जनेऊ लटका चौराहे पर मूतने का वर्ष। 2 दिसम्बर का विप्लवकारी वो साल - 1992। माँ 6 दिसम्बर को विदा हो गयी। 2 दिसम्बर 1992 से कुछ वर्ष पूर्व जब भागलपुर में साम्प्रदायिक दंगा हुआ था, समाचार सुनते हुए माँ की बहुत ही कोमल सी आवाज में सुना था - ये क्या हो गया है लोगों को, जरा जरा सी बात पर मरने मारने को उतारु हो जाते हैं।
दादा पुरोहिताई करते थे। पिता सबसे बड़े थे। दूर-दूर तक फैली जजमानी को निपटाने के लिए दादा चाहते थे कि ज्येठा जाये। हरमनी, कुलसारी से लेकर भगवती तक। दादा की उम्र हो रही थी। टांगे जवाब देने लगी थी। ज्येठे को भगवती भेज कर जहां किसी को पानी पर लगाना है, मंझले को भी आदेश मिल जाता कि वह कुलसारी चला जाये, जजमान को रैबार पहुँचाना है। कठिन चढ़ाई और उतराई की यह ब्रहमवृत्ति पिता को न भायी। जोड़-जोड़ हिला देने वाली चढ़ाई और उतराई पर दौड़ते हुए आखिर एक दिन दादा से ऐसी ही किसी बात पर झड़प हो गयी तो उनके मुँह से निकल ही गया - फंड फूक तै दक्षिणा ते। ऐसी कठिन चढ़ाईयों के बाद मिलने वाली दक्षिणा भाड़ में जाये। बर्तन मांज लूंगा पर ये सब नहीं करुंगा। पिता के पास घर से भागने का पूरा किस्सा था। जिसे कोई भी, खास उस दिन, सुन सकता था, जिस दिन उनके भीतर बैचेनी भरी तरंगें उछाल मार रही होतीं। 6 दिसम्बर के बाद, माँ के न रहने पर तो कई दिनों तक सिर्फ उनका यही किस्सा चलता रहा। हर आने जाने वाले के लिए किस्से को सुने बिना उठना संभव ही न रहा। शोक मनाने पहुंचा हुआ व्यक्ति देखता कि पिता न सिर्फ सामान्य है बल्कि माँ के न रहने का तो उन्हें कोई मलाल ही नहीं है। वे तो बस खूब मस्त हैं। खूब मस्त। उनके बेहद करीब से जानने वाला ही बता सकता था कि यह उनकी असमान्यता का लक्षण है। सामन्य अवस्था में तो इतना मुखर वे होते ही नहीं। बात बात पर तुनक रहे हैं तो जान लो एकदम सामान्य हैं। पर जब उनके भीतर का गुस्सा गायब है तो वे बेहद असमान्य हैं। उस वक्त उन्हें बेहद कोमल व्यवहार की अपेक्षा है। वे जिस दिन परेशान होते, जीवन के उस बीहड़ में घुस जाते जहां से निकलने का एक ही रास्ता होता कि उस दिन मींग गदेरे से जो दौड़ लगायी तो सीधे ग्वालदम जाकर ही रुके। कोई पीछे से आकर धर न दबोचे इसलिए ग्वालदम में भी न रुके, गरुड़ होते हुए बैजनाथ निकल गये। बैजनाथ में मोटर पर बैठते कि साथ में भागे हुए दोनों साथी बस में चढ़े ही नहीं और घर वापिस लौट गये।
बस अकेले ही शुरु हुई उनकी यात्रा। मोटर में बैठने के बाद उल्टियों की अनंत लड़ियां थी जो उनकी स्मृतियों में हमेशा ज्यों की त्यों रही। जगहों के नामों की जगह सिर्फ मुरादाबाद ही उनकी स्मृतियों में दर्ज रहा। जबकि भूगोल गवाह है कि गरूण के बाद अल्मोड़ा, हल्द्वानी और न जाने कितने ही अन्य ठिकानों पर रुक-रुक कर चलने वाली बस सीधे मुरादाबाद पहुंची ही नहीं होगी।
कम्यूनिस्टों का नाम सुनते ही एक अन्जाना भय उनके भीतर घर करता रहा। मालूम हो जाये कि सामने वाला कम्यूनिस्ट है तो क्या मजाल है कि उसकी उन बातों पर भी, जो लगातार कुछ सोचते रहने को मजबूर करती रही होती, वैसे ही वे यकीन कर लें। नास्तिक आदमी क्या जाने दुनियादारी, अक्सर यही कहते। लेकिन दूसरे ही क्षण अपनी द्विविधा को भी रख देते - वैसे आदमी तो ठीक लग रहा था, ईमानदार है। पर इन कम्यूनिस्टों की सबसे बड़ी खराबी ही यह है कि इन्हें किसी पर विश्वास ही नहीं। इनका क्या। न भाई है कोई इनका न रिश्तेदार। तो क्या मानेगें उसको। और उनकी निगाहें ऊपर को उठ जाती। कभी कोई तर्क वितर्क कर लिया तो बस शामत ही आ जाती थी। जा, जा तू भी शामिल हो जा उन कम्यूनिस्टों की टोली में। पर ध्यान रखना हमसे वास्ता खतम है। कम्यूनिस्ट हो चाहे क्रिश्चयन, उनकी निगाह में दोनों ही अधार्मिक थे - गोमांस खाते है। कम्यूनिस्टों के बारे में उनकी जानकारी बहुत ही उथली रही। बाद में कभी, जब कुछ ऐसे लोगों से मिलना हुआ तो अपनी धारणा तो नहीं बदली, जो बहुत भीतर तक धंस चुकी थी, पर उन व्यक्तियों के व्यवहार से प्रभावित होने के बाद यही कहते - आदमी तो ठीक है पर गलत लोगों के साथ लग गया। धीरे-धीरे इस धारणा पर भी संशोधन हुआ और कभी कभी तो जब कभी किसी समाचार को सुनकर नेताओं पर भड़कते तो अपनी राय रखते कि गांधी जी ने ठीक ही कहा था कि ये सब लोभी है। इनसे तो अच्छा कम्यूनिस्ट राज आ जाये। गांधी जी के बारे में भी उनकी राय किसी अध्ययन की उपज नहीं बल्कि लोक श्रुतियों पर आधारित रही। आजादी के आंदोलन में गांधी जी की भूमिका वे महत्वपूर्ण मानते थे। उस दौर से ही कांग्रेस के प्रति उनका गहरा रुझान था। लेकिन इस बात को कभी प्रकट न करते थे। जब वोट डालकर आते तो एकदम खामोश रहते। किसे वोट दिया, हम उत्सुकतवश पूछते तो न माँ ही कुछ ज़वाब देती और न ही पिता। वोट उनके लिए एक ऐसी पवित्र और गुप्त प्रार्थना थी जिसको किसी के सामने प्रकट कर देना मानो उसका अपमान था। मतदान के नतीजे आते तो भी नहीं। हां, जनसंघ्ा डंडी मारो की पार्टी है, ठीक हुआ हार गयी, समाचारों को सुनते हुए वे खुश होते हुए व्यक्त करते। गाय बछड़े वाली कांग्रेस तक वे उम्मीदों के साथ थे। आपातकाल ने न सिर्फ कांग्रेस से उनका मोह भंग किया बल्कि उसके बाद तो वे राजनीतिज्ञों की कार्यवाहियों से ही खिन्न होने लगे। अब तो कम्यूनिस्ट राज आना ही चाहिए। कम्यूनिस्ट तंत्र के बारे में वे बेशक कुछ नहीं जानते थे पर अपने आस पास के उन लोगों से प्रभावित तो होते ही रहे जो अपने को कम्यूनिस्ट भी कहते थे और वैसा होने की कोशिश भी करते थे।
नेपाल में बदल रहे हालात पर उनकी क्या राय होती, यदि इसे उनकी द्विविधा के साथ देखूं तो स्पष्ट है कि हर नेपाली को गोरखा मान लेने की अपनी समझ के चलते, वे डरे हुए भी रहते, पर उसी खूंखार दौर के खिलाफ लामबंद हुई नेपाली जनता के प्रति उनका मोह भी उमड़ता ही। जब वे जान जाते उसी राजा का आतंकी राज समाप्त हो गया जिसके वंशजों ने गोरख्याणी की क्रूरता को रचा है तो वे निश्चित ही खुश होते। बेशक, सत्ता की चौकसी में जुटा अमला उन्हें माओवादी कहता तो वे ऐसे में खुद को माओवादी कहलाने से भी परहेज न करते।
06 जून 2008
नैतिक पत्रकारिता ही पेशेवर और पेशेवर पत्रकारिता ही नैतिक:-
बर्नार्ड मारग्रेट
पत्रकारिता का मूलतः दो काम है. पहला लोकतंत्र के खंभे के रूप में काम करना और दूसरा लोगों को एक साथ लाने, समुदायों को एक करने में अहम भूमिका का निर्वाह करना. पत्रकारों का मूल काम तो फैक्ट प्रोवाइड करवाना है. क्या, कौन, कहां, कब, क्यों, कैसे, कितना... के फॉर्मेट में लेकिन यही काफी नहीं है. उस फैक्ट के पीछे के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक कारणों से भी लोगों को रू-ब-रू करवाना जरूरी है.
मीडिया की एक दूसरी अहम भूमिका दो भिन्न समुदाय, संस्कृति, धर्म और जीवनशैली वाले लोगों को भी एक-दूसरे से परिचित कराते हुए करीब लाने की सार्थक कोशिश करना है. यानी इन्फॉर्मेशन को इंटर-फॉर्मेशन और अंडरस्टैंडिंग को म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग में बदलना है. सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना भी मीडिया का काम है.
मिशन से भटकने के कारण ही मीडिया व मीडियाकर्मियों की साख पर सवाल उठने शुरू हुए हैं. पश्चिमी यूरोप में विगत वर्ष एक सर्वेक्षण हुआ कि किस पेशे को लोग सम्मान की नजर से देखते हैं. इसमें मीडियाकर्मियों को मात्र १६-१७ प्रतिशत के बीच अंक मिले.
आज स्थिति क्या हैङ्क्ष मीडिया का दिन-ब-दिन विस्तार हो रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तेजी से फैल रहा है, इंटरनेट पत्रकारिता का दायरा बढा लेकिन फिर भी हम जहां थे, वहीं पर खडे हैं. खबर तो आ रही हैं लेकिन क्याङ्क्ष यह देनेवालों को भी नहीं पता. समाचार अपील नहीं कर पा रहे. आज भी लोग वोट डालने नहीं जाते. लोकतंत्र की मजबूती के लिए आखिर क्या कर रही है मीडियाङ्क्ष
यह सच है कि मीडिया पर ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव पडा है. वैसे उद्योगपति, जिनका मीडिया से कोई लेना-देना नहीं था, वे आज मीडिया के कारोबारी हो गये हैं. अमेरिका ऑनलाइन आज नेटस्केप, टाइम, वार्नर ब्रदर्स व सीएनन को नियंत्रित करता है तो फोटोग्राफी के क्षेत्र में बिल गेट्स की एजेंसी 'कॉर्बिस' है. रूपर्ट मर्डोक आज कई ब्रिटिश व अमेरिकी अखबारों के शहंशाह बने हुए हैं. द टाइम्स, द सन, द न्यूयॉर्क पोस्ट, बी स्काई बी जैसे सैटेलाइट नेटवर्क एवं २० सेंचुरी फॉक्स नामक बडी फिल्म निर्माण कंपनी को संचालित कर रहे हैं. यूरोप में भी यह ट्रेंड बढ रहा है. फ्रांस के दो बडे मीडिया ग्रुप सेर्गे डेसॉल्ट और जीन लक लैगार्देर द्वारा नियंत्रित हो रहे हैं. ये दोनों हथियार निर्माण क्षेत्र के व्यापारी रहे हैं. इनके आने से मीडिया उद्योग का लक्ष्य-उेश्य तेजी से अधिक पैसा बनाना और अपना रेटिंग बनाये रखना है. इसके लिए सनसनी, पोर्नोग्राफी, हिंसा को ही मुख्य राह बनाना पडे, तो भी इनके लिए कोई मायने नहीं रखता.
सनसनी लिखना या दिखाना, तो किसी पत्रकार के लिए सबसे आसान होता है. गंभीर विषयों/मुों पर लिखना या काम करना कठिन होता है, क्योंकि उसके लिए पहले होमवर्क, रिसर्च-वर्क करना पडता है. गंभीर विषयों को रोचक ढंग से लिखना तो सबसे कठिन काम होता है. हमें मूल वाक्य याद रखना होगा कि, सिर्फ पेशेवर पत्रकारिता ही नैतिक हो सकती है और नैतिक पत्रकारिता ही पेशेवर हो सकती है.
तो ऐसे में हमें क्या करना चाहिएङ्क्ष सबसे पहले तो यह याद रखना होगा कि हम कॉमोडिटी नहीं बेचते.
प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि बिजनेस को नुकसान पहुंचाये बिना कैसे बेहतरी से काम कर सकते हैं. अच्छी पत्रकारिता के लिए एक पत्रकार के दिल में लोग, समुदाय के लिए प्यार होना बेहद जरूरी है. खुद में बदलाव लाना होगा. यदि रास्ता नहीं निकाल पाते, विजन को विकसित नहीं कर पा रहे, तो फिर बैड गवर्नेंस पर बोलने का हमें अधिकार नहीं.
(फ्रांसीसी पत्रकार बर्नार्ड मारग्रेट इंटरनेशनल कम्युनिकेशंस फोरम के अध्यक्ष हैं. यह आलेख मीडिया, गवर्नेंस व सोसायटी विषयक एक व्याख्यान का संपादित अंश है.)
अनुवाद : निराला
पत्रकारिता का मूलतः दो काम है. पहला लोकतंत्र के खंभे के रूप में काम करना और दूसरा लोगों को एक साथ लाने, समुदायों को एक करने में अहम भूमिका का निर्वाह करना. पत्रकारों का मूल काम तो फैक्ट प्रोवाइड करवाना है. क्या, कौन, कहां, कब, क्यों, कैसे, कितना... के फॉर्मेट में लेकिन यही काफी नहीं है. उस फैक्ट के पीछे के ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक कारणों से भी लोगों को रू-ब-रू करवाना जरूरी है.
मीडिया की एक दूसरी अहम भूमिका दो भिन्न समुदाय, संस्कृति, धर्म और जीवनशैली वाले लोगों को भी एक-दूसरे से परिचित कराते हुए करीब लाने की सार्थक कोशिश करना है. यानी इन्फॉर्मेशन को इंटर-फॉर्मेशन और अंडरस्टैंडिंग को म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग में बदलना है. सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना भी मीडिया का काम है.
मिशन से भटकने के कारण ही मीडिया व मीडियाकर्मियों की साख पर सवाल उठने शुरू हुए हैं. पश्चिमी यूरोप में विगत वर्ष एक सर्वेक्षण हुआ कि किस पेशे को लोग सम्मान की नजर से देखते हैं. इसमें मीडियाकर्मियों को मात्र १६-१७ प्रतिशत के बीच अंक मिले.
आज स्थिति क्या हैङ्क्ष मीडिया का दिन-ब-दिन विस्तार हो रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तेजी से फैल रहा है, इंटरनेट पत्रकारिता का दायरा बढा लेकिन फिर भी हम जहां थे, वहीं पर खडे हैं. खबर तो आ रही हैं लेकिन क्याङ्क्ष यह देनेवालों को भी नहीं पता. समाचार अपील नहीं कर पा रहे. आज भी लोग वोट डालने नहीं जाते. लोकतंत्र की मजबूती के लिए आखिर क्या कर रही है मीडियाङ्क्ष
यह सच है कि मीडिया पर ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव पडा है. वैसे उद्योगपति, जिनका मीडिया से कोई लेना-देना नहीं था, वे आज मीडिया के कारोबारी हो गये हैं. अमेरिका ऑनलाइन आज नेटस्केप, टाइम, वार्नर ब्रदर्स व सीएनन को नियंत्रित करता है तो फोटोग्राफी के क्षेत्र में बिल गेट्स की एजेंसी 'कॉर्बिस' है. रूपर्ट मर्डोक आज कई ब्रिटिश व अमेरिकी अखबारों के शहंशाह बने हुए हैं. द टाइम्स, द सन, द न्यूयॉर्क पोस्ट, बी स्काई बी जैसे सैटेलाइट नेटवर्क एवं २० सेंचुरी फॉक्स नामक बडी फिल्म निर्माण कंपनी को संचालित कर रहे हैं. यूरोप में भी यह ट्रेंड बढ रहा है. फ्रांस के दो बडे मीडिया ग्रुप सेर्गे डेसॉल्ट और जीन लक लैगार्देर द्वारा नियंत्रित हो रहे हैं. ये दोनों हथियार निर्माण क्षेत्र के व्यापारी रहे हैं. इनके आने से मीडिया उद्योग का लक्ष्य-उेश्य तेजी से अधिक पैसा बनाना और अपना रेटिंग बनाये रखना है. इसके लिए सनसनी, पोर्नोग्राफी, हिंसा को ही मुख्य राह बनाना पडे, तो भी इनके लिए कोई मायने नहीं रखता.
सनसनी लिखना या दिखाना, तो किसी पत्रकार के लिए सबसे आसान होता है. गंभीर विषयों/मुों पर लिखना या काम करना कठिन होता है, क्योंकि उसके लिए पहले होमवर्क, रिसर्च-वर्क करना पडता है. गंभीर विषयों को रोचक ढंग से लिखना तो सबसे कठिन काम होता है. हमें मूल वाक्य याद रखना होगा कि, सिर्फ पेशेवर पत्रकारिता ही नैतिक हो सकती है और नैतिक पत्रकारिता ही पेशेवर हो सकती है.
तो ऐसे में हमें क्या करना चाहिएङ्क्ष सबसे पहले तो यह याद रखना होगा कि हम कॉमोडिटी नहीं बेचते.
प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि बिजनेस को नुकसान पहुंचाये बिना कैसे बेहतरी से काम कर सकते हैं. अच्छी पत्रकारिता के लिए एक पत्रकार के दिल में लोग, समुदाय के लिए प्यार होना बेहद जरूरी है. खुद में बदलाव लाना होगा. यदि रास्ता नहीं निकाल पाते, विजन को विकसित नहीं कर पा रहे, तो फिर बैड गवर्नेंस पर बोलने का हमें अधिकार नहीं.
(फ्रांसीसी पत्रकार बर्नार्ड मारग्रेट इंटरनेशनल कम्युनिकेशंस फोरम के अध्यक्ष हैं. यह आलेख मीडिया, गवर्नेंस व सोसायटी विषयक एक व्याख्यान का संपादित अंश है.)
अनुवाद : निराला
05 जून 2008
मीडियाकर्मियों पर लानत लगाने से बेहतर उनकी स्थिति पर संवेदनशील तरीके से विचार करने की जरूरत है:-

विवेक कुमार सिंह
मीडिया के मूल्यों में गिरावट आयी है. इस बात को लेकर बौद्धिक वर्ग में आम सहमति है. मूल्यों के पतन के लिए मीडिया को कटघरे में खडा किया जाता है. लेकिन एक सवाल अनुत्तरित है कि ऐसा हो क्यों हो रहा है!
मीडियाकर्मियों के मूल्यबोध भी समाज सापेक्ष होते हैं. उनकी आकांक्षाएं और आवश्यकताएं भी वैसी होती हैं, जैसी समाज के अन्य मध्यवर्गीय लोगों की. आजादी के बाद खास कर उदारीकरण से मध्यवर्गीय मानस में उपभोक्तावादी संस्कृति ने अपना स्थायी घर बना लिया है. उपभोक्तावाद की अंधी दौड में समाज, संस्था, सरकार के प्रति वैसी प्रतिबद्धता नहीं पायी जाती, जैसी कुछ दशक पहले थी. आज समाज के प्रति मीडिया की जितनी जिम्मेदारी है, उससे कम जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की नहीं है. प्रमाणिक रूप से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनेताओं का समाज बहिष्कार नहीं करता. झारखंड इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. राजनीतिक पार्टियां बाहुबलियों को टिकट देने से परहेज नहीं करती. इस प्रवृत्ति को आप सही मानें या गलत, लेकिन इतना तो साफ है कि भ्रष्टाचार को समाज पूरी तरह अछूत नहीं मानता. बल्कि पैसे के बल पर प्रतिष्ठा पाने की परंपरा भी विकसित हुई है. यह अकारण नहीं है कि हर्षद मेहता किसी समय युवाओं की पहली पसंद में शुमार थे. ऐसे माहौल में केवल मीडियाकर्मियों पर लानत लगाने से बेहतर उनकी स्थिति पर संवेदनशील तरीके से विचार करना भी जरूरी है.
हर सवाल को लौट कर अंततः घर तक ही आना है. क्षेत्रीय भाषाओं में काम करनेवाले एमए पास पत्रकारों की तनख्वाह कई बार दिहाडी मजदूरों से भी कम होती है.वे इस आस में कैरियर की शुरुआत करते हैं कि १८०० रुपये प्रतिमाह की तनख्वाह कभी उस आंकडे में बदल जायेगी, जो जीविका निर्वाह के लिए पर्याप्त होगा. विज्ञापनों और चौंकानेवाली खबरें प्राप्त करने की होड में उसके अपने आदर्श व मूल्य दबते चले जाते हैं, जिसकी ओर पेज-थ्री फिल्म इशारा करती है. फिर उसका पतन अंधेरे कुएं में कहां तक होगा, कहा नहीं जा सकता. उदाहरण के लिए प्रसिद्ध पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह ने बडे मनोयोग से समाज के सच को दिखाने के लिए एक मुहिम के तहत चैनल शुरू किया. लेकिन उनके जाने के चंद दिनों के बाद ही उनकी मुहिम मनोहर कहानियों के शक्ल में तब्दील हो गयी. हम वही दिखाते हैं, जो चलता है की अवधारणा दरअसल मीडिया की नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के समाज की सोच है. मीडिया के मूल्यों में आज भी उतनी गिरावट नहीं आयी है, जितनी की राजनीति और शासन की. महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के नेता समाज के एक तबके के खिलाफ विष वमन करते रहते हैं. फिर भी आला पुलिस अधिकारियों के घर में इसके नेता मुख्य अतिथि बनते फिरते हैं. कुख्यात अपराधी नेताओं को सिक्के से तौलते हैं, जनता ताली बजाती है लेकिन मीडिया इनमें कहां है! सच दिखाने पर राजनेताओं से लात खायेंगे, झूठ लिखेंगे तो जनता और मीडिया स्वयं कटघरे में खडा करेगी. ऐसे माहौल में करे, तो क्या करें! फिर कोई मीडिया कभी-कभी राजनीति से सांठ-गांठ कर राज्य सभा की राह पकड ही ले तो क्या बुरा है! विज्ञापन हासिल करने के लिए सरकारी अफसरों के कार्यक्रमों की थोडी तसवीर छप ही जाये, तो क्या बुरा है!
मीडिया लोकतंत्र के आधार स्तंभों में है. इस बात का खयाल द हिंदू और प्रभात खबर जैसे अखबारों को है, लेकिन प्रतिबद्ध पत्रकारिता की मिसाल लगातार कम होती जा रही है. इसमें बाहरी दबावों की भूमिका ज्यादा है. विश्वयुद्ध के समय ब्रेख्त ने लिखा था कि हमारा जब मूल्यांकन करना, तो उस अंधेरे को भी शामिल करना, जिसका सामना करने से तुम बच गये थे. आज मीडिया के मूल्य बदले जरूर हैं,किंतु इसका मूल्यांकन करते समय ब्रेख्त की बातों को जरूर याद करना चाहिए. मूल्यों की आवश्यकता राजनीति, शासन और समाज में भी उतनी ही है, जितनी कि मीडिया के लिए.
(लेखक भारतीय स्टेट बैंक, सिलीगुडी
में सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं)
03 जून 2008
मीडिया का नया आचरण : चिंता नहीं, चिंतन की जरूरत

अवनींद्र
मैं इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं
लगता है हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विकास की कहानी अभी अधूरी है. मीडिया के एक बडे वर्ग द्वारा रची गयी नयी आचार संहिता को देख कर तो ऐसा ही लगता. यह सच है कि आज हम सूचना क्रांति के युग में पहुंच गये हैं. सेटेलाइट और इंटरनेट ने पूरे विश्र्व को एक गांव में तब्दील कर दिया है. यह परिवर्तन बहुत हद तक सही भी है, क्योंकि जडता किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए शुभ नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि हम परिवर्तन के नाम पर क्या-क्या स्वीकार करेंगेङ्क्ष आज अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने उपभोक्ता संस्कृति का नया संसार रच दिया है. इस प्रवृत्ति ने मीडिया को भी बाजार केंद्रित बना दिया है. अब निजी हित उससे जुड गये हैं. खबर उसके लिए एक प्रोडक्ट है और पाठक व दर्शक उसके खरीदार. प्रोडक्ट को बेचने के लिए कोई भी हथकंडा गैरवाजिब नहीं होता. मसलन हर तरह के उपक्रम किये जा रहे हैं. जो जितनी जल्दी अपने प्रोडक्ट को लांचिंग करेगा और उसे लुभावने आकर्षक कलेवर में बाजार में उतारेगा, वह उतने ही ग्राहक जुटायेगा. इस होड ने मीडिया को नारद जी के खबर पहुंचाने से छापाखाना होते हुए ब्रेकिंग न्यूज तक पहुंचा दिया है. अब मीडिया का जोर सबसे पहले पर ज्यादा है, चाहे इसका परिणाम जो भी हो.
पिछले वर्ष अगस्त-सितंबर में दिल्ली में लाइव इंडिया नामक एक चैनल ने एक शिक्षिका उमा खुराना पर लडकियों को फांस कर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाया. चैनल ने बकायदा इसकी छद्म सीडी भी दिखायी. इस खबर के बाद उत्तेजित लोगों ने उस स्कूल में तोडफोड भी की, जहां यह शिक्षिका पढाती थी. बाद में जब मामले की जांच पडताल की गयी, तो शिक्षिका पर लगाये गये सारे आरोप बेबुनियाद निकले. लेकिन मीडिया ने उस शिक्षिका के चरित्र पर जो दाग लगाया, वह वक्त के पानी से भी शायद नहीं धुलेगा. यह घटना हमेशा उस शिक्षिका के चरित्र के आगे प्रश्नचिह्न उपस्थित करती रहेगी. इसी तरह पिछले दिनों एक चैनल ने दिल्ली के एक गांव में भूत-प्रेत की कथा गढी, जिससे लोगों में भय फैल गया. कुछ लोगों ने चैनल के खिलाफ सूचना प्रसारण मंत्रालय में शिकायत की. इसके बाद मंत्रालय ने उस चैनल को नोटिस जारी किया.
यह सिर्फ उदाहरण है. इस तरह की घटनाएं प्रायः अधिकतर खबरिया चैनलों की सनसनी हुआ करती हैं. हर रोज घृणा फैलायी जा रही है, अंधविश्र्वास को अलंकृत किया जा रहा है. यह दुष्परिणाम है उस बाजारवाद का, जिसने हमारी संवेदना को कुंद कर दिया है. उचित-अनुचित के विवेक को लहूलुहान कर दिया है. सामाजिक सरोकार पर निजी सरोकार हावी हो गये हैं. सर्जना की तमीज खत्म हो गयी है. लडकी के शीलहरण की खबर प्रसारित कर हर घंटे उसका शीलहरण किया जाता है.खबर परोसते वक्त यह भी ध्यान नहीं रखा जाता कि यह बच्चों की आंखों के सामने से भी गुजरेगी और ऐसी सामग्री परोसकर हम भविष्य के लिए विकृत और कुंठित समाज का निर्माण कर रहे हैं. किसी साहित्यकार की मृत्यु खबर नहीं बनती, जबकि सिने तारिकाओं के रोमांस के किस्से दिखाने में घंटो जाया किये जाते हैं.
मीडिया अपने पक्ष में अक्सर यह तर्क भी देता है कि हमारा पाठक-दर्शक वर्ग हमसे यही अपेक्षा करता है,तो हम क्या करें ङ्क्ष लेकिन पाठकों-दर्शकों में क्या यह दिलचस्पी मीडिया ने पैदा नहीं की. क्या उसने समय-समय पर उन अंकुरित होती आकांक्षाओं की जडों में खाद पानी नहीं डाला. अब तो स्थिति यह हो गयी है कि हर घंटे एक्सक्लूसिव परोसने के चक्कर में यह भी ध्यान नहीं रखा जाता कि इसकी विश्र्वसनीयता क्या है और इससे किसी के चरित्र की हत्या भी हो सकती है. हर क्षेत्र में पारदर्शिता की बात करनेवाले मीडिया की पारदर्शिता ही संदिग्ध लगती है. एक समय पत्रकारिता त्याग और समर्पण की चीज हुआ करती थी. लेकिन ऐसा लगता है कि पत्रकारिता के उन्नायकों ने जो नींव रखी थी, उस पर हम मजबूत इमारत खडी नहीं कर पाये. पत्रकारिता तो एक ऐसा हथियार है, जिसका उपयोग और दुरुपयोग दोनों हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि इन हथियारों का संचालक कौन है, उसके न्यस्त हित क्या हैं. आज इस हथियार का संचालन अधिकतर अपरिपक्व हाथों में है. हालांकि सामाजिक- सांस्कृतिक प्रदूषण के इस दौर में भी कुछ अखबारों ने अपनी विश्र्वसनीयता जरूर बचाये रखी है. उनके लिए पर्यावरण और मानव मूल्यों की रक्षा काफी अहम है. लेकिन उनका सामना इन परचूनी बनियों से है. ऐसे में वे कब तक अपने विश्र्वास को अक्षुण्ण रख पायेंगे. मीडिया को यह समझना चाहिए कि आज संदेश विस्फोट का युग है और व्यक्ति अपने तर्क से ज्यादा मीडिया से प्राप्त सूचनाओं और संदेशों पर भरोसा करता है. ऐसे में उसका दायित्व और बढ जाता है कि वह प्राप्त साधनों का इस्तेमाल सावधानी से करे. अगर यही स्थिति रही तो लोकतंत्र की पहरेदारी का दावा करनेवाले मीडिया पर से लोगों का भरोसा उठ जायेगा. आज मीडिया की जो स्थिति सोचनीय बनी हुई है, वह अवश्य बदल सकती है, बशर्ते कुछ लोग सन्नद्ध हों. मीडिया का एक वर्ग जो इन परिस्थितियों की मार खाकर चुपचाप कोने में खडा है, सामने आयेगा. किंतु जरूरत है कि प्रबुद्ध वर्ग जागरूक हो और वह चिंता के बजाय चिंतन करे.
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