11 फ़रवरी 2008

पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट :-



पाकिसतान में आज चुनाव है ऐसे हालात मे पाक पर एक नजरः-
करामत अली पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार है। पाकिस्तान की बदलती हालाते और बढ़ते सैन्यकरण को पाकिस्तान की जनता के हित में खतरे के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र का तकाजा है कि वह अपनी जनता को सुरक्षित रखे, उसके अधिकारो को सुरक्षित रखे। जनता को इस सुरक्षा का अहसास तभी हो सकता है जब पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंध हों देश की सीमाओं पर युध्द के खतरे कम हों और देश की सम्प्रभुता बरकरार रखी जाये। परंतु हाल के दिनों में पाक की सीमा और देश की आंतरिक शस्त्रीकरण और बढ़ता सैन्यकरण इस बात का संकेत है कि देश की स्थिति, मानवाधिकारों की स्थिति और लोकतंत्र की स्थिति बद से बद्तर हुई है।

पाक की स्थिति भारत से भी ज्यादा खराब है उसका अंदाजा हाल की कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है। इसका कारण यह है कि पाक की सेना देश में प्रत्यक्ष रूप में शासन कर रही है सेना का पूर्णता हस्तक्षेप पिछले कई वर्षों से रहा है, और बढ़ा है। इसका एक उदाहरण आप देखे तो बेनजीर भुट्टो की पीपुल्स पार्टी जब सत्ता मे आयी तो वह बहुमत में नहीं थी। अन्य छोटी पार्टिओं के सहयोग से ऐसा संभव हुआ। ऐसे अवसर पर पाक के आर्मी चीफ ने बेनजीर को डिनर पर बुलाया जिसमे सेना के सभी बडे़ हुक्मरान और उनकी बीबीयॉं भी शामिल थी। डिनर के वक्त आर्मी चीफ ने बेनजीर से कहा की शासन तो आप करिये पर तीन विभाग में कौन रहेगा यह हम तय करेंगें जो भी हो पर बेनजीर से यह बात मनवा ली गई पहला फॉरेंन अफेयर, दूसरा इंडिया पाक रिलेशन तीसरा फाइनेन्स ऑफिसर जाफरी रहेंगे । बेनजीर को खुद नही पता था की यह जाफरी है कौन? दरअसल जाफरी वल्र्ड बैंक के एक अधिकारी थे।
इस तरह पाक आर्मी के कब्जे में वित्त व्यवस्था किसी भी समय थी और है। जिससे वें मिलेट्राईजेशन और न्युिक्लयराइजेशन की बजट बढ़ाने में सफल रहे हैं। और देश की जी.डी.पी. का 6.5 व्यय सेना पर हो रहा है दूसरा अमेरिका को इससे ज्यादा मदद यह मिली की वल्र्ड बैंक का अधिकारी (अमेरिकी प्यादा) पाक का वित्त मंत्री रहा तीसरा अमेरिका को शस्त्र बेचनें में मदद मिली।
पाकिस्तान की सेना का सार्वजनिक उपक्रमों में भी पूरा हस्तक्षेप है देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति रिटायर्ड सेनाधिकारी हैं। समाज के हर सोरमे में सेना का हस्तक्षेप है और सेना-सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों को खत्म किया जाता है। विभाजन के बाद भारत पाक के ट्रेड युनियन एक जैसे थे पर पाकिस्तान के ट्रेड युनियन मे बदलाव आया है। पहले आर्मी में वे लोग यूनियन बना सकते थे जो वदीZधारी नही थे। जिनकी सेना मे एक बड़ी तादाद भी है पर अब वे यूनियन नहीं बना सकते हैं यहां तक कि जो लोग सेना से किसी भी तरह का सम्बध रखते हैं यूनियन नहीं बना सकते। अभी हाल में एक दिलचस्प वाकया घटित हुआ जिसमें कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। मामला यह था कि एक एक्वागार्ड कम्पनी के मजदूरो ने यूनियन बनाई थी जिसको कम्पनी ने कोर्ट में यह कहते हुए मामला दाखिल किया कि वह सेना को एक्वागार्ड सप्लाई करती है और नियमत: सेना से सम्बध्द कोई भी विभाग की यूनियन नही हो सकती। कारण वश फैसला कम्पनी के पक्ष में रहा ।
दुनिया का यह पहला देश होगा जहां रेलवे लाईनों की लम्बाईओं में कमी आयी है कारण पड़ोसी देशों का खौफ रहा है जिसका झूठा प्रचार पाक सरकार हमेशा करती रही है। जिससे देश के लोगों को भी रेलवे सुविधाए ठीक ढंग से मुहैया नही हो पाती। और रेलवे में भी जहां से आमीZ की ट्रेन गुजरती है वहां से सारे ट्रेड यूनियन खत्म किये गये हैं।
भारत और पाक दोनों देश यह कहते रहे हैं कि जंग नही करनी है मसले को शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जाना है इसके बावजूद दोनों देश नए हथियारों से लैस हो रहे हैं सेना की खर्च को बढ़ाया जा रहा है , परमाणु परीक्षण किये जा रहे हैं। भारत यदि 150 परमाणु शस्त्र रखने का दावा कर रहा है तो पाक कम-अज-कम 50 या उससे अधिक रखने का प्रयास में जुटा है। इसके पीछे क्या कारण हैं। यदि परमाणु बम पंजाब मे गिरता है तो ऐसा नही है कि वह केवल पंजाब में ही विध्वसं फैलायेगा उसका असर पाकिस्तान तक जायेगा क्योंकि बम कोई सीमा नहीं देखता और न ही किसी देश की सेना उसके प्रभाव को रोक पायेगी। कुल मिलाकर देश की जनता ही तबाह होगी जब कि ऐसा करने में दो चार बम ही काफी है फिर सौ क्या पचास क्या। और एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका फैसला लेने वाले दोनों देशो में पचास से भी ज्यादा लोग नही है जबकि अंजाम अरबों जनता को भुगतना होगा। यह कैसा लोकतंत्र है और कैसा न्याय है। अत: दोनों देशो को अपने सैन्य शस्त्रों को कम करना चाहिए और परमाणु निशस्त्रिकरण करना चाहिए। दरसल ये देश टेरर और वार के नाम पर यूरोप और अमेरिका की सेवा कर रहे हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा और हसीं भी आएगी की पाकिस्तान मे आज गरीब की परिभाषा इससे तय की जाती है कि किसके पास बंदूक नही है , रॉकेट लांन्चर नही है , बच्चे लेवर कर रहे हैं बिलो पॉवर्टी के नीचे है, इससे नही। गणतंत्र दिवसपर हम अपनी मिलेट्री पावर अस्त्र-शस्त्र का प्रदशZन करते हैं, न कि डेमाके्रसी में सुधार, मानवाधिकार किसानों की बदतर हालातों की चर्चा।
दूसरी बात डिफेन्स पर हो रहे खर्चे पर किसी भी संसद में बहस नही होती जो होनी चाहिए और सेना को कम किया जाना चाहिए। इस बार जब कांग्रेस सत्ता में आयी तो एक मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री का कहना था कि एक दो माह में सियाचीन से आमीZ हटा ली जाऐगी पर हुआ यूं कि एक दो हप्ते बाद आमीZ चीफ का बयान आया कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं कि सेना को हटाया जाये और तब से यथास्थिति बनी हुई है। हमें यह नही सोचना चाहिए कि जब आमीZ माशZल लॉ लगाती है तभी शासन करती है बल्कि जब इनके पावर और ये बढ़ते हैं तब भी शासन करते हैं। और श्रीलंका, बंग्लादेश, पाक, भारत सबके सेना की हालत एक जैसी है।
भारत पाक की स्थिति को देखे हुए ऐसा लगता है कि देश मे एक बडे़ जन आंदोलन की जरूरत है जिसके जरिये मिलेट्राइजेशन को कम किया जा सकता है और उस पैसे से देश की अन्य बदतर स्थितियो को सुधारा जा सकता है। सेना में आयात किये जाने वाले शस्त्रो का दस प्रतिशत कमीशन भी हटाया जाना चाहिए।

07 फ़रवरी 2008

कब लौटेंगे हुसैन अपने घरः-



93 साल के मकबूल फिदा हुसैन अपने-आप में एक चलता-फिरता इतिहास हैं. अपनी पेंटिंग्स पर उठे विवादों और उन पर चल रहे अदालती मामलों के बाद पिछले कुछ समय से उन्हें दुबई में रहना पड़ रहा है. इन विवादों को लेकर वो क्या सोचते हैं? अपने विरोधियों को कहने के लिए उनके पास क्या है? ऐसे कुछ सवालों को टटोलता शोमा चौधरी का लेख .


मकबूल फिदा हुसैन को भारत रत्न दिया जाए या नहीं, खबरिया चैनल एनडीटीवी द्वारा इस सवाल पर एसएमएस पोल चलाने के विरोध में 19 जनवरी को जब कुछ लोग चैनल के अहमदाबाद स्थित दफ्तर में तोड़फोड़ कर रहे थे तो ये फनकार दुबई स्थित अपने घर में उस्ताद अमजद अली खान के बेटे की शादी के निमंत्रण पत्र के लिए दो घोड़ों का स्केच बनाने में तल्लीन था. उनके ब्रश की आवाज कमरे में पसरी शांति को तोड़ने के बजाय और गहरा कर रही थी. हुसैन जब चित्रकारी कर रहे होते हैं तो उनके ध्यान में कोई भी चीज बाधा नहीं डाल सकती. उनकी जिंदगी के पिछले 70 साल चित्रों के भक्त के रूप में गुजरे हैं. इन 70 सालों में उन्होंने हिंदू दर्शन और संस्कृति को आत्मसात किया है. रामायण पर चित्रकारी करते हुए आठ साल बिताए हैं. महाभारत को भी इतना ही वक्त दिया है. हुसैन ने गणेश, शिव, पार्वती, हनुमान, राग, नाट्य और बनारस की सैकड़ों तसवीरें बनाई हैं. भारत के बारे में दुनिया की समझ को समृद्ध करने के लिए उन्होंने सारी दुनिया की यात्रा की है. उन्हीं हुसैन को अब धर्मविरोधी करार दे कर उनके नाम पर तोड़फोड़ की जा रही है.

हुसैन कहते हैं, “ये इतिहास का बस एक लम्हा है, क्या कर सकते हैं.” दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है .

हालांकि हुसैन के लिए निर्वासन कड़वा अनुभव नहीं क्योंकि ऐसा होना उनके विरोधियों की जीत और उनकी हार जैसा होगा. वो ठाठ और मजे के साथ जीने में यकीन रखते हैं. दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है जिसकी भव्यता देखते ही बनती है. इसके तीन कमरे उन्होंने अपनी कला को समर्पित किए हैं—एक कमरे में 1950 के दशक में बनाई गई पेंटिग्स रखी गई हैं. इनमें अपने आप में एक कहानी ‘मारिया कलेक्शन’ भी शामिल है. दूसरे कमरे में पेंटिंग्स की एक श्रंखला, जिसे वो ‘हुसैन डिकोडेड’ कहते हैं, मौजूद है. तीसरे में मुगले-आज़म पर आधारित पेंटिंग्स रखी गई हैं.

इन दो अपार्टमेंट्स के बीच हुसैन अपनी जिंदगी उस ऊर्जा, उत्साह और सक्रियता के साथ जी रहे हैं जो उनसे एक तिहाई उम्र के लोगों को भी शर्मिंदा कर दे. वो सुबह सात बजे उठते हैं और रात को दो बजे तक जागे रहते हैं. उन्हें शानदार कारों का शौक है और उनके बेड़े में फेरारी, बेंटली, जगुआर और सात करोड़ में खरीदी गई बुगाटी शामिल है. हुसैन हंसते हुए कहते हैं, “लोग मूर्तियां खरीदते हैं, मैं कारें खरीदता हूं.”

शरारत उनके खून में है. फिदा की पत्नी साहिबा कहती हैं, “जब चाचा घर पर होते हैं तो सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती.” हुसैन ने उन सबकी जिंदगी का कायाकल्प कर दिया है. फिल्में, पॉपकॉर्न, समारोह, मेहमान, महंगी जगहों पर भोजन, सस्ते रवि ढाबा पर दिन का खाना, एक मालाबारी होटल की चाय जैसी चीजों में ही उनका वक्त बीत रहा है.

पेंटिंग के इतर भी हुसैन सतत चलायमान रहते हैं. उनकी उंगलियां लगातार किसी काल्पनिक तबले पर थिरक रही होती हैं. वो एक दिन आबूधाबी में होते हैं तो दूसरे दिन कतर में. हर साल गर्मियों के महीने वो लंदन जाते हैं. इन दिनों वो अरबी भाषा भी सीख रहे हैं. इसके अलावा वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.

अकूत धनसंपदा का ये मालिक आज भी पहले की ही तरह अपने ड्राइंग रूम में बिछे एक साधारण गद्दे पर सोता है. हुसैन अकेले यात्रा करना पसंद करते हैं. 93 साल की उम्र के इस शख्स की शारीरिक फुर्ती और मानसिक क्षमता देखकर हैरत होती है. लगता है जैसे उन्हें कोई दिव्य वरदान मिला हुआ है.

हुसैन एक तरह से जीता-जागता इतिहास और राष्ट्रीय धरोहर हैं. जिस दिन एनडीटीवी के अहमदाबाद आफिस में बीस लोग तोड़-फोड़ करते हैं उसी शाम हम उस्ताद अमजद अली खान और उनके बेटों के संगीत आयोजन में जाते हैं. लोगों की भीड़ उन्हें ऐसे घेर लेती है जैसे वो एक फिल्म स्टार हों. बार-बार सुनने को मिलता है, “दुबई का सौभाग्य है कि आप यहां हैं.” लोग उन्हें छूने, उनका ऑटोग्राफ लेने और उनके साथ फोटो खिंचवाने की कोशिश करते हैं. उस्ताद के सरोद का संगीत अब भी माहौल में गूंज रहा है. कुछ देर पहले हमने उनकी गणेश वंदना का आनंद लिया है. विविधताओं से बनी भारत की जिस मजबूत संस्कृति पर हम गर्व करते हैं वो ऐसे ही लोगों में बसती है. इस माहौल में भी रह-रहकर भारत में हो रही घटनाओं पर ध्यान चला जाता है. बाद में मालाबार रेस्टोरेंट में चाय पीते हुए हुसैन इस बारे में मानो कुछ सोचते हुए कहते हैं, “गालिब ने एक बार बहुत परेशान होकर कहा था कि या तो मेरे श्रोताओं को समझ दे या फिर मेरी आवाज बदल दे.” वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.


हुसैन की आत्मकथा ‘अपनी जबान में’ में एक घटना है. एक बच्चा मिट्टी से खेलता हुआ कुछ आकृतियां बना रहा है. मक़बूल नाम का एक नौजवान आता है और इन्हें चटख रंगों में रंग देता है. कोई भी इन आकृतियों में दिलचस्पी नहीं लेता. इसके बाद एम एफ हुसैन नाम का एक शख्स आता है और उन पर अपने हस्ताक्षर कर देता है. अचानक ही आकृतियों को खरीदने के लिए भीड़ टूट पड़ती है. हुसैन कहते हैं, “तीनों पात्र मैं ही हूं. कला की कीमत बढ़ाने के लिए मैंने एम एफ हुसैन को सोचसमझकर एक ब्रांड के रूप में तब्दील किया. मैं चाहता था कि कला के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़े. मेरे लिए ये एक मिशन था.”

एम एफ हुसैन ब्रांड को लोगों ने हाथों-हाथ लिया. कला के बाजारीकरण से कई नाराज भी हुए मगर इसने भारतीय कला को विश्व स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई. 90 के दशक में जब हुसैन ने अपनी एक कलाकृति का मूल्य 40 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये किया था तो लोगों ने इसे आत्मघाती कदम बताया. आखिर में जीत हुसैन की ही हुई और ये पांच लाख रुपये में बिकी. अगली बार उन्होंने अपने काम की कीमत पांच लाख लगाई, फिर दस लाख और इसके बाद आया एक करोड़ का मुकाम. इसे कामयाब बनाने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने इस आयोजन को सिटीबैंक से प्रायोजित करवाया और चुनिंदा दर्शकों को ही आमंत्रित किया. फिर उन्होंने एक तमाशा किया. संगीत की धुन और नर्तकों के थिरकते कदमों के बीच उनका कैनवास मखमल के किसी पर्दे की तरह लहराते हुए नीचे आया. इससे पहले वो ऐसा ही तामझाम भरा एक आयोजन वो माधुरी दीक्षित के साथ कर चुके थे. हुसैन कहते हैं, “मैंने माधुरी से पूछा कि क्या वो भारतीय कला को मशहूर बनाने के मिशन में मेरा साथ देंगी. आयोजन में हमने रंगों से पोता हुआ एक सफेद घोड़ा रखा हुआ था. शानदार लिमोजीन में बैठकर हम जानबूझकर आयोजन में देर से आए. लोगों को ये तमाशा खूब पसंद आया.”

हंसते हुए हुसैन कहते हैं, “लेकिन मैंने खुद को बचाए रखा है. मेरे भीतर वो बच्चा और चित्रकार मकबूल अब भी जिंदा है. मकबूल के बिना एम एफ हुसैन का वजूद नहीं होता.”

हुसैन के एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है. बतौर कलाकार मैं अपनी ऊंचाई 1950 के दशक में छू चुका हूं. मेरा बाकी का काम उसी का प्रतिबिंब है. जब मेरी बीवी फाज़िला का भाई बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चला गया तो कई दशक तक मैंने उससे कोई संपर्क नहीं रखा. मैं हमेशा से राष्ट्रवादी रहा हूं. मगर मुझे जगहों से कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता. मां का प्यार आपके दिल में घर का अहसास पैदा करता है...आपको बांधकर रखता है. मैं बस डेढ़ साल का था जब मेरी मां चल बसी इसलिए मैंने इस तरह का लगाव भी कभी महसूस नहीं किया. मेरा पहला बच्चा शब्बीर तीन साल की उम्र में ही चल बसा. मैंने खुद एक गटर से उसकी लाश बाहर निकाली. इसके बाद खोने के लिए बाकी क्या रह जाता है.”

हुसैन के विचारों से आपको एक तरह की बुद्धिमत्ता की झलक मिलती है. इस उम्र में भी उनके भीतर खुद को दूसरी जगह जमाने और जिंदगी को फिर से गढ़ने की हिम्मत है. वो इसे इतना आसान बना देते हैं कि आपको ये बात बहुत हल्की लग सकती है. एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है.

लेकिन अगर सिर्फ एक निगाह भर डालें तो उनके निर्वासन से जुड़ा बेतुकापन खुलकर सामने आ जाता है. यहां एक ऐसा व्यक्ति है जिसने लगभग एक सदी से भारत के हर पक्ष को बहुत नजदीक से देखा है. 1955 तक वह एक स्थापित कलाकार हो चुके थे और पद्मश्री से सम्मानित भी. 1971 तक उन्हें साओ पाओलो में पाब्लो पिकासो के साथ आमंत्रित किया जाने लगा था. 1986 में वह राज्यसभा सांसद भी बने. और ये सब महज ऊपर-ऊपर की बातें हैं—अगर ये सोचा जाए कि उन्होंने भारत के हर छोटे-बड़े रंग को 10,000 से ज्यादा चित्रों में उकेरा है तो ये बेतुकापन बिल्कुल नग्न हो जाता है.

एम एफ हुसैन एक चलता-फिरता इतिहास है. एक राष्ट्रीय धरोहर. और हमने उन्हें क्या दिया? देशनिकाला.

दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा. डॉ. सिंह निहायत ही गर्ममिजाज आदमी हैं. बात शुरू करते ही वो फट पड़े, "मैं आप जैसे लोगों को अच्छी तरह जानता हूं. आप मुझसे सवाल क्यों पूछ रही हैं? आप लोग हमेशा हमें लतियाने की फिराक में रहते हैं." मैंने कहा, "आप किस 'हम' की बात कर रहे हैं डॉ. सिंह? मैं भी एक हिंदू हूं. ठीक है आप हुसैन से सहमति नहीं रखते हैं, लेकिन आप एक पढ़े-लिखे आदमी हैं इसलिए मैं सिर्फ इतना पूछना चाहती हूं क्या आप लोग ऑफिसों में तोड़फोड़, कला दीर्घाओं में आगजनी रोक नहीं सकते हैं. क्या आप तांत्रिक कला की परंपरा के बारे में नहीं जानते और कृष्ण राधा, शिव पार्वती के कामुक प्रेम चित्रण को बताने की जरूरत नहीं है..." आप मुझे पढ़ा लिखा आदमी कह रही हैं? आप लोग हमेशा हमें गालियां देते हैं.. मुझसे सवाल पूछने वाली आप होती कौन हैं? मैं आपसे तंत्र या फिर किसी चीज़ के बारे में बात नहीं करूंगा. आप लोग हमारे साथ सम्मान के साथ क्यों नहीं रहते? आप जैसे लोग इस देश में सिर्फ एक फीसदी हैं, हम आपके साथ भी वही करेंगे...”

डॉ. सिंह की याचिका हुसैन के खिलाफ उन सात याचिकाओं में शामिल है जिनकी जानकारी हुसैन के वकील अखिल सिब्बल को है. सबको एक में ही दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समाहित कर दिया गया है. सिब्बल ने बताया, "इसके अलावा अब मेरी जानकारी में उनके खिलाफ कोई और अदालती कार्रवाई नहीं चल रही है. लेकिन अक्सर हमें इसके बारे में जानकारी मीडिया के जरिए ही मिलती है."

हुसैन ने 2006 में उस वक्त हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया था जब दक्षिणपंथियों के हमलावर रुख के बाद हरिद्वार की कोर्ट ने उनके खिलाफ ग़ैर ज़मानती वारंट जारी कर दिया था और इसमें भारत के भीतर उनकी सभी संपत्तियों की कुर्की का निर्देश भी था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी लेकिन बीते साल में ही हुसैन की पेंटिंग्स का कई हिंसक विरोधों से सामना हो चुका है. 2006 में लंदन के एशिया हाउस में आयोजित एक प्रदर्शनी में एक कट्टरपंथी हिंदू गुट ने जमकर तोड़फोड़ मचाई. यही कहानी अमेरिका के पीबॉडी एसेक्स संग्रहालय में लगी उनकी महाभारत श्रृंखला की पेंटिग्स के साथ भी दोहराई गई. ऐसा ही कुछ पिछले साल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में देखने को मिला जब केरल सरकार को दबाव में राजा रवि वर्मा पुरस्कार स्थगित करना पड़ा. मई 2007 में एबीएन एमरो बैंक को भी दबाव में अपने प्लेटिनम क्रेडिट कार्ड से हुसैन की कृति हटानी पड़ी. एक डरावने और बेतुके घटनाक्रम में लखनऊ में एक स्वघोषित हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड ने हुसैन का सिर लाने वाले को 51 करोड़ रूपये, आंखों के लिए 11 लाख और हाथ के बदले एक किलो सोना इनाम में देने की घोषणा की. एनडीटीवी के ऑफिस पर हमला इसी श्रंखला की ताज़ा कड़ी है. दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा.

अगर डॉ. राम प्रताप सिंह की जबान में ही बोला जाए तो ऐसे लोग भारत की आबादी का दशमलव कुछ फीसदी हिस्सा भी नहीं है. और भावनाओं का अनियंत्रित उफान भी नहीं है. उदाहरण के तौर पर गुजरात मामले को ही लें. बेरोजगार, कुंठित और बजरंग दल द्वारा दुत्कार दिया गया अशोक शर्मा किसी भी तरह से नाम कमाना चाहता था. अहमदाबाद के संयुक्त पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा भी इसका समर्थन करते हुए उसे ‘आवारा’ बताते हैं. इंटरनेट पर भी ये अभियान सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है लेकिन इसके बाद भी इस तरह की खुराफातों में हिस्सा लेने वाले लोग गिनती के ही हैं. तरस खाने वाली बात ये है कि ये गिने चुने, असहिष्णु, किसी तरह की बात में विश्वास न रखने वाले और क़ानूनों की बेशर्मी से धज्जी उड़ाने वाले लोग ही हमारे सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने लगे हैं. और इन मामलों में कोई भी गिरफ्तारी नहीं होती जबकि सिब्बल बताते हैं कि राज्य, कोर्ट और पुलिस के पास सिर्फ शक्तियां ही नहीं है बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी बनती है कि उनकी जानकारी में क़ानूनों का उल्लंघन करने की बात आए तो तो खुद-ब-खुद हस्तक्षेप करें. इस मसले पर हमने बीजेपी के अरुण जेटली से राय जानने की कोशिश की मगर उनका कहना था कि मीडिया से बात करना बंद कर रखा है. कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी से पूछिए आपको रटी रटाई लाइन सुनने को मिलेगी, “हुसैन के महत्व पर किसी को शक नहीं है, लेकिन भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सबको विरोध और असहमति जताने का हक़ है. उनका शोषण नहीं होना चाहिए आदि...“ जहां तक सड़क पर जो हिंसा होती है उसका क्या? “अगर कोई ग़लत काम करते पकड़ा जाता है तो निश्चित रूप से उसे गिरफ्तार करना चाहिए लेकिन क़ानून व्यवस्था का मसला राज्य सरकार के जिम्मे है”

अपनी तरह का विशिष्ट और हाईप्रोफाइल मामला होने की वजह से हुसैन का निर्वासन देश के सामने भी चुनौती बन गया है. तस्लीमा नसरीन, सलमान रश्दी, तैयब मेहता, अकबर पद्मसी, मृदुला गर्ग, हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, दीपा मेहता... हिंदू और मुस्लिम असहिष्णु गुटों द्वारा सताए गए लोगों की गिनती करते करते उंगलियों में दर्द होने लगता है. कलाकारों के ऊपर बातचीत के जरिए नहीं बल्कि मारपीट के जरिए प्रतिबंध थोपा गया. खुद तहलका भी प्रतिष्ठित छायाकार रघु राय की एक नग्न महिला की फोटो प्रकाशित करने के आरोप में मुंबई में इसी तरह के एक मामले का सामना कर रही है. हर बार जब सुनवाई होती है प्रधान संपादक को कोर्ट में हाज़िर होकर फिर से ज़मानत करवानी पड़ती है.

इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए? एम एफ हुसैन 2006 में तब प्रमुखता से ख़बरो में आ गए जब उनकी एक बिना नाम वाली पेंटिंग जिसमें एक नग्न युवती के रूप में देश का चित्रण किया गया था, का प्रदर्शन शैरोन एपारोस सैफ्रोनॉर्ट द्वारा किया गया. एक निष्पक्ष आदमी के लिए ये प्रेरक और सुंदर काम था. कुछ हिंदू गुटों ने इस पर हल्ला मचाना शुरू कर दिया. हुसैन को केरल अवार्ड दिए जाने का विरोध करने वाले रवि वर्मा बताते हैं, "हुसैन ने ये काम देश के 80 करोड़ हिंदुओं और इसके अलावा विदेशों में बसने वाले लाखों हिंदुओं की भावनाओं को जानबूझ कर चोट पहुंचाने की नीयत से किया है." ये पूछना ही बेकार है कि इतनी बड़ी संख्या की भावनाओं के बारे में वो कैसे दावा कर सकते हैं. सिब्बल के शब्दों में, "भारत माता पर किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं है और क़ानूनों के मुताबिक खुद वर्मा के आरोप सांप्रदायिक और विभाजनवादी हैं."

इसके अलावा हुसैन द्वारा 1988 में बनायी गई सरस्वती पेंटिंग पर रूढ़िवादियों ने भौहें तरेरी थी. इसे निजी रूप से ही खरीदा गया था और इसका प्रकाशन भी टाटा स्टील द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के सीमित संस्करणों में ही हुआ था. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जिस हद तक उत्तेजना का पुट होता है इस पेंटिंग में उसका एक चौथाई भी नहीं है. लेकिन अगर आप इस बात को कुछ देर के लिए छोड़ भी दें तो भी अश्लीलता पर जब हम बहस करते हैं तो एक अहम सवाल उठता है कि ये किस सीमा तक सार्वजनिक है? हुसैन का मामला हो, या किसी कलाकार का इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए?
, वो अपना काम आपके ऊपर थोपते नहीं हैं, वो अपने काम का प्रचार बड़ी बड़ी होर्डिंग्स के सहारे नहीं करते जिनसे आपका सामना हर दिन होता है और आपके पास और भी विकल्प होते हैं. छोटी सी बात है, अगर आपको उनका काम पसंद नहीं है तो उसे मत देखिए. गैलरी में मत जाइए, किताबें मत खरीदिए. किसी समान विचारधारा वाले मीडिया में इसके खिलाफ अपने लेख प्रकाशित कीजिए. ये विरोध का एक सभ्य तरीका हो सकता है.

एक कलाकार या लेखक की तमाम जिम्मेदारियों में एक काम ये भी है कि वो समाज के विचारों की सीमा को आगे बढ़ाए. अगर उन्हें इस तरह से दबाया जाएगा तो फिर सारी कलाधर्मिता रुक जाएगी. खुशी की बात ये है कि बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने बारीकी से आम ज़िंदगी में अश्लीलता का निर्धारण करने की कोशिश की है. रंजीत डी उदेशी बनाम महाराष्ट्र सरकार(1965), अजय गोस्वामी बनाम भारत सरकार(2005), समरेश बोस बनाम अमल मित्रा(1985) जैसे तमाम मामलों में अदालत ने ये राय दी है कि कला में सेक्स और नग्नता को अश्लीलता के दायरे में नहीं रखा जा सकता, न ही भद्देपन की समानता अश्लीलता से की जा सकती है. सिर्फ उन स्थितियों को, जिनमें जानबूझकर किसी का चरित्र बिगाड़ने या फिर भ्रष्ट करने की कोशिश की गई हो या कामुकता को भड़काने और दर्शक की यौन भावनाओं को उघाड़ने की कोशिश हो, ही अश्लीलता के दायरे में रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता की सीमा निर्धारित करने में वो अतिसंवेदनशील व्यक्तियों की सोच को इस्तेमाल नहीं कर सकता.

इसके पीछे का आशय काफी मायने रखता है. इन उदाहरणों के आगे हुसैन के खिलाफ मामले कहीं खड़े नहीं हो सकते. 10,000 कैनवास के जखीरे में बमुश्किल तीन पेंटिंग विवाद में हैं. क्या उनका मकसद अपमान करने का है? बजाय इसके उनका संपूर्ण काम ही उनके समर्पण को दर्शाता है. कला इतिहासकार अल्का पाण्डेय कहती हैं, "हुसैन असली मास्टर है. चित्र उकेरने की उनकी विशिष्ट कला, उनका बड़े पैमाने पर किया गया काम, खुद ही सीखने का गुण--ये सब अतुलनीय हैं. जहां तक कामुकता का सवाल है तो ये हमेशा से हमारे दर्शन और सौंदर्यप्रधान संस्कृति का हिस्सा रहे हैं. हुसैन इसी मिट्टी में सांस लेकर बड़े हुए हैं. उनकी कला भी इसी का नमूना है. उनका विरोध लज्जाजनक है.” ऐसा समर्थन उन्हें खूब मिलता है लेकिन इसका तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि कोई उनकी लड़ाई को लड़ने के लिए आगे नहीं आता. हुसैन खुद कुछ नहीं कहेंगे. वो एक उक्ति पर जीते हैं, “न कोई सफाई, न कोई बुराई”

25 जनवरी 2008

संविधान में मौलिक अधिकारों की प्रासंगिकता-


संविधान को लागू हुये 58 वर्ष बीत चुके है तब से तीन थके हुये रंगों को एक पहिया ढो रहा है। हर वर्ष 26 जनवरी को परेडों और जुलुसों के बीच राष्ट्र की संमप्रभुता और संविधान में प्रदत्त नागरिक अधिकारों का गुणगाण किया जाता है। पर इतने वर्षो बाद आम जन को ये अधिकार कितने मिल पायें है इसके विष्लेषण की जरूरत हैं। 1789 में मानवाधिकारों या मौलिक अधिकारों कों अपने नागरिकों के लिए सुनििष्चत करने वाला पहला राज्य फ्रांस था। भारतीय संविधान में नागरिकों के 7 मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12 से 35 तक वणीZत किये गये है। परंतु 1975 के 44 वे संषोधन में संपत्ति का अधिकार समाप्त होने के बाद 6 अधिकार ही बचे। और इन अधिकारों क® लेकर 13 के खंड 2 मेें इस बात का वर्णन किया गया है कि राज्य कोइ भी ऐसा कानून नहीं बनायेगा जो इन अधिकारों को छीनती है या कम करती है और बनायी गयी प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक षून्य होंगी। भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को जो अधिकार प्रदत्त किये गये उनकी कुछ सीमायें थी, सीमायें ही नहीं वरन उनमें इस तरह की व्यवस्था रखी गयी कि राज्य का कोई हस्तक्षेप न होते हुये भी राज्य की इच्छा के अनुरूप ही यह अधिकार मिल सके और नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन होता रहा।

समानता का अधिकार
अनुच्छेद 14 से 18 में नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। जिनमें कई तरह की समानता नागरिकों को देने की बात कहीं गयी है। इनमे कानूनों के समक्ष समानता, अवसर की समानता, सामाजिक समानता, अस्पृष्यता का निषेध, उपाधियों का निषेध आदि षामिल है। पर गौर करने की बात यह है कि संविधान में वणिZत दिखावे की यह समानता है। आज भी समाज में वर्चस्ववादी वर्ग के लोगों का ही बोलबाला है। समाज में अवसर लाभ उसी को मिलता है जिसका समाज में वर्चस्व है। व्यवस्था में षिर्षस्थ स्थान पर वही लोग बैठे है जो पीढी दर पीढी से सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल रखे हुयें है। ऐसी स्थिती में आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी सामाजिक परिस्थितीयों ने दमित व षोषित वर्ग को वंचित ही बनाके रखा है। थोडे बहुत परिवर्तन यदि आये भी तो उन्ही के पास जिन्होने इस वर्चस्ववादी जन से समझौता किया है। पर वे परिवर्तन कहीं से भी अस्पृष्यता निषेध या जातिविहीन समाज बनाने में मददगार साबित नही लगते।

स्वतंत्रता का अधिकार
मूल संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को जो स्वतंत्रतायें प्रदान की गयी। जिनमें विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण संमेलन, संघ तथा समुदाय बनाना, देष में कही भी भ्रमण, देष के किसी भी क्षेत्र मे निवास तथा व्यापार व व्यवसाय की स्वतंत्रता है। परंतु नागरिकों को ये स्वतंत्रता प्रदान करने के बाद कुछ प्रतिबंध भी लगाये गये यदि कोई व्यक्ति राज्य की सुरक्षा, विदेषी राज्यों से मैत्रिपुर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, षिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय अवमानना, मानहानि या अपराध या फिर 1963 के 16 वे संषोधन में एक नया प्रतिबंध जोडा गया कि किसी क्षेत्र को भारत से अलग करने की मांग कोई करता है तो उसपर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इन प्रतिबंधों के बाद अब ऐसा कुछ भी व्यक्त करने को नहीं बचता जिसके लिए आप स्वतंत्र है, और जो बचता है वह है राज्य की इच्छा की अनुरूप अभिव्यक्ति या राज्य की पक्षधरता अन्यथा इनकी व्याख्या करके राज्य किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है यदि वह उसके उनुरूप न हो। अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण सम्मेलनों की व्याख्या राज्य किन रूपों में करेंगी। इसका कोई आधार नहीं है। लाठी या डंडे को अस्त्र माना जा सकता है। परंतु एके 47 लेकर रैलियों में सामूहिक प्रदषZन और गोलीबारी करने पर कोई प्रतिबंध नही लगता जैसा की पिछले दिनों उत्तर प्रदेष मेें मायावती सरकार की जीत के जष्न में उनके एक विधायक ने किया था।

शोषण के विरूद्ध अधिकार
अनुच्छेद 23-24 में वणिZत ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा को सुनिष्चत करने के लिए बनायें गये हैं जिसके पीछे कारण यह था कि भारत में बेगार लेने या मजदूरों को गुलाम बनाने की प्रथा थी। परंतु जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने के लिए रोटी, कपडा और प्रश्रय के अभाव में एक बडी जनसंख्या जी रही है। जो पहले दास के रूप में गुलाम बनकर अपना जिवन यापन करती थी। आज उसका स्वरूप थोडा बदल गया है। औद्योगिकरण के बाद उन दास का केंद्रीकरण हुआ है और वे किसी कंपनी में पूंजी घराने के दास बने हुये हैं और अपने श्रम को सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर हैं। जिसका मुनाफा उस निजी पूंजी घराने को जा रहा है। यही नहीं दूर दराज के गांव में आज भी यह व्यवस्था थोडे बहुत परिवर्तनों के साथ मौजूद है और मजदूर के रूप में सामंतों की जमीनों की जोत के बदले एक बडा तबका दास बनने को अभिसप्त है। यह अधिकार संविधान की किताब में लिखे चंद हफोंZ के अलावे कुछ नहीं दिखते।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 25 से 28 तक दिए गये इन अधिकारों में नागरिकों को किसी भी धर्म को अंगीकार करने तथा उसके प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी। जिसमें यह भी बात कही गयी थी कि उस नागरिक को राज्य कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता जो किसी विषेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विषेष रूप से सुनििष्चत किया हो। जिसका परिणाम यह हुआ की एक बडा व्यवसायी व संपन्न वर्ग इसकी आड में पूंजी का केंद्रीकरण करता रहा तथा आम जनता को धार्मिकता से ओतप्रोत करता रहा। जिसका फायदा आगे उठाकर धार्मिक कट्टरपंथियों ने लोगों की धार्मिक संवेदनाओं को सांप्रदायिकता के हद तक पहुचाया। लोगों को अपने धर्म के प्रति कट्टर बनाया और ताकिZक चिंतन और वैज्ञानिक चिंतन की परंपरा को भी कुंद करने का काम किया। कारणवष धर्म और धर्मगं्रथों में वणिZत व्यवस्थायें जो सामंती समाज आधारित थी उनको भी पुष्टी मिली और समाज में वर्णव्यवस्था वा विषमता को बरकरार रखने को बल मिला। सांप्रदायिक दंगों को भी अपरोक्ष रूप से आधार प्रदान किया गया और अल्पसंख्यकों के हितों का अनदेखा होता रहा।

संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकार
अनुच्छेद 29-30 में संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकारों का मूल उद्देष्य था कि अल्पसंख्यकों को इस बात से आष्वस्त करना कि उनके मामले में किसी भी प्रकार का अनावष्यक एवं अनुचित हस्तक्षेप नही किया जायेगा तथा भारतीय संघ किसी भी आधार पर भेदभाव नही करेगा। परंतु देष की सत्ता में विराजमान अधिकांषत: व सत्ता चरित्र के मुताबिक अपनी संस्कृति का निर्माण किया गया जो व्यवस्था को किसी भी रूप में स्थायित्व प्रदान कर सके। विभिन्न पार्टीयों ने वोट की राजनीति के लिए अपने हित के अनुरूप संस्कृति बनायी और उसे पोषित किया। पूंजी के इस युग में लोककला-संस्कृति को तरजीह देने के बजाय साम्राज्यवादी संस्कृति के रूप में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास किया गया। गुजरात में आज यदि अल्पसंख्यक के रूप में रह रहा मुस्लिम इतना भयभीत है कि वह गाडी, दुकान में हिंदू देवों की मुर्तिया लगा रहा है, अपने वेषभूषा को हिंदुओं के मुताबिक ढाल कर चलने को मजबूर है। तो उसके मौलिक अधिकार कहां है और उनकी रक्षा करने वाला कौन?

संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अनुच्छेद 32 से 35 को अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा जिसके अंतर्गत न्यायपालिका- व्यवस्थापिका व कार्यपालिका की ऐसे सभी काननों और कार्याे को असंवैधानिक घोषित कर देगी जो मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप से प्रतिबंधित करते है। किंतु गौरतलब बात यह है कि न्यायपालिका में बैठा हुआ न्यायाधीष वर्तमान लोकतंत्र के फासीवादी चरित्रपर सिर्फ नकाब पहना रहा है। जबकि इन अधिकारों का हनन करने वाले कितने ऐसे कानूनों- पोटा, आस्पा, छत्तीसगढ जनसुरक्षा अधिनियम आदि बनाये गये है। और हाल के कई फैसलों ने यह सिद्ध किया है कि न्यायपालिका-कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के कायोZं पर परदा डाल कर लोकतंत्र या जनता पर न्यायपूर्ण षासन का ढोंग कर रही है।

24 जनवरी 2008

शामिलः-

हाशिया वाले रेयाज भाई की यह कविता आज के समय में लिखे जा रहे साहित्य से हट कर छत्तीसगढ़ के समय और संघर्ष को व्याख्यायित करती है| जब छत्तीसगढ़ में जनसंघर्ष चल रहा है, या यूं कहें की युद्ध चल रहा है, ऐसी स्थिती में छत्तीसगढ़ के लेखक अपनी भाषा के गुल खिला रहें है, और चटकारे लेकर लिख रहें है, उनकी पक्षधरता भी दिख रही है, किसी घटना पर कुछ न बोलने की| चाहे वह सलवा जुडुम हो या विनायक सेन की गिरफ्तारी, शायद उन्हे डर है सत्ता से सम्मान खोने का, उन्हे परहेज है जनपक्षधर हो के लिखने का| ऐसे में रेयाज की यह कविता उनके लिये जबाब भी हो सकती है की सिर्फ लेखक बने रहने के लिये लिखना और अपने समाज काल की स्थितियों और अभिव्क्तियों से लोगों को वाकिफ कराना दोनों में अंतर है...रेयाज की साहसशील लेखनी को सलाम


तुम कहोगी
कि मैं तो कभी आया नहीं तुम्हारे गांव
सलीके से लीपे तुम्हारे आंगन में बैठ
कंकडों मिला तुम्हारा भात खाने
लाल चींटियों की चटनी के साथ
तो भला कैसे जानता हूं मैं तुम्हारा दर्द
जो मैं दूर बैठा लिख रहा हूं यह सबङ्क्ष

तुम हंसोगी
मैं यह भी जानता हूं

तुम जानो कि मैं कोई जादूगर नहीं
न तारों की भाषा पढनेवाला कोई ज्योतिषी
और रमल-इंद्रजाल का माहिर
और न ही पेशा है मेरा कविता लिखना
कि तुम्हारे बारे में ही लिख डाला, मन हुआ तो

मैं तुम्हें जानता हूं
बेहद नजदीक से
जैसे तुम्हारी कलाई में बंधा कपडा
पहचानता है तुम्हारी नब्ज की गति
और सामने का पेड
चीन्ह लेता है तुम्हारी आंखों के आंसू

मैं वह हूं
जो चीन्हता है तुम्हारा दर्द
और पहचानता है तुम्हारी लडाई को
सही कहूं
तो शामिल है उन सबमें
जो तुम्हारे आंसुओं और तुम्हारे खून से बने हैं

दूर देश में बैठा मैं
एक शहर में
बिजली-बत्तियों की रोशनी में
पढा मैंने तुम्हारे बारे में
और उस गांव के बारे में
जिसमें तुम हो
और उस धरती के बारे में
जिसके नीचे तुम्हारे लिए
बोयी जा चुकी है बारूद और मौत

सुना कि तुम्हारा गांव
अब बाघों के लिए चुन लिया गया है
तुमने सुना-देश को तुम्हारी नहीं
बाघ की जरूरत है
बाघ हैं बडे काम के जीव
वे रहेंगे
तो आयेंगे दूर देश के सैलानी
डॉलर और पाउंड लायेंगे
देश का खजाना भरेगा इससे

सैलानी आयेंगे
तो ठहरेंगे यहां
और बनेंगे इसके लिए सुंदर कमरे
रहेंगे उनमें सभ्य नौकर
सुसज्जित वरदी में
आरामदेह कमरों के बीच
जहां न मच्छर, न सांप, न बिच्छू
बिजली की रोशनी जलेगी
और हवा रहेगी मिजाज के माफिक

...वे बाघ देखने आयेंगे
और खुद बाघ बनना चाहेंगे
तुम्हारे गांव में कितनी लडकियां हैं सुगना
दस, बीस, पचास
शायद नाकाफी हैं उनके लिए
उनका मन इतने से नहीं भर सकेगा

जो बाघ देखने आते हैं
उनके पास बडा पैसा होता है
वे खरीद सकते हैं कुछ भी
जैसे खरीद ली है उन्होंने
तुम्हारी लडकियां
तुम्हारा लोहा
तुम्हारी जमीनें
तुम्हारा गांव
सरकार
...वह जमादार
जो आकर चौथी बार धमका गया तुम्हें
वह इसी बिकी हुई सरकार का
बिका हुआ नौकर है
घिनौना गोखरू
गंदा जानवर
ठीक किया जो उसकी पीठ पर
थूक दिया तुमने

आयेंगे बाघ देखने गाडियों से
चौडी सडकों पर
और सडकें तुम्हारे बाप-दादों की
जमीन तुमसे छीन कर बनायेगी
और तुम्हारी पीठ पर
लात मार कर
खदेड देगी सरकार तुम्हें
यह
तुम भी जानती हो

पर तुम नहीं जानतीं
दूसरी तरफ है बैलाडिला
सबसे सुंदर लोहा
जिसे लाद कर
ले जाती है लोहे की टेन
जापानी मालिकों के लिए
अपना लोहा
अपने लोहे की टेन
अपनी मेहनत
और उस पर मालिकाना जापान का

लेकिन तुम यह जानती हो
कि लोहा लेकर गयी टेन
जब लौटती है
तो लाती है बंदूकें
और लोहे के बूट पहने सिपाही
ताकि वे खामोश रहें
जिनकी जगह
बाघ की जरूरत है सरकार को

सुगना, तुमने सचमुच हिसाब
नहीं पढा
मगर फिर भी तुम्हें इसके लिए
हिसाब जानने की जरूरत नहीं पडी कि
सारा लोहा तो ले जाते हैं जापान के मालिक
फिर लोहे की बंदूक अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे की टेन अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे के बूट अपनी सरकार के पास कैसे

जो नहीं हुआ अब तक
जो न देखा-न सुना कभी
ऐसा हो रहा है
और तुम अचक्की हो
कि लडकियां सचमुच गायब हो रही हैं
कि लडके दुबलाते जा रहे हैं
कि भैंसों को जाने कौन-सा रोग लग गया है
कि पानी अब नदी में आता ही नहीं
कि शंखिनी और ढाकिनी का पानी
हो गया है भूरा
और बसाता है, जैसे लोहा
और लोग पीते हैं
तो मर जाते हैं

तुम्हारी नदी
तुम्हारी धरती
तुम्हारा जंगल
और राज करेंगे
बाघ को देखने-दिखानेवाले
दिल्ली-लंदन में बैठे लोग

ये बाघ वाकई बडे काम के जीव हैं
कि उनका नाम दर्ज है संविधान तक में
और तुम्हारा कहीं नहीं
उस फेहरिस्त में भी नहीं
जो उजडनेवाले इस गांव के बाशिंदों की है.

बाघ भरते हैं खजाना देश का
तुम क्या भरती हो देश के खजाने में सुगना
उल्टे जन्म देती हो ऐसे बच्चे
जो साहबों के सपने में
खौफ की तरह आते हैं-बाघ बन कर

सांझ ढल रही है तुम्हारी टाटी में
और मैं जानता हूं
कि मैं तुम्हारे पास आ रहा हूं
केवल आज भर के लिए नहीं
हमेशा के लिए
तुम्हारे आंसुओं और खून से बने
दूसरे सभी लोगों की तरह
उनमें से एक

हम जानते हैं
कि हम खुशी हैं
और मुस्कुराहट हैं
और सबेरा हैं
हम दीवार के उस पार का वह विस्तार हैं
जो इस सांझ के बाद उगेगा

हम लडेंगे
हम इसलिए लडेंगे कि
तुम्हारे लिए
एक नया संविधान बना सकें
जिसमें बाघों का नहीं
तुम्हारा नाम होगा, तुम्हारा अपना नाम
और हर उस आदमी का नाम
जो तुम्हारे आंसुओं
और तुम्हारे खून में से था

जिसने तुम्हें बनाया
और जिसे तुमने बनाया
सारी दुनिया के आंसुओं और खून से बने
वे सारे लोग होंगे
अपने-अपने नामों के साथ
तुम्हारे संविधान में

जो जिये और फंफूंद लगी रोटी की तरह
फेंक दिये गये, वे भी
और जिन्होंने आरे की तरह
काट डाला रात का अंधेरा
और निकाल लाये सूरज

जो लडे और मारे गये
जो जगे रहे और जिन्होंने सपने देखे
उस सबके नाम के साथ
तुम्हारे गांव का नाम
और तुम्हारा आंगन
तुम्हारी भैंस
और तुम्हारे खेत, जंगल
पगडंडी,
नदी की ओट का वह पत्थर
जो तुम्हारे नहाने की जगह था
और तेंदू के पेड की वह जड
जिस पर बैठ कर तुम गुनगुनाती थीं कभी
वे सब उस किताब में होंगे एक दिन
तुम्हारे हाथों में

तुम्हारे आंसू
तुम्हारा खून
तुम्हारा लोहा
और तुम्हारा प्यार

...हम यह सब करेंगे
वादा रहा.

16 जनवरी 2008

फिल्मी दुनिया केज्यादातर लोग कम पढ़े-लिखे हैं


साहित्य अकादेमी अवार्ड, इकबाल सम्मान, बहादुर शाह जफर अवॉर्ड, गालिब अवॉर्ड, राजभाषा अवॉर्ड, उदूü अकादमी अवॉर्डü, फिराक सम्मान आदि से नवाजे जा चुके `गमन´, `उमराव जान´, `अंजुमन´ जैसी फिल्मों में गीत लिख चुके और स्थानीय जनवादी लेखक संघ के 15 वषोZ से अध्यक्ष शहरयार आज हिंदुस्तानी शायरी की पहचान बन चुके हैं। इन पर कई पीएचडी हो चुकी हैं, तो कई विश्वविद्यालयों में (जहां मॉडनü पोएट्री है) एमए में उनको पढ़ाया जाता है। यह इत्तेफाक ही है कि जिस फिल्म के लिए उन्होंने अनमने से गीत लिखे, उसी ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। पहला संग्रह छपा, उस समय भारत-पाक जंग शुरू हो गई थी। मगर उनकी शायरी को सीमाओं के दायरे पड़ोसी देश पहुंचने से नहीं रोक सके और वाया लंदन उनकी किताब पाकिस्तान भी पहुंच गई। अलीगढ़ में उनके आवास पर हुई बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं :

शहरयार साफ-साफ बात कहने और सुनने में विश्वास करते हैं। उनकी रचनाएं संवेदना और समय का भरा-पूरा दस्तावेज हैं। अब तक उन्हें साहित्य जगत के अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। गजलगो शहरयार हिंदुस्तानी शायरी का एक चेहरा बन गए हैं।

`दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए´ और `जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें´ जैसी गजलों का रचनाकार आज एक फ्लैट में सीमित होकर रह गया। क्या फिल्मों में आगे काम नहीं मिला या आपको फिल्मों का काम पसंद नहीं आया?


दरअसल, मुझे बहुत जल्द पता चल गया कि वहां की जिंदगी के लिए मैं बना ही नहीं हूं। वहां फिल्में बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग कम पढ़े-लिखे और छोटे जेहन के लगे। वहां मौलिकता की गुंजाइश भी नहीं थी। जिनसे वास्ता पड़ता था, उनकी बातेें बहुत सतही होती थीं। एक प्रोडKूसर मिला, जो बमुश्किल दस्तखत कर सकता था। संक्षेप में कहूं, तो `दुपट्टा मेरा´ टाइप गाने की फरमाइश मैं पूरी नहीं कर सकता था।


दूसरा कारण था कि जिस मुकाम पर आकर मुझे फिल्मों में काम करने का मौका मिला, वहां तक पहुंचकर मैं पूरी तरह सुकून की जिंदगी गुजारने का आदी हो गया था। मैं परिवार छोड़कर नहीं रह सकता था। मैंने देखा है कि लोगों ने पैसे तो बहुत कमा लिए, मगर उनके बच्चे गुमराह हो गए। मैं पिता का रोल बच्चों के साथ रहकर अदा करना चाहता था। (एक क्षण रुककर) जो कमियां बचपन में मेरे साथ रहीं, वह अपने बच्चों के साथ होते नहीं देखना चाहता था।


आपने फिल्मों तक का रास्ता कैसे तय किया?

मुजफ्फर अली पेंटर थे और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मेरे जूनियर भी। वे शायरी पसंद करते थे। उन दिनों (वर्ष 1965 में) मेरा पहला गजल संग्रह `इस्मे आजम´ छपा, जो उनके पास था। उससे वे प्रभावित थे। पांच-छह साल बाद उनका एक खत मिला कि वे `गमन´ फिल्म में मेरी दो गजलें रखना चाहते हैं।


सीने में जलन आंखों में तूफान-सा क्यों है


इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है


और दूसरी...


अजीब सानिहा मुझ पर गुजर गया यारो


मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो


इस तरह ये गजलें सुरेश वाडकर और हरिहरन ने गाईं, जो उनकी भी बेस्ट रहीं।


उमराव जान में गाने का प्रस्ताव कैसे मिला?


इन गजलों के कैसेट रिलीज के मौके पर मुजफ्फर ने मुझे मुंबई बुलाया और लखनवी अदब पर फिल्म बनाने की बात कही। मैं फिक्शन पढ़ाता था और उमराव जान उपन्यास उस समय बन रहा था। मैंने इस किताब की बुनियाद पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया। इस फिल्म में मेरी पांच गजलें हैं।


ऐसी कोई बात, जो भुलाए न भूल रही हो?


मेरे गॉड फादर के समान खलीलुर्रहमान की मृत्यु...। (काफी देर चुप रहने के बाद) मैं अपनी पत्नी से 12 वषोZ से अलग हूूं, यह बात भी मुझे भुलाए नहीं भूलती।


हालांकि यह नितांत निजी मामला है और पूछने में संकोच भी हो रहा है फिर भी बात निकली है, तो क्यों न पूरी कर लें। इस अलगाव का कारण?


(बहुत ही शांत चित्त से) कुछ मेरा कुसूर है, लेकिन इसका इल्म शादी से पहले था। मेरी हर कमजोरी से पत्नी वाकिफ थीं, लेकिन एक वक्त के बाद वह चाहती थी कि वे आदतें अच्छाइयों में तब्दील हो जाएं। बात नहीं बनी और हम अलग हो गए। (एक शेर सुनाते हैं)


इस मोड़ पर अब तुमसे बिछड़ना नहीं आसान


पहले ही कहीं तुमसे जुदा हो गए होते


आखिरी व्यक्तिगत प्रश्न पूछ रहा हूं। बच्चे ऐसे में कैसा महसूस करते है?


मैंने उन्हें सिखाया है कि वे अपनी मां को पूरा सम्मान दें। क्योंकि मैंने भी अपनी मां से बहुत प्यार किया। बड़ा बेटा हम दोनों का बराबर सम्मान करता है।


(हम साहित्य पर लौटते हैं)


हिंदी कविता तमाम बंदिशों को तोड़कर आगे बढ़ रही है। छंद-लय तक सीमित न रहकर वह अर्थ-लय तक पहुंच गई मगर ऐसा लगता है कि उदूü शायरी बंदिशों से मुक्त नहीं हो पा रही है।


ऐसा नहीं है। उदूü में काम बहुत हुआ है। हिंदी और उदूü की तुलना सम्मेलनों और मुशायरों को लेकर नहीं की जा सकती। उदूü में `सीरियस´ और `पॉपुलर´ में काफी अंतर रहा है। इसकी वजह हमारी साहिçत्यक गतिविधियों का व्यावसायिक पहलू न होना है। बेदी और इस्मत चुगताई आदि की कहानियां पहले हिंदी में छपीं तब उदूü में। प्रेमचंद भी इसी कारण उदूü से हिंदी में आ गए। रही बात छंदों की, तो मीटर तोड़ने की जरूरत नहीं है। मीटर की पाबंदियों में रहकर मुख्तलिफ बातें कही जा सकती हैं। अब शायरी बदल गई है। उसके सामाजिक और नैतिक पहलू का ध्यान रखा जाने लगा है। फैज़ म$कदूम और मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी पूरी तरह प्रोग्रेसिव है।


हिंदी में भी आज बड़े पैमाने पर गजलें लिखी जा रही हैं, जिनसे उदूü के बड़े शायर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। आपका क्या खयाल है?

मेरा कुछ भी कहना ज्यादती होगी। हां, दुष्यंत कुमार हिंदी के बेहतरीन गजलगो हैं। कई स्थानीय शायर भी बेहतरीन काम कर रहे हैं। मैं इसके खिलाफ नहीं हूं। भाषा कोई भी हो, गजल की शतेZ उसमें बरकरार होना जरूरी है। दो लाइनें बराबर तो होनी ही चाहिए।


आपने अपनी शायरी को भाषा के स्तर पर काठ का जूता नहीं पहनाया, जबकि उदूü के अधिकांश शायर ऐसा करते रहे हैं।


मैं अपने लिए शेर नहीं कहता। शायरी लोगों की समझ में आनी चाहिए, भले ही उसे कम लोग समझ पाएं। गालिब और मीर ने भी बहुत आसान शायरी की है। (दोनों के एक-एक शेर सुनाते हैं):


इब्ने मरियम हुआ करे कोई


मेरे दुख की दवा करे कोई


या फिर


नाजुकी उसके लब की क्या कहिए


पंखुड़ी एक गुलाब की-सी है


ऐसा नहीं लगता कि पुरानी उदूü शायरी कुछ हद तक सीमित दायरे में और पूर्वाग्रह से ग्रस्त है?


शायरी में इश्क-मोहब्बत होनी ही चाहिए, यह पूर्व धारणा है। मगर यही सब कुछ नहीं है, ये अब की सोच है। मैंने शराब पर कोई शेर नहीं कहा, न ही शराब पीकर शायरी की। दरअसल शायरों के साथ कई मिथक गढ़ दिए गए हैं। जैसे शायर है, तो अनपढ़ होगा, शक्ल-ओ-सूरत खराब होगी, शराब पीता होगा, गैरजिम्मेदार होगा आदि-आदि। हालांकि ऐसा हो भी सकता है, मगर यह जरूरी भी नहीं।


आपकी अपनी पसंदीदा गजल?


किसी एक को कहना मुश्किल है, मगर मेरी एक गजल चçर्चत हुई:


जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है।


हर घड़ी होता है एहसास कहीं, कुछ कम है॥


घर की ताकीर तसव्वुर में ही हो जाती है।


अपने नक्शे के मुताबिक ये जमीं, कुछ कम है॥


जीवन का उद्देश्य किस तरह व्याख्यायित करेंगे?


आदमी को किसी के लिए जिंदा रहना चाहिए। जिन चीजों से अच्छाइयों को खतरा है, उनका विरोध हो।


ये सफर वो है कि रुकने का मुकाम इसमें नहीं।


मैं जो थम जाऊं, तो परछाईं को चलता देखूं॥




(ऊर्दू के मशहूर शायर शहरयार से गीतेश्वर की बातचीत)
अमर उजाला से साभारः-

10 जनवरी 2008

मुक्तिबोध की तीन कवितायेंः-




1:- मृत्यु और कवि

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर
व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर
है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,
जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर
बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,
वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला
"ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर
दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर?
इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,
सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर
तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर
ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ।

2:- नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

3:- ऐ इन्सानों

आँधी के झूले पर झूलो
आग बबूला बन कर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सबेरे का मूँह चूमो
ऐ इन्सानों ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो

पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझालो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा ।
- गजानन माधव मुक्तिबोध

26 दिसंबर 2007

विनायक सेन की कैद के मायने-

अपूर्वानंद
इसी महीने 10 दिसंबर को एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जा रहा था तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक शख्स की कैद लंबी हो रही थी. ये शख्स हैं इस साल मई से छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में बंद पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया. 45 मिनट चली सुनवाई वहां मौजूद लोगों के लिए एक भयावह अनुभव था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सेन माओवादी हैं और उन्हें छोड़ने का मतलब होगा सरकार की जड़ें खोदने के लिए उन्हें खुली आजादी देना. परेशान करने वाली बात ये थी कि इस दावे की प्रामाणिकता जांचने की जरूरत ही नहीं समझी गई. डॉ सेन के कंप्यूटर रिकॉर्डों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इसमें वे पत्र हैं जिनसे ये पता लगता है कि किस तरह डॉ सेन ने नागपुर में हथियारों का प्रशिक्षण कैंप आयोजित क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा?
करने में मदद पहुंचाई. बचाव पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस ओर ध्यान खींचने की कोशिश की कि पत्रों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और डॉ सेन खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए नागपुर गए थे. लेकिन अदालत का मानना था कि धवन का तर्क ट्रायल कोर्ट में देखेगा और उसके पास डॉ सेन को जमानत न देने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.

इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात थी हमारे कुछ अनुभवी मित्रों का यह कहना कि अभियोजन पक्ष का काम ही है कि वह झूठ बोले और इसमें कुछ भी नया या अनोखा नहीं है कि सरकारी वकील ने डॉ सेन के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया.

जब सरकार ही झूठ बोलने पर उतर आए तो आप क्या करेंगे? क्या देश के उच्चतम न्यायालय ने ये सिद्धांत नहीं दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और जमानत से तब तक इनकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ये स्वतंत्रता दूसरों के लिए खतरा न बन जाए? क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा? वो आदिवासी जिनके लिए डॉ सेन ही एकमात्र मेडिकल सुविधा थे. क्या खंडपीठ ने ये सोचा कि डॉ सेन की गिरफ्तारी के फलस्वरूप धमतारी अस्पताल बंद हो गया है? और इसके साथ ही पढ़ने में आता है अदालत ने किसी फिल्म स्टार को सिर्फ इसलिए जमानत दे दी कि उसके ऊपर फिल्म उद्योग के करोड़ों रुपये लगे हुए हैं.

आम आदमी सीधे सवाल पूछता है : क्या जमानत दिए जाने पर डॉ सेन के भूमिगत होने का खतरा था? ये एक तथ्य है कि बंगाल में अपनी छुट्टियां बिताने के बाद डॉ सेन मई में रायपुर लौटे थे, ये पता होने के बावजूद कि स्थानीय मीडिया के सहयोग से छत्तीसगढ पुलिस उनके बारे में दुष्प्रचार कर रही है. उनके भाई ने उन्हें एक पत्र भी भेजा था जिसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन वह वापस आए और जैसी कि आशंका थी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अगर छत्तीसगढ़ पुलिस अदालत को जैसा बता रही थी वैसा होता तो डॉ सेन मई में ही भूमिगत हो जाते. उनका वापस आने और कानून का सामना करने का फैसला पर्याप्त आधार होना चाहिए था कि कोई भी अदालत उन्हें जमानत दे देती. केस की जानकारी रखने वालों के मुताबिक सरकार द्वारा ट्रायल कोर्ट में मामले को लटकाए रखने के लिए अपनाई गई चालबाजियां छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है.
इस बात का सबूत हैं कि सरकार की दिलचस्पी केवल डॉ सेन को लंबे समय तक कैद रखने में है. इसका नतीजा ये हुआ कि सलवा जुडूम के नाम पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का पर्दाफाश करने वाली एक ताकतवर और भरोसेमंद जुबान खामोश हो गई है. इसका मतलब ये भी है कि मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले समुदाय के सारे संसाधन अब अपने नेता को आजादी दिलाने में लग जाएंगे. नतीजतन सरकार को निर्बाध दूसरी ज्यादतियां करने की छूट मिल जाएगी.

छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है. जब डॉ सेन ने छत्तीसगढ़ सरकार की जनविरोधी प्रकृति का भांडाफोड़ करना शुरू किया, जब उन्होंने सलवा जुडूम और एनकाउंटर के नाम पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की तो सरकार उसे बर्दाश्त न कर सकी. उसने डॉ सेन की जुबान बंद करने का फैसला कर लिया. सबसे आसान तरीका था उन्हें माओवादी घोषित कर देना.

डॉ सेन कितने दिन जेल में रहेंगे कहा नहीं जा सकता. जो निश्चित रूप से कहा जा सकता है वह ये है कि डॉ बिनायक सेन जैसे लोगों के जेल में बिताये गये हर दिन का मतलब है भारत में लोकतंत्र और आजादी के एक दिन का कम हो जाना. हमें ये जानने की आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जेलें डॉ सेन जैसे सैकड़ों लोगों से भरी हैं. ऐसे कई सीपीआई कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिर्फ इस अपराध में माओवादी करार देकर जेल में ठूंस दिया गया कि उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया था. माओवादियों की हिंसावादी राजनीति का समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन जब राज्य में किसी भी विपक्ष को माओवादी बता जेल में ठूंसा जाने लगे तो ऐसा उनकी राजनीति को निश्चित तौर पर थोड़ी सी वैधता प्रदान करता है. क्या सरकार ऐसा जानबूझकर कर रही है? क्या ये सरकार खुद भारत का अलोकतंत्रीकरण कर रही है?
साभार तहलका

यह चरित्र है संसदवादी कम्युनिष्टों काः-

के ए शाजी
संसदवाद की प्रणाली में अपने को फिट करते-करते अब भारतीय कम्युनिष्तों का चरित्र सामने आा रहा है चाहे वह नंदीग्राम में हो या फिर केरल में
बुद्धदेव भट्टाचार्य अब शायद खुश होंगे। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का नंदीग्राम मार्का मार्क्सवादी समाजवाद अब केरल के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। राज्य के इडुक्की जिले में कॉमरेड भू-माफियाओं और पर्यटन व्यवसायियों के हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसकी मार पड़ रही है उन गरीब आदिवासियों पर जिन्हें उनकी सदियों पुरानी ज़मीनों से खदेड़ा जा रहा है।

पार्टी के नवउदारवादी नेता पिन्नाराई विजयन, टीएम थॉमस, आइसाक और एमए बेबी के स्थानीय गुंडों ने इडुक्की की ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है। इडुक्की हाल तक मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन का गढ़ हुआ करता था जहां उन्होंने बड़े भू-माफियाओं को बाहर खदेड़ने के लिए कड़े क़दम उठए थे। लेकिन ताकतवर माफियाओं ने स्थानीय सीपीआई और सीपीएम, दोनों को अपने पाले में कर लिया। नतीजा, अच्युतानंदन का सबसे मजबूत गढ़ उनके हाथ से जाता रहा।

नवंबर के आखिर में हजारों की संख्या में सीपीएम कैडरों ने हिल स्टेशन मुन्नार के पास बसे गांव चिन्नाकनाल की 53 एकड़ सरकारी ज़मीन पर कब्जा कर लिया. इस जमीन पर करीब कुछ महीनों से 160 भूमिहीन आदिवासी सरकार के उस आश्वासन आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।
के बाद झोपड़ियां बनाकर रह रहे थे जिसमें कहा गया था कि उन्हें इस इलाके में जमीन दी जाएगी। इन झोपड़ियों को आग लगाकर राख कर दिया गया और उनके ऊपर लाल झंडे फहरा दिए गए जो इस बात का संकेत थे कि जमीन अब आजाद है। असहाय आदिवासियों ने पास ही स्थित एक चट्टान के नीचे शरण ली और सीपीएम के लोगों ने उस ज़मीन पर अपने छप्पर डाल कर अपने "अतिक्रमण विरोधी" अभियान को अंतिम रूप दे दिया।

हालांकि पहले दिन सिर्फ अनयिरंगल और पप्पाथिचोला से ही आदिवासियों को बाहर निकालने का अभियान चला लेकिन अगले दिन सीपीएम के गुंडो ने लगभग पूरे चिन्नाकनाल गांव में आने वाली राजस्व भूमि पर लाल झंडे फहरा कर उस पर अपने अधिकार का ऐलान कर दिया। दूसरे दिन के अभियान में करीब 2000 कैडरों ने हिस्सा लिया।

अब आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।

आदिवासी परिवारों ने 1500 एकड़ की जिस ज़मीन पर झोपड़ियां बनाई थीं उसे सरकार ने सालों पहले हिंदुस्तान न्यूज़प्रिंट लिमिटेड नाम की एक कंपनी को यूकेलिप्टिस के पेड़ लगाने के लिए आवंटित किया था। इन आदिवासियों को पता ही नहीं चला कि कब सीपीएम कैडरों ने अपना कब्जा अभियान शुरू कर किया। दरअसल ये पूरा इलाका आदिवासियों का ही था और कंपनी इस ज़मीन का कोई उपयोग नहीं कर रही थी। आदिवासियों को सीपीएम का कोपभाजन इसलिए बनना पड़ा क्योंकि उन्होंने ज़मीन को तब तक न छोड़ने की धमकी दी थी जब तक की सरकार उन्हें अपने वादे के मुताबिक ज़मीनें मुहैया नहीं करवाती। आदिवासी इन ज़मीनों पर ट्राइबल रिहैबिलिटेशन प्रोटेक्शन कमेटी के झंडे तले रह रहे थे।

जाने-माने आदिवासी नेता सी के जानू कहते हैं, "ये एक औऱ नंदीग्राम की शुरुआत है। आदिवासियों के आवंटन वाली ज़मीन से उन्हें बेदखल करने का अधिकार सीपीएम कैडरों को किसने दिया? ये लोग ज़मीन के मामलों में फैसला करने का अधिकार न्यायपालिका और सरकार के जिम्मे क्यों नहीं छोड़ते हैं? मामला बिल्कुल साफ है कि पार्टी बाहुबल के दम पर सार्वजनिक ज़मीनों पर कब्जा करके उसे भू-माफियाओं को सौंपना चाहती है।"

चिन्नाकनाल में सीपीएम कैडरों के इस कारनामें पर सीपीआई नेता और राज्य के राजस्व मंत्री केपी राजेंद्रन ने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ज़िला प्रशासन को आदेश दिया कि पार्टी से जुड़ाव को दरकिनार करके सभी अतिक्रमणकारियों को हटाया जाय। बावजूद इसके अभी तक सीपीएम के अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मुन्नार में ज़मीन के कब्जेदारों को हटाने के लिए बने टास्क फोर्स के मुखिया केएम रामानंदन ने इस मसले को हल करने के लिए सभी पार्टियों की मीटिंग भी बुलाई लेकिन इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला।

गुस्साए आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो सीपीएम ने चिन्नाकलान में हड़पी गई ज़मीनों को वापस न करने की ठानी हुई है। चिन्नाकनाल में सीपीएम के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले आदिवासी पुन्नाम्बलम कहते हैं, "अगर अधिकारियों ने तत्काल कड़े क़दम नहीं उठाए तो यहां मुथांगा जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।" मुथांगा में पुलिस ने आदिवासियों के खिलाफ सबसे कठोर अभियान चलाया था। ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है।
एके एंटनी की यूडीएफ सरकार के दौरान ने जब उत्तरी केरल के वायनाड ज़िले में आदिवासियों को वायदे के मुताबिक ज़मीन नहीं दी तो इसके विरोध में उन्होंने जंगलों में अपनी झोपड़ियां बना ली थीं। इसकी प्रतिक्रिया में फरवरी 2003 में पुलिस कार्रवाई में एक आदिवासी और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी जबकि कई आदिवासी घायल हुए थे। इस मामले में आदिवासियों को अब तक भी जमीनें नहीं मिली हैं। पुन्नाबलम कहते हैं, "मार्क्सवादियों का लक्ष्य ये साबित करना है कि आदिवासी ज़मीन के हक़दार नहीं है। चूंकि वो सत्ता में हैं इसलिए वो आसानी से अपने दावे को सही साबित करने के लिए जाली दस्तावेज भी पेश कर देते हैं और हम पर अपनी ज़मीनों से बेदखल करने का दबाव डालते हैं। एक बार ऐसा हो गया तो वो ज़मीनों के बंटवारे को ठंडे बस्ते में डालकर इन ज़मीनों को भू-माफियाओं के हवाले कर देंगे।"

उधर, राजस्व मंत्री ने तहलका को बताया कि सभी प्रदर्शनकारी आदिवासियों को उनकी ज़मीनें वापस दी जाएंगी और लाल झंडे की परवाह न करते हुए जमीनों से कब्जे हटाए जाएंगे। लेकिन चिन्नाकनाल पंचायत में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ये आसान नहीं लगता। पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर अस्थायी तौर पर सीपीएम कैडर हट भी जाते हैं तो आदिवासियों को ज़मीने सौंपना आसान नहीं है। स्थानीय पत्रकार टीसी राजेश कहते हैं, "सीपीएम पहले से ही ये तर्क दे रही है कि जिन 120 आदिवासियों ने अपनी झोपड़ियां यहां बना रखी थीं उनमें सिर्फ 21 के पास ही मालिकाना हक़ है। सीपीएम के लिए आदिवासियों को जारी किए गए ऑफर लेटर की फिर से जांच की मांग करना आसान है। इससे पार्टी को अपना एजेंडा लागू करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।" सालों पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री एके एंटनी और आदिवासी नेता सीके जानू के बीच हुए एक समझौते के बाद आदिवासी इन जमीनों पर बसे थे। एक भव्य समारोह के दौरान एंटनी ने 798 आदिवासियों को ज़मीन के कागज़ात सौंपे थे। लेकिन 540 परिवारों को ही चिन्नाकनाल में ज़मीन मिली। बाक़ियों को जो ज़मीनें मिली वो पहले से ही भूमाफियाओं के कब्जे में थी।

"ये गरीब लोग पिछले पांच सालों से अपनी ज़मीन के इंतज़ार में हैं। सरकार उन्हें सीधे-सीधे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर रही है," ये कहना है आदिवासी नेता सीपी शाजी का। उधर सीपीएम नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस और सीपीआई के लोगों ने आदिवासियों को इन ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए उकसाया ताकि एक बार मामला शांत हो जाने के बाद वो खुद इन ज़मीनों पर कब्जा कर सकें।

बहरहाल ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है। ज़िलाधिकारी ने ये भी साफ किया है कि आदिवासियो की ज़मीन पर कब्जा करने के पीछे टूरिस्ट रेजॉर्ट बनाने वाली एक लॉबी का हाथ भी है।

राजेश कहते हैं, "ये गांव पर्यटन के लिहाज से काफी अहम जगह पर मौजूद है जिसकी सीमाएं मथिकेत्तन राष्ट्रीय उद्यान और मुन्नार हिल स्टेशन से लगती हैं। विवादित ज़मीन दर्शनीय अनयिरंकल बांध से भी काफी नज़दीक है। रियल इस्टेट माफिया को अहसास है कि इसे बड़े फायदे के सौदे में बदला जा सकता है।"
:-तहलका से साभार

12 दिसंबर 2007

मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो


मेरा मुक़दमा ऐसा नही की उसका फैसला
काले कोटवालों की नीली कर्रेंसी नोट देकर
किसी एक देश की किसी एक अदालत मी हो जाए
मुझे गवाह के कटघरे में आने दो

तुम लोग जो आदमी की आस्था को बरबाद करते हो
इश्वर के नाम पर मुझे शपथ क्यों दिलाना चाहते हो
निर्दोष और अपराधियों के लिए
तुमलोग एक ही कानून पर बहस करते हो
न्याय को चूहे की तरह तुम लोग उतार देते हो
वकील की फीस की गर्त में
इस काम के लिए तुम्हारी योग्यता क्या है
मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो

तुम्हारा ही न्याय और तुम्हारा ही जेलखाना
तुम डरते क्यों हो
एक अंतहीन सांचा चला आ रहा है युगों से

यह भरा हुआ है तुम्हारे दिमाग के महलों में
तुम्हारे कबूतर गुटुर्गूँ कर रहे हैं घरेलु मुड़ेरों पे
मधुर आकांक्षाएं झरती जाती हैं हर क्षण
तुम अपने सरों को कलम क्यों नही करते
नही ढहाते कमरे की चारों दीवारें
कारों दिशाएं खोल दो फ़िर देखना तुम विश्व नागरिक कैसे नही बनते

11 दिसंबर 2007

बिहार में विकास के माडल की तलाश


प्रेम कुमार मणि
आज पूरी दुनिया में विकास की आंधी चल रही है। कभी राष्ट्रवाद और समाजवाद को लेकर भी ऐसी ही आंधी चली थी। विकास की इस आंधी ने राष्ट्रवाद को तो पूरी तरह और समाजवाद को बहुत हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। जहां तक भारत की बात है जिस कांग्रेस ने कभी समाजवाद शब्द को भारतीय संविधान में भारतीय गणराज्य के साथ नत्थी कराने में अग्रणी भूमिका निभायी थी उसी ने उसे अप्रासंगिक बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभायी है। अब बिहार में समाजवादी तबियत के नीतीश कुमार विकास की राजनीति की प्रस्तावना कर रहे हैं जिसकी एक झांकी पिछले १९-२१ जनवरी को पटना में हुए एक ग्लोबल कांफ्रेंस में प्रस्तुत हुई; जिसे एक एनजीओ ने बिहार सरकार के सहयोग से आयोजित किया था और जिसका उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने किया। राष्ट्रपति डॉ. कलाम विकास की राजनीति के पुराने प्रस्तावक रहे हैं। इसलिए उनका भाषण रश्मी तौर पर दिया गया भाषण नहीं, बल्कि मनोयोग से तैयार किया गया एक दिलचस्प भाषण था। उद्घाटन सत्र, जो पटना कें एक बड़े सभागार में ताम-झाम के साथ आयोजित था, में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। बिहार में कांग्रेस का जो पहला अधिवेशन हुआ था (१९१२, बांकीपुर कांग्रेस) उस में भाग लेकर जवाहरलाल नेहरू को जो अनुभूति हुई थी, कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूति इस समारोह के बाद मेरी थी। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- 'I visited as a delegate, the Bankipore congress during christmas 1912. It was very much an English knowing upper class affair, Where morning coats and well-pressed trousers were greatly in evidence. Essentially it was a social gathering with no political excitment or tension.(Page-30)' इसमें यदि संशोधन की जरूरत है तो बस 'अपर क्लास` की तरह 'अपर कास्ट` भर की। कुलीन 'बुद्धिजीवियों` की इस खूबसूरत कांफ्रेंस में प्रतिभागियों की रूचि विकास में कम, अपनी धज प्रदर्शित करने में अधिक थी। इस समारोह को ग्लोबल नहीं गोलमाल समारोह कहने वाले लालू प्रसाद ने भी ठीक इसी समय को ब्राह्मणवादी ठीहे पर आत्मसमर्पण के लिए चुना था। इस दौरान वे अपने गांव में शंकराचार्य को बुलाकर उनके चरणों में लोट रहे थे। फुलवरिया में खुला ब्राह्मणवाद था तो पटना में प्रच्छन्न ब्राह्मणवाद। अब बिहार को इनके बीच से आगे या पीछे जाना है।

सवाल उठता है बिहार में विकास का मॉडल क्या हो? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद सोचते हैं तो उनके सोच में सामाजिक न्याय का एक पुट होता है। पंचायत चुनावों में अपनी सोच को साकार कर उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। महिलाओं और बहुत पिछड़े तबकों को पंचायत चुनावों में आरक्षण सुनिश्चित कर ग्रामीण इलाकों में उन्होंने एक नया नेतृ वर्ग खड़ा किया है। इससे जो हलचल पैदा हुई है वह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारक बनेगा। लेकिन नीतीश कुमार यदि यह सोचते हैं कि बाहरी निरंकुश निवेश से बिहार में विकास होगा तो वे गलती पर हैं। वास्तविक विकास के लिए ग्रामीण स्तर पर कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी रूझानों को बल देना होगा। आजादी के बाद से ही ब्राह्मणवादी-समाजवादी चेतना ने निचले स्तर पर पूंजीवादी रूझानों को हतोत्साहित किया और इसी का नतीजा है गांव और शहर की दूरी बढ़ती गयी। जिन लोगों ने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के इतिहास का अध्ययन किया है वे यह भी जानते हैं कि किन लोगों ने वहां इसे विकसित किया था। पूंजीवाद एक अवस्था में प्रगतिशील कदम होता है क्योंकि यह सामंतवादी रूझानों को खत्म करता है। (फ्रांसीसी लेखक बॉल्जाक की रचनाओं को देखें। मार्क्स ने इसे रेखांकित किया है।) हमारे मुल्क में आयातित समाजवाद ने अपनी लड़ाई पूंजीवाद से शुरू की। (दरअसल समाजवाद पूंजीवाद से ही संघर्ष करता है।) इसका प्रतिफल हुआ कि एक तरफ तो समाज के सामंतवादी रूझान साबूत रह गये दूसरी तरफ ऊंची जातियों के प्रभुत्व वाले लोकतंत्र ने जिस समाजवाद को लाया वह ब्राह्मण-समाजवाद बन कर रह गया। उदाहरण के लिए भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मणों के प्रभुत्व को देखंे। यह सरकारी प्रयासों से हुआ है। (विस्तृत अध्ययन के लिए गेल ऑम्वेट का लेख 'रिजर्वेशन इन प्राइवेट सेक्टर` द हिन्दू ३१ मई-१ जून २००१) अब विकास के इस दौर में देखना होगा कि निचले तबकों को लेकर हम विकास का कैसा खाका बनायंे जिससे वास्तविक विकास हो सके। शायद इसे ही नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं। इसके लिए पूंजी से अधिक ज्ञान और समर्पण की जरूरत है। फ्रांसीसी लेखक-चिन्तक गाइ सोमां इसे बेयरफुट कैप्टिलिज्म (नंगे पांव पूंजीवाद) कहते हैं। यह बेयरफुट कैप्टिलिज्म विकास का आधार बनेगा तभी सामाजिक न्याय भी संभव होगा। (मार्च अंक में इस विषय पर गाई सोमां का लेख देखेंगे) १९-२१ जनवरी को संपन्न ग्लोबल मीट पिछड़े बिहार को विकास की ओर नहीं, एक नयी राजनीतिक गुलामी की ओर ले जायेगा जो अंतत: एक जटिल सामाजिक गुलामी को भी जन्म देगा और जिससे जूझने में समानता और आजादी के सिपाहियों को दशकों का समय लग जायेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे की मजबूती के लिए रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं। हर सभा-समारोह में लाठी फेंकने और कलम-कागज पकड़ने की बात कहते हैं। बिहारियों की लगनशीलता और काबलियत पर वे इतराते भी हैं। इस मानव संसाधन को उन्होंने अपनी पूंजी माना है। जाति और संप्रदाय से बाहर आकर वे बिहारीपन की, इसके स्वाभिमान की बात करते हैं। दरअसल यही वह महत्वपूर्ण कार्य है जिससे निचले स्तर से पूंजीवादी रूझान विकसित होंगे। इसी आधार पर सम्यक विकास की रूप रेखा बन सकेगी। यही वास्तविक सामाजिक न्याय भी है। जैसा कि राष्ट्रपति कलाम ने भी २०१५ तक पूर्ण साक्षरता और पूर्ण गरीबी उन्मूूलन की बात की है। इसे हर हाल में हासिल करना होगा। लेकिन प्रवासी निवेशकों की रूचि साक्षरता और गरीबी उन्मूलन में नहीं है। उनकी रूचि औन-पौन दाम में जमीन हासिल करने और येन-केन अपनी झोली भरने में है। किसी भी विकास पुरुष के लिए ऐसे लोगों से सावधान रहना ही श्रेयस्कर होगा।
जनविकल्प से साभार

10 दिसंबर 2007

मानवाधिकार दिवस गोष्टीयों में और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में


आज मानवाधिकार दिवस है और छत्तीसगढ़ में मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले आदिवासियों के हक हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले डा बिनायक सेन जेल में है - संयोग यह भी है कि आज सुप्रीम कोर्त में उनके बेल को लेकर सुनवाई भी है
नक्सल समर्थन के आरोप में गिरफ्तार, पेशे से बाल चिकित्‍सक डा. बिनायक पी यू सी एल से जुड़े रहे हैं। उनकी पत्‍नी इलीना सेन ने आज अखबार में लिखा कि डा. बिनायक पर नक्‍सलियों को समर्थन देने का आरोप है- उनके बच्‍चे की ट्रिग्‍नोमैट्री की कापी को सबूत के तौर पर पेश किया गया है। डा. जीलानी पर संसद पर आतंकवादी हमले का आरोप था और इसी किस्‍म के ‘प्रमाण’ जुटाए गए थे- जो कोर्ट में धराशाही हो गए- खुन्‍नस में जीलानी पर हमला किया गया और स्‍पेशल सेल के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं मिला (संयोग से उसी स्‍पेशल सेल में अपना एक पुराना सहपाठी भी था- उसने क्‍या बताया ये नहीं बताउंगा पर ये मान लीजिए कि सब ठीक तो नहीं ही था)। अब जाहिर है कोई ‘मसिजीवी की आत्‍मा’ बनकर कहेगा कि देश की पुलिस के खिलाफ लिखना जयचंदी काम है पर क्‍या करें हमें लगता है कि यही राष्‍ट्रभक्ति है- देश की संसद पर हमला हो और आप इस-उस को पकड़कर दोषी सिद्ध करने में ताकत झोंको, जिसका मतलब है कि दोषी आतंकवादी अगला हमला करने के लिए अभी भी बाहर मजे में घूम रहे हैं- दूसरी ओर किसी विचारधारा से भयंकर तौर पर भयभीत होकर आप एक डाक्‍टर को जेल में ठूंसो क्‍योंकि आप उससे सहमत नहीं हैं।

डा. बिनायक के विषय में हमें नहीं पता कि वे कितने नक्‍सली हैं जैसे कि अफजल व जीलानी के विषय में नहीं पता था कि वे कितने बड़े आतंकवादी थे – किंतु एक बात सहजता से पता लग रही है- राज्‍य अपनी वैधता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है और हॉं उसी व्‍यकितगत अनुभव से ये भी जानते हैं कि जीलानी को राज्‍य के दमन के विरुद्ध प्रतीक बनाने में सरकार की वही भूमिका है जो बजार1 जैसे बदमजा चिट्ठे को असहमति की अभिव्‍यक्ति का प्रतीक बना देने में नारद की थी।

जिस तरह कश्‍मीरी अलगाववाद से हम असहमत है, राहुल की भाषा को अनावश्‍यक रूप से बदमजा मानते हैं तथा अधिकतर समय हमने नए नए मार्क्‍सवादी रंगरूटों से उनके विचारों से गहरी असहमति जाहिर करते हुए गुजारा है- अब भी उस विचारधारा से अपना असहमति का ही रिश्‍ता है पर पुलिस स्‍टेट कायम करने के खिलाफ लोकतंत्र के पक्ष में हम राहुल, जीलानी और बिनायक के पक्ष में खड़े हैं। मसीजीवी सेः-

06 दिसंबर 2007

लाल सलाम-लाल सालेम:-

घटनायें काल परिवर्तन का माध्यम होती है वे स्थितियों का भान कराती है नंदीग्राम आज के बर्बर व क्रूर सत्ता का सच है जिसे बार-बार याद कराने की जरूरत हैः-



विचारधारा के लिए लड़ने वाले सिपाही या राजनीतिक गुंडे? पश्चिम बंगाल में पिछले तीन दशक से सीपीएम के अबाध राज का राज़ कैडर ही रहे हैं. कैसे कैडर सीपीएम की मदद करते हैं और इसमें उनका क्या फायदा है बता रहे हैं शांतनु गुहा रे...

भास्वती सरकार कार्ल मार्क्स के केवल नाम से ही परिचित हैं, मगर मार्क्स के सिद्धांत क्या हैं ये जानने के लिए उन्होंने उनकी किताबों को कभी नहीं खंगाला. 34 वर्षीय ये स्कूल शिक्षिका अपने पति(राज्य परिवहन निगम में क्लर्क) के साथ कोलकाता के दक्षिणी इलाके में रहती हैं. समर्पित सीपीएम कैडरों की तरह ये दोनों पति-पत्नी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) की गढ़िया से निकलने वाली रैलियों का एक अभिन्न हिस्सा होते हैं. सरकार पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के शासन पर बात तो करती हैं लेकिन अपनी तस्वीर छपवाने के सवाल पर पीछे हट जाती हैं. हालांकि उनके पड़ोसी बताते हैं कि सरकार को रैलियों में नारे लगाने के बदले पैसे मिलते हैं, लेकिन वो इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं.
गौरतलब है कि ये महिला कैडर, पार्टी में और पांच साल बिताने के बाद नेता के रूप में अपनी पदोन्नति का सपना संजोए हुए है. सरकार का पार्टी से जुड़ाव छात्र जीवन में ही हो गया था. तब वो स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) की एक सामान्य सदस्य थीं और उसी दौरान उन्होंने पहली बार सीपीएम की रैली में भी हिस्सा लिया था. कैडर सत्ता का उतना आनंद नहीं ले पाते. लिहाजा सरकार सहित राज्य के लाखों कैडर राज्य के शीर्ष पार्टी नेताओं के संपर्क में आने की अपनी बारी के इंतजार में हैं. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के लिए नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.

अब जरा ये देखें कि पार्टी के प्रति इस अंधभक्ति के फलस्वरूप सरकार जैसे लोगों को मिलता क्या है.

पहले राज्य में सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया राज्य सरकार के हाथ में होती थी और इनमें से 90 प्रतिशत तक नौकरियां प. बंगाल में सीपीएम कैडरों की झोली में ही जाती थीं. नौकरियों से योग्यता का कोई लेना-देना नहीं था और वामपंथ से थोड़ा-सा जुड़ाव ही पर्याप्त योग्यता मानी जाती थी. कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के जिम्मे कर दिया मगर अब भी सैकड़ों अस्थाई नियुक्तियां स्थानीय नेताओं के निर्देशों पर ही होती हैं. चाहे सरकारी नौकरी हो, नगर परिषद् की या फिर किसी निजी संस्थान की - पार्टी का संदेश स्पष्ट हैः यदि आप हमारे साथ हैं, तो हम भी आपका ध्यान रखेंगे.

बहरहाल, कैडर के सवाल पर सरकार कहती हैं, “मैं एक कैडर हूं और पार्टी के लिए काम करती हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई गुंडा-बदमाश हूं.” वो एक सीधा-सा सिद्धांत जानती हैं - पार्टी के प्रति अंधभक्ति कैडर के जीवन और उसकी प्रगति की अनिवार्य शर्त है. यानी कैडर को हर हाल में पार्टी के पक्ष में खड़ा होना है, पार्टी के बचाव का रास्ता तलाशना है. वह इसे पलटवार का सिद्धांत कहती हैं. उनका मानना है कि विरोधी हर कदम पर पार्टी पर कीचड़ उछालते रहते हैं, लिहाजा कैडरों को उसके जवाब के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है.

उदाहरण के तौर पर जिस दिन फिल्मकार अपर्णा सेन ने नंदीग्राम विरोधी रैली में हिस्सा लेने का निर्णय किया, कैडर पहले से तैयार थे कि मीडिया में उन्हें क्या कहना है. सेन के इस कदम पर कैडरों ने ये प्रचारित करना शुरू किया कि कोलकाता में हाल में संपन्न हुए फिल्म समारोह में अध्यक्ष न बनाए जाने को लेकर वो सरकार से नाराज थीं. जिन तक ये कहानी नहीं पहुंच पाई थी, उन्होंने दूसरा कारण गढ़ा: सेन इसलिए नाराज थीं क्योंकि राज्य सरकार ने सेन की अगली फिल्म को वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया था.

पश्चिम बंगाल में यदि आप एक कैडर हैं, तो आपको न केवल इस सिद्धांत में विश्वास करना होगा, बल्कि इसे प्रचारित-प्रसारित भी करना होगा. यानी जमीनी स्तर पर व्यावहारिक मार्क्सवादी सिद्धांत यही है.

स्थानीय न्यूज चैनल तारा बंगला की संपादक सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है. गली के नुक्कड़ पर होने वाली सभा में वक्ता के रूप में कोई प्राध्यापक भी हो सकता है. किसी सार्वजनिक सभा में भीड़ जुटाने वाला संयोजक हो सकता है. पास-पड़ोस के तलाक, किराएदारी, असफल प्रेम प्रसंग जैसे मामलों को सुलझाने के प्रयास करता कोई कार्यकर्ता भी हो सकता है और विरोधियों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई करने वाला कोई क्षेत्रीय गुंडा भी हो सकता है, जिसे सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त होता है.”

चट्टोपाध्याय अपने स्टूडियो में घटी एक घटना का उदाहरण देती हैं. एक प्राइमटाइम शो के खत्म होने के बाद उन्होंने स्टूडियो में मौजूद और सत्ताधारी पार्टी से निकटता रखने वाले गार्डन रीच इलाके के डॉन झुनू अंसारी से पूछा कि क्या उन्होंने अपने आदमियों को नंदीग्राम में जवाबी कार्रवाई के लिए भेजा था. अंसारी ने ऐसा करने से तो इनकार किया लेकिन ये जरूर बताया कि ज्यादातर कैडर बंगाल के बाहर से आए थे. सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है.

जानकार बताते हैं कि ज्यादातर माकपाई कैडर बेरोजगार हैं और सीपीएम से उनके जुड़ाव के कई कारण हैं. एक तो इससे उनकी कुछ आमदनी की गारंटी हो जाती है, दूसरे, उनका एक सामाजिक स्तर बन जाता है और साथ ही प्रसिद्धि की राह पर पहला कदम भी पड़ जाता है.

सीपीआई(एमएल) के वरिष्ठ नेता अरिंदम पाल स्वीकारते हैं कि “पार्टी के कई कार्यकर्ता मुश्किलें खड़ी कर देने वाले हैं. शीर्ष कामरेड इसे महसूस भी करते हैं लेकिन उन्हें पता है कि राजनीति में आपको बुद्धिजीवियों की नहीं, ऐसे ही तत्वों की जरूरत पड़ती है.” उन्होंने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर घटी घटना का हवाला दिया, जहां कैडरों ने एयरपोर्ट यूनियन के चुनाव प्रचार के दौरान एक तरह से इस पर कब्जा कर लिया था. इस उपद्रव के कारण एयरपोर्ट्स अथॉरिटी के लगभग 55 प्रतिशत कर्मचारी काम पर आए ही नहीं. हॉवड़ा स्टेशन पर होने वाले रेलवे इम्प्लाइज यूनियन के चुनाव में भी इसी नजारे की उम्मीदें लगाई जा रही है. “ये तो राष्ट्रीय चुनाव है, और मुंबई व दिल्ली के मतदाता भी वोट देने आएंगे. लेकिन मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनस के पोस्टरों से पटे होने और कामकाज ठप्प होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. दरअसल, ये सब सिर्फ बंगाल में ही संभव है, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इस तरह के चुनावों को अपने जनाधार से जुड़ाव का आदर्श रास्ता मानती है. यही दरअसल कैडर हैं”, कहते हैं सीपीआई(एमएल) के ही कार्तिक सेन.

शहर के जादवपुर विश्वविद्यालय में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान छात्रा सोहिनी मजुमदार कहती हैं, “सभी पार्टियों की तरह वाम मोर्चे में और सीपीएम में भी इस तरह के लोग इसलिए हैं, क्योंकि आप खुद इस तरह के लोगों का समर्थन चाहते हैं. लेकिन उनके बारे में नकारात्मक सोच इसलिए बन गई है क्योंकि ज्यादातर घटनाओं में उनके बुरे पक्ष को ही सामने लाया जाता है.” इस तरह की शुरुआती घटनाओं में से एक 1990 में उत्तरी कोलकाता के विधानसभा चुनाव में हुई थी जहां स्थानीय डॉन नंदा के नेतृत्व में अपराधियों ने सुबह 10 बजे ही बूथ पर कब्जा कर लिया था. स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से सक्रिय रूप से जुड़ी मजुमदार स्वीकारती हैं, “वहां नंदा का खुलेआम रिवाल्वर लहराना निश्चितरूप से परेशान करने वाली बात थी.” लेकिन वो ये भी कहती हैं कि अब परिस्थिति बदल रही है और हाल ही में पार्टी ने इस तरह के 12 हजार लोगों को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया है.

प्रेसीडेंसी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अमाल मुखर्जी कहते हैं, “कैडर ब्रिगेड, कार्यकर्ता बनने के लिए मौका देख कर सुविधानुसार अपने रंग बदलता है. चूंकि उनके पास आरएसएस की शाखा की तरह कोई नियमित अड्डा नहीं होता और उन्हें रोज सुबह परेड नहीं करनी पड़ती, लिहाजा उन्हें पहचानना मुश्किल होता है.”

पास के ही सरकारी स्कूल में पार्टी की स्थानीय शाखा की एक बैठक चल रही है जहां कार्ल मार्क्स, लेनिन, प्रमोद दासगुप्ता व ज्योति बसु जैसे नेताओं के कटआउट लगे हुए हैं. पूछे जाने पर सभा के आयोजक अनिरबन रॉय चौधरी कहते हैं, “यहां ऐसी कोई गलत चीजें नहीं है. किसी के पास कोई गोली-बंदूक नहीं होती. ये तो पश्चिम बंगाल के बारे में मीडिया की अपनी कपोल कल्पना है. कैडर तो अनुशासित कार्यकर्ता मात्र होते हैं जो पार्टी हित में जमीनी जनाधार जुटाने का काम करते हैं.”

वामपंथी विचारधारा के कट्टर समर्थक, केंद्रीय कर्मचारी उत्पल मित्रा कहते हैं, “कोई राजनीतिक पार्टी किसी राज्य में तीन दशक तक सिर्फ इस वजह से सत्ता में नहीं रह सकती, क्योंकि उसके पास कैडर के रूप में असामाजिक तत्व हैं.” मित्रा नंदीग्राम के प्रेत को दफन करने के लिए शहर भर में निकाली जा रही रैलियों का नियमित हिस्सा होते हैं. वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है.

अब सवाल ये उठता है कि राज्य भर में कैडरों की वृद्धि को आखिर प्रोत्साहित किसने किया है और उनकी संख्या इतनी कैसे हो गई जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है? विश्लेषक कहते हैं कि शुरुआत 1977 में सीपीएम के सत्ता में आने के साथ हुई. पश्चिम बंगाल में रीयल एस्टेट कारोबार में तेजी की शुरुआत ही हुई थी. इससे जुड़े हर तरह के फायदे पार्टी से जुड़े लोगों को दिए जाने लगे. देखादेखी और लोग भी बहती गंगा में हाथ धोने को सीपीएम से जुड़ने लगे. भूमि सुधारों ने भी लोगों की पार्टी के प्रति अंधस्वामिभक्ति सुनिश्चित की.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निरबेद रे कहते हैं, “वास्तव में सीपीएम में कैडरों की भीड़ 1990 में आनी शुरू हुई और ये आज तक जारी है.” रे आगे जोड़ते हैं, “इन कैडरों ने राज्य के मतदाताओं का विस्तृत डाटाबेस तैयार किया, जो चुनावों के दौरान पार्टी के काम आया और क्षेत्र पर पकड़ बनाने में उनकी मदद की. कैडरों के पास अपने पास-पड़ोस के बारे में जो सूक्ष्म जानकारी होती है, वो अन्य पार्टियों के पास नहीं होती और ये जानकारी उन्हें बड़ी मदद पहुंचाती है.” रे की मानें तो वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है. “लेकिन आज अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों व नव उदारवादी नीतियों का समर्थन, बाहुबलियों पर भरोसा और अपने सहयोगियों के प्रति उपेक्षापूर्ण बरताव वामपंथी राजनीति का शगल बन गया है.” रे आगे कहते हैं, “आज तो कैडर नंदीग्राम में लोगों को धमकाने, उन्हें वहां से बेदखल करने या फिर उन्हें अपने प्रभाव में लेने संबंधी पार्टी के अभियान का एक अहम हिस्सा बन गए हैं.”

कैडरों की क्रूरता की पहली घटना 1978 में तब सामने आई थी जब उन्होंने बीरभूमि जिले के मारिचझापी में असहाय बांग्लादेशी शरणार्थियों पर फायरिंग में पुलिस का साथ दिया था. रे कहते हैं कि “उसके बाद तो इस तरह की घटनाओं का सिलसिला सा चल पड़ा. शहर के एक पुल से गुजर रहे 17 आनंदमार्गियों की सरेआम हत्या इसी तरह की एक जघन्य घटना थी, लेकिन नंदीग्राम आज इन सभी घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पर पहुंच गया है क्योंकि सभी को ऐसा लग रहा है कि हथियारबंद कैडरों की वहां उपस्थिति व उनके द्वारा की गई हिंसा को पार्टी खुद ही जायज ठहरा रही है.”

वरिष्ट स्तंभकार प्रभाष जोशी भी सच की पड़ताल में एक दल के साथ नंदीग्राम गए थे. उनका कहना है कि कैडर नजर न आने वाली ऐसी इकाई है जिसमें अनवरत बढ़ोतरी हो रही है. “ये तो आप भाग्यशाली थे जो नंदीग्राम में इनमें से कुछ को देख पाए, वरना ग्रामीण इलाकों में जिन कैडरों को बाइक वाहिनी के रूप में जाना जाता है, उनके बारे में तो शायद ही किसी को पता हो.”

राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एस.एन. भार्गव कहते हैं कि कैडर एक ऐसी विध्वंशक सेना हैं जिसकी ताकत पुलिस की मिलीभगत से बनती है. भार्गव कहते हैं, “नंदीग्राम के कैडर पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा व 24-परगना जिलों से आए थे और वे स्वचालित आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल में पूर्ण प्रशिक्षित थे.”

कुछ भी हो कैडर तो इन सब चर्चाओं से बेखबर अपनी प्राथमिकता वाले कामों में आज भी व्यस्त हैं. और ये काम हैं--नंदीग्राम की हिंसा की लीपापोती और सरकारी तंत्र के पार्टी हितों के आगे घुटने टेकने के आरोपों को खारिज करना.

:-तहलका से साभार

04 दिसंबर 2007

डॉलर : साम्राज्य में सेंध


रेयाज-उल-हक
द इकोनॉमिस्ट भले ही इस बात पर खुशी जाहिर कर रहा हो कि डॉलर अभी ध्वस्त नहीं होने जा रहा है. मगर यह एक विश्व मुद्रा के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं कि वह एक मॉडल के पारिश्रमिक भुगतान में असमर्थ साबित हो. ब्राजील की सुपर मॉडल गीसेल अब डॉलर स्वीकार नहीं कर रही हैं.
और ऐसा करनेवाली गीसेल अकेली नहीं हैं. अरबपति जार्ज सोरोस के पूर्व पार्टनर जिम रोजर्स अपनी पूरी जायदाद और मकान बेच रहे हैं, ताकि वे पूरी संपत्ति चीनी यूआन में तबदील कर सकें. एयर बस ने पहले ही डॉलर के इस संकट को प्राणघातक कहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने इकोनॉमिक वार की चेतावनी दी है.
अमेरिकी पूंजी का अमेरिका से बाहर निवेश होना और बुश द्वारा युद्ध पर किये जा रहे भारी खर्च के बीच मांग और आपूर्ति के सिद्धांत में विश्वास रखनेवालों को यह अभी आकलन ही करना है कि डॉलर की मांग में कमी डॉलर की कीमत और अमेरिकी शक्ति को किस तरह डुबो रही है.
दुनिया भर के अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि डॉलर का इस तरह लुढकते जाना नियंत्रण से बाहर हो सकता है. और अगर ऐसा हुआ तो अमेरिकी साम्राज्य का बने रहना असंभव हो जायेगा.
अगर हम थोडी कल्पना करने की इजाजत लें तो हम देखेंगे कि अमेरिका के लिए तब भारी मुश्किल पैदा हो जायेगी, जब उसका डॉलर विश्व मुद्रा के रूप में अपना अस्तित्व खो देगा. तब अमेरिका को विदेशों में स्थित अपने ७३७ सैनिक अड्डों के खर्च के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित करनी होगी. और अभी अमेरिका के ८०० बिलियन व्यापार घाटे को देखते हुए यह असंभव लगता है. जब डॉलर रिजर्व करेंसी के रूप में नहीं रह जायेगा, विदेशी निवेशक अमेरिकी व्यापार और बजट घाटे में पैसा लगाना भी बंद कर देंगे.
२००२ में, जबकि डॉलर का प्रभुत्व विश्व अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक था, के बाद से वह संयुक्त रूप से विश्व की शेष करेंसियों के मुकाबले २४ प्रतिशत नीचे गिरा है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में ०.७५ प्रतिशत की कटौती के बावजूद इसकी गिरावट जारी है. बढी हुई मुद्रास्फीति से उबरने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जाती है. मगर अब अमेरिका में यह मांग उठने लगी है कि डॉलर को विनाश से बचाने के लिए अभी और कटौती पर रोक लगायी जाये.
अभी कुछ समय पहले यह खबर आयी थी कि दुनिया के सात देश डॉलर का परित्याग करनेवाले हैं. इनमें दक्षिण कोरिया, वेनेजुएला, ईरान, सूडान, चीन और रूस के साथ आश्चर्यजनक रूप से सऊदी अरब भी शामिल है. सऊदी अरब ने हाल में तब ब्याज दरों में कटौती से इनकार कर दिया, जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें घटायीं. जानकारों का कहना है कि यह स्थिति अमेरिकी डॉलर के लिए एक विश्व मुद्रा के रूप में बेहद खतरनाक हालात पैदा करेगी. अमेरिका के साथ लेन-देन में अकेले सऊदी अरब की ८०० बिलियन डॉलर की भागीदारी है. और अगर सऊदी अरब ने डॉलर का साथ छोड दिया तो यह मध्य पूर्व में डॉलर के लिए एक बडा झटका साबित होगा. पूरे मध्य पूर्व के साथ अमेरिका का ३५०० बिलियन का लेन-देन है. दक्षिण कोरिया अगस्त में १०० मिलियन डॉलर बेच चुका है और ऐसी खबरें हैं कि वह एक बिलियन अमेरिकी बांड बेचनेवाला है. चीन के बारे में माना जाता है कि वह डॉलर को उडा देने की क्षमता रखता है.
नवंबर, २००५ में दक्षिण कोरिया के मात्र इतना कहने से कि वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार में कटौती करने की योजना पर विचार कर रहा है, डॉलर के इतिहास में सबसे बडी एकदिवसीय गिरावट आयी थी. उस समय द कोरिया के पास मात्र ६९ बिलियन डॉलर का रिजर्व था. हम कल्पना कर सकते हैं कि चीन और जापान जैसे देशों, जिनके पास कुल मिला कर लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का विदेशी भंडार है, यदि डॉलर में कटौती पर विचार करें तो क्या हालत हो सकती है.
हम संकेतों को पढ सकते हैं. मध्य पूर्व में ताजा राजनीतिक-सैन्य गतिविधियों को देखें तो युद्ध को लेकर अमेरिकी उतावली और ईरान के खिलाफ नये सिरे से और तेज लामबंदी का डॉलर के इस घटते प्रभुत्व से भी संबंध है. २००३ में इराक पर सारी दुनिया की जनता के प्रतिरोध को नजरअंदाज करते हुए थोपे गये युद्ध के पूर्व भी ऐसी ही स्थिति थी. तब साम हुसेन ने अपने १० बिलियन अमेरिकी डॉलर के भंडार को यूरो में बदल दिया था और उसकी देखा-देखी कई और देश इस राह पर जाने को तैयार थे.
१९७० के बाद से जारी वैश्विक मंदी से निकलने के लिए कि्वे ग्वे सारे उपा्व असफल साबित हुए हैं. उल्टे संकट और सघन हुआ है. लैटिन अमेरिका, एशि्वा और अफ्रीका में जनता के तेज होते प्रतिरोध संघर्षों के बीच उसका संकट और बढेगा ही.
...और जाहिर है, ऐसे में द इकोनॉमिस्ट' के लिए राहत भरे दिन लंबे समय तक नहीं नहीं रहनेवाले हैं.

03 दिसंबर 2007

लज्जा : तसलीमा की नहीं, हमारी



क्या तसलीमा नसरीन की कहानी हमारे समाज की उदारता के पतन की कहानी है? शांतनु गुहा रे बता रहे हैं कि जब राजनीतिक हितों पर आंच आती नजर आती है तो दक्षिणपंथी और वामपंथी एक ही पंथ पर चल पड़ते हैं.

“बारी फिरबो सुनिल दा...कोतो दिन बारी जाई नी. कोतो दिन बारी फिरे कोब्जी डूबिए गोरोम दाल भात खाई नी, किच्छू बूझते पारछी ना कि होछे.” (मैं घर लौटना चाहती हूं, सुनिल दा. घर गए और अपना मनपसंद गर्म दाल-भात खाए कितने दिन गुजर गए. मुझे समझ नहीं आता कि ये क्या हो रहा है.)

ये वे शब्द हैं जो 2004 में तसलीमा नसरीन ने बंगाली लेखक सुनिल गंगोपाध्याय से तब कहे थे जब वे जर्मनी के म्यूनिख शहर में थीं. शायद इन दिनों भी उनकी मनोदशा कमोबेश ऐसी ही हो. बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन दर-दर भटकने को मजबूर हैं. वह भी एक ऐसे देश में जिसे वह अपना घर कहती आई हैं. वह एक ऐसी अनचाही और असुविधाजनक वस्तु हो गई हैं जिससे हर कोई पीछा छुड़ाता नजर आ रहा है. तसलीमा इसलिए अनचाही हो गईं थीं कि उन्हें सुरक्षा देने से वामदलों को प. बंगाल में कीमती मुस्लिम वोटों के खिसकने का डर लग रहा था. और हास्यास्पद ही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इस पेशकश से की कि ‘तसलीमाबेन’ गुजरात में रहें.

तसलीमा जब भारत पहुंची थी तो उन्हें यकीन था कि यहां उन्हें लिखने और बोलने की आजादी होगी. उनके ऐसा सोचने की वजह भी थी. लोकतंत्र और सामाजिक अधिकारों के लिए लड़ने वालों को भारत ने हमेशा पनाह दी है. उदाहरण एक नहीं अनेक हैं--दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायी, नेपाली कांग्रेस के कई नेता, फैज़ अहमद फैज़ और फाहमिदा रियाज़ जैसे पाकिस्तानी लेखक, शेख मुजीबुर्र रहमान की पुत्री शेख हसीना वाज़ेद, अफगानिस्तान के नजीबुल्ला और उनका परिवार.

तो फिर अचानक तसलीमा नसरीन के साथ ही ऐसा क्या हो गया?

जवाब सीधा मगर शर्मिंदा करने वाला है. तसलीमा राजनीतिक रूप से तकलीफदेह हो गईं थीं और इसलिए उन्हें निकाल बाहर किया गया. अप्रत्याशित ये रहा कि उन्हें धक्का देने वाले हाथ इस बार वामपंथियों के थे जिन्होंने सामाजिक अधिकारों और आजादी की बड़ी-बड़ी बातें के बीच अचानक अपना असली चेहरा जाहिर कर दिया है. वह चेहरा जो पार्टी के हित के लिए आजादी और अधिकारों के दमन से बनता है. ऐसा ही कुछ नंदीग्राम में हुआ और यही तसलीमा नसरीन के साथ भी दोहराया गया. मुस्लिमों का एक वर्ग इस जानी-मानी लेखिका के विरोध में सड़कों पर क्या उतरा कि तसलीमा को बंजारा बना दिया गया. उन्हें आनन-फानन में पहले जयपुर रवाना किया गया, उसके बाद दिल्ली और अब वह राजधानी के आसपास किसी गोपनीय जगह पर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की सुरक्षा में हैं.

वामदल हमेशा से लेखकों और कलाकारों के खिलाफ संघ परिवार की असहिष्णुता पर लानत भेजते रहे हैं लेकिन अचानक ही इस घटना ने उनके दोगलेपन को सामने ला दिया है. तसलीमा इसलिए अनचाही हो गईं थीं कि उन्हें सुरक्षा देने से वामदलों को प. बंगाल में कीमती मुस्लिम वोटों के खिसकने का डर लग रहा था. और हास्यास्पद ही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इस पेशकश से की कि ‘तसलीमाबेन’ गुजरात में रहें. नई दिल्ली में मौजूद उनके साथी शायद वाम को शर्मिंदा करने और अपनी खामियों से ध्यान हटाने के लिए तसलीमा बचाओ अभियान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे थे. वामपंथियों की असहिष्णुता ने अचानक ही दक्षिणपंथियों को अपनी असहिष्णुता के बचाव का ब्रह्मास्त्र दे दिया है. जहां तक केंद्र का सवाल है तो उसकी जबान ज्यादातर मौकों पर दबी ही रही. जैसा कि एक कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ये एक गंदा राजनीतिक खेल बन गया है. किसी को तसलीमा की चिंता नहीं है. सबको अपने वोटबैंक की पड़ी है.”

विचारों की आजादी का मुद्दा राजनीतिक बयानों में कहीं दिखाई नहीं दे रहा. जैसा कि जाने-माने लेखक और संपादक जॉय गोस्वामी कहते हैं, “उनके (तसलीमा के) लेखन की आलोचना की जा सकती है पर जिस तरह से उन्हें निकाला गया यह खेदजनक है.” ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमन्स एसोसिएशन की महासचिव कुमुदिनी पति भी इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, “इसे और कुछ नहीं बस अपने मतलब के लिए किसी के पीछे पड़ना कहा जा सकता है. हैरानी हो रही है कि आखिर कलाकारों को राजनीतिक गोटियों की तरह इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है? नंदीग्राम और रिजवानुर मुद्दे पर प. बंगाल के मुस्लिम नाराज हैं और ऐसे में तसलीमा को कोलकाता से बाहर करना राजनीति से प्रेरित कदम ज्यादा लगता है.” “अब जब सरकार ने बयान दे दिया है तो कौन ये फैसला करेगा कि किस चीज से भारत में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचती है और किससे नहीं.क्या उन्हें हर बार अपनी मूल प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भेजनी होगी?”

उधर, सीपीएम ऐसी किसी भी बात से इनकार करती है. लेकिन इस मामले में उसका रुख साफ है कि पार्टी तसलीमा को सुरक्षा देकर अपने वोट बैंक के नुकसान का खतरा मोल नहीं ले सकती. पार्टी प्रवक्ता सीताराम येचुरी तीखे सुर में कह चुके हैं कि तसलीमा को वीजा देने वाले केंद्र को उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए. पिछले तीन साल से तसलीमा का घर रहे कोलकाता में राज्य सरकार और पुलिस विभाग के आला अधिकारी इस मामले पर कोई टिप्पणी करने के लिए तैयार नहीं हैं. हालांकि राइटर्स बिल्डिंग में बैठे उच्चाधिकारी विनम्र और अनिश्चित लहजे में ‘तसलीमा की वापसी का स्वागत है’ जैसी बातें जरूर कह रहे हैं, लेकिन पुलिस ने यह साफ कर दिया है कि तसलीमा वहां अवांछित हैं. कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर विनीत गोयल का कहना था, “हमें फौरन उन्हें बाहर भेजने के आदेश थे. हमने सुरक्षा कारणों के चलते उन्हें बाहर भेजा और ऐसा करने के निर्देश राज्य के गृह विभाग से आए थे.”

लेकिन बात छोटी-मोटी नहीं थी. तसलीमा की जिंदगी में आए इस नए भूचाल से उपजी तरंगों को प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने में देर नहीं लगी. युगांडा की राजधानी कंपाला में राष्ट्रकुल देशों के सम्मेलन से वापस आने के बाद प्रधानमंत्री ने सबसे पहले यह संदेश बाहर भेजा कि सरकार कट्टरपंथी ताकतों द्वारा तसलीमा के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगी और उनकी सुरक्षा हर कीमत पर सुनिश्चित करेगी. विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद को आश्वासन दिया कि सरकार न केवल तसलीमा के वीजा की अवधि बढ़ाएगी बल्कि उन्हें सुरक्षा भी प्रदान करेगी. गौरतलब है कि तसलीमा ने स्वीडन की नागरिकता ली हुई है और भारत में उनका वीजा फरवरी 2008 में खत्म होना है.

मगर वोट बैंक की चिंता तो कांग्रेस को भी है. इसीलिए सुरक्षा की बातें तो की गईं लेकिन साथ ही तसलीमा को, उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए, ये पाठ भी पढ़ाया गया. प्रणव मुखर्जी के शब्द थे, “यह उम्मीद की जाती है कि मेहमान उन गतिविधियों से परहेज करेंगी जिनसे हमारे लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचे.”

मशहूर चित्रकार सुवाप्रसन्ना के मुताबिक इस हिदायत से तसलीमा के लेखन की आजादी पर कोई न कोई असर तो पड़ेगा ही. वह कहती हैं, “अब जब सरकार ने बयान दे दिया है तो कौन ये फैसला करेगा कि किस चीज से भारत में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचती है और किससे नहीं.क्या उन्हें हर बार अपनी मूल प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भेजनी होगी.” जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के शिक्षक जोया हसन कहती हैं, “दुखद ये है कि कोई भी इसका विरोध नहीं कर रहा. उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाए.” लेखक सुनिल गंगोपाध्याय भी नाराजगी भरे स्वर में कहते हैं, “किसी न किसी को जिम्मेदारी तो लेनी ही होगी. आखिर किसी लेखक को इस तरह परेशान कैसे किया जा सकता है?”

गंगोपाध्याय अनुमान लगाते हैं कि अगर तसलीमा ने 2004 के बाद अपनी कोई कृति प्रकाशित नहीं की है तो इसके पीछे की एक वजह शायद उनकी परेशानियों को लेकर कोलकाता के प्रबुद्ध वर्ग की खामोशी भी हो सकती है. तसलीमा ने उस साल जब अपनी आत्मकथा का चौथा भाग ‘साइ सोब ओंधोकार’ (वही अंधकार) लिखा था तो बांग्लादेश सरकार ने ये कहते हुए तुरंत इस पर प्रतिबंध लगा दिया था कि इसमें पैगंबर के बारे में आपत्तिजनक बातें हैं.

गौरतलब है कि पुलिस द्वारा कई बार शहर छोड़ने के सुझाव को तसलीमा ने कोई तरजीह नहीं दी थी. इसलिए ये भी कहा जा रहा है कि राज्य सरकार ने 22 नवंबर को कोलकाता में हुई हिंसा को तसलीमा से छुटकारा पाने के लिए इस्तेमाल किया. गुपचुप रूप से ये भी कहा जा रहा है कि ये हिंसा कई सालों से तसलीमा के खिलाफ सुलग रहे गुस्से का परिणाम हो सकती है. इसी साल अगस्त में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने तसलीमा के खिलाफ मौत का फतवा भी जारी किया था. लेकिन आलोचकों के मुताबिक कोलकाता में हुई हिंसा तसलीमा को लेकर नहीं बल्कि नंदीग्राम के विरोध में थी.

लेकिन कोलकाता छोड़ना शायद तसलीमा की मुसीबतों का अंत न हो. विश्वस्त सूत्रों ने तहलका को बताया है कि परदे के पीछे तसलीमा को इस बात के लिए राजी करने की कोशिशें हो रही हैं कि वह स्वीडन या किसी दूसरे यूरोपीय देश चली जाएं. दिल्ली में स्वीडन के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन ने हमें बताया कि उनका देश तसलीमा के वापस लौटने का स्वागत करेगा.

लेकिन सवाल ये है कि अगर तसलीमा को भारत छोड़ना भी पड़ा तो क्या हम खुद को कभी सही अर्थों में उदार लोकतंत्र की संज्ञा दे पाएंगे? क्या ये हमारी छवि पर एक और दाग नहीं होगा?

:-तहलका से सभार

28 नवंबर 2007

भूमंडलीकरण एक प्रचार :-















ए.वी.वर्धन

इन दिनों भूमंडलीकरण एक बहु-प्रचारित अवधारणा है। यह आर्थिक विषयों पर सभी लेखन तथा बातचीत से सामने आ जाता है। इसे एक बड़ी वास्तविकता के रूप में स्वीकार करने के लिए दबाव बढ़ रहा है। यह दलील दी जाती है कि इससे बचा नहीं जा सकता है। स्पष्टत: इसका उद्देश्य सहज सत्य बतलाना नहीं है कि हम सभी `एक ही भूमंडल´ में रहते है। यह भौगोलिक तथ्य तो मंद बुद्वि के लिए भी साफ है। न ही इसका उद्देश्य इस नवीनतम सत्य को सामने लाना है कि संचार प्रौद्योगिकी में क्रांति ने दूरियों को काफी कम कर दिया है और विश्व एक `भूमंडलीय गांव´ बन गया है।
भूमंडलीकरण एक नीति-एक आर्थिक, सामाजिक तथा राजनितिक नीति का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक ऐसी नीति है जिसकी कुछ शक्तिशाली हितों द्वारा आक्रामक रूप से वकालत की जाती है और उन लोगों के गले में जबर्दस्ती उतारने का प्रयास किया जाता है जो असहाय हो कर इसे स्वीकार कर सकते हैं या इसका विरोध करने का प्रयास कर सकते हैं, हालांकि उन्हें अधिक सफलता नहीं मिल सकती हैं। ऐसे भी लोग हैं जो यह कहते हैं कि आप इसे उतना ही पीछे कर सकते हैं जितना आप किसी लहर को पीछे कर सकते हैं। यह देर-सबेर प्रत्येक देश को अपने आगोश में ले लेगा।
भूमंडलीकरण वास्तव में `नव-उदारवादी´ की संतति हो सकता है और अपने अभिभावक की भांति यह भी एक नीति है जिसे साम्राज्यवादी देशों द्वारा आगे बढ़ाया जाता है और वह तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ नििर्दष्ट है जिन्हें वह अपना िशकार बनाता है। तीन बहनें- उदारवाद, निजीकरण और भूमंडलीकरण साथ-साथ चलती हैं।
तीसरी दुनिया के देशों ने पिछली दो या तीन सदियों से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व के तहत तकलीफें भोगी हैं। उन्होंने अपने उननिवेशी स्वामियों से पिछड़ेपन की विरासत प्राप्त की है। 20वीं सदी के मध्य या उत्तरार्ध के दौरान स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से वे अपने को कठोर स्थिति में पाते हैं, खासकर पूंजी तथा प्रौद्योगिकी के मामले में जिसकी विकास के लिए जरूरत है। वे हर क्षेत्र में अर्धविकास से पीिड़त हैं। भयंकर गरीबी, उच्च बेकारी, निरक्षरता, स्वास्थ्य-देखभाल का अभाव ही उनकी नियति बन गयी है।
द्वितीय विश्वययुद्ध की समाप्ति के बाद जो इतिहास का सर्वाधिकार विध्वंसकारी युद्ध था- विजेता ब्रेटनवूड्स सम्मेलन में शामिल हुए और उन्होंने पुनिर्नर्माण तथा विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की स्थापना की। इन संस्थानों पर विकसित पूंजीवादी देशों खासकर अमरीका का प्रभुत्व कायम हो गया । जल्द ही वे यह निर्देश देने के औजार हो गये कि अपनी जरूरतों के लिए इन संस्थाओं से कर्ज लेने वाले ग्राहक देशों की किस तरह की आर्थिक नीतियां अपनानी चाहिए। कर्जों के साथ लगातार `शर्तो´ को भी थोप दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने एक पूर्ण संरचनात्मक समायाजोन कार्यक्रम को जोड़ दिया जो सभी विकासशील देशों के लिए एक रामबाण हो गया, चाहे उनकी खास विशेषता जो भी हो।
संयुक्त राष्ट्र ने एक `नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था´ की रूपरेखा तैयार की। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ऐसी व्यवस्था की बातें बंद हो गयीं और उसकी जगह अमरीका निर्देिशत `नयी आर्थिक व्यवस्था´ की बात की जाने लगी। ` नव- उदरतावाद ´ का आर्थिक दशZन इस क्षेत्र में प्रभावी होने लगा। `मुक्त बाजार´ प्रतिस्पर्धा, निजी उद्यम, संरचनात्मक समायोजन आदि की बातों के आवरण में तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों जो अमरीका तथा ग्रुप-8 देशों से काम करती हैं, नवगठित विश्व व्यापार संगठन के औजार साथ जो असमान गैट संधि द्वारा सामने लाया गया, साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया के देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण करने का निष्ठुर अभियान शुरू कर दिया है। यह और कुछ नहीं बल्कि नये रूप में, नये तरीके से समकालीन विश्व स्थिति में नव उपनिवेशी शोषण थोपने का एक तरीका था। उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडीकरण प्रिय मुहावरा हो गये हैं।
तथ्य यह साबित कर रहे हैं कि इन सभी नीतियों ने वस्तुत: गरीबी, बेकारी, निरक्षरता तथा बीमारी की समस्याओं को और अधिक गहरा किया है जिनसे विकासशील देशा लगातार पीडित रहे हैं। इन नीतियों ने अमीर तथा गरीब देशों के बीच एवं प्रत्येेक देश में अमीर तथा गरीब के बीच खाई को बढ़ाया है।
विश्व व्यापार संगठन की कार्यविधि के जरिये सभी देशों पर निवेश पर बहुपक्षीय समझौते को थोपने के प्रयास का उद्देश्य भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाना एवं आगे बढ़ाना है जिसकी पहल अमरीका ने यूरोपीय यूनियन तथा आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के समर्थन से की है। वह विकासशील देशों की आर्थिक संप्रभुता का भितरघात करेगा।
नव-उदार भूमंडलीकरण एक अराजक विश्व का निर्माण कर रहा है जो पूंजीवाद, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं विश्व व्यापार संगठन के अंधे कानूनों की दया पर निर्भर रहेंगें। क्या भूमंडलीकरण यह काम कर सकता है ? या मानव जाति की बुनियादी समस्याओं का समाधान कर सकता है ? ऐसा भूमंडलीकरण आर्थिक संकट ही लायेगी जो अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लेगा। हम ऐसे संकट के पूर्व संकेतों को देख रहे हैं।
इस तरह का भूमंडलीकरण नििश्चत तौर से अधिकांश देशों में मेहनतकश जनता की उपलब्धियों की निष्फल कर देगा।
हम केवल एक भूमंडलीकरण की परिकल्पना कर सकते हैं वह है समाजवादी भूमंडलीकरण जिसकी माक्र्स ने 150 वषZ पहले परिकल्पना की थी। लेकिन वह अभी काफी दूर है। पर इसके लिए संघषZ को विकसित किया जाना है। जन- प्रतिरोध तथा सभी विकासशील देशों के संयुक्त रूख ने नव-उदावादी भूमंडलीेकरण के प्रस्तावकों की योजनाओं को पराजित किया जा सकता है और एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर आधारित एक भूमंडलीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।